Thursday, January 21, 2010

अजमल आमिर क़साब का इक़बालिया बयान-२
अज़ीज़ बर्नी

(कल का शेष)
दो महीने के बाद हम लोगों को मां-बाप से मिलने की मोहलत दी गयी। मैं माता-पिता के साथ एक महीने रहा। उसके बाद मैं मुज़फ्फराबाद में शादियां नाला स्थित लशकर के कैम्प में एडवांस टेªनिंग लेने के लिए पहंुचा। वहां मेरी तस्वीरें उतारी गयीं और कुछ फार्म भर गये। उसके बाद हमें दौरा-ए-खास की ट्रेनिंग के लिए चेलाबंदी पहाड़ी पर ले जाया गया। यह प्रशिक्षण तीन महीने का था जिसके दौरान पी.टी, हर प्रकार के हथियारों से फायर करने का अभ्यास, हथगोलों को प्रयोग करने की ट्रेनिंग, राॅकेट लांचर और मोर्टर तोप को चलाना सिखाया गया।
इस ट्रेनिंग का दैनिक शेड्यूल निम्नलिखित थाः
04.15 से 05.00 तक जागने का अलार्म और नमाज़
05.00 से 06.00 तक पी.टी का प्रशिक्षण अबु मुआविया
08.00 बजे नाश्ता
08.30 से 11.30 तक हर प्रकार के हथियारों के प्रयोग और उनके फायर करने की ट्रेनिंग, हथगोले प्रयोग करने की ट्रेनिंग, राॅकेट लांचर और मोर्टर ग्रीन जीरो, एस.के.एस , यूजी गन पिस्तौल, रिवाल्वर, हथगोले मोर्टर, राॅकेट लांचर आदि। ट्रेनर अबु मुआविया
11.30 से 12.00 तक विश्राम का समय
12.00 से 13.00 तक दोपहर का भोजन
13.00 से 14.00 नमाज
14.00 से 16.00 हथियारों का प्रयोग और उनसे फायर करने की प्रेक्टिस, भारत की खुफिया एजेंसियों के बारे में व्याख्यान।
16.00 से 18.00 तक पी.टी
18.00 õ2000 नमाज़ एवं अन्य कार्य
20.00 õ2100 डिनर
इस स्थान पर 32 व्यक्तियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा था।
इनमें 16 को एक गुप्त मिशन हेतु ज़कीउर्रहमान चाचा ने चयनित कर लिया। उन 16 में से 3 कैम्प से फरार हो गये। उपरोक्त चाचा ने उन 13 व्यक्तियों को मुरीदकेे कैम्प में काफा नामी एक व्यक्ति के पास भेजा, मुरीदके में हमें तैराकी के साथ-साथ उन हालात का सामना करने का प्रशिक्षण दिया गया जिनका सामना मछुआरों को समुद्र में करना होता है।
हम लोगों ने लाँच के द्वारा समुद्र में अभ्यास हेतु कई यात्राएं भी कीं। इस दौरान हमें भारत की गुप्तचर एजेंसियों की कार्यप्रणाली के सम्बंध में जानकारियां भी दी गईं। हमें भारतीय मुसलमानों पर किये जाने वाले अत्याचार की किलिपिंग्स भी दिखाई गईं।
इस प्रशिक्षण की समाप्ति के उपरांत हमंे सात दिन के लिए अपने पैतृक गांव जाने की अनुमति दी गई। मैं अपने परिवार के सदस्यों के साथ 7 दिन व्यतीत कर मुजफ़्फ़राबाद में मौजूद लश्कर-ए-तैयबा के कैम्प चला गया।
हम 13 व्यक्ति इस प्रशिक्षण कैम्प में उपस्थित थे। इसके उपरांत ज़कीउर्रहमान चाचा के आदेश पर काफा नामी व्यक्ति हमें पुनः मुरीदके में प्रशिक्षण हेतु अपने साथ ले गया। समुद्री वातावरण के अनुकूल बनने और तैराकी का यह प्रशिक्षण पुनः एक माह तक चला।
इस प्रशिक्षण के दौरान हमें राॅ सहित सभी भारतीय गुप्तचर एजेंसियों के सम्बंध में व्याख्यान दिये गये। हमें इस बात का भी प्रशिक्षण दिया गया कि किस प्रकार हम सुरक्षा बलों से बच सकते हैं। हमें इस बात के कड़े निर्देश दिये गये थे कि हम भारत पहुंचने के बाद पाकिस्तान फोन नहीं करेंगे। इस प्रशिक्षण में सम्मिलित होने वालों के नाम निम्नलिखित हैं।
मौ0 अजमल उर्फ अबु मुजाहिद, इस्माईल उर्फ अबु उमर, अबु अली, अबु अक़सा, अबु उमैर, अबु शुऐब, अब्दुर्रहमान (बड़ा), अब्दुर्रहमान (छोटा), अफज़लुल्लाह, अबु उमर।
इस प्रशिक्षण के उपरांत 15 सितम्बर को ज़कीउर्रहमान उर्फ़ चाचा ने हम में से 10 का चयन करके 5 दस्ते बनाये जिनमें से हर एक में 2 लोग थे। मेरी टीम में, मैं और इस्माईल थे। हमारा कोड था वी.टी.एस.। हमें इंटरनेट पर गूगल अर्थ दिखाया गया। हमें इसी साइट पर मुम्बई का आज़ाद मैदान भी दिखाया गया और यह बताया गया कि हमको कहां उतरकर कैसे मुम्बई में दाख़िल होना है। हमें वी.टी. स्टेशन की फिल्म भी दिखाई गई जिसमें भीड़-भाड़ के समय यात्रियों को ट्रेन में चढ़ते एवं उतरते दिखाया गया था। हम लोगों को प्रातः 7 से 11 एवं सांय 7 से 11 बजे के मध्य गोली चलाने का आदेश दिया गया था। इसके उपरांत हमसे कहा गया था कि हम कुछ लोगों को बंधक बनाकर पास की किसी बिल्डिंग में घुसकर उसकी छत पर चढ़ जायेंगे और उसकी छत पर चढ़ने के बाद हम चाचा से सम्पर्क करेंगे। इसके बाद चाचा हमें भारतीय मीडिया के फोन नम्बर देगा, इन नम्बरों पर हम मीडिया के लोगों से सम्पर्क स्थापित करेंगे और चाचा द्वारा दिए गए आदेश के अनुसार हम बंधकों की रिहाई के लिए मांगें प्रस्तुत करेंगे। यही कार्यप्रणाली हमारे प्रशिक्षकों ने तय की थी।
इस मुहिम के लिए 27 सितम्बर की तिथि रखी गई थी किन्तु किन्हीं कारणवश इसको रद्द कर दिया गया। हम कराची में ठहरे रहे। हमनें फिर समुद्र में स्पीड बोट में यात्रा करने का अभ्यास किया। हम वहां 23 नवम्बर तक रहे। दूसरी टीमों में शामिल व्यक्तियों के नाम निम्नलिखित हैं।
टीम सं0 2 अबु अक़सा, अबु उमर
टीम सं0 3 बड़ा अब्दुर्रहमान, अबुअली
टीम सं0 4 छोटा अब्दुर्रहमान, अफ़ज़लुल्लाह
टीम सं0 5 शुऐब, अबु उमर
23 नवम्बर को हमारी टीम सहित उपरोक्त सभी टीमों ने ज़कीउर्रहमान उर्फ चाचा एवं काफ़ा के साथ अज़ीज़ाबाद, कराची से प्रस्थान किया। हम लोगों को एक नज़दीकी समुद्री तट पर ले जाया गया। यहां पर हम एक लाँच में सवार हुए। लगभग 20-25 समुद्री मील चलने के उपरांत हमको समुद्र में एक बड़ी लाँच मिली। कुछ देर यात्रा करने के उपरांत हम लोगों को गहरे समुद्र में एक बड़े जहाज़ अलहुसैनी में सवार किया गया। जहाज़ में सवार होते समय हममें से प्रत्येक को थैले दिये गये, जिनमें 8 हथ गोले, 1 ए.के.47 रायफल, 200 गोलियां, 2 मैगज़ीन और सम्पर्क स्थापित करने हेतु एक-एक सेलफोन दिया गया।
फिर हम भारतीय तट की ओर चल पड़े। जब हम भारत की समुद्री सीमा में पहुंचे तो अलहुसैनी पर सवार अमले ने एक भारतीय लाँच का अपहरण कर लिया। इस लाँच में सवार मल्लाहों को अलहुसैनी में स्थानतरित कर दिया और अपहृत लाँच में हम लोग सवार हो गये। एक भारतीय मल्लाह को हमारे साथ रखा गया। बन्दूक की नोक पर वह हमें भारतीय तट की ओर लेकर चल पड़ा। 3-4 दिन की यात्रा के बाद हम मुम्बई तट के करीब पहुंच गये ! जब हम लोग मुम्बई के तट से कुछ ही दूर रह गये तो अफ़ज़लुल्लाह और इस्माईल ने भारतीय मल्लाह (तांडेल) को लाँच के तहख़ाने में मार दिया। फिर जैसा कि हमें निर्देश दिया गया था हम लोग रबर की छोटी छोटी नाव (डंगी) द्वारा बुधवारपैठ की जैटी (तट) पर पहुंच गये। बुधवारपैठ पर उतरने के उपरांत मैं और इस्माईल टैक्सी द्वारा वी.टी. स्टेशन के लिए रवाना हो गए। वी.टी.स्टेशन के हाॅल में पहुंचने के पश्चात मैं और इस्माईल सार्वजनिक शौचालय में घुस गये जहां हमने अपने थैलों से हथियार निकाले, उनको लोड किया और बाहर निकल कर यात्रियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाना प्रारम्भ कर दीं।
अचानक वर्दी पहने एक पुलिसकर्मी हमारी ओर लपका और उसने गोलियां चलाना प्रारम्भ कर दीं, जवाब में हमने उस पर हथगोला फैंका और उसपर गोलियां भी चलाईं। इसके पश्चात हम स्टेशन परिसर में घुस गये और यात्रियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाना आरम्भ कर दिया।
इसके पश्चात हम रेलवे स्टेशन से बाहर निकल आये और एक ऊँची छत वाली बिल्डिंग तलाश करने लगे, किन्तु हमें कोई उचित बिल्ंिडग नहीं मिली। तब हम एक पतली गली में घुसे और एक बिल्डिंग में घुस कर सीढ़ियों द्वारा ऊपर चले गये। तीसरी और चैथी मंजिल पर हमने बंधक बनाने के लिए लोगों को तलाश करना आरम्भ कर दिया किन्तु हमें पता चला कि यह एक रिहायशी मकान नहीं बल्कि एक अस्पताल है, तब हम बाहर आने लगे।
इस मौके पर पुलिस ने हम पर फायरिंग करना शुरू कर दी और हमने भी उनपर हथगोले फेंके। जब हम अस्पताल से वापस आ रहे थे तब अचानक हमने एक पुलिस की गाड़ी को अपने सामने से गुज़रते देखा। तब हम एक झाड़ी के पीछे छुप गये। एक और गाड़ी हमारे सामने से गुज़री और थोड़ी दूर जाकर रूक गई। उसमें से एक पुलिसकर्मी उतरा और उसने हम पर फायरिंग करना शुरू कर दी। एक गोली मेरे हाथ पर लगी और मेरी ए.के.47 रायफल गिर गई। मैं उसको उठाने के लिए झुका ही था कि दूसरी गोली मेरे उसी हाथ में घुस गई, मैं घायल हो गया। इस्माईल ने गाड़ी में बैठे अधिकारियों पर फायरिंग जारी रखी। वे लोग घायल हो गये और उनकी ओर से गोली चलना बंद हो गई।
हम लोगों ने कुछ देर प्रतीक्षा की फिर उस गाड़ी की ओर बढ़े, वहां 3 शव पड़े थे। इस्माईल ने तीनों शवों को हटाया और गाड़ी चलाना शुरू कर दी। मैं उसके करीब बैठा था। जब हम गाड़ी में आगे बढ़े तो कुछ पुलिस अधिकारियों ने हमें रोकने का प्रयास किया। इस्माईल ने उनपर गोली चला दी। जब हम आगे बढ़ रहे थे तब बड़े से मैदान के समीप हमारी गाड़ी में पंक्चर हो गया। इस्माईल ने ड्राइवर की सीट से उतरकर एक कार को रोका और उसमें सवार महिलाओं को बंदूक की नोक पर बाहर निकाल दिया। उसके पश्चात इस्माईल मुझे खींच कर कार में ले गया क्योंकि मैं घायल था। इसके बाद वह गाड़ी चलाने लगा। जब हम कार में यात्रा कर रहे थे तब हमको तट के समीप एक सड़क पर रोका गया और पुलिस ने हमारी ओर गोलियां चलाईं। पुलिस की फायरिंग में इस्माईल घायल हो गया। फिर पुलिस हमको अस्पताल ले गई। अस्पताल में मुझे ज्ञात हुआ कि इस्माईल जख्मों की ताब न लोकर मर गया।
मेरा बयान मेरे सामने पढ़ा गया और हिन्दी में समझाया गया और बिल्कुल सही ढंग से रिकार्ड किया गया है।

1 comment:

अरूण साथी said...

अजीज जी बात तो सही है पर इसे मानता कौन है, अपनी सरकार भी इसे कहां मान रही है और कसाब को महज एक मेहमान बनाए हुए है।