Thursday, December 4, 2008

किसी भी निर्णय से पहले हमारी सरकार यह तो सोचे

विश्वसनीय कौन! आतंकवादी "क़सब" या "शहीद करकरे"

पाकिस्तान पर हमला करना है तो वातावरण निर्मित है, बिना झिझक किया जा सकता है, जिस समुदाय ने पहले एक वीर अब्दुल हामिद दिया था, अब वह दस अब्दुल हामिद दे सकता है। मीजाइल मैन ऐ. पी. जे अब्दुल कलाम की दी हुई टेक्नोलॉजी भी है और मौलाना आजाद, मौलाना हसरत मोहानी व अली ब्रद्रन की छोड़ी हुई विरासत भी है। परन्तु यह युद्ध क्या भारत की किसी समस्या का हल है? क्या पाकिस्तान पर हमला करके आतंकवाद से मुक्ति पाई जा सकती है? क्या वास्तव में स्वयं आतंकवाद का शिकार पाकिस्तान भारत में होने वाले आतंकवादी हमलों में लिप्त हो सकता है? क्यूंकि पिछले दिनों आतंकवादी हमलों में पाकिस्तान ने जो खोया वो भी कुछ कम नहीं है। ताज और ओबेरॉय से पहले पाकिस्तान के होटल "मेरिअट" पर हमला हुआ तथा करकरे से पहले पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली के लिए चिंतित बेनजीर भुट्टो आतंकवादी हमलों की भेंट चढ़ गयीं। आख़िर हम यह कब सोचेंगे की यह आतंकवादी हमले किस की समस्याओं का समाधान हें, किस के मस्तिष्क कि खोज हें, किसे अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए आतंकवाद और युद्ध कि आव्यशकता है। क्या अमेरिका के अतिरिक्त किसी और का नाम आपके मस्तिष्क में आता है?

हम अगले एक वर्ष तक बराक हुसैन ओबामा के नेतृत्व वाला अमेरिका देखना चाहते हें, इस लिए पहले से स्थापित दृष्टीकोण पर अधिक बात नहीं करना चाहते हें। आज भारत में बैठ कर कोंडालिसा राइस क्या बोल रही हें और कल इस्लामाबाद जा कर क्या बोलेंगी यह हमारे लिए इतना महत्तवपूर्ण नहीं है। हाँ मनमोहन सिंह और आसिफ ज़रदारी के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है। हमें देखना होगा की बराक हुसैन ओबामा और हिलेरी क्लिंटन क्या बोल रहे हें? जहाँ तक जॉर्ज डब्लेव बुश का प्रशन है तो ९/११ के बाद उन की पर्त्येक समस्या का निदान लादेन का भूत था। जब भी वे परेशानी में होते, लादेन का कैसेट सामने आजाता, इसी प्रकार हिंदुस्तान में जब जब भारतीय जनता पार्टी परेशान होती है, बम धमाके हो जाते हें। इस समय इन बम धमाकों ने किस प्रकार भारतीय जनता पार्टी को मुसीबत से बचाया है, समूचा विश्व जनता है। वरना अब तक करकरे, अडवाणी और राज नाथ की कितनी किरकिरी कर चुके होते, समझा जा सकता है। पता नही हमारी केंद्रीय सरकार की सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो गई है अन्यथा संघ परिवार को क्लीन चिट देने के लिए वह इतनी उतावली न होती। जहाँ तक पाकिस्तान को आरोपी ठहराने की बात है और उस के लिए पाकिस्तान पर हमला किया जाना चाहिए था तो जयपुर से ले कर आसाम तक पिछले ६ महीनों में ६ से अधिक अवसर हमारे पास थे। अब रहा प्रमाणों का सवाल तो सरकार भलीभांति जानती है की वह कौन से प्रमाण हें जो पाकिस्तान के विरुद्ध हें और जिन्हें बुन्याद बना कर न केवल यह की बेहतर होते जा रहे सम्बन्ध खतरे में डाले जा रहे हें। अपितु हमला करने तक की आवाज़ें उठने लगी हें। क्या पुलिस के हाथ आए आतंकवादी का बयान शब्दश: सच्चा है? पुलिस की कार्यप्रणाली तो सब जानते ही हें। वो केवल तोते की तरह रटा हुआ बयान बोलेगा। इस के पीछे किस की इच्छा क्या है, यह इसे क्या पता। हमारी वह गुप्तचर एजेंसियाँ जिन्हें अब पल पल की ख़बर है, कहाँ तक पानी का जहाज़ आया, कहाँ से वे नावों में सवार हुए, कितने लोग थे, कैसे कपड़े पहने थे, इरादे क्या थे, कितने सटेलाईट फ़ोन थे, कितने घंटे तक बात हुई? ठीक इसी प्रकार उन्हें दस मिनट में पूर्ण जानकारी प्राप्त हो गई, जिस प्रकार वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के दस मिनट बाद सी आई ऐ और मिस्टर बुश को प्राप्त हो गई थी। जब हम यह सुनते थे की भारत नक़ल करने में निपुण है तो हमारा मस्तिष्क इस ओर नहीं जाता था की वह अमेरिकी रणनीति की भी नक़ल करेगा। अब अगर यह नक़ल करने की प्रवृत्ति इससे भी आगे तक जारी रही तो फिर पाकिस्तान के साथ युद्ध अनिवार्य नज़र आता है। इस लिए की अमेरिका पर हुए ९/११ के आतंकवादी हमले के बाद अफगानिस्तान और इराक , अमेरिकी एक्पक्ष्य युद्ध के बाद लग भग नष्ट कर दिए गए। बहाना था की अफगानिस्तान में लादेन है, और इराक में विनाशकारी हथ्यार। जाते जाते मिस्टर बुश स्वयं यह भी कह गए की इराक में विनाशकारी हथ्यार नहीं थे और यह केवल एक अफवाह थी। येही बात तो सद्दाम हुसैन ने भी कही थी तथा स्वयं उन के द्वारा भेजी गई विशेषज्ञों की हजारों पृष्ठों पर आधारित रिपोर्ट का भी येही कहना था। परन्तु क्या उन्होंने उस समय विश्वास किया? अमेरिका को हमला करना था, यह हमला हुआ, परिणाम सबके सामने है। हमले का जो कारण बीते हुए कल में अमेरिका के पास था, वही आज हमारे पास भी है। अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला इस लिए किया क्यूंकि वहां लादेन था और हम पाकिस्तान पर इस लिए हमला कर सकते हें की वहां दाऊद है। इराक को इस लिए नष्ट किया गया क्यूंकि वहां विनाशकारी हथ्यार होने की सूचना थी। हम पाकिस्तान को इस लिए नष्ट कर सकते हें क्यूंकि उस के विषय में मुंबई में हुए आतंकवादी हमले की सूचना है। "सूचना है" मैंने इस लिए लिखा की अभी विशवास करने जैसी बातें सामने नहीं आई हें। यह बयान हमारे उन सतर्क एवं कर्तव्यनिष्ठ गुप्तचर अधिकारीयों का है जिन की नाक के नीचे इतना बड़ा आतंकवादी हमला हुआ और वे सोते रहे। अब भी वे लगातार एक अविश्वसनीय बात कहते चले आरहे हें की हमला करने वालों की संख्या केवल दस थी तथा कोई स्थानीय हाथ भी इस में शामिल नहीं है। कौन मूर्ख इस बात पर विशवास करेगा की इतना बड़ा विनाश और केवल १० आतंकवादी, कोई स्थानीय सहायक नहीं। हमारे विचार में तो ताज और ओबेरॉय जैसे होटल में कोई अपनी दोस्त को पत्नी बना कर ले जाए तो यह बात भी पकड़ में आसकती है। हत्यारों का इतना बड़ा भंडार होटलों में हो और उपस्थित होटल के स्टाफ और प्रबंधनों को इस की कोई जानकारी न हो। बात कुछ हज़म नहीं होती। इस से जुडा एक प्रशन जो करना नहीं चाहते थे मगर सच की मांग है इस लिए करना आवयशक लगता है। भोपाल गैस काण्ड में एंडरसन पर मुकदमा क्यूँ? दिल्ली के उपहार सिनेमा में आग लगने पर अंसल ब्रदर्स को सज़ा क्यूँ? क्या एंडरसन कम्पनी के जिम्मेदारों ने स्वयं आकर गैस लीक की थी? क्या अंसल ब्रदर्स ने स्वयं आकर अपने सिनेमा घर में आग लगायी थी? दोनों मामलों में केवल मानवीय भूल थी परन्तु इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी। तो फिर इस से बड़ी भूल के लिए होटल ताज और ओबेरॉय के मालिक जिम्मेदार क्यूँ नहीं? माफ़ कीजिये, भोपाल गैस काण्ड या उपहार सिनेमा में आग भारत पर आतंकवादी हमला नहीं था जबकि ताज और ओबेरॉय में जो कुछ हुआ, वह भारत पर हमले से कम नहीं है। क्या भारतीय सरकार को अपनी मित्रता के लिए सब कुछ स्वीकार है या फिर कारन यह है की भोपाल गैस काण्ड और उपहार सिनेमा में आग लगने के मामले को पाकिस्तान से नहीं जोड़ा जा सकता था।

होटल ताज में हमला करने वालों ने अमेरिकी और ब्रिटिश नागरिकों की निशान्दाही चाहि और निशाना भी बनाया। क्या इस लिए की कोंडालिसा राइस और मिस्टर ब्राउन को हस्तक्षेप का अवसर मिले और यदि पाकिस्तान पर हमला करने की आव्यशकता हो तो उन की राय का दखल भी रहे। नरीमन हाउस निशाना बना क्यूंकि इजराइलियों की घृणा को इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध प्रयोग किया जा सके, क्या यह सब कुछ एक सोचे समझे षड़यंत्र का हिस्सा नहीं हो सकता? आख़िर हम इस दिशा में क्यूँ नहीं सोच रहे हैं जो इस आतंकवादी हमले का एक कारण हो सकता है? हो सकता है की यह ग़लत हो परन्तु जांच के लिए विभिन्न दृष्टिकोण सामने रखे ही जाते हें। भारत के इतिहास में यह पहला अवसर था की हिंदू संघटनों के आतंकवाद का इतना बड़ा नेटवर्क सामने आया। इस दिशा में जांच की जा रही है क्या हेमंत करकरे को रास्ते से हटाने, हिंदू आतंकवाद की घटनाओं को परदे के पीछे ले जाने और एक बार फिर मुसलमानों या इस्लामी देशों का सम्बन्ध आतंकवाद से जोड़ने के लिए यह षड़यंत्र रचा गया हो, ऐसा नहीं हो सकता।

हाँ हम वे घटनाएँ और विवरण सामने रखेंगे की जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार में फौज के बीच संघ परिवार का लिटरेचर बांटा गया, क्या उन का मस्तिष्क बदलने के लिए विशेष अवसरों पर फौज के बीच बाल ठाकरे और संघ के प्रचारक तरुण विजय को निमंत्रित नहीं किया गया। चलो कुछ देर के लिए बाल ठाकरे को राजनीति और इस सरकार का हिस्सा मान भी लें तो तरुण विजय की उपस्थिति का कारण? हमारे पास वह विवरण है जिस से स्पष्ट होता है की "RAW"और IBमें एक भी मुस्लमान नहीं था। (जिस समय की रिपोर्ट का उल्लेख हम कर रहे हें, उस समय नहीं था। हो सकता है आज कोई हो) ऐसा क्यूँ? १९३६ में भोसला मिलेट्री ट्रेनिंग कॉलेज की स्थापना की गई, कब किस ने और किस उद्देश्य के लिए की? सब कुछ सामने आया तो स्पष्ट हो जायेगा की प्रोहित और उपाध्याय जैसे लोगों को आतंक का पर्याय बनाने के लिए प्रयोग किया गया यह मिलेट्री कॉलेज।

हम इस आतंकवादी "क़सब" की बात पर विशवास करें जिस ने बताया की ५०० आतंकवादियों को ट्रेनिंग दी गयी पाकिस्तान में। या "शहीद हेमंत करकरे" की बात पर विशवास करें जिन्होंने ने बताया की प्रोहित ने ५०० आतंकवादी तैयार किए। अब निर्णय भारत सरकार को लेना है और भारतीय जनता को की यह आतंकवादी सच्चा है या शहीद हेमंत करकरे? हमला इस आतंकवादी के बयान को आधार बना कर पाकिस्तान पर किया जाना चाहिए या करकरे के इस बयान को उन की आखरी वसीयत मान कर उन लोगों पर पकड़ मज़बूत की जानी चाहिए जिन्हें वह बेनकाब कर रहे थे।

मुंबई पर आतंकवादी हमला या क्रिया की प्रतिक्रिया

"क्रिया" करकरे की जांच और "प्रतिक्रिया" करकरे की मौत

मैं आज कुछ नहीं लिखना चाहता था। जब लिखने के लिए कुछ भी न हो तब कुछ पंक्तियाँ लिखना भी बहुत कठिन होता है और जब लिखने के लिए इतना अधिक हो की कुछ पृष्ठ भी कम हों, तब भी लिखना बहुत कठिन होता है। २६ नवम्बर २००८ को जब मुंबई में आतंकवादी हमला हुआ। तब मैं भारत के बाहर था। अगले दिन सुबह "साउथ एशिया मीडिया कांफ्रेंस" में हिस्स्सा लेना था, जहाँ भारत से "आजाद हिंद" कोल्कता के संपादक और पार्लिमेंट सदस्य अहमद सईद मलीहाबादी और रोजनामा "सिआसत" हैदराबाद के संपादक जाहिद खान, व आलमी सहारा उर्दू चैनल के देवेश वर्मा भी इस कांफ्रेंस में सम्मिलित थे। रात भर मैं परेशान रहा और यह तय कर पाना बहुत कठिन था की विदेशी ज़मीन पर जब अंतर्राष्ट्रीय मीडिया उपस्थित होगा, तो मैं इस विषय पर किस प्रकार अपने विचार प्रकट करूँगा। लेकिन मुझे अपने समाचार पात्र और अपने देश का प्रतिनिधित्व करना था। इसलिए दृष्टिकोण सामने रखना भी आवयशक था, इस लिए की मुंबई पर हुआ आतंकवादी हमला लगातार मेरे मस्तिष्क पर छाया हुआ था, अतएव मैं निश्चित समय से पहले भाषण दे कर अपने साथी शकील हसन शम्सी के मित्र मोअज्ज़म शाह के कार्यालय "मीडिया बैंक" पहुँचा और इस घटना के बाद कराची में बैठ कर जो पहला लेख लिखा उस का विषय था, "हेमंत करकरे के बाद ऐ टी एस? " तब से अब तक अर्थार्त यह लेख लिखते समय तक इस विषय पर जो कुछ लिखा है, वह इस आतंकवादी हमले में शहीद हेमंत करकरे को मस्तिष्क में रख कर ही लिखा है। आज भी मैं अपने आप को इस सोच से अलग नहीं कर पा रहा हूँ, इस लिए कुछ भी लिखना बहुत कठिन नज़र आरहा था। आख़िर आप सुब इस दिशा में क्यूँ नहीं सोच रहे हैं? येही चाहता था मैं, की आज कुछ न लिखूं और इस विषय पर जितना अधिक से अधिक अध्यन कर सकता हूँ, करूँ और आप से यह प्रार्थना करूँ की इश्वर के लिए आप सब मिल कर इस दिशा में सोचें की आख़िर ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे का इन आतंकवादी हमलों में शहीद हो जाना मात्र सहयोग था या एक गहरा षड़यंत्र?


जिस प्रकार ओपेराशन बटला हाउस के बाद लग भाग पूर्ण मीडिया केवल तथा केवल एक ही पक्ष को सामने रख रहा था, वह जो पुलिस द्वारा बयान किया जारहा था, ठीक वही वस्तुस्थिति आज फिर हमारे सामने है, जो कुछ पुलिस कह रही है, वही पूर्ण मीडिया द्वारा प्रस्तुत किया जारहा है और यह प्रचार प्रसार केवल भारत तक ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँच रहा है। क्या हम यह मान लें की पूर्ण मीडिया के पास समाचारों का जो मध्यम है, वह केवल पुलिस है और पुलिस के पास इस आतंकवादी हमले के सम्बन्ध से प्रत्येक जानकारी प्राप्त होने का केवल एक ही सूत्र है और वह है उन आतंकवादी हमलों में जीवित पकड़ा गया आतंकवादी, अजमल कमाल कसाब। क्या यह सत्यवादी हरिश्चंद्र के जैसा केवल सच बोलने वाला व्यक्ति है जिसकी प्रत्येक बात पर आँख बंद कर के विश्वास कर लिया जाए। आख़िर ऐसा ही क्यूँ होता है की अधिकतर बम धमाकों या आतंकवादी हमलों के बाद सभी आतंकवादी मार दिए जाते हैं, केवल एक जीवित पकड़ में आता है व कुछ भाग जाते हैं और फिर इस एक जीवित पकड़े गए आतंकवादी को सामने रख कर पुलिस एक कहानी प्रस्तुत कर देती है और समूचा देश इस कहानी पर विश्वास कर लेता है, न अधिक जाँच पड़ताल की आव्यशकता है होती है और न किसी दुसरे दृष्टिकोण से सोचने की।


प्राप्त सूचनाओं के अनुसार ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे जब एक मीटिंग से वापस पहुंचे तो उन्हें यह सूचना दी गई की होटल ओबेरॉय पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया है, वह तुंरत होटल ओबेरॉय की ओर चले, फिर उन्हें सूचना मिली की छत्रपति शिवाजी स्टेशन पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया है, वह होटल ओबेरॉय से सी एस टी पहुंचे की रास्ते में ही एक और सूचना मिली की अस्पताल कामा सेंटर पर आतंकवादी हैं, और एक बार फिर वह एनकाउंटर स्पेशलिस्ट "सालसकर" तथा डिप्टी कमिशनर ऑफ़ पुलिस "अशोक काम्टे" के साथ कामा सेंटर की ओर चल पड़े और इस के लिए एक संकरे मार्ग का चुनाव कीया गया जहाँ तीन ओर से उन पर हमला किया गया और एक सूचना के अनुसार झाडियों में छुपे आतंकवादियों ने निशाना बाँध कर उन पर हमला किया, फिर उन्हें गाड़ी से नीचे फ़ेंक कर उस गाड़ी को लेकर भाग गए। तत्पश्चात रस्ते में एक स्कोडा कार को रोका, इसके चालक को नीचे उतारा और कार लेकर भाग गए।
मुंबई के इन आतंकवादी हमलों में मारे गए सभी लोग आतंकवादी हमलों का शिकार हुए हों, चाहे अंधाधुन्द फायरिंग द्वारा, हैण्ड ग्रेनेड द्वारा किए गए धमाकों में या अग्नि काण्ड में। टारगेट किल्लिंग अर्थार्त निशाना बाँध कर केवल तीन ही व्यक्तियों की हत्या की गई है और उन में भी प्रमुख हैं, मिस्टर हेमंत करकरे की जो वास्तव में आंखों की किरकिरी बन गए थे, संघ परिवार की विशेष रूप से लाल कृष्ण अडवानी, राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी की। इस दिशा में बात क्यूँ नहीं हो रही है? पुलिस और मीडिया इस दृष्टिकोण पर मौन क्यूँ है? जिस जीप में हेमंत करकरे, विजय सालसकर और अशोक काम्टे सवार थे उसमें एक कांस्टबल भी सवार था जिसे एक गोली लगी और जिसका उपचार हो रहा है। आतंकवादियों ने उस की जान लेना आवयशक नहीं समझा और स्कोडा कार के चालक पर भी उन की दयादृष्टि रही। आख़िर इन आतंकवादियों की हेमंत करकरे और शेष दो अधिकारीयों से ही क्या दुश्मनी थी? वह उन्हें ही क्यूँ रास्ते से हटाना चाहते थे? वह कौन था जो बार बार फ़ोन कर के या वायरलेस द्वारा संदेश भेज रहा था की करकरे ओबेरॉय पहुंचे? सी एस टी या कामा सेंटर, क्या प्रत्येक स्थान पर आतंकवादियों से निपटने के लिए महाराष्ट्र में केवल एक ही टीम और एक ही व्यक्ति था? यदि करकरे ओबेरॉय पहुँच गए थे तो सी एस टी और कामा सेंटर कोई दूसरी टीम जा सकती थी और यदि उन्हें सी एस टी भेज दिया गया था तो फिर वहां से कामा सेंटर जाने का निर्देश देना आवयशक क्यूँ था? यह निर्देश देने वाला कौन था? इस का पता लगना अत्याधिक आवयशक है। करकरे, सालसकर और काम्टे के शरीर पर कुल कितनी गोलियाँ लगीं? क्या गोलियाँ लगने के बाद उन के शरीर के फोटो लिए गए? अगर लिए गए तो वह कहाँ हैं? उनके शरीर में कितनी गोलियाँ लगीं, उन गोलियों की पहचान क्या है? क्या आतंकवादी हमलों में मरने वाले अन्य लोगों को भी वैसी ही गोलियाँ लगीं हैं? अर्थार्त जो आतंकवादी प्रयोग कर रहे थे। या उन्हें जो गोलियाँ लगीं वह पुलिस या आर्मी द्वारा प्रयोग की जाती हैं। करकरे और उन के दो साथियों की पोस्ट मोर्टेम रिपोर्ट क्या कहती है, उसे सामने क्यूँ नहीं लाया गया? अगर इन सभी प्रश्नों के उत्तर सामने आजायें तो मुंबई पर आतंकवादी हमले के राज़ से परदा हट सकता है। अभी तक इन आतंकवादी हमलों के बाद वस्तुस्थिति में जो भी परिवर्तन आया है वह यह है की २६ नवम्बर २००८ से पहले भारत में प्रत्येक ओर चर्चा का विषय था मालेगाँव जाँच प्रकरण, इस में कट्टर हिंदूवादी संघटनों का सम्मिलित होना, साध्वी, महंत और प्रोहित के लिप्त होने के प्रमाणों का सामने आना, समझौता एक्सप्रेस दुर्घटना में लेफ्टनेंट कर्नल प्रोहित का सम्मिलित नज़र आना, दयानंद पाण्डेय के लैपटॉप से संघ परिवार के इन्द्रेश और मोहन राव भागवत की हत्या के षड़यंत्र से परदा उठना, लाल कृष्ण अडवानी, राज नाथ सिंह, नरेंद्र मोदी और शिव सेना का इन आरोपियों के समर्थन में खुल कर सामने आना, शिव सेना द्वारा नयायालय ले जाते समय आरोपियों पर फूल बरसना, टी वी प्रोग्रामों में भाजपा के नेताओं का उसे सही करार देना, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के मामले को लेकर लाल कृष्ण अडवानी का प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से मिलना अर्थात इन कत्तावादी संघटनों को बेनकाब कर दिए जाने के बाद यह सब ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे से बहुत नाराज़ थे और अपने जीवन के अन्तिम दिनों में हेमंत करकरे इस सच्चाई को गहराई से समझने लगे थे। भारतीय जनता पार्टी के लिए मालेगाँव बम धमाकों का सत्य और इस के साथ ही दुसरे बम धमाकों से एक के बाद एक परदे का उठना, वबाल जान बन गया था और उन्हें यह विश्वास हो चला था की यदि वस्तुस्थिति ऐसी ही रही तो आगामी लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता उन्हें स्पष्ट रूप से नकार देगी और चुनाव उन के लिए कितना महत्त्व रखता है, इस का एक उदहारण यह भी है की मुंबई पर आतंकवादी हमलों के बाद प्रधानमन्त्री जब सर्वदलीयबैठक कर रहे थे, तब लाल कृष्ण अडवानी और राज नाथ सिंह राजस्थान में अपनी पार्टी के चुनाव प्रसार में व्यस्त थे। यह वही लोग हैं जो आतंकवाद के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की बात करते रहे हैं। क्या उन्हें लगता है की आतंकवाद के दायरे में कट्टर हिंदू संघटनों के आने का सिलसिला रुक गया है, इस लिए उन की आव्यशकता पूर्ण हो गई। मुंबई बम धमाकों के बाद हिंदू आतंकवादियों की चर्चा समाप्त हो गई इस लिए अब चुनाव का समय आते आते वह फिर अपने लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करने में safal हो जायेंगे। हमें इस विषय में अभी कुछ नहीं कहना परन्तु यह अवश्य कहेंगे की शहीदों का खून रंग लाएगा ज़रूर। बात मालेगाँव की हो या मुंबई पर आतंकवादी हमलों की, सच्चाई तो एक न एक दिन सामने आएगी ही, फिर तय होगा की मुंबई पर आतंवादी हमला पाकिस्तान और लश्करे तयबा की क्रिया थी या पहले की तरह एक्शन का रेअच्शन, क्रिया की प्रतिक्रिया। क्रिया करकरे की जाँच और प्रतिक्रिया करकरे की शहादत।

Wednesday, December 3, 2008

शहीदों के रिश्तेदार न्याय मांग रहे हैं

वह समझते हैं की जो दिख रहा है उसके परदे में सच्चाई कुछ और भी है

मुंबई के वर्त्तमान आतंकवादी हमलों में हमने ऐसा बहुत कुछ खोया है, जिस की भरपाई नहीं हो सकती. परन्तु जो कुछ पाया है यदि उस पर गंभीरता से विचार करें तो हम समझ सकते हैं की शहीदों का बलिदान निरर्थक नहीं गया यह आतंकवादी हमला, पाकिस्तान की ओर से था, लश्करे तैबा ने किया या इस में भारत से सम्बन्ध रखने वाले आतंकवादी शामिल थे, यह जांच चलती रहेगी, परिणाम आते रहेंगे परन्तु इस भयानक विनाश के बाद जो कुछ देखने को मिला, उससे अब यह आशा बंधती नज़र आती है की भारतीय जनता जागरूक हो चुकी है, उस ने आतंकवादियों के उद्देश्य को भी समझ लिया है, उस के सामने सांप्रदायिक व्यक्तियों के चेहरे बेनकाब हो गए हैं और अब राजनीतिज्ञों का राजनीती खेल भी उससे छिपा नहीं है।

मुखौटे लगाकर घूमने वाले कुछ नेता तो स्वयं अपनी करतूत से ही बेनकाब हो गए, उन के चेहरे से नकाब उठाने की आव्यशकता ही नहीं पड़ी और शेष को उन की पूर्व गतिविधियों के प्रकाश में पहचानना कठिन नहीं है। भारतीय जनता ने धर्म जाती के भेद भाव के बिना जिस प्रकार इस गंभीर स्तिथि में शान्ति व एकता का दृश्य प्रस्तुत किया वह प्रशंसिया व अनुकर्णीय है और यदि हम इस भावना को कायम रख पाये तो निश्चय ही यह बलिदान एक नए भारत को जनम दे सकता है, जहाँ शान्ति भी होगी और सांप्रदायिक एकता भी, जहाँ राजनीतिज्ञ वोट के लिए सांप्रदायिक तनाव पैदा करने में सफल नहीं होंगे इश्वर करे की ऐसा हो जाए।

परन्तु

यह भी आवयशक है की हम अत्याधिक गंभीरता से इन आतंकवादी हमलों की विवेचना करें और इस वास्तविकता को समझने का प्रयास करें की इस विनाश के पीछे कौन है, यह विनाश किस की समस्याओं का हल है तथा इस में किस के हितों का रहस्य छिपा है? मैंने अपने कल के लेख में ऐसे कुछ प्रशन उठाये थे। जिनके उत्तर सच्चाई को सार्वजनिक कर सकते हैं। यह प्रशन पिछले कई दिनों से मेरे मस्तिष्क में थे और मैं लगतार यह सोचता रहा था की इन प्रशनों को उठाया जाए की नहीं यहाँ तक की प्रकाशन से पहले मैंने अपने वरिष्ठ साथियों के बीच इन प्रशनों को रख कर उन का सुझाव भी चाहा, राय मिली जुली थी परन्तु मैं इन प्रशनों को उठाने से स्वयं को रोक न सका।

मुझे संतोष उस समय हुआ जब आज प्रात: मैं अंग्रेज़ी दैनिक "हिंदुस्तान टाईम्स" पढ़ रहा था, उस ने भी न केवल कुछ ऐसे ही प्रशन उठाये हैं अपितु पृष्ठ एक पर "वीर सांघवी" ने कुछ रहस्योद्घाटन भी किए हैं। जो हमारी सरकार की असफलता की ओर संकेत करते हैं। हम इन सभी बिन्दुओं को एकत्रित करके अपने पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करेंगे। परन्तु इस समय मैं आवयशक समझता हूँ की प्रसिद्द इतिहासकार और बुद्धिजीवी "अमरेश मिश्रा" के वे लेख अपने पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करूँ जो उन्होंने ईमेल द्वारा तीन अलग अलग टुकडों में मुझ तक पहुंचाए बहुत सम्भव है की इस आतंकवादी हमले की तह तक जाने में उन के द्वारा उठाये गए प्रशन भी अत्याधिक महत्त्वपूर्ण साबित हों।

मैं जिस "थेओरी" को बयान कर रहा हूँ, उस पर कई लोगों ने संदेह प्रकट किए हैं, शायद इन्टरनेट पर। उन्हें किसी भी व्यक्ति अथवा किसी भी चीज़ पर संदेह करने और उस के सम्बन्ध में प्रशन करने का अधिकार है। हो भी क्यों न, सही दिशा में सोचने की बुन्याद आख़िर संदेह ही तो है।

मैंने मौत की धमकी सुनी, मेरे पास घृणा से भरे मेल आए, परन्तु साहस के कारण मुझे प्रशंसाएं भी सुनने को मिलीं।

कुछ लोग इस बात को नहीं समझते की मुंबई पर आतंकवादी हमले जैसे पेचीदा हालत में जैसे जैसे नई सच्चियां सामने आती जाएँगी, नए नए दृष्टिकोण भी उभरते चले जायेंगे परन्तु इस का अर्थ यह नहीं है की किसी व्यक्ति को सरकारी अधिकारीयों की आलोचना करने से रोक दिया जाए या मीडिया की बात को नकार दिया जाए।

मेरी बुनयादी थेओरी की संघ परिवार के तत्वों ने आतंकवादी हमलों के लिए मार्ग प्रशस्त किया है, अब अधिक सशक्त हो चुकी है. वास्तव में संघ परिवार से कहीं ज़्यादा इस में मोदी का अमल नज़र आता है. जी हाँ वह हिन्दुस्तानी फासीवाद के नए और आधुनिक चेहरे हैं। वह एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने वास्तव में कई मामलों में आर एस एस को भी पीछे छोड़ दिया है, वह मोसाद के मित्र नंबर एक हैं, हाल ही में आर एस एस के एक बड़े अधिकारी ने मुझे बताया की "अमरेश हम ने अपने केद्रों के ऊपर अपना कंट्रोल खो दिया है। हम कभी नहीं चाहते थे की उरिसा और कर्णाटक में हालत काबू से बहार हो जाएँ. उरिसा के अन्दर तो हम ने ईसाई नेताओं के साथ एक साझी घोषणा जारी करने की योजना भी बनाई थी, परन्तु निचले स्टार से बगावत हो गई। वि एह पी और बजरंग दल ने हमारी बातों को मानने से इनकार कर दिया इस के बाद उन्हें मोदी जैसे व्यक्ति से समर्थन प्राप्त हो गया हम लोग असहाय रह गएबुनयादी रूप से आर एस एस ने जो संघटन खड़ा किया था, उस के ऊपर अब स्वयं उस का कंट्रोल नहीं रहा। मोदी के रूप में इस संघटन ने मोसाद से संथ गाँठ कर li है यहाँ पर इस बात को भी याद रखिये की मोसाद के सम्बन्ध विनाश में लिप्त आई एस आई में के साथ भी हैं. यह भी याद रखें की पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्यपूर्व में सक्रिय बहुत से "जिहादी" गिरोहों का रिमोट कंट्रोल या तो मोसाद (इस्राइली खुफिया एजेन्सी) के हाथ में है या फिर सी आई ऐ (अमेरिकी खुफ्या एजेन्सी) के हाथ में. हाल ही में यमन में एक ऐसे मुस्लिम "जिहादी" संघटन का पता चला है, जिसकी स्थापना मोसाद ने की थी. इसी लिए यह सम्भव है की जिन आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला किया, उन्होंने ने पाकिस्तान को अपने अड्डे के रूप में प्रयोग किया हो परन्तु उन का सम्बन्ध अलग अलग देशों से हो सकता है, उन में से कुछ ब्रिटेन के भी मुस्लमान हो सकते हैं उन में से कम से कम एक के बारे में पता चला है की वह मौरिशुस का रहने वाला है।

अब यह बात भी सामने आ रही है की साउदी अरब के एक व्यक्ति (जिसे इस समय मौलाना बेदी कहा जा रहा है) ने शायद उन "जिहादियों" को एकत्रित किया और यहाँ पर भेजा। इस मास्टर मंद को धन किस से प्राप्त हुआ होगा, यह पता लगना आवयशक है। ऐसे मास्टर मिन्ड्स की कोई विचारधारा नहीं होती। यह अमेरिका की पैदावार हैं जो पैसे के लिए काम करते हैं, बल्कि कई बार तो अमेरिकी हितों के विरुद्ध भी काम करते हैं। यह एक बार फिर एक पेचीदा परन्तु स्पष्ट तथ्य है।

स्वयं ओबेरॉय होटल के मालिक भी मोदी के घनिष्ट मित्र हैं उन्होंने गुजरात में करोरों रुपयों की पूँजी लगाई है ओपेराशन से पहले आख़िर इतने दिनों तक यह आतंकवादी कैसे ताज और ओबेरॉय में ठहरे हुए थे? इन दोनों ही पाँच सितारा होटलों में कई दिनों तक भला हथ्यार और गोला बारूद कैसे जमा किए जाते रहे? क्या कोई साधारण व्यक्ति ऐसा कर सकता है? होटल प्रबंधन की जानकारी के बिना क्या यह सब सम्भव है?

नरीमन हाउस की यदि बात करें तो मैं वास्तव में आश्चर्यचकित हूँ की मोसाद समर्थन से होने वाले ओपेराशन में यहूदियों को क्यों मारा जायेगा? लेकिन क्यूँ नहीं? मोसाद हर स्तिथि में बर्बर ज़ेओनिज़्म (यहूदीवाद) का समर्थन करता है जो के संघ परिवार के हिंदुत्व की ही तरह एक आधुनिक धार्मिक व फासीवादी विचारधारा है ज़ेओनिज़्म, जुदैज्म का भाग नहीं है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हिंदुत्व सनातन धर्म का भाग नहीं है जो की हिन्दुओं का वास्तविक धर्म है। प्रज्ञा सिंह के मामले में सनातन धर्म के लोगों ने ऐसे हिंदुत्व का विरोध किया, विशेष कर जिस प्रकार उन्होंने हेमंत करकरे को बदनाम किया।

" मोसाद" और ज़ओनिस्ट साधारण यहूदियों को मारने के लिए जाने जाते रहे हैं आख़िर हिंदुत्व विचारधारा ने महात्मा गाँधी की भी हत्या कर दी थी, क्या कोई इस से इंकार कर सकता है?

इस बात पर भी विचार करें की विश्व में बुराई का बोल बाला है क्योंकि अछे के अन्दर सोचने की कमी है। कुछ समय के लिए बुराई की ही जीत होती है क्योंकि इस के अन्दर अच्छाई से भी अधिक सोचने की क्षमता है।

जो लोग अपने आप को मोदी और अडवानी का समर्थक कहते हैं वह लोग महात्मा गाँधी के कातिलों के भी समर्थक हैं हिंदुत्व विचारधारा और राजनीती प्रारम्भ से ही धर्म निरपेक्ष राज्य का विरोध करते रहे हैं जिसकी बुन्याद १९४७ में पड़ी थी उन्होंने १९४७ में भारतीय राज्य के विरुद्ध भी बगावत की थी इस बात के प्रमाण मौजूद हैं की आर एस एस प्रमुख गोलवलकर ने मुसलमानों के विरुद्ध हमला करने के लिए ब्रिटिश सेना की सहायता की थी यह बात उस समय के उनितेद प्रोविंस (मौजूदा उत्तर प्रदेश) के गृह सचिव, राजेश्वर दयाल को बताई गई थी, जिन्होंने ने U. P. के उस समय के मुख्या मंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त को इस समाचार से सूचित किया था।

१९४७ के बाद जो मुस्लमान हिंदुस्तान में ही ठहर गए थे, उन्होंने ऐसा अपनी इच्छा से किया था। स्वयं मुसलमानों में इस बात को ले कर काफ़ी विरोधाभास था। जिस के कारण जिन्नाह और मुस्लिम लीग एक और हो गए थे जबकि दूसरे मुस्लिम उल्माओं और उन के समर्थकों ने कांग्रेस का साथ दिया था।

करकरे की मौत: अब करकरे का मामला : इस से सम्बंधित दो बातें पहले से ही आरही हैं। यह बात अब तक साफ़ नहीं है की उनको कैसे मारा गया? इस को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। करकरे की माँ टी वी पर आई और वह यह जानना चाहती थी की उनके बेटे को कैसे मारा गया। सलस्कर के चछेरे भाई ने भी यह प्रश्न उठाया।

बहादुर शहीदों के रिश्तेदार न्याय की मांग कर रहे हैं। वह यह महसूस करते हैं की जो कुछ नज़रों के सामने दिखाई दे रहा है। उससे से भी परे कोई बात अवश्य है और कहीं न कहीं करकरे, काम्टे और सलस्कर की मौत मालेगओं धमाकों की जांच से जुड़ी हुई है, जो करकरे की निगरानी में चल रही थी।

आख़िर करकरे की पत्नी और बेटे ने मोदी द्वारा घोषित की गई १ करोड़ की राशि को लेने से इनकार क्यूँ कर दिया? करकरे का यह बेटा बाद में ओबेरॉय होटल भी आया, जहाँ पर फायरिंग का सिलसिला अभी जारी था। उस ने एक बयान भी दिया जो किसी को भी पसंद नहीं आया मोदी शायद येही सोच रहे थे की उन्होंने विपक्ष की इस घड़ी में एक समस्या को दूर कर दिया जो की मध्यप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के चुनाव से पहले पैदा हुई थी जिस में आतंकवादी हमलों से पूर्व भाजपा की स्पष्ट असफलता दिखाई दे रही थी।

ज़रा सोचिये, मुंबई आने वाली नाव गुजरात सरकार की मदद के बिना वहां तक नहीं पहुँच सकती थी।

सच्चाई यह है वह सभी हिंदुत्व शक्तियां जो करकरे और पूरी मुंबई ऐ टी एस टीम को अपना निशाना बनाये हुए थी और उन्हें विल्लें और "हिन्दुओं का शत्रु" बता रही थी, वह आज अचानक उन्हें हीरो कहने लगी हैं? कैसे द्विमुखी लोग हैं! यह कुछ लोगों ने मुझे मेल भेजे हैं और कह रहे हैं की वे अडवाणी और मोदी का समर्थन करते हैं यह सभी लोग करकरे की मौत का समर्थन कर रहे हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे उन्होंने महात्मा गाँधी की मौत का समर्थन किया था। लेकिन हमें यह जानना चाहिए, हमें यह जानने का अधिकार है की कुछ हिंदुत्व वादी करकरे से घृणा रखते थे, क्या उन्होंने ने ही उन की मौत के पीछे अपना दिमाग लगाया और क्या ऐसे लोग ही उन की हत्या के लिए जिम्मेदार हैं. करकरे हमारे महान हीरो हैं. धर्म निरपेक्षता के लिए अपनी जान निछावर करने वाले शहीद हैं।

मोदी, अडवाणी और सभी सनातनी विरुद्धि हिंदू जो इन्टरनेट पर स्वयं को हिंदू कह रहे हैं, मुस्लिम दुश्मनी में लिप्त यह लोग "मालेगाँव" धमाके की जांच को देखना नहीं चाहते थे, जिस में करकरे बहुत हलद प्रवीन तोगडिया का नाम भी लेने वाले थे, यहाँ तक के छोटे राजन का भी लेकिन इस से पहले ही करकरे को रास्ते से हटा दिया गया।

विदेशी एजेंसियों के संरक्षण में सांप्रदायिक शक्तियां भारत को नष्ट कर देना चाहती हैं. अमेरिका पाकिस्तान को नष्ट कर देना और चीन का घेराव करना चाहता है इत्यादि और इस के लिए वह चाहता है की भारत भी अमेरिका और इस्राइल के प्रभाव क्षेत्र में दाखिल हो जाए इसी कारण अमेरिकियों, ब्रितानियों तथा इस्रैलियों को निशाना बनाया गया नरीमन हाउस एक ऐसा केन्द्र था जहाँ पर चश्मदीद गवाहों के अनुसार बहुत से संदिग्ध इस्राइली आया जाया करते थे इसलिए यह सम्भव है की वोही लोग आतंकवादी हमलों में भी शामिल रहे हों और उन्होंने ने ही स्वयं अपने लोगों को मार दिया हो।

मुंबई पर होने वाला आतंकवादी हमला एक बड़ा प्रयोग था अर्थार्थ भारत में मौजूद उन शक्तियों के लिए जिन में से एक भारत को खतरनाक और आत्मघाती अमेरिकी व इस्राइली प्रभाव क्षेत्र में ले जाना चाहता है तथा दूसरी वह शक्ति जो भारत को स्वतंत्र देखना चाहती है और पाकिस्तान, चीन और इरान के साथ उस के संबंधों को सुध्रुध करना चाहती है इस युद्ध में सम्मिलित प्रत्येक शक्ति का चेहरा पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं है परन्तु यह पैटर्न धीरे धीरे साफ़ होता जा रहा है भारतीय राष्ट्रीय वाद को पुन : स्पष्ट करने की आव्यशकता है अमेरिका समर्थक, इस्राइल समर्थक निति और हिंदुत्व की और भारत का धीरे धीरे झुकाव मौलाना बेदी और मूसद के लिए यह मैदान तैयार कर रहा है की वह भारत पर हमला करें भारत को उपनिवेशवाद से पूर्व की हिंदू मुस्लिम एकता और १८५७ के हिंदुत्व विरोधी राष्ट्रवाद की और वापास जन होगा।

आख़िर १८५७ की १५० वी वर्षगाँठ को भारत में इतना महत्व क्यूँ नहीं दिया गया? क्यूंकि अमेरिका समर्थक और इस्राइल समर्थक लोब्बी १८५७ को पसंद नहीं करती जो की वास्तविक भारतीय राष्ट्रवाद का सच्चा लक्षण था।

विचार कीजिये ........थोड़ा सोचिये .........हम करकरे और एन एस जी और सेना के सभी वीरों को नमन करते हैं।

Tuesday, December 2, 2008

करकरे के बाद भी क्या बेनकाब हो पाएंगे सफ़ेद पोश दहशत गर्द?

मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद गृह मंत्री शिवराज पाटिल और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम् के नारायणन के त्यागपत्र ग़लत समय पर उठाये गए सही क़दम हैं। यह दोनों त्याग पात्र ओपेराशन बटला हाउस के बाद पुलिस की कार्यशैली पर उठाये गए प्रशनों के पश्चात् आने चाहिए थे। उडीसा, मध्यप्रदेश और कर्णाटक में ईसाइयों और गिरजाघरों पर हमले के बाद आने चाहिए थे। जयपुर, अहमदाबाद, मालेगओं, दिल्ली और गुवाहाटी में हुए बम धमाकों के बाद आने चाहिए थे। भैंसा ( आँध्रप्रदेश), धुलिया (महाराष्ट्र), में सांप्रदायिक दंगे और वाटोली (आदिलाबाद) में एक फौजी के परिवार के सभी ६ व्यक्तियों को जिंदा जला दिए जाने के बाद आने चाहिए थे। इस में कोई संदेह नहीं की मुंबई पर आतंकवादी हमला इतनी बड़ी घटना है जिस के लिए गृह मंत्री शिवराज पाटिल और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को त्याग पात्र देदेना चाहिए था। परन्तु पिछली तमाम असफलताओं के बावजूद शिवराज पाटिल और एम् के नारायणन के अपने पदों पर रहते हुए ही मुंबई ऐ टी एस प्रमुख हेमंत करकरे और उन की टीम ने मालेगओं धमाकों की जांच के दौरान कुछ ऐसे रहस्योद्घाटन किए जिन से स्पष्ट हो गया था की सांप्रदायिक राजनीतिज्ञों की छत्रछाया में कुछ साधू और साध्वियों के भगवा चोलों के पीछे आतंकवाद का खेल खेला जा रहा था। खतरनाक योजनायें तैयार हो रही थी। यहाँ तक की आतंकवाद के यह खतरनाक कीटाणु इस भगवा ब्रिगेड के गंदे मानसिकता के कारन भारतीय सेना तक पहुँच गए थे। लेफ्टनेंट कर्नल प्रोहित और भूतपूर्व सेना अधिकारी उपाध्याय को गिरफ्तार किया जा चुका था। हेमंत करकरे मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों की भेंट न चढ़े होते तो शायद आतंकवाद के इस पूरे नेटवर्क को बेनकाब कर देते। परन्तु साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर पर हिरासत के दौरान हुई प्रताड़ना का बहाना बना कर विपक्ष के नेता लाल कृष्ण अडवानी का प्रधान मंत्री से मिलना और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम् के नारायणन का सफाई पेश करने के लिए लाल कृष्ण अडवानी के घर तक जाना दो ऐसी घटनाएं थी जिन्होंने इस बात का इशारा कर दिया था की अब संभवत: केन्द्र सरकार को मालेगाँव बम धमाकों के सिलसिले में चल रही ऐ टी एस की जांच पर रोक लगाने को मजबूर होना पड़े परन्तु यह सोच से परे की बात थी की जांच के प्रमुख हेमंत करकरे को एक आतंकवादी हमले में मौत के घाट उतार दिया जायेगा! क्या मोहन चंद शर्मा और हेमंत करकरे एक जैसी दुर्घटनाओं के शिकार हुए हैं। क्या आतंकवादी अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। मुंबई पर आतंकवादी हमलों में लिप्त होने का पहला आरोप दक्कन मुजाहिदीन पर आया बल्कि यह कहना ज़्यादा उचित होगा की सबसे पहले यह ज़िम्मेदारी दक्कन मुजाहिदीन ने स्वीकार की लेकिन यह नाम सामने आते ही मीडिया और बुद्धिजीवियों ने प्रशन करदिया की क्या एक अनजान संघटन जिसका सम्बन्ध केवल और केवल हैदराबाद दक्षिण तक नज़र आता है वह इतना बड़ा और भयानक हमला करसकती है तब जाकर इस मामले में पाकिस्तान के शामिल होने की बात कही जाने लगी। हम इस आरोप को न तो रद्द कर रहे हैं और न ही स्वीकार कर रहे हैं। इस आरोप से जुड़े कुछ प्रशन हैं जिनका उल्लेख करना अनिवार्य है। यदि इस के बाद यह हमला पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा किए जाना प्रमाणित हो जाए तो फिर पुलिस का बयान सच्चा और अगर उठने वाले प्रशन, परिस्थितियों और घटनाएं उस के मन घडत कहानी होने की ओर इशारा करें तो फिर निर्णय पाठकों का, हमें कुछ नहीं कहना। इस समय यह सब प्रशन केवल हमारे मस्तिष्क में ही नहीं हैं और भी लोग हैं जो इस दिशा में सोच रहे हैं की ऐ टी एस प्रमुख हेमंत करकरे के नेतृत्व में मालेगाँव बम धमाकों की जांच बहुत से ऐसे रहस्यों का परदा फाश कर रही थी जिस से साधू और संतों के चोले में छुपे आतंकवादी चेहरे बेनकाब हो रहे थे। और अब यह आग संघ परिवार ही नहीं उस की राजनितिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के दामन तक भी पहुँचने लगी थी। इस सन्दर्भ में हमारी जांच और विचार लगातार पाठकों की सेवाओं में पेश किए जाते रहेंगे। इस की पहली कड़ी के रूप में आज हम प्रकाशित कर रहे हैं हेमंत करकरे के अन्तिम संस्कार के समय दिया गया वरिष्ठ अधिकारी जूलियो रिबेरो का बयान।


करकरे अडवानी द्वारा लगाये गए आरोप से दुखी थे : जूलियो रिबेरो
हेमंत करकरे पिछले मंगलवार को मुझ से मिलने के लिए आए थे। एल के अडवाणी के इस आरोप ने उन्हें बहोत दुःख पहुँचाया था के उन के नेतृत्व में ऐ टी एस मालेगाँव बम धमाकों के केस में राजनितिक प्रभाव और अव्योहरिक ढंग में कार्य कर रहे हैं। उन्होंने ने स्पष्ट किया था की ऐ टी एस ने साध्वी प्रज्ञा सिंह के विरोध में ठोस और पक्के सबूत एकत्रित किए हैं और जांच सफल होने वाली है। अडवाणी जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता के हिंदू तत्व के झंडा बरदार बन्ने वालों के साथ मिल कर आरोप लगाने ने उन्हें आश्चर्यचकित करदिया था। हेमंत करकरे एक सच्चे हिंदू थे। वे अपने धरम पर विश्वास रखते थे और उन का विचार था की उन के सहधर्मी भी इसी प्रकार अमल करें। उन्हें इस सह दुर्घटना ने चकित कर दिया था की हिंदू तत्व का प्रचार करने वाले हिंदू धरम के आदेशों पर अमल नहीं कर रहे हैं। ऐ टी एस चीफ महाराष्ट्र एक बेहतरीन पुलिस अधिकारी थे और मैं अगर यह कहूं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी की उन की गिनती भारत के सक्षम और बहतरीन अधिकारीयों में थी। उन की ईमानदारी किसी संदेह से ऊपर है। मुंबई पुलिस का वरिष्ठ नेतृत्व निजी रूप से भ्रुष्ठ और ईमानदार अधिकारीयों में विभाजित है। हेमंत करकरे को ईमानदार अधिकारी के रूप में गिना जाता था। उनकी योग्यता और कार्यक्षमता अतियाधिक उच्याकोटी की थी। उन्हें जनता में लोकप्रियता प्राप्त रही। गढ़चिरोली में एस पी के रूप में नक्सलवादियों ने उन्हें जान से मारने का प्रयास किया था। दिल्ली बम धमाकों के बाद इंडियन मुजाहिदीन ने भी उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी। अँधेरी मोगरा पाडा में काम्बिंग ओपेराशन के समय मुसलमानों ने उन के कार्यालय का घेराओ किया था और अंतत: वह भगवा ब्रिगेड के मिथ्या आरोप का शिकार बन गए। हिंदुत्व शक्तियों ने जिहादियों के विरुद्ध कार्यवाही पर ऐ टी एस की पीठ थपथपाई परन्तु जब मालेगाँव धमाके के बाद उस ने भगवा आतंकवाद की दिशा में रुख बदल लिया तो जांच पर प्रशन उठाने शुरू कर दिए। इस में उच्य भाजपा नेतृत्व भी पीछे नहीं रहा। एल के अडवाणी ने जांच को राजनितिक प्रभाव में और अव्योहरिक करार दे दिया। करकरे इस बात से अच्छी तरह परिचित थे की इस मार्ग पर चलते हुए वह राजनीती का शिकार बन सकते हैं परन्तु उन्होंने सच्चाई का दामन हीं छोड़ा था। प्रत्येक भाजपा की सच्चाई को झुठलाने और हटधर्मी की नीति से परिचित है लेकिन जांच के दौरान होने वाले रहस्योद्घाटन उन के होश उडादेंगे। ऐ टी एस के विरुद्ध मुहीम और मालेगओं धमाके को राजनितिक रंग देने के प्रयास से भाजपा को अगले चुनाव में कुछ वोट तो प्राप्त हो सकते हैं परन्तु इस पारकर वह न्यायिक व्यवस्था के कार्य को हानि पहुँचा कर आग से खेल रहे हाँ। यदि भाजपा सत्ता में आती है तब वह ऐ टी एस द्वारा बड़े परिश्रम से एकत्रित किए गए प्रमाण और सबूतों का क्या करेगी? और क्या वह हिंदू संप्रदाय में मौजूद उग्रवादी तत्वों को आतंकवाद फैलाने की छूट देदेगी? उन्हें अपनी रोगग्रस्त मानसिकता और कार्यशैली से जन्म लेने वाली गंभीर स्तिथि पर गहराई से विचार करना होगा।
हेमंत करकरे एक योग्य और अदभुत अधिकारी थे। वह अब उन पर लगाये जाने वाले आरोप (दाग) मिटाने के लिए जीवित नहीं हैं। उन्होंने अपने सिद्धांतों के लिए अपने पर्णों की आहुति दी।
5 अलग अलग स्थान पर 60 घंटे तक तबाही

और केवल 10 आतंकवादी, बात कुछ हज़म नहीं हुई


अगर कुछ समय के लिए यह स्वीकार कर लें की हमलावर कराची (पाकिस्तान) से समुद्र के रास्ते आए थे और उनकी संख्या केवल 10 ही थी, जिन्होंने ने 5 टुकडियों में विभाजित हो कर इस आतंकवादी हमलों की कार्रवाई को अंजाम दिया। जैसा की अबतक पुलिस का बयान है। तो फिर कई ऐसे प्रशन पैदा होते हैं जिनका उत्तर पुलिस और गुजरात सरकार दोनों को देना होगा। क्या यह सम्भव है की केवल 10 नौजवान चाहे वह कितने भी प्रशिक्षित क्यों न हों, लगातार 60 घंटों तक फायरिंग जारी रखते हुए एक बड़े व शक्तिशाली देश की सेना के प्रशिक्षित कमान्डोस का मुकाबला कर सकते हैं? क्या यह सम्भव है की कराची से गुजरात होते हुए समुद्री रस्ते के द्वारा आतंकवादी भारत की सीमा में प्रवेश कर जाएँ और हमारी चौकस गुजरात सरकार का सुरक्षा दस्ता इससे बेखबर रहे। जबकि इंटेलिजेंस एजेन्सी ने पहले ही समुंदरी सिक्यूरिटी अधिकारीयों को इस बात से अवगत कर दिया था की कुछ पाकिस्तानी समुद्री जहाज़ द्वारा कराची बंदरा के रस्ते हिंदुस्तान की समुद्री सीमा में प्रवेश कर सकते हैं। इस लिए उन पर कड़ी नज़र रखी जाए। इस से पहले की हिन्दुस्तानी सिक्यूरिटी गार्ड की नज़र एक पाकिस्तानी जहाज़ पर पड़ती, आतंकवादियों ने हिन्दुस्तानी मच्छी मार जहाज़ "एम् वि कूबर" को अपने कब्जे में ले लिया और उस के सारे स्टाफ को मार कर स्वयं उस में सवार हो गए और इस प्रकार बिना किसी संदेह में आए हिंदुस्तान की समुंदरी सीमा में प्रवेश कर लिया, क्या यह हमारे सिक्यूरिटी सिस्टम पर एक प्रशन नहीं है?
पुलिस द्वारा दी गई सूचनाओं के अनुसार आतंकवादियों की टुकडी में ओपेराशन ताज के लिए 4 आतंकवादी निर्धारित किए गए थे, होटल ताज की इमारत लगभग 6 मंजिला है और उस में विविध कांफ्रेंस हाल और रेस्तोरांत इत्यादि के अलावा सेंकडों कमरे हैं। क्या यह सम्भव है की बेसमेंट से लेकर टेरिस तक यानी छत तक सभी कांफ्रेंस हाल सीढियां, लिफ्ट, किचन, जनरेटर रूम, होटल स्टाफ द्वारा प्रयोग होनेवाला व्यक्तिगत रास्ता, इन सब पर केवल और केवल चार आतंकवादियों का कब्जा हो। (उल्लेखनीय है की इन चार आतंकवादियों ने ताज होटल के मालिकान, जिम्मेदारान या देशी विदेशी अतिथियों में से किसी एक या कुछ विशेष लोगों को बंधक बना कर होटल पर कब्जा नहीं किया था और न ही इस हमले का उद्देश्य बताते हुए कुछ मांगें सामने रखी थी) उनके क्रियाकलाप से यह स्पष्ट हुआ, इससे उन का उद्देश्य केवल आतंक पैदा करना और तबाही फैलाना था लेकिन यहाँ भी एक गंभीर प्रशन यह पैदा होता है की अगर वह खून खराबा और तबाही ही मचाना चाहते थे तो बेसमेंट में पाये गए आर दी एक्स के दो कार्टन ही इमारत को उड़ा देने के लिए काफ़ी थे, उन का प्रयोग क्यूँ नहीं किया?होटल पर किए गए हमले से जुड़े दो महत्त्वपूर्ण प्रशन यह भी हैं की कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक की होटल का मालिक भी इतनी बड़ी इमारत के चप्पे चप्पे से अवगत नहीं हो सकता और न ही यह सम्भव है की दो चार लोगों द्वारा इतनी बड़ी इमारत पर कब्जा कर लिया जाए और यह कब्जा ६० घंटों तक जारी रहे, जब तक की बिल्डिंग में कोई ऐसा कंट्रोल रूम न हो जहाँ से प्रत्येक स्थान पर बैठ कर ही हर कमरे पर निगाह रखी जा सके और प्रत्येक कमरे में तबाही फैलाने के लिए बटन इस कंट्रोल रूम में हो। स्पष्ट है की होटल में न ऐसा को कंट्रोल रूम था, न होता है, न हर कमरे की गतिविधियाँ किसी एक स्थान से कंट्रोल की जा सकती हैं। सभी बड़े होटलों में तीन स्टार का सुरक्षा ता है। जब आप मुख्या द्वार से होटल में प्रवेश करने का इरादा करते हैं तो मुख्यद्वार पर इस गाड़ी की चेक्किंग बाहर मौजूद सुरक्षा दल द्वारा की जाती है, जहाँ गाड़ी का बाँट एवं दिग्गी को भी खोल कर देखा जाता है ताकि कोई आपत्तिजनक vastu होटल के अन्दर न ले जाई जा सके होटल में प्रवेश करने वाला व्यक्ति एवं उस का सामान मेटल detectar से गुज़ारा जाता है ताकि इस बात को निश्चित किया जा सके की किसी भी प्रकार का हथ्यार तो होटल के भीतर नहीं ले जाया जा रहा है इस के पश्चात् जगह जगह विशेष रूप से लिफ्ट में प्रवेश करने वालों पर निगाह रखने हेतु गुप्त कैमरे लगे होते हैं जिन के द्वारा किसी भी संदिग्ध व्यक्ति की किसी भी गतिविधि पर निगाह रखी जा सकती है। इस सब के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में हथ्यार तथा हैण्ड ग्रेनेड लेजाना कैसे सम्भव हुआ? हमारे अपने संज्ञान में तो यह भी है की होटल में ठहेरने वाले किसी भी व्यक्ति को कमरे की चाबी के रूप में जो कार्ड दिया जाता है केवल उसी कार्ड द्वारा लिफ्ट चलाई जा सकती है और इस कार्ड को प्रवेश करने पर लिफ्ट अतिथि को उसी फ़लूर तक पहुंचती है जिस पर उस के नाम अल्लोट किया गया कमरा होता है। ऐसी स्तिथि में वह व्यक्ति लोब्बी के अलावा केवल उसी floor तक जा सकता है जिस पर उस का कमरा है। अगर यह चार आतंकवादी चार अलग अलग फ़लूर पर भी ठहरे थे तब भी उन का कब्जा केवल चार फ़लूर पर ही होसकता है वह भी केवल इस स्तिथि में जब सभी कमरे एक ही राहदारी में हों और आतंकवादी के पास राहदारी के अन्तिम किनारे वाला कमरा हो और इस फ़लूर से बाहर निकलने के लिए यानी लिफ्ट अथवा जीना भी केवल एक ही हो और वह भी उस आतंकवादी के कमरे के साथ जिस पर उस का कब्जा हो, होटल ताज की बनावट के अनुसार ऐसा कुछ नहीं था अत: यह असंभव नज़र आता है. अब prashan यह उठता है वह क्या तरीका था की विदेश से आने वाले आतंकवादी इस होटल के कोने कोने से परिचित हो गए और भारी तादाद में हथ्यार लेजाने में भी इन्हें कामयाबी मिल गई? क्या यह सोचना सरासर ग़लत है, की होटल का स्टाफ एवं उस का मैनेजमेंट उस में सम्मिलित न हो तो यह असंभव लगता है क्योंकि भीतरी और प्रभावशाली व्यक्तियों की सहायता से ही आतंकवादी भूतल से लेकर छत तक सभी स्थान पर कब्जा करने और 60 घंटों तक लगातार गोली चलते रहने में कामयाब हो सकते हैं. आश्चर्य की बात यह भी है की इस दौरान उन्हें न तो सोने की आव्यशकता महसूस हुई और न ही शौच के लिए अपनी स्तिथि छोड़ने की. कहीं ऐसा तो नहीं आतंकवादियों की संख्या चार से बहुत अधिक रही हो और वह बारी बारी से आराम भी करते रहे हों, शौच आदि से भी निमटते रहे हों, अपने स्वामियों से फोन पर निर्देश भी लेते रहे हों और हमारी सेना का मुकाबला भी करते रहे हों ऐसी स्तिथि में तो हर फ़लूर पर कम से कम १० से १२ आतंकवादियों की मौजूदगी आवयशक थी और वह भी होटल स्टाफ एवं प्रबंधन की सहायता के साथ. इस सम्बन्ध में होटल स्टाफ एवं मैनेजमेंट से अब तक क्या बात की गई, इन के उत्तर क्या थे? भूतल पर आर डी एक्स कैसे पहुँचा? कमरों तक हथ्यार कैसे पहुंचे? गुप्त कैमरों की फूटेज कहाँ हैं? होटल में ठहरे हुए अतिथियों की सूची कहाँ है? गत तीन माह से कौन कौन पाकिस्तानी वहां आकर ठहरे? उनके नाम पते क्या हैं? उन्हें किस ने आमंत्रित किया? वे किस कार्य से आए? किस्से मिले? विवरण क्या है? एक सूचना के अनुसार गोधरा का नेतृत्व करने वाले भारतीय जनता पार्टी के एक सांसद भी वहां ठहरे हुए थे, कब से कब वहां रहे और रुकने का क्या कारण था? ६० घंटों तक आतंकवादी अपने स्वामियों से फोन पर निर्देश लेते रहे, अगर सेटलाइट फ़ोन के कारन यह पता लगना सम्भव नहीं था की किस से और कहाँ से बात हो रही है, तो भी जामर द्वारा वायु नेटवर्क को अप्रभावित नहीं किया जा सकता था ताकि उन का संपर्क टूट जाए? हम जानते हैं की सभी बड़ी का इंश्योरेंस होता है, उस से जो नुकसान पहुँचता है बड़ी हद तक उस की भरपाई इंश्योरेंस एजेन्सी के द्वारा की जाती है. ९/११ को अम्रीका के शहर न्यूयार्क (मेनहटन) में तबाह होने वाले वर्ल्ड ट्रेड टावर का एक स्वामी जोर्ज दब्लिव बुश का मित्र लार्री सिल्वर स्टेन था क्या व्यक्तिगत रूप से उसे उस का कोई नुकसान पहुँचा अथवा नहीं ताज पर हुए आतंकवादी हमले की जांच भी हर दृष्टिकोण पर की जानी चाहिए हम अपने इस लेख के साथ होटल ताज के कुछ चित्र जिन में होटल का बाहरी दृश्य देखा जा सकता है, की कितने फ़लूर है एवं कम से कम कितने कमरे होंगे (हमारी जानकारी के अनुसार होटल ताज में २५८ कमरे हैं और उस से जुड़े ताज महल टावर में २७७ कमरे हैं) होटल के एक कमरे का भीतरी नज़ारा, रेस्तौरांत का फोटो भी सम्मिलित है हम अपने इस लेख की आगामी किस्तों में इसी प्रकार ओबेरॉय, नरीमन हाउस, अस्पताल कामा सेंटर, से एस टी रेलवे स्टेशन और विशेष रूप से उस पतली सी गली का स्केच भी पथाक्गन की सेवा में प्रस्तुत करेंगे, जहाँ घेर कर शहीद हेमंत करकरे, सलस्कर और कामते को मारा गया तब तक आप सोचें की पाकिस्तान से आने वाले आतंकवादियों का प्रथम बड़ा शिकार आख़िर हेमंत करकरे किस प्रकार बने, वे उन्हें आख़िर किस प्रकार पहचानते थे, किसने उन की पहचान karai और paakistan से उन की दुश्मनी का क्या कारन था? विवरण के लिए प्रतीक्षा करें इसी सिलसिले की आगामी किस्तों का पुलिस के द्वारा दी गई सूचनाओं के अनुसार ५०० बार एक ही फ़ोन की घंटी बजी, जिस पर आतंकवादियों से संपर्क स्थापित करना चाहते थे आज आव्यशकता इस बात की है की उन ६० घंटों में होटल ताज से कुल कितनी बार, किस किस ने, किस किस नम्बर पर संपर्क किया और क्या इन में से कोई ऐसा भी था, जिस का सम्बन्ध भारत से भी हो और उस ने इन आतंकवादियों से भी बात की?

Monday, December 1, 2008

Even after Karkare,will the white -collar terrorists be un-masked?
Hemant karkare came to meet me on Tuesday. He was shaken by L. K. Advani's allegations that the antiterrorist squad, which he headed, had acted "in a politically motivated and unprofessional manner'' in the Malegaon blasts investigation. He explained how the ATS had stumbled on the evidence against Pragya Thakur and how the investigations developed. He was as surprised as me that a seasoned politician like Advani should have joined Hindutva's chorus against him.
Hemant Karkare was a true Hindu. He believed in his dharma. He had expected his co-religionists to believe likewise. He was astonished that the staunch proponents of Hindutva did not subscribe to the teachings of the scriptures!
Hemant Karkare was one of Maharashtra's best police officers. I dare say he was one of India's best. His integrity was unimpeachable. Mumbai policemen who have privately divided the senior police leadership into two distinct compartments-corrupt and noncorrupt-had placed Karkare squarely among the latter. His application and abilities were outstanding. Above all, he was people-oriented.
When he was SP, Gadchiroli, the Naxalites had targeted him for elimination. The Indian Muhajideen had threatened to eliminate him following his inquiries into the Delhi blasts. Muslim clerics gheraoed him in his office after he ordered combing operations in Mograpada in Andheri. And finally there was the saffron brigade.
The fidayeen, who got him, just did not know who they had killed. Hemant Karkare had rushed in to save hostages and died doing his duty.
The Hindutva forces had praised the ATS when it brought jihadi terrorists to book, conveniently targeting it only after the Malegaon investigations. L K Advani's blatant attempts to politicise the investigations for being "politically motivated and unprofessional manner'' are laughable and need to be unequivocally condemned because anyone who knew Karkare knew he was the last person to succumb to political machinations. One can understand the BJP's anxiety to obfuscate facts. The revelations during the investigations have hurt them.
The campaign against the ATS and the attempt to politicise the Malegaon investigations may help the BJP to win some votes in the coming elections but they are playing with fire by assaulting the judicial process system. What are they going to do about the mass of evidence so assiduously collected by the ATS? And will they encourage fringe elements in the Hindu community to resort to terrorism, should they come to power? They should think seriously about the consequences of their ill-conceived adventure.
In the meantime, a truly distinguished officer, Hemant Karkare, is not alive to suffer their barbs. He has laid down his life for his principles.

After terrorist attack on Mumbai resignations of central home minister Mr. Shivraj Patil and national security advisor Mr.N.K.Narainan are right steps taken at wrong time. These two resignations must have been submitted after questions raised at operation Batla House, These must have been submitted after attacks on Christians and Churches in Orissa, Madhya Pradesh and Karnataka. These must have been submitted after bomb blasts of Jaipur, Ahmedabad, Malegaon, Delhi and Gwahati. These must have been submitted after communal riots of Bhainsa (Andhra Pradesh), Dhoolia (Maharashtra), and murder of 6 family members of an Army man who were burnt to death in Vatoli (Aadilabad).
No doubt, terrorist attack on Mumbai is definitely such a big incident which requires the resignations of home minister Shivraj Patil and national security adviser N.K.Narainan. But, in-spite of last several failures, and their being continued at these posts, Mumbai ATS chief Mr. Hemant Karkare and his team, during their investigations in Malegaon bomb blastcase, did expose such facts which indicate terrorists activities by the people in the garb of Sadhus and Sadhvis under the patronage of politicians. Dangerous plans were made, to the extent that due to prevalent filthy ideology of Bhagva-Brigade, dangerous virus of terrorism inflicted Indian Army. Lt. col. Purohit and ex-military officer Upadhyaye were arrested. If Hement Karkare would not have fell victim to terrorists attack in Mumbai, then, perhaps this network of terrorism could have been exposed completely.
But meeting of leader of opposition Mr. L.K.Advani with PM with the excuse to discuss alleged atrocities on sadhvi Prigya singh Thakur in custody and subsequent meeting of national security advisor M.N.K. Narainan with Mr. L.K.Advani at his residence for clarification, were two incidents, which were indication that central government will be forced to put restrictions on investigations of ATS in Malegaon bomb-blast case. But this was a remote observation beyond imagination that Hemant Karkare will be killed in a terrorist attack. Did Hemant Karkare and Mohan Chand Sharma meet with similar type of incidents? Can terrorist cross any limits to achieve their nefarious goals?
Deccan Mujahedin were blamed first, for involvement in Mumbai terrorist attack or
It is more appropriate to say that Deccan Mujahedeen owned the responsibility for these attack first. But media and intellectuals questioned, whether an un known organization which seems to be limited in and around only Hyderabad, can perpetrate the terrorist attack of such huge horrendous scale? After this, the allegations of involvement of Pakistan were made. We are not rejecting this, neither, we admit it as acceptable. There are certain questions linked with these allegations, which are very important to be raised. If according to these, it is proved that this attack was accomplished by Pakistani terrorists, then statement of police will stand true. And if questions being raised, circumstances and incidents indicate that this is a cooked story then reader's decision will prevail. We don't want to say any thing.
At present not only We, but a number of others are also thinking on these lines that the investigations led by ATS Chief Hemant Karkare in Malegaon bomb blast case was un-veiling many secrets those terrorists who are in the garb of Sadhus and Sadhvis, their real faces being exposed and this fire was not only engulfing Sangh parivar but it was reaching upto the door steps of it's political organization BJP. In this context, we will continue to present our observations and research. As a first part of this series, we are publishing as follows, the statement of Senior Poice officer Julio Ribeiro which he gave during the last rites of Hemant Karkare.