Friday, December 25, 2009

अगर है कोई जवाब इसका तो बताओ!



लॉस एंजलिस टाइम्स, 13 दिसम्बर



टाइम लाइन ऑफ़ डेविड कोलमेन हेडलीअमेरिकी सरकार तथा अदालत के दस्तावेज़ के अनुसार


2005: हेडली लश्कर-ए-तय्यबा के लिए काम करने और भारत की यात्रा की निगरानी के लिए तैयार हो गया।


2006 फरवरीः अपना नाम दाऊद गीलानी से बदल कर डेविड हेडली कर लिया ताकि भारत में स्वयं को अमेरिकी के रूप में पेश कर सके जो ना तो मुसलमान है और ना ही पाकिस्तानी।


2006 जून: शिकागो में अपने मित्र तहव्वुर राना से भारत में राना के इमेग्रेशन के धंधे की खाता खोलने की अनुमति।


2006 सितम्बर: भारत में कई सप्ताह तक रहा और फिर पाकिस्तान रवाना हुआ।


2007 फरवरी: कई सप्ताह तक भारत की यात्रा की और फिर पाकिस्तान रवाना।


2007 सितम्बर: कई सप्ताह तक भारत की यात्रा की और फिर पाकिस्तान रवाना।


2008 अप्रैल: लश्कर-ए-तय्यबा के कहने पर कई सप्ताह तक भारत की यात्रा पर रहा। मुम्बई के तटयीय क्षेत्रों की निगरानी के लिए नाव से निगरानी की। अधिकारियों का कहना है कि हेडली द्वारा तैयार वीडियो का प्रयोग 10 आतंकवादियों ने किया।


2008 जुलाई: कई सप्ता तक भारत में रहा और फिर पाकिस्तान रवाना।


2008 अक्तूबर: डनमार्क के अख़बार में प्रकाशित ख़ाके के बाद Yahoo पर एक बिक्षन ग्रूप पर अपने जवाब के बाद एफबीआई ने नज़र रखनी शुरू की।
फरवरी: पाकिस्तान के आदीवासी क्षेत्र में गया जहां पाकिस्तानी सेना के मेजर अब्दुर्रेहमान हाशिम सय्यद ने लश्कर-ए-तय्यबा के लोगों से मिलवाया। जून में वापस शिकागो आने से पूर्व हेडली ने अपनी रज़ामंदी से राना को सुचित किया।


15 अगस्त: कूपन हेगन की यात्रा के बाद एटलांटा पहुंचा।


3 अक्तूबर: शिकागो से पाकिस्तान रवाना होने से पूर्व गिरफ़्तार। पुश्कर, गोआ, पुणे, मुम्बई तथा दिल्ली (जिन शहरों में हेडली रुका था), हर जगह चबाड हाउस के आस पास।


उपरोक्त समाचार एक अमेरिकी अख़बार ‘‘लॉस एंजलिस टाइम्स’’ में 13 दिसम्बर को प्रकाशित हुआ और कल इस कॉलम के तहत प्रकाशित किया गया लेख वीर संघवी का था, जो 20 दिसम्बर 2009 को अंग्रेज़ी दैनिक ‘‘हिंदुस्तान टाइम्स’’ में प्रकाशित हुआ -और- अब मुलाहिज़ा फ़रमाऐं मेरा आज का लेख और अपने विचारों से भी अवगत कराऐं। लेख की समाप्ति पर मेरा फोन, फैक्स, ई-मेल ब्लाग मौजूद है, और हां इस पेज की पेशानी के साथ प्रकाशित किया जाने वाला ‘हेडली’ के पासपोर्ट का चित्र अवश्य देखें जिस पर अमेरिका से जारी होने की तिथि स्पष्ट रूप में नज़र आ रही है।


पासपोर्ट एक ऐसी पहचान है, जो अपने देश के बाहर सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इससे न केवल आपकी पहचान जुड़ी होती है, बल्कि आपके देश की पहचान भी। आप किस देश के नागरिक हैं, इसको अलग-अलग दृष्टि से देखा जाता है, जैसे अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड तथा यूरोप में इतने मधुर संबंध हैं कि बिना रोक-टोक एक देश का नागरिक दूसरे देश में आ जा सकता है। उनमें से अधिकांश देशों के बीच तो वीज़ा की आवश्यकता भी नहीं होती, लेकिन कुछ देश ऐसे हैं जहां के निवासियों को कहीं भी आने-जाने के लिए न केवल वीज़ा दरकार होता है, बल्कि वीज़ा देने से पूर्व अच्छी ख़ासी छान-बीन भी की जाती है। कई चरणों से गुज़रना पड़ता है। दुर्भाग्य से भारत भी एक ऐसा ही देश है और पाकिस्तान के रहने वालों की कठिनाइयां तो इससे भी कहीं अधिक हैं। जब से यह आतंकवाद की बीमारी चली है, पाकिस्तान बार-बार आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त नज़र आया है और इस आतंकवाद ने पिछले कुछ वर्षों में ख़ुद पाकिस्तान को भी विनाश के कगार पर पहुंचा दिया है। इस विनाश में बेनज़ीर भुट्टो की आतंकवादी हमले में हत्या भी शामिल है, इसलिए पाकिस्तानियों को कोई भी देश वीज़ा देने से पूर्व अच्छी तरह उसके बारे में जांच पड़ताल कर लेना आवश्यक समझता है। भारत तो पाकिस्तानी नागरिकों के अपने देश में क़दम रखने पर अत्यधिक सचेत रहता है और उसे रहना भी चाहिए, क्योंकि बार-बार के कटु अनुभव ने हमें ऐसा करने पर विवश कर दिया है। यही कारण है कि जब ‘‘अंसार बर्नी’’ जैसे विश्व प्रसिद्ध पाकिस्तानी भारत में जामा मस्जिद यूनाइटिड फोरम की ओर से आयोजित एक अन्तराष्ट्र्रीय सेमिनार में भाग लेने के लिए आते हैं तो उन्हें बावजूद पासपोर्ट और वीज़ा होने के एयरपोर्ट से ही वापस लौट जाना पड़ता है। अंसार बर्नी यानी वह पाकिस्तानी नागरिक जो पाकिस्तान में क़ैद भारतीय क़ैदियों की रिहाई के लिए दिन-रात सक्रिय रहे हैं और उनकी सक्रियता के कारण पाकिस्तानी सरकार तथा जनता का एक वर्ग उन्हें नापसंदीदगी की नज़र से देखता है। उन्होंने सरबजीत सिंह और कशमीर सिंह की रिहाई के लिए दिन-रात एक कर दिया, वह अंसार बर्नी जो इस सेमिनार के निमंत्रण से कुछ महीने पहले जब पंजाब पहुंचे तो भारतीय जनता ने पग-पग उनका उल्हासपूर्ण स्वागत किया परन्तु अगली बार भारत आगमन के अवसर पर घंटों एयरपोर्ट पर रुक कर विभिन्न प्रश्नों का सामना करना पड़ा। और फिर भी शहर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली, एयरपोर्ट से ही वापस लौट जाना पड़ा। यहां यह ख़ुलासा भी आवश्यक है कि इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के मेज़बान यहया बुख़ारी यानी पूर्व शाही इमाम सय्यद अब्दुल्ला बु़ख़ारी के पुत्र और वर्तमान शाही इमाम अहमद बुख़ारी के भाई थे और उस अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में केंद्रीय सरकार के मंत्रियों को भी शामिल होना था। फिर भी अधिकारियों ने अपने देश की सुरक्षा के महत्व को समझते हुए किसी प्रकार की नर्मी बरतना उचित नहीं समझा। हो सकता है कि इसका कारण कोई भ्रम रहा हो या एयरपोर्ट पर तैनात अधिकारियों की सख़ती? कारण जो भी हो, मन में देश की सुरक्षा ही रही होगी, इसके सिवा कुछ और नहीं। यह उदाहरण मैंने क्यों दिया और इसके इतने ख़ुलासे क्यों पेश किए, यह समझने के लिए मेरे इस लेख के अगले वाक्य को अत्यंत गंभीरतापूर्वक तथा ध्यान से पढ़ना होगा, इसलिए कि यही वह एक वाक्य है, जिसको अपने पाठकों, भारत सरकार और 26/11 की जांच करने वाले अधिकारियों तक मैं पहुंचाना चाहता हूं।

दाऊद गीलानी लगभग 11 वर्ष की आयु से 16 वर्ष की आयु तक पाकिस्तान में रहा, फिर उसकी यहूदी मां शेरेल हेडली उसे अपने साथ अमेरिका ले गई। उस समय दाऊद गीलानी के पास पाकिस्तानी पासपोर्ट था या अमरीकन पासपोर्ट, यह जानकारी बेहद ज़रूरी है क्योंकि उसने जिस पासपोर्ट से भारत और पाकिस्तान में यात्राऐं कीं वह तो अमरीकन पासपोर्ट है और 10 मार्च 2006 को जारी किया गया है। गिलानी उर्फ हैडली 1998 में एफ।बी।आई के द्वारा मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में पकड़ा गया, सज़ा हुई, फिर अमेरिका की गुप्तचर एजेंसी एफबीआई ने तय किया कि उसे अपना अंडर कवर एजेंट बनाकर पाकिस्तान भेजना है, इसीलिए असाधारण रूप में उसकी सज़ा दो वर्ष से भी कम कर दी गई, जबकि अमेरिका में मादक पदार्थों की तस्करी एक बहुत बड़ा अपराध है और ऐसे अपराधी की इतनी जल्दी रिहाई संभव नहीं है। एफबीआई क्यों दाऊद गीलानी से इतना प्रभावित थी और उस पर इतनी कृपा का क्या कारण था? इस रिहाई के लिए उससे क्या सौदा हुआ था? यह सब तो एफबीआई या डेविड कोलमेन हेडली ही बेहतर जानते होंगे, मगर जो सूचनाएं आम हैं, वह यह कि इस रिहाई के बाद एफबीआई ने दाऊद गीलानी को डेविड कोलमेन हेडली के नाम से एक नए अमेरिकी पासपोर्ट द्वारा पाकिस्तान भेजा और लश्कर-ए-तय्यबा जैसी कुख्यात आतंकवादी संस्था में प्रवेश करा दिया।....... हमारे विचार में पाकिस्तान पहुंचकर लश्कर-ए-तय्यबा में शामिल होने के लिए दाऊद गीलानी नाम और पाकिस्तानी नागरिक होना ज़्यादा ठीक होता, इसलिए कि अगर लश्कर-ए-तय्यबा एक मुस्लिम आतंकवादी संस्था है तो उसके लिए एक अमेरिकी यहूदी के मुक़ाबले एक पाकिस्तानी मुसलमान अधिक विश्वसनीय होता। अब उसका क्या कारण समझा जाए? क्या एफबीआई को यह विश्वास था कि वह एक अमेरिकी यहूदी को भी सहजता पूर्वक लश्कर तय्यबा में प्रवेश दिला सकती है। क्या लश्कर-ए-तय्यबा उनके हुक्म की पाबन्द है? क्या लश्कर-ए-तय्यबा में उनकी इतनी पहुंच है कि उनका कोई भी एजेंट इतनी सहजता से उसमें शामिल हो सकता है। सोचते रहिए इस प्रश्न पर फिर आपकी सदबुद्धि जो भी उत्तर दे।


मुझे अगली बात जो कहनी है और जिसके लिए मैंने अन्सार बर्नी का उदाहरण दिया था, वह यह कि आज सारी दुनिया जानती है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध कैसे हैं? भारत से पाकिस्तान जाने वालों या पाकिस्तान से भारत आने वालों को सीमाओं पर कितनी जांच-पड़ताल की आवश्यता पड़ती है। हो सकता है मेरा यह विचार पूर्णतः ग़लत हो, मगर क्या यह बात ध्यान देने योगय नहीं है कि क्या एफबीआई ने यही सोच कर दाऊद गीलानी को जो अपनी मां का धर्म गृहण करके एक यहूदी डेविड कोलमेन हेडली बन गया था। उसे एक नया अमेरिकी पासपोर्ट उपलब्ध कराया हो, क्योंकि एफबीआई अच्छी तरह जानती है कि भारत में किसी भी पाकिस्तानी के लिए प्रवेश करना कितना कठिन है और अगर वह आतंकवादी है और पकड़ में आ जाता है तो कितने भेद उगल सकता है?, जबकि अमेरिकी पासपोर्ट पर आने वाले किसी भी ईसाई अथवा यहूदी के लिए हमारे देश में वैसी जांच पड़ताल नहीं होती, उसे सहजता पूर्वक प्रवेश मिल जाता है। शायद यही कारण था कि एक मादक पदार्थों का तस्कर, एक एफबीआई का एजेंट, एक लश्कर-ए-तय्यबा का आतंकवादी 9 बार भारत में प्रवेश करने में सफल हो गया। क्या हमें इस दिशा में विचार नहीं करना चाहिए कि एक सज़ायाफ्ता मुजरिम जिसे ख़ुद एफ।बी।आई ने मादक पदार्थो की तस्करी में पकड़ा, क्यों उसे अमेरिकी पासपोर्ट उपलब्ध कराया गया। वह क्यों 9 बार भारत आया। अमेरिका के बीच मधुर संबंध होने के बावजूद भी एफबीआई द्वारा भारतीय सरकार या हमारी गुप्तचर एजेंसियों को उसकी वास्तविकता क्यों नहीं बताई गई कि उसका संबंध लश्करे तय्यबा से है? इतना ही नहीं जब स्वयं एफबीआई ने अपनी जांच के आधार पर यह जान लिया कि हेडली का संबंध 26/11/2008 को भारत में मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमलों से है तो, क्यों नहीं उसी समय यह जानकारी भारत सरकार को दे दी गई? उसे क्यों भारत से भाग कर अमेरीका पहुंचने का अवसर प्रदान किया गया? क्या उसे भारत में गिरफ़्तारी से बचाने के लिए? क्या 26/11 से उसके संबंध को भारतीय गुप्तचर एजेंसियों के सामने न आने देने के लिए, क्या एफबीआई के एजेंट के रूप में उसने जोõजो किया उसे पर्दे में ही रहने देने के लिए? और अब वह आतंकवादी जो 26/11 के लिए ज़िम्मेदार है, अमेरिका की पकड़ में है या क़ैद में है, उनका क़ैदी है या अमेरिकी जेल उसके लिए शाही महमानख़ाना? यह तो उसके और अमेरिकी सरकार के बीच ही रहेगा, मगर इस सच से कौन इन्कार करेगा कि भारत में गिरफ़्तार होने की बजाय डेविड कोलमेन हेडली और अमेरिका दोनों ने ही अमेरिकी जेल को अधिक बहतर समझा।.................

1 comment:

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही विचारणीय आलेख......