Monday, November 16, 2009

और अब होगी बात झारखंड की, वंदेमातरम की और कल्याण की

रांची से रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा के प्रकाशन का निर्णय काफी पहले लिया जा चुका था और तमाम तैयारियां पूरी थीं, बस अगर इन्तज़ार था तो बस इस बात का कि मैं वहां पहुंचकर समस्त तैयारियों का जायज़ा ले लूं ताकि प्रकाशन का सिलसिला आरंभ किया जा सके। अतः तुरन्त झारखण्ड की यात्रा का निर्णय लेना पड़ा, विलम्ब अब इसलिए भी संभव नहीं था क्योंकि इस राज्य में भी राजनीतिक जंग का बिगुल बज चुका है और कमोबेश सीधा मुकाबला साम्प्रदायिक शक्तियों और धर्मनिर्पेक्षता के बीच है।

पिछले संसदीय चुनाव के बाद से ही यह महसूस किया जाने लगा है कि रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा लोकतंत्र की सुदृढ़ता, साम्प्रदायिक शक्तियों की हार व धर्मनिर्पेक्ष शक्तियों को सत्ता में लाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता रहा है। बात चाहें महाराष्ट्र, हरियाणा, अरूणाचल प्रदेश की हो या झारखण्ड राज्य के विधानसभा चुनावों की, हमारा मानना है कि लोकतांत्रिक मूल्यों की मज़बूती केवल हमारी ही नहीं बल्कि इस देश की आवश्यकता है, देश की जनता की आवश्यकता है क्योंकि धर्मनिर्पेक्ष राजनीति ही देश के अन्दर साम्प्रदायिक सौहार्द और शांति व एकता की आवश्यकता को पूरा कर सकती है।

साम्प्रदायिक शक्तियां चाहें उनका सम्बन्ध किसी भी धर्म से क्यों न हो, देश के लिए लाभयदायक साबित नहीं हो सकतीं और जात-पात के आधार पर की जाने वाली राजनीति भी देश के लिए हानिकारक है। महाराष्ट्र में हम देख ही रहे हैं कि किस तरह मराठों को भारत से अलग करके पृथक्तवाद की नींव डाली जा रही है, अतः आवश्यक समझा गया कि बिना विलम्ब रांची से रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा के प्रकाशन का सिलसिला शुरू कर दिया जाये। हम आशा करते हैं कि इंशाअल्लाह यह लेख जब आपके हाथों में होगा तो झारखण्ड की जनता भी अपनी धरती से संबंधित लिखे गये इस लेख को उसी समय पढ़ रही होगी।

यूं तो मेरा यह सफर रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा के प्रकाशन के सम्बन्ध में ही था परन्तु सफर के बीच झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी से शाम की चाय पर एक महत्वपूर्ण भेंट और फिर केन्द्रीय मंत्री श्री सुबोधकांत सहाय के साथ खाने पर की गई बातचीत बहुत महत्वपूर्ण रही है और जिस तरह राज्य के तमाम जिम्मेदार राजनीतिज्ञों की मौजूदगी में खाने की मेज़ पर सुबोधकांत सहाय साहब ने चुनाव घोषणा पत्र को अंतिम रूप दिये जाने से पूर्व इस लेखक से विचार विमर्श को महत्व दिया तो मुझे लगा कि अल्लाह का शुक्र है कि अब ऊर्दू पत्रकारिता एक बार फिर उस रास्ते पर नज़र आ रही है जहां आज़ादी के सफर में उसने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

क्योंकि अभी यह चुनाव घोषणा पत्र जनता के सामने नहीं आया है, इसलिए आज के लेख में, मैं इसका विवरण देना नहीं चाहता, बस इतना ही कहना चाहता हूं कि अल्पसंख्यकों की आवश्यकताओं का विशेष ध्यान रखा गया है और आशा की जा सकती है कि अगर उन्हें सत्ता में आने का अवसर मिला तो इसको अमली जामा पहनाने का प्रयास भी किया जायेगा। दूसरी स्थिति में किसी भी तरह की कोताही या अनदेखा किये जाने पर रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटेगा, इसलिए आज ही यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि बात केवल वह ही की जाये जिसे पूरा भी किया जा सके। हमारा परामर्श अपनी जगह, आपकी राजनीति के तकाज़े अपनी जगह।

झारखण्ड राज्य के सफर के दौरान एक और खूबसूरत और उल्लेखनीय बात यह रही कि ‘‘दायरा’’ नाम का एक संगठन, जो अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर 15 नवम्बर को एक कांफ्रेंस आयोजित कर रहा था उसने मुझे भी विचार प्रकट करने का निमंत्रण दिया और जब लगा कि झारखण्ड की जनता के बीच विशेष रूप से अपनी कौम के बीच जाकर उनके हालात को समझने का एक अवसर है मेरे पास, अतः मुझे अवश्य जाना चाहिए। यूं भी ज़िलहिज के महीने के आगमन के समय अगर मैं मदीने की गलियों में न जा सका तो कम से कम उस गली में जाने का अवसर तो न छोड़ा जाये जिस गली में मदीना मस्जिद मौजूद है।

अतः 15 नवम्बर की सुबह जब मैं हेलीकाप्टर के द्वारा डाल्टनगंज एयर स्ट्रिप पर उतरा तो आशा के विपरीत बहुत से लोग फूलों के साथ मेरी प्रतीक्षा में थे। आशा के विपरीत इसलिए कि प्लामू, डाल्टनगंज की धरती पर कदम रखने का यह मेरा पहला अवसर था जहां मैं सीधे किसी को जानता भी नहीं था और बड़ी संख्या में मेरा अखबार पटना से छपकर यहां पहुंचता होगा, इसकी भी आशा कम ही थी, इसलिए कि यह इलाका नक्सलवाद से प्रभावित है और सड़क के द्वारा लम्बी यात्रा आसान नहीं। बहरहाल मेरा लिये यह बेहद प्रसन्नता का अवसर था कि मैं उस धरती पर खड़े होकर अपनी बात कह रहा था जहां से शहीद अश्फाक उल्ला खां ने आज़ादी की जंग आरंभ की थी।

मैंने अपने भाषण में जो कुछ कहा इसका उल्लेख तो मैं आगामी किस्तों में करूंगा, लेकिन वह चन्द वाक्य जिनका सम्बन्ध ‘‘वन्दे मात्रम’’ से था। मैं अभी लिखना चाहूंगा, इसलिए कि मैंने अपने पिछले लेख में जमीअत उलेमा-ए-हिन्द के ३० वें अधिवेशन के 16वें प्रस्ताव पर अपनी बात को अधूरा छोड़ा था और उसके बाद मैं जिस प्रस्ताव पर विस्तृत बहस का इरादा रखता हूं वह ‘‘वन्दे मात्रम’’ का विषय ही है लेकिन ऐसा भी न लगे कि 16वें प्रस्ताव पर की जाने वाली बात को बीच में ही अधूरा छोड़ दिया गया, अतः आज के इस लेख में चन्द वाक्य उसी सिलसिले में लिखकर इस विषय पर अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा।

16वें प्रस्ताव का सम्बन्ध शिक्षा और शैक्षणिक संस्थाओं से था और बातचीत भी इसी विषय की रोशनी में थी। केवल एक और अंतिम बात, इस बड़े अधिवेशन में चन्द लोग स्टेज पर थे, अर्थात ऊपर मंच पर तशरीफ रखते थे और जो इस अधिवेशन में शिरकत कर रहे थे उनमें बड़ी संख्या यदि मेरा अनुमान गलत नहीं है तो 90 प्रतिशत से अधिक सम्मानित अतिथियों की संख्या उन्हीं दीनी मदरसों से सम्बन्ध रखने वाली थी जो या तो मदारिस में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं या दीनी तालीम दे रहे हैं, मगर वह सब नीचे की कुर्सियों पर थे, ऊपर बैठे चन्द विशेष और उल्लेखनीय लोगों में कुछ को छोड़कर वह ही थे, जिन्होंने सरकारी , गैर सरकारी संस्थाओं में शिक्षा प्राप्त की है।

उनमें हमारी कौम से सम्बन्ध रखने वाले वह महत्वपूर्ण व्यक्ति भी थे, जो बड़े बड़े पदों पर होने के साथ साथ शिक्षा क्षेत्र के दायित्वों से भी जुड़े हैं। न केवल यह कि उन्होंने शिक्षा ऐसी संस्थाओं में प्राप्त की, जिन को सरकारी गैर सरकारी श्रेणी में रखा जा सकता है, बल्कि उनके संरक्षण में चलने वाली शिक्षा संस्थाओं में भी लड़के-लड़कियों को एक साथ पढ़ाए जाने की व्यवस्था है। बहरहाल मैं तो केवल इतना चाहता हूं कि मेरी कौम के नौजवान लड़के-लड़कियां पूर्ण रूप से धार्मिक शिक्षा भी प्राप्त करें और दुनियावी शिक्षा में भी पारंगत हों ताकि कम से कम उन्हें तो ऊपर मंच पर बैठने के लिए जगह मिल सके।

भले ही उनके बुजुर्गों ने नीचे बैठकर जिन्दगी गुज़ार दी हो और अब ‘‘वन्दे मात्रम’’ के विषय पर धनबाद के भाषण में बंकिम चन्द चटोपाध्याय के उपन्यास ‘‘आनन्द मठ’’ की वह चन्द पंक्तियां जो लेखक की मानसिकता को भी स्पष्ट करती हैं और इस सच्चाई को भी कि आखिर मुसलमान इसे क्यों नपसन्द करते हैं और क्या हिन्दू भाईयों को भी मुसलमानों की सोच से सहमत नहीं होना चाहिए।


‘‘सत्यानन्द ने जवाब दिया, ‘‘चलिए, मैं तैयार हूं। मगर हे महात्मन, मेरा एक संदेह दूर कीजिए। मैंने जिस पल युद्ध में जीतकर सन्तान-धर्म को निष्कंटक किया, उसी समय से मुझे प्रत्याख्यान का आदेश क्यों?’’


जो आए थे, वे बोले, ‘‘तुम्हारा कार्य सिद्ध हो गया, मुसलमानों का राज्य ध्वस्त हो गया। अब तुम्हारा और कोई काम नहीं। अनर्थक प्राणिहत्या की क्या ज़रूरत।’’

‘‘मुसलमानों का राज्य ध्वस्त हो गया, मगर हिन्दुओं का राज्य तो स्थापित नहीं हुआ। अब भी कलकत्ता में अंग्रेज़ों का राज्य है।

‘‘हिन्दुओं का राज्य अभी स्थापित नहीं होगा- तुम्हारे रहने से अनर्थक नर-हत्या होगी। इसलिए चलो...’’सुनकर सत्यानन्द तीव्र मर्मपीड़ा से कातर हो गए। बोले, ‘‘हे प्र्रभू। अगर हिन्दुओं का राज्य स्थापित नहीं होगा तो किसका राज्य होगा? क्या फिर मुसलमानों का राज्य होगा।

वे बोले, ‘‘नहीं, अब अंग्रेज़ों का राज्य होगा। ’’

मैंने वन्दे मात्रम पर जुबान खोलने का सहास उस समय तक नहीं किया जब तक कि मैंने बंकिम चन्द के इस उपन्यास ‘‘आनन्द मठ’’ का पहली पंक्ति से अंतिम पंक्ति तक का ध्यानपूवर्क अध्ययन नहीं कर लिया और अब मुझे लगता है कि मैं इस विषय पर लिख भी सकता हूं और बोल भी सकता हूं आज के इस लेख के साथ मैं सम्मिलित कर रहा हूं झारखण्ड डाल्टनगंज की जनता के भावनाओं में डूबे हुए वह शब्द और एक कविता जिससे समझा जा सकता है कि आपके प्रिय रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा का पाठकों के दिल में क्या स्थान हैः

सेवा में...............................समुह सम्पादक, रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा

श्रीमान ,
सबसे पहले हम झारखंड की जनता साधारणतः और इस छोटे राज्य के छोटे शहर डाल्टनगंज की जनता विशेषतः इस धरती पर आपका पुरतपाक स्वागत करती है। हम आपकी सेवा में धन्यवाद प्रस्तुत करते हुए कृतज्ञ भी हैं कि आप जैसे व्यस्तम पत्रकार और विश्व स्तर की स्थितियों पर गहरी निगाह रखने वाले व्यक्ति ने अपनी पत्रकारिता की व्यस्तताओं के बावजूद अपने बहुमूल्य समय में से थोड़ा सा समय हमें देने की कृपा की, और यह थोड़ा समय यहां की जनता के लिए इतना बहुमूल्य है कि इसके लिए धन्यवाद के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता।

बेबाक कलम के सिपाही! आपने अपने कलम का प्रयोग पत्रकारिता के उस स्थान पर किया है जहां आज तक उर्दू पत्रकारिता पहुंच नहीं सकी थी, और माशाअल्लाह आप ने अपनी पत्रकारिता को जीवित रखने के लिए न तो उसका सौदा किया और न ही किसी डर से काम किया। आपके लेख पढ़कर इस समय भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक, समाजिक और शैक्षणिक चेतना में परिवर्तन हो रहा है ये सब आपके बेबाक कलम की देन है।

पत्रकारिता के गौरव! उर्दू पत्रकारिता का भारत में मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मौलाना ज़फर अली खां और मौलाना अबुल कलाम आजाद के बाद दम घुटता नज़र आ रहा था। विशेषतः भारत की आज़ादी के बाद उर्दू पत्रकारिता ने कोई बड़ी क्रांति नहीं पैदा की और न ही किसी चेतना के साथ उर्दू जनता को जागृत करने का कारनामा अंजाम दिया। मगर आपको उपरोक्त तीनों महान पत्रकारों के बाद हमें पत्रकारिता का गौरव कहने में कोई झिझक नहीं। आपकी उर्दू पत्रकारिता ने भारत की तमाम भाषाओं की पत्रकारिता को एक नई डगर दी। यह आपका महान कारनामा है।

हमदर्द-ए- क़ौम व मिल्लत! आप अपनी पत्रकारिता की व्यस्तताओं के बावजूद घूम घूम कर भारत के कोने कोने में फैले मुसलमानों की शोचनीय स्थिति का जायजा लेकर जिस मिल्ली हमदर्दी व राष्ट्रीय सौहार्द का नमूना पेश कर रहे हैं, यह आने वाले समय में भारतीय मुसलमानों के लिए प्रकाश स्तंभ साबित होगा। हमारे पास शब्द नहीं कि आपकी शान के अनुरूप मुबारकबाद के शब्दों के साथ अपने हालात को आपके सामने रख सकें। मगर आपकी दिव्यदृष्टि ऐसी है कि आप संक्षिप्त जायजे में भी बहुत दूर तक देख लेते हैं और इसका प्रकटीकरण आपका कलम कागज पर करता रहा है।

हम इतना ही निवेदन करेंगे कि आप अपनी इस दिव्यदृष्टि से झारखंड की मुस्लिम जनता की बेचारगी, बेबसी और पिछड़ेपन का भी जायजा लें और उसकी शोचनीय स्थिति दूर करने के लिए ठोस कार्यक्रम के साथ-साथ कुछ न कुछ दृष्टिकोण दें, ताकि हम झारखंड और डाल्टनगंज की पिछड़े हुई जनता अपनी चेतना जागृत करके आपके बताये हुए रास्ते पर चल सके।

एकबार फिर हम आपके आगमन का स्वागत ही नहीं बल्कि धन्यवाद भी करते हैं। इस आशा के साथ हम अपनी बात समाप्त करते हैं कि आप हमारी आवाज़ बनकर अपनी पत्रकारिता में इसका प्रकटीकरण अवश्य करेंगे।
मिनजानिब
‘‘दायरा’’ झारखंड, (पलामू)


सेवा में ..........................................
ग्रुप एडीटर रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा


गुलहा-ए- अकीदत

जो करता तज़करा है हर घड़ी सिदक व सदाकत का

लिए है मर्तबा आली जो दुनिया-ए- सहाफत का

सबक देता है जो सब को अखूवत का, मुहब्बत का

है जिसके दिल में दर्द ओ ग़म हमेशा क़ौम ओ मिल्लत का

निगाहे इल्म व दानिश मे जो अकरम हैं, मुअज्ज़म हैं

बसद इखलास करते आपका हम खैर मक़दम हैं

अदाए मुशफेक़ाना, पुरअसर तक़रीर है जिसकी

ज़बां में लज्जते शीरीं, बयां तासीर है जिसकी

अदूए हक़ की ख़ातिर खमा एक शमशीर है जिसकी

बहुत बेदाग़ और बेबाक हर तहरीर है जिसकी

बयाने ख़ैर से करने हमें जो ताज़ा दम आया

पलामू की जमीं पर वो शहंशाहे कलम आया

बफैजे रब सरापा इल्म व दानिश का जो पैकर है

मिसाले बदरे कामिल जो सहाफत के उफक़ पर है

कि जिसकी रौशनी से तीरगीए शब मुनव्वर है

हवाए तुन्द में रौशन चिरागे़ अज़्म लेकर है

हवा का रूख बदल दे जो, क़लम में ऐसी कुदरत है

कि जिसके दम से मंज़र नाज़िशे उर्दू सहाफत है।

नतीजए फिक्र .............................मकबूल मंज़र
मुस्लिम नगर, डाल्टनगंज, पलामू (झारखंड)ः822101
1-अधिक दया करने वाला, 2-बहुत बड़ा, 3-बहुत खुलूस के साथ, 4-स्वागत, 5-मीठा स्वा6-प्रभावकारी, 7-प्रेमपूर्ण अदा, 8-तेज़ हवा, 9-रात का अन्धेरा, 10-प्रकाशमय

1 comment:

वन्दे ईश्वरम vande ishwaram said...

janab kuch naya likhen, to achha he,, ham wande matram ke silsile men jo kar chuke usse aage kuch aap de paye to baat he.

dekhne:
http://wandematram.blogspot.com/