Tuesday, December 14, 2010

हमारे पास हैं सबूत हेमंत करकरे को मिलने वाली धमकियों के
अज़ीज़ बर्नी

एक बयान और इतना तूफान, खुदा ख़ैर करे। मेरी पुस्तक के विमोचन के अवसर पर जनाब दिग्विजय सिंह ने शहीद हेमन्त करकरे से अपनी गुफ्तगू की चर्चा क्या की कि एक हंगामा खड़ा हो गया। मैं जानता था, पहली बार जब मैंने दिग्विजय सिंह जी को नागपुर में आयोजित ‘‘विदर्भ मुस्लिम इंटेलेक्चुअल फोरम’’ के अधिवेशन में अपने भाषण के दौरान हेमन्त करकरे की शहादत की संध्या को हुई अपनी गुफ्तगू की चर्चा की तो मुझे उसी समय अंदाज़ा हो गया था कि अगर उनकी यह बात संघी कानों तक पहुंच गई तो निश्चय ही वह सामप्रदायिक शक्तियां तूफान खड़ा कर देंगी जिनके विरूद्ध मालेगांव जांच की रिपोर्ट की जा रही थी। फिर जब मेरी पुस्तक के विमोचन के समय उन्होंने अपने भाषण में इसी घटना को दोहराया तो मुझे लगा कि इसे यूंही नज़रअंदाज़ नहीं कर दिया जाना चाहिए बल्कि जनता का आतंकवादी हमले से मात्र तीन घंटे पूर्व हुई गुफ्तगू की ओर ध्यान दिलाया जाना चाहिए। नागपुर की सभा में जब दिग्विजय सिंह ने भाषण किया तो उस समय तक मैं सभा को संबोधित कर चुका था, लेकिन दिल्ली में 6 दिसम्बर 2010 को ‘इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर’ में विमोचन समारोह में चूंकि मुझे उनके बाद बोलना था, इसलिए मेरे पास अवसर था कि उपस्थित जनता तथा मीडिया का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जाये। मैं उस टेलिफोनिक गुफ्तगू की गंभीरता को समझता था परंतु यह अंदाज़ा नहीं था कि भारतीय जनता पार्टी और मीडिया विशेषरूप से अंग्रेजी मीडिया तथा इलेक्ट्राॅनिक चैनल इसे इस प्रकार अपने ध्यान का केंद्र बनायेंगे, वह भी तब जब संसद संयुक्त संसदीय समिति के गठन की मांग को लेकर हंगामे की भंेट हो रही हो, विकीलिक्स दिन प्रतिदिन नये नये खुलासे करके पुरी दुनिया के मीडिया को अपनी ओर आकर्षित कर रहा हो और इस बीच भारत के प्रधानमंत्री डाॅ0 मनमोहन सिंह ने बेल्जियम तथा जर्मनी की महत्वपूर्ण यात्रा भी की हो, लेकिन जितने समाचार वह भी प्रथम पृष्ठ पर और सम्पादकीय इस विषय को लेकर लिखे गए उतना महत्व किसी भी अन्य समाचार को नहीं दिया गया। चार दिनों तक मैं देश के बाहर रहा और वापसी के बाद दो दिन लगे मुझे उन समाचार पत्रों का अध्ययन करने में जो इन समाचारों से भरे पड़े थे। मैं स्वंय मीडिया का हिस्सा हूं, लेकिन यह समझने से विवश हूं कि, ऐसी क्या अनूठी बात कही दिग्विजय सिंह जी ने, जिसका इससे पहले किसी को अंदाज़ा न था। कम से कम मीडिया वालों को तो जानकारी थी कि देश पर शहीद हेमन्त करकरे को मालेगांव जांच के बाद लगातार धमकियां मिल रही थीं और हमारा राष्ट्रीय मीडिया ऐसे समाचारों को लगातार प्रकाशित भी कर रहा था, जो कुछ दुर्घटना से 3 घंटा पूर्व शहीद हेमन्त करकरे ने टेलिफोन पर दिग्विजय सिंह जी से कहा, एक दिन पूर्व ठीक वही बात अपने एक रिटायर्ड वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जनाब जूलियो रेबेरो से अपनी मुलाकात के दौरान कही थी। यह मुलाकात स्वंय हेमन्त करकरे ने जूलियो रेबेरो से उनके पास जाकर कही थी। मैं अपने लेख के साथ उस मुलाकात के दौरान हुई बातचीत को ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहा हूं। यह समाचार शीर्षक के साथ........अंग्रेजी दैनिक ‘टाईम्स आॅफ इंडिया’ में प्रकाशित किया गया था तथा अन्य कई समाचारपत्रों ने भी इस समाचार को प्रकाशित किया था। इसलिए जो कुछ 6 दिसम्बर 2010 को मेरी पुस्तक ‘‘आरएसएस की साजिश-26/11?’’ के विमोचन समारोह दौरान अपने भाषण में जनाब दिग्विजय सिंह ने कहा, उसमें और आदरणीय जूलियो रेबेरो से स्वंय जाकर मुलाकात के दौरान कही गई बातों में कितना अंतर है, इसे समझा जा सकता है। बहरहाल अभी तो केवल यह दो लोगों की हुई बातचीत का उल्लेख है, अतिसंभव है कि इन दोनों के अलावा भी अपने कुछ शुभचिंतकों तथा जिम्मेदारों से शहीद हेमन्त करकरे ने अपने हालात को बयान किया हो लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखकर शायद ही कोई अपने साथ की गई गुफ्तगू को सामने लाने का साहस कर सके। हां परंतु हमारे पास अभी बहुत कुछ है कहने के लिए अपने इस क्रमवार लेख की अगली किस्तों में, वह भी सबूतों और हवालों के साथ शायद कल फिर........।
यहां मैं एक और बात पर ध्यान दिलाना आवश्यक समझता हूं और वह यह कि मेरी जानकारी के अनुसार जनाब रेबेरो का न तो राजनीति से कोई संबंध है और न ही वह स्वयं को मुसलमानों का प्रतिनिधि सिद्ध करने का प्रयास करते रहे हैं और उनसे की जाने वाली इस गुफ्तगू को निजी भी नहीं कहा जा सकता बल्कि मुझे क्षमा करें मेरे विचार में तो जनाब करकरे ने अपने एक सेवानिवृत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पास जाकर उन लोगों के विरूद्ध एफआईआर दर्ज कराई थी जिनसे वह परेशान थे या भयभीत थे। भले ही उसकी स्थिति बकायदा एफआईआर की नहीं थी। काश कि उसी समय इस चर्चा को एक एफआईआर की तरह समझ लिया गया होता। इस विषय पर गुफ्तगू जारी रहेगी। आइए अब चर्चा करते हैं पाकिस्तान की।
पाकिस्तान एक ऐसा देश है, जिसमें सबसे अधिक आतंकवादियों को शरण प्राप्त है, जो आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा है। पाकिसतान एक ऐसा देश है, जो स्वंय दुनिया में सबसे अधिक आतंकवाद का शिकार है। भारत में आतंकी कार्रवाई में अधिकतर पाकिस्तान लिप्त रहा है। 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई मंे हुए आतंकी हमले से पाकिस्तान का गहरा संबंध है, यह बात भी जग जाहिर है। इस बीच अमेरिका व शरम-अल-शेख में जहां भारतीय प्रधानमंत्री डाॅक्टर मनमोहन सिंह की पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गीलानी से मुलाकात हुई, अन्य विभिन्न अवसरों पर अन्तर्राष्ट्रीय मंच से यह बात सामने लाई जा चुकी है। स्वंय पाकिस्तान ने भी यह स्वीकार कर लिया है कि आतंकवादियों का संबंध उनके देश से था हम उनके विरूद्ध कार्रवाई करने के लिए लगातार दबाव डाल रहे हैं। आतंकवाद के विरूद्ध जंग लड़ने वाले कई देश इस मामले में हमारे साथ हैं। पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए हमारे पास सबूतों की कमी है और न कारणों की, हम जब चाहें ऐसा कर सकते हैं, अगर यह आवश्यक लगता है तो आज भी लेकिन हमें इस हकीकत पर भी विचार करना होगा कि क्या हमारे लिए केवल पाकिस्तान को सबक सिखाना ही काफी होगा या क्या हमें अपने देश को आतंकवाद से पूरी तरह पाक करने के लिए इससे हटकर सोचने की कतई जरूरत नहीं है। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, कोई राष्ट्रीयता नहीं होती, वह किसी भी धर्म और किसी भी देश के हो सकते हैं। हमने देखा कि हमारे देश में होने वाली आतंकवादी कार्रवाईयों में पाकिस्तान के अलावा अन्य आतंकी भी लिप्त हैं। उनमें भारत से संबंध रखनेवाले भी हैं, जांच ने यह बात सिद्ध कर दी है। फिर अगर कहीं कोई बात, कोई घटना, कहीं कोई प्रमाण ऐसा मिलता है जो हमें ऐसे लोगों तक पहुंचने में, ऐसे लोगों को पहचानने में मदद कर सकता है, जो आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं, जाने-अनजाने आतंकवादियों को संरक्षण देते हैं तो क्या हमें चुप रह जाना चाहिए या उन्हें बचाने के लिए मोर्चाबंदी पर उतर आना चाहिए, उन्हें बचाने के लिए भावनात्मक वातावरण बनाना चाहिए इस अत्यन्त महत्वपूर्ण मामले को राजनीति की भेंट चढ़ा देना चाहिए, इसे मुस्लिम तुष्टिकरण की संज्ञा देकर एक विशेष समुदाय को अपमानित करना चाहिए। क्या हमारी जिम्मेदारी इतनी ही होनी चाहिए कि आतंकी कार्रवाई में चूंकि पाकिस्तान लिप्त है और यह सिद्ध हो गया है कि यह पाकिस्तान का कारनामा है। हम क्यों नहीं सोचते कि अगर 100 आतंकवादियों में से 99 पाकिस्तान के हैं और उनमें एक आतंकी भारत का है तो हमें उस एक आतंकी पर भी नज़र डालनी होगी, इसलिए कि पहले हमें अपना घर साफ करना है
..................................................(जारी)

Karkare was shaken by L.K.Advani's Allegations: Julio Ribeiro

Hemant karkare came to meet me on Tuesday. He was shaken by L K Advani's allegations that the antiterrorist squad, which he headed, had acted "in a politically motivated and unprofessional manner'' in the Malegaon blasts investigation. He explained how the ATS had stumbled on the evidence against Pragya Thakur and how the investigations developed. He was as surprised as me that a seasoned politician like Advani should have joined Hindutva's chorus against him.
Hemant Karkare was a true Hindu. He believed in his dharma. He had expected his co-religionists to believe likewise. He was astonished that the staunch proponents of Hindutva did not subscribe to the teachings of the scriptures!
Hemant Karkare was one of Maharashtra's best police officers. I dare say he was one of India's best. His integrity was unimpeachable. Mumbai policemen who have privately divided the senior police leadership into two distinct compartments-corrupt and noncorrupt-had placed Karkare squarely among the latter. His application and abilities were outstanding. Above all, he was people-oriented.
When he was SP, Gadchiroli, the Naxalites had targeted him for elimination. The Indian Muhajideen had threatened to eliminate him following his inquiries into the Delhi blasts. Muslim clerics gheraoed him in his office after he ordered combing operations in Mograpada in Andheri. And finally there was the saffron brigade.
The fidayeen, who got him, just did not know who they had killed. Hemant Karkare had rushed in to save hostages and died doing his duty.
The Hindutva forces had praised the ATS when it brought jihadi terrorists to book, conveniently targeting it only after the Malegaon investigations. L K Advani's blatant attempts to politicise the investigations for being "politically motivated and unprofessional manner'' are laughable and need to be unequivocally condemned because anyone who knew Karkare knew he was the last person to succumb to political machinations. One can understand the BJP's anxiety to obfuscate facts. The revelations during the investigations have hurt them.
The campaign against the ATS and the attempt to politicise the Malegaon investigations may help the BJP to win some votes in the coming elections but they are playing with fire by assaulting the judicial process system. What are they going to do about the mass of evidence so assiduously collected by the ATS? And will they encourage fringe elements in the Hindu community to resort to terrorism, should they come to power? They should think seriously about the consequences of their ill-conceived adventure.
In the meantime, a truly distinguished officer, Hemant Karkare, is not alive to suffer their barbs. He has laid down his life for his principles.

करकरे आडवाणी द्वारा लगाए गए आरोप से दुखी थेः जुलियू रिबैरो

हेमंत करकरे पिछले मंगलवार को मुझसे मिलने के लिए आए थे। एल.के.आडवाणी के इस आरोप ने उन्हें बहुत दुख पहंुंचाया था कि उनके नेतृत्व में ए.टी.एस, मालेगांव बम धमाकों के केस में राजनीतिक प्रभाव और अव्यवहारिक ढंग में कार्य कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि ए.टी.एस ने साध्वी प्रज्ञा सिंह के विरूद्ध ठोस और पक्के सबूत एकत्रित किऐ हैं और जांच सफल होने वाली है। आडवाणी जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता के हिन्दुत्व के झंडा बरदार बनने वालों के साथ मिल कर आरोप लगाने ने उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया था।
हेमंत करकरे एक सच्चे हिन्दू थे। वह अपने धर्म (कर्तव्य) पर विश्वास रखते थे और उनका विचार था कि उनके सहधर्मी भी इसी प्रकार अमल करें। उन्हें इस रहस्योद्घाटन ने चकित कर दिया था कि हिन्दुत्व का प्रचार करने वाले हिन्दू धर्म के आदेशों पर अमल नहीं कर रहे हैं। ए.टी.एस चीफ महाराष्ट्र एक बेहतरीन पुलिस अधिकारी थे और अगर मैं यह कहूँ तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उनकी गिनती भारत के बेहतरीन और सक्षम अधिकारियों में थी। उनकी ईमानदारी किसी संदेह से ऊपर है। मुम्बई पुलिस का वरिष्ठ नेतृत्व निजी रूप से भ्रष्ट और ईमानदार अधिकारियों में विभाजित है। हेमंत करकरे को ईमानदार अधिकारी के रूप में गिना जाता था। उनकी योग्यता और कार्यक्षमता अत्याधिक उच्चकोटी की थी। उन्हें जनता में लोकप्रियता प्राप्त रही। गुडचरोली में एस.पी के रूप में नकसलवादियों ने उन्हें जान से मारने का प्रयास किया था। दिल्ली बम धमाके के बाद इण्डियन मुजाहेदीन ने भी उन्हें मारने की धमकी दी। अंधेरी मोगरापाड़ा में कामबिंग आपरेशन के समय मुसलमानों ने उनके कार्यालय का घेराव किया था और अंततः वह भगवा ब्रिगेड के मिथ्या आरोप का शिकार बन गए।
हिन्दुत्व शक्तियों ने जिहादियों के विरूद्ध कार्यवाही पर ए.टी.एस की पीठ थपथपाई परन्तु जब मालेगांव धमाके के बाद उसने भगवा आतंकवाद की दिशा में रूख़ बदल लिया तो जांच पर प्रश्न उठाने शुरू कर दिये। इसमें उच्च भाजपा नेतृत्व भी पीछे नहीं रहा। एल.के.आडवाणी ने जांच को राजनीतिक प्रभाव में और अव्यवहारिक क़रार दे दिया। करकरे इस बात से अच्छी तरह परिचित थे कि इस मार्ग पर चलते हुए वह राजनीति का शिकार बन सकते हैं परन्तु उन्होंने सच्चाई का दामन नहीं छोड़ा था। प्रत्येक व्यक्ति भाजपा की सच्चाई को झुठलाने और हठधर्मी की नीति से परिचित है लेकिन जांच के दौरान होने वाले रहस्योद्घाटन उनके होश उड़ा देंगे। ए.टी.एस के विरूद्ध मुहिम और मालेगांव धमाके की जांच को राजनीतिक रंग देने के प्रयास से भाजपा को अगले चुनाव में कुछ वोट तो प्राप्त हो सकते हैं परन्तु इस प्रकार वह न्यायिक व्यवस्था के कार्य को हानि पहुंचा कर आग से खेल रहे हैं। यदि भाजपा सत्ता में आती है तब वह ए.टी.एस द्वारा बड़े परिश्रम से एकत्रित किए गए प्रमाण और सबूतों का क्या करेगी? और क्या वह हिन्दू सम्प्रदाय में मौजूद उग्रवादी तत्वों को आतंकवाद फैलाने की छूट दे देगी? उन्हें अपनी रोगग्रस्त मानसिकता और कार्यशैली से जन्म लेनी वाली गंभीर स्थिति पर गहराई से विचार करना होगा।
हेमंत करकरे एक योग्य और अद्भुत अधिकारी थे। वह अब उन पर लगाए जाने वाले आरोप (दाग़) मिटाने के लिए जीवित नहीं हैं। उन्होंने अपने सिद्धांतों के लिए अपने प्राणों की आहूति दी।

Wednesday, December 8, 2010

آخری لمحات میں کرکرے نے کی دگ وجے سنگھ سے دل کی بات!

عزیز برنی

کانگریس کے جنرل سکریٹری جناب دگ وجے سنگھ جی نے میری کتاب ’’آر ایس ایس کی سازشـ6/11؟‘‘ کی رسم اجرا کی تقریب میں جہاں ایک معرکہ آرا اور تاریخی تقریر کی، وہیں اس کے چند جملے ایسے بھی تھے جنہیں میں نے اپنے خطاب کا سرنامۂ کلام بنانا ضروری سمجھا۔ میں اس وقت وہی جملہ آپ کے ذہنوں میں رقم کرنے جارہا ہوں اور اس درخواست کے ساتھ کہ خدارا اسے کاغذ اور سیاہی تک محدود نہ رہنے دیجئی، نقش کرلیجئے اپنے دل و دماغ پر اس لئے کہ آزاد ہندوستان کو پہلی بار اپنے ملک پر کسی دشمن ملک کی فوج سے نہیں، بلکہ ایک دہشت گردانہ حملہ کا سامنا کرنا پڑا اور وہ بھی سرحدوں پر نہیں، بلکہ ہندوستان کی معاشی راجدھانی قرار دئے جانے والے شہر ممبئی کی اس بندرگاہ، جہاں سیکڑوں برس سے پانی کے جہاز آکر رکا کرتے تھے اور جہاں آج بھی گیٹ وے آف انڈیا ہندوستان کی آن بان شان کے ترجمان کی حیثیت سے کھڑا ہی۔ اس سے چند قدم کے فاصلہ پر ہوٹل تاج اس دہشت گردانہ حملہ کا مرکز تھا اور تاریخ تھی 26نومبر 2008 ، میں اپنے آج کے اس مضمون میں اس حملہ سے تین گھنٹہ پہلے یعنی محض80منٹ پہلے کی ایک ٹیلی فون کال کا ذکر کرنے جارہا ہوں، جو شہید وطن ہیمنت کرکرے کی کال تھی اور حکمراں جماعت یعنی کانگریس کے جنرل سکریٹری جناب دگ وجے سنگھ کے موبائل فون پرتھی۔ یہ فون کیا تھا خود شہید ہیمنت کرکرے نی۔ میں ایک ایک بات کو انتہائی وضاحت کے ساتھ اس لئے درج کررہا ہوں کہ ہر بات کے کچھ معنی ہوتے ہیں، اگر یہ فون جناب دگ وجے سنگھ کے ذریعہ ہیمنت کرکرے کو کیا جاتا تو بات کچھ اور ہوتی، اس کا مطلب کچھ اور ہوتا، اسے ہم ایک اتفاق قرار دے سکتے تھی، لیکن جب کوئی شخض پریشان ہوتا ہی، غمزدہ ہوتا ہے یا بعض اوقات کچھ عظیم شخصیتوں کو اس آنے والے وقت کا اندازہ ہوجاتا ہی، جس سے انہیں کچھ دیر بعد گزرنا ہوتا ہی، تب ان کی آنکھیں تلاش کرتی ہیں کسی ایسے ہمدرد کو، جس سے زندگی کے آخری لمحہ میں کچھ کہہ سکیں۔ ایسے جملے وصیت کا درجہ رکھتے ہیں۔ عام طور پر بستر مرگ پر اپنی زندگی کے آخری لمحوں کو نزدیک محسوس کرتے ہوئے ہر شخص اپنے عزیزواقارب سے اپنے دل کی بات کرتا ہے اور اگر کوئی پیغام دینا چاہتا ہے تو ایسے شخص کو منتخب کرتا ہی، جس کے ذریعہ یہ پیغام وہاں تک پہنچ سکی، جہاں وہ پہنچانا چاہتا ہی۔ ایک اور بات ہماری عدالتیں کسی بھی شخص کی موت کے آخری بیان کو انتہائی اہمیت کا حامل مانتی ہیں۔ اسے حرف آخر قرار دیا جاتا ہی، اس لحاظ سے شہید ہیمنت کرکرے کے ان جملوں کو دیکھیں، جو انہوں نے دگ وجے سنگھ کو فون کرکے کہا، ’’میں انتہائی پریشانی کے عالم میں ہوں۔ میں نے اپنی زندگی میں اتنا پریشان کن دور نہیں دیکھا۔ میرا 17 سالہ بیٹا جو زیرتعلیم ہی، اسے دبئی میں ایک بڑا کنٹریکٹر بتاکر بدنام کیا جارہا ہی۔ میرے اہل خانہ جو ناگپور میں ہیں، انہیں بم سے اڑا دینے کی دھمکیاں دی جارہی ہیں اور اس سب کے لئے انہوں نے سنگھ پریوار کو نامزد کیا تھا۔ پھر ذہن نشین کرلیں،سنگھ پریوار کو نامزد کیا تھا۔ اپنی موت سے صرف تین گھنٹے پہلی۔ اپنی جان کو خطرے میں بتایا تھا۔ اپنے خاندان کو بم سے اڑا دئے جانے کی بات کہی تھی۔ اپنے بیٹے کو 500کروڑ روپے کے کنٹریکٹ کے جھوٹے الزام میں پھنسانے کی بات کہی تھی۔ اور پھر ہوا ممبئی پر دہشت گردانہ حملہ، جس کا پہلا شکار ہوئے شہید ہیمنت کرکری۔ میں پہلے گفتگو کو یہیں تمام کردوں، تاکہ واضح ہوجائے کہ ٹیلی فون پر کی جانے والی گفتگو کہاں سے کہاں تک تھی۔ اس حوالہ میں آخری جملہ جو میں نے لکھا کہ ممبئی پر دہشت گردانہ حملہ کا شکار ہوئے شہید ہیمنت کرکری، یہ میرا جملہ تھا اور اس سے پہلے میں جن باتوں کا ذکر کررہا تھا، وہ شہید ہیمنت کرکرے اور جناب دگ وجے سنگھ کے درمیان ہوئی گفتگو تھی۔ میں نے اپنی کتاب کے رسم اجرا کے موقع پر اپنی مختصر تقریر اسی عنوان کے ساتھ شروع کی۔ موقع نہیں تھا کہ میں تفصیل سے اس وقت اس انتہائی اہم جملہ کو سامنے رکھ کر تمام واقعات کی روشنی میں وہ تاریخی حقیقت اسی وقت پیش کردیتا، جو اب مندرجہ ذیل لفظوں کے ذریعہ آپ کی خدمت میں پیش کررہا ہوں۔
نریمن ہاؤس وہ جگہ تھی، جہاں بدھوارا پیٹھ پرسمندر کے کنارے پہنچنے والے دہشت گرد ناؤ سے اترنے کے بعد سب سے پہلے پہنچے اور جو یہودی، اسرائیلی ربی کی رہائش گاہ تھی۔ جیسے ہی یہ اطلاع نریمن ہاؤس تک پہنچی کہ ہیمنت کرکرے اس دہشت گردانہ حملہ میں ہلاک ہوگئے ہیں، وہاں مٹھائیاں تقسیم کی گئیں۔ میں نے اپنے گزشتہ قسط وار مضمون ’’مسلمانانِ ہند…ماضی، حال اور مستقبل؟؟؟‘‘ کی 100ویں قسط ’’شہید وطن ہیمنت کرکرے کی شہادت کو سلام‘‘ کے عنوان سے اس عظیم شخصیت کو خراج عقیدت کے طور پر پیش کی تھی۔ مٹھائیاں تقسیم کئے جانے والا معاملہ تفصیل کے ساتھ اس 100ویں قسط میں پیش کیا تھا اور اب اپنی حالیہ کتاب ’’آر ایس ایس کی سازشـ6/11؟‘‘ میں بھی۔ میں ایک اور بات روزاوّل سے ہی کہتا چلا آرہا ہوں، یقینا میرے قارئین کو یاد ہوگا کہ میں اجمل عامرقصاب کی اس تصویر پر سوالیہ نشان لگاتا رہا ہوں، جو سی ایس ٹی اسٹیشن پر اس کے ہاتھ میں رائفل لئے ہوئے ہی۔ کل 7دسمبر010کے انگریزی روزنامہ ’’ہندو‘‘ کی خبر میرے سامنے ہی، جو من و عن قارئین کی خدمت میں پیش کرنے جارہا ہوں، جس میں صاف لفظوں میں درج ہے کہ قصاب نے اس تصویر کو جھوٹا قرار دیا ہی۔ یہ بات اس کے وکیل امین سولکر نے کہی ہے اور تصویر کھینچنے والے سیبا ستین ڈیسوزافوٹوگرافر نے بھی اقرار کیا ہے کہ ہاں یہ ممکن ہی، یعنی جو بات ہم نے دو برس پہلے ہی کہہ دی تھی، آج اس بات کی تصدیق ہورہی ہی، جو بات ہم مسلسل گزشتہ دو برس سے کہتے چلے آرہے ہیں، اگر شہیدہیمنت کرکرے کے وہ آخری جملے جو جناب دگ وجے سنگھ سے انہوں نے خود فون کرکے کہے ، انہی کی طرف اشارہ کررہے ہیں، جن کی طرف ہم کرتے رہے ہیں تو پھر تفتیش اس سمت میں کیوں نہیںکی جاتی؟ ملاحظہ فرمائیں ’’ہندو‘‘ کی یہ خبر، اس کے بعد میرا مضمون جاری رہے گا۔
پاکستانی دہشت گرد اجمل عامر قصاب نے کہا ہے کہ وہ 26/11ممبئی حملوں کے دوران، چھترپتی شواجی ریلوے ٹرمنس اور کاما ہسپتال پر موجود نہیں تھا۔ پیر کے روز اس نے دعویٰ کیا ہے کہ جن تصویروں میں اسے اور اس کے ساتھی اسماعیل کو ان مقامات پر دکھایا گیا ان سے چھیڑ چھاڑ کی گئی ہی۔ ممبئی ہائی کورٹ کے جج صاحبان جسٹس رنجن ڈیسائی اور جسٹس آروی مورے کو، جو کہ قصاب کی سزائے موت کی توثیق سے متعلق دلائل کی سماعت کررہے ہیں وکیل امین سولکر نے بتایا ہے کہ ’’قصاب کاما ہسپتال پر دہشت گردانہ حملوں کے وقت ان مقامات پر موجود نہیں تھا اور اس کی تصاویر سے جو کہ ٹرائل کورٹ میں پیش کی گئی ہیں چھیڑ چھاڑ کی گئی ہی۔ ‘‘
قصاب عدالت میں لگائی گئی اس اسکرین پر بھی نہیں آیا تھا جو کہ اس لئے لگائی گئی تھی تاکہ وہ آرتھر روڈ جیل میں، جہاں وہ اس وقت زیر حراست ہی، مقدمہ کی کارروائی کو سن سکی۔
فوٹو گرافر کا بیان
مسٹر سولکر نے بتایا کہ میڈیا فوٹو گرافر سیباستین ڈیسوزا جس نے سی ایس ٹی یعنی چھتر پتی شیوا جی ٹرمنس پر قصاب کی تصاویر کھینچنے کا دعویٰ کیا تھا، جرح کے دوران اس بات کو تسلیم کیا ہے کہ تصاویر سے چھیڑ چھاڑ کی جاسکتی ہی۔ تاہم اس کے ساتھ ہی ساتھ وہ اپنے سابقہ بیان پربھی اڑا رہا کہ عدالت میں داخل کی گئی قصاب اور اسماعیل کی تصاویر اصلی ہیں۔مسٹر سولکر کا کہنا تھا کہ مسٹر سیباستین (فوٹو گرافر) نے تفتیش کے دوران پولس کو اپنے کیمرے کا میموری کارڈ نہیں دیا تھا۔ اس کے بجائے کچھ تصاویر کی انہوں نے ایک سی ڈی نکالی تھی اور اسے جنوبی ممبئی کے فورٹ علاقے کے ایک پرائیویٹ اسٹوڈیو سے Develop کرایا تھا۔ مسٹر سیباستین نے نہ تو اس اسٹوڈیو کی کوئی رسید پولس کو دی تھی او رنہ ہی انہوں نے اس دکان یا اس کے مالک کا نام پولس کوبتایا تھا۔
26/11پر لکھنے کا سلسلہ ابھی دیر تک چلنا ہی۔ عین ممکن ہے کہ میرے گزشتہ مضمون ’’مسلمانانِ ہند… ماضی، حال اور مستقبل؟؟؟‘‘ کی طرح میرے زیرنظر قسط وار مضمون ’’آزادبھارت کے اتہاس‘‘ کی 200ویں قسط بھی اسی موضوع پر ہو، اس لئے کہ یہ فاصلہ بھی اب زیادہ دور نہیں رہ گیا ہی۔ لیکن آج کا یہ مضمون ختم کرنے سے قبل اگر میں بنارس میں ہوئے بم دھماکہ پر گفتگو نہیں کروں گا تو بات ادھوری رہ جائے گی، یہ اس لئے بھی کہ کل صبح مجھے وزیراعظم کے ہمراہ بلجیم اور جرمنی کے دورہ پر جانا ہے اور اس مضمون کی اگلی قسط بیرون سفر سے واپسی کے بعد ہی ممکن ہی، لہٰذا اس وقت اگر میں بنارس میں ہوئے بم دھماکہ پر نہ لکھوں تو یہ پرانی ہوجائے گی۔
اس وقت میں بنارس میں ہوئے بم دھماکے کے محض 24گھنٹے بعد اس مضمون کو آخری شکل دے رہا ہوں اور اب تک اس بم دھماکہ کی تمام کڑیاں جڑ چکی ہیں۔ مجرموں کے نام سامنے آچکے ہیں، ماسٹر مائنڈ کون ہے معلوم ہوچکا ہی، اس کا نام سامنے آچکا ہی، وہ اس وقت کہاں چھپا ہی، سازش کب رچی گئی، سب کچھ ہماری خفیہ ایجنسیوں نے معلوم کرلیا ہی۔ کس قدر تیز رفتاری سے انہوں نے اس کارنامہ کو انجام دیا، مبارکباد کی مستحق ہیں وہ۔ ’’انڈین مجاہدین‘‘نے اس بم دھماکہ کی ذمہ داری لی ہی۔ چار صفحات کا وہ طویل خط بھی موجود ہی، جو انہوں نے میڈیا کو بھیجا ہی۔ ایـمیل نوی ممبئی سے کیا گیا، جن کی ایـمیل آئی ڈی کو ہیک کیا گیا، ان دونوں کے نام نکھل اور اکھل تنریجا ہیں، جنہیں حراست میں لے کر کچھ دیر بعد ہی چھوڑدیا گیا۔ کس قدر ذہین اور ایمانداری سے اپناجرم قبول کرنے والے دہشت گرد ہیں یہ، حادثہ کے فوراً بعد قبل اس کے کہ حادثہ کی تفتیش کی سمت طے کی جائی، اپنے جرم کا اقبال کرلیتے ہیں، وہ بھی دوچار سطروں میں نہیں، اتنے طویل خط کے ذریعہ کہ بم بنانے اور اسے پلانٹ کرنے کے لئے جتنا وقت درکار ہو، اس سے بھی زیادہ وقت وہ جرم کا اقرار کرنے کے لئے خرچ کرتے ہیں۔ اقبال جرم کی عبارت میں پیشانی پر لکھتے ہیں ’’بسم اللہ الرحمن رحیم‘‘ (شروع کرتے ہیں اس اللہ کے نام سی، جو نہایت رحم کرنے والا ہی)، یعنی حددرجہ کی بے رحمی کے جرم کا اقرار کرنے والے اپنے خط کے پہلے ہی جملہ کو ہی اللہ جو رحم کرنے والا ہی، اس کے نام سے شروع کرتے ہیں۔ اگر وہ واقعی اللہ کی خوشنودی حاصل کرنا چاہتے ہیں اور اپنے کام کو جہاد کا نام دینا چاہتے ہیں تو پھر یہ کس طرح ممکن ہے کہ انہیں اللہ کے اس پیغام کا ہی علم نہ ہو، جو ان کے پہلے ہی جملے میں ہی۔ یقینا قارئین کو یاد ہوگا، میں نے 2نومبر008 کو لکھے اپنے ایک مضمون کا عنوان دیا تھا ’’ہوسکتا ہے آسام میں بم دھماکے انڈین مجاہدین نے ہی کئے ہوں پر کیاانڈین مجاہدین بجرنگ دل کا ہی کوڈ نیم ہی!‘‘ آج پھر میں اپنی خفیہ ایجنسیوں سے یہ مؤدبانہ درخواست کرنا چاہتا ہوں کہ جب وہ انڈین مجاہدین کے اس جرم کی گہرائی تک پہنچنے کی کوشش کریں تو اپنی تفتیش میں اس پہلو کو بھی شامل رکھیں، اس لئے کہ سنگھ پریوار سازشیں رچنے میں کس قدر ماہر ہی، اس کا اندازہ تو 30جنوری948کو مہاتماگاندھی کے قتل کے فوراً بعد ہی ہوگیا تھا۔ اگر ناتھو رام گوڈسے پکڑا نہ جاتا اور اس کی اصل شناخت سامنے نہ آئی ہوتی تو مہاتماگاندھی کے قتل کا شبہ بھی مسلمانوں پر ہی جاتا۔ جگہ کم ہی، اس لئے بہت تفصیل سے گفتگو کرنا ممکن نہیں ہوپارہا ہی، ناندیڑ بم دھماکوں کے بعد ملی نقلی داڑھی اور ٹوپی کا حوالہ دے کر اپنی بات ختم کرتا ہوں، یہ بھی اسی لئے تھا کہ بم دھماکے وہ کریں اور شبہ مسلمانوں پر جائی۔ بنارس میں شیتلاگھاٹ پر ہوا بم دھماکہ کیا ایسی ہی ایک سازش کا حصہ تو نہیں کہ اس وقت جب مالیگاؤں، اجمیر، سمجھوتہ ایکسپریس، مکہ مسجد حیدرآباد میں ہوئے بم دھماکوں میں سنگھ پریوار سے وابستہ مجرموں کے نام سامنے آرہے ہیں تو ان کی جانب سے توجہ ہٹانے کے لئے بنارس میں بم دھماکہ کرکے انڈین مجاہدین کے حوالہ سے کچھ مسلم ناموں کو سامنے رکھا جارہا ہوکہ پھر ایک بار شک کی سوئی اس طرف مڑجائے اور بات پھر وہیں پہنچے جہاں سے شروع ہوئی تھی۔
……………

अन्तिम क्षणों में करकरे ने की दिग्विजिय सिंह से दिल की बात!
अज़ीज़ बर्नी

कांग्रेस के महासचिव जनाब दिग्विजय सिंह ने मेरी किताब ‘‘आरएसएस की साज़िश-26/11?’’ के विमोचन समारोह में जहां एक शानदार और ऐतिहासिक भाषण दिया वहीं उसके कुछ वाक्य ऐसे भी थे जिन्हें मैंने अपने संबोधन का शीर्षक बनाना ज़रूरी समझा। मैं इस समय वही वाक्य आपके ज़हनों पर अंकित करने जा रहा हूं और इस निवेदन के साथ कि ख़ुदा के लिए इसे काग़ज़ और रोशनाई तक सीमित न रहने दीजिए, नक़्श कर लीजिए अपने दिल व दिमाग़ पर इसलिए कि आज़ाद भारत को पहली बार अपने देश पर किसी दुश्मन देश की सेना से नहीं, बल्कि एक आतंकवादी हमले का सामना करना पड़ा और वह भी सीमाओं पर नहीं बल्कि भारत की आर्थिक राजधानी समझे जाने वाले नगर मुंबई की उस बंदरगाह, जहां सैकड़ों वर्ष से पानी के जहाज़ आकर रुका करते थे और जहां आज भी गेटवे आॅफ़ इंडिया भारत की आन बान शान के तर्जुमान की हैसियत से खड़ा है। इससे कुछ क़दम के फ़ासले पर होटल ताज उस आतंकवादी हमले का केंद्र था और तिथि थी 26 नवम्बर 2008, मैं अपने आज के इस लेख में हमले से 3 घंटे पूर्व अर्थात केवल 180 मिनट पहले की एक टेलीफोन काॅल की चर्चा करने जा रहा हूं, जो शहीदे वतन हेमंत करकरे की काॅल थी और सत्ताधारी दल अर्थात कांग्रेस के महासचिव जनाब दिग्विजय सिंह के मोबाइल फोन पर थी। यह फोन किया था स्वयं शहीद हेमंत करकरे ने। मैं एक एक बात को अत्यंत स्पष्टता के साथ इसलिए दर्ज कर रहा हूं कि हर बात के कुछ मायने होते हैं। अगर यह फोन जनाब दिग्विजय सिंह द्वारा हेमंत करकरे को किया जाता तो बात कुछ और होती, इसका मतलब कुछ और होता, उसे हम एक संयोग क़रार दे सकते थे, लेकिन जब कोई व्यक्ति परेशान होता है, ग़मज़दा होता है या कभी कुछ महान व्यक्तियों को आने वाले समय का अंदाज़ा हो जाता है, जिससे उन्हें कुछ देर बाद गुज़रना होता है, तब उनकी आंखें तलाश करती हैं किसी ऐसे हमदर्द को जिससे जीवन के अंतिम क्षण में कुछ कह सकें। ऐसे वाक्य वसीयत का स्थान रखते हैं। आमतौर पर मृत्यु शय्या पर अपने जीवन के अंतिम क्षणों को निकट महसूस करते हुए हर व्यक्ति अपने सगे संबंधियों से अपने दिल की बात करता है और अगर कोई संदेश देना चाहता है तो ऐसे व्यक्ति का चयन करता है, जिसके द्वारा यह संदेश वहां तक पहुंच सके, जहां वह पहुंचाना चाहता है। हमारी न्याय पालिकाएं किसी भी व्यक्ति की मृत्यु पूर्व के अंतिम बयानको अत्यंत महत्वपूर्ण मानती हैं। उसे अंतिम सत्य क़रार दिया जाता है। इस लिहाज़ से शहीद हेमंत करकरे के उन वाक्यों को देखें, जो उन्होंने दिग्विजय सिंह को फ़ोन करके कहा, ‘‘मैं बहुत कष्टदायक अवस्था में हूं। मैंने अपने जीवन में इतना परेशान करने वाला दौर नहीं देखा। मेरा 17 वर्षीय बेटा जो विद्यार्थी है, उसे दुबई में एक बड़ा कन्ट्रेक्टर बताकर बदनाम किया जा रहा है। मेरे परिवार वाले जो नागपुर में हैं, उन्हें बम से उड़ा देने की धमकियां दी जा रही हैं।’’ और इस सबके लिए उन्होंने संघ परिवार को नामज़द किया था। फिर ज़हननशीं कर लें, संघ परिवार को नामज़द किया था। अपनी मृत्यु से केवल 3 घंटे पहले। अपनी जान को ख़तरे में बताया था। अपने सम्बन्धियों को बम से उड़ा दिए जाने की बात कही थी। अपने बेटे को 500 करोड़ रुपए के कान्ट्रेक्ट के झूठे आरोप में फंसाने की बात कही थी, और फिर हुआ मुंबई पर आतंकवादी हमला, जिसका पहला शिकार हुए शहीद हेमंत करकरे। मैं पहले गुफ़्तगू को यहीं समाप्त कर दूं, ताकि स्पष्ट हो जाए टेलीफोन पर की जाने वाली गुफ़्तगू कहां से कहां तक थी। इस हवाले में अंतिम वाक्य जो मैंने लिखा कि मुंबई पर आतंकवादी हमले का शिकार हुए शहीद हेमंत करकरे, यह मेरा वाक्य था और इससे पहले मैं जिन बातों की चर्चा कर रहा था वह शहीद हेमंत करकरे और जनाब दिग्विजय सिंह के बीच हुई गुफ़्तगू थी। मैंने अपनी किताब के विमोचन के अवसर पर अपना संक्षिप्त भाषण इसी शीर्षक के साथ आरंभ किया। मौक़ा नहीं था कि मैं विस्तार से उस समय इस अत्यंत महत्वपूर्ण वाक्य को सामने रख कर सभी घटनाओं के प्रकाश में यह ऐतिहासिक वास्तविकता उसी समय पेश कर देता, जो अब निम्नलिखित शब्दों द्वारा आपकी सेवा में पेश कर रहा हूं।
नरेमन हाउस वह स्थान था, जहां बुद्धवारापीठ पर समुद्र के किनारे पहुंचने वाले आतंकवादी नाव से उतरने के बाद सबसे पहले पहुंचे और जो यहूदी, इस्राईली रब्बी का निवास स्थान था। जैसे ही यह सूचना नरेमन हाउस तक पहुंची कि हेमंत करकरे इस आतंकवादी हमले में हताहत हो गए हैं, वहां मिठाइयां बांटी गईं। मैं ने अपने पिछले क्रमवार लेख ‘‘मुसलमानाने हिंद ह्न माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल???’’ की 100वीं क़िस्त ‘‘शहीद हेमंत करकरे की शहादत को सलाम’’ के शीर्षक से उस महान व्यक्ति को श्रधंाजली के रूप में पेश किया था। मिठाइयां बांटने वाली घटना विस्तार के साथ उस 100वीं किस्त में पेश की थी और अब अपनी नई पुस्तक ‘‘आरएसएस की साज़िश-26/11?’’ में भी। मैं एक और बात पहले दिन से ही कहता चला आ रहा हूं। निश्चिय ही मेरे पाठकों को याद होगा कि मैं अजमल आमिर क़साब के उस चित्र पर प्रश्न चिन्ह लगाता रहा हूं, जो सीएसटी स्टेशन पर उसके हाथ में राइफ़ल लिए हुए है। कल 7/12/2010 के अंग्रेज़ी दैनिक ‘‘हिंदू’’ का समाचार मेरे सामने है जिसका अनुवाद पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करने जा हा हूं, जिसमें स्पष्ट शब्दों में दर्ज है कि क़साब ने उस चित्र को झूठा क़रार दिया है यह बात उसके वकील अमीन साॅलकर ने कही है और चित्र खींचने वाले सिबासेशन डिसोज़ा फोटो ग्राफर ने भी यह स्वीकार किया है कि हां यह संभव है अर्थात जो बात हमने 2 वर्ष पहले कह दी थी आज उस बात की पुष्टि हो रही है, जो बात हम लगातार पिछले 2 वर्षों से कहते चले आ रहे हैं, अगर शहीद हेमंत करकरे के वह अंतिम वाक्य जो जनाब दिग्विजय सिंह से उन्होंने स्व्यं फोन करके कहे, उन्हीं की ओर इशारा कर रहे हैं, जिनकी ओर हम करते रहे हैं तो फिर जांच उस दिशा में क्यों नहीं की जाती? मुलाहिज़ा फ़रमाएं ‘‘हिंदू’’ का यह समाचार, उसके बाद मेरा लेख जारी रहेगा।
पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर क़साब ने कहा है कि वह 26/11 मुंबई हमलों के दौरान छत्रपति शिवाजी रेलवे टर्मिनल और कामा हस्पताल पर मौजूद नहीं था। सोमवार के दिन उसने दावा किया कि जिन चित्रों में उसे और उसके साथी इस्माईल को उन स्थानों पर दिखाया गया, उनसे छेड़छाड़ की गई है। मुंबई हाईकोर्ट के जज साहिबान जस्टिस रंजन देसाई और जस्टिस आरवी मोरे को, जोकि क़साब की सज़ाए मौत की पुष्टि से संबंधित दलीलों की सुनवाई कर रहे हैं अधिवकता अमीन साॅलकर ने बताया कि ‘‘क़साब कामा अस्पताल पर आतंकवादी हमलों के समय उन स्थानों पर मौजूद नहीं था और उसके चित्रों से जो कि ट्रायल कोर्ट में पेश किए गए हैं छेड़छाड़ की गई है। ’’ क़साब अदालत में लगाए गए उस स्क्रीन पर भी नहीं आया था जोकि इसलिए लगाई गई थी ताकि वह आर्थर रोड जेल में, जहां वह इस समय क़ैदी है, मुक़द्दमे की कार्यवाही को सुन सके।
फ़ोटोग्राफ़र का बयान
श्री साॅलकर ने बताया कि मीडिया फोटोग्राफ़र सिबासेतन डिसोज़ा जिसने सीएसटी अर्थात छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर क़साब के चित्र खींचने का दावा किया था, जिरह के दौरान इस बात को स्वीकार किया है कि चित्र से छेड़छाड़ की जा सकती है। फिर भी हम इसके साथ ही साथ वह अपने पिछले बयान पर भी अड़ा रहा कि न्यायालय में दाख़िल की गई क़साब और इस्माईल की तस्वीरें असली हैं। श्री साॅलकर का कहना था कि श्री सिबासतेन डिसोज़ा (फोटोग्राफ़र) ने जांच के दौरान पुलिस को अपने कैमरे का मैमोरी कार्ड नहीं दिया था। उसके बजाए कुछ चित्रों की उन्होंने एक सीडी निकाली थी और उसे दक्षिणी मंुबई के फोर्ट क्षेत्र के एक प्राइवेट स्टूडियो से डेवलप कराया था। श्री सिबासतेन ने न तो उस स्टूडियो की कोई रसीद पुलिस को दी थी और न ही उस दुकान या उसके मालिक का नाम पुलिस को बताया था।
26/11 पर लिखने का यह सिलसिला अभी देर तक चलना है अतिसंभव है कि मेरे पिछले लेख ‘‘मुसलमानाने हिंद ह्न माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल???’’ की तरह मेरे इस क़िस्तवार लेख ‘‘आज़ाद भारत का इतिहास’’ की 200वीं क़िस्त भी इसी विषय पर हो, इसलिए कि यह फ़ासला भी अब अधिक दूर नहीं रह गया है। लेकिन आजका यह लेख समाप्त करने से पूर्व अगर मैं बनारस में हुए बम धमाके पर गुफ़्गू नहीं करूंगा तो बात अधूरी रह जाएगी यह, इसलिए भी कि कल सुबह (9 दिसम्बर 2010) मुझे प्रधानमंत्री के साथ बैल्जियम और जर्मनी की यात्रा पर जाना है और इस लेख की अगली कड़ी विदेश यात्रा से वापसी के बाद ही संभव है इसलिए उस समय तक अगर मैं बनारस पर हुए बम धमाके पर न लिखूं तो यह पुराना हो जाएगा।
इस समय में बनारस में हुए बम धमाके के मात्र 24 घंटे बाद इस लेख को अंतिम रूप दे रहा हूं और अब तक इस बम धमाके की सभी कड़ियां जुड़ चुकी हैं। अपराधियों के नाम सामने आ चुके हैं, मास्टर माइन्ड कौन है पता चल चुका है, उसका नाम सामने आ गया है, वह इस समय कहां छुपा है, साज़िश कब रची गई, सब कुछ हमारी ख़ु़िफ़या एजेंसियों ने पता कर लिया है। कितनी तीव्र गति से उन्होंने इस कारनामे को अंजाम दिया, मुबारकबाद के पात्र हैं वह। ‘‘इंडियन मुजाहिदीन’’ ने इस बम धमाके की ज़िम्मेदारी ली है। 4 पृष्ठों का वह लम्बा पत्र भी मौजूद है जो उन्होंने मीडिया को भेजा है, ईमेल नवी मुंबई से किया गया जिनकी ईमेल आईडी को हैक किया गया उन दोनों के नाम निखिल और अखिल तनरेजा हैं, जिन्हें हिरासत में लेकर कुछ देर बाद ही छोड़ दिया गया। कितनी बुद्धिमत्ता और ईमानदारी से अपना अपराध स्वीकार करने वाले आतंकवादी हैं यह, दुर्घटना के तुरंत बाद पूर्व इसके कि दुर्घटना की जांच की दिशा तय की जाए, अपना अपराध स्वीकार कर लेते हैं, वह भी दो चार पंक्तियों में नहीं, इतने लम्बे पत्र के द्वारा कि बम बनाने और उसे प्लांट करने के लिए जितना समय दरकार हो, उससे भी अधिक समय वह अपराध का स्वीकार करने के लिए लिखे पत्र में करते हैं। अपराध स्वीकार करने की इबारत में सबसे ऊपर लिखते हैं ‘‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’’ (शुरू करते हैं उस अल्लाह के नाम से जो निहायत रहम करने वाला है), अर्थात हद दरजे की बेरहमी के अपराध को स्वीकार करने वाले अपने पत्र के पहले वाक्य को अल्लाह जो रहम करने वाला है, उसके नाम से आरंभ करते हैं। अगर वह वास्तव में अल्लाह की प्रशंसा प्राप्त करना चाहते हैं और अपने काम को जिहाद का नाम देना चाहते हैं तो फिर यह किस तरह संभव है। निश्चय ही पाठकों को याद होगा, मैंने 2 नवम्बर 2008 को लिखे अपने लेख का शीर्षक दिया था ‘‘इंडियन मुजाहिदीन क्या बजरंग दल का कोड नेम है?’’ आज फिर मैं अपनी ख़ुफ़िया एजेंसियों से यह सादर निवेदन करना चाहता हूं कि जब वह इंडियन मुजाहिदीन के इस अपराध की गहराई से पहुंचने का प्रयास करें तो अपनी जांच में इस पहलु को भी शामिल रखें, इसलिए कि संघ परिवार साज़िशें रचने में कितना माहिर है, इसका अंदाज़ा तो 20 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के तुरंत बाद ही हो गया था। अगर नाथुराम गोडसे पकड़ा न जाता और उसकी वास्तविक पहचान सामने न आई होती तो महात्मा गांधी की हत्या का संदेह मुसलमानों पर ही जाता। जगह कम है, इसलिए फिर बहुत विस्तार से लिखना संभव नहीं हो पा रहा है। नांदेड़ बम धमाकों के बाद मिली नक़ली दाढ़ी और टोपी का हवाला देकर अपनी बात समाप्त करता हूं, यह भी इसलिए था कि बम धमाके वह करें और संदेह मुसलमानों पर जाए। बनारस में शीतला घाट पर हुआ बम धमाका क्या ऐसी एक साज़िश का हिस्सा तो नहीं कि इस समय जब मालेगांव, अजमेर, समझौता एक्सपे्रस, मक्का मस्जिद, हैदराबाद में हुए बम धमाकों से संघ परिवार से जुड़े अपराधियों के नाम सामने आ रहे हैं तो उनकी ओर से ध्यान हटाने के लिए बनारस में बम धमाका करके इंडियन मुजाहिदीन के हवाले से कुछ मुस्लिम नामों को सामने रखा जा रहा हो कि फिर एक बार शक की सूई उस तरफ़ मुड़ जाए और बात फिर वही पहुंचे जहां से आरंभ हुई थी।
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Tuesday, December 7, 2010

’’اچھا تو اعظم خاں کی ناراضگی امرسنگھ و جیہ پردا سے تھی، کلیان سنگھ سے نہیں‘‘

عزیز برنی

اعظم خاں اپنی واپسی کا جشن منارہے ہیں اور اس جشن میں شاید وہ یہ بھی بھول گئے ہیں کہ ہماری ایک تہذیب ہی، ہماری اخلاقی قدریں ہیں، بھلے ہی ہم سیاست میں رہیں، مگر ہمیں اپنی اخلاقی قدروں سے اس درجہ تجاوز نہیں کرنا چاہئے کہ لوگوں کو انگلیاں اٹھانے کا موقع ملی۔ جیہ پردا ایک فلمی اداکارہ ہیں، کیا وہ گزشتہ دوچار ماہ سے فلمی اداکار ہیں؟ کیا وہ سماجوادی پارٹی سے الگ ہونے کے بعد سے فلمی اداکارہ ہیں؟ وہ ایک رقاصہ ہیں، ان کا پیشہ یہی ہے تو پھر کیا سماجوادی پارٹی کو یہ علم نہیں تھا، جب انہیں پارٹی میں شامل کیا گیا تھا؟ کیا اس وقت محترم اعظم خاں سماجوادی پارٹی کا حصہ نہیں تھی، جب محترمہ جیہ پردا کو سماجوادی پارٹی میں شامل کیا گیا اور رامپور سے پارلیمانی انتخاب لڑانے کا فیصلہ کیا گیا؟ میں گزشتہ برس ہوئے پارلیمانی انتخابات کی بات نہیں کررہا ہوں، اس وقت ضرور اعظم خاں کی ناراضگی جگ ظاہر تھی اور جو کچھ بھی انہوں نے اس الیکشن کو متاثر کرنے کے لئے کیا، وہ بھی سب جانتے ہیں۔ اس وقت اس کا تذکرہ کرنا میرا مقصد نہیں ہی، بلکہ اس سے پہلے والے پارلیمانی انتخابات، یعنی 2004 کی بات اس وقت انہیں یاد دلانا چاہتا ہوں، جب وہ جیہ پردا کو اپنے ہمراہ لے کر رامپور کی گلیوں میں گھوم رہے تھے اور ہر دروازہ پر دستک دے کر ان کے لئے ووٹ مانگ رہے تھی۔ محترمہ جیہ بچن نے تو پارٹی ابھی تک چھوڑی نہیں ہی، کیا کہیں گے ان کے بارے میں؟ فلمی اداکارہ تو وہ بھی ہیں، بہت سی فلموں میں رقص انہوں نے بھی کیا ہی۔ نہیں، ہمارا مقصد یہ نہیں ہے کہ خدانخواستہ ان کی شان میں بھی گستاخی کی جائی، کہنے کا مقصد صرف یہ ہے کہ جب تک ساتھ رہے تو ہم پیالہ ہم نوالہ رہے اور اب یہ ہے کہ زبان سے انگارے برستے ہیں۔ ایسا کیوں؟ پھر جیہ پردا اکیلی تو رکن پارلیمنٹ یا سیاستداں نہیں ہیں۔ وجینتی مالا اپنے رقص کے لئے پہچانی جاتی تھیں، لمبے عرصہ تک ایوانِ بالا کی رکن رہیں۔ ہیمامالنی کی شناخت بھی ایک اداکارہ سے زیادہ رقاصہ کی ہی، وہ بھی ایوان بالا کی رکن رہیں اور خود اعظم خاں بھی اسی ایوان بالا کے رکن رہی۔ محترمہ شبانہ اعظمی انقلابی شاعر کیفی اعظمی صاحب کی صاحبزادی اور جاوید اختر کی اہلیہ ہیں۔ فلمی اداکارہ وہ بھی ہیں اور رقص تو انہوں نے بھی اپنی فلموں میں کیا ہی۔ سماجی کارکن ہیں، ایوان بالا کی رکن بھی رہی ہیں، کیا انہیں بھی اسی طرح کے جملوں سے نوازا جائی۔ کچھ بھی کہنے سے قبل ہمیں سوچنا ہوگا کہ ہماری زبان سے نکلا ایک جملہ کتنی شخصیتوں پر اثرانداز ہوتا ہی۔ دلیپ کمار کی ہم قدر کرتے ہیں، مایہ ناز فلم اداکار ہیں، ضرورت پڑنے پر ٹھمکے انہوں نے بھی لگائے تو کیا اس کے لئے انہیں تنقید کا نشانہ بنایا جائی۔ ٹھیک ہے اعظم خاں امرسنگھ سے ناراض ہیں۔ کل سماجوادی پارٹی میں امرسنگھ کا دبدبہ تھا تو وہ حاشیہ پر تھی، آج امرسنگھ سماجوادی پارٹی میں نہیں ہیں اور بڑے طمطراق سے سماجوادی پارٹی میں ان کی واپسی ہوگئی ہے تو یہ نزلہ جیہ پردا پر کیوں؟ پھر جس طرح کی زبانی جنگ امرسنگھ اور اعظم خاں کے درمیان کی جارہی ہی، کیا اسی کو ان کی سیاست قرار دے دیا جائی؟ اگر کوئی غیرمہذب شخص اس طرح کی بات کہے اور ترکی بہ ترکی جواب ملے تو سمجھ میں آسکتا ہی، لیکن اگر کوئی شخص خود کو سیاست کی اعلیٰ قدروں پر گامزن کہے اور پھر اس کا طرزعمل ایسا ہو تو مناسب نہیں لگتا۔ ہمیں امرسنگھ کی سیاست سے کچھ بھی لینا دینا نہیں ہی، لیکن جس طرح کی باتیں سرعام کہی جارہی ہیں اور انہیں ٹیلی ویژن چینلز پر چٹخارے لے کر دکھایا جارہا ہی، اس سے ملائم سنگھ یادو جیسے سنجیدہ اور مہذب سمجھے جانے والے لیڈر کی شخصیت بھی تو مجروح ہوتی ہی۔ امرسنگھ سپلائر ہیں؟ کیا سپلائی کرتے تھی، جملے کو ادھورا چھوڑ دیا جائی، کہہ دیا جائے کہ ’’آپ خاتون ہیں، میں کیا کہوں۔ کوئی اور ہوتا تو میں کچھ کہتا۔‘‘ اور پھر خاتون صحافی کے جواب کو اس طرح پیش کیا جائے کہ ’’اچھا میں سمجھ گئی‘‘ تو اگر یہ لفظ جو ایک کو سپلائر کہہ کر منسوب کیا گیا تو کیا اس دوسرے شخص کے لئے بڑے اعزاز کی بات ہی، جس کے لئے وہ شئے سپلائی کی گئی۔ اس کے دونوں پہلوؤں پر غور کرنا ہوگا۔ سیاستداں اپنے سیاسی مقاصد کے لئے کس درجہ گرنا چاہتے ہیں، وہ اس کا فیصلہ بیشک خود کرلیں، مگر جب کوئی بات عوامی سطح پر آکر کہیں تو اس بات کا خیال رکھنا ہوگا کہ ہمارے معاشرے پر ان باتوں کا کیا اثر پڑے گا۔ ہماری نوجوان نسل سیاست اور سیاستدانوں کو کس نظریہ سے دیکھے گی۔ مطلب کیا ہم انہیں یہ سمجھانا چاہتے ہیں کہ یہ ایک انتہائی غیرمہذب پیشہ ہے اور اس میں اچھے لوگوں کے لئے کوئی گنجائش نہیں ہے اور وہاں دو طرح کے لوگ پائے جاتے ہیں، ایک وہ جو سپلائر ہیں اور ایک وہ جن کے لئے قابل اعتراض اشیا سپلائی کی جاتی ہیں۔ کیا اس میں ملک اور قوم کی کوئی بھلائی نظر آتی ہی؟ بیشک جواباً دھمکی دئے جانے کے بعد کہہ دیا جائے کہ میزکرسی اور مائک سپلائی کرنے کی بات تھی، اس کے لئے سپلائر کہا گیا تھا تو محترم آپ کو یہ حق تو ہے کہ آپ خود کو بے پناہ عقلمند سمجھیں، مگر خدا کے لئے عوام کو اتنا بے وقوف بھی نہ سمجھیں کہ وہ آپ کے سپلائی اور سپلائر جیسے ذومعنی جملوں کا مطلب نہ سمجھتے ہوں۔
y اب دو باتیں محترم ملائم سنگھ یادو کی خدمت میں بھی عرض کرنا ضروری ہی۔ آپ کا کس سے کیا رشتہ ہی؟ آپ کب کس کو پارٹی میں لیتے ہیں اور کب نکالتے ہیں، یہ فیصلہ کرنے کا مکمل اختیار آپ کو ہی، مگر جس کو مسلمانوں کو چہرہ بنا کر پیش کرنا چاہتے ہیں، جس کے ذریعہ مسلمانوں کو متوجہ کرنا چاہتے ہیں۔ ان کا ووٹ حاصل کرنا چاہتے ہیں تو اس کے لئے ایسا طریقہ اختیار نہ کریں، جس سے پوری قوم کی شبیہ متاثر ہوتی ہو۔ ہم نے دیکھا ہے کہ جن مسلم سیاستدانوں کو دبنگ یا ایک فرقہ وارانہ جذبات کو مشتعل کرنے والا چہرہ بناکر پیش کیا گیا، انہوں نے تھوڑے ہی وقت میں شہرت تو حاصل کرلی، وہ مشہور تو ہوگئی، مگر انہیں زیادہ دن شرف قبولیت حاصل نہ ہوسکا۔ اگر عوام کے درمیان انہیں، ان کی شخصیت کو قبول کرلیا گیا ہوتا تو پھر یہ قوم آج تک قیادت سے خالی نہ ہوتی۔ ہمارے خیال میں تو ایسے لوگوں کا استعمال سیاستدانوں نے اپنی سیاست کے لئے کیا، جب تک ان کے ذریعہ مسلمانوں کو متاثر کیا جاسکتا تھا، کیا جاتا رہا اور جب ان کی ضرورت ختم ہوگئی تو انہیں دودھ میں سے مکھی کی طرح نکال کر پھینک دیا گیا۔ اعظم خاں خود اس کا شکار ہوچکے ہیں۔ آج انہیں خود یہ واضح کرنا ہوگا کہ وہ امرسنگھ کی وجہ سے نکالے گئے یا کلیان سنگھ کی وجہ سی۔ آج جس طرح وہ پارٹی میں واپس آنے کے بعد امرسنگھ کے خلاف بول رہے ہیں، اس سے تو یہی لگتا ہے کہ ان کی ناراضگی امرسنگھ سے تھی اور ان کو پارٹی سے نکالے جانے کی وجہ امرسنگھ تھی۔ ہم تو یہ سمجھے بیٹھے تھے کہ اعظم خاں کلیان سنگھ کے پارٹی میں آنے سے ناراض ہیں۔ ایک ایسے شخص کے ساتھ ایک پارٹی میں نہیں رہنا چاہتی، جو بابری مسجد کی شہادت کا مجرم ہی، لیکن پارٹی میں واپسی کے بعد سے اب تک انہوں نے ایک بار بھی تو یہ نہیں کہا کہ ان کی تو پارٹی میں اسی وقت واپسی طے ہوگئی تھی، جب کلیان سنگھ کو پارٹی سے نکال دیا گیا تھا۔ اس کے بعد باقاعدہ پارٹی میں شمولیت تو محض ایک رسم کی ادائیگی تھی۔ اچھا لگتا یہ سن کر کہ انہوں نے مسلمانوں کے جذبات کا احترام کرتے ہوئے یہ فیصلہ لیا تھا اور انہیں اسی بنا پر پارٹی سے الگ ہونا پڑا، لیکن جب وہ کلیان سنگھ کی بجائے امرسنگھ کو یا پھر امرسنگھ کی بات بھی جانے دیجئی، جیہ پردا کو نشانہ بناتے ہیں تو سوچنا پڑتا ہے کہ آخر مسلمانوں کی جیہ پردا سے کیا ناراضگی ہی؟ مسلمانوں کے آخر کون سے ایشوز کے خلاف جیہ پردا کھڑی نظر آئی ہیں۔ وہ کب کلیان سنگھ سے بھی زیادہ تنقید کا نشانہ بننے کے لائق ہوگئیں؟ اس سے تو یہی سمجھ میں آتا ہے کہ ناراضگی کی بنیاد رامپور کی ایک سیٹ اور امرسنگھ سے ذاتی رشتے تھی۔ اگر ایسا ہے تو ان کی پارٹی سے علیحدگی نہ مسلمانوں کے لئے تھی، نہ کلیان سنگھ کی ناراضگی کی بنا پر تھی اور نہ پارٹی میں واپسی کلیان سنگھ کی علیحدگی کی بنا پر ہی۔ جہاں تک میں امرسنگھ کے ذہن کو سمجھتا ہوں، وہ بے پناہ ذہین سیاستداں ہیں۔ ہمیں تو لگتا ہے کہ امرسنگھ نے اعظم خاں کی پارٹی میں واپسی کو بے اثر کرنے کے لئے اس زبانی جنگ کا خیرمقدم اسی لئے کیا، کیونکہ وہ جس طرح عبیداللہ خاں اعظمی کو ساتھ لے کر مسلمانوں کو متاثر کرنے کی کوشش کررہے ہیں اور پروانچل کو ایک الگ ریاست بنانے کی مہم چھیڑے ہوئے ہیں، وہ اعظم خاں کی سماجوادی پارٹی میں شمولیت کے بعد متاثر ہوسکتی تھی۔ مسلمان اعظم اور اعظمی میں سے کس کو چنیں یہ سوچنے لگتی، لیکن اگر پارٹی میں پھر سے شمولیت کے بعد اعظم خاں صرف اور صرف کلیان سنگھ کے ایشو پر بولتے اور ملائم سنگھ کے گلے لگ کر کہتے کہ آپ نے جس دن کلیان سنگھ کو پارٹی سے دفع کیا، سمجھ لیجئے اسی دن مجھے خوش آمدید کہہ دیا۔ ہاں رامپور سے لکھنؤ تک کا سفر طے کرنے میں کچھ وقت ضرور لگا، مگر دل کا دروازہ تو اسی دن کھل گیا تھا، جب آپ کے دروازہ سے بابری مسجد کے قاتل کے قدم باہر نکلی، تب بات کچھ اور ہوتی۔ لیکن اب جبکہ واضح طور پر یہ کھلی جنگ امرسنگھ اور اعظم خاں کے درمیان منظرعام پر آگئی ہے تو پھر اب کیا کہیں گے اعظم خاں۔ کیا وہ امرسنگھ کی وجہ سے پارٹی سے باہر نکلے تھے یا پھر کلیان سنگھ کی وجہ سی؟ اگر کلیان سنگھ کی وجہ سے نکلے ہوتے تو وجہ مسلمانوں کو بتائی جاسکتی تھی اور اگر امرسنگھ کی وجہ سے نکلے تو یہ تو دو سیاستدانوں کے درمیان کی آپسی جنگ تھی، اس سے مسلمانوں کو کیا لینا دینا۔ ساتھ ہی اگر ملائم سنگھ غور سے سوچیں تو انہیں سمجھ میں آجائے گا کہ اس سے انہیں کتنا بڑا نقصان ہونے جارہا ہی۔ میں امرسنگھ کے ذریعہ کی جانے والی بیان بازی کا ذکر نہیں کررہا ہوں۔ میں توجہ اس بات پر دلانا چاہتا ہوں کہ اگر یہی بات واضح ہوگئی کہ اعظم خاں کی علیحدگی اور واپسی کی وجہ کلیان سنگھ نہیں، امرسنگھ تھے تو پھر وہ مسلمانوں کو متاثر کرنے کے لئے اعظم خاں کی واپسی کے بارے میں کیا کہیں گی؟ میرے سامنے اس وقت اعظم خاں کی واپسی کے بعد کی خبروں کے تراشے ہیں، جنہیں میں آپ کے اور اپنے قارئین کی خدمت میں پیش کردینا چاہتا ہوں، تاکہ سیاسی جنگ کی حقیقت کو سمجھا جاسکی۔ ایک نظر ان خبروں پر:
سیاسی لوگ جیل جانے سے نہیںڈرتی، لیکن صنعت کاروں کے لئے جیل کافی تکلیف دہ جگہ ہی،لہٰذا امرسنگھ سوچ سمجھ کر زبان کھولیں تو بہتر ہی۔امرسنگھ بیمار ہیں اور وہ اپنا ذہنی توازن کھوچکے ہیں۔وہ پروگراموں میں کرسی، ٹینٹ سے لے کر ہیلی کاپٹر تک سپلائی کا ذکر خود کرچکے ہیں، اب سپلائر پکارنے میں برا کیوں لگ گیا؟ جیہ پردا فلمی اداکارہ ہیں۔ رامپور میں گھونگھٹ نکال کر مریم یا زلیخا نہیں بن سکتیں۔جیہ ہاں ناچتی اچھا ہیں۔ وہ سیاست میں ناسمجھ ہیں، اس لئے خاموش رہیں تو ہی بہتر ہی۔ امرسنگھ کو سبھی نے دلال کہا، لیکن ہاں ہم نے انہیں دلّا کہا۔
(’’راشٹریہ سہارا‘‘(ہندی)، ’’امراجالا‘‘، ’’ہندوستان‘‘، ’’نوبھارت ٹائمزـ 06-12-2010)
دیکھا آپ نی، ہے کوئی جملہ اس میں کلیان سنگھ کے حوالہ سی۔ نہیں ہے نہ، اب کیا کہیں گے آپ؟ ناراضگی کس سے تھی، کلیان سنگھ سے یا امرسنگھ اور جیہ پردا سی؟ ہوسکتا ہے اب ہمارے یاد دلانے کے بعد زبان پر کلیان سنگھ کا نام بھی آجائی، مگر یہ واپسی کے فوراً بعد ہی ہوتا تو کچھ اور بات ہوتی۔ جانے دیجئے یہ تو سب سیاستدانوں کے سیاسی انداز ہیں، شاید ہم بھی نظرانداز کردیتی، مگر لکھنا اس لئے پڑا کہ بیشک یہ سیاست ان کی ہوتی ہی، مگر شکار تو ہماری قوم کو ہی ہونا پڑتا ہی۔
پھر معذرت کئی روز تک نہیں لکھ سکا، وجہ میری کتاب کی اشاعت اور اس کی رسم اجرا، ہندوستان بھر میں ترسیل کا مرحلہ ابھی باقی ہی، تاہم اس موقع پر جناب دگ وجے سنگھ کی تقریر کا ایک جملہ ضرور ایسا ہی، جس پر مجھے نئے سرے سے لکھنا ہوگا اور مسلسل لکھنا ہوگا اور وہ ہے ’’شہید وطن ہیمنت کرکرے کی شہادت سے محض 3گھنٹے قبل ان کی ٹیلی فون پر گفتگو اور ہیمنت کرکرے کا یہ کہنا کہ وہ اپنی زندگی کے دشوارترین دور سے گزر رہے ہیں، ان کے اہل خانہ کو سنگھ پریوار کی جانب سے دھمکیاں مل رہی ہیں۔‘‘ ملاحظہ فرمائیں، کل کا مضمون اسی موضوع پر۔
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‘‘अच्छा तो आज़म ख़ां की नाराज़गी अमर सिंह व जया प्रदा से थी, कल्याण सिंह से नहीं’’
अज़ीज़ बर्नी

आज़म ख़ां अपनी वापसी का जश्न मना रहे हैं और इस जश्न में शायद वह यह भी भूल गए हैं कि हमारी एक सभ्यता है, हमारे सांस्कृतिक मूल्य हैं, भले ही हम राजनीति में रहें, परंतु हमें अपने स्वभाविक मूल्यों से इतना आगे नहीं जाना चाहिए कि लोगों को उंगलियां उठाने का मौक़ा मिले। जया प्रदा एक फ़िल्म अभिनेत्री हैं, क्या वह पिछले दो चार महीनों से फ़िल्म अभिनेत्री हैं? क्या वह समाजवादी पार्टी से अलग होने के बाद से फ़िल्म अभिनेत्री हैं? वह एक नृतकी हैं, उनका व्यवसाय यही है तो फिर क्या समाजवादी पार्टी को यह ज्ञात नहीं था, जब उन्हें पार्टी में शामिल किया गया था? क्या उस समय मोहतरम आज़म ख़ां समाजवादी पार्टी का हिस्सा नहीं थे, जब मोहतरमा जया प्रदा को समाजवादी पार्टी में शामिल किया गया और रामपुर से संसदीय चुनाव लड़ाने का फ़ैसला किया गया? मैं पिछले वर्ष हुए संसदीय चुनाव की बात नहीं कर रहा हूं, उस समय ज़रूर आज़म ख़ां की नाराज़गी जग ज़ाहिर थी और जो कुछ भी उन्होंने उस इलैक्शन को प्रभावित करने के लिए किया, वह भी सब जानते हैं। इस समय उसकी चर्चा करना मेरा उद्देश्य नहीं है, बल्कि इससे पहले वाले संसदीय चुनाव अर्थात 2004 की बात इस समय उन्हें याद दिलाना चाहता हूं, जब वह जया प्रदा को अपने साथ लेकर रामपुर की गलियों में घूम रहे थे और हर दरवाज़े पर दस्तक देकर उनके लिए वोट मांग रहे थे। मोहतरमा जया बच्चन ने तो पार्टी अभी तक छोड़ी नहीं है, क्या कहेंगे उनके बारे में, फ़िल्म अभिनेत्री तो वह भी हैं? बहुत सी फ़िल्मों में नृत्य उन्होंने भी किया है। नहीं, हमारा उद्देश्य यह नहीं है कि ख़ुदा न ख़्वास्ता उनकी भी निन्दा की जाए, कहने का उद्देश्य केवल यह है कि जब तक साथ रहे तो हमप्याला हमनिवाला रहे और अब यह है कि ज़्ाुबान से अंगारे बरसते हैं। ऐसा क्यों फिर जया प्रदा अकेली तो संसद सदस्य या राजनीतिज्ञ नहीं हैं। वजयंती माला अपने नृत्य के लिए पहचानी जाती थीं, लंबी अवधि तक ऊपरी सदन की सदस्य रहीं। हेमा मालिनी की पहचान भी एक अभिनेत्री से अधिक नृतकी की है, वह भी ऊपरी सदन की सदस्य रहीं और स्वंय आज़म ख़ां भी उसी ऊपरी सदन के सदस्य रहे। मोहतरमा शबाना आज़मी इन्क़लाबी शायर कैफ़ी आज़मी साहब की सुपुत्री और जावेद अख़्तर की पत्नी हैं। फ़िल्म अभिनेत्री वह भी हैं, और नृत्य तो उन्होंने भी अपनी फ़िल्मों में किया है। सामाजिक कार्यकर्ता हैं, ऊपरी सदन की सदस्य भी रही हैं, क्या उन्हें भी इसी तरह के वाक्यों से सम्बोधित किया जाए। कुछ भी कहने से पूर्व हमें सोचना होगा कि हमारी ज़ुबान से निकला एक वाक्य कितनी शख़्सियतों पर असरअंदाज़ होता है। दिलीप कुमार का हम सम्मान करते हैं, विशिष्ट फ़िल्म कलाकार हैं, ज़रूरत पड़ने पर ठुमके उन्होंने भी लगाए तो क्या इसके लिए उन्हें आलोचना का निशाना बनाया जाए। ठीक है आज़म ख़ां अमर सिंह से नाराज़ हैं। कल समाजवादी पार्टी में अमर सिंह का दबदबा था तो वह हाशिये पर थे, आज अमर सिंह समाजवादी पार्टी में नहीं हैं और बड़े गाजे-बाजे से समाजवादी पार्टी में उनकी वापसी हो गई है तो यह नज़ला जया प्रदा पर क्यों? फिर जिस तरह का वाक्य युद्ध अमर सिंह और आज़म ़ख़ां के बीच में जारी है, क्या इसी को उनकी राजनीति क़रार दे दी जाए? अगर कोई अभद्र व्यक्ति इस तरह की बात कहे और तुर्की-बतुर्की जवाब मिले तो समझ में आ सकता है, परंतु अगर कोई व्यक्ति स्वयं को राजनीति के उच्च मूल्यों पर चलने वाला कहे और फिर उसकी कार्य पद्धति ऐसी हो तो उचित नहीं लगता। हमें अमर सिंह कर की राजनीति से कुछ भी लेना देना नहीं है, लेकिन जिस तरह की बातें सरेआम कही जा रही हैं और उन्हें टेलीवीज़न चैनलों पर चटख़ारे लेकर दिखाया जा रहा है उससे मुलायम सिंह यादव जैसे गंभीर तथा सभ्य समझे जाने वाले नेता की छवि भी तो धूमिल होती है। अमर सिंह सप्लायर हैं? क्या सप्लाई करते थे, वाक्य को अधूरा छोड़ दिया जाए, कह दिया जाए कि ‘‘आप महिला हैं, मैं क्या कहूं। कोई और होता तो में कुछ कहता और फिर।’’ महिला पत्रकार के उत्तर को इस तरह प्रस्तुत किया जाए कि ‘‘अच्छा मैं समझ गई’’ तो अगर यह शब्द जो एक को सप्लायर कह कर सम्बोधित किया गया तो क्या उस दूसरे व्यक्ति के लिए बड़े सम्मान की बात है, जिसके लिए वह वस्तु सप्लाई की गई। उसके दोनों पहलुओं पर विचार करना होगा। राजनीतिज्ञ अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए कितना गिरना चाहते हैं, वह उसका फ़ैसला बेशक स्वयं कर लें, परंतु जब कोई बात सार्वजनिक स्तर पर आकर कहें तो इस बात का ध्यान रखना होगा कि हमारे समाज पर इन बातों का क्या प्रभाव पड़ेगा। हमारी युवा पीढ़ी राजनीति और राजनीतिज्ञों को किस दृष्टि से देखेगी। मतलब क्या हम उन्हें यह समझाना चाहते हैं कि यह एक अत्यंत अभद्र क्षेत्र है और इसमें अच्छे लोगों के लिए कोई गंुजाइश नहीं है और वहां दो तरह के लोग पाए जाते हैं एक वह जो सप्लायर हैं और एक वह जिनके लिए आपत्तिजनक वस्तुएं सप्लाई की जाती हैं। क्या इसमें देश तथा समाज की कोई भलाई नज़र आती है? बेशक जवाब में धमकी दिए जाने के बाद कह दिया जाए कि टेबल, कुर्सी और माइक सप्लाई करने की बात थी, इसके लिए सप्लायर कहा गया था तो मोहतरम आपको यह अधिकार तो है कि आप स्वयं को अत्यंत बुद्धिमान समझें, परंतु ख़ुदा के लिए जनता को इतना मूर्ख भी न समझें कि वह आपके सप्लाई और सप्लायर जैसे द्विभाषी वाक्यों का मतलब न समझते हों।
अब दो बातें मोहतरम मुलायम सिंह यादव की सेवा में भी अर्ज़ कर देना आवश्यक है। आपका किससे क्या संबंध है? आप कब किसको पार्टी में लेते हैं और कब निकालते हैं, यह फ़ैसला करने का सम्पूर्ण अधिकार आपको है, परंतु जिसको मुसलमानों का चेहरा बनाकर पेश करना चाहते हैं, जिसके द्वारा मुसलमानों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं, उनका वोट प्राप्त करना चाहते हैं तो इसके लिए ऐसा तरीक़ा न अपनाएं, जिससे पूरी क़ौम की छवि प्रभावित होती हो। हमने देखा है कि जिन मुस्लिम राजनीतिज्ञों को दबंग या साम्प्रदायिक भावनाओं केा भड़काने वाला चेहरा बनाकर पेश किया गया, उन्होंने थोड़े ही समय में प्रसिद्धि तो प्राप्त कर ली, वह प्रसिद्ध तो हो गए, परंतु उन्हें अधिक दिनों तक लोकप्रियता प्राप्त न हो सकी। अगर जनता के बीच उन्हें, उनकी शख़्सियत को स्वीकार कर लिया गया होता तो फिर यह क़ौम आज तक नेतृत्व से ख़ाली न होती। हमारे विचार में तो ऐसे लोगों का प्रयोग राजनीतिज्ञों ने अपनी राजनीति के लिए किया, जब तक उनके द्वारा मुसलमानों को प्रभावित किया जा सकता था, किया जाता रहा और जब उनकी आवश्यकता समाप्त हो गई तो उन्हें दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फैंक दिया गया। आज़म ख़ां स्वयं इसका शिकार हो चुके हैं। आज उन्हें स्वयं यह स्पष्ट करना होगा कि वह अमर सिंह की वजह से निकाले गए या कल्याण सिंह की वजह से। आज जिस तरह वह पार्टी में वापस आने के बाद अमर सिंह के विरुद्ध बोल रहे हैं इससे तो यही लगता है कि उनकी नाराज़गी अमर सिंह से थी और उनको पार्टी से निकाले जाने का कारण अमर सिंह थे। हम तो यह समझे बैठे थे कि आज़म ख़ां कल्याण सिंह के पार्टी में आने से नाराज़ हैं। एक ऐसे व्यक्ति के साथ एक पार्टी में नहीं रहना चाहते, जो बाबरी मस्जिद की शहादत का अपराधी है। लेकिन पार्टी में वापसी के बाद से अब तक उन्होंने ने एक बार भी तो यह नहीं कहा कि उनकी तो पार्टी में उसी समय वापसी तय हो गई थी, जब कल्याण सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया था। उसके बाद बाक़ायदा पार्टी में शामिल होना तो केवल एक रस्म अदायगी थी। अच्छा लगता यह सुनकर कि उन्होंने मुसलमानों की भावनाओं का सम्मान करते हुए यह फ़ैसला लिया था और उन्हें इसी आधार पर पार्टी से अलग होना पड़ा लेकिन जब वह कल्याण सिंह की बजाए अमर सिंह को या फिर अमर सिंह की बात भी जाने दीजिए, जया प्रदा को निशाना बनाते हैं तो सोचना पड़ता है कि आख़िर मुसलमानों की जया प्रदा से क्या नाराज़गी है। मुसलमानों के आख़िर कौनसे इशूज़ के विरुद्ध जया प्रदा खड़ी नज़र आई हैं। वह कब कल्याण सिंह से भी अधिक आलोचना का निशाना बनने योग्य हो गईं? इससे तो यही समझ में आता है कि नाराज़गी का आधार रामपुर की एक सीट और अमर सिंह से निजी संबंध थे। अगर ऐसा है तो उनकी पार्टी से अलाहिदगी न मुसलमानों के लिए थी, न कल्याण सिंह की नाराज़गी के आधार पर थी और न पार्टी में वापसी कल्याण सिंह की अलाहिदगी के आधार पर है। जहां तक मैं अमर सिंह के ज़हन को समझता हूं, वह अत्यंत बुद्धिमान राजनीतिज्ञ हैं। हमें तो लगता है कि अमर सिंह ने आज़म ख़ां की पार्टी में वापसी को निष्क्रिय करने के लिए इस वाक्य युद्ध का स्वगत इसीलिए किया क्योंकि वह जिस प्रकार उबैदुल्ला ख़ां आज़मी को साथ लेकर मुसलमानों को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं और पूर्वांचल को एक पृथक राज्य बनाने का अभियान छेड़े हुए हैं, वह आज़म ख़ां की समाजवादी पार्टी में वापसी के बाद प्रभावित हो सकती थी, मुसलमान आज़म और आज़मी में से किसको चुनें यह सोचने लगते, लेकिन पार्टी में फिर से शामिल होने के बाद आज़म ख़ां केवल और केवल कल्याण सिंह के इशू पर बोलते और मुलायम सिंह के गले लग कर कहते कि आपने जिस दिन कल्याण सिंह को पार्टी से निकाला, समझ लीजिए उसी दिन मुझे ख़ुश-आमदीद कह दिया। हां रामपुर से लखनऊ तक की यात्रा पूरी करने में कुछ समय अवश्य लगा, परंतु दिल का दरवाज़ा तो उसी दिन खुल गया, जब आपके दरवाज़े से बाबरी मस्जिद के हत्यारे के क़दम बाहर निकले, तब बात कुछ और होती। लेकिन अब जबकि स्पष्टरूप से यह खुली जंग अमर सिंह और आज़म ख़ां के बीच मंज़रेआम पर आ गई है तो फिर अब क्या कहेंगे आज़म ख़ां, क्या वह अमर सिंह के कारण पार्टी से बाहर निकले थे या फिर कल्याण सिंह के कारण? अगर कल्याण सिंह के कारण निकले होते तो कारण मुसलमानों को बताया जा सकता था और अगर अमर सिंह के कारण निकले तो यह तो दो राजनीतिज्ञों के बीच की आपसी लड़ाई थी, इससे मुसलमानों को क्या लेना-देना। साथ ही अगर मुलायम सिंह गंभीरता से सोचें तो उन्हें समझ में आ जाएगा कि इससे उन्हें कितना बड़ा नुक़्सान होने जा रहा है। मैं अमर सिंह द्वारा की जाने वाली बयानबाज़ी की चर्चा नहीं कर रहा हूं। मैं ध्यान इस बात की ओर दिलाना चाहता हूं कि अगर यही बात स्पष्ट हो गई कि आज़म ख़ां के अलग होने और वापसी का कारण कल्याण सिंह नहीं, अमर सिंह थे तो फिर वह मुसलमानों को प्रभावित करने के लिए आज़म ख़ां की वापसी के बारे में क्या कहेंगे? मेरे सामने इस समय आज़म ख़ां की वापसी के बाद के समाचारों की कटिंग हैं जिन्हें मैं आपसे और अपने पाठकों की सेवा में प्रस्तुत कर देना चाहता हूं, ताकि राजनीतिक युद्ध की वास्तविकता को समझा जा सके:
राजनीतिक लोग जेल जाने से नहीं डरते, लेकिन उद्योगपतियों के लिए जेल काफ़ी पीड़ादायक स्थान है, इसलिए अमर सिंह सोच समझ कर ज़्ाुबान खोलें तो बेहतर है। अमर सिंह बीमार हैं और वह अपना मान्सिक संतुलन खो चुके हैं। वह कार्यक्रमों में कुर्सी, टैंट से लेकर हेलीकाॅप्टर तक सप्लाई की चर्चा स्वयं कर चुके हैं, अब सप्लायर पुकारने में बुरा क्यों लग गया। जया प्रदा फ़िल्म अभिनेत्री हैं। रामपुर में घूंघट निकाल कर मरयम या ज़ुलेख़ां नहीं बन सकतीं। जया हां नाचजी अच्छा है, वह राजनीति में ना समझ हैं, इसलिए ख़ामोश रहे तो ही बेहतर है। अमर सिंह को सभी ने दलाल कहा, लेकिन हां हमने उन्हें दल्ला कहा।
(‘‘राष्ट्रीय सहारा’’(हिन्दी), ‘‘अमर उजाला’’, ‘‘हिन्दुस्तान’’, ‘‘नवभारत टाईम्स-06.12.2010)
देखा आपने है कोई वाक्य इसमें कल्याण सिंह के हवाले से। नहीं है ना, अब क्या कहेंगे आप? नाराज़गी किससे थी, कल्याण सिंह से या अमर सिंह और जया प्रदा से? हो सकता है अब हमारे याद दिलाने के बाद ज़बान पर कल्याण सिंह का नाम भी आजाए, मगर यह वापसी के तुरंत बाद ही होता तो कुछ और बात होती। जाने दीजिए यह तो सब राजनीतिज्ञों के सियासी अंदाज़ हैं, शायद हम भी नज़रअंदाज़ कर देते, मगर लिखना इसलिए पड़ा कि निःसन्देह यह राजनीति उनकी होती है, मगर शिकार तो हमारी क़ौम को ही होना पड़ता है।
फिर माफी चाहता हूं, कई दिन तक नहीं लिख सका, कारण मेरी किताब का प्रकाशन और उसका विमोचन, पूरे भारत में पहुंचाने का सिलसिला अभी बाक़ी है, इसलिए इस अवसर पर जनाब दिग्विजिय सिंह की तक़रीर का एक वाक्य आवश्य ऐसा है, जिस पर मुझे नए सिरे से लिखना होगा और मुसलसल लिखना होगा और वह है ‘‘शहीद-ए-वतन हेमंत करकरे की शहादत से केवल 3 घण्टे पहले उनकी टेलीफोन पर बातचीत और हेमंत करकरे का यह कहना कि वह अपने जीवन के मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं, उनके घरवालों को संघ परिवार की तरफ से धमकियां मिल रही हैं।’’ मुलाहिज़ा फरमाएं कल का लेख इसी विषय पर।
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Thursday, December 2, 2010

امریکی کردار کا آئینہـوکی لیکس

عزیز برنی

میرا اندازفکر ذرا مختلف ہی۔ کچھ لوگوں کے لئے قابل اعتراض اور یکطرفہ بھی ہوسکتا ہی۔ مجھے ان سے کوئی شکایت نہیں، مگر ایک مؤدبانہ درخواست ضرور ہے کہ اگر الزام مسلسل یکطرفہ لگائے جاتے رہیں تو پھر آپ کے ذہن میں یہ خیال کیوں نہیں آتا کہ یہ اندازفکر یکطرفہ ہی۔ پھر اگر اس کے برعکس دفاع میں کوئی شخص وہی اندازفکر اختیار کرے تو اعتراض کیوں؟ مجھے لکھنے ہیں اس وقت چند جملی، وکی لیکس کے انکشافات پر۔ کوئی نئی بات نہیں ہی، اس وقت اس موضوع پر دنیا کے تمام میڈیا ہاؤس لکھ رہے ہیں۔ سب کا اپنا اپنا انداز ہی۔ کہیں تعریف تو کہیں تنقید، مگر میں ذرا ہٹ کر کچھ کہنا چاہتا ہوں۔ گزشتہ چند برسوں میں بالخصوص 9/11/2001 کو ورلڈٹریڈ ٹاور پر حملہ کے فوراً بعد سے امریکہ مسلمانوں پر یکطرفہ الزام لگاتا رہا اور ساری دنیا کے سامنے مذہب اسلام اور مسلمانوں کی ایک ایسی تصویر پیش کرتا رہا، جس میں ان کا چہرہ ایک دہشت گرد چہرہ نظر آئے اور ان کا مذہب یعنی اسلام دہشت گردی کی ترغیب دینے والا مذہب نظرآئی۔ اب اگر کچھ لوگ یہ کہنا چاہیں کہ یہ الزام تو بن لادن اور القاعدہ پر تھا، آپ اسے تمام مسلمانوں یا مذہب اسلام سے کیوں جوڑ رہے ہیں؟ تو ایک بار پھر میں بیحد ادب کے ساتھ ان سے درخواست کرنا چاہوں گا کہ بیشک کھلے لفظوں میں تنقید بھلے ہی بن لادن اور القاعدہ پرکی جارہی ہو، مگر پس پردہ نشانے پر تو اسلام اور مسلمان ہی تھی، یعنی جو مذہب اور قوم متاثر ہورہی تھی، وہ مسلمان اور اسلام ہی تھی۔ امریکی اطلاعات کے مطابق بن لادن آج بھی زندہ ہی۔ جب جب انہیں اس کی کیسٹ یا بیان کی ضرورت ہوتی ہے تو انہیں کہیں نہ کہیں سے دستیاب ہوجاتا ہے اور کسی نہ کسی میڈیا ہاؤس کے ذریعہ منظرعام پر لادیا جاتا ہی، شاید وہ اسی لئے آن ریکارڈ زندہ ہی، مگر بن لادن کے افغانستان میں چھپے ہونے کی اطلاع نے ہزاروں افغانیوں کو موت کی نیند سلادیا۔ ان سے ان کا ملک، ان کی آزادی چھین لی گئی۔ آپ کہہ سکتے ہیں کہ افغانستان پر حکمراں تو ایک افغانستانی ہی ہی، مگر مجھے پھر عرض کرنا ہوگا کہ کون سا افغانستانی؟ وہی نہ جو امریکی اشاروں پر چلنے کے لئے تیار ہو، جس کے لئے اپنے ملک اور اپنے ملک کے عوام کی فلاح و بہبود سے زیادہ اپنے آقاؤں کی خوشنودی اہمیت رکھتی ہو۔ حامد کرزئی ایک ایسے ہی افغان حکمراں ہیں۔ اب آپ خود اس سچائی پر غور کریں کہ اگر 9/11کے لئے ذمہ دار بن لادن اور القاعدہ ہے تو نشانہ صرف اور صرف وہی ہونے چاہئیں تھے افغانستان اور افغانستان کے عوام کیوں…؟۔ اس جرم میں اگر قتل واجب تھا تو بن لادن اور اس کے کارکنان کا، بے گناہ افغانستان کے عوام کا کیوں؟ اسی طرح عراق کے صدر صدام حسین اور عراق کے عوام کو کس جرم کی سزا ملی؟ 9/11سے تو ان کا کوئی تعلق نہیں تھا۔ خود امریکہ کے سابق صدر جارج واکر بش نے بھی بعد میں تسلیم کر لیا تھا کہ صدام حسین کا 9/11سے کچھ بھی لینا دینا نہیں تھا۔ یہی بات رپورٹس پہلے سے کہہ رہی تھیں، خود صدام حسین کا بھی یہی کہنا تھا۔ پھر کس لئے صدام حسین کو ایک فرضی مقدمہ میں سزائے موت کا اعلان کرکے پھانسی پر چڑھا دیا گیا اور ہزاروں عراقیوں کو بغیر کسی جرم کے قتل کردیا گیا؟ اگر اس کی وجہ اسلام دشمنی یا مسلم دشمنی نہیں تھی تو امریکہ بتائے کہ وہ وجہ کیا تھی اور آپ سب اپنے دل سے پوچھیں کہ وجہ کیا تھی؟
K
آپ سوچ رہے ہوں گے کہ میں وکی لیکس کے انکشافات کا ذکرکررہا ہوں یا افغانستان اور عراق کا درد بیان کررہا ہوں یا پھر 9/11کے حوالہ سے گڑے مردے اکھاڑنے کی کوشش کررہا ہوں؟ آپ جو سمجھیں، مگر میں بات وکی لیکس کے انکشافات کی ہی کررہا ہوں۔چلئے براہ راست وکی لیکس پر ہی بات کرتے ہیں۔ چند امریکہ نواز میڈیا کو چھوڑ دیں تو تقریباً تمام میڈیا بشمول پرنٹ اور الیکٹرانک اس بات کے لئے امریکہ کی تنقید کررہا ہے کہ وہ دیگر ممالک کے داخلی معاملات میں اس درجہ دخل کیوں دیتا ہی؟ کیوں اس نے خود کو پوری دنیا کا چودھری مان لیا ہی؟ کیوں اس طرح کی سازشیں رچتا رہتا ہی، جس سے دوسرے ممالک کا امن و سکون درہم برہم ہو، خانہ جنگی کے حالات پیدا ہوں یا دو ممالک کے درمیان تنازع پیدا ہو؟ ان انکشافات سے امریکہ کا کون سا چہرہ سامنے آیا؟ اب ذرا میرے ابتدائی جملوں پر غور کریں، میں نے یہی لکھا تھا نہ کہ اسلام اور مسلمان امریکہ کے نشانہ پر رہے اور اس کا خمیازہ مسلمانوں کو بھگتنا پڑا، مسلم ممالک کو بھگتنا پڑا۔ مسلمان ہی وہ واحد قوم تھی، جو امریکہ کی سب سے زیادہ اس کی ایسی ہی پالیسیوں کی بنا پر تنقید کرتی رہی۔ اب آپ فیصلہ کریں کہ تنقید کرنے والی قوم درست تھی یا غلط؟ اگر آج آپ ایسی ہی وجوہات کی بنا پر امریکہ کی تنقید کرنا ضروری سمجھتے ہیں تو پھر جو قوم آج تک یہی کام کررہی تھی، وہ غلط کہاں تھی؟ وکی لیکس نے آج جو انکشافات کئے ہیں، وہ ساری دنیا کے لئے دستاویزی ثبوت کی حیثیت رکھتے ہیں، اس لئے وہ امریکہ کی تنقید کررہے ہیں اور جو قوم بہت پہلے ہی امریکہ کی نیت کو پڑھ کر اسی نتیجہ پر پہنچی تو کیا وہ صحیح نہیں تھی؟ پھر اگر ہم یہ کہیں کہ ہم زیادہ دوراندیش ہیں، ہم دل پر لکھی عبارت کو بھی پڑھ لیتے ہیں، آپ کو کاغذ کے ٹکڑے کا انتظار رہتا ہے تو پھر کیا غلط ہوگا؟ اب یہ فیصلہ آپ کو کرنا ہے کہ امریکہ کو اپنے انداز فکر کو بدلنے پر مجبور کیا جائے یا نہیں؟ اسے تمام ممالک کے داخلی معاملات میں مداخلت سے باز رہنے کی ہدایات دی جائیں یا نہیں؟
مجھے چند جملے ایران اور سعودی عرب کے حوالے سے بھی لکھنے ہیں اور ہندوستان اور پاکستان کے حوالہ سے بھی؟ لیکن پہلے دو باتیں وکی لیکس کے سربراہ جولین اسنج (Julian Assange) کے تعلق سی۔ جولین اسنج (Julian Assange)کو گرفتار کرنے کے لئے ریڈکارنر نوٹس جاری کردیا گیا ہی، مگراس جرم میں نہیںجس کا چرچا آج سارے جہان میں ہی، بلکہ اس جرم کے لئے جس کا اندازہ اس سے پہلے کسی کو تھا ہی نہیں۔ اس سلسلہ میں پہلے کبھی کوئی گفتگو ہوئی ہی نہیں۔ ریڈکارنر نوٹس جاری ہوا ہی، کسی خاتون کے ساتھ جبراً جنسی تعلقات قائم کرنے کے جرم میں اور کسی کے ساتھ چھیڑچھاڑ کرنے کی بناپر۔ جولین اسنج (Julian Assange)کے وکیل کا کہنا ہے کہ یہ الزام جھوٹا ہی۔ تعلقات اس کی مرضی سے قائم کئے گئے تھی۔ سچ جو بھی ہو، تعلقات رضامندی سے قائم کئے گئے ہوں یا جبراً، سوال یہ پیدا ہوتا ہے کہ اس جرم پر توجہ پہلے کیوں نہیں دی گئی۔ یعنی امریکہ پر جب تک خود آنچ نہیں آئی، اس آسٹریلیائی نوجوان کے اس جرم پر کوئی توجہ نہیں دی گئی۔ نہ ریڈکارنر نوٹس جاری ہوا اور نہ ان جنسی جرائم کی خبروںکو کوئی خاص اہمیت دی گئی۔ اب اگر یہ کہا جائے کہ یہ امریکی حکمت عملی کا حصہ ہی، اسے جب جس کے لئے زمین تنگ کرنا ہوتا ہے تو ڈھیروں وجوہات پیدا کرلی جاتی ہیں۔ ساری دنیا کے سامنے اس کی کردار کشی کی جاتی ہی، اسے موردالزام ٹھہرایا جاتا ہی، پھر سولی پر چڑھا دیا جاتاہی۔ یہی صدام حسین کے ساتھ ہوا، یہی بن لادن کے ساتھ، واضح ہو کہ بن لادن اس وقت امریکہ کا بہترین دوست تھا، جب بن لادن سوویت یونین کے ٹکڑے ٹکڑے کرنے میں اس کی مدد کررہا تھا اور صدام حسین اس وقت امریکہ کے بہترین دوست تھی، جب وہ جنگ ایران کے ساتھ لڑرہے تھے اور اب یہی وکی لیکس کے بانی کے ساتھ ہورہا ہی۔ ہم نہیں جانتے یہ شخص کون ہی، ہمیں نہیں معلوم اس کے جس جرم کے خلاف ریڈکارنر نوٹس جاری ہوا ہی، اس نے وہ جرم کیا ہے یا نہیں۔ نہ ہم اس کے دفاع میں کچھ کہنا چاہتے ہیں۔ ہم صرف امریکی حکمت عملی کا تذکرہ کررہے ہیں۔ اب رہا اس کا وہ جرم جو جگ ظاہر ہی، بیشک کسی بھی ملک کے خفیہ دستاویزات جعلسازی سے حاصل کرکے انہیں منظرعام پر لادینا جرم سمجھا جانا چاہئی، لیکن اگریہ جرم انسانیت کے حق میں ہو، اس سے ایسے رازافشا ہوتے ہوں، جس سے امریکہ کی دوغلی پالیسی سامنے آتی ہو، جن ممالک کو وہ اپنا دوست کہتا ہی، پردے کے پیچھے انہیں بھی دشمن کی طرح دیکھتا ہو تو کم سے کم وہ تمام ممالک اور ان کے عوام جو امریکہ کی سچائی جان کر اپنے دفاع میں محتاط قدم اٹھانے کا فائدہ اٹھاسکتے ہیں، کم سے کم وہ تو وکی لیکس کی اس حرکت کو کوئی جرم نہیں سمجھیں گی، کیونکہ اس جرم میں ان کی بھلائی پوشیدہ ہی۔
آئیے اب ذکر کرتے ہیں سعودی عرب کے ذریعہ ایران پر حملے کی منشا اور ہندوستان، پاکستان کی ممکنہ جنگ کے حوالہ سی۔
سعودی عرب کے شاہ ایران کی تباہی کے خواہشمند تھی۔ لیک ہوئے خفیہ دستاویز یہ ظاہر کرتے ہیں کہ وہ ایسا کیوں چاہتے تھی، کیا رنجش تھی یا ہے سعودی بادشاہ کی ایران سی۔ بظاہر تو امریکہ ایران کی تباہی چاہتا تھا اور اپنی اسی خواہش کے پیش نظر وہ ایران کو متواتر دھمکیاں بھی دیتا رہا۔ یہ الگ بات ہے کہ ایران کے صدر محمود احمدی نژاد نے ان دھمکیوں کے سامنے کبھی سرنگوں نہیں کیا اور یہ حقیقت بھی کس سے پوشیدہ ہے کہ سعودی عرب امریکی دباؤ میں ہی۔ ہوسکتاہے امریکہ کی منشا کو سمجھتے ہوئے امریکی حکمرانوں کی خوشنودی حاصل کرنے کے پیش نظر سعودی بادشاہ نے ایران کے خلاف زہرافشانی کی ہو۔ شاید اسی بنیادی وجہ کو سمجھتے ہوئے محمود احمدی نژاد نے وکی لیکس کے انکشافات کے بعد بھی یہ کہہ دیا کہ سعودی عرب سے ان کے تعلقات پر کوئی فرق نہیں پڑے گا۔
اب رہا سوال ہندوستان کے حوالے سے ہوئے انکشافات کا تو پاکستان کی منشا کو سمجھتے ہوئے بھی امریکہ پاکستان کی مدد کرتا رہا اور ہندوستان سے دوستی کا دم بھرتا رہا۔ اس وقت اس ضمن میں تفصیل سے گفتگو نہیں کی جاسکتی جبکہ یہ ایک سنجیدہ موضوع ہی، جس پر بہت کچھ لکھا جانا چاہئی۔ انشاء اللہ پھر کبھی، لیکن کیا اب بھی ہماری حکومت امریکہ کے ساتھ اپنے رشتوں پر نظرثانی نہیں کرے گی۔
اور آخر میں چند جملے اپنی صفائی میں، اس لئے کہ آپ کی عدالت میں مجھ سے بھی یہ جرم سرزد ہوا ہے کہ میرے اس مسلسل کالم کا سلسلہ کئی روز تک منقطع رہا۔ مبارکپور گرلز ڈگری کالج، اعظم گڑھ کی تقریب میں شرکت تو چند گھنٹے کے لئے تھی اور کافی تھا کہ صرف ایک دن کے لئے یہ سلسلہ رک جاتا، مگر پھر کئی روز لگے قلم اٹھانے میں۔ دراصل اپنی زیرطبع کتاب ’’آر ایس ایس کی سازشـ6/11؟‘‘ ، جس کی رسم اجرا 6دسمبرکو دہلی میں ہونی ہے اور یہ تاریخ دانستہ بابری مسجد کی شہادت کے روز رکھی گئی، تاکہ میں اس موقع پر دونوں واقعات کو ایک ساتھ جوڑ کر کچھ کہہ سکوں، لہٰذا کچھ وقت اس کام کے لئے بھی درکار تھا، اس لئے یہ سلسلہ رکا اور مبارکپور جہاں بنارسی ساڑیاں بنانے کی صنعت اس بستی کے ہر گھر سے جڑی ہی، ان کی مشکلات پر لکھنے کا بھی وعدہ تھا میرا، جسے پورا کرنا ہی۔ میں کوشاں ہوں ان تمام دقتوں کو یکجا کرنے میں اور جلد ہی انشاء اللہ اس سلسلہ میں نہ صرف لکھا جائے گا، بلکہ یہ کوشش بھی کی جائے گی کہ مسئلہ کا حل نکلی۔ اس لئے کہ یہ ہزاروں خاندانوں کی روزی روٹی کا سوال بھی ہے اور بنارسی ساڑی جو ہماری شناخت کا ایک حصہ بن چکی ہی، اس کے تحفظ کا سوال بھی ہی۔ ساتھ ہی مجھے وہ چہرہ، وہ دردمندانداز، وہ آنسوؤں میں بھیگی تحریر بھی یاد ہی، جس میں ایک باپ نے اپنی تین بالغ بیٹیوں کے لاپتہ ہوجانے کی روداد بیان کی ہی۔ یقینا اس سمت میں بھی جدوجہد کی جائے گی، تاکہ ماں باپ اپنی بچھڑی ہوئی بچیوں سے مل سکیں۔ دراصل ہر روز لکھنا مجھے بھی بے پناہ پسند ہی، مگر زندگی کی کچھ مجبوریاں ایسی بھی ہیں، جو کبھی کبھی اس سلسلہ کو روک دیتی ہیں۔ یہ تسلسل اس وقت بھی ٹوٹتا ہی، جب مجھے آپ سننا چاہتے ہیں اور کئی بار آپ کے بیچ نہ آنے کا احساس بھی ہوتا ہی۔ علی گڑھ مسلم یونیورسٹی میں منعقد ’’انٹرنیشنل کانفرنس آف مولانا رومی‘‘ اور میوات کے گھاسیڑا میں منعقد "Educational Awareness & Help of the needy" میں شرکت نہ کرپانے کا احساس بھی ہے مجھی، انشاء اللہ پھر کبھی۔ اللہ سے دعا کیجئے کہ کچھ ایسی سبیل پیدا ہو کہ نہ لکھنے کا سلسلہ رکی، نہ بولنے کا اور جو زندگی کی رفتار ہی، وہ بھی یونہی چلتی رہی، بیشک یہ آپ کی دعاؤں کے سبب ہی ممکن ہی، ورنہ ایک ادنیٰ صحافی اور یہ کام… اللہ، اللہ۔
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अमेरिकी किरदार का आईना-विकिलिक्स
अज़ीज़ बर्नी

मेरे सोचने का अंदाज़ ज़रा भिन्न है। कुछ लोगों के लिए आपत्तिजनक और एकतरफ़ा भी हो सकता है। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं, परंतु एक सादर निवेदन अवश्य है कि अगर आरोप लगातार और एकतरफ़ा लगाए जाते रहे तो फिर आपके मन में यह ख़्याल क्यों नहीं आता कि यह सोचने का अंदाज़ एकतरफ़ा है। फिर अगर इसके विपरीत प्रतिरक्षा में कोई व्यक्ति सोचने का वही अंदाज़ इख़्तियार करे तो आपत्ति क्यों? मुझे लिखने हैं इस समय कुछ वाक्य, विकिलिक्स के रहस्योद्घाटनों पर। कोई नई बात नहीं है, इस समय इस विषय पर दुनिया के सभी मीडिया हाऊस लिख रहे हैं, सबका अपना-अपना अंदाज़ है। कहीं प्रशंसा तो कहीं आलोचना, परंतु मैं ज़रा हट कर कुछ कहना चाहता हूं। पिछले कुछ वर्षों में, विशेष रूप से 9/11/2001 को वल्र्ड ट्रेड टाॅवर पर हमले के तुरंत बाद से अमेरिका मुसलमानों पर एकतरफ़ा आरोप लगाता रहा और पूरी दुनिया के सामने इस्लाम धर्म और मुसलमानों की एक ऐसी छवि पेश करता रहा, जिस में उनका चेहरा एक आतंकी चेहरा नज़र आए और उनका धर्म अर्थात इस्लाम आतंकवाद की प्रेरणा देने वाला धर्म नज़र आए। अब अगर कुछ लोग यह कहना चाहें कि यह आरोप तो बिन लादेन और अलक़ायदा पर था, आप उसे सभी मुसलमानों या इस्लाम धर्म से क्यों जोड़ रहे हैं? तो एक बार फिर मैं अत्यंत विनम्रता के साथ उनसे निवेदन करना चाहूंगा कि निःसंदेह खुले शब्दों में आलोचना तो भले ही बिन लादेन और अलक़ायदा की की जा रही होे, परंतु उसके परदे में निशाने पर तो इस्लाम और मुसलमान ही थे अर्थात जो धर्म और समुदाय प्रभावित हो रहा था, वह मुसलमान और इस्लाम ही थे। अमेरिकी सूचनाओं के अनुसार बिन लादेन आज भी जीवित है। जब-जब उन्हें उसके कैसेट्स अथवा बयान की आवश्यकता होती है तो वह उन्हें कहीं न कहीं उपलब्ध हो जाता है और किसी न किसी मीडिया हाऊस द्वारा सामने ला दिया जाता है, शायद वह इसीलिए आॅन रिकार्ड ज़िन्दा है, परंतु बिन लादेन के अफ़ग़ानिस्तान में छुपे होने की सूचना ने हज़ारों अफ़ग़ानियों को मौत की नींद सुला दिया। उनसे उनका देश, उनकी स्वतंत्रता छीन ली गई। आप कह सकते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान पर शासक तो एक अफ़ग़ानिस्तानी ही है, परंतु मुझे फिर अर्ज़ करना होगा कि कौनसा अफ़ग़ानिस्तानी? वही ना जो अमेरिकी इशारों पर चलने के लिए तैयार हो, जिसके लिए अपने देश और अपने देश की जनता के कल्याण तथा उन्नति से अधिक अपने आक़ाओं की ख़ुशनूदी महत्व रखती हो। हामिद करज़ई एक ऐसे ही अफ़ग़ान शासक हैं। अब आप स्वयं इस सच्चाई पर ग़्ाौर करें कि अगर 9/11 के लिए ज़िम्मेदार बिन लादेन और अलक़ायदा है तो निशाना केवल और केवल वही होने चाहिए थे अफ़ग़ानिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की जनता क्यों ह्न? इस अपराध में अगर हत्या अनिवार्य थी तो बिन लादेन और उसके कारिंदों की, बेगुनाह अफ़ग़ानिस्तान की जनता की क्यों? इसी तरह इराक़ के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन और इराक़ की जनता को किस अपराध की सज़ा मिली? 9/11 से तो उनका कोई संबंध नहीं। स्वयं अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जाॅर्ज वाकर बुश ने भी बाद में स्वीकार कर लिया था कि सद्दाम हुसैन का 9/11 से कुछ भी लेना देना नहीं था। यही बात रिपोर्टें पहले से कह रही थीं, स्वयं सद्दाम हुसैन का भी यही कहना था। फिर किसलिए सद्दाम हुसैन को एक फ़र्ज़ी मुक़द्दमे में सज़ाए मौत की घोषणा करके फांसी पर चढ़ा दिया गया और हज़ारों इराक़ियों की बिना किसी अपराध के हत्या कर दी गई? अगर इसका कारण इस्लाम दुश्मनी अथवा मुस्लिम दुश्मनी नहीं तो अमेरिका बताए कि वह क्या कारण थे और आप सब अपने दिल से पूछें कि क्या कारण था।
आप सोच रहे होंगे कि मैं विकिलिक्स के रहस्योद्घाटनों की चर्चा कर रहा हूं या अफ़ग़ानिस्तान व इराक़ की पीड़ा बयान कर रहा हूं या फिर 9/11 के हवाले से गड़े मुर्दे उखाड़ने का प्रयास कर रहा हूं? आप जो समझें, परंतु मैं बात विकिलिक्स के रहस्योद्घाटनों की ही कर रहा हूं, चलिए सीधे विकिलिक्स पर ही बात करते हैं। कुछ अमेरिका समर्थक मीडिया को छोड़ दें तो प्रिंट तथा इलैक्ट्राॅनिक सहित लगभग सभी मीडिया इस बात के लिए अमेरिका की आलोचना कर रहे हैं कि वह अन्य देशों के आंतरिक मामलों में इतना दख़ल क्यों देता है? क्यों उसने स्वयं को पूरी दुनिया का चैधरी मान लिया है? क्यों इस तरह के षड़यंत्र रचता रहता है, जिससे दूसरे देशों की शांति भंग हो, गृहयुद्ध जैसी परिस्थितियां पैदा हों या दो देशों के बीच विवाद पैदा हो? इन रहस्योद्घाटनों से अमेरिका का कौनसा चेहरा सामने आया? अब ज़रा मेरे आरंभिक वाक्यों पर विचार करें, मैंने यही लिखा था ना कि इस्लाम और मुसलमान अमेरिका के निशाने पर रहे और उसका ख़ामियाज़ा मुसलमानों को भुगतना पड़ा, मुस्लिम देशों को भुगतना पड़ा, मुसलमान ही वह एकमात्र क़ौम थी, जो अमेरिका की सबसे अधिक उसकी ऐसी ही नीतियों के आधार पर आलोचना करती रही। अब आप फ़ैसला करें कि आलोचना करने वाली क़ौम ठीक थी या ग़लत? अगर आज आप ऐसे ही कारणों के आधार पर अमेरिका की आलोचना करना आवश्यक समझते हैं तो फिर जो क़ौम आज तक यही कार्य कर रही थी, वह ग़लत कहां थी? विकिलिक्स ने आज जो ख़ुलासे किए हैं, वह सारी दुनिया के लिए दस्तावेज़ी प्रमाण की हैसियत रखते हैं, इसलिए वह अमेरिका की आलोचना कर रहे हैं और जो क़ौम बहुत पहले ही अमेरिका की नियत को पढ़ कर इसी निष्कर्श पर पहुंची तो क्या वह सही नहीं थी? फिर अगर हम यह कहें कि हम अधिक दूरअंदेश हैं, हम दिल पर लिखी इबारत को भी पढ़ लेते हैं, आपको काग़ज़ के टुकड़े की प्रतीक्षा रहती है तो फिर क्या ग़लत होगा? अब यह फ़ैसला आपको करना है कि अमेरिका को अपनी सोच का अंदाज़ बदलने पर मजबूर किया जाए या नहीं? उसे सभी देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से बाज़ रहने के निर्देश दिए जाएं या नहीं?
मुझे कुछ वाक्य ईरान तथा सऊदी अरब के हवाले से भी लिखने हैं और भारत एवं पाकिस्तान के हवाले से भी? लेकिन पहले दो बातें विकिलिक्स प्रमुख जूलियन एसेंज ;श्रनसपंद ।ेेंदहमद्ध के संबंध में। जूलियन एसेंज ;श्रनसपंद ।ेेंदहमद्ध को गिरफ्तार करने के लिए रेड कार्नर नोटिस जारी कर दिया गया है, परंतु उस अपराध मे नहीं जिसकी चर्चा आज पूरी दुनिया में है, बल्कि उस अपराध के लिए जिसका अंदाजा किसी को था ही नहीं। इस संबंध में पहले कोई गुफ्तगू हुई ही नहीं। रेड काॅर्नर नोटिस जारी हुआ है, किसी महिला के साथ जबरन शारीरिक संबंध स्थापित करने के अपराध में और किसी के साथ छेड़छाड़ करने के आधार पर। जूलियन एसेंज ;श्रनसपंद ।ेेंदहमद्ध के वकील का कहना है कि यह आरोप झूठा है। संबंध उसकी स्वेच्छा से स्थापित किए गए थे। सच जो भी हो, संबंध स्वेच्छा से स्थापित किए गए हों या जबरन? प्रश्न यह पैदा होता है कि इस अपराध पर ध्यान पहले क्यों नहीं दिया गया। अर्थात अमेरिका पर जब तक ख़ुद आंच नहीं आई, इस आस्ट्रेलियाई युवक के इस अपराध पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। न रेड काॅर्नर नोटिस जारी हुआ और न इस यौन अपराध के समाचारों को कोई विशेष महत्व दिया गया। अब अगर यह कहा जाए कि यह अमेरिकी रणनीति का हिस्सा है, उसे जब जिसके लिए ज़मीन तंग करनी होती है तो ढेरों कारण पैदा कर लिए जाते हैं। सारी दुनिया के सामने उसका चरित्र हनन किया जाता है, उसे आरोपित ठहराया जाता है, फिर सूली पर चढ़ा दिया जाता है। यही सद्दाम हुसैन के साथ हुआ, यही बिन लादेन के साथ, स्पष्ट रहे कि बिन लादेन उस समय अमेरिका का बेहतरीन मित्र था, जब बिन लादेन सोवियत यूनियन के टुकड़े टुकड़े करने में उसकी सहायता कर रहा था और सद्दाम हुसैन उस समय अमेरिका के बेहतरीन मित्र थे, जब वह ईरान के साथ युद्ध लड़ रहे थे और अब यही विकिलिक्स के संस्थापक के साथ हो रहा है। हम नहीं जानते कि यह व्यक्ति कौन है, हमें नहीं मालूम उसके जिस अपराध के विरुद्ध रेड काॅर्नर नोटिस जारी हुआ है, उसने वह अपराध किया है या नहीं, न हम उसके बचाव में कुछ कहना चाहते। हम केवल अमेरिकी रणनीति की चर्चा कर रहे हैं। अब रहा उसका वह अपराध जो जग ज़ाहिर है, निःसंदेह किसी भी देश के ख़ुफ़िया दस्तावेज़ों को जालसाज़ी से प्राप्त करके उन्हें मंज़रेआम पर ला देना अपराध समझा जाना चाहिए, लेकिन अगर यह अपराध मानवता के हित में हो, उससे ऐसे रहस्योद्घाटन होते हों जिससे अमेरिका की दोग़ली पाॅलीसी सामने आती हो, जिन देशों को वह अपना मित्र कहता है, परदे के पीछे उन्हें भी दुश्मन की तरह देखता हो तो कम से कम वह सभी देश और उनकी जनता जो अमेरिका की सच्चाई जान कर अपने बचाव में सावधानिपूर्वक क़दम उठाने का फ़ायदा उठा सकते हैं, कम से कम वह तो विकिलिक्स की इस हरकत को कोई अपराध नहीं समझेंगे, क्योंकि इस अपराध में उनकी भलाई निहित है।
आइये अब चर्चा करते हैं सऊदी अरब द्वारा ईरान पर हमले की मन्शा तथा भारत-पाकिस्तान की संभावित जंग के हवाले से।
सऊदी अरब के शाह ईरान के विनाश के इच्छुक थे। लीक हुए ख़ुफ़िया दस्तावेज़ यह ज़ाहिर करते हैं कि वह ऐसा क्यों चाहते थे, क्या रंजिश थी या है, सऊदी बादहशाह की ईरान से। बज़ाहिर तो अमेरिका ईरान की तबाही चाहता था और अपनी इसी मनोकामना के पेशेनज़र वह ईरान को लगातार धमकी भी देता रहा, यह अलग बात है कि ईरान के राष्ट्रपति अहमदी नजाद ने इन धमकियों के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। और यह हक़ीक़त भी किससे छुपी हुई है कि सऊदी अरब अमेरिकी दबाव में है। हो सकता है अमेरिका की मंशा को समझते हुए अमेरिकी शासकों की ख़ुशनूदी प्राप्त करने के पेशेनज़र सऊदी बादशाह ने ईरान के ख़िलाफ़ ज़हर उगला हो। शायद इसी बुनियादी कारण को समझते हुए अहमदी नजाद ने विकिलिक्स के रहस्योद्घाटनों के बाद भी कहा कि सऊदी अरब से उनके संबंधों पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
अब रहा प्रश्न भारत के आलोक में हुए रहस्योद्घाटनों का तो पाकिस्तान की मंशा को समझते हुए अमेरिका पाकिस्तान की सहायता करता रहा और भारत से मित्रता का दम भरता रहा। इस समय संबंध में विस्तार के साथ गुफ़्तगू नहीं की जा सकती जबकि यह एक गंभीर विषय है जिस पर बहुत कुछ लिखा जाना चाहिए, इन्शाअल्लाह फिर कभी। लेकिन क्या अब भी हमारी सरकार अमेरिका के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार नहीं करेगी।
और अंत में कुछ वाक्य अपनी सफ़ाई में, इसलिए कि आपकी अदालत में मुझसे भी यह अपराध हुआ है कि मेरे इस मुसलसल काॅलम का सिलसिला कई दिनों तक टूटा रहा। मुबारकपुर गल्र्स डिग्री काॅलेज, आज़मगढ़ के समारोह में शिरकत तो कुछ घंटों के लिए थी और काफ़ी था कि केवल एक दिन के लिए यह सिलसिला रुक जाता, परंतु फिर कई रोज़ लगे क़लम उठाने में। दरअसल अपनी प्रकाशित होने वाली पुस्तक ‘आरएसएस की साज़िश-26/11?’, जिसका विमोचन 6 दिसम्बर को दिल्ली में होना है और यह तिथि जानबूझ कर बाबरी मस्जिद की शहादत के दिन रखी गयी, ताकि मैं इस अवसर पर दोनों घटनाओं को एक साथ जोड़ कर कुछ कह सकूं। इसलिए कुछ समय इस काम के लिए भी दरकार था, इसलिए यह सिलसिला रुका और मुबारकपुर जहां बनारसी साड़ियां बनाने के उद्योग से इस बस्ती का हर घर जुड़ा है, उनकी कठिनाइयों पर लिखने का भी वादा था मेरा, जिसे पूरा करना है। मैं प्रयत्नशील हूं उन सभी दिक़्क़तों को एकत्र करने में और शीघ्र ही इन्शाअल्लाह इस सिलसिले में न केवल लिखा जाएगा, बल्कि यह प्रयास भी किया जाएगा कि मसले का हल निकले। इसलिए कि यह हज़ारों परिवारों की रोटी रोज़ी का सवाल है और बनारसी साड़ी जो हमारी पहचान का एक हिस्सा बन चुकी है, उसकी सुरक्षा का प्रश्न भी है। साथ ही मुझे वह चेहरा, वह दर्दमंद अंदाज़, वह आंसुओं में भीगी तहरीर भी याद है, जिसमें एक बाप ने अपनी तीन जवान बेटियों के लापता होने की दास्तान बयान की है। निश्चितरूप से इस दिशा में भी जद्दोजहद की जाएगी ताकि मां-बाप अपनी बिछड़ी हुई बच्चियों से मिल सकें। दरअसल हर दिन लिखना मुझे भी अत्यंत प्रिय है, परंतु जीवन की कुछ मजबूरियां ऐसी भी हैं जो कभी-कभी इस सिलसिले को रोक देती हैं। यह सिलसिला उस समय भी टूटता है, जब मुझे आप सुनना चाहते हैं और कई बार आपके बीच न आने का एहसास भी होता है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में आयोजित ‘इंटरनेशनल कान्फ्ऱेंस आॅफ़ मौलाना रूमी’ और मेवात के घासेड़ा में आयोजित श्श्म्कनबंजपवदंस ।ूंतमदमेे - भ्मसच व िजीम दममकलश्श् में भाग न ले पाने का एहसास भी है मुझे, इन्शाअल्लाह फिर कभी। अल्लाह से दुआ कीजिए कि कुछ ऐसी सूरत पैदा हो कि न लिखने का सिलसिला रुके, न बोलना का और जो ज़िंदगी की रफ़्तार है वह भी यूं ही चलती रहे, निःसंदेह यह आपकी दुआओं के कारण ही संभव है। अन्यथा एक मामूली पत्रकार और यह काम ह्न अल्लाह, अल्लाह।
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