Tuesday, March 23, 2010

भारत सरकार को नाराज़गी ज़ाहिर करनी चाहिए
अज़ीज़ बर्नी

मैंने किसी टिप्पणी के बिना प्रकाशित किया था कल बी॰रमन साहब के लेख को और आज श्रीमति बरखा दत्त के लेख पर भी किसी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है, जो 20 मार्च शनिवार के दिन अंगे्रज़ी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुआ। इन लेखों का एक-एक शब्द चीख़-चीख़ कर कहता है कि कहीं हमारे साथ न्याय नहीं हो रहा है। हमें तथ्यों तक पहुंचने से रोके जाने का प्रयास हो रहा है। कोई है जो नहीं चाहता कि हम भारत पर हुए आतंकवादी हमले की गहराई तक पहुंचें। क्या यह समझना कोई पहेली हल करने जैसा कठिन कार्य है, वह कौन है और क्यों ऐसा चाहता है? क्या यह इतना जटिल प्रश्न है जिसके जवाब के लिए हमें दिमाग़ पर बहुत अधिक ज़ोर डालने की आवश्यकता है? नहीं, उत्तर बहुत सरल है। फिर भी हम इतनी सहजता से इस उत्तर तक पहुंचना नहीं चाहते। क्यों, क्या मजबूरी है हमारी? क्यों हमारे क़लम उस धारा प्रवाह रूप से नहीं चलते जिस धारा प्रवाह ढंग से चला करते हैं? क्यों हमारी ज़बान पर यह नाम आते-आते रुक जाता है? हम सत्य को डंके की चोट पर कहने में झिझकते क्यांे हैं?
बहरहाल देर आयद दुरुस्त आयद की तरह फिज़ा कुछ बदल रही है। हम समझते हैं कि हमारे देश के लिए यह एक सुखद संदेश है और हम संतुष्ट इसलिए भी हैं कि जो कुछ हमने घटना के तुरंत बाद से लिखना आरंभ किया, आज उसे ऐसे सुप्रसिद्ध लेखकों के लेखों से काफी बल मिल रहा है। हम फिर बहुत ज़ोरदार ढंग से उससे आगे की कहानी तक पहुंचने का इरादा रखते हैं। सारी रूप रेखा दिमाग़ में है। आज और इसी समय लिखा जा सकता है। परंतु अभी थोड़ा इंतिज़ार। इस कड़ी में कुछ और लोगों को शामिल हो लेने दीजिए, यह आवाज़ सभी दिशाओं से उठ लेने दीजिए। कहीं ऐसा न लगे कि जो कुछ हम सामने रख रहे हैं वह केवल हम बोल रहे हैं, बल्कि हर लेख से लगे कि हक़ बोल रहा है। और फिर जब यह आवाज़ पहुंचे, हमारे सत्ता के गलियारों तक और उस केंद्रीय किरदार तक जो सब कुछ आईने की तरह साफ होने पर भी आईने को धुंधला करने के प्रयासों में लगे हैं, तो फिर वह मान लेगा कि यह खोज बेनतीजा नहीं है। बेशक! सच को हज़ार पर्दों से ढक दिया जाए, परंतु सच को उजागर होने से कोई रोक नहीं सकता।
एक परछाईं का पीछा
नई दिल्ली ने आमिर अजमल क़साब से पूछताछ के लिए एफबीआई को अनुमति दे दी थी लेकिन अमेरिका डेविड हेडली के रास्ते में रुकावट खड़ी कर रहा है। अब यह बात स्पष्ट हो गई है कि पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी, जिसने भारत के विरुद्ध युद्ध का वातावरण तैयार किया और मुम्बई को तबाह करने का प्रयास किया, अंततः उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। हमसे कहा गया है कि सब कुछ नष्ट नहीं हुआ है। लेकिन अमेरिका के साथ डेविड के मामले पर हो रही पहल से ऐसा लग रहा है कि भारत उस व्यक्ति को प्राप्त करने में असफल साबित होगा, जिसने भारत में सीमा पार से आकर उथल पुथल का माहौल पैदा किया, बम धमाके कराए, कई स्थानों का निरीक्षण किया और कई लोगों को अपने मिशन में शामिल किया। लेकिन ऊपरी तौर पर हम फिर भी ख़ुश हैं कि भारत की जांच ऐजंसियां किसी न किसी रूप में उस व्यक्ति से पूछताछ करने में सफल हो सकती हैं तो क्या वह सरकार जो हेडली के प्रत्यार्पण की मांग कर रही थी अब हेडली की कम सज़ा पर चुप्पी साध लेने में ही अपनी भलाई समझती है।
हमें इस अपमान को नहीं भूलना चाहिए जब हमारे देश की जांच ऐजंसी पहली बार डेविड हेडली से पूछताछ करने अमेरिका गई थी तो उसे पूछताछ किए बिना ही वापस लौटा दिया गया था जबकि आमिर अजमल क़साब से पूछताछ भारत ने एफबीआई को पूरी छूट दी थी और एफबीआई ने 9 घंटे से अधिक क़साब से पूछताछ भी की थी। 26/11 के हमले में 6 अमेरिकी नागरिकों की मृत्यु से एफबीआई ने अपने आप यह समझ लिया था कि उसे पूछताछ करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। जबकि इसी तरह के हमले में 100 से अधिक भारतीय नागरिक की जान जाती है जिसके कारण भारत को सदैव के लिए एक गहरा आघात लगा, इस मामले में हमें पूछताछ की अनुमति नहीं दी जाती है, बल्कि यह कहा जाता है कि सब भूल जाइए और इसी में प्रसन्न रहिए कि वीडियो कान्फ्ऱेंसिंग द्वारा हेडली से पूछताछ का अवसर प्राप्त हो सकता है।
इस विचित्र दोमूंहे पन के दो कारण हो सकते हैं, धोखा या गोपनीयता। पिछले कुछ महीनों से हेडली के रहस्यमय अतीत के बारे में प्रश्न उठाए जा रहे हैं? एक तो उसकी विभिन्न प्रकार की आंखें अर्थात् एक भूरी और एक नीली ैबीप्रव च्ीतमदपं में डूबे हुए जीवन का संकेत हो सकती हैं, दूसरे हमें ज्ञात है कि उसकी दो पत्नियां हैं और एक मां है। मां एक ठंत चलाती है और बाप जो पाकिस्तानी राजनयिक है, जो उसे कट्टरवाद की ओर ले गया। हेडली को पूरब और पश्चिम दोनों की जानकारी होने के कारण वह अमेरिकी ड्रग इन्फोर्समंेट एडमिनिस्ट्रेशन के लिए मुख़बिरी का काम करने लगा। अब यह रहस्योदघाटन हुआ है कि 1998 के ड्रग स्मगलिंग के एक मामले में पकड़े जाने पर वह अपनी 10 वर्ष की सज़ा को 2 साल में परिवर्तित करने पर मुख़बिरी करने के लिए राज़ी हुआ था। अब कहानी यहां पर एक नया मोड़ लेती है, लेकिन ऐसा तो नहीं कि हेडली पाकिस्तान में मादक पदार्थों के रास्ते अमेरिकी मुख़बिर के रूप में लशकर-ए-तैयबा में शामिल हो गया हो या किसी कारणवश अमेरिका को धोखा देकर उसने उसके लिए काम करना तो बंद नहीं कर दिया था? अगर ऐसा है तो क्या यह 26/11 से पहले हुआ? एक आदमी किस तरह से अमेरिका में और अमेरिका से बाहर यहां तक की दुनिया भर में इतनी सहजता से आता जाता रहा? यहां एक विशेष बात यह है कि हेडली अगर 26/11 से एक महीना पूर्व एफबीआई की जांच के घेरे में था तो यह सूचना भारत को क्यों नहीं दी गई। यहां तक कि वह मुम्बई हमले के पांच महीने बाद अप्रैल 2009 में भारत आने में कैसे सफल रहा। हालांकि यह सभी प्रश्न जासूसी नाविल पढ़ने वालों के काल्पनिक प्रश्न कह कर रद्द कर दिए गए हैं, लेकिन यदि हम सभी ग़लत थे तो क्या कोई हमें यह बताएगा कि उसकी वैकल्पिक कहानी क्या हो सकती है?
अमेरिका ने भारतीय ऐजंसी को 26/11 की महत्वपूर्ण भूमिका से पूछताछ करने से यूंही मना नहीं किया, बल्कि उसने हेडली की जान भी बचाई है।
अब यह दूसरा अवसर है जब हेडली ने हिरासत के दौरान कोई समझौता किया है। क्या यह किसी को संदेह में डालने के लिए पर्याप्त नहीं है? मुम्बई के फिल्मी हीरो और ‘‘जिम’’ के मालिक राहुल भट्ट जिनकी कई महीनों तक हेडली से दोस्ती रही, उनका कहना है कि वह हेडली को सदैव ‘‘ऐजेंट हेडली’’ कह कर बुलाते थे क्योंकि ‘‘वह रहस्यमय ढंग से आता था और बातचीत भी गुप्त रूप से करता था। उसे अपने टारगेट का ज्ञान था।’’ सरकार इन बातों को रद्द कर सकती है लेकिन सच्चाई यह है कि भट्ट को हेडली के जेल में बंद होने की सूचना अमेरिकी अधिकारियों की ओर से भारत को बताने से पहले ही से थी। गृहमंत्रालय के अनुसार हेडली के बारे में अमेरिका का इनकार हेडली के ऐजंेट के कारणवश नहीं है। लेकिन भारत के प्रमुख वान्टेड आतंकवादी के साथ अमेरिकी रवैया के कारण इस जिज्ञासा भरे मामले की व्याख्या कैसे की जा सकती है?
अमेरिकी ड्रग इन्फोर्समंेट एडमिनिस्ट्रेशन के मुख़बिर के रूप में अगर हेडली का अतीत न देखा जाए तो भी इस मामले में अमेरिका की ओर से हैंडिल किया जाना विचित्र सा लगता है, डेनमार्क के पत्रकारों के हवाले से यह ख़बर आई है कि डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के विरुद्ध प्रतिशोध की कार्रवाई के बारे में हेडली से डेनमार्क के जांचकर्ताओं ने पहले ही पूछताछ कर ली है, तो ऐसी परिस्थितियों में भारत को इतने लम्बे समय से क्यों पूछताछ की अनुमति नहीं दी जा रही है? इस मामले को कोई अमेरिका विरोधी मानसिकता के कारण नहीं उठा रहा है, बल्कि सच्चाई यह है कि अब यह जानने की उत्सुकता बढ़ रही है कि अमेरिका आतंकवाद विरोधी युद्ध में भारत का गंभीर सहयोगी है कि नहीं। या हमें यह जंग अकेले ही लड़नी होगी। ओबामा प्रशासन जिस तरह अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से संबंधित नीति बना रहा है उससे पहले ही यह लग रहा था कि उसे भारत की चिंता नहीं है।
हेडली पर जिज्ञासा जिस तरह क़ायम है उससे कभी भी सब्र का प्याला भर सकता है। ऐसे में आशा की जा सकती है कि एक विशाल परिपेक्ष में भारतीय सरकार को अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। बहरहाल हेडली से पूछताछ के लिए उसे भारत को सौंपा जाएगा या नहीं, इस पर अभी अनिश्चत्ता की स्थिति क़ायम है। देखना यह भी होगा कि क्या यह सचमुच की जांच होगी या फिर यह अमेरिका की इच्छा के अनुसार होगी? अभी तक तो सरकार किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है जिसके कारण कई और परेशान करने वाले प्रश्न पैदा होते हैं। अगर एक 40 वर्षीय मास्टर मांइड को जीवन यापन करने का अधिकार मिल जाता है तो 21 वर्षीय क़साब जो हेडली की योजना का मात्र एक पैदल सिपाही है, उसे संभावित मृत्यु का सामना करना चाहिए?
बरखा दत्त (ग्रुप एडीटर, एनडीटीवी)

2 comments:

अजय कुमार झा said...

भारत सरकार इतना कर पाती तो बात ही क्या थी ..
अजय कुमार झा

Akhtar Khan Akela said...

jnaab aziz saheb aadaab arz he mashaallah aapki qlam ke hm to fen hen lekin ykjaa aapke khyaal pdhen ko nhin mil paate hen isliyen hm preshaan hen, akhta khan akela 21/104 shripura kota rajasthan mbl 09829086339