Wednesday, December 24, 2008


शहादत तो शहादत है उस पर सवाल कैसा
मगर सच्चाई का सामने आना भी राष्ट्र के हित में है
भारत के इतिहास में यह पहला अवसर है जब पूरा देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुट है, हिंदू भी, मुस्लमान भी और अन्य देशवासी भी। मुंबई में आतंकवादियों के हमले के तुंरत बाद पहले गेट वे ऑफ़ इंडिया और फिर देश के दूसरे शहरों में भारतीय जनता ने जिस एकजुटता का प्रदर्शन किया, वह आतंकवादियों के मुहँ पर भरपूर तमांचा है। शायद आतंकवादियों का बम धमाकों के द्वारा मकसद था की भारत को गृहयुद्ध का शिकार बना दिया जाए, हिंदू और मुस्लमान एक दूसरे के खिलाफ मोर्चेबंदी पर मजबूर हों और इस प्रकार उन के नापाक इरादे पूरे हो जाएँ। उन्हें यह दृश्य देख कर अवश्य ही मायूसी हुई होगी की उन का मकसद पूरा नहीं हुआ और साथ ही देश के राजनीतिज्ञों ने भी यह भली भांति समझ लिया होगा की भारतीय जनता का यह प्रदर्शन उन के लिए भी किसी सबक से कम नहीं है। क्यूंकि वह अब न उनके पारंपरिक बयान सुनना चाहते हैं और न किसी तरह की सफाई में उन की रूचि है। यहाँ तक की सहायता स्वरुप दी जाने वाली धनराशि में भी पीडितों को कोई रूचि नहीं है। लेकिन यह तस्वीर का एक रुख है। अब नज़र डालिए तस्वीर के दूसरे रुख पर।
भारत ही नहीं शायद विश्व इतिहास में ऐसा पहला अवसर है जब किसी देश की संसद सत्तारूढ़ पार्टी, विपक्ष और अन्य राजनितिक दल सब के सब किसी एक आतंकवादी के बयान पर एक जुट हैं।
हमारे देश भारत की अखंडता पर हमला करने वाले आतंकवादियों में से जिंदा पकड़े जाने वाले एक अजमल आमिर कसाब नामक आतंकवादी का बयान पुलिस के माध्यम से मीडिया और सरकार तक पहुँचा है, उस बयान पर मीडिया खास तौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो अपने अपने अंदाज़ में उस की पब्लिसिटी कर ही रहा है, मगर हैरान करने वाली बात यह है की हमारी सरकार और दूसरी सभी पार्टियों ने भी बिना किसी विलंब के इस बयान को इतना प्रमाणित मान लिया मानो येही अन्तिम सत्य है और इस बयान को जारी करने वाला कोई आतंकवादी या अपराधी नहीं, कोई ऐसा विश्वसनीय और सत्यप्रिय व्यक्ति है जिस की ज़बान से निकलने वाला एक एक शब्द हमारे लिए स्वीकार्य है, न तो इस में संदेह की गुंजाईश है और न किसी अन्य जांच की। हाँ! अगर इस जांच के नाम पर कुछ बातें सामने आजाती हैं तो वे भी वहीँ हैं जो उस के बयान को सही साबित कर सकती हों।
ऐसी बात न तो उस आतंकवादी ने कही जिस से परदे के पीछे की घटनाओं को समझा जा सके और न ही हमारी पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने उन तमाम सबूतों पर नज़र डाली जो चारों तरफ़ बिखरे पड़े हैं। हम अपने इसी लेख की १०० वीं किस्त में ऐसे बहुत से सबूतों को सामने लाने वाले हैं, जिस की एक झलक आज की इस किस्त में भी पाठकों की सेवा में प्रस्तुत की जा रही है। लेकिन पहले ज़रा एक नज़र राजनेताओं के रवैये पर।
विपक्षी सांसदों का रवैया तो समझ में आता है, इस लिए की आमिर कसाब का बयान तो उन के लिए बड़े संतोष की बात है। हेमंत करकरे मालेगाँव बम धमाकों के बाद अपनी और अपनी टीम की जांच द्वारा आतंकवाद के जिस नेटवर्क को बेनकाब कर रहे थे उस के घेरे में भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के लोग भी आने लगे थे। अत: उन की समझ में आगया था की अगर यह आग उन के दामन तक पहुँची तो वे और उन के हिंदू राष्ट्र के सपने सहित सारी राजनितिक योजनायें अर्थात सब कुछ ख़ाक में मिल जायेंगी, येही कारण था की इन रहस्योद्घतनों के बाद उन्होंने हेमंत करकरे के खिलाफ हर स्तर पर मोर्चेबंदी शुरू कर दी थी। न केवल यह की उनके खिलाफ हर तरफ़ से ज़हर उगला जा रहा था, बल्कि उन्हें जान से मारने की धमकियाँ तक मिल रही थीं, जिस का ज़िक्र उन्हों ने अपनी ज़िन्दगी में ही किया था, जो अधिकान्क्ष अखबारों में छपा और रोजनामा राष्ट्रीय सहारा ने भी इन घटनाओं को सामने रखा। कुछ छोटी राजनितिक पार्टियों की यह मजबूरी हो सकती है की वे अपने दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहती हैं, आज वह कांग्रेस के साथ हैं, इस लिए की कांग्रेस सत्ता में है। कल अगर कांग्रेस के स्थान पर वह पार्टी सत्ता में आजाये जो विपक्ष में है तो फिर उन्हें उस के दरवाज़े पर भी दस्तक देने की आव्यशकता हो सकती है। आज उस के विरुद्ध आवाज़ उठाने के बजाये खामोशी ही बेहतर है। परन्तु अब प्रशन यह उठता है की कांग्रेस के सामने ऐसी क्या मजबूरी थी की वह एक आतंकवादी के बयान पर अडिग रहने और रखने के लिए दृढ़संकल्प है। केन्द्र सरकार में केंद्रीय मंत्री अब्दुर रहमान अंतुले ने शहीद हेमंत करकरे की मौत के कारण जानने की बात कह दी तो इस में इस कदर तूफ़ान खड़ा करने का क्या कारण था? हाँ यदि अडवाणी एंड पार्टी में भूकंप आजाये, संघ परिवार सकते की स्थिति में पहुँच जाए, शिव सेना चीखने चिल्लाने लगे, यह बात तो समझ में आती है क्यूंकि यह सब वही लोग हैं जिन्हें हेमंत करकरे बेनकाब कर रहे थे और जिन के लिए अजमल आमिर कसाब का बयान किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है। परन्तु कांग्रेस के लिए तो अब्दुर रहमान अंतुले द्वारा उठाई गई आवाज़ राहत पहुँचा रही है। जो लोग कांग्रेस की भूमिका को भारतीय जनता पार्टी के साथ जोड़कर देखने लगे थे और जिन्हें एक तरह से कांग्रेस भी भगवा रंग में रंगी नज़र आने लगी थी, उस से छुटकारा दिलाने का कम किया, ऐ आर अंतुले ने। अत: कांगेस को तो अपने केंद्रीय मंत्री का आभारी होना चाहिए था। बहर हाल इस और अभी चिंतन की गुंजाईश बाकी है। क्यूंकि कांग्रेस ने अभी कोई आखिरी फ़ैसला नहीं किया है। सम्भव है की उसे यह ख्याल आजाये की हेमंत करकरे की शहादत के पीछे अगर कोई और भी कहानी है तो इस प्रशन को उठाकर श्री अंतुले ने ठीक ही किया इसलिए की उन के द्वारा उठाया गया यह प्रशन भारत की जनता के दिलों में भी है। हाँ बस उन्होंने इस सवाल को जुबां देदी है। अन्यथा रोजनामा राष्ट्रीय सहारा में तो इस घटना के तुंरत बाद से ही प्रशन उठता रहा है और मैंने ख़ुद मुंबई पहुँच कर चप्पे चप्पे का निरिक्षण किया। जहाँ जहाँ भी आतंकवादी हमले हुए या जिस जगह भी आतंकवादियों के कदम पड़े, ख़ुद वहां पहुँच कर सभी जगह का गहराई से जायज़ा लिया ताकि सत्य को समझा जा सके।
हमारे विश्लेषण में बहुत से ऐसी बातें हैं जिस तरफ़ न तो पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने ध्यान दिया और न ही अजमल आमिर कसाब के बयान में इन बातों का उल्लेख किया गया। इन में से कुछ आज पाठकों की सेवा में पेश कर रहे हैं। शेष १०० वीं किस्त में।
*मुंबई में आतंकवादी हमले से पूर्व नरीमन हाउस में रहने वालों ने १०० किलो मास और अन्य खाने पीने की वस्तुएं मंगायीं। एक ही समय में इस्तेमाल किया जाए तो लगभग ५०० लोगों के लिए यह खाना पर्याप्त था। अगर ५० लोग दोनों समय यह खाना खाएं तो तब भी कम से कम पाँच दिन तक यह खाना चल सकता है। इतने खाने का आर्डर किस ने दिया और क्यूँ? अगर वहां रहने वालों की संख्या केवल ५ थी तो यह खाना किस के लिए मंगाया गया? आतंकवादी मछवारों की बस्ती बुधवार पार्क तक रबर की नाओ से पहुंचे। उस के बाद अलग अलग टुकडों में बट कर होटल ताज, ओबेरॉय और सी एस टी पहुंचे। हमने अजमल आमिर कसाब की फोटो के साथ साथ बुधवार पार्क (समुद्र के किनारे मछवारों की बस्ती) के उस स्थान की फोटो भी पाठकों के सामने प्रस्तुत की ताकि समझा जा सके की अगर यह आतंकवादी उसी रास्ते से आए थे और सीधे उपरोक्त स्थानों पर पहुंचे तो उनके जूते कीचड में सने हुए क्यूँ नहीं? उन के कपडों पर पानी और कीचड के निशान नहीं? ऐसा तो नहीं है की पेहले यह आतंकवादी नरीमन हाउस पहुंचे हों (उसी दिन या पहले कभी) और फिर वहां से तैयार हो कर योजनाबद्ध तरीके से हमला करने के लिए निकले हों। नरीमन हाउस के आस पास रहने वालों का बयान भी है की कुछ संदिग्ध चेहरे यहाँ कई रोज़ से नज़र आरहे थे। पुलिस ने उन पड़ोसियों में से किसी का भी बयान अभी तक सार्वजनिक क्यूँ नहीं किया? घटना की रात यानि २६ और २७ नवम्बर की मध्यरात्री नरीमन हाउस के निकट रहने वाले एक आदमी ने एक टी वी चैनल पर बताया था की पिछले कुछ दिनों से नरीमन हाउस में आने जाने वालों की गतिविधियाँ बढ़ गई थी, जिन में गोरे अर्थात अँगरेज़ दिखने वाले लोग शामिल थे, बाद में यह ख़बर कभी नहीं दिखायी गई। इस प्रकार एक सूचना के अनुसार उसी रात अर्थात २६ और २७ की मध्यरात्री एक आतंकवादी से तेलेफोनिक कांफ्रेंस द्वारा वाशिंगटन, न्यूयार्क और इस्राइल लगभग ५ घंटों तक बातचीत होती रही। यह बात क्या थी? पुलिस और खुफिया एजेंसियों की पकड़ में क्यूँ नहीं आई?
*होटल ताज और ओबेरॉय के सी सी टी वी कैमरों का फूटेज कहाँ है? इनमें आतकवादियों के चेहरे सुरक्षित होने चाहिए। क्या वह मारे गए ९ आतंकवादियों और एक जिंदा बचे आतंकवादी से मिलते हैं?
*हेमंत करकरे, विजय सलस्कर और अशोक काम्टे के मोबाइल फ़ोन कहाँ हैं? घटना के कुछ घंटों पूर्व तक किस किस ने उन्हें फोन किए, कितनी कितनी देर बात हुई? यह जानकारी ज़रूरी है।
*एक ख़बर यह भी है की हेमंत करकरे की मौत की ख़बर पहुँचने के बाद नरीमन हाउस में खुशियाँ मनाई गई। यह खुशियाँ मनाने वाले कौन थे? अगर आतंकवादी थे तो हेमंत करकरे की मौत से उन्हें खुशी क्यूँ? क्या वह इसी टास्क के लिए आए थे? और अगर खुशी मनाने वाले वह यहूदी थे जो नरीमन हाउस में रहते थे तो उन की खुशी मनाने की वजह? उनकी हेमंत करकरे से क्या दुश्मनी थी? हम पूरा विवरण अपने इसी लेख की १०० वीं किस्त में विस्तृत रूप से प्रकाशित करने का इरादा रखते हैं। परन्तु प्रशन सिर्फ़ इतने ही नहीं हैं। टी वी पर यह फूटेज बार बार दिखाया गया की हेमंत करकरे आतंकवादियों के पीछे जाने से पहले हेलमेट पहन रहे हैं। बुल्लेट प्रूफ़ जैकेट पहन रहे हैं, क्या इसी तरह की तयारी की विडियो ग्राफी अन्य अधिकारीयों की भी की गई थी? अगर हाँ तो वह कहाँ है? और अगर नहीं तो सिर्फ़ हेमंत करकरे की ही क्यूँ? कहीं इस लिए तो नहीं की हमने एनकाउंटर बटला हाउस में मोहन चंद शर्मा के मामले में बुल्लेट प्रूफ़ जैकेट न पहेन्ने का सवाल उठाया था।
*सी एस टी स्टेशन पर आतंकवादियों के दो फोटो जो पुलिस के द्वारा जारी की गई उन में से कसाब अकेला है और दूसरे फोटो में उस का साथी भी मौजूद है। दोनों फोटो में आतंकवादियों के अतिरिक्त कोई चीज़ फ्रेम में नहीं है, न तो यात्रियों का छूटा सामन और न ही भाग दौड़ में पैरों से निकल जाने वाले जूते चप्पल। यहाँ तक की फर्श पर कोई भी ऐसी चीज़ नज़र नहीं आरही है जो आमतौर पर दिन भर के प्रयोग के बाद नज़र आसकती है। जैसे अखबार, पानी की खाली बोतलें इत्यादि। फोटो अगर किसी फोटोग्राफर ने ली तो उस ने क्या देखा? उसे अभी तक सार्वजनिक क्यूँ नहीं किया गया? दोनों फोटो अगर सी सी टी वि द्वारा li गई तो इस अवसर की अन्य फोटो कहाँ हैं? इस लिए की सी सी टी वी में एक या दो फोटो ही नहीं होते बल्कि कांतिनुइटी में आगे पीछे की फोटो भी होती हैं, वह फोटो कहाँ हैं? कोई फोटो तो ऐसी होगी जिस में यह आतंकवादी गोलियाँ चलाते हुए दिखायी दें और वहां घायल लोग और आतंकवादी एक साथ नज़र आयेंगे।
प्रशन और भी बहुत हैं परन्तु आज जगह इससे अधिक नहीं दी जा सकती इस लिए आपको प्रतीक्षा करनी होगी, इस लेख की १०० वीं कड़ी की। सम्भव है इस दिन यह लेख एक दो पृष्ठों पर न हो कर १०० पृष्ठों पर आधारित हो और एक इतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए की आप उसे संभाल कर रख सकें अर्थात आलमी सहारा के रूप में। जहाँ तक तिथि का सम्बन्ध है तो हम चाहते हैं की हेमंत करकरे की शहादत के ४० वें दिन यह मुख्य अंक मंज़र आम पर आए। आज के बाद हम इस मुख्य अंक के बारे में समय समय पर जानकारी देते रहेंगे मगर एक अन्तिम प्रशन अभी आपके विचार के लिए छोड़ना चाहते हैं, पिछली रात्रि को १० बजे टी वी चैनल "आज तक" पर एक विशेष रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसमें करकरे के साथ शहीद होने वाले विजय सलस्कर के जीवन के अन्तिम ८ मिनट की विडियो फ़िल्म प्रसारित की गई, क्या ऐसी ही फ़िल्म अशोक काम्टे और हेमंत करकरे के जीवन के अन्तिम समय की भी बनाई गई है? यदि नहीं तो केवल एक ही शहीद की विडियो फ़िल्म बनाने का कारण........? और इससे सम्बंधित एक महत्तवपूर्ण जानकारी यह भी की विजय सालस्कर को सभी गोलियाँ पीठ पर लगी, उनके पीछे तो हेमंत करकरे और उनके पीछे चार कांस्टेबल बैठे हुए थे, क्या जीवित बचा कांस्टेबल यह बता पायेगा की यह किस प्रकार सम्भव हुआ?
नोट: आज की इस ९९ वीं कड़ी में हम रोजनामा राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित २५ अक्तूबर से २५ नवम्बर तक की घटनाएं सिलसिलेवार अपने पाठकों की सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं और १०० वीं कड़ी में हम २६ नवम्बर से २६ दिसम्बर तक की घटनाएं प्रस्तुत करेंगे ताकि जब आप भी इन कड़ियों को जोडें तो घटनाओं की पूरी तसवीरें आपके मस्तिष्क में सुरक्षित हो जाए।
मालेगाँव धमाका जांच
रोजनामा राष्ट्रीय सहारा देश में हो रहे आतंकवादी हमलों के पीछे बजरंग दल व शिवसेना सरीखे संघटनों के लिप्त होने की ओर इशारा करता रहा है। जब नांदेड, जालना और परभनी की एक मस्जिद में धमाका हुआ था, उस समय भी हम ने बजरंग दल की संदिग्ध गतिविधियों की ओर इशारा किया था, तब नांदेड में बजरंग दल के सदस्य के घर से नकली दाढ़ी और टोपी के साथ अरबी भाषा में कुछ लेख भी मिले थे, परन्तु इस दिशा में कोई कार्यवाही नहीं की गई। अंतत: उस समय वास्तविकता सामने आगई जब मुंबई ऐ टी एस ने २३ अक्टोबर २००८ को धमाकों में प्रयोग हुई साध्वी प्रज्ञा सिंह की मोटर साइकिल बरामद की और हिंदू संघटनों के विरुद्ध जांच आरम्भ कर दी। जांच के बाद हिंदू संघटनों और सेना के महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के चेहरे सामने आए।



आपकी सेवा में प्रस्तुत है ऐ टी एस की इस दिशा में की गई अब तक की जांच पर एक नज़र:-
ऐ टी एस की तथ्यों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार पहली बार हिंदू संघटनों के लिप्त होने की बात सामने आई। प्राथमिक जांच में ऐ टी एस ने ५ लोगों को गिरफ्तार किया जिन में साध्वी प्रज्ञा सिंह का भी नाम था। इसी दिन राज्य सभा सी पी एम् की नेता ब्रुन्दकारत ने हिंदू संघटनों की बात की थी। बाद में उन में से दो को छोड़ दिया गया।
इसी दिन कांग्रेस ने बजरंग दल, आर आर एस के साथ साथ बी जे पी तक का हाथ मालेगाँव धमाके में होने का संदेह प्रकट किया था।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से ३२ दिन पूर्व
२५ अक्टूबर: ऐ टी एस ने इन में से तीन आरोपियों को नासिक कोर्ट में पेश किया। साध्वी प्रज्ञा, श्याम लाल भंवर और शिव नारायण को न्यायालय में पेश किया गया।
इसी तिथि को ऐ टी एस ने एक सनसनी खेज़ रहस्योद्घाटन करके ३ लोगों को गिरफ्तार किया जो पूर्व सैनिक थे। इसी दिन एन सी पी कार्यकर्ताओं ने मुंबई में वी एह पी के कार्यालय पर हमला किया।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से ३१ दिन पूर्व
२६ अक्टूबर: समाचार के अनुसार ऐ टी एस की टीम जांच के लिए भोपाल गई और दो पूर्व सेना अधिकारीयों से पूछताछ की गई।
इसी दिन भारतीय जनशक्ति पार्टी की अध्यक्ष उमा भरती ने कहा की प्रज्ञा किसी भी हिंसक मामले में संलिप्त नहीं हो सकती क्यूंकि वह एक साध्वी है और साध्वी केवल पूजा पाठ और शान्ति की बात करती है।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से ३० दिन पूर्व
२७ अक्टूबर: जबलपुर में साध्वी के घर की तलाशी ली गई और ऐ टी एस ने महत्त्वपूर्ण प्रमाण एकत्रित किए।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से २८ दिन पूर्व
२९ अक्टूबर: प्रज्ञा के भाई ने मानवाधिकार कमीशन और मुंबई हाई कोर्ट में एक स्वतंत्र जांच कमीशन की मांग की और इसके साथ अन्य हिंदू संस्थायें भी खड़ी दिखाई दीं।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से २७ दिन पूर्व
३० अक्टूबर: इधर भाजपा हिंदू संस्थाओं के नाम आने पर बोखला गई और खुले आम आरोपियों के बचाव में खड़ी हो गई। भाजपा अध्यक्ष राज नाथ सिंह ने मीडिया पर निशाना साधते हुए कहा की "मीडिया इस पूरे मामले को आरुशी मर्डर केस की भाँती प्रस्तुत कर रहा है" और प्रज्ञा के बचाव में कहा की जो लोग साँस्कृतिक राष्ट्रीयता पर विश्वास रखते हैं वे आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त हो ही नहीं सकते। उन्होंने ने ऐ टी एस के नार्को टेस्ट पर प्रशनचिंह लगाया और कहा की किसी भयानक आतंकवादी को भी इस प्रकार से प्रताडित नहीं किया जाता, किंतु ऐ टी एस प्रमुख हेमंत करकरे ने सभी आरोपियों पर मकोका लगा दिया। इसी बीच हिंदू महासभा ने कर्नल पुरोहीत और अन्य आरोपियों को कानूनी सहायता देने का एलान किया।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से २५ दिन पूर्व
१ नवम्बर: साध्वी के ब्रेन मेपिंग टेस्ट में ऐ टी एस साध्वी से कुछ भी उगलवाने में नाकाम रही। यह टेस्ट नागपाडा पुलिस अस्पताल में इसी सप्ताह किया गया और इस के पश्चात पुलिस ने दूसरे फोरेंसिक टेस्ट की तयारी आरम्भ कर दी।
इसी दिन ख़बर आई की समीर कुलकर्णी को ऐ टी एस ने मालेगाँव धमाके के आरोपियों के रूप में पहले ही गिरफ्तार कर लिया है। समीर कुलकर्णी भोपाल की एक प्रिंटिंग प्रेस में कार्य करता था। पुलिस के अनुसार ३५ वर्षीया कुलकर्णी अभिनव भारत के संस्थापक सदस्यों में से था।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से २४ दिन पूर्व
२ नवम्बर: भोंसला मिलेट्री स्कूल के प्रिंसिपल को गिरफ्तार कर उससे पूछताछ की गई। इसी तिथि को बाल ठाकरे ने भाजपा की इस बात के लिए आलोचना की की वह साध्वी का बचाव नहीं कर रही है और इस से हिंदू समाज की मानहानि हो रही है।
भाजपा और शिव सेना ने विभिन्न स्थानों से उच्च स्तर के अधिवक्ताओं को एकत्रित करके नासिक कोर्ट के समक्ष धरना दिया।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से २२ दिन पूर्व
४ नवम्बर: ऐ टी एस के अनुसार आरोपी प्रज्ञा सिंह ने स्वीकार किया की उसी ने अपनी मोटर साइकल कथित आरोपी रामजी जिसने बम रखा था को दी थी, किंतु साथ ही उस ने यह भी बताया की उसे इस के इस्तेमाल के सम्बन्ध में पता नहीं था की रामजी का इसकी मोटर साइकल को लेकर क्या Intention था, यह LML (Freedom) मॉडल की बाइक थी।
इसी दिन साध्वी के सम्बन्ध में कठोर रवैये से पलटते हुए भाजपा ने उसे कानूनी सहायता देने का एलान किया। इससे पूर्व भाजपा ने साध्वी के सम्बन्ध में कठोर रवैया अपनाया हुआ था। इसी तिथि को जांच एजेन्सी ऐ टी एस ने मालेगाँव धमाके के ८ आरोपियों पर मकोका लगाने का निर्णय लिया।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से २१ दिन पूर्व
५ नवम्बर: मुंबई ऐ टी एस ने आरोपी लेफ्टनेंट पुरोहीत को गिरफ्तार करके जांच करने की तैयारीआरम्भ कर दी एवं इसी तिथि को साध्वी पर भी मकोका लगाने की तयारी भी प्रारम्भ कर दी गई।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से २० दिन पूर्व
६ नवम्बर: कर्नल पुरोहीत को गिरफ्तार किया गया। पुलिस को उस के मोबाइल से दूसरे संदिग्ध आरोपियों को किए गए कुछ एस एम् एस मिले, जो कोड वर्ड में किए गए थे। जिन में "कैट इस आउट ऑफ़ दी बास्केट"। दूसरा "सिंह हेस संग" इस के अतिरिक्त "वी आर ऑन दी राडार ऑफ़ दी ऐ टी एस", "चेंज दी सिम कार्ड" यह वह एस एम् एस जो कर्नल प्रोहित के मोबाइल से रिताइर्ड मेजर रमेश उपाध्याय को भेजा गया था इससे पूर्व पुलिस उपाध्याय को इस मामले में गिरफ्तार कर चुकी थी और इस को १५ नवम्बर तक पुलिस रिमांड पर ले लिया गया था।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से १९ दिन पूर्व
७ नवम्बर: ऐ टी एस के अनुसार कर्नल प्रोहित ने स्वीकार किया की वे मालेगाँव धमाकों का मास्टर माइंड था। इस के साथ साथ उस ने यह भी स्वीकार किया की उसने धमाके का षड़यंत्र रचा था और २९ सितम्बर के लिए धमाका करने की सामग्री फौज से मुहैया करायी थी और हथ्यार भी मुहैया कराये थे और यह सभी सामान अभिनव भारत के सदस्यों के हवाले की थी।
इसी तिथि को आर्मी डिप्टी चीफ लेफ्तानेंत जनरल ने बयान दिया की कर्नल प्रोहित की गिरफ्तारी से सेना के सम्मान को ठेस पहुँची है। इसी तिथि को तोगडिया ने अभिनव भारत की आलोचना भी की।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से १८ दिन पूर्व
८ नवम्बर: कर्नल पुरोहीत से सम्बंधित मुंबई ऐ टी एस ने दो और सेना अधिकारीयों से पूछताछ की। साथ ही ऐ टी एस ने यह भी बताया की कर्नल पुरोहीत पर मकोका लगाया जा सकता है। इसी तिथि में प्रमाण के सामने आने के बाद संघ परिवार ने कर्नल पुरोहीत और दूसरे गिरफ्तार आरोपियों से किसी प्रकार का सम्बन्ध होने से इंकार किया जबकि इससे पूर्व वह धमाका करने वाले आरोपियों का खुल कर समर्थन करते आरहे थे।
इसी तिथि को कांग्रेस ने भाजपा पर आरोप लगाया की भाजपा सेना का भगवाकरण कर रही है। यह बयान अभिषेक मनु सिंघवी ने दिया।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से १७ दिन पूर्व
९ नवम्बर: ऐ टी एस का बयान आया की ऐ टी एस ३ वी एह पि नेताओं, जो गुजरात से सम्बन्ध रखते हैं उन के बारे में जांच करना चाहती है क्यूंकि इन तीनों का सम्बन्ध समीर कुलकर्णी से है जो अभिनव भारत का बुनयादी कार्यकर्ता है।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से १६ दिन पूर्व
१० नवम्बर: ऐ टी एस ने एक और सनसनीखेज़ रहस्योद्घाटन करते हुए कहा की कर्नल पुरोहीत का हाथ परभनी, जालना और नांदेड धमाकों में है। ऐ टी एस के सामने यह बात कर्नल पुरोहीत के नार्को टेस्ट के दौरान आई।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से १५ दिन पूर्व
११ नवम्बर: गोरखपुर के एम् पी योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस पर आरोप लगाया की वह हिंदू संस्थाओं के कार्यकर्ताओं को झूठे केसों में फंसा रही है।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से १४ दिन पूर्व
१२ नवम्बर: केन्द्र ने सभी राज्य सरकारों से बजरंग दल से सम्बंधित एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी। केन्द्र का मन्ना था की बजरंग दल के कार्यकर्ता विभिन्न सांप्रदायिक दंगों में लिप्त हो सकते हैं।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से १३ दिन पूर्व
१३ नवम्बर: हरियाणा पुलिस ने मालेगाँव के तार समझौता एक्सप्रेस बम धमाके से जुड़े होने की बात कही और सम्बंधित पुलिस अधिकारीयों को पूछताछ हेतु मुंबई भेजा।


मुंबई पर आतंकवादी हमले से १२ दिन पूर्व


१४ नवम्बर: ऐ टी एस ने नासिक कोर्ट में रहस्योद्घाटन किया की महंत दयानंद पाण्डेय ने पुरोहित को आर डी एक्स सप्लाई करने को कहा


दयानंद पाण्डेय कानपूर ब्लास्ट में भी संदिग्ध - ऐ टी एस
मुंबई पर आतंकवादी हमले से ११ दिन पूर्व
१५ नवम्बर: राजनाथ सिंह ने इस पूरे मामले को “एक बड़ा षड़यंत्र” करार दिया। उन्होंने कहा की “ मैं पूर्णत: संतुष्ट हूँ की साध्वी आदि इस षड़यंत्र में लिप्त नहीं हैं”।


पुरोहीत ने समझौता एक्सप्रेस धमाके के लिए आर डी एक्स सप्लाई किया - ऐ टी एस
नासिक कोर्ट में पुरोहीत ने ऐ टी एस के द्वारा किसी भी प्रकार से प्रताडित किए जाने के आरोप को खारिज कर दिया।लालू ने अडवाणी को “टेरर मास्क” कहा
मुंबई पर आतंकवादी हमले से ९ दिन पूर्व
१७ नवम्बर: मालेगाँव धमाके के तार अजमेर शरीफ और मक्का मस्जिद बम धमाके से जुड़े हैं - ऐ टी एस
इसी तिथि को प्रज्ञा ठाकुर ने मुंबई ऐ टी एस के द्वारा उसे प्रताडित करने से सम्बंधित शपथ पत्र दायर किया।
मुम्बई पर आतंकवादी हमले से ८ दिन पूर्व
१८ नवम्बर: मालेगाँव धमाकों की जांच से सम्बंधित बात करने के लिए विपक्षी दल के नेता एल के अडवाणी ने प्रधान मंत्री से भेंट की।इसी तिथि को अडवाणी और राजनाथ सिंह ने ऐ टी एस पर आरोप लगाया की ऐ टी एस और कांग्रेस में सांठ गाँठ है और वह अव्यसायिक ढंग से जांच कर रही है।
मुंबई पर आतंकवादी हमले से ६ दिन पूर्व
२० नवम्बर: ऐ टी एस ने मालेगाँव आरोपियों पर मकोका लगाया। साध्वी प्रज्ञा की मोटर साइकिल खरीदने वाला व्यक्ति २००७ में मारा गया– ऐ टी एस
मुंबई पर आतंकवादी हमले से ५ दिन पूर्व
२१ नवम्बर: मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया की वह वोट बैंक की राजनीती कर रही है।“पाकिस्तान जो कार्य २० वर्ष में नहीं कर सका वह भारत सरकार (कांग्रेस) ने २० दिन में कर दिखाया।” मोदी
मुंबई पर आतंकवादी हमले से २ दिन पूर्व
२४ नवम्बर: प्रोहित ने सी बी आई को बयां दिया की “वी एह पी नेता अभिनव भारत की स्थापना में आगे आगे थे। उन्होंने ने कहा की आर एस एस नेता इन्द्रेश कुमार ने पाकिस्तान की संस्था आई एस आई से ३ करोड़ रूपये लिए। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने मालेगाँव धमाके के लिए प्रोहित को इस का क्रेडिट लेने से इंकार किया और कहा, “ उनके लोगों ने” यह धमाका किया है न की अभिनव भारत ने।”दयानंद पाण्डेय ने स्वीकार किया की उस ने आर डी एक्स उपलब्ध कराया था। इसी तिथि को मकोका अदालत ने साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहीत और दयानंद पाण्डेय का ऐ टी एस द्वारा रिमांड की अवधि में वृद्धि की मांग को रद्द कर दिया था क्यूंकि इन तीनों ने ऐ टी एस पर प्रताडित करने का आरोप लगाया था।इसी दिन पुलिस कंट्रोल रूम में सायं ५।२० पर करकरे की हत्या करने का धमकी भरा फ़ोन आया था जिस का खुलासा उपायुक्त पुलिस राजेंद्र सोनवाने ने एक बयान में किया था। यह फ़ोन कॉल सहकार नगर के एक पी सी ओ, जिस का नंबर २४२३१३७५ है, से आई थी.मुंबई पर आतंकवादी हमले से १ दिन पूर्व २५ नवम्बर: मकोका न्यायालय ने ऐ टी एस से प्रताडित करने के आरोपों पर जवाब माँगा। महाराष्ट्र ऐ टी एस ने मानवाधिकार के राष्ट्रीय आयोग ने प्रताड़ना के आरोपों पर सफाई पेश करने को कहा।कर्नल प्रोहित ने स्वीकार किया की उस ने इस वर्ष आर एस एस प्रमुख सुदर्शन से जबलपुर में भेंट की और आर एस एस नेता इन्द्रेश कुमार के रोल की शिकायत की।


kt hindustaan mein

Saturday, December 20, 2008


मुंबई पर हमला करने वाले आतंकवादी पाकिस्तानी
मगर क्या उन का कोई सहयोगी भारतीय भी!
२६ नवम्बर २००८ को आतंकवादियों का मुंबई पर हमला, केवल मुंबई ही नहीं बल्कि भारत पर हमला है तथा भारतीयता पर हमला है। जिस का पहला उत्तर तो दिया हमारी पुलिस और सेना ने इस हमले को और अधिक भयानक रूप लेने से रोक कर और सिवाए एक के सभी आतंकवादियों को मौत के घाट उतार कर, उस के बाद दूसरा उचित जवाब दिया भारतीय नागरिकों ने राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन कर के। हाँ! राजनीतिज्ञों से उन की नाराज़गी ज़रूर सामने आई। मगर नाराज़ होने के बजाये यह विचारणीय पल है हमारे राजनीतिज्ञों के लिए की वे आतंकवाद पर काबू पाने में असफल क्यूँ हैं। कमी उन की रणनीति में है या दृढ़ इच्छा शक्ति में। इस आतंकवादी हमले में केवल एकमात्र जीवित पकड़ में आए अजमल आमिर कसाब के इस बयान ने वास्तव में हमारी पुलिस और सरकार को सोचने पर मजबूर कर दिया होगा की अभी १० आतंकवादी और मुंबई में छुपे हुए हैं। मगर यहाँ एक विचारणीय बात यह भी है की इसी आतंकवादी ने पुलिस को दिए गए अपने बयान में पहले सिर्फ़ १० आतंकवादियों के पाकिस्तान से आने का उल्लेख किया था। अब उस के अनुसार उन की संख्या २० हो गई। क्या इसे विश्वसनीय स्वीकार कर लिया जाए या उस के अगले बयान में कुछ और आतंकवादियों की बात भी सामने आ सकती है।
जहाँ तक अजमल आमिर कसाब के बारे में पुलिस सूत्रों से प्राप्त सूचनाओं का सम्बन्ध है तो अब तक यह सिद्ध हो चुका है की अजमल आमिर कसाब एक पाकिस्तानी आतंकवादी है। उस के बाप ने भी उस की पहचान कर ली है। पाकिस्तान के लोकप्रिय टी वी चॅनल जीओ टी वी ने अपने स्टिंग ओपरेशन के द्वारा यह रहस्योद्घाटन भी कर दिया की अजमल पाँच महीने पहले आतंकवाद का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अपने घर वालों से मिलने के लिए अपने गाँव आया था। उस ने गाँव के लड़कों को जुडो कराटे के करतब भी दिखाए, इस बात को प्रर्दशित भी किया की अब वह एक प्रशिक्षित नौजवान है जिसे पकड़ना आसन नहीं और जिस के शरीर में अदभुत शक्ति है। उस ने यह भी स्वीकार किया की वह जिहाद के लिए जाने का इरादा रखता है और उस के लिए उस ने अपनी माँ से आशीर्वाद भी लिया। इन सारी बातों पर बहस की कोई गुंजाईश नहीं है। पाकिस्तान को भी अब सच्चाई का सामना करते हुए उस हकीकत को स्वीकार करना चाहिए और धन्यवाद् देना चाहिए जीओ टी वी चैनल को जिस ने आतंकवाद के विरुद्ध जिहाद का अमली सबूत अपने स्टिंग ओपरेशन के द्वारा दिया।
लेकिन अब भारत सरकार और हमारी गुप्तचर एजेंसियों को भी इस बात पर विचार करना होगा की अजमल आमिर कसाब के बयान को सच्चाई की कसौटी पर परखें।
क्या वह सच बोल रहा है की उस ने २६ नवम्बर को ही भारतीय सीमा में प्रवेश किया और मुंबई पहुँचा?
क्या वह सच बोल रहा है की उसके साथ आने वाले आतंकवादियों की संख्या केवल १० ही थी?
क्या वह सच बोल रहा है की केवल १० आतंकवादी ही पाँच टुकडों में विभाजित हो कर अलग अलग स्थान पर आतंकवादी हमले के लिए पहुंचे, कहीं संख्या के मामले में ग़लत बयानी तो नहीं की जा रही है? पाकिस्तान के शहर कराची से मुंबई तक पहुँचने के मामले में यात्रा की जो दास्तान बयान की गई है, क्या वह पूर्ण रूप से विश्वसनीय है? भारत की जिस नाव पर कब्ज़ा करके एक नाविक को रास्ता दिखाने की नियत से साथ लेकर आए फिर नाव के तहखाने में उस की हत्या कर दी, क्या उस की पहचान हो गई है?
क्या उस का शव मिल गया है? जिन दूसरे नाविकों को आतंकवादी पाकिस्तान के जहाज़ अलहुसैनी में बंधक बना कर ले गए थे, क्या उन के बारे में पूरी जानकारी मिल गई है? यह हत्या किस तारीख को की गई, उन नाविकों को किस तारीख को बंधक बनाया गया? क्या कसाब का बयान हिंदुस्तान की गुप्तचर एजेंसियों और सम्बंधित रिश्तेदारों की जानकारियों के अनुसार मेल खता है? जिस प्रकार असलाह होटल ताज और अन्य स्थानों पर बरामद हुआ व इस्तेमाल हुआ, क्या येही दस लोग अपने बैग में रखकर उसी दिन अर्थात २६ नवम्बर को शहर में प्रवेश किए थे या आतंकवादियों की संख्या कहीं अधिक थी और आने के समय व संख्या में ग़लत बयानी से काम लिया जा रहा है? क्या गूगल अर्थ की वेबसाइट पर जाकर नक्शे के द्वारा ही इन सभी स्थानों पर पहुँच कर आतंकवादी कार्यवाई को अंजाम दिया जा सकता है या उन में से कुछ आतंकवादी पहले से ही शहर में प्रवेश कर चुके थे? और सभी स्थानों को चिन्हित कर चुके थे? की कब, किस तरह यह आतंकवादी हमला करना है, उस का खाका बना चुके थे और बहुत सोच समझ कर २६ नवम्बर की तारिख तय की गई थी।
स्पष्ट हो की हमारी सूचना के अनुसार उसी दिन अर्थात २६ नवम्बर को शाम के लगभग ८ बजे लन्दन से इंग्लैंड क्रिकेट टीम को मुंबई पहुंचना था। उन के लिए होटल ताज में कमरे बुक कर लिए गए थे। नवम्बर के दुसरे हफ्ते में भी इंग्लैंड की क्रिकेट टीम होटल ताज की पाँचवीं और छटी मंजिल के कमरों में ठहरी थी। कसाब के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार वह भी होटल ताज के कमरा नंबर ६३० में ठहरा था। यह केवल इत्तेफाक है या आतंकवादियों के इरादे अधिक खतरनाक थे। उन्हें यह मालूम था के २६ तारिख को आठ साढ़े आठ बजे मुंबई पहुँचने के बाद १० बजे तक यह क्रिकेट टीम होटल ताज में होगी और उन्हें नुक्सान पहुँचा कर वह इस आतंकवादी हमले को और भी भयानक बनाने में सफल हो जायेंगे। अगर हम तक पहुँची यह सूचना सही है तो अब तक यह ख़बर किसी भी सूत्र के द्वारा सामने क्यूँ नहीं आई? क्या यह भी विचारणीय नहीं है की जिस जहाज़ को लगभग साढ़े आठ बजे मुंबई पहुंचना था वह रात लगभग १२ बजे मुंबई पहुँचा और यह क्रिकेट टीम मुंबई एअरपोर्ट से ही वापस लौट गई। क्या जहाज़ के ज़मीन पर उतरने से पहले ही पाइलट तक यह सूचना पहुँच चुकी थी और एहतियाती तौर पर उस की लैंडिंग में देर करायी गई या फिर यह केवल एक इत्तेफाक था?
हम जानते हैं की सभी घटनाओं की कडियाँ जोड़ने में फूँक फूँक कर कदम रखने की आव्यशकता है मगर आतंकवाद को पूर्ण रूप से समाप्त करने के लिए सभी तथ्यों को जानना और समझना भी अति अनिवार्य है। पाकिस्तान पर किया जाने वाला संदेह अपनी जगह, उस के पूर्व कार्यों को देखें तो उसके अविश्वसनीय होने का भी कोई उचित कारण नहीं है। पाकिस्तान और पाकिस्तान की गुप्तचर संघटन आई एस आई या पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादी भारत की अखंडता पर हुए इस हमले में शामिल हो सकते हैं। मगर हमें यह भी सोचना होगा की कहीं उस में हमारी कोई भूल या हमारी धरती पर बसने वाले कुछ ऐसे लोग तो जान बूझ कर या अनजाने तौर पर उन हमलावरों के सहयोगी साबित नहीं हुए वरना मुट्ठी भर आतंकवादी हमारी ज़मीन पर आकर इतना बड़ा आतंकवादी हमला करने में कैसे सफल हुए। सभी घटनाओं की कडियाँ जोड़ने और विश्लेषण करने में समय लगेगा साथ ही उन आतंकवादी हमलों को बीते दिनों की कुछ घटनाओं की रौशनी में देखना होगा। मेरे सामने पिछले दिनों हुए बम धमाकों और ऐ टी एस की जांच के बाद सामने आए कुछ रहस्योद्घाटन हैं। पता नहीं उन का कोई सम्बन्ध ताज़ा आतंकवादी हमलों से है या नहीं मगर भारत सरकार और जांच करने वाली एजेंसियों की सेवा में इस लिए उन्हें इस लेख में शामिल करना आवयशक महसूस हो रहा है की अगर उचित समझें तो वे इस पहलु पर भी विचार करें ताकि आतंकवाद की पूर्ण रूप से समाप्ति करने में सफलता प्राप्त हो सके इसलिए की आतंकवादी एक आतंकवादी है। वह हमारी ज़मीन का है तो भी आतंकवादी है, पराई ज़मीन का है तो भी आतंकवादी है। वह आतंकवादी चाहे किसी भी धर्म व जाती से सम्बन्ध रखता हो, हमारे नज़दीक उस की पहचान केवल और केवल एक आतंकवादी की है।
इसलिए आपकी सेवा में प्रस्तुत है समाचार पत्रों की कुछ कतरनें जो स्पष्ट करती हैं की पाकिस्तान की खतरनाक गुप्तचर संस्था आई एस आई के तार शायद हमारे देश के कुछ लोगों से जुड़े हुए थे। यदि ऐ टी एस (हेमंत करकरे) की जांच के बाद लिखे गए बयान सच्चे हैं तो।
*इन्द्रेश ने आई एस आई से तीन करोड़ रूपये लिए हैं।
*दयानंद पाण्डेय के लैपटॉप से प्राप्त जानकारी के अनुसार इन्द्रेश और मोहन भागवत की हत्या का षड़यंत्र रचा गया था। षड़यंत्र में लेफ्टनेंट प्रोहित के अतिरिक्त कुछ दूसरे लोग भी सम्मिलित थे। (हिंदुस्तान दैनिक, २२ नवम्बर)
*मुंबई ऐ टी एस के वकील रोहनी सलेन ने यह दावा करते हुए कहा की पाण्डेय के ज़ब्त किए गए लैपटॉप से प्राप्त ३ ऑडियो और विडियो क्लिपिंग से स्पष्ट होता है की उनकी बड़ा धमाका करने की भी योजना थी। वकील के अनुसार लैपटॉप में पंचमढ़ी में बुलाई गई एक मीटिंग का विवरण है जिस में मालेगाँव धमाके का षड़यंत्र रचने की बातचीत है। इस बातचीत में लम्बी दूरी तक वार करने वाले हथियारों, हैण्ड ग्रेनेड, रासायनिक और आर डी एक्स का उल्लेख है। (हिंदुस्तान, २७.११.२००८)
*मुंबई ऐ टी एस के अनुसार कर्नल प्रोहित के नार्को टेस्ट में बताया गया है की अजमेर धमाके का मास्टर माइंड स्वामी दयानंद पाण्डेय उर्फ़ अमृतानंद थे। (हिंदुस्तान १७.११.२००८)
*मुंबई ऐ टी एस को दयानंद पाण्डेय से सम्बंधित हरी पर्वत मन्दिर के गेस्ट हाउस से पुलिस ने स्वामी का इन्टरनेट डाटा कार्ड और महाराष्ट्र, हरयाणा और उत्तर्पर्देश, गुजरात और दिल्ली के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों का नक्शा प्राप्त किया। (हिंदुस्तान १६.११.२००८)
*ऐ टी एस के वकील अजय मिश्रा को टेलीफोन द्वारा दोपहर २ बज कर ५६ मिनट पर धमकी देने वाले ने कहा, इस मामले से हट जाओ। उस ने हेमंत करकरे और मोहन कुलकर्णी के नाम भी धमकी दी। ६९९१३२ से फ़ोन पर बताया "हम तुम्हारा हेमंत करकरे और मोहन कुलकर्णी का गेम करेंगे" (हिंदुस्तान, १६.११.२००८)
*महाराष्ट्र ऐ टी एस के सूत्रों ने कहा की प्रोहित ने राष्ट्र सेवक संघ के सुधाकर चतुर्वेदी को पुणे के निकट सिन्हा के तोपखाना केन्द्र में जाने के लिए फर्जी दस्तावेज़ दिए। (जनसत्ता, २१ नवम्बर, पृष्ठ न १)
मैंने १२ दिसम्बर की शाम श्री हेमंत करकरे के घर जाकर उन की पत्नी से भेंट की। यह शाम हेमंत करकरे के जनम दिन की शाम थी। अगर वह जीवित होते तो यह घर रौशनी से जगमगा रहा होता और खुशी प्रत्येक स्थान से प्रतीत होती परन्तु वहां उदासी थी। हम देश पर शहीद और एक कर्तव्यपरायण अधिकारी के परिवार को वे खुशियाँ तो नहीं लौटा सकते जो भारतीय समुदाय की सुरक्षा के मार्ग में कुर्बान हो गई परन्तु आतंकवाद का विनाश करके उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित तो कर ही सकते हैं...........

Sunday, December 14, 2008


कसाब नाव से उतरा, पानी और कीचड से गुज़रा, स्टेशन पहुँचा
लेकिन न कीचड जूतों पर और न भीगने के निशान पैंट पर
"अजमल आमिर कसाब हमारी पुलिस के लिए बड़ी काम की चीज़ सिद्ध हो रहा है। एक तो उस की याददाश्त बहुत अच्छी है जो पुलिस के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो रही है। उसे पूरी कहानी जुबानी याद है। कौन कौन लोग उस के साथ थे, वे सब कहाँ के रहने वाले थे, उन के पते क्या क्या थे, कब-कब, कहाँ-कहाँ, किस-किस को, किस-किस ने, किस-किस प्रकार की ट्रेनिंग दी, उसे सब याद है, जगहें भी और लोग भी। साथ ही वो पुलिस के लिए इतना को- ओपरेटिव भी है की पुलिस के प्रत्येक प्रशन का खुशी-खुशी उत्तर देने के लिए हर समय तैयार रहता है।यह पहला पैराग्राफ था मेरे उस लेख का जो मैंने अपने दिल्ली कार्यालय में बैठ कर १० दिसम्बर को लिखा था। अर्थात आपकी नज़र से गुज़रा ब्र्हुस्पतिवार, ११ दिसम्बर को। उस के बाद ब्र्हुस्पतिवार और शुक्रवार को मुझे नहीं लिखना था इसलिए मैंने अपने पाठकों की सेवा में यह प्रस्तुत किया था की मेरे इस जारी लेख की आगामी कड़ी उनके सामने होगी रविवार १४ दिसम्बर को। कारण था की सम्पूर्ण दास्ताँ मैं दिल्ली में बैठ कर नहीं लिखना चाहता था। मुझे लगा की आवयशक है की मैं मुंबई में घटना स्थल पर पहुँच कर प्रत्येक जगह का निरिक्षण करूँ, जहाँ जहाँ भी आतंकवादी कार्यवाही हुई थी। इस लिए शुक्रवार मेरे और मुंबई टीम के लिए अत्यन्त व्यस्तता का दिन था। हम लोग ऐसे प्रत्येक स्थान पर गए जहाँ जहाँ भी आतंकवादी हमले हुए थे और प्रत्येक चीज़ का ध्यानपूर्वक निरिक्षण करने का प्रयास किया।अतएवं आज बात आरम्भ करते हैं इस स्थान से जहाँ अजमल आमिर कसाब अपने सहकर्मी आतंकवादियों के साथ रबड़ की नाव से मुंबई पहुँचा। उस स्थान का नाम है बुधवार पार्क, यहाँ से सड़क पर आकर उस ने टैक्सी पकड़ी, टैक्सी से वह सी एस टी स्टेशन पहुँचा। हमारे पास अपने वाहन थे। परन्तु हम कई बातों को गहराई से समझना चाहते थे इसलिए हम ने तय किया की हमारी एक टीम जिस में दो लोग होंगे वह टैक्सी द्वारा ही सी एस टी स्टेशन पहुंचेंगे। हम आठ लोग (स्पष्ट रहे की उस स्थान तक पहुँचने वाले आतंकवादियों की संख्या भी आठ ही थी। क्यूंकि दो आतंकवादी जो होटल ओबेरॉय पहुंचे वह दूसरे पॉइंट से गए थे जिस का उल्लेख हम बाद में करेंगे) हम लोग उसी स्थान पर खड़े हो कर टैक्सी की प्रतीक्षा करने लगे। लग भाग १२ मिनट तक कोई टैक्सी वाला नहीं रुका इस लिए की सभी में यात्री पहले से ही बैठे हुए थे। इस बीच १५ से अधिक टेक्सियाँ हमारे सामने से गुजरीं जिन्हें रोकने का प्रयास किया गया परन्तु उन में पहले से ही कोई न कोई व्यक्ति बैठा था, काफ़ी प्रयास के बाद एक टेक्सी रुकी, जिस में हमारे साथी जावेद जमालुद्दीन और उन के साथ स्थानीय रिपोर्टर शराफत खान जो की उस दिन अर्थात २६ नवम्बर को उस समय सी एस टी स्टेशन के निकट ही थे, जब यह घटना हुई, स्वर हुए। टैक्सी द्वारा उन लोगों को स्टेशन पहुँचने में १४ मिनट का समय लगा। लगभग इतना ही समय अजमल आमिर कसाब और उसके साथी इस्माइल को भी लगा होगा। उस के बाद क्या हुआ यह २६ नवम्बर से आज तक आप लगातार पढ़ते चले आरहे हैं और इस विवरण को एक मात्र जीवित बचे आतंकवादी अजमल आमिर कसाब ने अपने शब्दों में बयान किया। हम उस का पूरा बयान आप की सेवा में प्रस्तुत करेंगे परन्तु अभी नहीं। आज मैं केवल एक बात पर आप सब का ध्यान केंद्रित करना चाहता हूँ इस लिए आज का लेख अत्यन्त छोटा होगा ताकि आप का पूरा ध्यान उस चित्र में पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब के वस्त्रों और मुख्य रूप से उस के जूतों पर केंद्रित रहे। आप को याद होगा हम ने इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा का भी केवल एक फोटो द्वारा ही ऑपेरशन बटला हाउस के पूरे सत्य को सामने लाने का प्रयास किया था और आज फिर एक बार येही प्रयास दोहरा रहे हैं। आज भी केवल हम एक फोटो द्वारा ही अपनी जांच आरम्भ करेंगे।ध्यान से देखें इस फोटो को, इस में कसाब के जूते बिल्कुल साफ़ हैं। उस ने जो कार्गो पेंट पहनी हुई है वह भी सफ़ेद या बहोत ही हलके रंग की है, उस पर न तो कीचड लगी है न पानी से भीगे होने के निशान हैं, न जूते कीचड में सने हैं जबकि वह नाव के सहारे बुधवार पार्क पंहुचा जिस का फोटो हमने ऊपर दिया है। आप देख सकते हैं की नाव से उतर कर सड़क तक पहुँचने से पहले आतंकवादियों को जिस मार्ग से गुज़रना था, वह अत्यन्त कीचड भरा और गन्दा है। जबकि सी एस टी स्टेशन पर ऐ के ४७ लेकर खड़ा आतंकवादी कसाब जो कपड़े पहने हुए हैं उन पर गन्दगी की एक छींट भी नहीं दिख रही है और न ही उस के आस पास की धरती पर जहाँ वह कुछ कदम जो अवश्य चला होगा और यह भी अत्यन्त आश्चर्यजनिक है की उस के जूते के सोल पर भी कीचड बिल्कुल नहीं है। यह कैसे सम्भव हुआ? क्या कसाब पहले कहीं और गया था? वहां उस ने वस्त्र बदले, जूते बदले और तैयार होकर फिर स्टेशन पहुँचा? अगर ऐसा है तो वह स्थान कौनसा था? ले जाने वाले कौन थे? अभी तक इस का उल्लेख क्यूँ नहीं? और अगर वह सीधे वहां पहुंचे तो उस के जूतों पर कीचड क्यूँ नहीं थी? पैंट के निचले भाग पर पानी का निशान क्यूँ नहीं? स्पष्ट है की केवल आधे घंटे में इतने मोटे कपड़े की कार्गो पैंट सूख तो नहीं सकती। सोचें फिर हमें बताएं की आपकी राय क्या है। यह सिलसिला जारी रहेगा परन्तु प्रत्येक दिन प्रत्येक प्रशन पर आपकी राय भी आवयशक है, चाहे वह ई-मेल द्वारा हो, एस एम् एस या फैक्स द्वारा। आज के लिए बस इतना ही। कल फिर आपकी सेवा में उपस्थित होंगे कुछ नए प्रशनों के साथ।

Wednesday, December 10, 2008

अगर पुलिस को दिया गया कसाब का बयान सच्चा

तो फिर प्रज्ञा, प्रोहित और पाण्डेय के बयान भी सच्चे!

अजमल आमिर कसाब हमारी पुलिस के लिए बड़ी काम की चीज़ सिद्ध हो रहा है। एक तो उसकी याददाश्त बहुत अच्छी है जो पुलिस के लिए अतिमहत्त्वपूर्ण सिद्ध हो रही है। उसे पूरी कहानी ज़बानी याद है। कौन कौन लोग उस के साथ थे, वे सब कहाँ के रहने वाले थे, उनके पते क्या क्या थे, कब-कब, कहाँ-कहाँ, किस-किस को, किस-किस ने, किस-किस प्रकार की ट्रेनिंग दी, उसे सब याद है, जगहें भी और लोग भी। साथ ही वह पुलिस के लिए इतना को-ओप्रटिव भी है की पुलिस के प्रत्येक प्रशन का खुशी खुशी उत्तर देने के लिए हर समय तैयार रहता है। वह हमारी पुलिस से इतना घुल मिल भी गया है की कब उसे अपनी माँ की याद आती है और कब माँ को चिट्ठी लिखना चाहता है, एक हमदर्द अच्छे मित्र की तरह अपनी प्रत्येक इच्छा उनके सामने रखता है। यहाँ तक की अमिताभ बच्चन की कौनसी फ़िल्म देखना चाहता है, यह बताने में भी उसे कोई संकोच नहीं होता और हमारी पुलिस भी इतनी दयालु है की उस के हर आराम का ध्यान रखती है। अर्थार्त वह व्यक्ति जो ६० घंटों तक भारत पर किए गए हमले की प्रमुख कड़ी, हमारी पुलिस, फौज, भारत सरकार, महाराष्ट्र सरकार और लगभग १०० करोड़ जनता के लिए सब से बड़ा सिरदर्द बना रहा, वह आज हमारी पुलिस के लिए सब से बड़े सुकून का कारण बन गया है। पुलिस के प्रत्येक प्रशन का उस के पास उत्तर है। केवल इतना ही नहीं की उसने ट्रेनिंग कब-कब, कहाँ-कहाँ ली, उसे इस बात की भी पूर्ण जानकारी है की कुबेर पर कब और कहाँ कब्जा किया, कहाँ मारा, किस-किस को मारा, कहाँ सटेलाईट फ़ोन छूटा, कहाँ से नाव ली, किस प्रकार ५ ग्रुपों में बट कर ताज, ओबेरॉय, सी एस टी और नरीमन हाउस पहुंचे, किस ग्रुप में कौन था, वह इस बात को भी स्वीकार करता है की ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे पर छुप कर हमला करने वाला वही है। वह यह भी बताता है की ९ एम् एम् वाली पिस्टल उस ने पाकिस्तान से प्राप्त की थी और करकरे पर गोलियां उस ने ऐ के ४७ या ५६ से नहीं बल्कि पिस्टल से चलाईं। परन्तु जब हमारा जांबाज़ सिपाही तुकाराम उसे जीवित पकड़ने के प्रयास में मारा जाता है तो उस पर वे ऐ के ४७ से हमला करता है अर्थार्त हेमंत करकरे के बारे में इस प्रकार यह पुष्टि हो भी जाए की उनकी मृत्यु किस गोली से हुई और यदि हत्या में ऐ के ४७ या ५६ नहीं ९ एम् एम् की गोली होने के प्रमाण मिलें तो अपराधी का इकबालिया बयान प्रस्तुत है, किसी और पर संदेह करने की आव्यशकता ही नहीं है और अब यह प्रशन तो उठाना ही नहीं चाहिए की शहीद हेमंत करकरे की मृत्यु किस प्रकार हुई और उन की मृत्यु के लिए कौन जिम्मेदार है, इस लिए की अपराधी स्वयं अपना अपराध स्वीकार कर रहा है की उस ने ही गोलीयाँ चलाईं, उस ने ही तीनों अपराधियों को गाड़ी से निकाल कर बाहर फैंका, उस ने ही गाड़ी पर कब्जा किया। बस इस बयान में थोडी सी कमी यह है की उस टाटा कुअलिस में मरने वालों की संख्या ६ थी और कुल ७ लोग सवार थे, जिन में ४ कांस्टेबल थे, तीन अधिकारीयों में ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे, इनकाउन्टर स्पेशलिस्ट विजय सालसकर और अशोक काम्टे। इस हमले में बच जाने वाले एक मात्र सिपाही का नाम जाधव था, जिस को बाजू में गोली लगी, और अब वह इलाज करा रहा है। सम्भव है अब कसाब यह भी बता दे की शेष तीन पुलिस कांस्टेबल जो हेमंत करकरे के साथ शहीद हुए, वह उस के दूसरे साथियों की गोलियों से मारे गए जो अब जीवित नहीं बचे हैं।

इस कहानी के अनुसार पाकिस्तान पूर्ण रूप से इन हमलों के लिए जिम्मेदार है। उसी धरती पर षड़यंत्र रचा गया। ट्रेनिंग देने वालों से लेकर मंसूबा बनाने वालों तक सबका सम्बन्ध इसी धरती से है। हमें अत्यन्त दुःख है की पाकिस्तान द्वारा ट्रेनिंग प्राप्त किए केवल १० आतंकवादी ६० घंटों तक हमारी पुलिस और फौज का मुकाबला करते रहे। हमें इस बात का भी दुःख है की ताज और ओबेरॉय जैसे ७ स्टार होटलों का सुरक्षा प्रबंधन इतना ख़राब था की ४ और २ के ग्रुपों में आतंकवादियों ने इतने भारी हथियारों के साथ प्रवेश किया था और किसी को उन की जानकारी भी नहीं मिली। ६० घंटों तक यह आतंकवादी हमारी पुलिस और फौज का मुकाबला करते रहते हैं और साथ ही इस मुकाबले के बीच अपने स्वामियों से टेलीफोन पर बात कर के आदेश भी लेते रहते हैं। अर्थात उन के पास इतना समय रहता था की वह टेलीफोन पर बात करते रहे, हथियार चलाते रहे और हमारे सजग कामांडोस इस अवसर का लाभ उठा कर भी उन पर हमला न कर सके। केवल फोटो और इन्टरनेट पर गूगल की वेबसाईट देखने के बाद आतंकवादी मुंबई के कठिन नक्शों और ताज और ओबेरॉय की बिल्डिंग के अन्दर के भागों से इतना अवगत हो जाते हैं की उन्हें कहीं भी पहुँचने में और पोजीशन लेने में कोई कठिनाई नहीं आती। शायद उन्हें यह भी पता होता है की खुफिया कैमरों की पकड़ से वे किस प्रकार बच सकते हैं या कम से कम उन की पकड़ में आ सकते हैं। ऐसी दवाइयाँ भी उन के पास होती हैं की ६० घंटों तक न उन्हें कुछ खाने की आव्यशकता होती है और न शौच की, न सोने की। लगातार जागते रहने के लिए तो बहरहाल वे कुछ दवाइयाँ लेते रहते हैं परन्तु शेष बातों के लिए उन्होंने कौनसी दवाइयाँ लीं यह अभी तक कसाब ने नहीं बताया है। हो सकता है कोई बड़ा डॉक्टर उसे ऐसी दवाइयों के नाम भी बता दे की यह भी सम्भव नज़र आने लगे की बिना खाए और बिना आव्यशाक्तों से निपटे किस प्रकार ६० घंटों तक मोर्चे पर डाटा रहा जा सकता है।

हमारी मजबूरी है की हम १०० करोड़ भारतियों के पास इस आतंकवादी की प्रत्येक बात को विश्वसनीय मानने के अलावा कोई चारा नहीं है क्यूंकि १० आतंकवादियों में केवल अकेला वही जीवित है और शेष जीवित हो कर अब उस की किसी बात को झूठा करार नहीं दे सकते और हमारी पुलिस को इस के बयान की सच्चाई जानने की बिल्कुल आव्यशकता है ही नहीं, इस लिए की उन्हें भरोसा है की कसाब जो बोलेगा, सच ही बोलेगा और सच के अतिरिक्त कुछ नहीं बोलेगा। इस लिए वह उसे लाइ डिटेक्टर टेस्ट, पोलिग्रफ्य टेस्ट, नार्को टेस्ट जैसी पीड़ा दायक प्रक्रियाओं से नहीं गुज़रना चाहते, यह अत्याचार तो उन्होंने साध्वी प्रज्ञा, दयानंद पाण्डेय और प्रोहित जैसे महान लोगों पर किया था और इतना किया था की हमारे भूतपूर्व गृहमंत्री व उपप्रधानमंत्री या यूँ कहिये की प्रधानमंत्री बन्ने के इच्छुक लाल कृष्ण अडवाणी अत्यन्त बेचैन हो गए और उन्होंने इस समस्या पर प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से मिलना आवयशक समझा परन्तु संभवत: लाल कृष्ण अडवाणी जी के सहदेशवासी होने का लाभ प्राप्त हुआ कसाब को......यह तो आप जानते ही हैं की अडवाणी जी भी पाकिस्तान के संध प्रांती में ही जन्मे थे अत: हमारे पुलिस वालों ने इस बात का ध्यान रखा होगा की जो त्रुटी पहले हो चुकी है, वह अब न हो। येही कारण है की अब तक कोई ऐसी बात सुनने में नहीं आई की कसाब ने पुलिस के किसी भी अत्याचार व उत्पीडन का शिकवा किसी से किया हो। अर्थात उस के साथ पुलिस ने किसी प्रकार का अत्याचार नहीं किया।

कसाब बड़ा धार्मिक व्यक्ति है। आधी रात के बाद उठ कर तहज्जुद की नमाज़ पढता है और फिर सोता नहीं, फज्र की नमाज़ पढने के बाद नाश्ते के समय तक ट्रेनिंग में व्यस्त रहता है। कुरान व हदीस की बातें भी अच्छी तरह जानता है। मतलब यह संदेश देने की कोशिश भी कर रहा है की हत्या और विनाश दीनदार मुसलमानों का काम है जो कुरान व हदीस और उस के संदेश को अच्छी तरह समझते हैं।

हमारा मीडिया विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पुलिस के द्वारा उपलब्ध कराये गए हर बयान को अत्याधिक प्रभावी और सुंदर ढंग में प्रस्तुत करने की निपुणता रखता है। इस का नाटकीय चित्रण इतना मज़बूत होता है मानो अब किसी आतंकवादी के बयान को पेश नहीं कर रहे हैं बल्कि आंखों देखा हाल एक विडियो फ़िल्म के द्वारा पेश करने का प्रयास कर रहे हैं। सम्भव है की पुलिस इस प्रचार को अपने लिए बड़ा उपयोगी समझती हो और ऐसा मीडिया जो जांच के बजाय पुलिस के द्वारा सुनाई गई कहानी को महत्त्व देना उस का प्रचार करना ही अपने कर्तव्य को निभाना समझता है, सम्भव है कल अपनी भूल का एहसास करे, इस लिए की अदालत में इस बयान का कोई महत्त्व नहीं है। पुलिस की मौजूदगी में किसी भी अपराधी का दिया गया बयान अदालत में कोई महत्त्व नहीं रखता और यदि पाठक और भारत सरकार हमें अपनी राय प्रकट करने की आज्ञा दें तो पुलिस से अत्याधिक क्षमा के साथ हम केवल इतना कहना चाहेंगे की कम से कम पुलिस ऐसे मामलों में कुछ अच्छे स्क्रिप्ट राइटर्स की सेवाएँ प्राप्त किया करे और पहले कहानी के सभी पक्षों पर विचार कर लिया करे। इस लिए की भारतीय जानता इतनी ज़हीन है की उस ने दुर्घटना के तुंरत बाद अपने पहले प्रदर्शन में ही संदेश दे दिया था और शहीद हेमंत करकरे की मृत्यु की सच्चाई क्या है, इस के लिए एक कसाब का बयान तो क्या हजारों क़साबों का बयान बेकार है क्यूंकि शहीद हेमंत करकरे की पत्नी ने जो पहली प्रतिक्रिया प्रकट की, वह हर भारतीय को समझाने के लिए काफ़ी है की उन की दृष्टी में अपराधी कौन कौन हैं?

अब रहा प्रशन रोजनामा राष्ट्रीय सहारा, उस की रिसर्च टीम तथा पाठकों के द्वारा दी जाने वाली महत्त्वपूर्ण सूचनाओं के द्वारा तथ्यों को सामने रखने का तो इस में कहने केलिए अभी बहुत कुछ शेष है, जिस को हम बहुत जल्द अपने पाठकों और भारत सरकार की सेवा में प्रस्तुत करने का इरादा रखते हैं। इस के पश्चात पुलिस स्वयं ही इस कहानी को झूठा करार देने के लिए मजबूर हो सकती है और यदि कुछ क्षणों के लिए हम इस कहानी को सच्चा मान भी लें तो पुलिस के सामने सब से बड़ी कठिनाई यह होगी की अब तक दिए गए सभी इकबालिया बयानों को उसे सच्चा मानना पड़ेगा। पुलिस की मौजूदगी में यानी ऐ टी एस हेमंत करकरे और उसकी टीम की मौजूदगी में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टनेंट कर्नल प्रोहित, दयानंद पाण्डेय और मेजर उपाध्याय ने जो कुछ कहाँ वह सब भी सच्चा माना जायेगा, क्यूंकि यदि एक इतने खतरनाक आतंकवादी को हमने सच्चा मान लिया तो वह जिन्हें शहीद हेमंत करकरे आतंकवादी सिद्ध कर रहे थे उन सब के बयानों को झूठा कैसे साबित किया जायेगा। यदि पुलिस के सामने बयान की गई यह कहानी सच्ची है तो फिर साध्वी प्रज्ञा सिंह, प्रोहित और दयानंद पाण्डेय के सभी बयान भी सच्चे और जब इन्हें सच्चा मानें तो बात प्रवीन तोगडिया और लाल कृष्ण अडवाणी तक भी पहुँच सकती है। मतलब जहाँ से चले थे वहीँ पहुँच गए। बहरहाल अब यह निर्णय तो पुलिस और उत्तरदायी मीडिया को ही करना होगा की वह केवल उस एक आतंकवादी की बात को सच मान कर पिछले तमाम आरोपियों के पुलिस को दिए गए बयानों को सच्चा मान लें या फिर इस की हर बात को बकवास करार दे कर हर बात की नए सिरे से जांच ईमानदारी से करें। यदि कसाब को अपराधी और इसके सभी साथी आतंकवादी साथियों को भारत पर हुए आतंकवादी हमले का जिम्मेदार करार दे कर जांच बंद कर दी गई और परदे के पीछे के वास्तविक अपराधी सुरक्षित रह गए तो अत्याधिक दुःख के साथ हमें यह कहना पड़ेगा की भारत में आतंकवाद की समाप्ति नहीं होगी। वह इसी प्रकार पोषित होता रहेगा। आतंकवादी मानसिकता, नए नए चेहरे, नए तरीके, नए नए बहाने तलाश करती रहेगी।

हम अपनी बात के स्पष्टीकरण के लिए ऐसे कुछ आरोपियों के इकबालिया बयान कल और उस के बाद के प्रकाशनों में अपने पाठकों की सेवा में पेश करेंगे और फिर उन से उन की राय मांगेंगे की यदि कसाब के बयान को सच्चा मान लिया जाए तो फिर प्रज्ञा, प्रोहित और दयानंद जैसों के बयानों को सच्चा क्यूँ नहीं माना जाए.........



कौन है मास्टर माइंड इन आतंकवादी हमलों का

क्या सोचते हैं आप! विचार करें और बताएं

जीवन सहारा उर्दू विशेषकर इस एक लेख "मुसलमानाने हिंद .......माजी, हाल और मुस्तकबिल???तक सिमट कर रह गया है। घर परिवार मित्र, रिश्ते नाते, तीज त्यौहार सब कुछ बहुत पीछे छूट गया है। यहाँ तक की शनिवार की शाम जब मैं अपने कार्यालय मैं बैठा उस दिन का लेख तैयार कर रहा था तभी फ़ोन पर सूचना मिली की पत्नी की तबियत बहुत ख़राब है। अत: डॉक्टर को फ़ोन किया और मैं ख़ुद भी घर के लिए रवाना हो गया। एक ही समय में मैं और डॉक्टर घर पहोंचे। इंजेक्शन इत्यादि देने के बाद कुछ राहत मिली तो तो उस ने बड़ी हसरत से मूंगफली का एक पैकेट खोलकर मेरे सामने रखते हुए कहा,"कभी आप सर्दियों में मूंगफली और गजक ले कर आते थे आज मैं लेकर आई हूँ, अब तो आपके पास इतना समय नहीं होता..........कभी हम जब बहुत मामूली जीवन जी रहे थे तब बहुत खुश थे, थोड़े से पैसे होते तो आप मूंगफली लाते और कभी कभी फ़िल्म भी देख आते, अब तो यह सब सपनों की सी बातें लगती हैं। इस के पश्चात् मुझे लगा की कुछ तकाजे ऐसे भी हैं जिनकी बिल्कुल उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। मैं देर तक उससे बातें करता रहा, रात्रि के लगभग १० बजे का समय था, टी वी ऑन किया तो कलर्स चैनल पर फ़िल्म "हल्ला बोल" आरही थी। शायद आधी से ज़्यादा फ़िल्म निकल चुकी थी, जहाँ से मैंने फ़िल्म देखना शुरू की वहां अदालत में एक लड़की झूठ बोलकर अपराधियों की जान बचा लेती है। ये अपराधी राज्य के एक मंत्री के बेटे हैं और इस फ़िल्म के नायक समीर खान जो एक फ़िल्म स्टार है, अपराधियों को उन के किए का दंड दिलाने के लिए अपनी पोजीशन की भी चिंता नहीं करता। परन्तु उस लड़की का झूठ मुकद्के को उन के हक में कर देता है। लड़की अदालत से बहार निकल कर फूट फूट कर रोते हुए बताती है की किस तरह बाज़ार में अपमानित किया गया और उसे यह धमकी भी दी गई की यदि अदालत में उस ने अपराधियों की पहचान की तो उस का अंजाम भी ऐसा ही होगा जैसा की उस की बाहें का हुआ था। समीर खान उस के बावजूद भी हार नहीं मानता। वह अपराधियों को बेनकाब करना चाहता है इसलिए राज्य के उस मंत्री गाइक्वाद के घर पहोंचता है और वहां उस के आलिशान घर पहुँच कर उसे उसकी वास्तविकता बतलाता है। परन्तु जब वह वहां से लौट रहा होता है तो रास्ते में उस पर हमला होता है, उसका सीनियर साथी सिद्धू समय पर पहुँच कर समीर खान की जान बचाता है।


गैक्वाद का प्रयास है समीर खान किसी भी तरह सड़क पर किए गए प्रदर्शन में उसे बेनकाब न करे, जबकि समीर खान और सिद्धू जो एक थिअटर से निकले थे यह फ़ैसला करते हैं की "हल्ला बोल" के नाम से सड़क पर नाटक करके अपराधियों को बेनकाब करेंगे। लंबे समय के बाद देखि गई इस फ़िल्म में भी मैं अपनी पत्नी के साथ रह कर भी साथ न रह सका, मेरा यह सिलसिलेवार लेख इस दौरान भी मेरे मस्तिष्क पर छाया रहा। मुझे लगा की यह समीर खान वास्तविक जीवन में हमारे जीवन में हमारे बीच हेमंत करकरे के रूप में मौजूद था जो दुर्भाग्य से अब हमारे साथ नहीं हैं और गाइक्वाद आज भी जीवित है। क्या उसे बेनकाब करने के लिए कुछ समीर खान सामने आयेंगे? करकरे के अधूरे काम को पूरा करने का साहस करेंगे? शायद येही उन के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आज ईद का दिन है मेरे पाठक मुझ से राय मांगते रहे हैं की राष्ट्र व क़ौम के कल्याण के लिए वे क्या करें? हर बार मैंने येही कहा की माहौल को अनुरूप होने दीजिये, एक हो कर कोई कार्य योजना बनायेंगे और फिर उसे क्रियान्वयन के लिए आपके सामने रखा जायेगा। परन्तु इस समय मैं अनुभव करता हूँ की देर करना उचित नहीं होगा, अब कोई शुरुवात करनी ही होगी। अत: विचार आया की इस आन्दोलन को आगे बढ़ने के लिए आप कोई नाम सामने रखें और यदि आप चाहें तो वो नाम


"सहारा यूनिटी मिशन"


SAHARA UNITY MISSION


भी हो सकता है। हर शहर, हर गावं, हर मुहल्ले में इस की शाख स्थापित करें और रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के द्वारा शुरू की गई अधिकार और न्याय की इस जंग को अपने हाथ में लेकर आगे बढ़ें। परन्तु यह ध्यान रहे की यह जंग अकेले नहीं लड़नी है। इस जंग में सफलता तब तक सम्भव नहीं जब तक के हमारे अन्य देशवासी भाई विशेषकर हिंदू भाई इस में शामिल न हों। इस लिए आज हम में से हर एक को अपने निकटतम हिंदू भाइयों से ईद मिलने के लिए अवश्य जाना चाहिए और जो आ सकें उन्हें निमंत्रण भी देना चाहिए तथा उन के सामने केवल एक ही बात रखनी चाहिए की मुंबई पर आतंकवादी हमला वास्तव में हमारे देश पर किया गया आतंकवादी हमला है और यह जंग हमें मिलजुल कर लड़नी है, उसी प्रकार जिस प्रकार अंग्रेजों के विरुद्ध जंग में हम कंधे से कन्धा मिलाकर साथ थे। आज चाहे हमारे विदेशी पड़ोसी का मामला हो या हमारे देश में देश के उन गद्दारों का मामला हो जो सफ़ेद पोश होने के करना पहचान में नहीं आते हैं, इस लिए बचे रहते हैं। आतंकवादी उस समय तक अपनी आतंकवादी गतिविधियों में सफल नहीं हो सकते जब तक की उन्हें अन्दर से कोई सहायता न मिले। क्या उत्तरदायी लोगों की लापरवाही उनके लिए उत्साह्वृद्धक साबित होती है या फिर यह आतंकवाद उन की राजनीतीक आव्यशकता बन गई है और इसके लिए वह इंसानों का खून बहने से भी बाज़ नहीं आते।
आजके इस लेख को मैं अधिक विस्तार नहीं देना चाहता। आज का समय पढने से ज़्यादा मैं आप सबको सोचने में प्रयोग करते हुए देखना चाहता हूँ और आपके सोचने के लिए उपरोक्त बिन्दुओं के अतिरिक्त एक तस्वीर भी आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ जिस में शहीद करकरे का चेहरा और होटल ताज की इमारत है, चारों ओर वे चेहरे हैं जिन में से कुछ हेमंत करकरे और उनके साथियों की मृत्यु के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं और देश पर इस आतंकवादी हमले के लिए भी। सबसे ऊपर जो तीन चेहरे (साध्वी प्रज्ञा सिंह, लेफ्टनेंट कर्नल प्रोहित और दयानंद पाण्डेय) आपके सामने हैं, उन को तो इस लिए इस फोटो में जगह दी गई है की हो सकता है येही तीन इस भयानक हमले का बुनयादी करना बने हों, इस लिए की हेमंत करकरे जिन्हें बेनकाब कर रहे थे, उन में सूची में सब से ऊपर यही थे. मोदी और प्रवीन तोगाडिया, शायद यह उन लोगों में से हैं जिन के दामन तक वह आग पहुँच रही थी और वह अपने भविष्य और योजनाओं को लेकर डर गए थे। मनमोहन सिंह, कोंडोलिजा राइस और मोसाद की सांकेतिक फोटो इस लिए दी गई हैं की कहीं ऐसा तो नहीं की भारत में मुसलमानों को आरोपी ठहराने के लिए अमेरिका और इस्राइल ने भी कोई रोल अदा किया हो और हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह उन के दबाव में आकर मौन रहने के लिए विवश हो गए हों। अडवाणी और उनके बीच जो भी बातचीत हुई हो, क्या इस में अमेरिका का भी कोई दखल था और अंत में जो फोटो हैं उन में एक तो वो आतंकवादी है जो पुलिस की कहानी का केंद्रीय चरित्र है और जिस के सहारे इस आतंकवादी हमले की सच्चाई सामने रखने की बात कही जा रही है और बाक़ी पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी और दवूद इब्राहीम जिन की ओर यह इशारा है की आई एस आई अर्थार्त पाकिस्तान का खुफिया संघटन इन आतंकवादी हमलों में लिप्त है। मेरे मस्तिष्क में इन सभी फोटो के सम्बन्ध से एक काल्पनिक कथा है, एक ऐसा दृष्टिकोण जो शायद सही भी हो सकता है, मगर इस समय मैं इन फोटो को आपकी सेवा में प्रस्तुत करना चाहता हूँ की पहले आप सब का दृष्टिकोण जानूं क्यूंकि पूर्ण वस्तुस्थिति आपके सामने है और कोई राय तो आपने भी स्थापित की होगी, इस लिए कलम उठाइये और नीचे दिए गए ई मेल द्वारा मुझे अपनी राय भेजिए और फिर प्रतिज्ञा करें मेरे अगले लेख का।

Sunday, December 7, 2008

१९९३ के अतिरिक्त सभी आतंकवादी घटनाएं संघ व मोसाद की साजिश का नतीजा हैं!

करकरे इस सच्चाई को सामने ला रहे थे

इस प्रमाण के बारे में आप का क्या कहना है? आप इस का अनुवाद करके इसे अपने ब्लॉग में क्यूँ नहीं डाल देते? क्या यह सही नहीं है की आप और आपके मित्र गाँधी के हत्यारों के लिए सहानुभूति रखते हैं?

कृपया इसे ध्यान से पढ़ें: १९९१ तक आर एस एस का आतंकवाद सन्वेदन्विहिन पड़ा हुआ था क्यूंकि कांग्रेस ने उसे दबा दिया था और इस लिए भी सोवियत संघ (यु एस एस आर) के साथ भारत के घनिष्ठ सम्बन्ध थे और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर एस एस को संरक्षण देने वाला कोई नहीं था।

१९९१ के बाद अर्थार्त राजीव गाँधी की हत्या और सोवियत संघ के टूटने के बाद, भारत ने इस्राइल को स्वीकार कर लिया। अमेरिका से निकटता बढ़ गई और शेष बातें इतिहास का अंश हैं।

भारत में आतंकवाद का अध्यन करने के लिए यह पृष्ठभूमि अत्यन्त भयानक है। आतंकवाद के आधुनिक अवतार भारत में, उसके द्वारा इस्राइल को स्वीकार कर लेने के बाद आयत किए गए। इससे आप भी इनकार नहीं कर सकते।

१९९० का वही दशक, अर्थात नरसिम्हा राव के बाद का दौर, जब मुसलमानों पर अत्याचारों का सिलसिला पुन: तेज़ हो गया था। वास्तव में उस दौर में भारत में अधिक बम धमाके हुए। करकरे इस सच्चाई को सामने ला रहे थे की १९९३ के अतिरिक्त सभी धमाके और आतंकवादी गतिविधियाँ संघ मोसाद के आपसी षड़यंत्र का परिणाम थी। आप उन की पत्नी से जा कर पूछें, अपनी मौत से पहले वह इसका खुलासा मीडिया के सामने करने वाले थे और देश छोड़ कर कहीं बहार चले जाने का इरादा रखते थे।

क्या आप यह नहीं देख रहे हैं की करकरे की मृत्यु पर कोई सरकारी व्यक्तव्य अब तक नहीं आया है और आप ने एक क़दम आगे जाते हुए यह परिणाम मेरे मेल पर भेजा है की यह निर्मल आनंद का "संयोग" था।

तो फिर सच्चाई को कौन तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहा है? आज केवल दो प्रकार के हिंदू हैं, एक वह जो आर एस एस और आतंकवाद का समर्थन करते हैं और दूसरे वे जिनकी संख्या अधिक है, जो इसका विरोध करते हैं।

इस्राइल - अमेरिका - आर एस एस का यह खेल १९९१ से चल रहा है की आतंक पैदा करो। मुसलमानों के नाम का प्रयोग करो और अंडरवर्ल्ड के कुछ अपराधियों को "जिहादी" कह कर पुकारो तथा इस प्रकार सभी मुसलमानों को बदनाम करो। आर एस एस - अमेरिका - इस्राइल का यह गठजोड़ केवल मुसलामानों को परेशान करने के लिए नहीं है। वह "मुस्लिम आतंकवाद" के नाम पर मुसलमानों को डरा कर भारत को अस्थिर करना चाहते हैं। अब आप यह पूछेंगे की आर एस एस आख़िर भारत को अस्थिर करना क्यूँ चाहेगा? क्यूँ नहीं? फासीवादी भगवान में या मानव द्वारा बनाये गए राज्य में विश्वास नहीं रखते। क्यूँ आर एस एस का उद्देश्य "अखंड भारत" का निर्माण करना है। उसे कहीं भी खड़ा किया जा सकता है, गुजरात या महाराष्ट्र के किनारे पर भी। फासीवाद के दृष्टिकोण पर ध्यान दें। राज्य की सीमा वहीँ तक होती है जहाँ तक उन की सत्ता होती है। वह उस भारत की बिल्कुल परवाह नहीं करते जिसकी स्थापना १९४७ में हुई थी। वह उसे भारत नहीं मानते। उस के मस्तिष्क में एक काल्पनिक भारत की रूपरेखा मौजूद है। जिस की सीमा फिलस्तीन तक मिली हुई हों। इस लिए आप देख सकते हैं की स्थानीय भाषा में, काल्पनिक चित्र हमें घटया और बटवारे की राजनीती तक ले जाते हैं। यह इतिहास की भाषा का नियम है।

अंत में, आपके विचार में १८५७ पर आधारित मेरी पुस्तक को क्यूँ दबा दिया गया।

अपने पिछले लेख, में मैंने यह दिखाने का प्रयास किया था की इस्राइल के बाहर रहने वाले यहूदी जिन्हें "सियांमस" कहते हैं, वह मोसाद की सहायता करने के लिए उतारू हैं और अपने इस कार्य में जान भी दे सकते हैं।

कोई भी बुद्धिमान इस संभावना से इनकार नहीं कर सकता की नरीमन हाउस में रहने वाले रब्बी और उनकी पत्नी भी "सियांमस" थे।

मैंने बहुत से प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। क्या आप जानते हैं की करकरे को ९ एम् एम् बुल्लेट से मारा गया था? अब आप मुझ से मेरे माध्यमों की बात पूछेंगे, जिस के बारे में स्पष्ट है की मैं आपको नहीं बता सकता। परन्तु ९ एम् एम् की गोलियाँ पुलिस सर्विस रेवोल्वेर में होती हैं, न की ऐ के ४७ में। अब आप मेरी बात समझ गए?

फिलहाल RAWऔर गृह मंत्रालय में शिवराज पाटिल के विरोधी पदाधिकारिगन करकरे की हत्या से सन्दर्भ में गुजरात ऐ टी एस की भूमिका की छानबीन कर रहे हैं, कया आप अब भी नहीं समझ पाये?

एक और पक्का प्रमाण:

नरीमन हाउस के बाहर खड़े हो कर सी एन बी सी न्यूज़ के साथ एक टेलीफोनिक इंटरव्यू में, फ्रीलांस जर्नलिस्ट अरुण अस्थाना ने बताया की ऐसी भी सूचनाएँ प्राप्त हुईं हैं की कुछ आतंकवादी हमला करने से पहले नरीमन हाउस के निकट गेस्ट हाउस में १५ दिनों तक ठहरे थे। अस्थाना ने यह भी बताया की "उन के पास भारी मात्रा में गोला बारूद, हथ्यार और खाने की सामग्री थी।"

अब दूसरी रिपोर्टों से भी यह बात स्पष्ट हो चुकी है की नरीमन हाउस में रहने वालों ने भी भारी मात्रा में खाने की सामग्री का आर्डर दिया था। यह खाना ३०-४० व्यक्तियों के लिए कई दिनों के लिए काफ़ी था। इतनी मात्रा में खाना क्यूँ मंगवाया गया? और अंत तक नरीमन हाउस पर हमला क्यूँ नहीं किया गया? मुंबई में रहने वाला एक गुजरती हिंदू सी एन एन आई बी एन टी वी पर प्रात: ३.३० या इस के आस पास आया और उस ने बताया की दो माह से नरीमन हाउस में संदिग्ध गतिविधियाँ जारी थी। बहुत से विदेशी इस में आते जाते रहे। यह बात पुलिस को भी बताई गई थी परन्तु किसी ने भी कोई कार्यवाही नहीं की।

सी एन एन आई बी एन ने इस समाचार को दोबारा नहीं चलाया, इस के पश्चात जब मुंबई के आम लोगों ने नरीमन हाउस पर धावा बोलने की धमकी दी तब जा कर एन एस जी कमांडोस अन्दर घुसे। यदि नरीमन हाउस के अन्दर केवल दो आतंकवादी ही छुपे हुए थे तो फिर उस पर धावा बोलने में इतना विलंब क्यूँ किया गया?

यह सरकार का गहरा षड़यंत्र है और कुछ नहीं। नरीमन हाउस के पूर्ण मामले पर जांच अत्याव्यशक है।

इस के बाद यह रिपोर्ट आई की "कुछ हद तक आश्चर्य की बात है की मुंबई के कामा हॉस्पिटल में उपस्थित आतंकवादी धाराप्रवाह मराठी बोल रहे हैं।" एक मराठी दैनिक "महाराष्ट्र टाईम्स" ने भी यह रिपोर्ट प्रकाशित की है की वह आतंकवादी जो कामा हॉस्पिटल में फायरिंग कर रहे थे उन्होंने ने सिविल ड्रेस में तैनात अस्पताल के एक कर्मचारी से मराठी में बात की थी।

इस समाचारपत्र के अनुसार जिन आतंकवादियों ने ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे, डिप्टी पुलिस कमिश्नर अशोक काम्टे और इनकाउन्टर स्पेशलिस्ट विजय सालसकर को निशाना बनाया, वह धाराप्रवाह मराठी बोल रहे थे।

इस समाचार पात्र का यह भी दावा है की युनिफोर्म पहने दो वाचमेन और अन्य लोगों पर गोलियाँ चलाने वाले आतंकवादियों ने बन्दूक की नोक पर उन से मराठी भाषा में पूछा की, " क्या तुम लोग यहाँ पर कर्मचारी हो?" उन कर्मचारियों में से एक ने आतंकवादियों का पैर पकड़ कर उन से कहा की "मैं यहाँ पर काम नहीं करता हूँ। मेरी पत्नी को दिल का दौरा पड़ा है और मैं उसे यहाँ भरती कराने आया हूँ।"

आतंकवादियों ने उससे एक बार फिर मराठी में पूछा की "तुम सच बोल रहे हो या झूठ?" कर्मचारी ने उत्तर दिया की "नहीं, भगवान की कसम मैं सत्य बोल रहा हूँ" , इस पर आतंकवादी ने उसे छोड़ दिया।

एक दूसरी रिपोर्ट यह बताती है की मुंबई के यहूदी, जो विस्थापित हो कर इस्राइल जा चुके हैं, वह भी धाराप्रवाह मराठी बोलते हैं तथा वह इस बात के लिए प्रसिद्द हैं की उन्हें मोसाद ने नियुक्त कर रखा है।

हेमंत करकरे की मृत्यु एक पहेली बनी हुई है। सभी सरकारी बयान एक दूसरे के विपरीत हैं। कुछ का कहना है की उन्हें सी एस टी के पास मारा गया, कुछ कहते हैं की उन की मृत्यु कामा हॉस्पिटल के पास हुई, कुछ मेट्रो सिनेमा के पास बताते हैं और कुछ का तो यह भी कहना है की उन्हें उस समय मारा गया जब वह पुलिस जीप में सवार थे। परन्तु उन्हें गोली कहाँ पर लगी? कुछ कहते हैं गर्दन पर और कुछ लोग ह्रदय के निकट बताते हैं। करकरे को एक टी वी पर बुल्लेटप्रूफ जैकेट पहेंते हुए दिखाया गया। ऐसी स्थिति में गोली उनकी गर्दन पर नहीं लगनी चाहिए थी, जबकि कोई स्नाइपर (छुप कर गोली चलाने वाला ) उन की प्रतीक्षा न कर रहा हो।

और अगर गोली उन के ह्रदय के निकट लगी तो फिर उन्होंने अपना यह जैकेट कब उतारा? किसी ने भी इस प्रशन का उत्तर देने का कष्ट नहीं किया। एक अन्य दृष्टीकोण भी उभर कर सामने आरहा है की करकरे को कामा के पास मारा गया परन्तु काम्टे और सालसकर की क्रित्यु मेट्रो (सिनेमा) के पास गोली बारी में हुई।

अब यह बातें स्पष्ट हो रही हैं:

१- बहुत से लोग गोरे रहे होंगे।

२- क्या वे अंतर्राष्ट्रीय खरीदे गए गुलाम थे? यदि हाँ, तो फिर किस देश के थे? किस ने उन्हें इकठ्ठा किया? यह बात सब को पता है की मोसाद और सी आई ऐ के पास ऐसे गुलामों के कई संघटन हैं, उन्हीं में से एक तथाकथित जिहादी भी हैं। वह जिहाद करते हैं और उन मुसलमानों को भ्रमित करते हैं जो विश्व की इस्लामोफोबिया से प्रभावित नहीं हुए हैं। सम्भव है की मुंबई में भी उन्हीं में से कुछ को प्रयोग किया गया हो परन्तु उन लोगों के पास अमेरिका, ब्रिटेन,मोरिशिअस तथा मलेसिया के पासपोर्ट क्यूँ थे?

३- वह कौन से मराठी थे जिन्होंने ने करकरे की हत्या कर दी? कामा हॉस्पिटल के पास का मार्ग पूर्ण रूप से सुनसान रहता है. यह सीधे मुंबई सी आई डी हेड्कोर्टर के पिछले द्वार तक जाता है. पुलिस के अज्ञात सूत्रों से पता चला है की करकरे को वहां पर करकरे विरोधी उस टीम द्वारा लाया गया था जो मुंबई पुलिस के हिंदुत्व समर्थक अधिकारी हैं और उन के साथ छोटा राजन के लोग भी सम्मिलित थे. करकरे, छोटा राजन के विरोधी थे. सालसकर भी प्रदीप शर्मा के विरोधी थे जो की मुंबई के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पद पर थे और छोटा राजन के शूटर के रूप में कार्य करने के कारण अब जेल में हैं। इस लिए मराठी बोलने वाले आतंकवादी कुछ ऐसे यहूदी हो सकते हैं जिनका मुंबई से सम्बन्ध रहा हो या फिर हिंदुत्व ब्रिगेड के भाड़े के हत्यारे या छोटा राजन के आदमी हो सकते हैं।

४- ऐसा लगता है की कई चीज़ें एक साथ घटित हुईं. २६ नवम्बर की रात में ९.३० बजे जब मुंबई पर हमला हुआ तो उस समय महाराष्ट्र के मुख्या मंत्री विलासराव देशमुख (जो अब हटा दिए गए हैं) केरल में थे. उसके बाद ११ बजे देशमुख गृहमंत्री शिवराज पाटिल (यह भी हटा दिए गए हैं) को इस समाचार की सूचना दी. और पाटिल ने एन एस जी कामान्डोसको भेजने की तैयारी आरम्भ कर दी थी. इस का अर्थ यह हुआ की ११ बजे तक देशमुख को पता चल चुका था की क्या कुछ हो रहा है. फिर ऐसे में ९.३० से लेकर प्रात: एक बजे के बीच विभिन्न स्थानों पर मुंबई पुलिस को तैनात क्यूँ नहीं किया गया था? येही वह समय था जब करकरे उन स्थानों पर पहुँचते हैं. मुंबई ऐ टी एस एक प्रथक संस्था है, यह मुंबई पुलिस के अधीन नहीं है अर्थात ११ बजे से १ बजे के बीच मुंबई पुलिस के सशक्त ४० हज़ार जवान दृश्य से बिल्कुल गायब थे और तभी करकरे वहां पहुँचते हैं तथा अपने साथियों के साथ मौत का शिकार हो जाते हैं। क्या यहाँ पर कोई खिचडी नहीं पाक रही है? स्पष्ट है की ११ बजे से १ बजे के बीच मुंबई पुलिस को जान बूझ कर अलग रखा गया, ऐसे समय में जब की आतंकवादी पूरी ताकत के साथ लोगों को मारने में लगे हुए थे, तभी करकरे को वहां जाने के लिए कहा गया होगा और वह वहाँ गए यह समझ कर की वहाँ पर मुंबई पुलिस के लोग तैनात होंगे। परन्तु वहां कोई नहीं था केवल एक दो पुलिस कर्मी ! और फिर उन्हें मार दिया गया!

अमरेश मिश्रा

Saturday, December 6, 2008

प्रज्ञा और प्रोहित नए नहीं हैं

आतंकवाद १९४७ से ही आर एस एस का कल्चर रहा है

अमरेश मिश्रा एक बड़े इतिहासकार और यथार्थवादी लेखक हैं। उन्होंने २६ नवम्बर को मुंबई पर आतंकवादी हमलों के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा है, जिसे हमने प्रकाशित भी किया है। उन्होंने ने अपने शोध द्वारा संघ परिवार के अतीत और इन आतंकवादी हमलों के उलझे हुए प्रश्नों पर भरपूर रौशनी डाली है, जिसे हम आज और आने वाले कल के प्रकाशन में पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करना चाहते हैं। अमरेश मिश्रा का यह लेख और उन के साथ की गई अभद्रता की जानकारी हमें ई-मेल द्वारा प्राप्त हुई। मुंबई पर आतंकवादी हमले के सम्बन्ध में मेरे ई-मेल पर कुछ और भी महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ हैं जिन्हें इस सिलसिलेवार लेख की आगामी कड़ियों में पाठकों की सेवा में प्रस्तुत किया जायेगा।

अब तथ्यों से छेड़छाड़ कौन कर रहा है? आप मेरा हवाला मेरी पृष्ठभूमि से बाहर जाकर देते हैं। मैंने कभी यह नहीं कहा की मुंबई हमले में चूंकि ६० मुस्लमान मारे गए थे इसलिए यह इस्लामी आतंकवादियों का कार्य नहीं हो सकता। मैंने केवल यह कहा था की यह वह तथ्य है जो कुछ देर के लिए मुझे ठहर कर सोचने पर मजबूर करता है।

इस बात को लेकर पूरे विश्व में मेरा साक्षात्कार हो रहा है, बी बी सी से लेकर अलजजीरा तक। मैं आपको कई बार इस बातचीत के बारे में बता चुका हूँ, जो द्वारिका के शंकराचार्य और सनातन धर्मियों के धरम गुरु स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज और आर एस एस प्रमुख गोलवलकर के बीच हुई थी। यह भी बता चुका हूँ की गोलवलकर ने कैसे श्री राम को "भगवान" मानने से मन कर दिया था और उन्हें केवल एक "महापुरुष" कहा करते थे और शंकराचार्य ने इन से कहा था की "येही बात रावन ने भी कही थी"।

आप यह बात भी भली भांति जानते हैं की द्वारिका के शंकराचार्य ने कई बार मुझ से कहा था की आर एस एस के कुछ लोग गांधी के हत्यारे हैं, उन्होंने ने कई बार मुझ से यह भी कहा था की आर एस एस के लोग अपराधी हैं, यह अपराधी दस्ते हैं, जिन्होंने कई बार शंकराचार्यों पर जानलेवा आक्रमण किया। वे हथ्यार और गोला बारूद एकत्रित करने में निपुण हैं। वे धर्म निरपेक्षता में विश्वास नहीं रखते। वे १९४७ से ही भारत में सेना की बगावत जैसा माहौल पैदा करने की प्रतीक्षा में हैं। आप जानते हैं की मेरे दादा सी बी आई में थे और इन दिनों (१९७० के दशक में) सी बी आई के सदस्य RAWके लिए भी कार्य किया करते थे अत: मेरी परवरिश RAW के सदस्यों की गोद में हुई है। इन लोगों के साथ मेरे सम्बन्ध अब भी हैं और मुझे यह बात भली भाँती पता है की RAW भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और भारत के राज्यतंत्र के भीतर एक और सांप्रदायिक, संघ समर्थक, इस्राइल समर्थक और अमेरिकी सेना की समर्थक शक्तियों और दूसरी और धर्म निरपेक्ष राष्ट्रिय वादी शक्तियों के बीच जीवन और मृत्यु की जंग चल रही है।

अत: २६ नवम्बर की रात मैं अचानक ही किसी निर्णय पर नहीं पहुँचा। मैं जानता था की सभी आतंकवादी हमले इन्हीं युद्ध का परिणाम हैं और धर्म निरपेक्ष राष्ट्रवादी शक्तियों को नीचा दिखने हेतु अमेरिका के समर्थक, इस्राइली समर्थक और संघ समर्थक शक्तियों का एक प्रयास है। ये शक्तियां अब अपने बचाव के लिए लड़ रही हैं।

मैं एक बार फिर किसी परिणाम तक नहीं पहुँचा। मुझे गुप्त तौर पर यह बात पता थी, इस लिए मैं वह सब कुछ कह सका, जो मैंने कहा है और इसीलिए मेरी बात सत्य भी साबित होगी, क्यूंकि जब मैं मालेगाँव के आतंकवादी हमलों में संघ के लिप्त होने की बातें कर रहा था की जिस दौर में अडवानी केंद्रीय मंत्री थे और २००६ में नांदेड का मामला पेश आया था, तो इस दौर में संघ (परिवार) ने अमेरिका और इस्राइल की सहायता से अपनी आतंकवादी गतिविधियाँ फिर से प्रारम्भ कर दी थीं। उस समय भी कुछ लोगों ने मेरी बातों पर विश्वास किया था और अब करकरे ने पूरे सत्य का खुलासा कर दिया है।

मैं यह महसूस करता हूँ की कुछ लोग करकरे से इर्ष्या रखते थे क्यूंकि वह सत्य तक पहुँच रहे थे और अडवाणी और मोदी को भी गिरफ्तार कर सकते थे। आपकी सोच इस स्तर तक पहुँच चुकी थी? एक बार फिर आप मेरा उल्लेख पृष्ठभूमि से हट कर मत कीजिये।

इस लड़ाई में मैं धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ हूँ। ब्रह्मण और अब्राह्मण नौकर शाहों का एक पूरा संप्रदाय मेरे समर्थन में खड़ा है। आप मेरी मजबूती को भी भलीभांति जानते हैं। आप मुझे यु पी के किसी भी चुनावी क्षेत्र से खड़ा कर दीजिये, अमेरिका, इस्राइल और संघ के बीच रिश्तों की बात करते हुए भी कन्याकुब्जा ब्राहमणों का पूरा वोट मुझे ही मिलेगा, इस पर आप क्या कहेंगे? यह किस कन्याकुब्जा ब्रह्मण मुस्लिम समर्थक हैं?

पंडित नेहरू इस बात को जानते थे और हम लोग भी इसे भलीभांति जानते हैं की भारत का सब से महत्त्वपूर्ण और एकमात्र संघ का आतंकवाद है।

ब्रिटेन के इतिहासकार एलेक्स्वान तन्ज़ल मैन ने अपनी पुस्तक "दी इंडियन समर : सीक्रेट स्टोरी ऑफ़ एन एंड ऑफ़ एन अम्ब्यार" में एम् १६ और कुछ गुप्त ब्रिटेन अभिलेखों का खुलासा किया है जो इस बात की पुष्टि करते हैं की सितम्बर १९४७ में दिल्ली में होने वाले सांप्रदायिक दंगे वास्तव में भारतीय सेना के पूर्व अधिकारीयों की सहायता से आर एस एस द्वारा कराये जाने वाले दंगे थे। इन दंगों को भारतीय सेना ने सख्ती से कुचल दिया।

अत: प्रसाद श्रीकांत प्रोहित और प्रज्ञा सिंह ठाकुर नए नहीं हैं, आतंकवाद १९४७ से आर एस एस की संस्कृति रही है। आख़िर क्यूँ? क्यूंकि इन्होने "इंडियन नॅशनल स्टेट" पर कभी भरोसा ही नहीं किया, जिस की स्थापना १९४७ में की गई थी। ऐसे बहुत से अभिलेख हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं की गोलवरकर ने यु पी के मुस्लिम क्षेत्रों में आक्रमण करने हेतु ब्रिटेन अधिकारियों से सांठगाँठ कर रखी थी।

निम्नलिखित नमुनूं को देखें और फिर कृपया एक बुद्धिमान व्यक्ति की तरह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें।

भारत की ब्रिटिश सरकार और आर एस एस के बीच संबंधों के पुख्ता प्रमाण राजेश्वर दयाल आई सी एस की जीवनी "ऐ लाइफ ऑफ़ अवर टाईम्स" में मौजूद हैं। इस पुस्तक को ओरिएंट लोग मैन ने १९९८ में प्रकाशित किया है।

उन्होंने ने आर एस एस को शहरों और गावों का विस्तृत मानचित्र प्राप्त किया ताकि मुसलमानों पर हमला किया जा सके।

दयाल कहते हैं की १९४६ के प्रारंभिक दिनों की एक कोकटेल पार्टी में मुख्या सचिव ने एक दिन अचानक मुझ से कहा था की "मैं उत्तर प्रदेश का अगला ग्रह सचिव बन सकता हूँ। ऐसी स्थिति में मैं पहला भारतीय अधिकारी होता जो इस पद पर आसीन होता, क्यूंकि अब तक यह पद ब्रिटिश अधिकारीयों के लिए ही सुरक्षित होता है।"

(पृष्ठ-७७)

ग्रह सचिव के रूप में दयाल बहुत ही गुप्त जानकारियों के राजदार बन चुके थे, "मैं एक अत्यन्त गंभीर घटना रिकॉर्ड पर रखना चाहता हूँ जब सांप्रदायिक तनाव अपनी पराकाष्टा पर था तो पश्चिमी रेंज के एक योग्य अधिकारी एवं अत्यन्त निपुण डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल बी बी एल जेटली बहुत रहस्मय ढंग से मेरे घर पहुंचे। उन के साथ दो अधिकारी थे, जो अपने साथ एक ताला लगा हुआ स्टील का संदूक भी लाये थे। जब उस संदूक को खोला गया तो उस के अन्दर से इस क्षेत्र के पश्चिमी जिलों में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे और खून खराबा करने के षड़यंत्र का परदा फाश हुआ और उस के प्रमाण भी मिले।

इस बक्से के अन्दर पूरी होश्यारी से बनाये गए ब्लू प्रिंट और व्यासायिक ढंग से बनाये गए मुस्लिम क्षेत्रों और निवास स्थलों के मानचित्र भी मिले, जिनमें उन स्थानों को विशेष रूप से चिन्हित किया गया। इन कागजों में इस बात का भी पूरा विवरण मौजूद था की इन क्षेत्रों तक कैसे पहुँचा जाए। इस के अलावा इस तरह के अन्य प्रमाण भी थे जिस से इस घिनौने षड़यंत्र का पता चलता था।"

दयाल इन सांप्रदायिक प्रमाणों को लेकर मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ्पन्त के पास पहुंचे "वहां पर एक बंद कमरे में जेटली ने अपनी खोज के बारे में बताया और स्टील के बक्से में मौजूद सभी प्रमाण भी दिखाए। आर एस एस के ठिकानों पर पड़ने वाले छापों के कारन एक बड़े षड़यंत्र का परदा फाश हो गया। यह पूरा षड़यंत्र इस संघटन के प्रमुख की निगरानी और उनके निर्देशन में तैयार किया गया था।

हम दोनो ने ही यानि जेटली और दयाल आरोपी श्री गोलवलकर को गिरफ्तार करने पर ज़ोर दिया जो की उस समय उस क्षेत्र में ही मौजूद थे। लेकिन पन्त जी ने इस पूरे मामले को मंत्रिमंडल के सामने रखने का निर्णय लिया। कांग्रेस के अन्दर आर एस एस से हमदर्दी रखने वाले लोग मौजूद थे और ख़ुद विधान सभा के अध्यक्ष आत्मा गोविन्द खेर्गी इन हमदर्दों में से एक थे और उनके पुत्रों के बारे में सब को पता था की वे आर एस एस के सदस्य हैं। लेकिन क़दम सिर्फ़ इतना उठाया गया की गोल्वालरअलकार को गिरफ्तार करने के बजाय उन्हें उन के खिलाफ पकड़े गए उन प्रमाणों के बारे में उन से स्पष्टीकरण माँगा गया। जैसा की आशा की जा सकती है की गोलवलकर वहां से भागने में सफल हो गए और कुरिअर उन तक पहुँच ही नहीं सका- "उन को ढूँढने का बेकार प्रयास जारी रहा। एक जगह से दूसरी जगह ढूँढने में हफ्तों गुज़र गए।"

इस पुस्तक के पृष्ठ के ९४ का अगला पेराग्राफ अपनी कहानी ख़ुद बयान करता है की "अंतत: ३० जनवरी १९४८ का वह दिन आगया जब शान्ति के सबसे बड़े संदेशवाहक एक गोली के शिकार होगये।"

यह मानचित्र केवल "ब्रिटिश सर्वेयर जनरल" के कार्यालय में ही तैयार हो सकते थे। ब्रिटिश प्रशासन को इस के महत्त्व और गंभीरता का अच्छी तरह पता रहा होगा जिसके कारन इस मानचित्रों की कड़ी सुरक्षा की गई और आर एस एस को यह मानचित्र मुहैय्या करना इस बात का प्रमाण है की उन दोनों के बीच गहरे सम्बन्ध थे...............जारी

अमरेश मिश्रा