पिछले का शेष....
यहां मैं यह भी कहना चाहूंगा कि कोई क़ानून बनाकर, ज़ोर जबरदस्ती करके किसी को अपनी मां से प्यार करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। किसी के प्रति प्यार पैदा करने के लिए क़ानून में कोई तरीक़ा नहीं है, लेकिन किसी व्यक्ति को यह एहसास अवश्य कराया जा सकता है कि यदि उसने अपनी मां से मोहब्बत नहीं की, उसकी सेवा नहीं की तो मां के क़दमों में जो जन्नत है, वह उसे नहीं मिलेगी। जहां हम पैदा हुए हैं, उसे हम मादरे वतन(मातृभूमि)कहते हैं, इस मादरे वतन की अपनी मां के साथ तुलना करूं तो यह कोई मज़हब विरोधी काम नहीं है, जिसका दोहन हमने सारी ज़िदगी किया, जिसका अनाज और पानी अंतिम सांस तक पिया, उसका कोई अधिकार हमारे ऊपर है या नहीं?
हदीस में भी एक स्थान पर कहा गया है कि पूरी धरती मेरे लिए मस्जिद बना दी गई है, इसीलिए यह दिखाई देता है कि केवल मस्जिद में नमाज़ पढ़ना ज़रूरी नहीं है बल्कि एक मुसलमान यात्रा के समय रेलगाड़ी में, प्लेटफार्म या पैदल चलते समय कहीं भी, किसी पेड़ के नीचे गमछा (अंग वस्त्र) बिछाकर नमाज़ पढ़ लेता है तो क्या कोई कहेगा कि मस्जिद का सम्मान नहीं होना चाहिए? फिर उस मस्जिद (धरती) का कितना सम्मान होना चाहिए जहां ऊपर वाले ने हमें पैदा किया है? इसका फल-फूल, अन्न-पानी तो हमने खाया ही है, मरने पर हमें इसी धरती का हिस्सा बन जाना है। जिस मिट्टी में मेरे बुज़ुर्गो की हड्डियां मिली हुई हैं, क्या वो मेरे लिए क़ाबिले ताज़ीम नहीं होनी चाहिए?
उस धरती की ताज़ीम करना मेरा फर्ज़ है, जिसे हदीस में मस्जिद कहा गया है। यानी धरती की ताज़ीम करनी चाहिए। पर मेरी अपनी धरती, जहां मैंने जन्म लिया, मैं इससे प्यार क्यों न करूं?
जब मैंने वन्दे मातरम् का अनुवाद करना शुरू किया तो मुझे लगा कि लोग इस बेमिसाल गीत का अज्ञानता के कारण विरोध करते हैं। मैंने भी वन्दे मातरम् की गहराई को तब समझा जब मैंने इसका अनुवाद करना प्रारंभ किया। मैंने पूरे वन्दे मातरम् का अनुवाद नहीं किया है, जिस पर वर्तमान में जिस वन्दे मातरम् की चर्चा हो रही है, उस वन्दे मातरम् का अनुवाद किया है जो हमारी संविधान सभा द्वारा राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकृत किया गया है, वह वही मूल गीत है जो 1875 में बंकिम चन्द्र जी ने लिखा है। बाद में 1881 में ‘आनंद मठ’ में इसे शामिल करते समय इसका विस्तार किया गया था। इसलिए मैंने उसी वन्दे मातरम् का अनुवाद किया जो राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकृत किया गया था।
पर सम्पूर्ण वन्दे मातरम्, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसमें मूर्ति पूजा का भाव आता है, वास्तव में ‘आनंद मठ’ उपन्यास की आवश्यकता के कारण इसमें वह हिस्सा जोड़ा गया और जहां तक बंकिम बाबू की बात है, तो वे जिस समुदाय से संबंध रखते थे वह मूर्ति पूजा का विरोधी था। बंकिम चंद्र ने स्वयं मूर्ति पूजा के विरूद्ध एक लेख लिखा है। ‘काल टू ट्रूथ’ नामक अपने लेख में उन्होंने लिखा था, ‘मूर्ति पूजा विज्ञान विरोधी है। जहां कहीं मूर्ति पूजा है वहां ज्ञान नहीं रहता।
वे आर्य ऋर्षि, जिन्होंने भारत में ज्ञान का वर्धन किया, वे मूर्तिपूजक नहीं थे।’ बंकिम चन्द्र ने वन्दे मातरम् के अगले खंड में ऐसी बातें क्यों लिखीं, जिनसे मूर्ति पूजा का आभास होता है, इस पर गहराई से विचार करना चाहिए। मेरी दृष्टि में इसका कारण यह था कि केवल भारत ही नहीं, सभी पूर्वी देशों में यह पुरानी परम्परा रही है कि जब भी किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर जनचेतना जगानी होती थी तो उसे एक धार्मिक आधार प्रदान कर दिया जाता था। उस समय बंगाल में मुस्लिम नवाब का शासन केवल नाममात्र को था और सत्ता के सूत्र वास्तव में अंग्रेज़ों के पास थे। ऐसे में इन दोनों में विरुद्ध राष्ट्रवादी लोगों की चेतना जागृत करने के लिए बंकिम चंद्र ने वन्दे मातरम् में धार्मिक प्रतिमानों का सहारा लिया।
जो लोग यह कहते हैं कि बंकिम चन्द्र के उपन्यास ‘आनंद मठ’ से भी उनके मुस्लिम विरोधी होने का आभास मिलता है, उन्हें इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भी समझना चाहिए कि उस समय देश को गुलाम बनाने वाले अंग्रेज़ बंगाल के नवाब के एजेन्ट के रूप में कार्य कर रहे थे। ‘आनंद मठ’ में बंकिम चन्द्र का आक्रोश उस नवाब के विरुद्ध है, आम मुसलमान के विरुद्ध नहीं।
हालांकि मैं नहीं मानता, पर पाकिस्तान के अधिकांश और भारत में बहुत से लोगों का ऐसा मानना है कि अल्लामा इक़बाल पाकिस्तान के सूत्रधार थे। लेकिन क्या इस आधार पर भारत में कोई कहेगा कि ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ गाना बंद कर दिया जाए? बंकिम चन्द्र के साहित्य को भी इसी दृष्टि से देखें। प्रख्यात आलोचक रियाजुल करीम ने इसलिए वन्दे मातरम् पर साहित्यिक चर्चा करते हुए मन को छू जाने वाला एक वाक्य लिखा है। उन्होंने कहा कि इस गीत ने गूंगों को जबान दे दी है और जो कमज़ोर दिल के थे, उन्हें साहस दे दिया। इस दृष्टि से बंकिम चन्द्र का योगदान अतुलनीय है।दरअसल आज़ादी के आंदोलन के दौरान वन्दे मातरम् का विरोध इसलिए नहीं किया गया कि इसमें कहीं मज़हब विरोधी बातें थी, बल्कि इसलिए किया गया ताकि मुसलमान राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा न बनें।
इसीलिए मोहम्मद अली जिन्ना ने 1936 में कांग्रेस के साथ बातचीत में जो तीन शर्ते रखीं, उनमें पहली थी कि कांग्रेस मुस्लिम सम्पर्क का काम बंद करे। वन्दे मातरम् न गाने की शर्त दूसरी थी। मुस्लिम सम्पर्क बंद करने की मांग इसलिए की गई ताकि कांग्रेस यह न कह सके कि वह राष्ट्रीय पार्टी है। सभी वर्गो का प्रतिनिधित्व करती है। यदि कांग्रेस सिर्फ हिन्दू पार्टी बनकर रह जाती तभी तो मुस्लिम लीग को मुसलमानों की पार्टी माना जाता। इसलिए मुस्लिमों में कांग्रेस के सम्पर्क कार्यक्रम का विरोध किया गया। इस राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए वन्दे मातरम् का विरोध किया गया।
जिन्ना का उद्देश्य स्पष्ट था कि भले ही आज़ादी अभी मिले या देर से मिले, पर पहले हमारी मांगों का फैसला हो जाए। जब आजादी के बारे में ही जिन्ना का दृष्टिकोण बदल चुका था, तब वन्दे मातरम् के बारे में उनकी सोच को समझा जा सकता है।जिन लोगों ने यह कहा है कि न केवल हमारा मजहब अलग हैं, बल्कि हमारी संस्कृति और परम्पराएं अलग हैं। इसी द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के आधार पर अलग देश बनाया, वे आज बहुत पीछे हैं, उनके टुकड़े भी हो गए। पर इस सिद्धांत का विरोध करने वाले भारत में सभी मत, पंथों, साम्प्रदायों के लोग शांतिपूर्वक रह रहे हैं और यह देश आगे बढ़ रहा है। पर देश के विभाजन का ज़ख़्म बहुत गहरा है।
यदि देश का विभाजन न हुआ तो हम 20 वर्ष बाद भारत के महाशक्ति बनने का जो सपना देख रहे हैं, वह अब तक पूरा हो गया होता। लेकिन इतनी बड़ी हानि उठाने के बाद भी कुछ लोग इस देश में ऐसे हैं, जो पूरे इतिहास की अनदेखी कर यह कह रहे हैं कि हमारी पहचान अलग है। यद्यपि अब उनमें इतना साहस तो नहीं है कि वे यह कहें कि हम मज़हब के आधार पर अलग राष्ट्र हैं। जिन्ना की अलगाववादी विरासत को संभाले हुए कुछ लोग उसी सोच को खाद-पानी देने के लिए आज भी वन्दे मातरम् का विरोध कर रहे हैं। इसीलिए मैंने वन्दे मातरम् का अनुवाद किया ताकि इसके बारे में कोई भ्रम न फैला सके। साथ ही मुझे यह भी कहना है कि यदि कोई न गाना चाहे तो न गाए, यह उसका व्यक्तिगत मामला है।
क़ानून बनाकर उसे बाध्य नहीं किया जा सकता, लेकिन वन्दे मातरम् का विरोध करने का कोई कारण नहीं है। इसका विरोध करने वालों को समझना चाहिए कि भले ही इस राष्ट्रगीत के प्रति उसकी भावना सही न हो, पर इतना तो ध्यान रखें कि इस देश के करोड़ों-करोड़ लोगों के लिए यह गीत राष्ट्रीयता का प्रतीक है। फांसी के फंदे पर झूलने वाले उन लोगों को तो याद कर लीजिए, जिनके लबों पर अंतिम समय में यह गीत था।
अगर वन्दे मातरम् गाते हुए लोग सड़कों पर न निकले होतो, फांसी न चढ़े होते तो आज यह आज़ादी न मिली होती। आज भी इस देश में वे जगहें होतीं, जहां लिखा होता कि भारतीय और कुत्ते यहां नहीं आ सकते। वन्दे मातरम् का विरोध करने वाले कम से कम इस बात का श्रेय तो उन क्रांतिवीरों को दे ही सकते हैं जिनके कारण उन्हें और हमें कुत्ते की श्रेणी से निकलकर एक इंसान के रूप में एक आज़ाद देश में स्वाभिमान के साथ रहने का मौक़ा मिला।
उम्मीद की झलक
उरुजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्तां होगा
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशयां होगा
चखायेंगे मज़ा बरबादिये गुलशन का गुलचीं को
बहार आजाएगी उस दिन जब अपना बाग़बां होगा
वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है
सुना है आज मक़तल में हमारा इमतिहां होगा
जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज
न जाने बाद मुर्दन मैं कहां और तू कहां होगा
यह आये दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंजरे क़ातिल
बता कब फैसला उनके हमारे दर्मियां होगा
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा
कभी वह दिन भी आएगा कि जब स्वराज देखेंगे
जब अपनी ही ज़मीं होगी जब अपना आसमां होगा
उल्लास वर्मा
Tuesday, November 24, 2009
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