Wednesday, October 7, 2009

तो मुंबई में लागू होगा परमिट सिस्टम!




किसी भी व्यक्ति का बात करने का अंदाज़ और उसकी ज़बान, उसके व्यक्तित्व का आईना होती है, जिससे उसके मिजाज़ और परिवारिक पृष्ठभूमि को समझा जा सकता है। अपने इस लेख में अगले कुछ वाक्य जो मैं लिखने जा रहा हूं, वह मेरे लेख का हिस्सा अवश्य हैं परन्तु उनका संबंध मुझ से नहीं है। यह देश के एक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ की ज़बान है, जो उन्होंने अपने अख़बार में प्रयोग की हैः‘‘कांग्रेस और राष्ट्रवादी के हरामखोरों ने महाराष्ट्र का जो सत्यानाश किया है, जनता के जीवन को जिस तरह से नष्ट किया है, उसे सुधारने के लिए शिवसेना-भारतीय जनता पार्टी के हरीश चंद्र के हाथ में सत्ता की चाबी सौंपनी ज़रूरी है।

गांधी जी कहा करते थे कि हिंदुस्थान को दुनिया भर के बेसहारों और दलितों का आश्रय स्थान बनना चाहिए। हिंदुस्थान वैश्विक धर्मशाला बन चुका है। इस धर्मशाला में हिंदुस्थानियों की अपेक्षा बांग्लादेशी और पाकिस्तान प्रेमियों की आबादी ज़्यादा हो गई है। शिवराय के महाराष्ट्र की हालत कुछ ज़्यादा ही दयनीय है। धर्मशाला में भी किसी मालिक की अनुमति की आवश्यकता होती है। मुंबई और महाराष्ट्र को ‘‘आओ-जाओ घर अपना’’ है वाली धर्मशाला बना दी गई है। मुंबई की छाती पर बांग्लादेशी सवार हो गए हैं।

इसलिए हमारा पक्का इरादा है कि सरकार में आने पर हम मुंबई में परमिट सिस्टम लागू करेंगे। .................................................................... कांग्रेसवालों ने महाराष्ट्रवासियों को फोड़कर सत्ता पर कब्ज़ा करने का स्वप्न संजोया है। उसके लिए मनसे जैसी नालायक औलाद को हाथ में लेकर राजकरण का गजकर्ण चलाया गया है। यह गजकर्ण मुस्लिम लीग की अपेक्षा ज़्यादा भयंकर है। मुस्लिम लीग और उसके मोहम्मद अली जिन्ना ने धर्म के नाम पर खुल्लम-खुल्ला पाकिस्तान बनाया। देश तोड़ा, खून की नदियां बहाई और हमेशा-हमेशा के लिए हिंदुस्थान के हिंदुओं को दुखी और अस्थिर किया।

अंग्रेज़ों ने जिन्ना की खोपड़ी में ज़हर घोलकर उसके हाथ में कुल्हाड़ी सौंप दी। उस कुल्हाड़ी से हिंदुस्थान के दो टुकड़े कर दिए गए। कांग्रेसवाले महाराष्ट्र और मराठी माणुस के लिए वही बंटवारे का बीज बो चुके हैं। उस समय मोहम्मद अली जिन्ना था, इधर घरवाला ही जिन्ना है।’’यह इबारत थी महाराष्ट्र मुम्बई से प्रकाशित होने वाले मराठी और हिन्दी अख़बार ‘‘दोपहर का सामना’’ के सम्पादकीय की, जिसके सर्वेसर्वा हैं बाला साहब ठाकरे। वही बाला साहब ठाकरे जो शिवसेना के सुप्रीमो भी हैं। वह कांग्रेस या एन।सी.पी के लिए क्या दृष्टिकोण रखते हैं, यह कांग्रेस ओर एन.सी.पी वाले जानें या वह जानें, हमें इस पर कुछ नहीं कहना।

बाल ठाकरे अपने भतीजे राज ठाकरे को जो चाहे कहें, यह उनका घरेलू मामला है। जैसाकि स्वयं अपने लेख में उन्होंने उसे घरवाला कहा है, परन्तु यदि राज ठाकरे को जिन्ना कहा जाएगा तो फिर हमें इतिहास के दामन में झांक कर देखना होगा। देश के विभाजन की परिस्तिथियों पर ग़ौर करना होगा। मोहम्मद अली जिन्ना की कार्यप्रणाली पर ग़ौर करना होगा। मोहम्मद अली जिन्ना की भूमिका पर नज़र डालनी होगी और बाल ठाकरे के अनुसार आज के जिन्ना यानी राज ठाकरे के किरदार को समझना होगा। पिछले दो दिनों में इसपर बहुत कुछ लिखा है, आगे भी लिखने की आश्यकता हो सकती है।

इस बीच एनडी टी.वी. ने भी अपने विशेष कार्यक्रम में इस मुद्दे को उठाया है अतः आज के इस लेख में जिन्ना के सन्दर्भ में कही गई बात पर बहस नहीं करनी है बल्कि इस लेख में जो अन्य बातें कही गई हैं उस पर पाठकगण का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। हमने भाषा का उल्लेख इसलिए किया था कि इससे सामने वाले के चरित्र को समझने का अवसर मिलता है। अगर यह सामने वाला कोई साधारण व्यक्ति है तब हम उसकी बात को अनदेखा कर सकते हैं। उस पर अधिक ध्यान देने या बहस की आवश्यकता महसूस नहीं करते, लेकिन यदि वह व्यक्ति हमारा नेता बनने का दावा करता हो, राज्य का सर्वेसर्वा बनने का इच्छुक हो तब हमें ध्यान देना आवश्यक लगता है, इसलिए कि हम अपना भविष्य ऐसे अशिष्ठ व्यक्ति के हाथों में कैसे सौंप सकते हैं जिसे बात करने का सलीका भी न हो जो कुछ भी कहा गया इस सम्पादकीय में उसका भावार्थ तो वही रह सकता था हां मगर भाषा सुसंस्कृत हो सकती थी।

बंग्लादेशियों और पाकिस्तान से प्यार करने वालों का सन्दर्भ किनके लिए और क्यों दिया गया है यह भी किसी से छुपा नहीं है इसका उल्लेख भी हम ज़रा आगे चलकर करेंगे। इस समय जिस विशेष बात पर ध्यान दिलाना आवश्यक है वह यह है कि अगर सत्ता में आए तो हमारा पक्का इरादा कि हम मुम्बई मं परमिट सिस्टम लागू करेंगे, अर्थात अपने ही देश में एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए अर्थात देश के किसी भी भाग से मुम्बई में प्रवेश करने के लिए परमिट की आवश्यकता होगी। दूसरे शब्दों में देश के अन्दर ही एक और पासपोर्ट दरकार होगा।

इस बात का सम्बन्ध किसी धर्म, जाति या साम्प्रदाय से नहीं बल्कि उन तमाम भारतीयों से है जबकि मुम्बई को मुम्बई बनाने में, मुम्बई को भारत की आर्थिक राजधानी बनाने के लिए बहुतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हम बेहद सम्मान के साथ बाल ठाकरे साहब की सेवा में यह निवेदन करना चाहते हैं कि मुम्बई ही नहीं पूरे भारत का सबसे बड़ा व्यापारी परिवार मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी मुम्बई में रहते हैं लेकिन धीरूभाई अम्बानी का सम्बन्ध गुजरात से था। टेªजिडी किंग दिलीप कुमार उर्फ यूसुफ खांन और कपूर परिवार पेशावर से आकर मुम्बई में बसें। धर्मेन्द्र, सुनील दत्त और विनोद खन्ना इन सभी का सम्बन्ध पंजाब से था। दुनिया भर में अपनी ताकत का लोहा मनवाने वाले दारा सिंह भी इसी धरती से सम्बन्ध रखते थे।

बोलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन का परिवार उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद से सम्बन्ध रखता है तो बादशाह अर्थात शाहरूख खांन का सम्बन्ध दिल्ली से है। वेजयंती माला और रेखा से लेकर रानी मुखर्जी, सुष्मिता सैन, ऐश्वर्या राॅय तक सभी पश्चिम बंगाल या दक्षिण भारत से आने वाली अभिनेत्रियां हैं। फीरोज़ खांन,संजय खांन,समीर खांन, अकबर खांन इन सबका सम्बन्ध बंगलौर से है तो अपनी अदाकारी का लौहा मनवाने वाली जयाप्रदा और तब्बू आंध्रा प्रदेश से हैं। मोहम्मद रफी नौशाद जैसे नामों में से कोई भी मराठी नहीं।

अगर इन सबको अलग कर दें तो मुम्बई में क्या रह जाता है? जो सम्मान दौलत और शोहरत कमाकर उन्होंने और उन जैसे व्यक्तियों ने मुम्बई को दी और विश्व के मानचित्र पर एक प्रतिष्ठित नाम बनाया आखिर वह उनके सिवा कौन लोग हैं जिनका नाम लिया जा सके? ठाकरे के परिवार या भारतीय जनता पार्टी के नेतागण जिनमें नरेन्द्र मोदी जैसे नाम आज सबसे अधिक उल्लेखनीय हैं उन्हें किस रूप में देखा जाता है, यह किससे छुपा है क्या यह वही नरेन्द्र मोदी नहीं हैं जिन्हें गुजरात दंगों के बाद मुख्यमंत्री रहते हुए भी अमेरिका और इंग्लैण्ड में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई थी।

बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर किन बतों के लिए लोकप्रिय हैं यह दुनिया जानती है। उन्होंने मुम्बई को मुम्बई बनाने में कौन सी भूमिका निभाई है यह श्रीकृष्णा कमीशन की रिपोर्ट में साफ-साफ दर्ज है। चन्द पंक्तियां सन्दर्भ के रूप में पेश हैंः-1- 22 जून 1997 को श्रीकृष्णा कमीशन को मोहित नाम के व्यक्ति ने अपने बयान में कहा कि फोन काल्स के कारण मेरी और शिवसेना चीफ की बात में रूकावट पड़ रही थी वह एक साथ कई फोन पर बोल रहे थे, और जैसा मैंने सुना और समझा, वह सेना के कार्यकर्ताओं को मुसलमानों पर हमला करने का आदेश दे रहे थे मराठी में उन्होंने ‘‘सरला नडिया ना मारून टाका’’ कहा फोन करने वाले को निर्देश दिया कि ध्यान रहे कि कोई भी मुसलमान अदालत में गवाही देने के लिए जिन्दा न बचने पाये।2-कमीशन की रिपोर्ट कहती है कि ‘‘8 जनवरी 1993 से इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि मुसलमानों और उनकी सम्पत्तियों पर सुनियोजित ढंग से हमला करने में शिवसेना और शिवसैनिकों ने मुख्य भूमिका निभाई और यह सबकुछ पार्टी के कई नेताओं शाखा प्रमुख से लेकर शिवसेना प्रमुख की निगरानी में हुआ।

सेनाप्रमुख ने एक तजुर्बेकार जनरल की तरह अपने वफादार शिवसैनिकों को मुसलमानों पर सुनियोजित ढंग से हमले के द्वारा बदला लेने का आदेश दिया। शिवसेना के द्वारा साम्प्रदायिक दंगे भड़काए गए और उसका प्रयोग अपराधी तत्वों ने एक अवसर के रूप में किया जब तक शिवसेना यह जान पाई कि बदले के नाम पर बहुत कुछ किया जा चुका है तब तक स्थितियां उनके लीडरों के काबू से बाहर हो गई थीं और उनके नेताओं को इसे समाप्त करने की अपील करनी पड़ी’’।3-कमीशन यह शामिल करना नहीं भूली ‘‘यहां तक कि जब यह स्पष्ट हो गया कि शिवसेना के नेता ही साम्प्रदायिक दंगे की आग लगाने में शामिल रहे हैं तब पुलिस ने कहा कि अगर ऐसे नेताओं को हिरासत में लिया जाता है तो साम्प्रदायिक स्थितियां और भी बदतर हो सकती हैं और मुख्यमंत्री सुधाकर राव नायक के शब्दों में कहें तो ‘बोम्बे में आग लग जाएगी’

जैसा कि हमने अपने कल के लेख में लिखा था कि भारतीय जनता पार्टी और शिवेसना के प्रदर्शन को सामने रखने के लिए हमारे पास गुजरात दंगे और श्रीकृष्णा कमीशन की रिपोर्ट में दर्ज ऐसी अनेक घटनाएं हैं जिनसे इन पार्टियों के स्वभाव को समझा जा सकता है, लेकिन मैं आज के और आने वाले कल के लेख में यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि वास्तव में मुस्लिम दुश्मनी के नाम पर हिन्दुत्व का ढिंढोरा पीटने वाली यह पार्टियां हिन्दुओं की प्रतिनिधि पार्टियां हो ही नहीं सकतीं बल्कि जहां उन्होंने एक तरफ मुसलमानों के नरसंहार और उन पर किये जाने वाले अत्याचारों के कारण उनके दिलों में घृणा और नाराज़गी पैदा की है वहीं हिन्दु भाईयों को भी कुछ कम कष्ट नहीं दिये हैं।

इस मानसिकता ने जो पहला कत्ल किया वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का था जो हिन्दू थे। सारे भारत में स्वयं को कट्टर हिन्दुवादी बताकर हिन्दु भाईयों का नाम अपने साथ जोड़कर कभी हिन्दु-मुस्लिम, कभी हिन्दू-सिख तो हिन्दू ओर ईसाई के बीच खाई पैदा करते रहे। पंजाब में जो कुछ हुआ वह हिन्दू और मुसलमानों के बीच नहीं हिन्दुओं और सिखों के बीच था। उड़ीसा और कर्नाटक में जो गिरजाघर जलाये गये उससे हिन्दू और ईसाइयों के बीच खाई पैदा हुई। बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात दंगों ने हिन्दु और मुसलमानों के बीच नफरत की दीवार खड़ी की। क्या यह सब देश की प्रगति और शांति में कारगर साबित हो सकता है?

नहीं बिल्कुल नहीं..........बल्कि यह सोच, यह मानसिकता देश की प्रगति में सबसे बड़ी रूकावट है। हिन्दु और मुसलमान के बीच, अर्थात भाई-भाई के बीच यह नफरत का सबसे बड़ा कारण है। आज जब दुनिया की बड़ी ताक़तें फिर से हमें अपना ग़ुलाम बनाने की कोशिशों में लगी हुई हैं, आज जबकि हमारे अपने पड़ोसियों से रिश्ते बहुत खुशगवार नहीं हैं, आज जब हम आतंकवाद के साए में जीने को विवश हो गए हैं, ऐसे में अपनी राजनीति के लिए नफ़रत के बीज बोने वालों को न तो इतिहास कभी मांफ करेगा और न आज हमें उनके धोखे में आना चाहिए।

दरअसल यह वही लोग हैं, यह वही मानसिकता है, जिसने पहले भी इस देश के टुकड़े किए और आज अलगाववादी मिजाज़ पैदा करके राज्यों को सरहदों की दीवारों में बांट देने के षड़यंत्र रच रहे हैं। उनका नाम कभी जिन्ना होता है तो कभी कोई ठाकरे हिदुस्तान की अखंडता और राष्ट्रीय एकता को हानि पहुंचाने के लिए सामने आ जाता है हमें इन चेहरों को धर्म के अधार पर नहीं देखना चाहिए। क्षेत्रीयता या भाषा के हवाले से भी नहीं देखना चाहिए। आवश्यकता है तो केवल और केवल उन्हें उनके चरित्र और मानसिकता से पहचानने की।

एक अंतिम वाक्य लिखकर मैं आज के इस लेख को समाप्त करता हूं कि पूरी दुनिया में कश्मीरियों के पृथकतावाद की चर्चा है, मगर कश्मीर की सीमा में प्रवेश करने के लिए परमिट सिस्टम की बात तो इस राज्य के किसी ऐसे जिम्मेदार ने भी नहीं की जिसका कद शिवसेना के चीफ जैसा हो और जो राज्य में सत्ता में आने का दावेदार हो। अतः इस बात को यूंही अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि इसका सम्बन्ध हर भारतीय से है। भारत की अखण्डता से है, साम्प्रदायिक सदभव से, राष्ट्रीय एकता से है।



کسی بھی شخص کا انداز گفتگو اور اس کی زبان، اس کی شخصیت کا آئینہ ہوتی ہے، جس سے اس کے مزاج اور خاندانی پس منظر کو سمجھا جاسکتا ہے۔ اپنی اس تحریر میں اگلے چند جملے جو میں لکھنے جارہا ہوں، وہ میری تحریر کا حصہ ضرور ہیں، مگر ان کا تعلق مجھ سے نہیں ہے۔ یہ ملک کے ایک نامور سیاستداں کی زبان ہے، جو انہوں نے اپنے اخبار میں استعمال کی ہے۔”کانگریس اور راشٹروادی کے حرام خوروں نے مہاراشٹر کا جو ستیاناس کیا ہے۔ جنتا کے جیون کو جس طرح سے نشٹ کیا ہے(عوام کی زندگی کو جس طرح برباد کیا ہے)، اسے سدھارنے کے لےے شیوسینا، بھارتیہ جنتا پارٹی کے ہریش چندر کے ہاتھ میں ستا کی چابی سونپنی ضروری ہے۔

گاندھی جی کہا کرتے تھے کہ ہندواستھان کو دنیا بھر کے بے سہاروں اور دلتوں کا آشرے استھان بننا چاہےے۔ ہندواستھان ویشوک دھرم شالہ بن چکا ہے۔ اس دھرم شالہ میں ہندواستھانیوں کی اپیکشا (کی بہ نسبت) بنگلہ دیشی اور پاکستان پریمیوں کی آبادی زیادہ ہوگئی ہے۔ شیورائے کے مہاراشٹر کی حالت کچھ زیادہ ہی دےنیےے (قابل رحم) ہے۔ دھرم شالہ میں بھی کسی مالک کی انومتی (اجازت) کی آوشیکتا (ضرورت) ہوتی ہے۔ ممبئی اور مہاراشٹر کو آﺅ جاﺅ، گھر اپنا ہے والی دھرم شالہ بنادی گئی ہے۔ ممبئی کی چھاتی پر بنگلہ دیشی سوار ہوگئے ہیں، اس لےے ہمارا پکا ارادہ ہے کہ سرکار میں آنے پر ہم ممبئی میں پرمٹ سسٹم لاگو کریں گے............ ................ کانگریس والوں نے مہاراشٹر واسیوں کو توڑ کر ستا پر قبضہ کرنے کا سوپن (خواب) سنجویا ہے۔ اس کے لےے منسے جیسی نالائق اولاد کو ہاتھ میں لے کر راج کرن (اقتدار) کا گج کرن (ہتھیار) چلایا ہے۔

یہ گج کرن مسلم لیگ کی اپیکشا(بہ نسبت) زیادہ بھینکر (خطرناک) ہے۔ مسلم لیگ اور اس کے محمد علی جناح نے دھرم کے نام پر کھلم کھلا پاکستان بنایا ہے۔ دیش کو توڑا، خون کی ندیاں بہائیں اور ہمیشہ ہمیشہ کے لےے ہندواستھان کے ہندوو¿ں کو دکھی اور آاِستھر (غیرمستحکم) کیا۔ انگریزوں نے جناح کی کھونپڑی میں زہر گھول کر اس کے ہاتھ میں کلہاڑی سونپ دی۔ اس کلہاڑی سے ہندوستان کے دو ٹکڑے کر دئےے گئے۔ کانگریس والے مہاراشٹر اور مراٹھی مانس کے لےے وہی بٹوارے کے بیج بو چکے ہیں۔ اس سمے (وقت) محمد علی جناح تھا، ادھر گھر والا ہی جناح ہے۔“یہ عبارت تھی مہاراشٹر ممبئی سے شائع ہونے والے مراٹھی اور ہندی اخبار ”دوپہر کا سامنا“ کے ادارےے کی، جس کے سروے سروا ہےں بالا صاحب ٹھاکرے۔ وہی بالا صاحب ٹھاکرے جو شیوسینا کے سپریمو بھی ہیں۔ وہ کانگریس یا این سی پی کے لےے کیا نظریہ رکھتے ہیں، یہ کانگریس اور این سی پی والے جانیں یا وہ جانیں، ہمیں اس پر کچھ نہیں کہنا۔ بال ٹھاکرے اپنے بھتیجے راج ٹھاکرے کو جو چاہے کہےں، یہ ان کا گھریلو معاملہ ہے۔

جیسا کہ خود اپنی تحریر میں انہوں نے اسے گھروالا قرار دیا ہے، مگر اگر راج ٹھاکرے کو جناح کہا جائے گا تو پھر ہمیں تاریخ کے دامن میں جھانک کر دیکھنا ہوگا۔ تقسیم وطن کے حالات پر غور کرنا ہوگا۔ محمد علی جناح کے عمل پر غور کرنا ہوگا۔ محمد علی جناح کے رول پر نظرثانی کرنی ہوگی اور آج کے جناح بقول بال ٹھاکرے یعنی راج ٹھاکرے کے کردار کو سمجھنا ہوگا۔ گزشتہ دوروز میں اس پر کافی کچھ لکھا ہے، آئندہ بھی لکھنے کی ضرورت پڑسکتی ہے، اس درمیان ”این ڈی ٹی وی“ نے بھی اپنے خاص پروگرام میں اس ایشو کو اٹھایا ہے، لہٰذا آج کی اس تحریر میں جناح کے حوالے سے کہی گئی بات پر بحث نہیں کرنا ہے، بلکہ اس تحریر میں جو دیگر باتیں کہی گئی ہیں اس پر قارئین کرام کی توجہ دلانا چاہتے ہیں۔ ہم نے زبان کا ذکر اس لےے کیا تھا کہ اس سے سامنے والے کے کردار کو سمجھنے کا موقع ملتا ہے۔

اگر یہ سامنے والا کوئی عام انسان ہے، تب ہم اس کی بات کو نظرانداز کرسکتے ہیں۔ اس پر زیادہ توجہ یا بحث کی ضرورت محسوس نہیں کرتے، لیکن وہی شخص اگر ہمارا رہنما بننے کا دعویٰ کرتا ہو، ریاست کا سربراہ بننے کا خواہاں ہو، تب ہمیں غور کرنا ضروری لگتا ہے، اس لےے کہ ہم اپنا مستقبل کسی ایسے بداخلاق شخص کے ہاتھوں میں کیسے سونپ سکتے ہیں، جسے بات کرنے کا سلیقہ بھی نہ ہو، جو کچھ بھی کہا گیا اس ادارےے میں اس کا مفہوم تو وہی رہ سکتا تھا، ہاں مگر زبان شائستہ ہوسکتی تھی۔ بنگلہ دیشیوں اور پاکستان سے محبت کرنے والوں کا حوالہ کن کے لےے اور کیوں دیا گیا ہے، یہ بھی کسی سے چھپا نہیں ہے۔ اس کا ذکر بھی ہم ذرا آگے چل کر کریں گے۔ اس وقت جس خاص بات پر توجہ دلانا ضروری ہے، وہ یہ ہے کہ اگر برسراقتدار آئے تو ہمارا پکا ارادہ کہ ہم ممبئی میں پرمٹ سسٹم لاگو کریں گے، یعنی اپنے ہی ملک میں ایک شہر سے دوسرے شہر جانے کے لےے یعنی ملک کے کسی بھی حصہ سے ممبئی میں داخل ہونے کے لےے پرمٹ کی ضرورت ہوگی۔

بالفاظ دیگر ملک کے اندر ہی ایک اور پاسپورٹ درکار ہوگا۔ اس بات کا تعلق کسی مذہب، ذات یا فرقہ سے نہیں، بلکہ ان تمام ہندوستانیوں سے ہے جبکہ ممبئی کو ممبئی بنانے میں، ممبئی کو ہندوستان کی اقتصادی راجدھانی بنانے کے لےے بہتوں نے اہم کردار ادا کیا ہے۔ ہم بے حد ادب کے ساتھ بال ٹھاکرے صاحب کی خدمت میں عرض کرنا چاہتے ہیں کہ ممبئی ہی نہیں، پورے ہندوستان کا سب سے بڑا تاجر گھرانہ مکیش امبانی اور انل امبانی ممبئی میں رہتے ہیں، لیکن دھیروبھائی امبانی کا تعلق گجرات سے تھا۔ شہنشاہِ جذبات دلیپ کمار عرف یوسف خان اور کپور خاندان پشاور سے آکر ممبئی میں بسے۔ دھرمیندر، سنیل دت اور ونودکھنہ ان سبھی کا تعلق پنجاب سے تھا۔ دنیا بھر میں اپنی طاقت کا لوہا منوانے والے داراسنگھ بھی اسی زمین سے تعلق رکھتے تھے۔

بالی ووڈ کے شہنشاہ امیتابھ بچن کا خاندان اترپردیش کے الٰہ آباد سے تعلق رکھتا ہے تو بادشاہ خان یعنی شاہ رُخ خان کا تعلق دہلی سے ہے۔ وجینتی مالا اور ریکھا سے لے کر رانی مکھرجی، سشمتا سین، ایشوریہ رائے تک سبھی مغربی بنگال یا جنوبی ہند سے آنے والی اداکارائیں ہیں۔ فیروز خان، سنجے خان، سمیرخان، اکبرخان ان سب کا تعلق بنگلور سے ہے تو اپنی اداکاری کا لوہا منوانے والی جیہ پردا اور تبو آندھراپردیش سے ہیں۔ محمد رفیع، نوشاد جیسے ناموں میں سے کوئی بھی مراٹھی نہیں۔ اگر ان سب کو الگ کردیں تو ممبئی میں کیا رہ جاتا ہے؟ جو عزت، دولت اور شہرت کماکر انہوں نے اور ان جیسی شخصیتوں نے ممبئی کو دیں اور دنیا کے نقشہ پر ایک باحیثیت نام بنایا، آخر وہ ان کے سواکون لوگ ہیں، جن کا نام لیا جاسکے؟ ٹھاکرے کے خاندان یا بھارتیہ جنتا پارٹی کے لیڈران، جن میں نریندر مودی جیسے نام آج سرفہرست نظر آتے ہیں، انہیں کس روپ میں دیکھا جاتا ہے، یہ کسی سے چھپا ہے؟

کیا یہ وہی نریندر مودی نہیں ہیں، جنہیں گجرات فسادات کے بعد وزیراعلیٰ رہتے ہوئے بھی امریکہ اور انگلینڈ میں داخلہ کی اجازت نہیں دی گئی تھی۔ بال ٹھاکرے، اودھو ٹھاکرے، راج ٹھاکرے قومی اور بین الاقوامی سطح پر کن باتوں کے لےے مقبول ہیں، یہ زمانہ جانتا ہے۔ انہوں نے ممبئی کو ممبئی بنانے میں کون سا کردار نبھایا ہے، یہ شری کرشن کمیشن کی رپورٹ میں صاف صاف درج ہے۔ چند سطریں بطور حوالہ پیش خدمت ہیں:

(1)22جون 1997کو شری کرشنا کمےشن کوموہت نام کے شخص نے اپنے بےان مےں کہا کہ فون کالس کے سبب مےری اور شےوسےنا چےف کی بات مےں رخنہ پڑرہاتھا۔وہ اےک ساتھ کئی فون پر بول رہے تھے اور جےسا مےں نے سنا اور سمجھا ۔ وہ سےنا کے کارکنوں کو مسلمانوں پر حملہ کرنے کے لئے حکم دے رہے تھے۔ مراٹھی مےں انہوں نے ’سرلا نڈےا نامارون ٹاکا‘ کہا۔ فون کرنے والے کو ہداےت دی کہ خےال رہے کوئی بھی مسلمان عدالت مےں گواہی دےنے کے لئے زندہ نہ بچنے پائے۔(2)کمےشن کی رپورٹ کہتی ہے کہ ”8جنوری 1993سے اس بات مےں کوئی شک نہےں ہے کہ مسلمانوں اور ان کی املاک پر منظم انداز مےں حملہ کرنے مےں شےوسےنا اور شےوسےنکوں نے کلےدی رول ادا کےا اور ےہ سب کچھ پارٹی کے کئی لےڈروں شاکھا پرمکھ سے لے کر شےوسےنا پر مکھ کی نگرانی مےں ہوا۔

سےنا پرمکھ نے اےک تجربہ کار جنرل کی طرح اپنے وفادار شےوسےنکوں کو مسلمانوں پر منظم انداز مےں حملے کے ذرےعہ بدلہ لےنے کا حکم دےا۔ شےوسےنا کے ذرےعہ فرقہ وارانہ فسادات بھڑکائے گئے اور اس کا استعمال جرائم پےشہ افراد نے اےک موقع کے طور پر کےا۔ جب تک شےوسےنا ےہ جان پائی کہ بدلے کے نام پر بہت کچھ کےا جاچکاہے تب تک حالات ان کے لےڈروں کے قابو سے باہر ہوگئے تھے اور ان کے لےڈروں کو اسے ختم کرنے کی اپےل کرنی پڑی۔“(3)کمشن ےہ شامل کرنا نہےں بھولا ” ےہاں تک کہ جب ےہ واضح ہو گےا کہ شےوسےنا کے لےڈران ہی فرقہ وارانہ فساد کی آگ لگانے مےں شامل رہے ہےں، تب پولس نے کہا کہ اگر اےسے لےڈران کو حراست مےں لےا جاتا ہے تو فرقہ وارانہ حالات اور بھی بدتر ہوسکتے ہےں اور وزےراعلیٰ سدھا کر راﺅ نائک کے لفظوں مےں کہےں تو ’بامبے مےں آگ لگ جائے گی‘ ۔جیسا کہ ہم نے اپنی کل کی تحریر میں لکھا تھا کہ بھارتیہ جنتا پارٹی اور شیوسینا کی کارکردگی کو سامنے رکھنے کے لےے ہمارے پاس گجرات فسادات اور شری کرشن کمیشن کی رپورٹ میں درج ایسے متعدد واقعات ہیں، جن سے ان پارٹیوں کے مزاج کوسمجھا جاسکتا ہے، لیکن میں اپنی آج کی اور آنے والے کل کی تحریر میں یہ واضح کردینا چاہتا ہوں کہ دراصل مسلم دشمنی کے نام پر ہندوتو کا ڈھنڈورا پیٹنے والی یہ پارٹیاں ہندوو¿ں کی نمائندہ پارٹیاں ہوہی نہیں سکتیں، بلکہ جہاں انہوں نے ایک طرف مسلمانوں کے قتل عام اور ان پر کےے جانے والے مظالم کی وجہ سے ان کے دلوں میں نفرت اور ناراضگی پیدا کی ہے، وہیں ہندوبھائیوں کو بھی کچھ کم اذیتیں نہیں پہنچائی ہیں۔ اس ذہنیت نے جو پہلا قتل کیا، وہ راشٹرپتا مہاتما گاندھی کا تھا، جو ایک ہندو تھے۔ سارے ہندوستان میں خود کو کٹرہندووادی بتاکر ہندوبھائیوں کا نام اپنے ساتھ جوڑ کر کبھی ہندو-مسلم، کبھی ہندو-سکھ تو کبھی ہندواورعیسائی کے درمیان خلیج پیدا کرتے رہے۔

پنجاب میں جو کچھ ہوا، وہ ہندو اور مسلمانوں کے درمیان نہیں، ہندوو¿ں اورسکھوں کے درمیان تھا۔اڑیسہ اور کرناٹک میں جو گرجاگھر نذرآتش کےے گئے، اس سے ہندوﺅں اور عیسائیوں کے درمیان خلیج پیدا ہوئی۔ بابری مسجد سانحہ اور گجرات فسادات نے ہندوو¿ں اور مسلمانوں کے درمیان نفرت کی دیوار کھڑی کی۔ کیا یہ سب کچھ ملک کی ترقی اور امن و امان میں کارگر ثابت ہوسکتا ہے؟ نہیں، قطعاً نہیں.... بلکہ یہ سوچ، یہ ذہنیت ملک کی ترقی میں سب سے بڑی رکاوٹ ہے۔ ہندو اور مسلمان کے درمیان، یعنی بھائی بھائی کے درمیان یہ نفرت کی سب سے بڑی وجہ ہے۔ آج جب دنیا کی بڑی طاقتیں پھر سے ہمیں اپنا غلام بنانے کی کوششوں میں مصروف ہیں، آج جبکہ ہمارے اپنے پڑوسیوں سے رشتے بہت خوشگوار نہیں ہیں، آج جب ہم دہشت گردی کے سائے میں جینے کو مجبور ہوگئے ہیں، ایسے میں اپنی سیاست کے لےے نفرت کے بیج بونے والوں کو نہ تو تاریخ کبھی معاف کرے گی اور نہ آج ہمیں ان کے جھوٹے فریب میں آنا چاہےے۔

دراصل یہی وہ لوگ ہیں، یہی وہ ذہنیت ہے، جس نے پہلے بھی اس ملک کے ٹکڑے کےے اور آج علیحدگی پسندی کا مزاج پیدا کرکے ریاستوںکو سرحد کی دیواروں میں بانٹ دینے کی سازشیں رچ رہی ہیں۔ ان کا نام کبھی جناح ہوتا ہے تو کبھی کوئی ٹھاکرے ہندوستان کی سالمیت اور قومی یکجہتی کو نقصان پہنچانے کے لےے سامنے آجاتا ہے۔ ہمیں ان چہروں کو مذہب کی بنیادوں پر نہیں دیکھنا چاہےے۔ علاقائیت یا زبان کے حوالہ سے بھی نہیں دیکھنا چاہےے، ضرورت ہے تو صرف اور صرف انہیں ان کے کردار اور ان کی ذہنیت سے انہیں پہچاننے کی۔

ایک آخری جملہ لکھ کر میں اپنی آج کی اس تحریر کو ختم کرتا ہوں کہ تمام دنیا میں کشمیریوں کی علیحدگی پسندی کا چرچا ہے، مگر کشمیر کی سرحد میں داخل ہونے کے لےے پرمٹ سسٹم کی بات تو اس ریاست کے کسی ایسے ذمہ دار نے بھی نہیں کی، جس کا قد شیوسینا کے سربراہ جیسا ہو اور جو ریاست میں برسراقتدار آنے کا دعویدار ہو، لہٰذا اس بات کو یونہی نظرانداز نہیں کیا جاسکتا کیوں کہ اس کا تعلق ہر ہندوستانی سے ہے۔ ہندوستان کی سالمیت سے ہے، فرقہ وارانہ ہم آہنگی سے ہے، قومی یکجہتی میں ہے۔



Monday, October 5, 2009

महाराष्ट्र इलैक्शन-जाऐं तो जाऐं कहां...?

महाराष्ट्र इलैक्शन-जाऐं तो जाऐं कहां...?

चुनाव की चिंता करें वे जो चुनाव लड़ रहे हैं या लड़ा रहे हैं............चुनाव की चिंता करें वे जिन्हें सरकार बनानी है, बनवानी है या बनने से रोकनी है............चुनाव की चिंता करें वे जिनके लिए चुनाव एक कारोबार है और जिसकी उन्हें पांच वर्ष तक प्रतीक्षा रहती है...........मेरे लिए चिंता का विषय है मेरी कौम, कौम की समस्याएं हैं, कौम का भविष्य है और इन सब बातों का सम्बन्ध क्योंकि चुनाव से भी है इसलिए चुनाव मेरे लिए भी महत्व रखता है।

मेरा कलम मेरा हथियार है इसलिए कि आज मेरी कौम को यही दरकार है। मेरा लेख कब किसको किस तरह अप्रिय लगे यह समझना मुश्किल है। हां मगर जो साफ-साफ मुझे समझने लगे हैं, क्योंकि मैं उन्हें अच्छी तरह समझता हूं इसलिए मेरी तहरीर उन्हें अप्रिय लगती होगी यह तो मैं भी अच्छी तरह जानता हूं और वह भी अच्छी तरह जानते हैं।

अतः आज कुछ बातें साफ-साफ करना चाहता हूं। वैसे भी घुमा-फिराकर बात करना उचित नहीं लगता। समझने के लिए दिमाग पर बहुत ज़ोर डालना पड़ता है, बड़ा समय लगता है और आज समय है किसके पास? हम तो पहले ही 62 वर्ष बर्बाद कर चुके हैं, अब समझने-समझाने में समय बर्बाद नहीं किया जा सकता है।

वर्तमान विधानसभा चुनावों के हवाले से मेरा आज का लेख कांग्रेस के पक्ष में जाता नज़र आ सकता है हालांकि कांग्रेस का किरदार कसीदे पढ़ने योग्य नहीं है और कसीदाख़ानी मुझे करनी भी नहीं है। लेकिन इसे कांग्रेस का सौभाग्य ठहराया जा सकता है कि बावजूद अनेक कमियों के आज तक राष्ट्रीय स्तर पर इसका कोई धर्मनिर्पेक्ष विकल्प पैदा नहीं हो सका है हां मगर उसे इस खुशफहमी का शिकार भी नहीं रहना चाहिए कि विवशता में ही सही जब उसका विकल्प ही नहीं है तो लोग जाएंगे कहां?

विवशता में उन्हें साथ आना ही होगा। कई बार हमने देखा है कि जनता इतनी विवश भी नहीं है, पूर्व में उसने अपने साथ की जाने वाली नाइंसाफियों की सज़ा भी दी है और उसे अगर उसका वाजिब अधिकार नहीं मिला तो वह कभी भी किसी को भी नज़रों से गिरा सकती है।
वर्तमान विधानसभा चुनावों में हमारे सामने एक प्रश्न है कि जाएं तो जाएं कहां..........?

अरूणाचल प्रदेश और हरियाणा की तुलना में यह प्रश्न महाराष्ट्र में अधिक उठता नज़र आ रहा है प्रश्न निरर्थक भी नहीं है............वास्तव में हमें यह समझना चाहिए कि आखिर वे कौन-कौन पार्टियां हैं जिनमें से हमें चुनाव करना है? हमारे सामने कांग्रेस और नैशनलिस्ट कांग्रेस का गठजोड़ है। कांग्रेस अर्थात वह पार्टी जिस पर हमने मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग से भी अधिक भरोसा किया......।

कांग्रेस अर्थात वह पार्टी जिसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर हमने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी......। कांग्रेस अर्थात वह पार्टी जिसके भरोसे हमने भारत में रह जाना पसन्द किया, पाकिस्तान को अपना देश नहीं समझा, मगर कांग्रेस हमें हमारा वाजिब अधिकार नहीं दे सकी। पिछले 62 वर्षों में लगभग आधी शताब्दी तक उसकी सरकार रही!

लेकिन भारत विभाजन से लेकर आतंकवाद तक का कलंक हमारे दामन पर लगता रहा लेकिन अब इसे एक संयोग कहिये या परवर दिगार-ए-आलम की ओर से भेजी गई ईश्वरीय सहायता कि पहला आरोप तो झूठा साबित हो ही चुका है । हम भारत विभाजन के उत्तरदायी नहीं हैं। कांग्रेस से अधिक यह आरोप लगाने और साबित करने का प्रयास किया संघ परिवार ने, उसके राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी ने और ऊपर वाले की बेआवाज़ लाठी भी पड़ी भी इसी पार्टी पर।

इस वास्तविकता को साबित करने में मदद भी मिली, इसी भारतीय जनता पार्टी से। जसवन्त सिंह ने भारतीय जनता पार्टी में रहते हुए जो पुस्तक लिखी उसने साबित किया कि मोहम्मद अली जिन्ना साम्प्रदायिक नहीं, धर्मनिर्पेक्ष थे, भारत विभाजन के इच्छुक नहीं थे, हिन्दू-मुस्लिम एकता के अलमबरदार थे और रही सही कसर पूरी कर दी कट्टर हिन्दुत्व और मुस्लिम दुश्मनी के मामले में संघ परिवार से भी अपने आप को दो कदम साबित करने वाली शिवसेना ने।

जिसने राज ठाकरे को महाराष्ट्र की राजनीति के हवाले से इस दौर का जिन्ना ठहरा दिया। अब यह तो सबके सामने है कि राज ठाकरे महाराष्ट्र की धरती के विभाजन का इच्छुक नहीं है। राज ठाकरे धर्म के आधार पर कोई अलग राज्य नहीं चाहता है। राज ठाकरे महाराष्ट्र की राजनीतिक ज़मीन पर अपना दबदबा चाहता है, राज ठाकरे स्वयं को मराठियों का नेता साबित करना चाहता है। अर्थात राज ठाकरे वही चाहता है जो हमेशा बाल ठाकरे ने चाहा।

अगर बाल ठाकरे जैसे बुद्धिमान व्यक्ति ने, जिसका सम्बन्ध साहित्य की दुनिया से भी है सोच-समझकर राज ठाकरे को जिन्ना की पदवी दे डाली तो साबित कर दिया कि वास्तव में मोहम्मद अली जिन्ना की इच्छा थी भारत पर शासन की, भारतीय जनता का नेता बनने की, देश का विभाजन मुसलमानों के नाम पर जिन्ना का उद्देश्य नहीं था।

दूसरा आरोप जो मुसलमानों पर लगा वह है आतंकवाद....इसके लिए कुछ हद तक कांग्रेस का क्योंकि उसी के सत्ता में रहते यह हुआ और बहुत हद तक शहीद हेमन्त करकरे का शुक्रिया अदा किया जा सकता है कि मुसलमानों के दामन पर लगने वाले इस दाग को मालेगांव बम ब्लास्ट की जांच ने धो डाला लेकिन यह काम अभी अधूरा है जो कांग्रेस को करना है।

दूसरा राजनीतिक गठजोड़ जो हमारे सामने है वह है भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का। 1901 में हिन्दू महासभा के जन्म के बाद से आज तक मुस्लिम दुश्मनी संघ परिवार की सोच रही है जिसे अमली जामा पहनाया है उसके राजनीतिक विंग भारतीय जनता पार्टी ने। गुजरात इस पार्टी के सत्ता में रहते भारत के माथे पर लगा वह कलंक है जिसे इतिहास कभी भुला नहीं पायेगा और जिसे इस पार्टी के सबसे बड़े नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी स्वीकार किया है।

दूसरी अर्थात भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टी शिवसेना जिसका किरदार मुस्लिम दुश्मनी में बी.जे.पी से भी चार कदम आगे रहा है? इसे बहुत स्पष्ट रूप से सामने रखा है जस्टिस श्रीकृष्ण कमीशन ने। इस लेख की श्रृंखला में हम गुजरात फ़साद से लेकर श्रीकृष्णा कमीशन की रिपोर्ट तक ऐसी घटनाओं का उल्लेख करेंगे जिनसे स्पष्ट हो जायेगा कि वास्तव में इस पार्टी की सोच क्या है, उसके कार्यकर्ताओं की कार्य प्रणाली क्या है?

और उसके नेता का उद्देश्य क्या है?
इन दोनों राजनीतिक पार्टियों के अतिरिक्त जिसे तीसरे मोर्चे का नाम दिया जा रहा है उसमें शामिल कुछ पार्टियां हैं और उनसे अलग बहुजन समाज पार्टी भी है। इन पार्टियों का इतिहास महाराष्ट्र की जनता के सामने है। महाराष्ट्र के सम्बन्ध में इन सबके बारे में बहुत अधिक कुछ लिखने और कहने की गुंजाइश नहीं है इसलिए कि ऐसी इन पार्टियों की इतनी हैसियत भी नहीं है कि यह महाराष्ट्र में सरकार बनाने या बनवाने में कोई स्पष्ट भुमिका निभा सकें फिर भी इन पार्टियों के मंसूबों को समझना आवश्यक है।

घोषित रूप से यह जो कहेंगे वह तो यही है कि वह महाराष्ट्र की जनता को कोई तीसरा विकल्प देना चाहते हैं। अगर उनसे यह कहा जाये कि आप तो इस हैसियत में नहीं हैं तब उनका उत्तर होगा कि कहीं से तो शुरूआत करना होगी, हम बेतहर भविष्य के लिए आशान्वित हैं प्रयास बेकार नहीं जायेगा। इस चुुनाव के बाद राज्य में हमारी जड़ें सुदृढ़ होंगी हो सकता है उनके इन दावों में दम हो, यह सही साबित भी हो जाए, मगर किस क़ीमत पर यह हमें सोचना होगा।

निःसन्देह हमारे वोटों की क़ीमत पर.......,अच्छी तरह जानती हैं यह स्वयं को तीसरा मोर्चा कहने वाली पार्टियां, उनका दावा भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के मतदाताओं पर नहीं है। कट्टर हिन्दू सोच का मतदाता उन्हें कोई महत्व नहीं देता। उनके खूबसूरत वादों के जाल में फंसने वाला धर्मनिर्पेक्ष और विशेषतः मुस्लिम मतदाता ही होता है, इसलिए अधिकतर मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारना या मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ज़ोरदार चुनावी अभियान छेड़कर ये राहें आसान कर देते हैं, उन साम्प्रदायिक पार्टियों के लिए जिनका अस्तित्व ही मुस्लिम दुश्मनी के लिए है यह पहला अवसर नहीं है जब दो बड़ी पार्टियों के गठजोड़ के अतिरिक्त अन्य छोटी पार्टियां चुनावी मैदान में मौजूद हैं।

अगर हम उनके पूर्व के चरित्र पर निगाह डालें तो ऊपर लिखीं पंक्तियों के महत्व को समझा जा सकता है, वैसे भी हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि तीसरे मोर्च के नाम पर मैदान में उतरने वाली पार्टियां केवल अपने अस्तित्व की जंग लड़ना चाहती हैं..........और अगर कुछ सीमा तक भी संभव हो सके तो उनका उद्देश्य केवल इतना है कि किसी भी तरह वह सौदेबाज़ी की हैसियत हासिल कर लें।

यहां सौदेबाज़ी का अर्थ यह नहीं है कि महाराष्ट्र राज्य में उन्हें इतनी सीटें जीत लेने की आशा है कि सरकार बनवाने या बनने से रोकने के लिए वह सौदेबाज़ी करने की स्थिति में आ जाएंगे बल्कि उन्हें यह लगता होगा कि अगर केन्द्र में दबाब बनाने का रास्ता महाराष्ट्र के चुनावों से निकल आता है तो इतना भी कुछ कम नहीं है। क्या उनकी इतनी सी इच्छा पूरी करने के लिए हमें यह जोखिम लेना चाहिए कि भले ही भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना की सरकार बन जाये, हमें तीसरे मोर्चे को महत्व देना चाहिए?

अब रहा प्रश्न भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के गठजोड़ का तो हमें नहीं लगता कि महाराष्ट्र की धर्मनिर्पेक्ष जनता महाराष्ट्र में बसने वाले उत्तर भारतीय, महाराष्ट्र की मुस्लिम जनता इस गठजोड़ की सरकार बनते देखना चाहेंगे। वैसे भी यह महत्वपूर्ण अवसर है भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक भविष्य के सम्बन्ध में भी और भारत में धर्मनिर्पेक्षता की मज़बूती के सम्बन्ध में भी।

पिछले संसदीय चुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी की जो दुर्गत बनी वह सबकेसामने है। जिस तरह 2009 के आम चुनावों में धर्मनिर्पेक्ष मतदाताओं ने मोहर लगाकर साबित किया कि उनका भरोसा धर्मनिर्पेक्षता में बना हुआ है, वह साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ नहीं जा सकते, उससे भारतीय जनता पार्टी में बिखराव आ गया वह आपसी फूट का शिकार हो गयी। अब उसे अपने पुर्न जीवन के लिए चाहिए किसी भी एक राज्य में सफलता।

केन्द्र की सरकार का सपना टूट जाने के बाद किसी भी राज्य में सरकार बनाने का अवसर। इसलिए कि यह पार्टी अच्छी तरह जानती है कि अगर इन विधानसभा चुनावों में भी उसे पराजय से दो-चार होना पड़ा तो उसका भविष्य तबाह हो जायेगा। अब यह निर्णय महाराष्ट्र, हरियाणा और अरूणाचल प्रदेश की धर्मनिर्पेक्ष जनता को करना है कि क्या वह साम्प्रदायिक शक्तियों की खोखली हो चुकी जड़ों को फिर से नया जीवन देने का जोखिम ले सकते हैं या फिर वह इस सुन्दर अवसर का उपयोग करते हैं भारत से साम्प्रदायिक राजनीति का पूरी तरह सफाया करने के लिए।

अगर धर्मनिर्पेक्ष मतदाताओं ने यह लड़ाई जीत ली तो फिर भारत को उसके धर्मनिर्पेक्ष भविष्य से कोई रोक नहीं सकता। जहां हिन्दू-मुस्लिम एकता भी नज़र आयेगी और साम्प्रदायिक सदभाव भी। हां यह स्थिति जो हमारे सामने है और वह विश्लेषण जो अभी मैंने पाठकों की सेवा में प्रस्तुत किया, निःसन्देह कांग्रेस के पक्ष में जाता दिखाई देता है जैसा कि मैंने अपने लेख के शुरू में ही स्पष्ट कर दिया था।

मैं अगर यह दो वाक्य नहीं लिखता या स्पष्ट रूप में कांग्रेस का नाम न लिखता तब भी यह विशलेषण किस दिश में जा रहा है समझना कठिन नहीं होता। मगर क्या इस डर से कि लेख किसी के विरूद्ध या किसी के पक्ष में हो सकता है, मुझे नहीं लिखना चाहिए था? मुझे नहीं लिखना चाहिए थी आज की राजनीतिक स्थिति?

अगर आप ऐसा सोचते हैं तो फाड़कर फेंक दीजिए रद्दी की टोकरी में कागज के इस टुकड़े को, कोई महत्व नहीं है इसका........और अगर आप सोचते हैं कि अब वह समय आ गया है कि हमें तमाम परिस्थितियों का जायज़ा लेकर साफ-साफ बातें करनी चाहिए जो हमें नापसन्द है वह किस आधार पर नापसन्द है सामने रख देना चाहिए, ताकि वह हमसे कोई आशा करे तो हमारी भावनाओं का ध्यान रखे, हमारे अधिकारों का ध्यान रखे और जिसे हम पसन्द कर रहे हों भले ही विवशतः में तो उस पर भी यह स्पष्ट रहे कि उसके कमज़ोर पहलू क्या हैं?

अगर उसने अपनी कार्य प्रणाली में परिवर्तन नहीं किया, समान अधिकार जो भारत के संविधान में दर्ज हैं देने में कोताही बरती तो आज प्राप्त होने वाला समर्थन है वह दीर्घकालीन नहीं हो सकता और यह तो ज़माना जानता ही है कि अगर कोई नज़रों से गिर जाये, आशाओं पर खरा न उतरे, भरोसे को तोड़ दे तो फिर उसके लिए नज़रों में उठना और भरोसा प्राप्त करना कितना कठिन होता है।

مہاراشٹر الیکشنـ جائیں تو جائیں کہاں…؟

الیکشن کی فکر کریںوہ، جو الیکشن لڑرہے ہیں یا لڑا رہے ہیں… الیکشن کی فکر کریںوہ، جنہیں سرکار بنانی ہے، بنوانی ہے یا بننے سے روکنی ہے… الیکشن کی فکر کریںوہ، جن کے لےے الیکشن ایک کاروبار ہے اور جس کا انہیں پانچ برس تک انتظار رہتا ہے… میرے لےے فکر کا موضوع میری قوم ہے، قوم کے مسائل ہیں، قوم کا مستقبل ہے اور ان سب باتوں کا تعلق چونکہ الیکشن سے بھی ہے، اس لےے الیکشن میرے لےے بھی اہمیت کا حامل ہے۔

میرا قلم میرا ہتھیار ہے، اس لےے کہ آج میری قوم کو یہی درکار ہے۔ میری تحریر کب کس کو کس طرح گراں گزرے، یہ سمجھنا مشکل ہے۔ ہاں، مگر جو صاف صاف مجھے سمجھنے لگے ہیں، کیوں کہ میں انہیں اچھی طرح سمجھتا ہوں، اس لےے میری تحریر انہیں گراں گزرتی ہی ہوگی یہ تو میں بھی اچھی طرح جانتا ہوں اورہ وہ بھی اچھی طرح جانتے ہیں۔

لہٰذا آج کچھ بات صاف صاف کرنا چاہتا ہوں۔ ویسے بھی گھما پھرا کر بات کرنا مناسب نہیں لگتا۔ سمجھنے کے لےے ذہن پر بہت زورڈالنا پڑتا ہے، بڑا وقت لگتا ہے اور آج وقت ہے کس کے پاس؟ ہم تو پہلے ہی 62برس برباد کرچکے ہیں، اب سمجھنے سمجھانے میں اور وقت برباد نہیں کیا جاسکتا۔ موجودہ ریاستی انتخابات کے حوالے سے میری آج کی تحریر کانگریس کے حق میں جاتی نظر آسکتی ہے، حالانکہ کانگریس کا کردار قصیدے پڑھنے کے لائق نہیں ہے اور قصیدہ خوانی مجھے کرنی بھی نہیں ہے۔

لیکن اسے کانگریس کی خوش نصیبی قرار دیا جاسکتا ہے کہ باوجود متعدد خامیوں کے آج تک قومی سطح پر اس کا کوئی سیکولر متبادل پیدا نہیں ہوسکا ہے۔ ہاں، مگر اسے اس خوش فہمی کا شکار بھی نہیں رہنا چاہےے کہ مجبوری میں ہی سہی جب اس کا نعم البدل ہی نہیں ہے تو لوگ جائیں گے کہاں؟ مجبوری میں تو انہیں ساتھ آنا ہی ہوگا۔ بارہا ہم نے دیکھا ہے کہ قوم اتنی مجبور بھی نہیں ہے۔ ماضی میں اس نے اپنے ساتھ کی جانے والی ناانصافیوں کی سزا بھی دی ہے اور اسے اگر اس کا واجب حق نہیں ملا تو وہ کبھی بھی، کسی کو بھی نظروں سے گرا سکتی ہے۔

موجودہ ریاستی انتخابات میں ہمارے سامنے ایک سوال ہے کہ جائیں تو جائیں کہاں…؟ اروناچل پردیش اور ہریانہ کے مقابلہ یہ سوال مہاراشٹر میں زیادہ گردش کرتا نظر آرہا ہے۔ سوال بے معنی بھی نہیں ہے…، واقعی ہمیں یہ سمجھنا چاہےے کہ آخر وہ کون کون پارٹیاں ہیں، جن میں سے ہمیں انتخاب کرنا ہے؟ ہمارے سامنے کانگریس اور نیشنلسٹ کانگریس کا اتحاد ہے۔

کانگریس یعنی وہ پارٹی جس پر ہم نے محمدعلی جناح کی مسلم لیگ سے بھی زیادہ بھروسہ کیا۔ کانگریس یعنی وہ پارٹی جس کے ساتھ کاندھا سے کاندھا ملا کر ہم نے آزادی کی جنگ لڑی۔ کانگریس یعنی وہ پارٹی جس کے بھروسہ ہم نے ہندوستان میں رہ جانا پسند کیا، پاکستان کو اپنا ملک نہیں سمجھا، مگر کانگریس ہمیں ہمارا واجب حق نہیں دے سکی۔

گزشتہ 62برسوں میں تقریباً آدھی صدی تک اس کی حکومت رہی، لیکن تقسیم وطن سے لے کر دہشت گردی تک کا داغ ہمارے دامن پر لگتا رہا، لیکن اب اسے اتفاق کہئے یا پروردگارِعالم کی جانب سے بھیجی گئی غیبی مدد کہ پہلا الزام تو جھوٹا ثابت ہوہی چکا ہے۔ ہم تقسیم وطن کے ذمہ دار نہیں ہےں۔ کانگریس سے زیادہ یہ الزام لگانے اور ثابت کرنے کی کوشش کی سنگھ پریوار نے، اس کی سیاسی جماعت بھارتیہ جنتا پارٹی نے اور اللہ کی بے آواز لاٹھی پڑی بھی اسی پارٹی پر۔ اس حقیقت کو ثابت کرنے میں مدد بھی ملی، اسی بھارتیہ جنتا پارٹی سے۔

جسونت سنگھ نے بھارتیہ جنتا پارٹی میں رہتے ہوئے جو کتاب لکھی، اس نے ثابت کیا کہ محمد علی جناح فرقہ پرست نہیں تھے، سیکولر تھے، تقسیم وطن کے خواہشمند نہیں تھے، ہندومسلم اتحاد کے علمبردار تھے اور رہی سہی کسر پوری کردی کٹر ہندوتو اور مسلم دشمنی کے معاملے میں سنگھ پریوار سے بھی اپنے آپ کو دو قدم آگے ثابت کرنے والی شیوسینا نے، جس نے راج ٹھاکرے کو مہاراشٹر کی سیاست کے حوالہ سے اس دور کا جناح قرار دے دیا۔ اب یہ تو سب کے سامنے ہے کہ راج ٹھاکرے مہاراشٹر کی زمین کے بٹوارے کا خواہش مند نہیں ہے۔

راج ٹھاکرے مذہب کی بنیادوں پر کوئی الگ ریاست نہیں چاہتا ہے۔ راج ٹھاکرے مہاراشٹر کی سیاسی زمین پر اپنا دبدبہ چاہتا ہے۔ راج ٹھاکرے خود کو مراٹھوںکا لیڈر ثابت کرنا چاہتا ہے۔ راج ٹھاکرے وہی چاہتا ہے، جو ہمیشہ بال ٹھاکرے نے چاہا۔ اگر بال ٹھاکرے جیسے ذہین شخص نے، جس کا تعلق لٹریچر کی دنیا سے بھی ہے سوچ سمجھ کر راج ٹھاکرے کو جناح کا لقب دے ڈالا اور ثابت کردیا کہ محمدعلی جناح کی خواہش تھی ہندوستان پر حکومت کی، ہندوستانیوں کا لیڈر بننے کی تمنا تھی، ملک کا بٹوارہ مسلمانوں کے نام پر جناح کا مقصد نہیں تھا۔

دوسرا الزام جو مسلمانوں پر لگا وہ ہے دہشت گردی… اس کے لےے کچھ حد تک کانگریس کا، کیوں کہ اسی کے دوراقتدار میں یہ ہوا اور بہت حد تک شہیدہیمنت کرکرے کا شکریہ ادا کیا جاسکتا ہے کہ مسلمانوں کے دامن پر لگنے والے اس داغ کو مالیگاؤں بم بلاسٹ کی تحقیق نے دھوڈالا، لیکن یہ کام ابھی ادھورا ہے، جو کانگریس کو کرنا ہے۔
دوسرا سیاسی گٹھ جوڑ جو ہمارے سامنے ہے، وہ بھارتیہ جنتا پارٹی اور شیوسینا کا۔ 1901میں ہندومہاسبھا کے جنم کے بعد سے آج تک مسلم دشمنی سنگھ پریوار کی سوچ ہے، جسے عملی جامہ پہنایا ہے اس کی سیاسی جماعت بھارتیہ جنتا پارٹی نے۔

گجرات اس پارٹی کے دوراقتدار میں ہندوستان کی پیشانی پر لگا وہ بدنما داغ ہے، جسے تاریخ کبھی بھلا نہیں پائے گی اور جسے اس پارٹی کے سب سے بڑے لیڈر سابق وزیراعظم اٹل بہاری واجپئی نے بھی تسلیم کیاہے۔ دوسری یعنی بھارتیہ جنتا پارٹی کی اتحادی پارٹی شیوسینا اس کا کردار مسلم دشمنی میں اس سے بھی چار قدم آگے رہا ہے؟ اسے بہت واضح طور پر سامنے رکھا ہے جسٹس شری کرشن نے۔ اس تحریر کے تسلسل میں ہم گجرات سے لے کر شری کرشن کمیشن کی رپورٹ تک ایسے واقعات کا تذکرہ کرےں گے، جن سے واضح ہوجائے گا کہ دراصل اس پارٹی کی سوچ کیا ہے؟ اس کے کارکنان کی کارکردگی کیا ہے؟ اور اس کے سربراہ کا مقصد کیا ہے؟

ان دونوں سیاسی پارٹیوں کے علاوہ جسے تیسرے محاذ کا نام دیا جارہا ہے، اس میں شامل کچھ پارٹیاں ہیںاور ان سے الگ بہوجن سماج پارٹی بھی ہے۔ ان پارٹیوں کا شجرہ مہاراشٹر کے عوام کے سامنے ہے۔ مہاراشٹر کے تعلق سے ان کے بارے میں بہت زیادہ کچھ لکھنے اور کہنے کی گنجائش نہیں ہے، اس لےے کہ ان پارٹیوں کی حیثیت بھی نہیں ہے کہ یہ مہاراشٹر میں سرکار بنانے یا بنوانے میں کوئی نمایاں کردار ادا کرسکیں۔ تاہم ان پارٹیوں کے منصوبوں کو سمجھنا ضروری ہے۔ اعلانیہ طور پر یہ جو کہیں گے، وہ تو یہی ہے کہ وہ مہاراشٹر کے عوام کو کوئی تیسرا متبادل دینا چاہتے ہیں۔

اگر ان سے یہ کہا جائے کہ آپ تو اس حیثیت میں نہیں ہیں، تب ان کا جواب ہوگا کہ کہیں سے تو شروعات کرنا ہوگی۔ ہم بہتر مستقبل کے لےے پرامید ہیں، کوشش رائیگاں نہیں جائے گی۔ اس الیکشن کے بعد ریاست میں ہماری جڑیں مضبوط ہوں گی۔ ہوسکتا ہے ان کے اس دعوں میں دم ہو، یہ صحیح ثابت بھی ہوجائیں، مگر کس قیمت پر، یہ ہمیں سوچنا ہوگا۔بیشک ہمارے ووٹوں کی قیمت پر…، اچھی طرح جانتی ہیں یہ پر خود کو تیسرا محاذ کہنے والی پارٹیاں کہ ان کا دعویٰ بھارتیہ جنتا پارٹی اور شیوسینا کے ووٹرس پر نہیں ہے۔ کٹر ہندو سوچ کا ووٹر انہیں کوئی اہمیت نہیں دیتا۔

ان کے خوبصورت وعدوں کے جال میں پھنسنے والا سیکولر اور بالخصوص مسلم ووٹر ہی ہوتا ہے، اس لےے زیادہ مسلم امیدوار میدان میں اتارنا یا مسلم اکثریت والے حلقوں میں زوردار انتخابی مہم چھیڑ کر یہ راہیں آسان کردیتے ہیں، ان فرقہ پرست پارٹیوں کے لےے جن کا وجود ہی مسلم دشمنی کے لےے ہے۔ یہ پہلا موقع نہیں ہے، جب دو بڑی پارٹیوں کے اتحاد کے علاوہ دیگر چھوٹی پارٹیاں انتخابی میدان میں موجود ہوں۔

اگر ہم ان کے سابقہ کردار پر نظر ڈالیں تو اوپر لکھی چند لائنوں کی اہمیت کو سمجھا جاسکتا ہے اور ویسے بھی ہم بہت اچھی طرح جانتے ہیں کہ تیسرے محاذ کے نام پر میدان میں اترنے والی پارٹیاں صرف اپنے وجود کی جنگ لڑنا چاہتی ہے… اور اگر کچھ حد تک بھی ممکن ہوسکے تو ان کا مقصد صرف اتنا ہے کہ کسی بھی طرح وہ سودے بازی کی حیثیت حاصل کرلیں۔

یہاں سودے بازی کا یہ مطلب نہیں کہ ریاست مہاراشٹر میں انہیں اتنی سیٹیں جیت لینے کی امید ہے کہ سرکار بنوانے یا بننے سے روکنے کے لےے وہ سودے بازی کرنے کی پوزیشن میں آجائیںگی، بلکہ انہیں یہ لگتا ہوگا کہ اگر مرکز میں دباؤ بنانے کا راستہ مہاراشٹر کے انتخابات سے نکل آتا ہے تو اتنا بھی کم نہیں ہے۔ کیا ان کی اتنی سی خواہش پوری کرنے کے لےے ہمیں یہ جوکھم لینا چاہےے؟ کہ بھلے ہی بھارتیہ جنتا پارٹی اور شیوسینا کی سرکار بن جائے، ہمیں تیسرے محاذ کو اہمیت دینی چاہےے۔

اب رہا سوال بھارتیہ جنتا پارٹی اور شیوسینا کے گٹھ جوڑ کا، تو ہمیں نہیں لگتا کہ مہاراشٹر کا سیکولر عوام مہاراشٹر میں بسنے والے اتربھارتیہ، مہاراشٹر کا مسلم عوام اس گٹھ جوڑ کی سرکار بنتے دیکھنا چاہے گا۔ ویسے بھی یہ اہم موقع ہے، بھارتیہ جنتا پارٹی کے سیاسی مستقبل کے تعلق سے بھی اور ہندوستان میں سیکولرزم کی مضبوطی کے تعلق سے بھی۔ گزشتہ پارلیمانی انتخابات کے بعد بھارتیہ جنتا پارٹی کی جو درگت بنی، وہ سب کے سامنے ہے۔

جس طرح 2009کے عام انتخابات میں سیکولر ووٹرس نے مہر لگاکر ثابت کیا کہ ان کا اعتماد سیکولرزم میں قائم ہے، وہ فرقہ پرست طاقتوں کے ساتھ نہیں جاسکتے۔ اس سے بھارتیہ جنتا پارٹی کا شیرازہ بکھرگیا۔ وہ آپسی پھوٹ کا شکار ہوگئی۔ اب اسے اپنی نئی زندگی کے لےے چاہےے، کسی بھی ایک ریاست میں کامیابی۔ مرکز کی حکومت کا خواب ٹوٹ جانے کے بعد کسی بھی ریاست میں سرکار بنانے کا موقع۔

اس لےے کہ یہ پارٹی اچھی طرح جانتی ہے کہ اگر ان ریاستی انتخابات میں بھی اسے شکست سے دوچار ہونا پڑا تو اس کا مستقبل تباہ ہوجائے گا۔ اب یہ فیصلہ مہاراشٹر، ہریانہ اور اروناچل پردیش کے سیکولر عوام کو کرنا ہے کہ کیا وہ فرقہ پرست طاقتوں کی کھوکھلی ہوچکی جڑوں کو پھر سے نئی زندگی دینے کا جوکھم لے سکتے ہیں؟ یا پھر وہ اس خوبصورت موقع کا استعمال کرتے ہیں، ہندوستان سے فرقہ پرست سیاست کا پوری طرح صفایا کرنے کے لےے۔

اگر سیکولرزم نے، سیکولر ووٹرس نے یہ لڑائی جیت لی تو پھر ہندوستان کو اس کے سیکولر مستقبل سے کوئی روک نہیں سکتا۔ جہاں ہندوـمسلم اتحاد بھی نظر آئے گا اور قومی یکجہتی (سرودھرم سمبھو) بھی۔ ہاں، یہ صورتحال جو ہمارے سامنے ہے اور وہ تجزیہ جو ابھی میں نے قارئین کی خدمت میں پیش کیا، جوبلاشبہ کانگریس کے حق میں جاتا دکھائی دیتا ہے، جیسا کہ میں نے اپنے مضمون کی ابتدا میں ہی واضح کردیا تھا۔میں اگر یہ دو جملے نہیں لکھتا یا واضح طور پر کانگریس کا نام نہ لکھتا، تب بھی یہ تجزیہ کس سمت میں جارہی ہے، سمجھنا مشکل نہیں ہوتا۔

مگر کیا اس خوف سے کہ تحریر کسی کے خلاف یا کسی کے حق میں ہوسکتی ہے، مجھے نہیں لکھنا چاہئے تھی؟ مجھے نہیں قلمبند کرنی چاہےے تھی آج کی سیاسی صورتحال؟اگر آپ ایسا سوچتے ہیں تو پھاڑ کر پھینک دیجئے ردّی کی ٹوکری میں کاغذ کے اس ٹکڑے کو، کوئی اہمیت نہیں ہے اس کی… اور اگر آپ سوچتے ہیں کہ اب وہ وقت آگیا ہے کہ ہمیں تمام حالات کا جائزہ لے کر صاف صاف باتیں کرنا چاہئیں، جو ہمیں ناپسند ہے، وہ کس بنیاد پر ناپسند ہے، سامنے رکھ دینا چاہےے، تاکہ وہ ہم سے کوئی امیدکرے تو ہمارے جذبات کا خیال کرے، ہمارے حقوق کا خیال رکھے اور جسے ہم پسند کررہے ہوں بھلے ہی مجبوری میں تو اس پر بھی یہ واضح رہے کہ اس کے کمزور پہلو کیا ہیں؟

اگر اس نے اپنی کارکردگی میں بدلاؤ نہیں کیا، یکساں حقوق جو ہندوستان کے آئین میں درج ہیں دینے میں کوتاہی برتی تو آج حاصل ہوجانے والی حمایت دیرپا نہیں ہوسکتی اور یہ تو زمانہ جانتا ہی ہے کہ اگر کوئی نظروں سے گرجائے، امیدوں پر پورا نہ اترے، اعتماد کو توڑ دے تو پھر اس کے لےے نظروں میں اٹھنا اور اعتماد حاصل کرنا کتنا مشکل ہوتا ہے؟

Sunday, October 4, 2009

मेरा पैगामे मोहब्बत है जहाँ तक पहुंचे

मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहां तक पहुंचे

करण जौहर ने अपनी फ़िल्म ‘वैक अप सिड’ में मुम्बई को बम्बई कहे जाने पर राज ठाकरे से क्षमा मांगी है और दरियादिल राज ठाकरे ने उन्हें क्षमा भी कर दिया। अच्छा ही हुआ कि यह मामला बड़े विवाद से बच गया। न सिनेमा घरों में आग लगी, न करण जौहर के घर पर एन.एन.एस. कार्यकर्ताओं के भयंकर प्रदर्शन हुए। हां, मगर यह सब कुछ बहुत ख़ामोशी से भी नहीं हो गया। इतना तो हुआ ही कि करण जौहर के पसीने छूट जायें और वह सर के बल चलते हुए राज ठाकरे के दरबार में हाज़िर हों और क्षमा याचना करें।

वैसे इस मामले में उन्हें शर्मिन्दा होने की आवश्यक्ता नहीं है वह पहले या अकेले फ़िल्म वाले नहीं हैं, जिन्हें इस प्रकार के हालात का सामना करना पड़ा। ‘ट्रेजडी किंग’ दिलीप कुमार से लेकर आज के मिलिनियम स्टार अमिताभ बच्चन तक लगभग ऐसे ही कारणों से ठाकरे परिवार के क़दमों में झुकते रहे हैं। हमें पता नहीं कि कब कौन सी सरकार ने किन हालात में मुम्बई को ठाकरे ख़ानदान की जागीर बना दिया।

अच्छा होता कि अगर यह स्पष्ट हो जाता तो इस शहर में बसने वाला हर व्यक्ति अपने आप को ठाकरे परिवार का कृतज्ञ समझता। कुछ हद तक तो समझते अब भी हैं ‘मगर बेहद मजबूरी के साथ, तब यह होता कि कोई भी व्यक्ति मुम्बई शहर में दाखि़ल होने के बाद सबसे पहले इस परिवार की चैखट को सलामी देता’ फिर अगर उनकी अनुमति होती तो मुम्बई को अपना निवास स्थान बनाता वरना उल्टे पांव लौट जाता।

नहीं, इसमें ठाकरे परिवार का कोई दोष नहीं है। आज कल टेलीवीज़न पर एक विज्ञापन बहुत दिखाया जाता है, इससे पहले भी ‘टाटा टी’ का विज्ञापन जनता के बीच बहुत प्रसिद्ध हुआ था। जब वोट मांगने के लिए आने वाले एक राजनीतिज्ञ से एक युवक कुछ इस प्रकार से प्रश्नों का सिलसिला शुरू कर देता है कि उन महाशय को लगता है कि यह उनका इन्टरव्यू ले रहा है।

इसलिए वह व्यंग्य में मालूम करते हैं कि ‘क्या मेरा इनटरव्यू ले रहे हो?’ युवक ‘हां’ में जवाब देता हुए कहता है कि ‘आपने एक विशेष कार्य के लिए आवेदन किया है, इसलिए यह जानकारी आवश्यक है।’ राजनीतिज्ञ मज़ाक उड़ाते हुए कहता है ‘‘जॉब, कैसा जाॅब...’’ नवयुवक का उत्तर होता है ‘‘देश को चलाने की जॉब’’।

इसी कम्पनी का नया विज्ञापन रिश्वतख़ोरी पर करारी चोट है। स्कूल, दफ़्तर, सड़क हो या मन्दिर हर जगह, हर व्यक्ति घूसख़ोरी में लगा है। फिर एक सवाल खड़ा होता है कि सब खाते हैं इसलिए कि हम खिलाते हैं, अगर यह दोनों विज्ञापन आपके ध्यान में हैं तो आज इलैक्शन के वातावरण में उन पर गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

क्यों ऐसा होता है? अगर मुम्बई को बम्बई कहना जुर्म है तो इस जुर्म पर अदालत में मुक़दमा चलना चाहिए, फिर सज़ा या माफ़ी जो भी निर्णय अदालत का हो उसे स्वीकार कर लिया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता, इसलिए कि वह झुकाते रहते हैं और हम झुकते रहते हैं।

मैं इस मामले में राज ठाकरे साहब को ज़्यादा क़सूरवार नहीं मानता, उन्हें तो यह राजनीतिज्ञ
कार्य प्रणाली विरासत में मिली है। वह नौजवान हैं, तेज़ तर्रार हैं, अच्छा पारिवारिक बैकग्राउंड है। प्रशंसकों की एक बड़ी संख्या मुम्बई में उनके साथ है। अब चाहने वाले पर ज़्यादा सवाल मत कीजियेगा। चाहत कभी आवश्यक्ता होती है तो कभी मजबूरी भी।

अब उनके साथ वजह क्या है यह तो वह जानें और चाहने वाले, लेकिन इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि राज ठाकरे बाल ठाकरे की शिव सेना को अच्छी टक्कर दे रहे हैं। इसलिए जहां एक ओर करण जौहर की फ़िल्म जैसे मामले को लेकर उन पर टिप्पणी को जी चाहता है, वहीं इस टक्कर देने के मामले में कभी कभी प्रशंसा करने को भी जी चाहता है। हालांकि ऐसा हो नहीं पाता।

यह मुहावरे तो आपने ख़ूब सुने होंगे कि ‘लोहा ही लोहे को काटता है’ या ‘घर का भेदी लंका ढाये’, यह दोनों मुहावरे राज ठाकरे पर लागू किये जा सकते हैं। अब रहा सवाल उत्तर भारतियों से घृणा के प्रदर्शन और उन पर की जाने वाली ज़ोर ज़बरदस्ती का। तो यह सोच भी राज ठाकरे को अपने चाचा बाल ठाकरे से मिली है। फ़िल्म वालों के साथ उनका व्यवहार भी बाल ठाकरे के व्यवहार की याद दिलाता है, जो कुछ उनके चाचा ने दिलीप कुमार और सायरा बानो या सुनील दत्त के साथ किया, वहीं सब राज ठाकरे अमिताभ बच्चन, जया बच्चन और करण जौहर के साथ कर रहे हैं।

असल झगड़ा है सियायसी विरासत का है इसलिए चोट तो इन्हीं बुनियादों पर करनी होगी, जिनको लेकर बाल ठाकरे कार्टून बनाते बनाते राजनीतिज्ञ बन गये। राज ठाकरे कार्य क्षेत्र से लेकर विचारों तक, उद्धव ठाकरे से कहीं अधिक बाल ठाकरे की विरासत के उत्तराधिकारी नज़र आते हैं।
अब यह हमें सोचने की आवश्यक्ता है कि इस सिलसिले को जारी रहना चाहिए या नहीं। जहां तक राजनीति का सम्बंध है तो इसका पूरा पूरा अधिकार बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे को भी और राज ठाकरे को भी, लेकिन जहां तक उनकी नीतियों का सम्बंध है तो इस पर चिन्तन की आवश्यक्ता है।
बाल ठाकरे की विचारधारा बदलने की तो कोई उम्मीद नहीं की जा सकती पर राज ठाकरे से अभी भी यह उम्मीद की जा सकती है वह बेशक अपने चाचा की राजनैतिक ज़मीन हासिल करने के लिए ये क़दम उठा रहे हों मगर राजनीति में लम्बा रास्ता तय करने के लिए उन्हें नफ़रत की राजनीति का दामन छोड़ना होगा। अगर उन्हें हमारे इस सुझाव पर कोई शक हो तो वह अपने चाचा की सहायक भारतीय जनता पार्टी की दुगर्ति देख कर इस बात का अन्दाज़ा कर सकते हैं कि आखि़रकार नफ़रत की राजनीति कामयाब नहीं होती।

हां, कुछ समय के लिए कामयाब ज़रूर दिखाई दे सकती है। क्या उन्होनें नहीं देखा पिछले लोकसभा चुनाव में और उसके बाद क्या हुआ? क्या उन्हें याद नहीं कि जब तक अटल बिहारी बाजपेयी जैसा विनम्र व्यक्तित्व जनता के सामने रहा यह पार्टी सत्ता में आती रही और धर्मनिरपेक्ष समझी जाने वाली पार्टियाँ भी सरकार बनाने में सहर्ष सहायक सिद्ध होती रहीं। मगर जब लाल कृष्ण आडवाणी और नरेन्द्र मोदी जैसे चेहरे सामने आये तो न सिर्फ़ जनता ने रूख़ मोड़ लिया बल्कि सहयोगी तक साथ छोड़ गये। ख़ुद यह पार्टी आज जिस हाल में है यह किसी से छिपा नहीं है।

जिस समय राज ठाकरे, बाल ठाकरे से अलग हुए थे तो यह उम्मीद पैदा हुई थी कि वह धर्मनिर्पेक्षता की राजनीति करेंगे, सबको साथ लेकर चलेंगे। हमने भी ‘आलमी सहारा’ के मुख्य पृष्ठ पर उनको स्थान दिया था। मुम्बई के कुछ मुसलमान भी इस उम्मीद में उनके साथ नज़र आते थे शायद इसलिए कि वह सोचते थे कि 6 दिसम्बर 1992 के बाद जो क़हर बरपा किया, अब आगे उसमें कमी आयेगी और अब हिन्दू मुस्लिम नफ़रत की राजनीति अधिक दिन नहीं चलेगी।

एक हद तक ऐसा हुआ भी, राज ठाकरे की यह सोच उत्तर भारतियों के खि़लाफ़ या मराठों के हक़ में तो रही पर इसमें हिन्दू मुस्लिम का वो दृष्टिकोण नज़र नहीं आया जो बाल ठाकरे या शिव सेना में नज़र आता था। उनकी पार्टी ने मुसलमानों के साथ वैसा सलूक नहीं किया जैसा बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद शिव सेना ने बाल ठाकरे की नेतृत्व में किया था।

इस समय भी अगर वह मराठों की लड़ाई लड़ रहे हैं और इस लड़ाई में वह बाल ठाकरे को पराजय दे देते हैं तो वह इतना तो अवश्य करेंगे कि बड़े पैमाने पर नफरत का ज़हर फैलाने वाली एक राजनीतिक पार्टी की जड़ें खोखली कर देंगे। मगर उसके बाद उन्हें अपनी राजनीति के लिए खुली विचारधारा का सबूत देना होगा। उन्हें इस दायरे को तोड़ना होगा, जिसमें उनके चाचा ने अपने आप को क़ैद कर लिया था।

कांग्रेस के प्रति उनके दिल में नरम रूख़ है या कांग्रेस के दिल में उनके लिए, इस बारे में हम कुछ नहीं कह सकते। हां, मगर यह उम्मीद तो ज़रूर है कि राज ठाकरे अगर अपने इरादों में सफ़ल होते हैं तो इससे शिव सेना को नुक़सान पहुंचेगा मगर जितना सच इस बात में नज़र आता है उतना ही सच यह भी है कि शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी भी आंख बंद किये नहीं बैठी हैं।

अगर राज ठाकरे कुछ हद तक साम्प्रदायिक वोटों में बँटवारा कर सकते हैं तो अपने आप को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाली पार्टियाँ बड़ी हद तक धर्मनिर्पेक्ष वोटों का बँटवारा करने के लिए मैदान में मौजूद हैं। जितना नुक़सान शिव सेना या भारतीय जनता पार्टी को राज ठाकरे के साम्प्रदायिक वोटों में बँटवारे से होगा उससे बड़ा नुक़सान कांग्रेस और नैशनलिस्ट कांग्रेस को इन धर्मनिर्पेक्ष पार्टियों के द्वारा प्राप्त किये गये वोटों के बँटवारे से होगा।

स्पष्ट है अब वह पार्टियाँ भी जानती हैं कि यह चुनाव उनके लिए किसी बड़ी कामयाबी की उम्मीदों वाला नहीं है। मगर कांग्रेस पर दबाव की राजनीति बनाने में ज़रूर कामयाब हो सकता है और अगर उनके भाग्य या राजनीतिक व्यूह रचना से उन्हें कुछ सीटें हासिल हो गईं और कांग्रेस एनसीपी गठबंधन या भाजपा शिवसेना गठबंधन स्पष्ट बहुमत से थोड़ा पीछे रह गए तो उनके दोनों हाथों में लड्डू हो सकते हैं जिधर उनकी आवश्यक्ता हो वह उधर जा सकते हैं।

अब सोचने की आवश्यक्ता मतदाताओं को है कि वह सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन का चुनाव करना चाहते हैं या इन राजनीतिक बाज़ीगरों के जाल में फंस कर अपना वोट उनकी सौदेबाज़ी के लिए देना चाहते हैं या अपनी समस्याओं के निवारण और बेहतर भविष्य के लिए देना चाहते हैं? दूसरी महत्वपूर्ण बात जिस पर हमें अब विचार करना होगा वह यह कि क्या उन्हें 6 दिसम्बर 1992 के बाद के हालात और गुजरात के दंगे याद हैं और अब वह ऐसी किसी भी ताक़त को सत्ता में नहीं आने देना चाहते या फिर उन्होंने स्वंय को हालात के धारे पर छोड़ दिया है।

अभी भी समय है कि सभी दृष्टिकोणों से वर्तमान हालात पर विचार कर लिया जाये और किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाये ताकि सही क़दम उठाया जा सके जो देश और क़ौम के पक्ष में हो, जो प्रदेश और प्रदेश में रहने वालों के पक्ष में हो इसलिए कि एक बार का ग़लत निर्णय केवल 5 वर्ष के लिए ही नहीं अपितु अनेक वर्षों के लिए कष्टदायक सिद्ध हो सकता है।

میرا پیغام محبت ہے جہاں تک پہنچے

کرن جوہر نے اپنی فلم ’’ویک اپ سِد‘‘ میں ممبئی کو بمبئی کہے جانے پر راج ٹھاکرے سے معافی مانگی اور فراخدل راج ٹھاکرے نے انھیں معاف بھی کر دیا ۔اچھا ہی ہوا کہ یہ معاملہ بڑے تنازعے سے بچ گیا۔نہ سنیما گھروں میں آگ لگی ،نہ کرن جوہر کے گھر پرایم این ایس کارکنان کے زبردست مظاہرے ہوئے ۔ہاں، مگر یہ سب کچھ بہت خاموشی سے بھی تو نہیں ہو گیا ۔اتنا تو ہوا ہی کہ کرن جوہر کے پسینے چھوٹ جائیں اور وہ سر کے بل چلتے ہوئے راج ٹھاکرے کے دربار میں حاضر ہوں اور معافی کے طلب گار ہوں۔

ویسے اس معاملے میں انھیں شرمندہ ہونے کی ضرورت نہیں ہے ۔ وہ پہلے یا اکیلے فلم والے نہیں ہیں ،جب اس طرح کے حالات کا سامنا کرنا پڑا۔شہنشاہ جذبات دلیپ کمار سے لے کر آج کے شہنشاہ وقت امیتابھ بچن تک تقریباً ایسی ہی وجوہات کی بنا پر ٹھاکرے خاندان کے قدموں میں جھکتے رہے ہیں۔ ہمیں پتہ نہیں کہ کب کون سی حکومت نے کن حالات میں ممبئی کو ٹھاکرے خاندان کی ملکیت میں دے دیا۔اچھا ہوتا اگر یہ وضاحت ہو جاتی تو اس شہر میں بسنے والا ہر شخص اپنے آپ کو ٹھاکرے خاندان کا مرہون منت سمجھتا ۔

کچھ حد تک تو سمجھتے اب بھی ہیں،مگر بیحد مجبوری کے ساتھ ۔تب یہ ہوتا کہ کوئی بھی شخص ممبئی شہر میں داخل ہونے کے بعد سب سے پہلے اس خاندان کی چوکھٹ کو سلامی دیتا ،پھر اگر ان کی اجازت ہوتی تو ممبئی کو اپنی قیام گاہ بناتا،ورنہ الٹے پائوں لوٹ جاتا۔

نہیں! اس میں ٹھاکرے خاندان کا کوئی قصور نہیں ہے ۔آجکل ٹیلی ویژن پر ایک اشتہار کثرت سے دکھایا جاتا ہے ۔ اس سے پہلے بھی ’’ٹاٹا ٹی‘‘ کا اشتہار عوام کے درمیان بہت مقبول ہوا تھا ،جب ووٹ مانگنے کے لئے آنے والے ایک سیاست داں سے ایک نوجوان کچھ اس انداز میں سوالات کا سلسلہ شروع کر دیتا ہے کہ ان مہاشے کو لگتا ہے کہ یہ ان کا انٹرویو لے رہا ہے ۔لہٰذا وہ طنز میں معلوم کرتے ہیں کہ کیا میرا انٹرویو لے رہے ہو؟

نوجوان ہاں میں جواب دیتے ہوئے کہتا ہے کہ آپ نے ایک اہم جاب کے لئے اپلائی جو کیا ہے، اس کے لئے یہ جانکاری ضروری ہے ۔ سیاست داں مذاق اڑاتے ہوئے کہتاہے ’’جاب، کون سی جاب…؟‘‘نوجوان کا جواب ہوتا ہے ’دیش کو چلانے کی جاب‘۔

اسی کمپنی کا تازہ اشتہار رشوت خوری پر کراری چوٹ ہے ۔ اسکول ،دفتر ،سڑک ہو یا مندر ہر جگہ ہر شخص رشوت خوری میں لگا ہے ۔پھر ایک سوال کھڑا ہوتا ہے کہ سب کھاتے ہیں، اس لئے کہ ہم کھلاتے ہیں ۔اگر یہ دونوں اشتہارات آپ کے ذہن میں ہیںتو آج الیکشن کے ماحول میں ان پر سنجیدگی سے سوچنے کی ضرورت ہے ۔کیوں ایسا ہوتا ہے ؟

اگر ممبئی کو بمبئی کہنا جرم ہے ،تو اس جرم پر عدالت میں مقدمہ چلنا چاہئے،پھر سزا یا معافی جو بھی فیصلہ عدالت کا ہو اسے تسلیم کر لیا جانا چاہئے، لیکن ایسا نہیں ہوتا اس لئے کہ وہ جھکاتے رہتے ہیں اور ہم جھکتے رہتے ہیں ۔
میں اس معاملے میں راج ٹھاکرے صاحب کو زیادہ قصور وار نہیں مانتا ۔انھیں تو یہ سیاسی حکمت عملی وراثت میں ملی ہے ۔

وہ نوجوان ہیں ،تیز طرار ہیں ،اچھا خاندانی پس منظر ہے ،چاہنے والوں کی ایک بڑی تعداد ممبئی میں ان کے ساتھ ہے ۔اب لفظ چاہنے والے پر زیادہ سوال مت کیجئے گا ۔چاہت کبھی خواہش ہوتی ہے تو کبھی مجبوری بھی۔ اب ان کے ساتھ وجہ کیا ہے ،یہ تو وہ جانیں اور ان کے چاہنے والے ، لیکن اس سچائی سے انکار نہیں کیا جا سکتا کہ آج راج ٹھاکرے بال ٹھاکرے کی شیو سینا کو اچھی ٹکر دے رہے ہیں ۔

لہٰذا جہاں ایک طرف کرن جوہر کی فلم جیسے معاملات پر ان پر تنقید کرنے کو جی چاہتا ہے۔وہیں اس ٹکر دینے کے معاملے میں کبھی کبھی تعریف کرنے کو بھی جی چاہتا ہے، حالانکہ ایسا ہو نہیں پاتا۔ یہ محاورے تو آپ نے خوب سنےں ہوںگے کہ ’لوہا ہی لوہے کو کاٹتا ہے‘ ، یا ’گھر کا بھیدی لنکا ڈھائے‘،یہ دونوں محاورے راج ٹھاکرے پر چسپاں کئے جا سکتے ہیں ۔

اب رہا سوال اتر بھارتیوں سے نفرت کے مظاہرے اور ان پر کی جانے والی زیادتی کا تو یہ سوچ بھی راج ٹھاکرے کو اپنے چچا بال ٹھاکرے سے ملی ہے ۔فلم والوں کے ساتھ ان کا سلوک بھی بال ٹھاکرے کے طرز عمل کی یاد دلاتا ہے ،جو کچھ ان کے چچا نے دلیپ کمار اور سائرہ بانو یا سنیل دت کے ساتھ کیا ،وہی سب راج ٹھاکرے امیتابھ بچن ،جیا بچن اور کرن جوہر کے ساتھ کررہے ہیں۔

9اصل جھگڑا ہے سیاسی وراثت کا ،لہٰذا چوٹ تو انھیں بنیادوں پر کرنا ہوگی ،جن کولے کر بال ٹھاکرے کارٹون بناتے بناتے سیاست داں بن گئے ۔راج ٹھاکرے پیشے سے لے کر ارادوں تک اودھو ٹھاکرے سے کہیں زیادہ بال ٹھاکرے کی وراثت کے حقدار نظر آتے ہیں ۔اب یہ ہمیں سوچنے کی ضرورت ہے کہ کیا اس سلسلے کو جاری رہنا چاہئے یا نہیں۔

جہاں تک سیاست کا تعلق ہے تو اس کا پورا پورا حق ہے بال ٹھاکرے ،اودھو ٹھاکرے کو بھی اور راج ٹھاکرے کو بھی ،لیکن جہاں تک ان کے طرز عمل کا تعلق ہے تو اس پر یقینا انتہائی غوروفکر کی ضرورت ہے ۔بال ٹھاکرے کا ذہن بدلنے کی تو اب کوئی امید نہیں کی جا سکتی ،مگر راج ٹھاکرے سے ابھی بھی یہ امید کی جا سکتی ہے کہ وہ بیشک اپنے چچا کی سیاسی زمین حاصل کرنے کے لئے یہ قدم اٹھارہے ہوں، مگر سیاست میں لمبا راستہ طے کرنے کے لئے انھیں نفرت کی سیاست کا دامن چھوڑنا ہوگا ۔

اگر انھیں ہمارے اس مشورے پر کوئی شک ہو تو وہ اپنے چچا کی معاون بھارتیہ جنتا پارٹی کا حشر دیکھ کر اس بات کا اندازہ کر سکتے ہیں کہ باالآخر نفر ت کی سیاست کامیاب نہیں ہوتی۔ ہاں ! کچھ وقت کے لئے کامیاب ضرور دکھائی دے سکتی ہے ۔ کیاں انھوں نے نہیں دیکھا گزشتہ پارلیمانی الیکشن میں اور اس کے بعد کیا ہوا۔کیا انھیں یاد نہیں کہ جب تک اٹل بہاری واجپئی جیسا نرم چہرہ عوام کے سامنے رہا ۔یہ پارٹی بر سر اقتدار آتی رہی ...

اور سیکولر سمجھی جانے والی پارٹیاں بھی سرکار بنانے میں بخوشی مدد گار ثابت ہوتی رہیں ،مگر جب لال کرشن اڈوانی اور نریندر مودی جیسے چہرے سامنے آئے تو نہ صرف عوام نے رخ موڑ لیا، بلکہ معاونین کی گرمجوشی بھی ختم ہو گئی ۔خود یہ پارٹی آج جس حال میں ہے، یہ کسی سے چھپا نہیں ہے ۔

جس وقت راج ٹھاکرے ،بال ٹھاکرے سے الگ ہوئے تھے تو یہ امید جگی تھی کہ وہ سیکولر زم کی سیاست کریں گے ۔ سب کو ساتھ لے کر چلیں گے ۔ہم نے بھی ’’عالمی سہارا‘‘ کے سر ورق پر ان کو جگہ دی تھی ۔ ممبئی کے کچھ مسلمان بھی اس امید میں ان کے ساتھ نظر آتے تھے، شاید اس لئے کہ وہ سوچتے تھے کہ 6 دسمبر 1992 کے بعد جو قہر برپا کیا گیا، اب آگے اس میں کمی آئے گی اور اب وہ ہندوـ مسلم نفرت کی سیاست زیادہ نہیں چلے گی ۔

ایک حد تک ایسا ہوا بھی ۔راج ٹھاکرے کا نظریہ اتر بھارتیوں کے خلاف یا مراٹھوں کے حق میں تو رہا، مگر اس میں ہندوـ مسلم کی وہ ذہنیت نظر نہیں آئی، جو بال ٹھاکرے یا شیو سینا میں نظر آتی ہے ۔ان کی پارٹی نے مسلمانوں کے ساتھ ویسا سلوک نہیں کیا جیسا بابری مسجد کی شہادت کے بعد بال ٹھاکرے کی سرپرستی میں شیو سینا نے کیا تھا ۔

اس وقت بھی اگر وہ مراٹھوں کی لڑائی لڑ رہے ہیں اور اس لڑائی میں وہ بال ٹھاکرے کو شکست دے دیتے ہیں تو وہ اتنا تو ضرور کریں گے کہ بڑے پیمانے پر نفرت کا زہر پھیلانے والی ایک سیاسی پارٹی کی جڑیں کھوکھلی کر دیں گے ،مگر اس کے بعد انھیں اپنی سیاست کے لئے کھلے ذہن کا ثبوت دینا ہوگا ۔انھیں اس دائرے کو توڑنا ہو گا،جس میں ان کے چچا نے اپنے آپ کو قید کر لیا تھا۔ کانگریس کے تئیں ان کے دل میں نرم گوشہ ہے یا ان کے تئیں کانگریس کے دل میں نرم گوشہ ہے ،اس بارے میں ہم کچھ نہیں کہہ سکتے۔

ہاں ! یہ قیاس آرائی تو ضرور ہے کہ راج ٹھاکرے اگر اپنے ارادوں میں کامیاب ہوتے ہیں تو اس سے شیو سینا کو نقصان پہنچے گا ،مگر جتنا سچ اس بات میں نظر آتا ہے ،اتنا ہی سچ یہ بھی ہے کہ شیو سینا اور بھارتیہ جنتا پارٹی بھی آنکھ بند کئے نہیں بیٹھی ہیں ۔

اگر راج ٹھاکرے کچھ حد تک کمیونل ووٹوں میں بٹوارہ کر سکتے ہیں تو اپنے آپ کو سیکولر کہنے والی پارٹیاں بڑی حد تک سیکولر ووٹوں کا بٹوارہ کرنے کے لئے میدان میں موجود ہیں ۔جتنا نقصان شیو سینا یا بھارتیہ جنتا پارٹی کو راج ٹھاکرے کے کمیونل ووٹوں میں بٹوارے سے ہوگا ،اس سے بڑا نقصان کانگریس اور نیشنلسٹ کانگریس کو ان سیکولر پارٹیوں کے ذریعے حاصل کئے گئے ووٹوں کے بٹوارے سے ہوگا ۔ظاہر ہے اب وہ پارٹیاں بھی جانتی ہیں کہ یہ الیکشن ان کے لئے کسی بڑی کامیابی کی امیدوں والا نہیں ہے،

مگر کانگریس پر دبائو کی راجنیتی بنانے میں ضرور کامیاب ہو سکتا ہے اور اگر ان کی قسمت یا سیاسی حکمت عملی سے انھیں کچھ سیٹیں حاصل ہو گئیں اور کانگریسـ این سی پی اتحاد یا بی جے پیـ شیو سینا اتحاد واضح اکثریت سے ذرا دور رہ گئے تو ان کے دونوں ہاتھوں میں لڈو ہو سکتے ہیں۔ جدھر ان کی ضرورت ہو وہ ادھر جا سکتے ہیں۔

اب سوچنے کی ضرورت ووٹرس کو ہے کہ وہ سرکار بنانے کے لئے کسی پارٹی یا اتحاد کا انتخاب کرنا چاہتے ہیں یا ان سیاسی بازیگروں کے جال میں پھنس کر اپنا ووٹ ان کی سودے بازی کے لئے دینا چاہتے ہیں یا اپنے مسائل کے حل اور بہتر مستقبل کے لئے دینا چاہتے ہیں ۔ دوسری اہم بات جس پر ہمیں اب غور کرنا ہوگا؟ وہ یہ کہ کیا انھیں 6 دسمبر 1992کے بعد کے حالات اور گجرات کے فسادات یاد ہیں اور اب وہ ایسی کسی بھی طاقت کو بر سر اقتدار نہیں آنے دینا چاہتے ۔

یا پھر انھوں نے اپنے آپ کو حالات کے سہارے چھوڑ دیا ہے۔ابھی بھی وقت ہے کہ تمام زاویوں سے تازہ صورت حال پر غور کر لیا جائے اورکسی نتیجے پر پہنچ لیا جائے تاکہ صحیح قدم اٹھایا جا سکے، جو ملک اور قوم کے حق میں ہو ،جو ریاست اور اس ریاست میں رہنے والوں کے حق میں ہو۔اس لئے کہ ایک بار کا غلط فیصلہ صرف پانچ برس کے لئے ہی نہیں،بلکہ برسہا برس کے لئے سوہانِ روح ثابت ہو سکتا ہے۔

Friday, October 2, 2009

मराठा ग़ैर मराठा नहीं, चुनिये सिर्फ हिन्दुस्तानी


मराठा ग़ैर मराठा नहीं, चुनिये सिर्फ हिन्दुस्तानी

मैं स्वयं को राजनीति से दूर ही रखना चाहता हूँ अभी तक इस प्रयास में सफल भी हूं मगर हालात कब क्या करवट लें कहना कठिन है। संसदीय चुनाव के बाद उपचुनाव का कोई विशेष महत्व नहीं था मगर महाराष्ट्र, हरियाणा और अरूणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों को निर्रथक या महत्वहीन नहीं कहा जा सकता।

इरादा नहीं था कि इन विधानसभा चुनावों के बारे में अपनी ओर से कोई राय पेश की जाये क्योंकि वह किसी के पक्ष में तो किसी के विरूद्ध जा ही सकती है इसीलिए अभी तक कुछ लिखा भी नहीं। जसवन्त सिंह जी की पुस्तक राष्ट्रीय, समाजी समस्याओं और मुठभेड़ जैसे मामलों पर लिखता रहा लेकिन पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र विशेषतः मुम्बई और मालेगांव से पाठकों का लगातार दबाव है कि ऐसे अवसर पर चुप रहना उचित नहीं होगा इसलिए कि मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए राजनीतिक दल हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं उनके पास न तो संसाधनों की कमी है, न पैसे की, न पार्टी कार्यकर्ताओं की जबकि हमारे पाठकों को लगता है कि उनका महबूब अखबार उन्हें कोई राय बनाने में कारगर साबित हो सकता है अतः मुझे इस विषय पर लिखना ही होगा।

शायद मैं इस सबको नज़र अंदाज कर देता हालांकि यह बहुत मुश्किल होता मगर जब महाराष्ट्र के मराठी अखबार ‘‘सामना’’ जो मुम्बई से प्रकाशित होता है, जिसे शिवसेना का प्रवक्ता और बाला साहब ठाकरे की अधिवक्ता कहा जाता है ने अपने राजनीतिक प्रतिद्विवंदी और अपने ही परिवार के एक राजनीतिज्ञ राज ठाकरे को जिन्ना जैसा कहा तो खामोश रहना मुश्किल हो गया। अतः अब यह भी आवश्यक है कि लिखा जाये और यह भी आवश्यक है कि इस बीच मुम्बई में रहकर ही लिखा जाये ताकि वहां की परिस्थितियों का जायज़ा लेते हुए अपने इस किस्तवार लेख के सिलसिले को आगे बढ़ाया जा सके।

अगर शिवसेना और उसका आर्गन अखबार यह महसूस करता है कि राज ठाकरे कम से कम महाराष्ट्र के लिए या मराठों के लिए वही रोल अदा कर रहे हैं जो देश के विभाजन के समय या उससे पूर्व मोहम्मद अली जिन्ना ने किया था तो हमारे लिए यह जसवन्त सिंह की पुस्तक ‘‘जिन्ना इंडपेंडेंस-पार्टिशिन इंडिया’’ से भी बड़ा धमाका है।

इसलिए कि जसवन्त सिंह ने तो केवल देश विभाजन के हालात बयान करते हुए मोहम्मद अली जिन्ना के इस सेक्यूलर किरदार को सामने रखा था जो भारत में राष्ट्रीय सद्भावना का ध्वजवाहक था, भारत और मुसलमानों को साथ लेकर चलना चाहता था, मगर बाला साहब ठाकरे के अखबार ‘‘सामना’’ ने तो यह स्पष्ट कर दिया कि मोहम्मद अली जिन्ना के सम्बन्ध में अब तक जो भी कहा जा रहा था वह सरासर गलत था।

मोहम्मद अली जिन्ना ने देश नहीं बांटा बल्कि मुसलमानों को बांटा था। अतः अगर मोहम्मद अली जिन्ना को किसी का दुश्मन ठहराया जा सकता है तो भारत का नहीं बल्कि मुसलमानों का। अभी तक तो पिछले 20 वर्षों से लिखकर और बोलकर यह बात हम कहते रहे थे कि भारत का विभाजन मुसलमानों को विभाजित करने के लिए था। इसके उत्तरदायी न हिन्दु हैं न मुसलमान बल्कि इसकी जिम्मेदार राजनीति है।

मोहम्मद अली जिन्ना का सपना था या इच्छा थी भारत पर राज करना और उस सपने को चकनाचूर करने का एक ही तरीका था कि ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा देकर मोहम्मद अली जिन्ना की आवाज़ को हमेशा-हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया जाये हमारी इस बात को संकीर्ण सोच ठहराया जा सकता था, पक्षपातपूर्ण कहा जा सकता था, लेकिन अब जबकि लगभग वही बात इस देश की कट्टर हिन्दु मानसिकता का प्रतिनिधित्व करने वाले बाला साहब ठाकरे के अखबार ‘‘सामना’’ ने कह दी तो फिर मान लीजिए कि हमने अब तक जो भी कहा या लिखा वह इतिहास की रोशनी में बयान किया गया एक कड़वा सच था जिसे निगलना मुश्किल हो रहा था।

अब आपके मन में यह सवाल पैदा हो सकता है कि देश विभाजन के सिद्धांत से बाला साहब ठाकरे के अखबार के द्वारा राज ठाकरे को जिन्ना कह देने का क्या सम्बन्ध? तो आदरणीय पाठकगण अगर आप गंभीरतापूवर्क गौर करेंगे तो यह समझना बिल्कुल मुश्किल नहीं है कि वास्तव में राज ठाकरे को मराठों के सम्बन्ध में जिन्ना ठहराकर शिवसेना ने उन ऐतिहासिक तथ्यों को सामने रख दिया है जिनकी ओर हम संकेत कर रहे थे।

अगर शिवसेना यह मानती है कि मराठों के लिए राज ठाकरे मोहम्मद अली जिन्ना जैसी भूमिका निभा रहे हैं तो फिर मान लीजिए कि जिन्ना ने यही भूमिका मुसलमानों के सम्बन्ध में निभायी थी। अगर राज ठाकरे मराठियों को विभाजित कर रहे हैं तो मोहम्मद अली जिन्ना भी उस समय मुसलमानों को दो टुकड़ों में बांट
रहे थे। अतः जिसने मुसलमानों को दो टुकड़ों में बांटा हो उसे मुसलमानों का प्रतिनिधि या मार्गदर्शक कैसे ठहराया जा सकता है? उसे मुसलमानों का हितैषी, भला चाहने वाला कैसे ठहराया जा सकता है?

फिर उसके द्वारा बनाये गये देश को मुसलमानों का देश कैसे ठहराया जा सकता है? अर्थात जो आरोप आज तक शिवसेना और संघ परिवार की ओर से मुसलमानों पर लगाये जाते रहे। आज उन्हीं आरोपों के आइने में उन्हें अपना चेहरा देखने की आवश्यकता है, क्योंकि ‘‘सामना’’ में राज ठाकरे को जिन्ना ठहराये जाने पर भारतीय जनता पार्टी की ओर से भी उसे रद्द करने का कोई बयान नहीं आया है इसलिए कहा जा सकता है कि वह भी शिवसेना की इस सोच से सहमत है कम से कम इस मामले में तो हम शिवसेना को मुबारकबाद पेश करेंगे कि यह पहला अवसर है जब किसी हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले राजनीतिक दल के आर्गन ने अपने ही ढंग से अर्थात कट्टर हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले किसी व्यक्ति को जिन्ना ठहराया है।

यह तो शिवसेना के इस बयान को देखने और समीक्षा करने का एक दृष्टिकोण था अब हम इसी सोच के दूसरे दृष्टिकोण पर बात करते हैं। वह जो स्वयं को राष्ट्रभक्त कहते हैं वह जो स्वयं को देश की राजधारा में चलने वाला ठहराते हैं और दिन रात यही ताना अल्पसंख्यकों विशेषतः मुसलमानों को देते रहते हैं, वह जो देश की अखंडता और अटूट भारत की बात करते हैं अब मराठियों की बात करना उनकी सोच का आइना है।

क्या यह भारत को धर्म-जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर तोड़ डालना चाहते हैं? अगर हां तो ये कैसे भारतीय हैं, कैसे वतन से मोहब्बत करने वाले हैं जो मराठी और गैर मराठी की दुहाई देकर भारतीयों को दो टुकड़ों में बांट देना चाहते हैं। क्या मराठी भारतीय नहीं हैं? क्या गैर गराठी भारतीय नहीं है? फिर प्रश्न उसी मानसिकता का जिसने भारत और पाकिस्तान को दो अलग-अलग देशों के रूप में दुनिया के नक्शे पर पहचाने जाने की शुरूआत की। आज वही अपनी राजनीति के लिए मराठी और गैर मराठी का राग अलाप रहे हैं।

यह बात केवल शिवसेना तक सीमित नहीं की जा सकती है इसलिए कि महाराष्ट्र में उसके साथ चुनाव लड़ने वाली भारतीय जनता पार्टी अगर उसके इन विचारों से सहमत नहीं, तो उसके साथ क्यों है। स्पष्ट है जब वह महाराष्ट्र में चुनाव लड़ती है तो मराठियों और गैर मराठियों के अन्तर को स्वीकार करती है और जब वह देश के अन्य राज्यों में चुनाव लड़ती है तो ‘‘हिन्दी, हिन्दु, हिन्दुस्तान’’ की बात करती है।

क्या उसे अपने इस दोहरे मापदंड पर गौर नहीं करना चाहिए? क्या वह समझती है कि भारत की जनता उसकी वास्तविकता को नहीं समझती हैं? यह पार्टी कहीं हिन्दु और मुसलमानों को विभाजित करने की बात करती है ताकि अपनी राजनीतिक ज़मीन को बचाये रखे तो कहीं अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए वह मराठी और गैर मराठी का नारा लगाने वालों के साथ खड़ी नज़र आती है। अब पूछना होगा कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से कि क्या लाल कृष्ण आडवाणी मराठी हैं? क्या नरेन्द्र मोदी मराठी हैं?

क्या राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज मराठी हैं? आज भारत भर की जनता भाजपा से यह प्रश्न कर सकती है कि उत्तर प्रदेश,मध्यप्रदेश, राजस्थान अर्थात जब हिन्दी राज्यों से रोज़गार की तलाश में जब हमारे नौजवान मुम्बई आते हैं तो इसी मराठी और गैर मराठी के राग के चलते वह अपने ही देश में गैर हो जाते हैं उन्हें गिरी हुई नज़रों से देखा जाता है, उन्हें अत्याचार और ज्यादती का शिकार बनाया जाता है उन्हें बेइज्जत करके राज्य छोड़ देने पर विवश किया जाता है

जब हमारे एक भारतीय नागरिक को आस्ट्रेलिया में अपमानित किया जाता है तो पूरा देश उसे एक शर्मनाक घटना ठहराता है और ठहराया भी जाना चाहिए लेकिन जब इन्हीं हालात का सामना भारतीयों को अपने ही देश में गैर मराठी होने के ताने के साथ बल्कि इसे गाली भी कहा जा सकता है, से करना पड़ता है तो यह राजनीतिज्ञ ख़ामोश रहते हैं, इसलिए कि उन्हें अपनी यह ख़ामोशी अपनी राजनीति की आवश्यकता नज़र आती है।

महाराष्ट्र में चुनाव कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के गठजोड़ और भारतीय जनता पार्टी व शिवसेना गठजोड़ के बीच है या फिर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी, राजठाकरे की एम.एन.एस. भी इसमें कोई भूमिका अदा कर रही है? इस की समीक्षा की जा सकती है और की भी जायेगी, लेकिन इस समय हम बात सीमित रखना चाहते हैं शिवसेना की सोच, राजठाकरे को जिन्ना कहे जाने और मराठी व गैर मराठी के प्रश्न पर अतः हम बात करेंगे केवल भाजपा और शिवसेना के गठजोड़ पर।

भारतीय जनता पार्टी स्पष्ट करे कि वह राजठाकरे को जिन्ना जैसा मानती है कि नहीं? भाजपा स्पष्ट करे कि क्या वह राजठाकरे को मराठी वोट के विभाजन का मोहरा मानती है कि नहीं? अगर हां तो राष्ट्र को बताए कि वह अब मोहम्मद अली जिन्ना को क्या मानती है। मराठा वोटों के विभाजन की तर्ज़ पर मुसलमान वोटों के विभाजन के लिए मोहम्मद अली जिन्ना को जिम्मेदार या फिर कुछ और..........? साथ ही भारतीय जनता पार्टी स्पष्ट करे कि वह मराठी और गैर मराठी के प्रश्न पर तमाम भारतीयों से क्या कहना चाहती है?

अगर वह मराठा मानुस की बात करती है तो क्या मान लिया जाये कि उसे गैर मराठी वोटों की आवश्यकता नहीं है और केवल महाराष्ट्र में नहीं पूरे भारत में कहीं भी गैर मराठी वोटों की आवश्यकता नहीं है और अगर ऐसा नहीं है तो उसे अपने गठजोड़ वाली शिवसेना और उसके नेता बाला साहब ठाकरे और उद्धव ठाकरे से कहना होगा कि वह अपनी जु़बान को लगाम दें, मराठी और गैर मराठी की बात न करें, भारतीयों को केवल भारतीय रहने दें।

वोट अपने उसूलों के आधार पर, अगर वास्तव में कुछ उसूल हैं तो और अपनी पार्टी के प्रदर्शन के आधार पर अगर वह इस योग्य है तो, अवश्य मांगे और निर्णय जनता पर छोड़ दें लेकिन जनता के बीच घृणा की खाई पैदा न करें। हम उसूलों की बात करेंगे तो केवल भाजपा ही नहीं अन्य पार्टियां भी मुश्किल में पड़ जायेंगी। मगर जहां तक प्रदर्शन का सवाल है तो भारतीय जनता पार्टी या शिवसेना की खाते में क्या है वह सामने रखे।

हमारे सामने इस समय उनके जो कारनामे हैं उनमें ‘गुजरात’ है जिसे भारतीय जनता पार्टी आज़ादी के बाद से अब तक का सबसे बड़ा कारनामा ठहरा सकती है। इसलिए कि उसकी जन्मदाता ‘जनसंघ’ ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद यही रास्ता दिखाया था और अगर हम शिवसेना के प्रदर्शन पर नज़र डालें तो हमें जस्टिस श्रीकृष्णा की कमीशन की रिपोर्ट को एक बार फिर पाठकों के सामने रखना होगा इसलिए कि निःसन्देह उसे ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया हो।

जस्टिस श्रीकृष्णा ने जिन मुजरिमों के चेहरों की निशानदही की भले ही वह आज़ाद घूम रहे हों, उन्हें कोई सज़ा न मिली हो, वह राजनीति का चोला पहनकर सम्मानित नागरिक बन गये हों, मगर महाराष्ट्र की जनता तो अच्छी तरह जानती और पहचानती है उन चेहरों को जिन्होंने हिन्दु और मुसलमानों के बीच नफरत की वह खाई पैदा की जिसे भरना आज तक कठिन हो रहा है।

निःसन्देह श्रीकृष्णा कमीशन की रिपोर्ट पर कोई अमल न हुआ हो मगर जनता के पास तो अपने अमल के प्रदर्शन का एक अवसर है जो एक लोकतांत्रिक देश में उसे हर पांच वर्ष के बाद मिलता है और कभी-कभी इससे पहले भी। इस अवसर पर उसके लिए यह कठिन नहीं होता कि तय कर ले कि निर्णय किसके पक्ष में करना है?

जो धर्म जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर भाई से भाई को बांटना चाहते हैं जो मराठी और गैर मराठी के प्रश्न पर घृणा के बीज बो रहे हैं उनके या फिर उनके पक्ष में जो सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं, भारतीय को केवल भारतीय मानते हैं मराठी या गैर मराठी नहीं, उत्तर भारतीय या दक्षिण भारतीय नहीं, बिहारी या बंगाली नहीं या यह सब राज्य उनकी पहचान अवश्य हो सकते हैं मगर देश की सीमाओं की तरह भारतीयों और भारतीयों के बीच बटवारे का आधार नहीं।

مراٹھا غیر مراٹھا نہیں، چنئے صرف ہندوستانی

میں خود کو سیاست سے دور ہی رکھنا چاہتا تھا، ابھی تک اس کوشش میں کامیاب بھی ہوں، مگر حالات کب کیا کروٹ لیں، کہنا مشکل ہے۔ پارلیمانی انتخابات کے بعد ضمنی انتخابات کی کوئی خاص اہمیت نہیں تھی، مگر مہاراشٹر، ہریانہ اور اروناچل پردیش کے ریاستی انتخابات کو بے معنی یا غیراہم قرار نہیں دیا جاسکتا۔ ارادہ نہیں تھا کہ ان ریاستی انتخابات کے بارے میں اپنی جانب سے کوئی رائے پیش کی جائے، کیوں کہ وہ کسی کے حق میں تو کسی کے خلاف جاہی سکتی ہے، اس لےے ابھی تک کچھ لکھا بھی نہیں۔

جسونت سنگھ جی کی کتاب قومی، ملی مسائل اور انکاؤنٹر جیسے معاملات پر لکھتا رہا، لیکن گزشتہ کئی روز سے مہاراشٹر بالخصوص ممبئی اور مالیگاؤں سے قارئین کا مسلسل اصرار ہے کہ ایسے موقع پر خاموش رہنا مناسب نہیں ہوگا، اس لےے کہ ووٹرس کو گمراہ کرنے کے لےے سیاسی جماعتیں ہر ممکن کوشش کررہی ہیں۔ ان کے پاس نہ تو ذرائع کی کمی ہے، نہ سرمایہ کی، نہ پارٹی کارکنان کی، جبکہ ہمارے قارئین کو لگتا ہے کہ ان کا محبوب اخبار انہیں کوئی رائے قائم کرنے میں کارگر ثابت ہوسکتا ہے۔

لہٰذا مجھے اس موضوع پر لکھنا ہی ہوگا، شاید میں اس سب کو نظرانداز کردیتا، حالانکہ یہ بہت مشکل ہوتا،مگر جب مہاراشٹر کے مراٹھی اخبار ’’سامنا‘‘جو ممبئی سے شائع ہوتاہے، جسے شیوسینا کا ترجمان اور بالا صاحب ٹھاکرے کی زبان قرار دیا جاتا ہے، نے اپنے سیاسی حریف اور اپنے ہی خاندان کے ایک سیاستداں راج ٹھاکرے کو جناح جیسا کہا تو خاموش رہنا مشکل ہوگیا، لہٰذا اب یہ بھی ضروری ہے کہ لکھا جائے اور یہ بھی ضروری ہے کہ اس درمیان ممبئی میں رہ کر ہی لکھا جائے تاکہ وہاں کے حالات کا جائزہ لیتے ہوئے اپنے اس قسط وار مضمون کے سلسلہ کو آگے بڑھایا جاسکے۔

اگر شیوسینا اور اس کا ترجمان اخبار یہ محسوس کرتا ہے کہ راج ٹھاکرے کم از کم مہاراشٹر کے لےے یا مراٹھوں کے لےے وہی رول ادا کررہے ہیں، جو تقسیم وطن کے وقت یا اس کے پہلے محمد علی جناح نے کیا تھا تو ہمارے نزدیک یہ جسونت سنگھ کی کتاب ’’جناح، انڈیاـپارٹیشنـانڈیپنڈنس‘‘ سے بھی بڑا دھماکہ ہے، اس لےے کہ جسونت سنگھ نے تو صرف تقسیم وطن کے حالات بیان کرتے ہوئے محمد علی جناح کے اس سیکولر کردار کو سامنے رکھا تھا، جو ہندوستان میں قومی یکجہتی کا علمبردار تھا، ہندو اور مسلمانوں کو ساتھ لے کر چلنا چاہتا تھا، مگر بالا صاحب ٹھاکرے کے اخبار ’’سامنا‘‘ نے تو یہ واضح کردیا کہ محمد علی جناح کے تعلق سے اب تک جو بھی کہا جارہا تھا، وہ سراسر غلط تھا۔

محمد علی جناح نے ملک نہیں بانٹا، بلکہ مسلمانوں کو بانٹا تھا، لہٰذا اگر محمدعلی جناح کو کسی کا دشمن قرار دیا جاسکتا ہے تو ہندوستان کا نہیں، بلکہ مسلمانوں کا۔ ابھی تک تو گزشتہ 20برس سے لکھ کر اور بول کر یہی بات ہم کہتے رہے تھے کہ ہندوستان کا بٹوارہ مسلمانوں کی تقسیم کے لےے تھا۔ اس کے ذمہ دار نہ ہندو ہیں نہ مسلمان، بلکہ اس کی ذمہ دار سیاست ہے۔ محمد علی جناح کا خواب تھا یا خواہش تھی ہندوستان پر حکومت کرنااور اس خواب کو چکناچور کرنے کا ایک ہی طریقہ تھا کہ زمین کا ایک چھوٹا سا ٹکڑا دے کر محمد علی جناح کی آواز کو ہمیشہ ہمیشہ کے لےے خاموش کردیا جائے۔

ہماری یہ بات ہماری تنگ نظری قرار دی جاسکتی تھی، اسے ہماری جانبدارانہ سوچ کہا جاسکتا تھا، لیکن اب جبکہ تقریباً وہی بات اس ملک کی کٹر ہندوذہنیت کی ترجمانی کرنے والے بالاصاحب ٹھاکرے کے اخبار ’’سامنا‘‘ نے کہہ دی تو پھر مان لیجئے کہ ہم نے اب تک جو بھی کہا یا لکھا وہ تاریخ کی روشنی میں بیان کیا گیا ایک کڑوا سچ تھا، جسے نگلنا مشکل ہورہا تھا۔ اب آپ کے ذہن میں یہ سوال پیدا ہوسکتا ہے کہ تقسیم وطن کی فلاسفی سے بالاصاحب ٹھاکرے کے اخبار کے ذریعہ راج ٹھاکرے کو جناح کہہ دینے کا کیا تعلق؟ تو قارئین حضرات اگر آپ سنجیدگی سے غور فرمائیں گے تو یہ سمجھنا قطعی مشکل نہیں ہے کہ دراصل راج ٹھاکرے کو مراٹھوں کے تعلق سے جناح قرار دے کر شیوسینا نے ان تاریخی حقائق کو سامنے رکھ دیاہے، جن کی طرف ہم اشارہ کررہے تھے۔

اگر شیوسینا یہ مانتی ہے کہ مراٹھوں کے لےے راج ٹھاکرے محمد علی جناح جیسا کردار نبھارہے ہیں تو پھر مان لیجئے کہ جناح نے یہی کردار مسلمانوں کے تعلق سے نبھایا تھا۔ اگر راج ٹھاکرے مراٹھوں کو تقسیم کررہے ہیں تو محمد علی جناح بھی اس وقت مسلمانوں کو دو ٹکڑوں میں بانٹ رہے تھے، لہٰذا جس نے مسلمانوں کو دو ٹکڑوں میں بانٹا ہو، اسے مسلمانوں کا نمائندہ یا رہنما کیسے قرار دیا جاسکتا ہے؟ اسے مسلمانوں کا ہمدرد، خیرخواہ کیسے قرار دیا جاسکتا ہے؟ پھر اس کے ذریعہ بنائے گئے ملک کو مسلمانوں کا ملک کیسے قرار دیا جاسکتا ہے؟ یعنی جو الزامات آج تک شیوسینا اور سنگھ پریوار کی جانب سے مسلمانوں پر لگائے جاتے رہے،

آج انہیں الزامات کے آئینہ میں انہیں اپنا چہرہ دیکھنے کی ضرورت ہے، کیوں کہ ’’سامنا‘‘ میں راج ٹھاکرے کو جناح قرار دئےے جانے پر بھارتیہ جنتا پارٹی کی جانب سے بھی اس کے رد میں کوئی بیان نہیں آیا ہے، اس لےے کہا جاسکتا ہے کہ وہ بھی شیوسینا کی اس سوچ سے متفق ہے۔ کم از کم اس معاملہ میں تو ہم شیوسینا کو مبارکباد پیش کریں گے کہ یہ پہلا موقع ہے، جب کسی ہندوؤں کی ترجمانی کرنے والی سیاسی جماعت کے ترجمان نے اپنے دعویٰ میں اپنی ہی طرز پر یعنی کٹرہندوتو کی سیاست کرنے والے کسی شخص کو جناح قرار دیا ہے۔

یہ تو شیوسینا کے اس بیان کو دیکھنے اور تجزیہ کرنے کا ایک زاویہ تھا، اب ہم اسی سوچ کے دوسرے زاویہ پر بات کرتے ہیں۔ وہ جو خود کو وطن پرست کہتے ہیں، وہ جو خود کو ملک کے قومی دھارا میں چلنے والا قرار دیتے ہیں اور دن رات یہی طعنہ اقلیتوں بالخصوص مسلمانوں کو دیتے رہتے ہیں، وہ جو ملک کی سالمیت اور اٹوٹ بھارت کی بات کرتے ہیں، اب مراٹھوں کی بات کرنا ان کی سوچ کا آئینہ ہے۔ کیا یہ ہندوستان کو مذہب، ذات، علاقہ اور زبان کے نام پر توڑ ڈالنا چاہتے ہیں؟ اگر ہاں، تو کیسے ہندوستانی ہیں یہ… کیسے وطن سے محبت کرنے والے ہیںیہ… جو مراٹھا اور غیرمراٹھا کی دہائی دے کر ہندوستانیوں کو دو ٹکڑوں میں بانٹ دینا چاہتے ہیں۔

کیا مراٹھا ہندوستانی نہیں ہیں؟ کیا غیرمراٹھا ہندوستانی نہیں ہیں؟ پھر سوال اسی ذہنیت کا، جس نے ہندوستان اور پاکستان کو دو الگ الگ ممالک کی شکل میں دنیا کے نقشے پر پہچانے جانے کی داغ بیل ڈالی۔ آج وہی اپنی سیاست کے لےے مراٹھا اور غیرمراٹھا کا راگ الاپ رہے ہیں۔ یہ بات صرف شیوسینا تک محدود نہیں کی جاسکتی، اس لےے کہ مہاراشٹر میں اس کے ساتھ الیکشن لڑنے والی بھارتیہ جنتا پارٹی اگر اس کے ان نظریات سے اتفاق نہیں رکھتی تو اس کے ساتھ کیوں ہے؟ ظاہر ہے جب وہ مہاراشٹر میں الیکشن لڑتی ہے تو مراٹھوں اور غیرمراٹھوں کے فرق کو تسلیم کرتی ہے اور جب وہ ملک کی دیگر ریاستوں میں الیکشن لڑتی ہے تو ہندی،ہندو، ہندوستان کی بات کرتی ہے۔

کیا اسے اپنے اس دوہرے معیار پر غور نہیں کرنا چاہےے؟ کیا وہ سمجھتی ہے کہ ہندوستانی عوام اس کی اس حقیقت کو نہیں سمجھتے ہیں؟ یہ پارٹی کہیں ہندو اور مسلمانو ںکو بانٹنے کی بات کرتی ہے تاکہ اپنی سیاسی زمین کو بچائے رکھے تو کہیں اپنے اس مقصد کو پورا کرنے کے لےے وہ مراٹھا اور غیرمراٹھا کا نعرہ لگانے والوں کے لےے ساتھ کھڑی نظر آتی ہے۔ اب پوچھنا ہوگا بھارتیہ جنتا پارٹی کے لیڈروں سے کہ کیا لال کرشن اڈوانی مراٹھا ہیں؟ کیا نریندر مودی مراٹھا ہیں؟

کیا راج ناتھ سنگھ اور سشما سوراج مراٹھا ہیں؟ آج ہندوستان بھر کے عوام بھارتیہ جنتا پارٹی سے یہ سوال کرسکتے ہےں کہ اترپردیش، مدھیہ پردیش، راجستھان یعنی تمام ہندی ریاستوں سے ذریعہ معاش کی تلاش میں جب ہمارے نوجوان ممبئی آتے ہیں تو اسی مراٹھا اور غیرمراٹھا کے راگ کے سبب وہ اپنے ہی ملک میں غیر ہوجاتے ہیں۔انہیں گری ہوئی نظروں سے دیکھا جاتا ہے، انہیں ظلم و زیادتی کا شکار بنایا جاتا ہے، انہیں بے عزت کرکے ریاست چھوڑ دینے پر مجبور کیا جاتا ہے۔ جب ہمارے ایک ہندوستانی شہری کو آسٹریلیا میں بے عزت کیا جاتا ہے تو پورا ملک اسے ایک شرمناک واقعہ قرار دیتا ہے اور دیا بھی جانا چاہے

لیکن جب انہیں حالات کا سامنا ہندوستانیوں کو اپنے ہی ملک میں غیرمراٹھا ہونے کے طعنہ کے ساتھ، بلکہ اسے گالی بھی کہا جاسکتا ہے، سے کرنا پڑتا ہے تو یہ سیاستداں خاموش رہتے ہیں، اس لےے کہ انہیں اپنی یہ خاموشی اپنی سیاست کی ضرورت نظر آتی ہے۔ مہاراشٹر میں الیکشن کانگریس اور نیشنلسٹ کانگریس کے اتحاد اور بھارتیہ جنتا پارٹی اور شیوسینا اتحاد کے درمیان ہے یا پھر سماجوادی پارٹی، بہوجن سماج پارٹی، ری پبلکن پارٹی، راج ٹھاکرے کی ایم این ایس بھی اس میں کوئی رول ادا کررہی ہے؟ اس سب کا تجزیہ کیا جاسکتا ہے اور کیا بھی جائے گا،

لیکن اس وقت ہم بات محدود رکھنا چاہتے ہیں شیوسینا کی سوچ، راج ٹھاکرے کو جناح کہے جانے اور مراٹھا اور غیرمراٹھا کے سوال پر، لہٰذا ہم بات کریں گے صرف بھارتیہ جنتا پارٹی اور شیوسینا کے اتحاد پر۔ بھارتیہ جنتا پارٹی واضح کرے کہ وہ راج ٹھاکرے کو جناح جیسا مانتی ہے یا نہیں؟ بھارتیہ جنتا پارٹی واضح کرے کہ کیاوہ راج ٹھاکرے کو مراٹھا ووٹ کی تقسیم کا مہرہ مانتی ہے یا نہیں؟ اگر ہاں، تو قوم کو بتائے کہ وہ اب محمدعلی جناح کو کیا مانتی ہے؟ مراٹھا ووٹوں کی تقسیم کی طرز پر مسلمان ووٹوں کی تقسیم کے لے محمد علی جناح کو ذمہ دار یا پھر کچھ اور…؟

ساتھ ہی بھارتیہ جنتا پارٹی واضح کرے کہ وہ مراٹھا اور غیرمراٹھا کے سوال پر تمام ہندوستانیوں سے کیا کہنا چاہتی ہے؟ اگر وہ مراٹھا مانس کی بات کرتی ہے تو کیا مان لیا جائے کہ اسے غیرمراٹھا ووٹوں کی ضرورت نہیں ہے اور صرف مہاراشٹر میں ہی نہیں تمام ہندوستان میں کہیں بھی غیرمراٹھا ووٹوں کی ضرورت نہیں ہے… اور اگر ایسا نہیں ہے تو اسے اپنی اتحادی پارٹی شیوسینا اور اس کے سربراہ بالا صاحب ٹھاکرے اور اودھو ٹھاکرے کو کہنا ہوگا کہ وہ اپنی زبان کو لگام دیں۔ مراٹھا اور غیرمراٹھا کی بات نہ کریں، ہندوستانیوں کو صرف ہندوستانی رہنے دیں۔

ووٹ اپنے اصولوں کی بنیاد پر، اگر واقعی کچھ اصول ہیں تو اور اپنی پارٹی کی کارکردگی کی بنیاد پر، اگر وہ اس لائق ہے تو، ضرور مانگیں اور فیصلہ عوام پر چھوڑ دیں، لیکن عوام کے درمیان نفرت کی خلیج پیدا نہ کریں۔ ہم اصولوں کی بات کریں گے تو صرف بی جے پی ہی نہیں، دیگر پارٹیاں بھی مشکل میں پڑجائیں گی، مگر جہاں تک کارکردگی کا سوال ہے تو بھارتیہ جنتا پارٹی یا شیوسینا کے کھاتے میں کیا ہے وہ سامنے رکھے۔

ہمارے سامنے اس وقت ان کے جو کارنامے ہیں، ان میں گجرات ہے، جسے بھارتیہ جنتا پارٹی آزادی کے بعد سے اب تک کا سب سے بڑا کارنامہ قرار دے سکتی ہے، اس لے کہ اس کی جنم داتا جن سنگھ نے مہاتماگاندھی کے قتل کے بعد یہی راستہ دکھایا تھا اور اگر ہم شیوسینا کی کارکردگی پر نظرڈالیں تو ہمیں جسٹس شری کرشن کمیشن کی رپورٹ کو ایک بار پھر قارئین کے سامنے رکھنا ہوگا، اس لےے کہ بیشک اسے ٹھنڈے بستے میں ڈال دیا گیا ہو۔ جسٹس شری کرشن نے جن مجرموں کے چہروں کی نشاندہی کی، بھلے ہی وہ آزاد گھوم رہے ہوں، انہیں کوئی سزا نہ ملی ہو، وہ سیاست کا چولا پہن کر عزت دار شہری بن گئے ہوں

مگر مہاراشٹر کے عوام تو بخوبی جانتے ہےں اور پہچانتے ہےں ان چہروں کو، جنہوں نے ہندو اور مسلمانوں کے درمیان نفرت کی وہ کھائی پیدا کی، جسے پر کرنا آج تک مشکل ہورہا ہے۔ بیشک شری کرشن کمیشن کی رپورٹ پر کوئی عمل درآمد نہ ہوا ہو، مگر عوام کے پاس تو اپنے عمل کے مظاہرے کا ایک موقع ہے، جو ایک جمہوری ملک میں اسے ہر پانچ سال کے بعد ملتا ہے اور کبھی کبھی اس کے پہلے بھی۔

اس موقع پر اس کے لےے یہ مشکل نہیں ہوتا کہ طے کرلے کہ فیصلہ کس کے حق میں کرنا ہے؟ جو مذہب، ذات، علاقہ اور زبان کے نام پر بھائی سے بھائی کو بانٹنا چاہتے ہیں، جو مراٹھا اور غیرمراٹھا کے سوال پر نفرت کے بیچ بورہے ہیں، ان کے یا پھر ان کے حق میں، جو سب کو ساتھ لے کر چلنا چاہتے ہیں، ہندوستانی کو صرف ہندوستانی مانتے ہیں، مراٹھا یا غیرمراٹھا نہیں، اتربھارتیہ یادکشن بھارتیہ نہیں، بہاری یا بنگالی نہیںیا یہ سب ریاستیں ان کی شناخت ضرور ہوسکتی ہیں، مگر ملک کی سرحدوں کی طرح ہندوستانیوں اور ہندوستانیوں کے درمیان بٹوارے کی بنیاد نہیں۔

Thursday, October 1, 2009

क्या केन्द्र सरकार नरेन्द्र मोदी पर भरोसा कर सकती है?

क्या केन्द्र सरकार नरेन्द्र मोदी पर भरोसा कर सकती है?

कल के लेख में हमने कुछ ऐसे मामलों को उल्लेख किया था और आज फिर कर रहे हैं, जिनमें पुलिस ने अनेक लोगों को एंकाउंटर में मार गिराया। क्या वास्तव में इन सभी घटनाओं में पुलिस की यही कार्यवाही होनी चाहिए थी? इस दिशा में भारत सरकार मुख्य रूप से गृह मंत्रालय को गंभीरता से सोचना चाहिए। ऐसी घटनाओं की लम्बी सूचि है, जिन्हें एक दो लेख तो क्या एक दो पुस्तकों में भी नहीं समेटा जा सकता।

हमने कुछ घटनाओं का उल्लेख केवल इसलिए किया है ताकि गृहमंत्री का ध्यान केंद्रित कर सकें और इशरत जहां के एंकाउंटर को एक टेस्ट केस के रूप में लेने का कारण भी यही है कि हमारे गृहमंत्री पी.चिदम्बरम इस एंकाउंटर के मामले की जानकारी रखते हैं, ऐसा उनके बयान से भी स्पष्ट होता है। अभी हम उनके इस बयान के हवाले से कुछ भी लिखना नहीं चाहते।

परन्तु हम यह आवश्य चाहते हैं कि हमारे टेस्ट केस इशरत जहां एंकाउंटर के संबंध में जो तथ्य हमारे पास हैं, उन्हें भारत सरकार के सामने रखा जाए और इसके बाद इशरत जहां की छोटी बहन मुसर्रत जहां का नज़रिया भी कि वह गुजरात सरकार को लेकर क्या राय रखती है और नरेन्द्र मोदी के सत्ता में रहते हुए उन्हें और उनके परिवार को किस हद तक न्याय मिलने की उम्मीद है।

पिछले दिनों गुजरात सरकार उस समय एक बार फिर जांच के दायरे में आई जब एक मजिस्ट्रेट की रिर्पोट ने 2004 में हुए इशरत जहां और तीन दूसरे लोगों की मुठभेड़ को फर्ज़ी करार दे दिया। एक दूसरे मामले में पहले ही राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के समक्ष स्वींकार कर चुकी है कि नवम्बर 2005 में सोहराबुद्दीन फर्ज़ी मुठभेड़ में मारा गाया था। सोहराबुद्दीन की पत्नी कोसरबी और एक महत्वपूर्ण गवाह तुलसीराम प्रजापती भी मारे गए थे।

विधानसभा में एक प्रश्न के उत्तर में गुजरात सरकार ने कहा है कि 2002 से 2006 के बीच 21 लोग मुठभेड़ में मारे गए। इशरत जहां मामले का उल्लेख सूचि में शामिल है। इसके अलावा अहमदाबाद के रहने वाले समीर खान पठान का नाम ग़ायब है जिसे पुलिस ने 2001 में मार गिराया था। समीर खान पर आरोप था कि उसने मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को मारने का षड्यंत्र रचा था।

बापोदी मोहम्मद शाह फकीर और मीर भीमा मान्डा अधेदरा की मुठभेड़ों में कईं प्रश्न को लेकर संबंध है। पूर्व मंत्री हीरेन पांडे की विधवा जाग्रती पांडे ने अपने पति के कत्ल के तीन साल पश्चात् एक पत्र के द्वारा पूरे मामले की दुबारा जांच का आग्रह किया था और इसी पत्र में जाग्रती पांडे ने यह भी उल्लेख किया था कि बापोदी और भीमा के पास उनके पति के कत्ल से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां थी।

दिलचस्प बात यह है कि डी जी वंजारा, एन के अमीन और पुलिसवालों की टीम अहमदाबाद के अधिकतर एंकाउंटर में शामिल रही है। इसी प्रकार से विसाड ज़िले में हुई चारो मुठभेड़ों में पुलिस इंसपेक्टर के जी अरदा और सब इंसपेक्टर जितेंदर यादव शामिल थे। 2002 के दंगों के समय इरदा की पोस्टिंग अहमदाबाद में थी जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा बनाई गई इस्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम ने नरोदा गाम और नरोदा पाट्या दंगों के संबंध में गिरफ्तार किया था।

भावनगर का रहने वाला सादिक जमाल 13 जूलाई को मारा गया था। गुजरात पुलिस ने दावा किया था कि वह आई एस आई का ऐजेंट है और उस का संबंध लश्कर तैयबा, दाऊद और छोटा शकील से है। सादिक पर आरोप था कि वह नरेंद्र मोदी, प्रवीन तोगड़िया, एल के आडवाणी को मारने के मिशन पर था। 6 महीने बाद मुम्बई के एक पत्रकार केतन तीरोडकर ने स्पेशल मकोका अदालत के सामने अपने बयान में दावा किया कि सादिक को फर्ज़ी एंकाउंटर में मारा गया था।

केतिन ने बताया कि मुम्बई के एंकाउंटर स्पेशलिस्ट दया नायक ने सादिक को गुजरात पुलिस के हवाले किया था। सादिक के भाई साबिर ने गुजरात उच्च न्यायालय का दरवाज़ा भी खटखटाया है। पुलिस की प्रारंभिक जांच के सभी दस्तावेज़ मैट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में हैं।

ध्मुम्बई के रहने वाले गणेश कंटे और महेंद्र जाधव 23 जून 2003 को अहमदाबाद में मारे गए था। पुलिस के अनुसार दोनों छोटा शकील गैंग के सदस्य थे और सीनियर बीजेपी लीडरों के क़त्ल की योजना बना रहे थे। जांच के दौरान डीटेक्शन आॅफ क्राइम ब्रांच ने पोटा के तहत मुम्बई से 8 अहमदाबाद से 3 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया था। इन में से तीन को ही 5 वर्ष की आम कैद की सज़ा हुई थी।

इशरत जहां, जावेद शेख़ उर्फ प्रानेश प्लाई, ज़ीशान जोहर उर्फ जांबाज़ और अमजद अली अकबर राणा को अहमदाबाद में 15 जून 2004 को मारा गया, जबकि जावेद शेख़ पूणे का रहने वाला था और इशरत जहां मुम्बरा की रहने वाली थी। पुलिस ने ज़ीशान और अमजद को पकिस्तानी शहरी बताया था। सी.बी.आई के अनुसार चारों का संबंध लश्क्र-ए-तैयबा से था और मोदी और दूसरे नेतओं की हत्या करने के मिशन पर थे।

इशरत की माँ शमीमा और जावेद के पिता गोपी नाथ प्लाई ने पूरे मामले की सी.बी.आई जांच के लिए उच्च न्यायालय में अर्ज़ी दी है। गुजरात उच्च न्यायालय ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यों की एक इस्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम (एस.आई.टी) बनाई है।

राज कोट में रहने वाले जाला पोपट को 17 जनवरी 2004 को मारा गया था। पुलिस को इस व्यक्ति की लूट और चोरी के 6 मामलों में तलाश थी। मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट दाख़िल की गई थी।

सलीम गागी भाई मियाना का नाम 11 प्रोबेशन मामलों में था। उसे 4 मई 2004 को मारा गया। न्यायालय में सलीम की माँ ने मामले को चेलेंज करते हुए आरोप लगाया कि एंकाउंटर फर्ज़ी था। इस मामले में एक हैड कांस्टेबल यनती देव सिंह ज़ाला को सज़ा हुई।

जाम नगर के रहने वाले रफीक़ उर्फ बापूदी मोहम्मद शाह फकीर को 18 जुलाई 2007 को मारा गया। इस व्यक्ति पर हत्या, चोरी और डाका डालने के 28 मामले थे। मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट दाख़िल की गई थी।

हत्या के साथ 14 मामलों में जूनागढ़ के मीरभीमा मांदा उधेदरा दारा की तलाश थी। 19 सितम्बर 2004 को उसे पुलिस ने एंकाउंटर में मार गिराया था। मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट दाख़िल की गई थी।

हत्या, लूट, चोरी और ग़ैर क़ानूनी रूप से हथियार सहित 11 मामलों में उत्तरप्रदेश के रहने वाले कश्यप हरपक सिंह ढ़ाका का नाम था। 14 अगस्त 2004 को वदोदरा में पुलिस ने मार गिराया। मजिस्टेªट जांच रिपोर्ट दाख़िल की गई थी।

डाका डालने के मामले में वांछित मेथो उमर डाफर, 14 मार्च 2004 को आनंद ज़िले में मारा गया।

हत्या, लूट, चोरी और डाका डालने सहित 14 मामलों में मतलूब राजेशवर उर्फ मिंटो, 9 अप्रैल 2005 को आनंद में मारा गया।

एक पुलिस कांस्टेबल की हत्या और लूट के मामले में वांछित सूरत के रहने वाले अनिल बेन मिश्रा बिहारी को 11 मार्च 2003 को सूरत के अधना मुगडला रोड पर मारा गया। मजिस्ट्रेट जांच ने पुलिस को क्लीन चिट दी थी।

लूट और हत्या की कोशिशों के मामलों में वांछित महेश दीपक गरवाली 21 जनवरी 2004 को सूरत में मारा गया।

हत्या और डाका डालने के मामले में वांछित एक पूर्व फौजी सुभाष भास्कर नायर सूरत धूलिया रोड, वलसाद पर 4 जून 2004 को मारा गया।

बिलसाड के रहने वाले संजय उर्फ संजू को 26 नवम्बर 2004 को मारा गया।

डोंगरिया हिमला मच्छर को वलसाद के माराई गांव में 25 अगस्त 2008 को मारा गया।

तस्करी, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और नेशनल सिक्यूरिटी एक्ट सहित 13 मामलों में वांछित जाम सिलाया के हाजी इस्माइल सूज़ानिया को 9 अक्तूबर 2005 को मारा गया।

हत्या, चोरी, डाका डालने और लूट के 42 मामलों में मतलूब विलसाड के रहने वाले जोगिन्द्र सिंह खट्टन सिंह सिख को 2006 में मारा गया।

हमारे पास ऐसी और भी बहुत सी घटनाओं का विवरण है, परन्तु इस समय हम मुसर्रत जहां का नज़रिया बयान करके आज का लेख यही समाप्त करते हैं।

इशरत जहां की छोटी बहन मुसर्रत जहां ने अपना दर्द बयान करते हुए कहा कि गुजरात सरकार और पुलिस पर हमें बिल्कुल भरोसा नहीं है, इसलिए इशरत जहां फ़र्ज़ी एंकाउंटर से संबंधित मुक़दमे को गुजरात उच्चन्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय में हस्तांतरित किया जाए और फ़र्ज़ी एंकाउंटर में लिप्त सभी राजनीतिज्ञों और पुलिस अधिकारियों को बेनक़ाब करने के लिए इस मामले की सी.बी.आई से जांच करायी जाए ताकि इशरत जहां हत्या की सच्चाई सबके सामने आसके और अपराधियों को अंजाम तक पहुंचाया जा सके।

दरअस्ल इशरत जहां की हत्या की गई थी और एंकाउंटर एक ड्रामा था। मजिस्ट्रेटी रिपोर्ट आने से सिद्ध हुआ, परन्तु गुजरात सरकार ने इस रिपोर्ट के विरूद्ध उच्च न्यायालय से इस्टे हासिल कर लिया, जो बहुत पीड़ाजनक बात है। गुजरात सरकार का यह कहना कि यह जांच रिपोर्ट बहुत जल्द तैयार की गई है, बड़ा हास्यासपद है।

हमने इस सच्चाई को सामने आने के लिए पांच वर्ष इंतिज़ार किया है, जो रिपोर्ट चार-पांच माह में आजानी चाहिए थी, वह इतनी देर से आई और उस पर भी गुजरात सरकार का यह रवैया है। इससे उसकी नियत साफ हो जाती है।

हमने ही मजिस्ट्रेटी तमांग की रिपोर्ट पर इस्टे के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है और हमें पूरी उम्मीद है कि हमें न्याय मिलेगा, परन्तु गुजरात उच्च न्यायालय में जारी सुनवाई से हम ज़्यादा संतुष्ट नहीं हैं क्योंकि वहां उन ‘लोगों’ की सरकार है और हम मानते हैं कि वह किसी भी जांच को ईमानदारी और ग़ैर जानिबदारी से पूरा नहीं होने देंगे। अभी जो जांच वहां चल रही है, उससे हम संतुष्ट नहीं हैं क्योंकि वहां गुजरात पुलिस, गुजरात सरकार और नरेन्द्र मोदी के साथियों की ओर से रूकावट की आशंका है।

हमारी मांग है कि इस पूरे मामले को सर्वोच्च न्यायालय में हस्तांतरित कर दिया जाए और एंकाउंटर की जांच सी.बी.आई से कराई जाए ताकि इस फर्ज़ी एंकाउंटर में लिप्त सभी राजनीतिज्ञों और पुलिस अधिकारियों के चेहरे बेनक़ाब हो सकें।

کیا مرکزی حکومت نریندر مودی پر بھروسہ کرسکتی ہے؟

کلکے مضمون میں ہم نے کچھ ایسے معاملات کا ذکر کیا تھا اور آج بھی کررہے ہیں، جن میں پولیس نے متعدد افراد کو انکاؤنٹر میں مار گرایا۔ کیا واقعی ان تمام واقعات میں پولیس کا یہی طرزعمل ہونا چاہےے تھا؟ اس سمت میں حکومت ہند بالخصوص وزارت داخلہ کو سنجیدگی سے غور کرنا چاہےے۔ ایسے واقعات کی طویل فہرست ہے، جنہیں ایک دو مضامین تو کیا ایک دو کتابوں میں بھی نہیں سمیٹا جاسکتا۔

ہم نے چند واقعات کا ذکر صرف اس لےے کیا ہے کہ تاکہ وزیرداخلہ کو متوجہ کرسکیں اور عشرت جہاں کے انکاؤنٹر کو ایک ٹیسٹ کیس کے طور پر لینے کی وجہ بھی یہ ہے کہ ہمارے وزیرداخلہ پی چدمبرم اس انکاؤنٹر کے معاملہ میں جانکاری رکھتے ہیں، ایسا ان کے بیان سے بھی واضح ہوتا ہے۔ ابھی ہم ان کے اس بیان کے حوالہ سے کچھ بھی لکھنا نہیں چاہتے، لیکن ہم یہ ضرور چاہتے ہیں کہ ہمارے ٹیسٹ کیس عشرت جہاں انکاؤنٹر کے تعلق سے جو حقائق ہمارے پاس ہیں، انہیں حکومت ہند کے گوش گزار کردیں اور اس کے بعد عشرت جہاں کی چھوٹی بہن مسرت جہاں کے تاثرات بھی کہ وہ گجرات حکومت کو لے کر کیا رائے رکھتی ہے اور نریندر مودی کے برسراقتدار رہتے ہوئے انہیں اور ان کے خاندان کو کس حد تک انصاف کی امید ہے۔

گزشتہ دنوں گجرات حکومت اس وقت ایک بار پھر جانچ کے دائرہ میں آئی، جب ایک مجسٹریٹ کی رپورٹ نے 2004میں ہوئے عشرت جہاں اور تین دوسرے افراد کی مڈبھیڑ کو فرضی قرار دے دیا۔ ایک دوسرے معاملہ میں پہلے ہی ریاستی حکومت سپریم کورٹ کے سامنے قبول کرچکی ہے کہ نومبر 2005میں سہراب الدین شیخ فرضی مڈبھیڑ میں مارا گیا تھا۔ سہراب الدین کی بیوی کوثر بی اور ایک اہم گواہ تلسی رام پرجاپتی مارے گئے تھے۔ اسمبلی میں ایک سوال کے جواب میں گجرات حکومت نے کہا تھا کہ 2002سے 2006کے درمیان 21لوگ مڈبھیڑ میں مارے گئے۔

عشرت جہاں معاملہ کا ذکر فہرست میں ہے، لیکن اس میں سہراب الدین، اس کی بیوی یا پرجاپتی کا نام شامل نہیں ہے۔ اس کے علاوہ احمد آباد کے رہنے والے سمیر خان پٹھان کا نام غائب ہے، جسے پولس نے اکتوبر 2001میں مار گرایا تھا۔ سمیر خان پر الزام تھا کہ اس نے وزیر اعلیٰ نریندر مودی کو مارنے کی سازش رچی تھی۔
باپو دی محمد شاہ فقیر اورمیر بھیما ماندا ادھے دارا کی مڈبھیڑوں پر اٹھے سوالات میں ایک تعلق ہے۔ سابق وزیر ہرین پانڈیا کی بیوہ جاگرتی پانڈیا نے اپنے شوہر کے قتل کے تین سال بعد ایک خط کے ذریعہ پورے معاملہ کی دوبارہ جانچ کا مطالبہ کیا تھا اور اسی خط میں جاگرتی پانڈیا نے یہ بھی ذکر کیا تھا کہ باپو دی اور بھیماکے پاس ان کے شوہر کے قتل سے متعلق اہم معلومات تھیں۔

دلچسپ بات یہ ہے کہ ڈی جی ونذارا، این کے امین اور دوسرے پولس والوں پر مبنی پولس ٹیم ہی احمد آباد کے زیادہ تر انکائونٹر میں شامل رہی ہے۔ اسی طرح سے ولساڈ ضلع میں ہوئی چاروں مڈبھیڑوں میں پولس انسپکٹر کے جی اردا اور سب انسپکٹر جتیندر یادو شامل تھے۔ 2002کے فسادات کے وقت اردا کی پوسٹنگ احمد آباد میں تھی، جسے بعد میں سپریم کورٹ کے ذریعہ مقرر کی گئی اسپیشل انویسٹی گیشن ٹیم نے نرودا گام اور نرودا پاٹیہ فسادات کے سلسلے میں گرفتار کیا تھا۔

بھائونگر کا رہنے والا صادق جمال مہتر 13جولائی 2004کو مارا گیا تھا۔ گجرات پولس نے دعویٰ کیا تھا کہ وہ آئی ایس آئی کا ایجنٹ ہے اور اس کا تعلق لشکر طیبہ ، دائودابراہیم اور چھوٹا شکیل سے ہے۔ صادق پر الزام تھا کہ وہ نریندر مودی، ایل کے اڈوانی اور وی ایچ پی لیڈر پروین توگڑیا کو مارنے کے مشن پر تھا۔ چھ ماہ بعد ممبئی کے ایک صحافی کیتن تیروڑکر نے اسپیشل مکوکا عدالت کے سامنے اپنے بیان میں دعویٰ کیا کہ صادق کو فرضی انکائونٹر میں مارا گیا تھا۔ کیتن نے بتایا کہ ممبئی کے انکائونٹر اسپیشلسٹ دیانائک نے صادق کو گجرات پولس کے حوالے کیا تھا۔ صادق کے بھائی صابر نے گجرات ہائی کورٹ کا دروازہ کھٹکھٹایا ہے۔ پولس کی ابتدائی جانچ کے تمام دستاویز چیف میٹرو پولیٹن مجسٹریٹ کی عدالت میں ہیں۔

ممبئی کے رہنے والے گنیش کنٹے اور مہندر جادھو 23جون 2003کو احمد آباد میں مارے گئے تھے۔ پولس کے مطابق دونوں چھوٹا شکیل گینگ کے ممبر تھے اور سینئر بی جے پی لیڈروں کے قتل کا منصوبہ بنارہے تھے۔ جانچ کے دوارن ڈیٹکشن آف کرائم برانچ (ڈی سی جی) نے پوٹا کے تحت ممبئی سے 8 اور احمد آباد سے 3افراد کو گرفتار کیا تھا۔ ان میں سے صرف تین کو ہی 5سال کی قید کی سزا ہوئی تھی۔

عشرت جہاں رضا، جاوید شیخ عرف پرانیش پلائی، ذیشان جوہر عرف جانباز اور امجد علی اکبر رانا کو احمد آباد میں 15جون 2004کو مارا گیا، جبکہ جاوید شیخ پونے کا رہنے والا تھا اور عشرت ممبرا کی رہنے والی تھی۔ پولس نے ذیشان اور امجد کو پاکستانی شہری بتایا تھا۔ انٹلی جنس بیورو کے مطابق چاروں کا تعلق لشکر طیبہ سے تھا اور وہ مودی اور دوسرے لیڈروں کو قتل کرنے کے مشن پر تھے۔ عشرت کی ماں شمیمہ اور جاوید کے والد گوپی ناتھ پلائی نے پورے معاملہ کی سی بی آئی جانچ کے لئے ہائی کورٹ میں عرضی دی ہے۔ گجرات ہائی کورٹ نے معاملہ کی جانچ کے لئے تین اراکین پر مبنی اسپیشل انویسٹی گیشن ٹیم (ایس آئی ٹی) مقرر کی ہے۔

راج کوٹ کے رہنے والے جالا پوپٹ کو 17جنوری 2004کو مارا گیا تھا۔ پولس کو اس شخص کی لوٹ اور چوری کے 6معاملوں میں تلاش تھی۔ مجسٹریٹ جانچ کی رپورٹ داخل کی گئی تھی۔

سلیم گاگی بھائی میاناکا نام 11امتناعی معاملوں میں تھا۔ اسے 4مئی 2004کو مارا گیا ۔ عدالت میں سلیم کی والدہ نے معاملے کو چیلنج کرتے ہوئے الزام لگایا کہ انکائونٹر فرضی تھا۔ اس معاملے میں ایک ہیڈکانسٹبل ینتی دیو سنگھ زالہ کو سزا ہوئی۔

جام نگر کے رہنے والے رفیق عرف باپودی محمد شاہ فقیر (Faquir)کو 18جولائی 2007کو مارا گیا۔ اس شخص پر قتل، چوری اور ڈاکہ زنی کے 38معاملے تھے۔ مجسٹریٹ جانچ کی رپورٹ داخل کی گئی تھی۔

قتل کے ساتھ 14معاملوں میں جوناگڑھ کے میر بھیما ماندہ ادھے دارا کی تلاش تھی۔ 29دسمبر 2004کو اسے پولس نے انکائونٹر میں مار گرایا تھا۔ مجسٹریٹ جانچ کی رپورٹ داخل کی گئی تھی۔

قتل،لوٹ، چوری اور غیر قانونی طور پر اسلحہ رکھنے سمیت 11معاملوں میں اترپردیش کے رہنے والے کشیپ ہرپک سنگھ ڈھاکہ کا نام تھا۔ 14اگست 2004کو ودودرا میں پولس نے مار گرایا۔ مجسٹریٹ جانچ کی رپورٹ داخل کی گئی تھی۔

ڈاکہ زنی کے معاملہ میں مطلوب میتھو عمر ڈافر، 14مارچ 2004کو آنند ضلع میں مارا گیا۔

قتل، لوٹ، چوری اور ڈاکہ زنی سمیت 14معاملوں میں مطلوب راجیشور عرف منٹو،اپریل 2005کو آنند میں مارا گیا۔

ایک پولس کانسٹبل کے قتل اور لوٹ کے معاملے میں مطلوب صورت کے رہنے والے انل بین مشرا بہاری کو 11مارچ 2003کو سورت کے ادھنا مگڈلا روڈ پر مارا گیا۔ مجسٹریٹ جانچ نے پولس کو کلین چٹ دے دی تھی۔

لوٹ اور قتل کی کوشش کے معاملوں میں مطلوب مہیش دیپک گروالی 21جنوری 2004کو سورت میں مارا گیا۔

قتل اور ڈاکہ زنی کے معاملے میں مطلوب ایک سابق فوجی سبھاش بھاسکر نائر کو ولساڈ میں سورت دھولیہ روڈ پر 4جون 2004کو مارا گیا۔

دلساڈ کے رہنے والے سنجے عرف سنجو کو 26نومبر 2004کو مارا گیا۔

ڈونگریا ہملا مچھار کو ولساڈ کے مارائی گائوں میں 25اگست 2008کو مارا گیا۔

اسمگلنگ، ایکسپلو سوایکٹ اور نیشنل سیکورٹی ایکٹ سمیت 13معاملوں میں مطلوب جام سلایاکے حاجی اسماعیل سوزانیہ کو 9اکتوبر 2005کو مارا گیا۔

قتل، چوری، ڈاکہ زنی اور لوٹ کے 42معاملوں میں مطلوب ولساڈ کے رہنے والے جوگیندر سنگھ کھتان سنگھ سکھ کو 2006میں مارا گیا۔

ہمارے پاس ایسے اور بھی بہت سے واقعات کی تفصیل موجود ہے، لیکن ہم اس وقت مسرت جہاں کے تاثرات بیان کرکے آج کا مضمون یہیں پر ختم کرتے ہیں۔

عشرت جہاں کی چھوٹی بہن مسرت جہاں نے اپنا دردبیان کرتے ہوئے کہا کہ گجرات کی حکومت اور پولس پر ہمیں قطعی اعتماد نہیں ہے، اس لئے عشرت جہاں فرضی انکائونٹر سے متعلق مقدمہ کو گجرات ہائی کورٹ سے سپریم کورٹ میں منتقل کیا جائے اور فرضی انکائونٹر میں ملوث تمام سیاستدانوںاور پولس افسران کو بے نقاب کرنے کےلئے اس معاملے کی سی بی آئی سے تفتیش کرائی جائے تاکہ عشرت جہاں قتل کی حقیقت سب کے سامنے آ سکے اور مجرموں کو کیفر کردار تک پہنچایا جاسکے۔

دراصل عشرت جہاں کو قتل کیا گیا تھا اور انکائونٹر محض ایک ڈرامہ تھا۔ مجسٹریٹی رپورٹ آنے سے ثابت ہوا، لیکن گجرات سرکار نے اس رپورٹ کے خلاف ہائی کورٹ سے اسٹے حاصل کر لیا، جو انتہائی تکلیف دہ بات ہے۔گجرات سرکار کا یہ کہنا کہ یہ جانچ رپورٹ بہت جلد تیار کی گئی ہے، کافی مضحکہ خیز ہے ۔ ہم نے ا س سچائی کے سامنے آنے کے لئے پانچ سال انتظار کیا ہے، جو رپورٹ چار پانچ ماہ میں آ جانی چاہئے تھی، وہ اتنی تاخیر سے آئی اور اس پر بھی گجرات سرکار کا یہ رویہ ہے ۔ اس سے اس کی نیت صاف ہو جاتی ہے۔

ہم نے ہی مجسٹریٹ تمانگ کی رپورٹ پراسٹے کے خلاف سپریم کورٹ میں پٹیشن دائر کی ہے اور ہمیں پوری امید ہے کہ ہمیں انصاف ملے گا، لیکن گجرات ہائی کورٹ میں جاری سماعت سے ہم زیادہ مطمئن نہیں ہیں کیونکہ وہاں ان ’ لوگوں‘ کی سرکار ہے اورہم مانتے ہیں کہ وہ کسی بھی جانچ کوایمانداری اورغیر جانبداری سے مکمل نہیںہونے دیں گے۔ابھی جو انکوائری وہا ںچل رہی ہے، اس سے ہم مطمئن نہیں ہیں کیونکہ وہاں گجرات پولس ، گجرات سرکار اور نریندر مودی کے ساتھیوں کی جانب سے رخنہ اندازی کا خدشہ ہے۔

ہمارا مطالبہ ہے کہ اس پورے معاملے کو سپریم کورٹ میں منتقل کر دیا جائے اور انکائونٹر کی تفتیش سی بی آئی سے کرائی جائے تاکہ اس فرضی انکائونٹر میں ملوث تمام سیاستدانوں اور پولس افسران کے چہرے بے نقاب ہوسکیں۔


क्या इनकाउन्टर पोलिस के पास क़त्ल का लाइसेंस?


क्या इनकाउन्टर पोलिस के पास क़त्ल का लाइसेंस?

एंकाउंटर हमारे लिए रिसर्च का एक और महत्वपूर्ण विषय है, वह इसलिए कि कुछ एंकाउंटर तो फर्ज़ी सिद्ध हो ही चुके हैं और कुछ लगता है कि फर्ज़ी हैं, भले ही उन्हें सही सिद्ध करने का प्रयास किया जाता रहा हो। कभी कभी तो लगता है कि एंकाउंटर पुलिस के पास क़त्ल करने का लाइसेंस है। हम कुछ एंकाउंटर को टेस्ट केसेज़ के रूप में सामने रखना चाहते हैं।

आज प्रारंभ कर रहे हैं इशरत जहां एंकाउंटर के मामले से। इशरत जहां एंकाउंटर के संबंध से हमारे पास काफी मेटर है, परन्तु आज की क़िस्त में हम ‘‘इंडियन एक्सप्रैस’’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट को पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करने जा रहे हैं

15 जून 2004 गोलियों का शिकार हुए चारों लोगों के बारे में गुजरात पुलिस का कहना था कि यह लोग मुख्यमंत्री मोदी की हत्या करने के षडयंत्र में लिप्त थे।7 सितम्बर 2009 मजिस्ट्रेट जांच में इंकाउंटर फर्ज़ी पाया गया। अदालत में शपथपत्र में केन्द्रीय सरकार ने निम्नलिखित बातें कहीं।

एक अदालत द्वारा इशरत जहां इंकाउंटर को फर्ज़ी घोषित किये जाने के बाद गुजरात सरकार ने केन्द्रीय सरकार के गृहमंत्रालय के शपथपत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि 15 जून 2004 को इंकाउंटर में मारे गये चारों लोग आतंकवादी थे। गृहमंत्रालय ने शपथपत्र दाखिल करने की अवधि पूरी होने का इंतेज़ार किया और आखिरी दिन गुजरात हाईकोर्ट में शपथपत्र दाखिल किया।

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए गृहमंत्री पि.चिदम्बरम ने कहा कि अगर उन्होंने शपथपत्र देखा होता तो शायद वह अलग ही होता। चिदम्बरम ने पहले भी कहा है कि उस शपथपत्र में संशोधन करके एक नया शपथ पत्र शीघ्र ही अदालत में दाखिल किया जायेगा। उस समय तक केन्द्रीय सरकार का रूख यही था कि शपथ पत्र में चारों की आपराधिक हिस्ट्री का उल्लेख है लेकिन यह किसी को फर्ज़ी इंकाउंटर में मारने का औचित्य पेश नहीं करता है।

इशरत जहां की मां शमीमा की उच्च न्यायालय में याचिका के बाद ही यह शपथपत्र अदालत में दाखिल किया गया था। इशरत की मां ने अपनी याचिका में कहा है कि उनकी बेटी की अन्यायोचित तथा दुर्भावना के कारण हत्या की गई है और सीबीआई द्वारा जांच की मांग की है।

इशरत के अलावा पाकिस्तान के गुजरांवाला का रहने वाला ज़ीशान जौहर उर्फ जांबाज़, पाकिस्तान के सर्गाधा का रहने वाला अमजल अली अकबर अली राणा और जावेद गुलाम शेख उर्फ प्राणेश कुमार पिल्लाई इंकाउंटर में मारे गये थे। मुख्य अंशःभारत सरकार भी इस बात से अवगत थी कि लश्कर-ए-तैयबा कुछ बड़े राष्ट्रीय तथा राज्यस्तर के नेताओं की हत्या की योजना बना रही है और लश्कर-ए-तैयबा ने भारत में अपने कैडर को नेताओं की गतिविधियों पर नज़र रखने को कहा है।

भारत सरकार और उसकी एजेन्सियां नियमित रूप से सम्बन्धित राज्य सरकारों के साथ सूचनाओं का अदान प्रदान कर रही थी। भारत सरकार को यह भी पता चला है कि गुजरात में विशेष आतंकवादी कार्यवाई के लिए लश्कर-ए-तैयबा के पाकिस्तानी आतंकवादियों के अलावा भी कैडर को शामिल किया है...........भारत सरकार की एजेन्सियों को यह पता चला है कि गुजरात में आतंकवादी कार्यवाईयों के सिलसिले में जावेद लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों विशेष रूप से मुज़म्मिल के साथ लगातार सम्पर्क में था......मामला पूरी तरह समझने और विशेष रूप से इशरत जहां तथा जावेद गुलाम मोहम्मद शेख की हत्या........के लिए जरूरी है।

जावेद के अतीत तथा उसके सम्बन्धों पर विचार किया जाये.......1992-98 के बीच थाणे जिला में जावेद के विरूद्ध कई केस दर्ज हुए। उस समय जावेद मुम्बरा (थाणे) में रहता था जो उसके आपराधिक रिकार्ड को जाहिर करता है। रीजनल पास्टपोर्ट आफिस (आर.पी.ओ.) मुम्बई द्वारा 28 जून 1994 को जावेद उर्फ प्राणेश ने मोहम्मद जावेद गुलाम शेख पिता गुलाम मोहम्मद शेख के नाम से पास्टपोर्ट नम्बर.514800 प्राप्त किया।

इस पासपोर्ट पर वह दुबई गया और काफी दिनों तक काम किया। जावेद ने आर.पी.ओ. को चीन से एक और पास्टपोर्ट 16 सितम्बर 2003 को प्राणेश कुमार मनाल्दी ठेकू गोपीनाथ पिल्लाई पिता गोपीनाथ पिल्लाई के नाम से प्राप्त किया। जावेद केराला में कभी नहीं रहा।गोपीनाथ पिल्लाई (अर्ज़ी देने वालों में शामिल) ने अपने बेटे के बारे में कई महत्वपूर्ण तथ्यों को बयान नहीं किया।; द्ध केरला में न रहने के बावजूद और उस पते पर हिन्दु नाम से पास्टपोर्ट हासिल करना और;इद्ध दंगाई स्वभाव के नाते उसके विरूद्ध पुलिस में दर्ज मामले......इत्यादि उसने यह भी छुपाया कि जावेद कई वर्ष मुम्बरा में रहा है.........और जावेद दुबई जा चुका है.........उच्चतम न्यायालय में दाखिल याचिका में गोपीनाथ पिल्लई की दलील शमीमा कौसर के दावों के विपरीत है।

याचिका ने बड़े दावे के साथ कहा है कि मृत्यु से पूर्व उसका बेटा पूणे की एक ट्रेवल एजेन्सी में काम कर रहा था और अक्सर पर्यटकों को नीले रंग की इंडिका कार नम्बर डभ्.02श्र।4786 से विभिन्न स्थानों पर ले जाया करता था।शमीमा ने अपनी अर्ज़ी में कहा है कि उसकी दोस्त के बेटे रशीद अंसारी ने जावेद के बारे में बताया कि जावेद अपने खुशबू और ज्वपसमजतल के धंधे के लिए एक योग्य व्यक्ति की खोज में है।

रशीद ने शमीमा के घर पर दोनों की मुलाकात कराई। जावेद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह इशरत के साथ अपनी बेटी की तरह व्यवहार करेंगे लेकिन काम के सिलसिले में कई बार देश के किसी भी भाग में इशरत को जाना होगा। कार नम्बर डभ्.02श्र।4786 कभी टैक्सी के रूप में पंजीकृत नहीं थी..........इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों अर्ज़ियां सच नहीं बोल रही हैं तथा उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय को भ्रमित कर रही हैं।

समाचारों में छपी रिपोर्टा.......और प्रस्तुत तथ्यों तथा (शपथपत्र) में बयान किये गये तथ्यों के मद्देनज़र...........यह स्पष्ट है कि जावेद तथा इशरत लश्कर-ए- तैयबा से जुड़े आतंकवादी थे। जावेद और इशरत की मृत्यु से कुछ दिनों पूर्व तक की उन की गतिविधियों, व्यवसाय के सम्बन्ध में विरोघाभास है। याचिका में शमीमा कौसर कहती है कि नौकरी से जुड़ने के बाद इशरत दो बार जावेद के साथ शहर से बाहर गई और समय पर वापस आ गई।

जब कभी वह टूर पर जाती थी वह फोन पर अपनी मां को अपना पता ठिकाना देती रहती थी। आखिरी बार जब वह बाहर गई अर्थात 11 जून 2004 की सुबह तो उसने अपनी मां को फोन करके बताया कि वह नासिक में है।..............गोपीनाथ पिल्लई का दावा है कि जावेद अपनी गाड़ी से पूणे वापस आया और अपने परिवार को अपनी साली के घर पर छोड़कर पर्यटकों के साथ लम्बे टूर पर निकल गया।

इशरत के रोज़गार सहित जावेद के साथ सम्बन्ध का कोई उल्लेख नहीं है। याचिका ने स्वर्गीया इशरत के जावेद के साथ नौकरी से पूर्व के बारे में विस्तार से उल्लेख किया है, लेकिन जावेद की दुकान/बिजनेस के पते के बारे में कोई उल्लेख नहीं किया है..........इशरत के काम के समय के बारे में कोई उल्लेख नहीं है और न ही जावेद द्वारा बेची जाने वाली वस्तु और कहां तथा कैसे उसे प्राप्त हुए, के बारे में..........याचिका में यह भी स्पष्ट नहीं है कि जावेद के साथ नौकरी के बाद क्या इशरत ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी........यह भी स्पष्ट नहीं है........इशरत की नौकरी रोज़ाना दुकान पर जाने की थी या केवल टूर पर साथ जाने की थी।

याचिका ने जावेद के साथ इशरत की यात्रा के स्थान तथा उद्देश्य के बारे में नहीं बताया है। उपरोक्त पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि इसमें विवरण की कमी है और जो लगता है कि जानबूझकर की गई है ताकि जावेद और इशरत के वास्तविक स्वभाव तथा गतिविधि को छुपाया जा सके। विरोधाभास ज़ाहिर करते हैं कि न तो जावेद के पिता गोपीनाथ पिल्लई और न ही इशरत की मां शमीमा कौसर ने सही तथ्यों का खुलासा किया है.....

वास्तविकता यह है कि इशरत और जावेद ऐसी गतिविधियों में लिप्त थे जिसका खुलासा चारों के विरूद्ध पुलिस की कार्यवाई से हो सकता है।...........18 मई 2007 को उच्चतम न्यायालय ने इसी मामले पर गोपीनाथ पिल्लई की याचिका से कुछ दिनों पूर्व 2 मई 2007 को जमाअतुद्दावा (लशकर-ए-तैयबा का एक और मुखपत्र) ‘इशरत जहां के परिवार से माफी’ के शीर्षक से एक समाचार प्रकाशित किया है।..........

यह ज़ाहिर करता है कि इशरत लश्कर-ए-तैयबा के साथ सक्रियता से जुड़ी थी और लश्कर-ए-तैयबा के मुखपत्र द्वारा माफी केवल भारतीय सेक्योरिटी एजेन्सियों, पुलिस को बदनाम करने के उपाय और अदालत को गुमराह करने के उद्देश्य से है।...........पूणे पुलिस की जांच बताती है कि अमजद उर्फ बाबर नीले रंग की इंडिका कार नम्बर डभ्.02श्र।4786 को खरीदते समय जावेद के साथ था।

गुजरात पुलिस की जांच भी संकेत करती है कि इशरत और जावेद लखनऊ में एक होटल और इब्राहीमपुर (जिला फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश) में एक निजी मकान में एक साथ ठहरे थे। दोनों याचिकाएं जावेद और इशरत के दो पाकिस्तानी नागरिकों से सम्बन्ध बताने मे नाकाम रही हैं। अमजद अली लश्कर-ए-तैयबा का पाकिस्तानी आतंकवादी था और इशरत तथा जावेद का उसके साथ होना सिद्ध करता है कि यह लोग लश्कर-ए-तैयबा के मिशन पर थे।

2004 मे भारत सरकार को विशेष सूचनाएं मिलीं जो ज़ाहिर करती हैं कि लश्कर-ए-तैयबा गुजरात सहित देश के विभिन्न भागों में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने की योजना बना रहा है।..........इंकाउंटर में मारा गया अमजद अली पाकिस्तानी नागरिक और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा था। 25-28 जून को जम्मू व कमश्ीर पुलिस ने सेंट्रल कश्मीर के चीफ आप्रेशनल कमांडर शाहिद महमूद और उसके पाकिस्तानी साथी ज़ाहिद अहमद के साथ 18 लोगों के एक ग्रुप को गिरफ्तार किया।

उन लोगों ने खुलासा किया कि गुजरात तथा महाराष्ट्र में आतंकवाद के नेटवर्क को बनाने के लिए अमजद अली भारत में प्रवेश कर गया है। जम्मू व कश्मीर पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में अमजद अली घायल हुआ था और मई 2004 के शुरू में उसका इलाज दिल्ली में हुआ था। वह जावेद के साथ बराबर सम्पर्क में था। अन्य मारे गये व्यक्ति का नाम ज़ीशान था और वह पाकिस्तानी नागरिक तथा लश्कर-ए-तैयबा का आतंकवादी था जिसके बारे में कहा जाता है कि ‘‘पाक अधिकृत कश्मीर’’ से भारत में दाखिल हुआ था।.........

पूणे पुलिस जावेद के घर से आम तौर पर बरामद कैमिकल से विस्फोटक सामग्री तैयार करने का तरीका बताने वाले दस्तावेज़ बरामद किये थे।.......जावेद लश्कर-ए-तैयबा और विशेष रूप से मुज़म्मिल के सम्पर्क में था। जावेद का न तो खुशबू और ज्वपसमजतल का कारोबार था और न ही वह टैक्सी चलाता था। .......जावेद द्वारा इशरत की नियुक्ति लश्कर-ए-तैयबा के षडयंत्र का हिस्सा लगती है ताकि आतंकवादी मिशन को प्राप्त करने के लिए देश के कई भागों में यात्रा के दौरान स्वयं को मिया-बीवी के रूप में प्रस्तुत कर बच सकें।........

इस मामले में सीबीआई जांच का कोई प्रस्ताव केन्द्रीय सरकार के विचाराधीन नहीं है और न ही सरकार इस मामले को सीबीआई जांच के लिए उचित पाती है।

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