Saturday, December 19, 2009

लो क़साब तो मुकर गया, अब क्या कहेंगे आप!

जी हां, मेरे पास डेविड कोलमैन हेडली उर्फ़ दाऊद सय्यद गिलानी उसके पाकिस्तानी पिता सय्यद सलीम गिलानी और उसकी अमेरिकन यहूदी माँ सेरिल हेडली erill Hedly के विषय में कई विस्फ़ोटक जानकारियाँ हैं और आज का लेख ‘‘26/11, हेडली और एफ.बी.आई आखि़र इनमें सम्बंध क्या है?’’ को सामने रख कर ही लिखा जाना था, बल्कि बड़ी हद तक लिखा भी जा चुका था, मगर इस बीच अजमल आमिर क़साब ने अपना बयान बदल कर मेरा इरादा बदल दिया, अतः मुझे आवश्यक लगा कि एक वर्ष से अधिक अवधि तक सारा भारत, बल्कि सारी दुनिया जिस एक आतंकवादी के बयान को सामने रख कर ही मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमलों के बारे में सोचती रही, आखि़र अब उसके बयान बदल जाने के बाद हमारी पुलिस, गुप्तचर विभाग, भारत सरकार और विपक्ष के नेतागण क्या कहेंगे जो अजमल आमिर क़साब के बयान को इतना सच्चा मान रहे थे कि उससे अलग हट कर बात करने वाला कोई भी व्यक्ति उन्हें बर्दाशत नहीं था बल्कि कुछ लोगों को तो वे लोग देश के शत्रु दिखाई देते थे।


इस लेखक ने उस समय भी अजमल आमिर क़साब के बयान पर प्रश्न उठाये थे और अनेक लेखों में इस बात का स्पष्ट संकेत दिया था कि केवल क़साब के बयान को सच्चा मान कर चलना ही काफ़ी नहीं होगा, बल्कि वास्तविकता को जानने के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों से जांच आवश्यक है, अतः आज आवश्यक लगता है कि केवल अपने पाठक ही नहीं बल्कि भारतीय जनता (भारत सरकार सहित) एक बार फिर उन लेखों के अंश प्रकाशित किये जायें और फिर डेविड हेडली के साथ-साथ अजमल आमिर क़साब के ताज़ा बयान पर भी बात हो।


अतः प्रस्तुत है पहले एक पैराग्राफ़ जो 4 दिसम्बर 2008 को राष्ट्रीय सहारा में मेरे क़िस्तवार कोलम ‘‘मुसलमानाने हिन्द, माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल ???’’ की क़िस्त 90 में ‘‘मुम्बई पर आतंकवादी हमला या क्रिया की प्रतिक्रिया - ‘क्रिया’ करकरे की जांच और ‘प्रतिक्रिया’ करकरे की मौत’’ के शीर्षक से प्रकाशित किया गया और दूसरा लेख मेरे एक और क़िस्तवार लेख ‘‘दास्ताने हिन्द, माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल ???’’ की क़िस्त 89 में ‘‘मैं हूँ अजमल आमिर क़साब’’ के शीर्षक से प्रकाशित किया गया। हालांकि उपरोक्त दूसरा लेख एक ‘व्यंग्य’ था मगर इसके माध्यम से जिस गम्भीर बात की ओर संकेत किया गया उसे आज भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। क्या आप भी ऐसा ही सोचते हैं या नहीं ?


(04।12.2008)


जिस प्रकार आपरेशन बटला हाउस के बाद लगभग पूर्ण मीडिया केवल तथा केवल एक ही पक्ष को सामने रख रहा था, वह जो पुलिस द्वारा बयान किया जा रहा था, ठीक वही वस्तुस्थिति आज फिर हमारे सामने है, जो कुछ पुलिस कह रही है, वही पूर्ण मीडिया द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है और यह प्रचार-प्रसार केवल भारत तक ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच रहा है। क्या हम यह मान लें कि पूर्ण मीडिया के पास समाचारों का जो माध्यम है, वह केवल पुलिस है और पुलिस के पास इस आतंकवादी हमले के संबंध से प्रत्येक जानकारी प्राप्त होने का केवल एक ही सूत्र है और वह है उन आतंकवादी हमलों में जीवित पकड़ा गया आतंकवादी, अजमल आमिर कसाब।


क्या यह सत्यवादी हरीश चंद्र के जैसा केवल सच बोलने वाला व्यक्ति है जिसकी प्रत्येक बात पर आंख बंद करके विश्वास कर लिया जाए। आख़िर ऐसा ही क्यों होता है कि अधिकतर बम धमाकों या आतंकवादी हमलों के बाद सभी आतंकवादी मारे जाते हैं, केवल एक जीवित पकड़ में आता है व कुछ भाग जाते हैं आरै फिर इस एक जीवित पकड़े गए आतंकवादी को सामने रख कर पुलिस एक कहानी प्रस्तुत कर देती है और समूचा देश इस कहानी पर विश्वास कर लेता है, न अधिक जांच पड़ताल की आवश्यकता होती है और न किसी दूसरे दृष्टिकोण से सोचने की।


(26।07.2009)


मैं अपराध स्वीकार करता हूं कि 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले का जिम्मेदार मैं हूं। मुझे न अदालत से दया की भीख चाहिए और न मैं किसी रियायत के लिए,बगैर किसी दबाव के अपराध स्वीकार कर रहा हूं। आप चाहें तो इसे मेरे ज़मीर की आवाज़ भी समझ सकते हैं। जैसा कि मैंने कहा था कि मैं परवर दिगार-ए- आलम की अदालत की बजाए इसी अदालत में अपने गुनाहों की सज़ा चाहता हूं.........अब रही साज़िश से पर्दा उठाने की बात, तो कुछ नाम तो मैंने बता ही दिये थे, जो नहीं बताये मुझे उम्मीद थी कि उनका अन्दाज़ा स्वयं कर लिया जायेगा................... मगर अभी तक ऐसा नहीं हुआ, कोई बात नहीं आज अपने इस बयान के अन्त में मैं उन नामों को भी प्रकट कर ही दूंगा।
मैं चैथी कक्षा पास 22 वर्षीय नौजवान हूं। पाकिस्तान के शहर फरीदपुर का रहने वाला हूं और..........मैं मज़दूरी करता रहा हूं, यानी मकान बनाने वाले राज मिस्त्रियों के साथ म़जदूरी करता रहा हूं। फिर मैंने आतंकवाद के लिए बाकायदा ट्रेनिंग ली और अब मैं एक प्रशिक्षित आतंकवादी हूं। कुछ तो मेरी क्षमताओं का अन्दाज़ा 26 नवम्बर को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले से हो ही गया होगा बाकी पुलिस हिरासत में बीते लगभग 6 माह के दौरान तमाम पुलिस अमला मेरी क्षमताओं को देख और समझ चुका है। आदरणीय जज भी अब तक यह अनुमान लगा चुके होंगे कि सिर्फ चैथी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद मैं जाहिलों की तरह बात नहीं करता। अब यह बातें आप के सामने आ ही चुकी हैं कि मुझे अंग्रेज़ी की अच्छी ख़ासी समझ है। इन्टरनेट पर सर्फिंग करना मुझे पसन्द है। मैं दो मिनट के अन्दर गूगल पर जाकर अपना घर तलाश कर सकता हूं। मैं बेहतरीन मराठी बोल सकता हूं, जैसा कि कामा हॉस्पिटल में सुना गया। यह है मेरी शिक्षा का स्तर, इसके अलावा मैंने बोट चलाने का भी प्रशिक्षण लिया है। कराची से मुम्बई तक मैं ही बोट चलाकर लाया था। मैं समुन्द्री रास्तों से इस हद तक परिचित हूं जितना कोई नाविक भी नहीं हो सकता। सी।एस.टी रेलवे स्टेशन जहां यात्रियों को बन्धक बनाने का निर्देश मुझे मेरे आकाओं से मिला था, उस स्टेशन की तो कोई एक जगह भी ऐसी नहीं थी जिससे मैं परिचित न हूं। इमारत बनाने वाले इंजीनियर को भी जो याद न रहा होगा वह सब मुझे याद है। अतः टायलेट में जाकर कपड़े बदलने के बाद अमानती सामानघर के सामने बने रेस्टोरेंट पर गोलियां चलाने से लेकर मुसाफिरों और पुलिसकर्मियों को निशाना बनाने तक और स्टेशन तक कौन सा दरवाज़ा टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की बिल्डिंग के सामने और कामा हास्पिटल वाली गली की तरफ खुलता था इस सब का मुझे अच्छी तरह पता था, और हां यह फैसला भी मेरा था कि सिर्फ सी.एस.टी. रेलवे स्टेशन का खुफिया कैमरा काम करता रहे और उसमें सिर्फ और सिर्फ मेरा ही फोटू सुरक्षित रहे, विशेषतः इस अवसर का, मेरे हाथ में राइफल हो और कैमरे के लिए यह सावधानी बरतना भी मैंने ही तय किया था कि फ्रेम में मेरे अलावा कोई घायल या मरने वाला मुसाफिर न आये। मेरे जूतों के साथ फर्श भी आइने की तरह चमकता हो खून का एक धब्बा तो दूर किसी की चप्पल या हाथ का कोई सामान भी मेरे चित्र के साथ दिखाई न दे। क्योंकि मुझे अंतराष्ट्रीय आतंकवादी के रूप में अपनी पहचान बनानी थी। चैथी कक्षा पास मज़दूर अवश्य हूं मगर सफाई सुथराई का बहुत ध्यान रखता हूं। इसका अन्दाज़ा आपको मेरे कपड़ों और जूतों से हो ही गया होगा। अब आप हैरान होंगे यह सोच-सोचकर कि अगर सी.एस.टी. रेलवे स्टेशन के खुफिया कैमरे का फुटेज उपलब्ध है जिसमें मेरी तस्वीर मौजूद है तो फिर होटल ताज,ओबराय ल्योपोल्ड कैफे और नरीमन हाउस के खुफिया कैमरों का फुटेज क्यों नही है? तो आदरणीय यह भी मेरी ही एक सोची समझी योजना का हिस्सा था। मैं नहीं चाहता था कि कोई भी दूसरा कैमरा काम करे, किसी और का चेहरा भी इन कैमरों में दिखाई दे। वास्तव में मैं इस अंतराष्ट्रीय शोहरत को किसी से बांटना नहीं चाहता था। नरीमन हाउस में 100 किलो गोश्त मेरे ही लिये मंगाया गया था और जिस शाम मैं बुधवारा पैंठ पहुंचकर नाव से उतरा और धीमे-धीमे चलते हुआ नरीमन हाउस पहुंचा तो मेरे मेज़बान मेहमान नवाज़ी के लिए मेरी प्रतीक्षा में थे। मैंने कीचड़ में सने जूते उतार फेंके। कई दिन के पानी के सफर में खराब हुई जींस और टी-शर्ट को बदला। पलक झपकते मैंने और मेरे साथियों ने वह 100 किलो गोश्त हज़्म कर डाला। शराब के बारे में विस्तार से मुझसे मत पूछिये, क्योंकि मैं कुरआन भी पढ़ता हूं और नमाज़ भी...........बहरहाल मेरे अन्य साथी ताज और ओबराय के सफर पर रवाना हुये और मैंने इस्माइल के साथ टैक्सी पकड़ली। सी.एस.टी. स्टेशन पहुंचा। वहां की घटना तो मैं पहले ही बता चुका हूं। अब मुझे अपने एक विशेष मिशन पर रवाना होना था और वह था मुम्बई एटीएस के चीफ हेमन्त करकरे को मौत के घाट उतारना। वास्तव में मालेगांव जांच को लेकर मैं उनसे निजी रूप से बहुत नाखुश था। मैं नहीं चाहता था कि वह वास्तविक अपराधियों का चेहरा सामने लायें। साध्वी प्रज्ञा सिंह, दयानन्द पाण्डे, कर्नल पुरोहित और मेजर उपाध्याय जैसे लोगों को आतंकवादी साबित करें, और मैं यह भी नहीं चाहता था कि उनके तार किन-किन बड़े लोगों से जुड़े हैं यह बात सामने आये। मैं तो यह भी नही चाहता था कि संघ परिवार से सम्बन्ध रखने वाले इन्द्रेष को हमारे खुफिया संगठन आईएसआई ने जो तीन करोड़ रूपये दिये थे यह बात सामने आये, मगर क्या करूं और सब पर तो मेरा ज़ोर चल गया, मीडिया वालों पर नहीं चला। इसीलिए यह बात बाहर आ ही गई।

आपको हक है मुझे चाहे जितना बड़ा मुजरिम मानें, चाहे जो सज़ा दें मगर आपको मेरे और मेरे साथियों की ताकत और बुद्धिमानी का लोहा तो मानना ही होगा। हम वह हैं जिनकी संख्या अगर केवल 10 भी हो तो दुनिया के किसी भी बड़े से बड़े शहर को तबाह करने का हुनर जानते हैं। न हमें पुलिस का खौफ, न फौज का डर। 61 घण्टे तक शौच आदि गये बगैर हम लगातार गोलिया चला सकते हैं। मिशन के दौरान हमें न खाने-पीने की आवश्यकता पड़ती है न सोने की। वास्तव में ऐसी कोई भी प्राकृतिक आवश्यकता जो आम लोगों को होती है वह हमें नहीं होती।

साथ ही इस बीच लगातार हम टी.वी. देखते रह सकते हैं, टेलीफोन पर बात करते रहते हैं, लैप टॉप पर आगे की कार्यवाही का जायज़ा लेते रहते हैं, और हमारी याददाश्त उसका तो जवाब ही नहीं। मुझे सब याद है मेरे साथियों में किसका नाम क्या था, कहां का रहने वाला था, परिवारिक पृष्ठभूमि क्या थी, प्रशिक्षण किसने दिया, इस मिशन पर जिम्मेदारी क्या और किसके द्वारा दी गई? यह सबकुछ मुझे इतना मालूम है जितना कि सम्बन्धित लोगों को भी नहीं होगा। अब रहा प्रश्न हमारे नेटवर्क का, तो बस यूं समझ लीजिए कि हम जिनों को भी मात देने वालों में से हैं। हम ताज होटल और ओबराय होटल में हथियारों के साथ प्रवेश कर सकते हैं और कोई हमें देख भी नहीं सकता। हम बेसमेंट में आर.डी.एक्स. रख सकते हैं, गे्रेनेड और राइफलों के साथ होटल में ठहरे मुसाफिरों और अमले को कुछ भी न कर पाने के लिए मजबूर कर सकते हैं, मगर ऐसा भी नहीं है कि हम बहुत ज़ालिम हैं, खूंखार हैं, हमारे सीने में एक नरम दिल भी है, अतः जब हम पुलिस की गाड़ी में सवार हेमन्त करकरे, अशोक काम्टे और विजय सालस्कर को गोलियों से भून डालते हैं और बेदर्दी के साथ लाशों को भी सड़क पर फ़ेंक देते हैं, तब भी हम उन बेचारे सिपाहियों पर कोई जुल्म नहीं करते। भले ही उनमें से कोई जिन्दा बच जाये, और इतना ही नहीं हम जिसकी स्कोडा कार छीनते हैं उसमें सफर करने वालों पर भी गोली नहीं चलाते, सिर्फ नीचे उतार देते हैं। आप चाहें तो मेरी बातों के अन्तर विरोध पर विचार के लिए कोई कमेटी बना सकते हैं। पोलियोग्राफी और ब्रेनमैंपिंग जैसे दर्जनों टेस्ट करा सकते हैं अगर यह रिपोर्ट मेरे बयानों से मेल न खाये तो यह सरदर्द आपका है, मेरा नहीं, आप विश्वास कीजिए कि यह सारा नेटवर्क और कारनामा सिर्फ और सिर्फ हमारा था। हम 10 पाकिस्तानी आतंकवादियों के अलावा कोई और इसमें शामिल था ही नहीं। दरअसल हम हिप्नोटिज़्म जानते हैं। कुछ जिन्नात वाली विशेषताएं भी हमारे अन्दर हैं। इसलिए हम जिसे चाहें बस उसी को दिखाई देते हैं और अगर न चाहें तो कोई हमें देख भी नहीं सकता। क्या कराची से मुम्बई तक के सफर के बीच भारत के सुरक्षा दस्तों ने हमें देखा? हम पूरा गुजरात पार करके चले आये मजाल है कि किसी की हम पर निगाह पड़ी हो, नरेन्द्र मोदी जी को हमारे गुजरात आगमन की खबर मिली हो, हम रडारों की पकड़ में आये हों? आप जाकर तो देखिये एक होटल में रामपुरी चाकू के साथ, यह तो हमारा ही दम है कि हम आरडीएक्स, एके-47 और हैंड गे्रनेड लेकर सारे शहर में घूम सकते हैं। अब एक आखिरी बात जो अभी तक मैंने अदालत के सामने भी नहीं कही है, इस समय इसका कह देना इसलिए आवश्यक लगता है कि कहीं आप मुझे फांसी दिये जाने के बाद मेरे इस्राइली भाईयों पर शक न करने लगें। संघ परिवार से उनके रिश्तों की जांच पड़ताल में न लग जायें। मैं मानता हूं कि इस्राइली कमांडोज़ तकनीक के मामले में बहुत आगे हैं, मगर एक अंतराष्ट्रीय आतंकवादी का क्रेडिट जब मैं अपने आखिरी साथी इस्माइल से शेयर नहीं करना चाहता था तो मैं इस्राइलियों से क्यों करना चाहूंगा। हां अगर आपका दिल चाहे तो मेरी जिन्दगी में या मुझे फांसी दिये जाने के बाद स्थानीय नेटवर्क के मामले में दाउद इब्राहीम और प्रशिक्षिण देने के मामले में बिन लादेन का नाम जोड़ सकते हैं। चचा बुश होते तो अपने मनपसन्द मीडिया के माध्यम से इस बात को साबित भी कर देते...............मगर ओबामा के बारे में मैं क्या कहूं? उनका मिज़ाज तो कुछ बदला-बदला सा दिखाई दे रहा है।



माफ कीजिए!उपरोक्त बयान 26/11 को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले के सम्बन्ध में जिन्दा पकड़े गये अजमल आमिर कसाब का नहीं है, मगर जितनी बातें इसमें कही गई हैं वह सब ध्यान देने योग्य तो हैं। बेशक यह सबकी सब पूरी बकवास हो सकती हैं, इसलिए हमारे लिये तो सच वह ही है जो अजमल आमिर कसाब ने कहा.....लेकिन अगर वह अपने बयान में यह सब भी कह देता जो ऊपर लिखा गया है तो कुछ ख्याली या अफसान्वी बातों को अनदेखा कर भी दें तब भी व्यंगात्मक लेख में बातें तो वही सब हैं जो अखबारों की सुर्खियां बनती रही हैं। हां! यह अलग बात है कि अब कोई इस सब पर बात नहीं करता। पहुंचने दीजिए अदालत को किसी नतीजे पर, बहुत कुछ है हमारे पास भारत पर हुए इस आतंकवादी हमले के सम्बन्ध में जिसका जनता के सामने आना आवश्यक है इसलिए कि एक अजमल आमिर कसाब को फांसी दे दिये जाना भारत पर हुए आतंकवादी हमलों का हल नहीं है। जब तक हम आतंकवाद के पूरे नेटवर्क को नहीं समझेंगे और पूरी ईमानदारी के साथ तमाम आतंकवादियों को बेनकाब करके सज़ाएं नहीं देंगें, अजमल आमिर कसाब जैसे आतंकवादी अपराध स्वीकार करते रहेंगे, फाँसी पर चढ़ते रहेंगे, मगर आतंकवाद भी जारी रहेगा।

1 comment:

पी.सी.गोदियाल said...

यहाँ पर सिर्फ और सिर्फ कसाब के बारे में कहना चाहूंगा कि वह "मुकरा" नहीं हमारी लचक न्याय व्यवस्था की "मुकरी " (मौकरी) कर रहा है ! उसे भी एक साल में आपने मात्हतो और शुभचिंतको के माध्यम से यह ज्ञान प्राप्त हो गया है कि भारत में क़ानून सम्मत मजाक कैसे किया जाता है !