Monday, March 22, 2010

सच तो सामने आजाएगा, मगर क्या फिर भी....?
अज़ीज़ बर्नी

बटला हाउस पर हमने जो लिखा, पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने साबित कर दिया। 26/11 और हैडली के संबंध में हमने जो कुछ लिखा वही अब साबित हो रहा है। आज ‘‘हिन्दूस्तान टाइम्स’’ में बरखादत और www.outlookindia.com में बी.रमन ने जो लिखा, वह भी हमारे दृष्टिकोण को सही सिद्ध करता है, अर्थात मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले के बाद हमने जो लिखा, वह सब सच साबित होता नज़र आ रहा है, मगर इससे क्या। हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं। खुश हो सकते हैं कि हमारा जो अंदाज़ा था, वह सही था। हमारे कुछ चाहने वाले इसे हमारी दूरदर्शिता क़रार देकर प्रशंसा कर सकते हैं, मगर बात तो तब है जब कोई परिणाम निकले। क्या बटला हाउस एंकाउंटर की अब सी.बी.आई जांच की राहें हमवार हो गई हैं? क्या इस दुघर्टना की पूरी सच्चाई अब भी सामने आ सकेगी? अगर नहीं तो क्या परिणाम इस सबका। हां, हम निराश नहीं हैं, हालात तो बदले हैं, वातावरण में सकारात्मक तबदीली आई है, परिणाम की उम्मीद भी जागी है, मगर परिणाम सामने आना भी ज़रूरी है।
इसी तरह हमने अपने पिछले लेखों में मुम्बई पर आतंकवादी हमले और हैडली के से संबंधित जो कुछ लिखा, उसकी एक हल्की सी झलक आज प्रस्तुत करने जा रहे हैं। इससे आपको अंदाज़ा हो सकता है कि आज जो बातें हमारे राष्ट्रीय मीडिया द्वारा सामने लाई जा रही हैं, आपका रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा अपने इस लगातार काॅलम के तहत बहुत पहले वह सब कुछ सामने रख चुका है। प्रस्तुत है, तब क्या लिखा, ताकि संद रहे।
एक सवाल Positive/Negative Thinking का भी है
क़िस्त-59 (तिथिः-23.12.2009)
हम मुसलमान हैं, हम हिंदू हैं, हम सिख हैं, यह सब अपनी-अपनी जगह सच है, मगर हम सब भारतीय हैं क्या यह सच नहीं है? इस देश के स्वाधीनता संघर्ष में क्या हम सब शामिल नहीं थे? जब यह देश ग़्ाुलाम था तो क्या हिंदू, मुसलमान और सिख समान रूप से फिरंगियों के अत्याचार के शिकार नहीं थे? अगर देश फिर ग़्ाुलाम हो गया तो क्या फिर हमें ऐसी कठिनाइयों का, कष्टों का सामना नहीं करना पड़ेगा? हां यह कहा जा सकता है कि भारत एक मज़बूत और बहुत बड़ा देश है, अब इसे ग़्ाुलाम बनाने का प्रयास कौन कर सकता है? अब यह प्रश्न भी मन में क्यों आया कि देश ग़्ाुलाम हो सकता है? हम चाहें तो सिरे से इस विचार को अनदेखा कर सकते हैं और इस दिशा में सोचना अनावश्यक समझ सकते हैं, मगर कोई इतिहासकार क्या यह बताएगा कि फिरंगी जब लौंग-इलायची का व्यापार करने भारत आए, जब उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी स्थापित की तो उस समय भारत के शासकों को या भारत की जनता को यह एहसास हो गया था कि वह ग़्ाुलाम हो गए हैं, या होने जा रहे हैं। हमारे विचार में बिल्कुल नहीं। उन्होंने तब ऐसा सोचा भी नहीं होगा, अन्यथा मुट्ठी भर गोरे जो व्यापार के बहाने यहां आए थे उल्टे पांव लौट जाते। न ईस्ट इण्डिया कम्पनी स्थापित होती न देश ग़्ाुलाम होता।
फिर इसके बाद ग़्ाुलामी के दौर की समीक्षा करें तो क्या यह ठीक नहीं है कि अंग्रेज़ों ने हिंदू और मुसलमानों के बीच टकराव की स्थितियां क़दम क़दम पर पैदा कीं और उन्हें यह अच्छी तरह मालूम था कि जब जब इस देश के हिंदू और मुसलमान एक होंगे, यह देश मज़बूत होगा और उनकी आशाएं पूरी नहीं होंगी। उन्हें देश को ग़्ाुलाम बनाए रखने का अवसर नहीं मिलेगा और अगर यह दोनों क़ौमें आपस में लड़ती रहीं तो देश कमज़ोर हो जाएगा, उनकी रक्षात्मक शक्ति समाप्त हो जाएगी और फिर हमारे लिए यह आसान अवसर होगा कि भारत को अपना ग़्ाुलाम बनाए रखे। क्या यही रणनीति अब भी नहीं हो सकती।
मैं गढ़े मुर्दे उखाड़ने का प्रयास नहीं कर रहा हूं। एक संक्षिप्त लेख में अंग्रेज़ों की 190 वर्ष की ग़्ाुलामी की दास्तान बयान नहीं की जा सकती, मैं केवल और केवल फिरंगियों की रणनीति की तरफ इशारा करके अपनी बात को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा हूं। हम आज़ाद हैं। हमारा देश आज़ाद है। निसंदेह अभी तक तो सच्चाई यही है, मगर क्या हम मानसिक और शारीरिक रूप से पूर्णतः आज़ादी प्राप्त कर चुके हैं? हमें अपने तमाम निर्णय लेने का अधिकार है? अपनी बातों को तर्कों के द्वारा साबित करने का प्रयास अगर हम न करें तो क्या पूरी ईमानदारी से कह सकते हैं कि हम अपने तमाम मामलों में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं? क्या हमें विश्वास है कि हम किसी साज़िश का शिकार नहीं हो रहे हैं? क्या हम भरोसे के साथ यह कह सकते हैं कि एक बार फिर भारत को कमज़ोर करने, हिंदू और मुसलमानों के बीच नफरत पैदा करने का सुनियोजित षड़यंत्र नहीं किया जा रहा है। क्या हमें इस बात का पूरा विश्वास है कि भारत के विभाजन में उस समय के भारतीय राजनीतिज्ञों के अलावा किसी विदेशी शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका नहीं थी? मुहम्मद अली जिन्ना को देश विभाजन का ज़िम्मेदार मान भी लें तो क्या लार्ड माउंट बेटन को इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार बिल्कुल नहीं ठहराया जा सकता? समय की धूल के तले दबी इस सच्चाई को हमें इतिहास के दामन में झांक कर देखना होगा। इसलिए कि अब हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न है। यह बम धमाके केवल भारत-पाकिस्तान में ही क्यों हो रहे हैं? फिलहाल मैं फ़िलस्तीन अफग़ानिस्तान और ईराक़ की बात नहीं कर रहा हूं।
अमरीका के संबंध में हमारी सोच सकारात्मक है इसलिए हम उसके बारे में कोई ग़लत बात सोच ही नहीं सकते। डेविड कोलमैन हेडली अगर एफबीआई का एजंेट है और 26/11 को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमलों में संलिप्त हैं तब भी हम अमरीका के संबंध में कोई नकारात्मक बात नहीं सोचेंगे। तहव्वुर हुसैन राना मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमलों में शामिल है, वह उससे कुछ दिन पहले मुम्बई में मौजूद होता है और 26 नवम्बर को चीन से दक्षिण कोरिया होते हुए शिकागो (अमरीका) पहुंच जाता है और हमें यह ध्यान नहीं आता कि अगर वह मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले में शामिल है तो उसे अमरीका का ही सबसे सुरक्षित ठिकाना क्यों नज़र आता है? वह अमरीका ही क्यों पहुंचता है? क्या वह आतंकवादियों के लिए पनाहगाह है? क्यों पाकिस्तान नहीं जाता? चीन से पाकिस्तान तो इतना निकट है कि सीमाएं मिली हुई हैं, वह अमरीका का ही चुनाव क्यों करता है? 26/11 को मुम्बई में बुद्धवारा पीठ पर उतरने वाले पाकिस्तानी आतंकवादियों को अपनी आंखों से देखने वाली अनीता उदय्या को ख़ुफिया तौर पर बिना पासपोर्ट और वीज़ा के अमरीका क्यों ले जाया जाता है? उससे क्या बातचीत हुई, उसे क्यों जनता के सामने नहीं रखा गया? क्यूंकि हम अमरीका के बारे में नकारात्मक राय नहीं रखते, अतः इस पर न ध्यान देते हैं, न बात करते हैं और न इसे समाचारों में विशेष महत्व दिया जाता है। एफबीआई भारत आकर 26/11 की जांच में भाग ले। हम उस पर आंख बंद करके भरोसा रखें, हमें यह विचार ही न आए कि एफबीआई इसलिए भी जांच में दिलचस्पी ले सकतीहै ताकि जान सके कि कहीं संदेह की सूई अमरीका की तरफ़ तो नहीं जा रही है? यह हमारी सकारात्मक सोच है। हेडली एफबीआई का एजेंट भी हो और लशकरे तय्यबा का भी हमारी सकारात्मक सोच हमें इस दिशा में सोचने ही नहीं देती कि क्या लशकरे तय्यबा भी एफबीआई के कंट्रोल में है? क्या उसकी एक वतहंद भी हो सकती है? किस तरह इतनी आसानी से वह अपने ऐजेंटों को लशकरे तय्यबा में दाखिल करा देते हैं और अगर यह उनके नेटवर्क का कमाल है और वह हमारे हमदर्द भी हैं तो फिर हमें यह जानकारी समय रहते देकर तबाही से बचाते क्यों नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि अफग़ानिस्तान और इराक़ को तो अमरीका ने स्वयं तबाह कर दिया, फ़िलस्तीन को ईस्राईल के ज़रिए तबाह कर दिया और अब वह चाहता है कि पाकिस्तान को भारत तबाह करे, इस तरह उसका काम हो जाए और कोई बदनामी का दाग भी उसके दामन पर न आए।
अगर है कोई जवाब इसका तो बताओ!
क़िस्त-61 (तिथिः-25.12.2009)
लाॅस एंजलिस टाइम्स, 13 दिसम्बर
टाइम लाइन आॅफ़ डेविड कोलमेन हेडली-अमेरिकी सरकार तथा अदालत के दस्तावेज़ के अनुसार
2005: हेडली लश्कर-ए-तय्यबा के लिए काम करने और भारत की यात्रा की निगरानी के लिए तैयार हो गया।
2006 फरवरीः अपना नाम दाऊद गीलानी से बदल कर डेविड हेडली कर लिया ताकि भारत में स्वयं को अमेरिकी के रूप में पेश कर सके जो ना तो मुसलमान है और ना ही पाकिस्तानी।
2006 जून: शिकागो में अपने मित्र तहव्वुर राना से भारत में राना के इमेग्रेशन के धंधे की खाता खोलने की अनुमति।
2006 सितम्बर: भारत में कई सप्ताह तक रहा और फिर पाकिस्तान रवाना हुआ।
2007 फरवरी: कई सप्ताह तक भारत की यात्रा की और फिर पाकिस्तान रवाना।
2007 सितम्बर: कई सप्ताह तक भारत की यात्रा की और फिर पाकिस्तान रवाना।
2008 अप्रैल: लश्कर-ए-तय्यबा के कहने पर कई सप्ताह तक भारत की यात्रा पर रहा। मुम्बई के तटयीय क्षेत्रों की निगरानी के लिए नाव से निगरानी की। अधिकारियों का कहना है कि हेडली द्वारा तैयार वीडियो का प्रयोग 10 आतंकवादियों ने किया।
2008 जुलाई: कई सप्ता तक भारत में रहा और फिर पाकिस्तान रवाना।
2008 अक्तूबर: डनमार्क के अख़बार में प्रकाशित ख़ाके के बाद लंीवव पर एक बिक्षन ग्रूप पर अपने जवाब के बाद एफबीआई ने नज़र रखनी शुरू की।
फरवरी: पाकिस्तान के आदीवासी क्षेत्र में गया जहां पाकिस्तानी सेना के मेजर अब्दुर्रेहमान हाशिम सय्यद ने लश्कर-ए-तय्यबा के लोगों से मिलवाया। जून में वापस शिकागो आने से पूर्व हेडली ने अपनी रज़ामंदी से राना को सुचित किया।
15 अगस्त: कूपन हेगन की यात्रा के बाद एटलांटा पहुंचा।
3 अक्तूबर: शिकागो से पाकिस्तान रवाना होने से पूर्व गिरफ़्तार।
पुश्कर, गोआ, पुणे, मुम्बई तथा दिल्ली (जिन शहरों में हेडली रुका था), हर जगह चबाड हाउस के आस पास।
उपरोक्त समाचार एक अमेरिकी अख़बार ‘‘लाॅस एंजलिस टाइम्स’’ में 13 दिसम्बर को प्रकाशित हुआ और कल इस काॅलम के तहत प्रकाशित किया गया लेख वीर संघवी का था, जो 20 दिसम्बर 2009 को अंग्रेज़ी दैनिक ‘‘हिंदुस्तान टाइम्स’’ में प्रकाशित हुआ -और- अब मुलाहिज़ा फ़रमाऐं मेरा आज का लेख और अपने विचारों से भी अवगत कराऐं। लेख की समाप्ति पर मेरा फोन, फैक्स, ई-मेल ब्लाग मौजूद है, और हां इस पेज की पेशानी के साथ प्रकाशित किया जाने वाला ‘हेडली’ के पासपोर्ट का चित्र अवश्य देखें जिस पर अमेरिका से जारी होने की तिथि स्पष्ट रूप में नज़र आ रही है।
कौन है वास्तविक आतंकवादी क्या मैं पूछ सकता हूं
क़िस्त-67 (तिथिः-01.01.10)
अब तक आप पढ़ चुके हैं, किसने बदलवाया उसका नाम और धर्म..... किसने दिया उसे बाप का नया नाम..... किसने बनवाया दूसरा पासपोर्ट..... किसने दिलवाया वीज़ा..... किसने उपलब्ध कराये फ़र्ज़ी दस्तावेज़..... किसने दिलवायी लश्कर-ए-तय्यबा के कैम्पों में टेªनिंग..... किसने भेजा एक सज़ायाफ़्ता अपराधी को हिन्दुस्तान..... किसने रचा हिन्दुस्तान आने का बहाना..... किसने बनवाया केवल एक सप्ताह पूर्व तहव्वुर हुसैन राना का पासपोर्ट..... किसके कहने पर खुली मुम्बई में ‘‘फस्र्ट वल्र्ड इमीगिरेशन सर्विसिज’’..... किसने पैठ कराई हेडली की यहूदियों के ठिकानों तक..... किसने उसे मुम्बई अमेरिकन कौन्सिलेट के पास घर दिलाया..... क्यो उसका अमेरिकन कौन्सिलेट में बिना किसी रोक-टोक के आना जाना था..... किसने उसे हिन्दुस्तान में गिरफ्तारी से बचाया..... किसने उसे हिन्दुस्तानी खुफिया अधिकारियों से बात करने से रोका और क्यों..... कौन हैं जो हिन्दुस्तान में तबाही मचाने वाले इस खतरनाक आतंकवादी को हिन्दुस्तान के हवाले नहीं करना चाहता.....?
इनमें से कौन सा सवाल है ऐसा, जिसका जवाब आप नहीं जानते या हमारी खुफिया एजेंसियां नहीं जानतीं या हमारी सरकार नहीं जानती..... अगर है कोई ऐसा प्रश्न तो कृपा करके पढ़िये ‘‘रोज़नामा राष्ट्रीय सहरा’’ में मेरे क़िस्तवार लेख ‘‘आज़ाद भारत का इतिहास’’ की क़िस्त न. 60 (24.12.09) ‘‘यह लेख मेरा नहीं है मगर.....’’, क़िस्त न. 61 (25.12.09) ‘‘अगर है कोई जवाब इसका तो बताओ’’, क़िस्त न. 63 (27.12.09) ‘‘जो हमने लिखा वही पूर्व डी.जी.पी पश्चिमी बंगाल ने भी!’’, जो दी हुई तारीख़ों में प्रकाशित हुए। इसके अतिरिक्त आप देख सकते हैं ‘‘हिन्दुस्तान टाइम्स’’ में वीर संघ्वी का लेख "Did America Keep mum on 26/11?"], 20 दिसम्बर 2009। ‘‘लाॅस एंजलेस’’ 13 दिसम्बर 2009। हिन्दी रोज़नामा ‘‘संमार्ग’’ में लेखक दिनेश चन्द्र वाजपेयी, पूर्व डायरेक्टर जनरल पुलिस, पश्चिमी बंगाल, कोलकाता का लेख ‘‘26/11, हेडली और अमेरिका’’। श्रीलंका के अख़बार ‘‘श्रीलंका गार्जियन’’ में बी. रमन का लेख (Headley case: India as a soft state"] , 20 दिसम्बर 2009। ‘‘भारत बचाओ आंदोलन’’ संगठन की प्रेस Mumbai 26/11 Terror Attack"] , 26 दिसम्बर 2009।(Indo-Asian News Service) की 24 दिसम्बर 2009 की रिपोर्ट।
ध् क्या अब भी हिन्दू और मुसलमानों के बीच नफ़रत की दीवार खड़ी रहनी चाहिए?
ध् क्या अब भी हमें असली आतंकवादियों को और उनके इरादों को नहीं समझना चाहिए?
ध् क्या अब भी हमें हिन्दुस्तान को तबाह और बरबाद करने वालों से जवाब तलब नहीं करना चाहिए?
और..........
ध् क्या अब भी हमें बिना भेदभाव के एकजुट हो कर अपने देश की सुरक्षा के लिए तैयार नहीं हो जाना चाहिए?
सोचो अख़िर कब सोचोगे!
अब एक आख़िरी बात.........
हम क्यों यह समझते हैं कि डेविड कौलेमेन हेडली डेनमार्क के कार्टूनिस्ट को मारना चाहता था, इसलिए एफ.बी.आई ने उसे गिरफ्तार किया। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अपने मुख़बिर, अपने जासूस, अपने पोषक आतंकवादी को एक कट्टर मुसलमान के रूप में प्रस्तुत करके गुमराह करने का यह एक षड़यंत्र हो और उसे हिन्दुस्तान को सुपुर्द न करने का बहाना। जांच का सिलसिला जारी रहेगा और लेखों का भी, परन्तु आज के लिए बस इतना ही।

3 comments:

Suman said...

.nice

Tarkeshwar Giri said...

agar aap jaise soch sabhi musalaman bhai aur hindu rakhne lage to shyad dubara aise naubat nahi aayegi.

DR. ANWER JAMAL said...

nice post.
http://vedquran.blogspot.com/2010/03/is-kaba-ancient-sacred-hindu-temple.html