Wednesday, December 10, 2008



कौन है मास्टर माइंड इन आतंकवादी हमलों का

क्या सोचते हैं आप! विचार करें और बताएं

जीवन सहारा उर्दू विशेषकर इस एक लेख "मुसलमानाने हिंद .......माजी, हाल और मुस्तकबिल???तक सिमट कर रह गया है। घर परिवार मित्र, रिश्ते नाते, तीज त्यौहार सब कुछ बहुत पीछे छूट गया है। यहाँ तक की शनिवार की शाम जब मैं अपने कार्यालय मैं बैठा उस दिन का लेख तैयार कर रहा था तभी फ़ोन पर सूचना मिली की पत्नी की तबियत बहुत ख़राब है। अत: डॉक्टर को फ़ोन किया और मैं ख़ुद भी घर के लिए रवाना हो गया। एक ही समय में मैं और डॉक्टर घर पहोंचे। इंजेक्शन इत्यादि देने के बाद कुछ राहत मिली तो तो उस ने बड़ी हसरत से मूंगफली का एक पैकेट खोलकर मेरे सामने रखते हुए कहा,"कभी आप सर्दियों में मूंगफली और गजक ले कर आते थे आज मैं लेकर आई हूँ, अब तो आपके पास इतना समय नहीं होता..........कभी हम जब बहुत मामूली जीवन जी रहे थे तब बहुत खुश थे, थोड़े से पैसे होते तो आप मूंगफली लाते और कभी कभी फ़िल्म भी देख आते, अब तो यह सब सपनों की सी बातें लगती हैं। इस के पश्चात् मुझे लगा की कुछ तकाजे ऐसे भी हैं जिनकी बिल्कुल उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। मैं देर तक उससे बातें करता रहा, रात्रि के लगभग १० बजे का समय था, टी वी ऑन किया तो कलर्स चैनल पर फ़िल्म "हल्ला बोल" आरही थी। शायद आधी से ज़्यादा फ़िल्म निकल चुकी थी, जहाँ से मैंने फ़िल्म देखना शुरू की वहां अदालत में एक लड़की झूठ बोलकर अपराधियों की जान बचा लेती है। ये अपराधी राज्य के एक मंत्री के बेटे हैं और इस फ़िल्म के नायक समीर खान जो एक फ़िल्म स्टार है, अपराधियों को उन के किए का दंड दिलाने के लिए अपनी पोजीशन की भी चिंता नहीं करता। परन्तु उस लड़की का झूठ मुकद्के को उन के हक में कर देता है। लड़की अदालत से बहार निकल कर फूट फूट कर रोते हुए बताती है की किस तरह बाज़ार में अपमानित किया गया और उसे यह धमकी भी दी गई की यदि अदालत में उस ने अपराधियों की पहचान की तो उस का अंजाम भी ऐसा ही होगा जैसा की उस की बाहें का हुआ था। समीर खान उस के बावजूद भी हार नहीं मानता। वह अपराधियों को बेनकाब करना चाहता है इसलिए राज्य के उस मंत्री गाइक्वाद के घर पहोंचता है और वहां उस के आलिशान घर पहुँच कर उसे उसकी वास्तविकता बतलाता है। परन्तु जब वह वहां से लौट रहा होता है तो रास्ते में उस पर हमला होता है, उसका सीनियर साथी सिद्धू समय पर पहुँच कर समीर खान की जान बचाता है।


गैक्वाद का प्रयास है समीर खान किसी भी तरह सड़क पर किए गए प्रदर्शन में उसे बेनकाब न करे, जबकि समीर खान और सिद्धू जो एक थिअटर से निकले थे यह फ़ैसला करते हैं की "हल्ला बोल" के नाम से सड़क पर नाटक करके अपराधियों को बेनकाब करेंगे। लंबे समय के बाद देखि गई इस फ़िल्म में भी मैं अपनी पत्नी के साथ रह कर भी साथ न रह सका, मेरा यह सिलसिलेवार लेख इस दौरान भी मेरे मस्तिष्क पर छाया रहा। मुझे लगा की यह समीर खान वास्तविक जीवन में हमारे जीवन में हमारे बीच हेमंत करकरे के रूप में मौजूद था जो दुर्भाग्य से अब हमारे साथ नहीं हैं और गाइक्वाद आज भी जीवित है। क्या उसे बेनकाब करने के लिए कुछ समीर खान सामने आयेंगे? करकरे के अधूरे काम को पूरा करने का साहस करेंगे? शायद येही उन के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आज ईद का दिन है मेरे पाठक मुझ से राय मांगते रहे हैं की राष्ट्र व क़ौम के कल्याण के लिए वे क्या करें? हर बार मैंने येही कहा की माहौल को अनुरूप होने दीजिये, एक हो कर कोई कार्य योजना बनायेंगे और फिर उसे क्रियान्वयन के लिए आपके सामने रखा जायेगा। परन्तु इस समय मैं अनुभव करता हूँ की देर करना उचित नहीं होगा, अब कोई शुरुवात करनी ही होगी। अत: विचार आया की इस आन्दोलन को आगे बढ़ने के लिए आप कोई नाम सामने रखें और यदि आप चाहें तो वो नाम


"सहारा यूनिटी मिशन"


SAHARA UNITY MISSION


भी हो सकता है। हर शहर, हर गावं, हर मुहल्ले में इस की शाख स्थापित करें और रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के द्वारा शुरू की गई अधिकार और न्याय की इस जंग को अपने हाथ में लेकर आगे बढ़ें। परन्तु यह ध्यान रहे की यह जंग अकेले नहीं लड़नी है। इस जंग में सफलता तब तक सम्भव नहीं जब तक के हमारे अन्य देशवासी भाई विशेषकर हिंदू भाई इस में शामिल न हों। इस लिए आज हम में से हर एक को अपने निकटतम हिंदू भाइयों से ईद मिलने के लिए अवश्य जाना चाहिए और जो आ सकें उन्हें निमंत्रण भी देना चाहिए तथा उन के सामने केवल एक ही बात रखनी चाहिए की मुंबई पर आतंकवादी हमला वास्तव में हमारे देश पर किया गया आतंकवादी हमला है और यह जंग हमें मिलजुल कर लड़नी है, उसी प्रकार जिस प्रकार अंग्रेजों के विरुद्ध जंग में हम कंधे से कन्धा मिलाकर साथ थे। आज चाहे हमारे विदेशी पड़ोसी का मामला हो या हमारे देश में देश के उन गद्दारों का मामला हो जो सफ़ेद पोश होने के करना पहचान में नहीं आते हैं, इस लिए बचे रहते हैं। आतंकवादी उस समय तक अपनी आतंकवादी गतिविधियों में सफल नहीं हो सकते जब तक की उन्हें अन्दर से कोई सहायता न मिले। क्या उत्तरदायी लोगों की लापरवाही उनके लिए उत्साह्वृद्धक साबित होती है या फिर यह आतंकवाद उन की राजनीतीक आव्यशकता बन गई है और इसके लिए वह इंसानों का खून बहने से भी बाज़ नहीं आते।
आजके इस लेख को मैं अधिक विस्तार नहीं देना चाहता। आज का समय पढने से ज़्यादा मैं आप सबको सोचने में प्रयोग करते हुए देखना चाहता हूँ और आपके सोचने के लिए उपरोक्त बिन्दुओं के अतिरिक्त एक तस्वीर भी आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ जिस में शहीद करकरे का चेहरा और होटल ताज की इमारत है, चारों ओर वे चेहरे हैं जिन में से कुछ हेमंत करकरे और उनके साथियों की मृत्यु के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं और देश पर इस आतंकवादी हमले के लिए भी। सबसे ऊपर जो तीन चेहरे (साध्वी प्रज्ञा सिंह, लेफ्टनेंट कर्नल प्रोहित और दयानंद पाण्डेय) आपके सामने हैं, उन को तो इस लिए इस फोटो में जगह दी गई है की हो सकता है येही तीन इस भयानक हमले का बुनयादी करना बने हों, इस लिए की हेमंत करकरे जिन्हें बेनकाब कर रहे थे, उन में सूची में सब से ऊपर यही थे. मोदी और प्रवीन तोगाडिया, शायद यह उन लोगों में से हैं जिन के दामन तक वह आग पहुँच रही थी और वह अपने भविष्य और योजनाओं को लेकर डर गए थे। मनमोहन सिंह, कोंडोलिजा राइस और मोसाद की सांकेतिक फोटो इस लिए दी गई हैं की कहीं ऐसा तो नहीं की भारत में मुसलमानों को आरोपी ठहराने के लिए अमेरिका और इस्राइल ने भी कोई रोल अदा किया हो और हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह उन के दबाव में आकर मौन रहने के लिए विवश हो गए हों। अडवाणी और उनके बीच जो भी बातचीत हुई हो, क्या इस में अमेरिका का भी कोई दखल था और अंत में जो फोटो हैं उन में एक तो वो आतंकवादी है जो पुलिस की कहानी का केंद्रीय चरित्र है और जिस के सहारे इस आतंकवादी हमले की सच्चाई सामने रखने की बात कही जा रही है और बाक़ी पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी और दवूद इब्राहीम जिन की ओर यह इशारा है की आई एस आई अर्थार्त पाकिस्तान का खुफिया संघटन इन आतंकवादी हमलों में लिप्त है। मेरे मस्तिष्क में इन सभी फोटो के सम्बन्ध से एक काल्पनिक कथा है, एक ऐसा दृष्टिकोण जो शायद सही भी हो सकता है, मगर इस समय मैं इन फोटो को आपकी सेवा में प्रस्तुत करना चाहता हूँ की पहले आप सब का दृष्टिकोण जानूं क्यूंकि पूर्ण वस्तुस्थिति आपके सामने है और कोई राय तो आपने भी स्थापित की होगी, इस लिए कलम उठाइये और नीचे दिए गए ई मेल द्वारा मुझे अपनी राय भेजिए और फिर प्रतिज्ञा करें मेरे अगले लेख का।

Sunday, December 7, 2008

१९९३ के अतिरिक्त सभी आतंकवादी घटनाएं संघ व मोसाद की साजिश का नतीजा हैं!

करकरे इस सच्चाई को सामने ला रहे थे

इस प्रमाण के बारे में आप का क्या कहना है? आप इस का अनुवाद करके इसे अपने ब्लॉग में क्यूँ नहीं डाल देते? क्या यह सही नहीं है की आप और आपके मित्र गाँधी के हत्यारों के लिए सहानुभूति रखते हैं?

कृपया इसे ध्यान से पढ़ें: १९९१ तक आर एस एस का आतंकवाद सन्वेदन्विहिन पड़ा हुआ था क्यूंकि कांग्रेस ने उसे दबा दिया था और इस लिए भी सोवियत संघ (यु एस एस आर) के साथ भारत के घनिष्ठ सम्बन्ध थे और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर एस एस को संरक्षण देने वाला कोई नहीं था।

१९९१ के बाद अर्थार्त राजीव गाँधी की हत्या और सोवियत संघ के टूटने के बाद, भारत ने इस्राइल को स्वीकार कर लिया। अमेरिका से निकटता बढ़ गई और शेष बातें इतिहास का अंश हैं।

भारत में आतंकवाद का अध्यन करने के लिए यह पृष्ठभूमि अत्यन्त भयानक है। आतंकवाद के आधुनिक अवतार भारत में, उसके द्वारा इस्राइल को स्वीकार कर लेने के बाद आयत किए गए। इससे आप भी इनकार नहीं कर सकते।

१९९० का वही दशक, अर्थात नरसिम्हा राव के बाद का दौर, जब मुसलमानों पर अत्याचारों का सिलसिला पुन: तेज़ हो गया था। वास्तव में उस दौर में भारत में अधिक बम धमाके हुए। करकरे इस सच्चाई को सामने ला रहे थे की १९९३ के अतिरिक्त सभी धमाके और आतंकवादी गतिविधियाँ संघ मोसाद के आपसी षड़यंत्र का परिणाम थी। आप उन की पत्नी से जा कर पूछें, अपनी मौत से पहले वह इसका खुलासा मीडिया के सामने करने वाले थे और देश छोड़ कर कहीं बहार चले जाने का इरादा रखते थे।

क्या आप यह नहीं देख रहे हैं की करकरे की मृत्यु पर कोई सरकारी व्यक्तव्य अब तक नहीं आया है और आप ने एक क़दम आगे जाते हुए यह परिणाम मेरे मेल पर भेजा है की यह निर्मल आनंद का "संयोग" था।

तो फिर सच्चाई को कौन तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहा है? आज केवल दो प्रकार के हिंदू हैं, एक वह जो आर एस एस और आतंकवाद का समर्थन करते हैं और दूसरे वे जिनकी संख्या अधिक है, जो इसका विरोध करते हैं।

इस्राइल - अमेरिका - आर एस एस का यह खेल १९९१ से चल रहा है की आतंक पैदा करो। मुसलमानों के नाम का प्रयोग करो और अंडरवर्ल्ड के कुछ अपराधियों को "जिहादी" कह कर पुकारो तथा इस प्रकार सभी मुसलमानों को बदनाम करो। आर एस एस - अमेरिका - इस्राइल का यह गठजोड़ केवल मुसलामानों को परेशान करने के लिए नहीं है। वह "मुस्लिम आतंकवाद" के नाम पर मुसलमानों को डरा कर भारत को अस्थिर करना चाहते हैं। अब आप यह पूछेंगे की आर एस एस आख़िर भारत को अस्थिर करना क्यूँ चाहेगा? क्यूँ नहीं? फासीवादी भगवान में या मानव द्वारा बनाये गए राज्य में विश्वास नहीं रखते। क्यूँ आर एस एस का उद्देश्य "अखंड भारत" का निर्माण करना है। उसे कहीं भी खड़ा किया जा सकता है, गुजरात या महाराष्ट्र के किनारे पर भी। फासीवाद के दृष्टिकोण पर ध्यान दें। राज्य की सीमा वहीँ तक होती है जहाँ तक उन की सत्ता होती है। वह उस भारत की बिल्कुल परवाह नहीं करते जिसकी स्थापना १९४७ में हुई थी। वह उसे भारत नहीं मानते। उस के मस्तिष्क में एक काल्पनिक भारत की रूपरेखा मौजूद है। जिस की सीमा फिलस्तीन तक मिली हुई हों। इस लिए आप देख सकते हैं की स्थानीय भाषा में, काल्पनिक चित्र हमें घटया और बटवारे की राजनीती तक ले जाते हैं। यह इतिहास की भाषा का नियम है।

अंत में, आपके विचार में १८५७ पर आधारित मेरी पुस्तक को क्यूँ दबा दिया गया।

अपने पिछले लेख, में मैंने यह दिखाने का प्रयास किया था की इस्राइल के बाहर रहने वाले यहूदी जिन्हें "सियांमस" कहते हैं, वह मोसाद की सहायता करने के लिए उतारू हैं और अपने इस कार्य में जान भी दे सकते हैं।

कोई भी बुद्धिमान इस संभावना से इनकार नहीं कर सकता की नरीमन हाउस में रहने वाले रब्बी और उनकी पत्नी भी "सियांमस" थे।

मैंने बहुत से प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। क्या आप जानते हैं की करकरे को ९ एम् एम् बुल्लेट से मारा गया था? अब आप मुझ से मेरे माध्यमों की बात पूछेंगे, जिस के बारे में स्पष्ट है की मैं आपको नहीं बता सकता। परन्तु ९ एम् एम् की गोलियाँ पुलिस सर्विस रेवोल्वेर में होती हैं, न की ऐ के ४७ में। अब आप मेरी बात समझ गए?

फिलहाल RAWऔर गृह मंत्रालय में शिवराज पाटिल के विरोधी पदाधिकारिगन करकरे की हत्या से सन्दर्भ में गुजरात ऐ टी एस की भूमिका की छानबीन कर रहे हैं, कया आप अब भी नहीं समझ पाये?

एक और पक्का प्रमाण:

नरीमन हाउस के बाहर खड़े हो कर सी एन बी सी न्यूज़ के साथ एक टेलीफोनिक इंटरव्यू में, फ्रीलांस जर्नलिस्ट अरुण अस्थाना ने बताया की ऐसी भी सूचनाएँ प्राप्त हुईं हैं की कुछ आतंकवादी हमला करने से पहले नरीमन हाउस के निकट गेस्ट हाउस में १५ दिनों तक ठहरे थे। अस्थाना ने यह भी बताया की "उन के पास भारी मात्रा में गोला बारूद, हथ्यार और खाने की सामग्री थी।"

अब दूसरी रिपोर्टों से भी यह बात स्पष्ट हो चुकी है की नरीमन हाउस में रहने वालों ने भी भारी मात्रा में खाने की सामग्री का आर्डर दिया था। यह खाना ३०-४० व्यक्तियों के लिए कई दिनों के लिए काफ़ी था। इतनी मात्रा में खाना क्यूँ मंगवाया गया? और अंत तक नरीमन हाउस पर हमला क्यूँ नहीं किया गया? मुंबई में रहने वाला एक गुजरती हिंदू सी एन एन आई बी एन टी वी पर प्रात: ३.३० या इस के आस पास आया और उस ने बताया की दो माह से नरीमन हाउस में संदिग्ध गतिविधियाँ जारी थी। बहुत से विदेशी इस में आते जाते रहे। यह बात पुलिस को भी बताई गई थी परन्तु किसी ने भी कोई कार्यवाही नहीं की।

सी एन एन आई बी एन ने इस समाचार को दोबारा नहीं चलाया, इस के पश्चात जब मुंबई के आम लोगों ने नरीमन हाउस पर धावा बोलने की धमकी दी तब जा कर एन एस जी कमांडोस अन्दर घुसे। यदि नरीमन हाउस के अन्दर केवल दो आतंकवादी ही छुपे हुए थे तो फिर उस पर धावा बोलने में इतना विलंब क्यूँ किया गया?

यह सरकार का गहरा षड़यंत्र है और कुछ नहीं। नरीमन हाउस के पूर्ण मामले पर जांच अत्याव्यशक है।

इस के बाद यह रिपोर्ट आई की "कुछ हद तक आश्चर्य की बात है की मुंबई के कामा हॉस्पिटल में उपस्थित आतंकवादी धाराप्रवाह मराठी बोल रहे हैं।" एक मराठी दैनिक "महाराष्ट्र टाईम्स" ने भी यह रिपोर्ट प्रकाशित की है की वह आतंकवादी जो कामा हॉस्पिटल में फायरिंग कर रहे थे उन्होंने ने सिविल ड्रेस में तैनात अस्पताल के एक कर्मचारी से मराठी में बात की थी।

इस समाचारपत्र के अनुसार जिन आतंकवादियों ने ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे, डिप्टी पुलिस कमिश्नर अशोक काम्टे और इनकाउन्टर स्पेशलिस्ट विजय सालसकर को निशाना बनाया, वह धाराप्रवाह मराठी बोल रहे थे।

इस समाचार पात्र का यह भी दावा है की युनिफोर्म पहने दो वाचमेन और अन्य लोगों पर गोलियाँ चलाने वाले आतंकवादियों ने बन्दूक की नोक पर उन से मराठी भाषा में पूछा की, " क्या तुम लोग यहाँ पर कर्मचारी हो?" उन कर्मचारियों में से एक ने आतंकवादियों का पैर पकड़ कर उन से कहा की "मैं यहाँ पर काम नहीं करता हूँ। मेरी पत्नी को दिल का दौरा पड़ा है और मैं उसे यहाँ भरती कराने आया हूँ।"

आतंकवादियों ने उससे एक बार फिर मराठी में पूछा की "तुम सच बोल रहे हो या झूठ?" कर्मचारी ने उत्तर दिया की "नहीं, भगवान की कसम मैं सत्य बोल रहा हूँ" , इस पर आतंकवादी ने उसे छोड़ दिया।

एक दूसरी रिपोर्ट यह बताती है की मुंबई के यहूदी, जो विस्थापित हो कर इस्राइल जा चुके हैं, वह भी धाराप्रवाह मराठी बोलते हैं तथा वह इस बात के लिए प्रसिद्द हैं की उन्हें मोसाद ने नियुक्त कर रखा है।

हेमंत करकरे की मृत्यु एक पहेली बनी हुई है। सभी सरकारी बयान एक दूसरे के विपरीत हैं। कुछ का कहना है की उन्हें सी एस टी के पास मारा गया, कुछ कहते हैं की उन की मृत्यु कामा हॉस्पिटल के पास हुई, कुछ मेट्रो सिनेमा के पास बताते हैं और कुछ का तो यह भी कहना है की उन्हें उस समय मारा गया जब वह पुलिस जीप में सवार थे। परन्तु उन्हें गोली कहाँ पर लगी? कुछ कहते हैं गर्दन पर और कुछ लोग ह्रदय के निकट बताते हैं। करकरे को एक टी वी पर बुल्लेटप्रूफ जैकेट पहेंते हुए दिखाया गया। ऐसी स्थिति में गोली उनकी गर्दन पर नहीं लगनी चाहिए थी, जबकि कोई स्नाइपर (छुप कर गोली चलाने वाला ) उन की प्रतीक्षा न कर रहा हो।

और अगर गोली उन के ह्रदय के निकट लगी तो फिर उन्होंने अपना यह जैकेट कब उतारा? किसी ने भी इस प्रशन का उत्तर देने का कष्ट नहीं किया। एक अन्य दृष्टीकोण भी उभर कर सामने आरहा है की करकरे को कामा के पास मारा गया परन्तु काम्टे और सालसकर की क्रित्यु मेट्रो (सिनेमा) के पास गोली बारी में हुई।

अब यह बातें स्पष्ट हो रही हैं:

१- बहुत से लोग गोरे रहे होंगे।

२- क्या वे अंतर्राष्ट्रीय खरीदे गए गुलाम थे? यदि हाँ, तो फिर किस देश के थे? किस ने उन्हें इकठ्ठा किया? यह बात सब को पता है की मोसाद और सी आई ऐ के पास ऐसे गुलामों के कई संघटन हैं, उन्हीं में से एक तथाकथित जिहादी भी हैं। वह जिहाद करते हैं और उन मुसलमानों को भ्रमित करते हैं जो विश्व की इस्लामोफोबिया से प्रभावित नहीं हुए हैं। सम्भव है की मुंबई में भी उन्हीं में से कुछ को प्रयोग किया गया हो परन्तु उन लोगों के पास अमेरिका, ब्रिटेन,मोरिशिअस तथा मलेसिया के पासपोर्ट क्यूँ थे?

३- वह कौन से मराठी थे जिन्होंने ने करकरे की हत्या कर दी? कामा हॉस्पिटल के पास का मार्ग पूर्ण रूप से सुनसान रहता है. यह सीधे मुंबई सी आई डी हेड्कोर्टर के पिछले द्वार तक जाता है. पुलिस के अज्ञात सूत्रों से पता चला है की करकरे को वहां पर करकरे विरोधी उस टीम द्वारा लाया गया था जो मुंबई पुलिस के हिंदुत्व समर्थक अधिकारी हैं और उन के साथ छोटा राजन के लोग भी सम्मिलित थे. करकरे, छोटा राजन के विरोधी थे. सालसकर भी प्रदीप शर्मा के विरोधी थे जो की मुंबई के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पद पर थे और छोटा राजन के शूटर के रूप में कार्य करने के कारण अब जेल में हैं। इस लिए मराठी बोलने वाले आतंकवादी कुछ ऐसे यहूदी हो सकते हैं जिनका मुंबई से सम्बन्ध रहा हो या फिर हिंदुत्व ब्रिगेड के भाड़े के हत्यारे या छोटा राजन के आदमी हो सकते हैं।

४- ऐसा लगता है की कई चीज़ें एक साथ घटित हुईं. २६ नवम्बर की रात में ९.३० बजे जब मुंबई पर हमला हुआ तो उस समय महाराष्ट्र के मुख्या मंत्री विलासराव देशमुख (जो अब हटा दिए गए हैं) केरल में थे. उसके बाद ११ बजे देशमुख गृहमंत्री शिवराज पाटिल (यह भी हटा दिए गए हैं) को इस समाचार की सूचना दी. और पाटिल ने एन एस जी कामान्डोसको भेजने की तैयारी आरम्भ कर दी थी. इस का अर्थ यह हुआ की ११ बजे तक देशमुख को पता चल चुका था की क्या कुछ हो रहा है. फिर ऐसे में ९.३० से लेकर प्रात: एक बजे के बीच विभिन्न स्थानों पर मुंबई पुलिस को तैनात क्यूँ नहीं किया गया था? येही वह समय था जब करकरे उन स्थानों पर पहुँचते हैं. मुंबई ऐ टी एस एक प्रथक संस्था है, यह मुंबई पुलिस के अधीन नहीं है अर्थात ११ बजे से १ बजे के बीच मुंबई पुलिस के सशक्त ४० हज़ार जवान दृश्य से बिल्कुल गायब थे और तभी करकरे वहां पहुँचते हैं तथा अपने साथियों के साथ मौत का शिकार हो जाते हैं। क्या यहाँ पर कोई खिचडी नहीं पाक रही है? स्पष्ट है की ११ बजे से १ बजे के बीच मुंबई पुलिस को जान बूझ कर अलग रखा गया, ऐसे समय में जब की आतंकवादी पूरी ताकत के साथ लोगों को मारने में लगे हुए थे, तभी करकरे को वहां जाने के लिए कहा गया होगा और वह वहाँ गए यह समझ कर की वहाँ पर मुंबई पुलिस के लोग तैनात होंगे। परन्तु वहां कोई नहीं था केवल एक दो पुलिस कर्मी ! और फिर उन्हें मार दिया गया!

अमरेश मिश्रा

Saturday, December 6, 2008

प्रज्ञा और प्रोहित नए नहीं हैं

आतंकवाद १९४७ से ही आर एस एस का कल्चर रहा है

अमरेश मिश्रा एक बड़े इतिहासकार और यथार्थवादी लेखक हैं। उन्होंने २६ नवम्बर को मुंबई पर आतंकवादी हमलों के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा है, जिसे हमने प्रकाशित भी किया है। उन्होंने ने अपने शोध द्वारा संघ परिवार के अतीत और इन आतंकवादी हमलों के उलझे हुए प्रश्नों पर भरपूर रौशनी डाली है, जिसे हम आज और आने वाले कल के प्रकाशन में पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करना चाहते हैं। अमरेश मिश्रा का यह लेख और उन के साथ की गई अभद्रता की जानकारी हमें ई-मेल द्वारा प्राप्त हुई। मुंबई पर आतंकवादी हमले के सम्बन्ध में मेरे ई-मेल पर कुछ और भी महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ हैं जिन्हें इस सिलसिलेवार लेख की आगामी कड़ियों में पाठकों की सेवा में प्रस्तुत किया जायेगा।

अब तथ्यों से छेड़छाड़ कौन कर रहा है? आप मेरा हवाला मेरी पृष्ठभूमि से बाहर जाकर देते हैं। मैंने कभी यह नहीं कहा की मुंबई हमले में चूंकि ६० मुस्लमान मारे गए थे इसलिए यह इस्लामी आतंकवादियों का कार्य नहीं हो सकता। मैंने केवल यह कहा था की यह वह तथ्य है जो कुछ देर के लिए मुझे ठहर कर सोचने पर मजबूर करता है।

इस बात को लेकर पूरे विश्व में मेरा साक्षात्कार हो रहा है, बी बी सी से लेकर अलजजीरा तक। मैं आपको कई बार इस बातचीत के बारे में बता चुका हूँ, जो द्वारिका के शंकराचार्य और सनातन धर्मियों के धरम गुरु स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज और आर एस एस प्रमुख गोलवलकर के बीच हुई थी। यह भी बता चुका हूँ की गोलवलकर ने कैसे श्री राम को "भगवान" मानने से मन कर दिया था और उन्हें केवल एक "महापुरुष" कहा करते थे और शंकराचार्य ने इन से कहा था की "येही बात रावन ने भी कही थी"।

आप यह बात भी भली भांति जानते हैं की द्वारिका के शंकराचार्य ने कई बार मुझ से कहा था की आर एस एस के कुछ लोग गांधी के हत्यारे हैं, उन्होंने ने कई बार मुझ से यह भी कहा था की आर एस एस के लोग अपराधी हैं, यह अपराधी दस्ते हैं, जिन्होंने कई बार शंकराचार्यों पर जानलेवा आक्रमण किया। वे हथ्यार और गोला बारूद एकत्रित करने में निपुण हैं। वे धर्म निरपेक्षता में विश्वास नहीं रखते। वे १९४७ से ही भारत में सेना की बगावत जैसा माहौल पैदा करने की प्रतीक्षा में हैं। आप जानते हैं की मेरे दादा सी बी आई में थे और इन दिनों (१९७० के दशक में) सी बी आई के सदस्य RAWके लिए भी कार्य किया करते थे अत: मेरी परवरिश RAW के सदस्यों की गोद में हुई है। इन लोगों के साथ मेरे सम्बन्ध अब भी हैं और मुझे यह बात भली भाँती पता है की RAW भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और भारत के राज्यतंत्र के भीतर एक और सांप्रदायिक, संघ समर्थक, इस्राइल समर्थक और अमेरिकी सेना की समर्थक शक्तियों और दूसरी और धर्म निरपेक्ष राष्ट्रिय वादी शक्तियों के बीच जीवन और मृत्यु की जंग चल रही है।

अत: २६ नवम्बर की रात मैं अचानक ही किसी निर्णय पर नहीं पहुँचा। मैं जानता था की सभी आतंकवादी हमले इन्हीं युद्ध का परिणाम हैं और धर्म निरपेक्ष राष्ट्रवादी शक्तियों को नीचा दिखने हेतु अमेरिका के समर्थक, इस्राइली समर्थक और संघ समर्थक शक्तियों का एक प्रयास है। ये शक्तियां अब अपने बचाव के लिए लड़ रही हैं।

मैं एक बार फिर किसी परिणाम तक नहीं पहुँचा। मुझे गुप्त तौर पर यह बात पता थी, इस लिए मैं वह सब कुछ कह सका, जो मैंने कहा है और इसीलिए मेरी बात सत्य भी साबित होगी, क्यूंकि जब मैं मालेगाँव के आतंकवादी हमलों में संघ के लिप्त होने की बातें कर रहा था की जिस दौर में अडवानी केंद्रीय मंत्री थे और २००६ में नांदेड का मामला पेश आया था, तो इस दौर में संघ (परिवार) ने अमेरिका और इस्राइल की सहायता से अपनी आतंकवादी गतिविधियाँ फिर से प्रारम्भ कर दी थीं। उस समय भी कुछ लोगों ने मेरी बातों पर विश्वास किया था और अब करकरे ने पूरे सत्य का खुलासा कर दिया है।

मैं यह महसूस करता हूँ की कुछ लोग करकरे से इर्ष्या रखते थे क्यूंकि वह सत्य तक पहुँच रहे थे और अडवाणी और मोदी को भी गिरफ्तार कर सकते थे। आपकी सोच इस स्तर तक पहुँच चुकी थी? एक बार फिर आप मेरा उल्लेख पृष्ठभूमि से हट कर मत कीजिये।

इस लड़ाई में मैं धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ हूँ। ब्रह्मण और अब्राह्मण नौकर शाहों का एक पूरा संप्रदाय मेरे समर्थन में खड़ा है। आप मेरी मजबूती को भी भलीभांति जानते हैं। आप मुझे यु पी के किसी भी चुनावी क्षेत्र से खड़ा कर दीजिये, अमेरिका, इस्राइल और संघ के बीच रिश्तों की बात करते हुए भी कन्याकुब्जा ब्राहमणों का पूरा वोट मुझे ही मिलेगा, इस पर आप क्या कहेंगे? यह किस कन्याकुब्जा ब्रह्मण मुस्लिम समर्थक हैं?

पंडित नेहरू इस बात को जानते थे और हम लोग भी इसे भलीभांति जानते हैं की भारत का सब से महत्त्वपूर्ण और एकमात्र संघ का आतंकवाद है।

ब्रिटेन के इतिहासकार एलेक्स्वान तन्ज़ल मैन ने अपनी पुस्तक "दी इंडियन समर : सीक्रेट स्टोरी ऑफ़ एन एंड ऑफ़ एन अम्ब्यार" में एम् १६ और कुछ गुप्त ब्रिटेन अभिलेखों का खुलासा किया है जो इस बात की पुष्टि करते हैं की सितम्बर १९४७ में दिल्ली में होने वाले सांप्रदायिक दंगे वास्तव में भारतीय सेना के पूर्व अधिकारीयों की सहायता से आर एस एस द्वारा कराये जाने वाले दंगे थे। इन दंगों को भारतीय सेना ने सख्ती से कुचल दिया।

अत: प्रसाद श्रीकांत प्रोहित और प्रज्ञा सिंह ठाकुर नए नहीं हैं, आतंकवाद १९४७ से आर एस एस की संस्कृति रही है। आख़िर क्यूँ? क्यूंकि इन्होने "इंडियन नॅशनल स्टेट" पर कभी भरोसा ही नहीं किया, जिस की स्थापना १९४७ में की गई थी। ऐसे बहुत से अभिलेख हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं की गोलवरकर ने यु पी के मुस्लिम क्षेत्रों में आक्रमण करने हेतु ब्रिटेन अधिकारियों से सांठगाँठ कर रखी थी।

निम्नलिखित नमुनूं को देखें और फिर कृपया एक बुद्धिमान व्यक्ति की तरह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें।

भारत की ब्रिटिश सरकार और आर एस एस के बीच संबंधों के पुख्ता प्रमाण राजेश्वर दयाल आई सी एस की जीवनी "ऐ लाइफ ऑफ़ अवर टाईम्स" में मौजूद हैं। इस पुस्तक को ओरिएंट लोग मैन ने १९९८ में प्रकाशित किया है।

उन्होंने ने आर एस एस को शहरों और गावों का विस्तृत मानचित्र प्राप्त किया ताकि मुसलमानों पर हमला किया जा सके।

दयाल कहते हैं की १९४६ के प्रारंभिक दिनों की एक कोकटेल पार्टी में मुख्या सचिव ने एक दिन अचानक मुझ से कहा था की "मैं उत्तर प्रदेश का अगला ग्रह सचिव बन सकता हूँ। ऐसी स्थिति में मैं पहला भारतीय अधिकारी होता जो इस पद पर आसीन होता, क्यूंकि अब तक यह पद ब्रिटिश अधिकारीयों के लिए ही सुरक्षित होता है।"

(पृष्ठ-७७)

ग्रह सचिव के रूप में दयाल बहुत ही गुप्त जानकारियों के राजदार बन चुके थे, "मैं एक अत्यन्त गंभीर घटना रिकॉर्ड पर रखना चाहता हूँ जब सांप्रदायिक तनाव अपनी पराकाष्टा पर था तो पश्चिमी रेंज के एक योग्य अधिकारी एवं अत्यन्त निपुण डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल बी बी एल जेटली बहुत रहस्मय ढंग से मेरे घर पहुंचे। उन के साथ दो अधिकारी थे, जो अपने साथ एक ताला लगा हुआ स्टील का संदूक भी लाये थे। जब उस संदूक को खोला गया तो उस के अन्दर से इस क्षेत्र के पश्चिमी जिलों में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे और खून खराबा करने के षड़यंत्र का परदा फाश हुआ और उस के प्रमाण भी मिले।

इस बक्से के अन्दर पूरी होश्यारी से बनाये गए ब्लू प्रिंट और व्यासायिक ढंग से बनाये गए मुस्लिम क्षेत्रों और निवास स्थलों के मानचित्र भी मिले, जिनमें उन स्थानों को विशेष रूप से चिन्हित किया गया। इन कागजों में इस बात का भी पूरा विवरण मौजूद था की इन क्षेत्रों तक कैसे पहुँचा जाए। इस के अलावा इस तरह के अन्य प्रमाण भी थे जिस से इस घिनौने षड़यंत्र का पता चलता था।"

दयाल इन सांप्रदायिक प्रमाणों को लेकर मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ्पन्त के पास पहुंचे "वहां पर एक बंद कमरे में जेटली ने अपनी खोज के बारे में बताया और स्टील के बक्से में मौजूद सभी प्रमाण भी दिखाए। आर एस एस के ठिकानों पर पड़ने वाले छापों के कारन एक बड़े षड़यंत्र का परदा फाश हो गया। यह पूरा षड़यंत्र इस संघटन के प्रमुख की निगरानी और उनके निर्देशन में तैयार किया गया था।

हम दोनो ने ही यानि जेटली और दयाल आरोपी श्री गोलवलकर को गिरफ्तार करने पर ज़ोर दिया जो की उस समय उस क्षेत्र में ही मौजूद थे। लेकिन पन्त जी ने इस पूरे मामले को मंत्रिमंडल के सामने रखने का निर्णय लिया। कांग्रेस के अन्दर आर एस एस से हमदर्दी रखने वाले लोग मौजूद थे और ख़ुद विधान सभा के अध्यक्ष आत्मा गोविन्द खेर्गी इन हमदर्दों में से एक थे और उनके पुत्रों के बारे में सब को पता था की वे आर एस एस के सदस्य हैं। लेकिन क़दम सिर्फ़ इतना उठाया गया की गोल्वालरअलकार को गिरफ्तार करने के बजाय उन्हें उन के खिलाफ पकड़े गए उन प्रमाणों के बारे में उन से स्पष्टीकरण माँगा गया। जैसा की आशा की जा सकती है की गोलवलकर वहां से भागने में सफल हो गए और कुरिअर उन तक पहुँच ही नहीं सका- "उन को ढूँढने का बेकार प्रयास जारी रहा। एक जगह से दूसरी जगह ढूँढने में हफ्तों गुज़र गए।"

इस पुस्तक के पृष्ठ के ९४ का अगला पेराग्राफ अपनी कहानी ख़ुद बयान करता है की "अंतत: ३० जनवरी १९४८ का वह दिन आगया जब शान्ति के सबसे बड़े संदेशवाहक एक गोली के शिकार होगये।"

यह मानचित्र केवल "ब्रिटिश सर्वेयर जनरल" के कार्यालय में ही तैयार हो सकते थे। ब्रिटिश प्रशासन को इस के महत्त्व और गंभीरता का अच्छी तरह पता रहा होगा जिसके कारन इस मानचित्रों की कड़ी सुरक्षा की गई और आर एस एस को यह मानचित्र मुहैय्या करना इस बात का प्रमाण है की उन दोनों के बीच गहरे सम्बन्ध थे...............जारी

अमरेश मिश्रा

Thursday, December 4, 2008

किसी भी निर्णय से पहले हमारी सरकार यह तो सोचे

विश्वसनीय कौन! आतंकवादी "क़सब" या "शहीद करकरे"

पाकिस्तान पर हमला करना है तो वातावरण निर्मित है, बिना झिझक किया जा सकता है, जिस समुदाय ने पहले एक वीर अब्दुल हामिद दिया था, अब वह दस अब्दुल हामिद दे सकता है। मीजाइल मैन ऐ. पी. जे अब्दुल कलाम की दी हुई टेक्नोलॉजी भी है और मौलाना आजाद, मौलाना हसरत मोहानी व अली ब्रद्रन की छोड़ी हुई विरासत भी है। परन्तु यह युद्ध क्या भारत की किसी समस्या का हल है? क्या पाकिस्तान पर हमला करके आतंकवाद से मुक्ति पाई जा सकती है? क्या वास्तव में स्वयं आतंकवाद का शिकार पाकिस्तान भारत में होने वाले आतंकवादी हमलों में लिप्त हो सकता है? क्यूंकि पिछले दिनों आतंकवादी हमलों में पाकिस्तान ने जो खोया वो भी कुछ कम नहीं है। ताज और ओबेरॉय से पहले पाकिस्तान के होटल "मेरिअट" पर हमला हुआ तथा करकरे से पहले पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली के लिए चिंतित बेनजीर भुट्टो आतंकवादी हमलों की भेंट चढ़ गयीं। आख़िर हम यह कब सोचेंगे की यह आतंकवादी हमले किस की समस्याओं का समाधान हें, किस के मस्तिष्क कि खोज हें, किसे अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए आतंकवाद और युद्ध कि आव्यशकता है। क्या अमेरिका के अतिरिक्त किसी और का नाम आपके मस्तिष्क में आता है?

हम अगले एक वर्ष तक बराक हुसैन ओबामा के नेतृत्व वाला अमेरिका देखना चाहते हें, इस लिए पहले से स्थापित दृष्टीकोण पर अधिक बात नहीं करना चाहते हें। आज भारत में बैठ कर कोंडालिसा राइस क्या बोल रही हें और कल इस्लामाबाद जा कर क्या बोलेंगी यह हमारे लिए इतना महत्तवपूर्ण नहीं है। हाँ मनमोहन सिंह और आसिफ ज़रदारी के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है। हमें देखना होगा की बराक हुसैन ओबामा और हिलेरी क्लिंटन क्या बोल रहे हें? जहाँ तक जॉर्ज डब्लेव बुश का प्रशन है तो ९/११ के बाद उन की पर्त्येक समस्या का निदान लादेन का भूत था। जब भी वे परेशानी में होते, लादेन का कैसेट सामने आजाता, इसी प्रकार हिंदुस्तान में जब जब भारतीय जनता पार्टी परेशान होती है, बम धमाके हो जाते हें। इस समय इन बम धमाकों ने किस प्रकार भारतीय जनता पार्टी को मुसीबत से बचाया है, समूचा विश्व जनता है। वरना अब तक करकरे, अडवाणी और राज नाथ की कितनी किरकिरी कर चुके होते, समझा जा सकता है। पता नही हमारी केंद्रीय सरकार की सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो गई है अन्यथा संघ परिवार को क्लीन चिट देने के लिए वह इतनी उतावली न होती। जहाँ तक पाकिस्तान को आरोपी ठहराने की बात है और उस के लिए पाकिस्तान पर हमला किया जाना चाहिए था तो जयपुर से ले कर आसाम तक पिछले ६ महीनों में ६ से अधिक अवसर हमारे पास थे। अब रहा प्रमाणों का सवाल तो सरकार भलीभांति जानती है की वह कौन से प्रमाण हें जो पाकिस्तान के विरुद्ध हें और जिन्हें बुन्याद बना कर न केवल यह की बेहतर होते जा रहे सम्बन्ध खतरे में डाले जा रहे हें। अपितु हमला करने तक की आवाज़ें उठने लगी हें। क्या पुलिस के हाथ आए आतंकवादी का बयान शब्दश: सच्चा है? पुलिस की कार्यप्रणाली तो सब जानते ही हें। वो केवल तोते की तरह रटा हुआ बयान बोलेगा। इस के पीछे किस की इच्छा क्या है, यह इसे क्या पता। हमारी वह गुप्तचर एजेंसियाँ जिन्हें अब पल पल की ख़बर है, कहाँ तक पानी का जहाज़ आया, कहाँ से वे नावों में सवार हुए, कितने लोग थे, कैसे कपड़े पहने थे, इरादे क्या थे, कितने सटेलाईट फ़ोन थे, कितने घंटे तक बात हुई? ठीक इसी प्रकार उन्हें दस मिनट में पूर्ण जानकारी प्राप्त हो गई, जिस प्रकार वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के दस मिनट बाद सी आई ऐ और मिस्टर बुश को प्राप्त हो गई थी। जब हम यह सुनते थे की भारत नक़ल करने में निपुण है तो हमारा मस्तिष्क इस ओर नहीं जाता था की वह अमेरिकी रणनीति की भी नक़ल करेगा। अब अगर यह नक़ल करने की प्रवृत्ति इससे भी आगे तक जारी रही तो फिर पाकिस्तान के साथ युद्ध अनिवार्य नज़र आता है। इस लिए की अमेरिका पर हुए ९/११ के आतंकवादी हमले के बाद अफगानिस्तान और इराक , अमेरिकी एक्पक्ष्य युद्ध के बाद लग भग नष्ट कर दिए गए। बहाना था की अफगानिस्तान में लादेन है, और इराक में विनाशकारी हथ्यार। जाते जाते मिस्टर बुश स्वयं यह भी कह गए की इराक में विनाशकारी हथ्यार नहीं थे और यह केवल एक अफवाह थी। येही बात तो सद्दाम हुसैन ने भी कही थी तथा स्वयं उन के द्वारा भेजी गई विशेषज्ञों की हजारों पृष्ठों पर आधारित रिपोर्ट का भी येही कहना था। परन्तु क्या उन्होंने उस समय विश्वास किया? अमेरिका को हमला करना था, यह हमला हुआ, परिणाम सबके सामने है। हमले का जो कारण बीते हुए कल में अमेरिका के पास था, वही आज हमारे पास भी है। अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला इस लिए किया क्यूंकि वहां लादेन था और हम पाकिस्तान पर इस लिए हमला कर सकते हें की वहां दाऊद है। इराक को इस लिए नष्ट किया गया क्यूंकि वहां विनाशकारी हथ्यार होने की सूचना थी। हम पाकिस्तान को इस लिए नष्ट कर सकते हें क्यूंकि उस के विषय में मुंबई में हुए आतंकवादी हमले की सूचना है। "सूचना है" मैंने इस लिए लिखा की अभी विशवास करने जैसी बातें सामने नहीं आई हें। यह बयान हमारे उन सतर्क एवं कर्तव्यनिष्ठ गुप्तचर अधिकारीयों का है जिन की नाक के नीचे इतना बड़ा आतंकवादी हमला हुआ और वे सोते रहे। अब भी वे लगातार एक अविश्वसनीय बात कहते चले आरहे हें की हमला करने वालों की संख्या केवल दस थी तथा कोई स्थानीय हाथ भी इस में शामिल नहीं है। कौन मूर्ख इस बात पर विशवास करेगा की इतना बड़ा विनाश और केवल १० आतंकवादी, कोई स्थानीय सहायक नहीं। हमारे विचार में तो ताज और ओबेरॉय जैसे होटल में कोई अपनी दोस्त को पत्नी बना कर ले जाए तो यह बात भी पकड़ में आसकती है। हत्यारों का इतना बड़ा भंडार होटलों में हो और उपस्थित होटल के स्टाफ और प्रबंधनों को इस की कोई जानकारी न हो। बात कुछ हज़म नहीं होती। इस से जुडा एक प्रशन जो करना नहीं चाहते थे मगर सच की मांग है इस लिए करना आवयशक लगता है। भोपाल गैस काण्ड में एंडरसन पर मुकदमा क्यूँ? दिल्ली के उपहार सिनेमा में आग लगने पर अंसल ब्रदर्स को सज़ा क्यूँ? क्या एंडरसन कम्पनी के जिम्मेदारों ने स्वयं आकर गैस लीक की थी? क्या अंसल ब्रदर्स ने स्वयं आकर अपने सिनेमा घर में आग लगायी थी? दोनों मामलों में केवल मानवीय भूल थी परन्तु इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी। तो फिर इस से बड़ी भूल के लिए होटल ताज और ओबेरॉय के मालिक जिम्मेदार क्यूँ नहीं? माफ़ कीजिये, भोपाल गैस काण्ड या उपहार सिनेमा में आग भारत पर आतंकवादी हमला नहीं था जबकि ताज और ओबेरॉय में जो कुछ हुआ, वह भारत पर हमले से कम नहीं है। क्या भारतीय सरकार को अपनी मित्रता के लिए सब कुछ स्वीकार है या फिर कारन यह है की भोपाल गैस काण्ड और उपहार सिनेमा में आग लगने के मामले को पाकिस्तान से नहीं जोड़ा जा सकता था।

होटल ताज में हमला करने वालों ने अमेरिकी और ब्रिटिश नागरिकों की निशान्दाही चाहि और निशाना भी बनाया। क्या इस लिए की कोंडालिसा राइस और मिस्टर ब्राउन को हस्तक्षेप का अवसर मिले और यदि पाकिस्तान पर हमला करने की आव्यशकता हो तो उन की राय का दखल भी रहे। नरीमन हाउस निशाना बना क्यूंकि इजराइलियों की घृणा को इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध प्रयोग किया जा सके, क्या यह सब कुछ एक सोचे समझे षड़यंत्र का हिस्सा नहीं हो सकता? आख़िर हम इस दिशा में क्यूँ नहीं सोच रहे हैं जो इस आतंकवादी हमले का एक कारण हो सकता है? हो सकता है की यह ग़लत हो परन्तु जांच के लिए विभिन्न दृष्टिकोण सामने रखे ही जाते हें। भारत के इतिहास में यह पहला अवसर था की हिंदू संघटनों के आतंकवाद का इतना बड़ा नेटवर्क सामने आया। इस दिशा में जांच की जा रही है क्या हेमंत करकरे को रास्ते से हटाने, हिंदू आतंकवाद की घटनाओं को परदे के पीछे ले जाने और एक बार फिर मुसलमानों या इस्लामी देशों का सम्बन्ध आतंकवाद से जोड़ने के लिए यह षड़यंत्र रचा गया हो, ऐसा नहीं हो सकता।

हाँ हम वे घटनाएँ और विवरण सामने रखेंगे की जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार में फौज के बीच संघ परिवार का लिटरेचर बांटा गया, क्या उन का मस्तिष्क बदलने के लिए विशेष अवसरों पर फौज के बीच बाल ठाकरे और संघ के प्रचारक तरुण विजय को निमंत्रित नहीं किया गया। चलो कुछ देर के लिए बाल ठाकरे को राजनीति और इस सरकार का हिस्सा मान भी लें तो तरुण विजय की उपस्थिति का कारण? हमारे पास वह विवरण है जिस से स्पष्ट होता है की "RAW"और IBमें एक भी मुस्लमान नहीं था। (जिस समय की रिपोर्ट का उल्लेख हम कर रहे हें, उस समय नहीं था। हो सकता है आज कोई हो) ऐसा क्यूँ? १९३६ में भोसला मिलेट्री ट्रेनिंग कॉलेज की स्थापना की गई, कब किस ने और किस उद्देश्य के लिए की? सब कुछ सामने आया तो स्पष्ट हो जायेगा की प्रोहित और उपाध्याय जैसे लोगों को आतंक का पर्याय बनाने के लिए प्रयोग किया गया यह मिलेट्री कॉलेज।

हम इस आतंकवादी "क़सब" की बात पर विशवास करें जिस ने बताया की ५०० आतंकवादियों को ट्रेनिंग दी गयी पाकिस्तान में। या "शहीद हेमंत करकरे" की बात पर विशवास करें जिन्होंने ने बताया की प्रोहित ने ५०० आतंकवादी तैयार किए। अब निर्णय भारत सरकार को लेना है और भारतीय जनता को की यह आतंकवादी सच्चा है या शहीद हेमंत करकरे? हमला इस आतंकवादी के बयान को आधार बना कर पाकिस्तान पर किया जाना चाहिए या करकरे के इस बयान को उन की आखरी वसीयत मान कर उन लोगों पर पकड़ मज़बूत की जानी चाहिए जिन्हें वह बेनकाब कर रहे थे।

मुंबई पर आतंकवादी हमला या क्रिया की प्रतिक्रिया

"क्रिया" करकरे की जांच और "प्रतिक्रिया" करकरे की मौत

मैं आज कुछ नहीं लिखना चाहता था। जब लिखने के लिए कुछ भी न हो तब कुछ पंक्तियाँ लिखना भी बहुत कठिन होता है और जब लिखने के लिए इतना अधिक हो की कुछ पृष्ठ भी कम हों, तब भी लिखना बहुत कठिन होता है। २६ नवम्बर २००८ को जब मुंबई में आतंकवादी हमला हुआ। तब मैं भारत के बाहर था। अगले दिन सुबह "साउथ एशिया मीडिया कांफ्रेंस" में हिस्स्सा लेना था, जहाँ भारत से "आजाद हिंद" कोल्कता के संपादक और पार्लिमेंट सदस्य अहमद सईद मलीहाबादी और रोजनामा "सिआसत" हैदराबाद के संपादक जाहिद खान, व आलमी सहारा उर्दू चैनल के देवेश वर्मा भी इस कांफ्रेंस में सम्मिलित थे। रात भर मैं परेशान रहा और यह तय कर पाना बहुत कठिन था की विदेशी ज़मीन पर जब अंतर्राष्ट्रीय मीडिया उपस्थित होगा, तो मैं इस विषय पर किस प्रकार अपने विचार प्रकट करूँगा। लेकिन मुझे अपने समाचार पात्र और अपने देश का प्रतिनिधित्व करना था। इसलिए दृष्टिकोण सामने रखना भी आवयशक था, इस लिए की मुंबई पर हुआ आतंकवादी हमला लगातार मेरे मस्तिष्क पर छाया हुआ था, अतएव मैं निश्चित समय से पहले भाषण दे कर अपने साथी शकील हसन शम्सी के मित्र मोअज्ज़म शाह के कार्यालय "मीडिया बैंक" पहुँचा और इस घटना के बाद कराची में बैठ कर जो पहला लेख लिखा उस का विषय था, "हेमंत करकरे के बाद ऐ टी एस? " तब से अब तक अर्थार्त यह लेख लिखते समय तक इस विषय पर जो कुछ लिखा है, वह इस आतंकवादी हमले में शहीद हेमंत करकरे को मस्तिष्क में रख कर ही लिखा है। आज भी मैं अपने आप को इस सोच से अलग नहीं कर पा रहा हूँ, इस लिए कुछ भी लिखना बहुत कठिन नज़र आरहा था। आख़िर आप सुब इस दिशा में क्यूँ नहीं सोच रहे हैं? येही चाहता था मैं, की आज कुछ न लिखूं और इस विषय पर जितना अधिक से अधिक अध्यन कर सकता हूँ, करूँ और आप से यह प्रार्थना करूँ की इश्वर के लिए आप सब मिल कर इस दिशा में सोचें की आख़िर ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे का इन आतंकवादी हमलों में शहीद हो जाना मात्र सहयोग था या एक गहरा षड़यंत्र?


जिस प्रकार ओपेराशन बटला हाउस के बाद लग भाग पूर्ण मीडिया केवल तथा केवल एक ही पक्ष को सामने रख रहा था, वह जो पुलिस द्वारा बयान किया जारहा था, ठीक वही वस्तुस्थिति आज फिर हमारे सामने है, जो कुछ पुलिस कह रही है, वही पूर्ण मीडिया द्वारा प्रस्तुत किया जारहा है और यह प्रचार प्रसार केवल भारत तक ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँच रहा है। क्या हम यह मान लें की पूर्ण मीडिया के पास समाचारों का जो मध्यम है, वह केवल पुलिस है और पुलिस के पास इस आतंकवादी हमले के सम्बन्ध से प्रत्येक जानकारी प्राप्त होने का केवल एक ही सूत्र है और वह है उन आतंकवादी हमलों में जीवित पकड़ा गया आतंकवादी, अजमल कमाल कसाब। क्या यह सत्यवादी हरिश्चंद्र के जैसा केवल सच बोलने वाला व्यक्ति है जिसकी प्रत्येक बात पर आँख बंद कर के विश्वास कर लिया जाए। आख़िर ऐसा ही क्यूँ होता है की अधिकतर बम धमाकों या आतंकवादी हमलों के बाद सभी आतंकवादी मार दिए जाते हैं, केवल एक जीवित पकड़ में आता है व कुछ भाग जाते हैं और फिर इस एक जीवित पकड़े गए आतंकवादी को सामने रख कर पुलिस एक कहानी प्रस्तुत कर देती है और समूचा देश इस कहानी पर विश्वास कर लेता है, न अधिक जाँच पड़ताल की आव्यशकता है होती है और न किसी दुसरे दृष्टिकोण से सोचने की।


प्राप्त सूचनाओं के अनुसार ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे जब एक मीटिंग से वापस पहुंचे तो उन्हें यह सूचना दी गई की होटल ओबेरॉय पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया है, वह तुंरत होटल ओबेरॉय की ओर चले, फिर उन्हें सूचना मिली की छत्रपति शिवाजी स्टेशन पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया है, वह होटल ओबेरॉय से सी एस टी पहुंचे की रास्ते में ही एक और सूचना मिली की अस्पताल कामा सेंटर पर आतंकवादी हैं, और एक बार फिर वह एनकाउंटर स्पेशलिस्ट "सालसकर" तथा डिप्टी कमिशनर ऑफ़ पुलिस "अशोक काम्टे" के साथ कामा सेंटर की ओर चल पड़े और इस के लिए एक संकरे मार्ग का चुनाव कीया गया जहाँ तीन ओर से उन पर हमला किया गया और एक सूचना के अनुसार झाडियों में छुपे आतंकवादियों ने निशाना बाँध कर उन पर हमला किया, फिर उन्हें गाड़ी से नीचे फ़ेंक कर उस गाड़ी को लेकर भाग गए। तत्पश्चात रस्ते में एक स्कोडा कार को रोका, इसके चालक को नीचे उतारा और कार लेकर भाग गए।
मुंबई के इन आतंकवादी हमलों में मारे गए सभी लोग आतंकवादी हमलों का शिकार हुए हों, चाहे अंधाधुन्द फायरिंग द्वारा, हैण्ड ग्रेनेड द्वारा किए गए धमाकों में या अग्नि काण्ड में। टारगेट किल्लिंग अर्थार्त निशाना बाँध कर केवल तीन ही व्यक्तियों की हत्या की गई है और उन में भी प्रमुख हैं, मिस्टर हेमंत करकरे की जो वास्तव में आंखों की किरकिरी बन गए थे, संघ परिवार की विशेष रूप से लाल कृष्ण अडवानी, राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी की। इस दिशा में बात क्यूँ नहीं हो रही है? पुलिस और मीडिया इस दृष्टिकोण पर मौन क्यूँ है? जिस जीप में हेमंत करकरे, विजय सालसकर और अशोक काम्टे सवार थे उसमें एक कांस्टबल भी सवार था जिसे एक गोली लगी और जिसका उपचार हो रहा है। आतंकवादियों ने उस की जान लेना आवयशक नहीं समझा और स्कोडा कार के चालक पर भी उन की दयादृष्टि रही। आख़िर इन आतंकवादियों की हेमंत करकरे और शेष दो अधिकारीयों से ही क्या दुश्मनी थी? वह उन्हें ही क्यूँ रास्ते से हटाना चाहते थे? वह कौन था जो बार बार फ़ोन कर के या वायरलेस द्वारा संदेश भेज रहा था की करकरे ओबेरॉय पहुंचे? सी एस टी या कामा सेंटर, क्या प्रत्येक स्थान पर आतंकवादियों से निपटने के लिए महाराष्ट्र में केवल एक ही टीम और एक ही व्यक्ति था? यदि करकरे ओबेरॉय पहुँच गए थे तो सी एस टी और कामा सेंटर कोई दूसरी टीम जा सकती थी और यदि उन्हें सी एस टी भेज दिया गया था तो फिर वहां से कामा सेंटर जाने का निर्देश देना आवयशक क्यूँ था? यह निर्देश देने वाला कौन था? इस का पता लगना अत्याधिक आवयशक है। करकरे, सालसकर और काम्टे के शरीर पर कुल कितनी गोलियाँ लगीं? क्या गोलियाँ लगने के बाद उन के शरीर के फोटो लिए गए? अगर लिए गए तो वह कहाँ हैं? उनके शरीर में कितनी गोलियाँ लगीं, उन गोलियों की पहचान क्या है? क्या आतंकवादी हमलों में मरने वाले अन्य लोगों को भी वैसी ही गोलियाँ लगीं हैं? अर्थार्त जो आतंकवादी प्रयोग कर रहे थे। या उन्हें जो गोलियाँ लगीं वह पुलिस या आर्मी द्वारा प्रयोग की जाती हैं। करकरे और उन के दो साथियों की पोस्ट मोर्टेम रिपोर्ट क्या कहती है, उसे सामने क्यूँ नहीं लाया गया? अगर इन सभी प्रश्नों के उत्तर सामने आजायें तो मुंबई पर आतंकवादी हमले के राज़ से परदा हट सकता है। अभी तक इन आतंकवादी हमलों के बाद वस्तुस्थिति में जो भी परिवर्तन आया है वह यह है की २६ नवम्बर २००८ से पहले भारत में प्रत्येक ओर चर्चा का विषय था मालेगाँव जाँच प्रकरण, इस में कट्टर हिंदूवादी संघटनों का सम्मिलित होना, साध्वी, महंत और प्रोहित के लिप्त होने के प्रमाणों का सामने आना, समझौता एक्सप्रेस दुर्घटना में लेफ्टनेंट कर्नल प्रोहित का सम्मिलित नज़र आना, दयानंद पाण्डेय के लैपटॉप से संघ परिवार के इन्द्रेश और मोहन राव भागवत की हत्या के षड़यंत्र से परदा उठना, लाल कृष्ण अडवानी, राज नाथ सिंह, नरेंद्र मोदी और शिव सेना का इन आरोपियों के समर्थन में खुल कर सामने आना, शिव सेना द्वारा नयायालय ले जाते समय आरोपियों पर फूल बरसना, टी वी प्रोग्रामों में भाजपा के नेताओं का उसे सही करार देना, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के मामले को लेकर लाल कृष्ण अडवानी का प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से मिलना अर्थात इन कत्तावादी संघटनों को बेनकाब कर दिए जाने के बाद यह सब ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे से बहुत नाराज़ थे और अपने जीवन के अन्तिम दिनों में हेमंत करकरे इस सच्चाई को गहराई से समझने लगे थे। भारतीय जनता पार्टी के लिए मालेगाँव बम धमाकों का सत्य और इस के साथ ही दुसरे बम धमाकों से एक के बाद एक परदे का उठना, वबाल जान बन गया था और उन्हें यह विश्वास हो चला था की यदि वस्तुस्थिति ऐसी ही रही तो आगामी लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता उन्हें स्पष्ट रूप से नकार देगी और चुनाव उन के लिए कितना महत्त्व रखता है, इस का एक उदहारण यह भी है की मुंबई पर आतंकवादी हमलों के बाद प्रधानमन्त्री जब सर्वदलीयबैठक कर रहे थे, तब लाल कृष्ण अडवानी और राज नाथ सिंह राजस्थान में अपनी पार्टी के चुनाव प्रसार में व्यस्त थे। यह वही लोग हैं जो आतंकवाद के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की बात करते रहे हैं। क्या उन्हें लगता है की आतंकवाद के दायरे में कट्टर हिंदू संघटनों के आने का सिलसिला रुक गया है, इस लिए उन की आव्यशकता पूर्ण हो गई। मुंबई बम धमाकों के बाद हिंदू आतंकवादियों की चर्चा समाप्त हो गई इस लिए अब चुनाव का समय आते आते वह फिर अपने लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करने में safal हो जायेंगे। हमें इस विषय में अभी कुछ नहीं कहना परन्तु यह अवश्य कहेंगे की शहीदों का खून रंग लाएगा ज़रूर। बात मालेगाँव की हो या मुंबई पर आतंकवादी हमलों की, सच्चाई तो एक न एक दिन सामने आएगी ही, फिर तय होगा की मुंबई पर आतंवादी हमला पाकिस्तान और लश्करे तयबा की क्रिया थी या पहले की तरह एक्शन का रेअच्शन, क्रिया की प्रतिक्रिया। क्रिया करकरे की जाँच और प्रतिक्रिया करकरे की शहादत।

Wednesday, December 3, 2008

शहीदों के रिश्तेदार न्याय मांग रहे हैं

वह समझते हैं की जो दिख रहा है उसके परदे में सच्चाई कुछ और भी है

मुंबई के वर्त्तमान आतंकवादी हमलों में हमने ऐसा बहुत कुछ खोया है, जिस की भरपाई नहीं हो सकती. परन्तु जो कुछ पाया है यदि उस पर गंभीरता से विचार करें तो हम समझ सकते हैं की शहीदों का बलिदान निरर्थक नहीं गया यह आतंकवादी हमला, पाकिस्तान की ओर से था, लश्करे तैबा ने किया या इस में भारत से सम्बन्ध रखने वाले आतंकवादी शामिल थे, यह जांच चलती रहेगी, परिणाम आते रहेंगे परन्तु इस भयानक विनाश के बाद जो कुछ देखने को मिला, उससे अब यह आशा बंधती नज़र आती है की भारतीय जनता जागरूक हो चुकी है, उस ने आतंकवादियों के उद्देश्य को भी समझ लिया है, उस के सामने सांप्रदायिक व्यक्तियों के चेहरे बेनकाब हो गए हैं और अब राजनीतिज्ञों का राजनीती खेल भी उससे छिपा नहीं है।

मुखौटे लगाकर घूमने वाले कुछ नेता तो स्वयं अपनी करतूत से ही बेनकाब हो गए, उन के चेहरे से नकाब उठाने की आव्यशकता ही नहीं पड़ी और शेष को उन की पूर्व गतिविधियों के प्रकाश में पहचानना कठिन नहीं है। भारतीय जनता ने धर्म जाती के भेद भाव के बिना जिस प्रकार इस गंभीर स्तिथि में शान्ति व एकता का दृश्य प्रस्तुत किया वह प्रशंसिया व अनुकर्णीय है और यदि हम इस भावना को कायम रख पाये तो निश्चय ही यह बलिदान एक नए भारत को जनम दे सकता है, जहाँ शान्ति भी होगी और सांप्रदायिक एकता भी, जहाँ राजनीतिज्ञ वोट के लिए सांप्रदायिक तनाव पैदा करने में सफल नहीं होंगे इश्वर करे की ऐसा हो जाए।

परन्तु

यह भी आवयशक है की हम अत्याधिक गंभीरता से इन आतंकवादी हमलों की विवेचना करें और इस वास्तविकता को समझने का प्रयास करें की इस विनाश के पीछे कौन है, यह विनाश किस की समस्याओं का हल है तथा इस में किस के हितों का रहस्य छिपा है? मैंने अपने कल के लेख में ऐसे कुछ प्रशन उठाये थे। जिनके उत्तर सच्चाई को सार्वजनिक कर सकते हैं। यह प्रशन पिछले कई दिनों से मेरे मस्तिष्क में थे और मैं लगतार यह सोचता रहा था की इन प्रशनों को उठाया जाए की नहीं यहाँ तक की प्रकाशन से पहले मैंने अपने वरिष्ठ साथियों के बीच इन प्रशनों को रख कर उन का सुझाव भी चाहा, राय मिली जुली थी परन्तु मैं इन प्रशनों को उठाने से स्वयं को रोक न सका।

मुझे संतोष उस समय हुआ जब आज प्रात: मैं अंग्रेज़ी दैनिक "हिंदुस्तान टाईम्स" पढ़ रहा था, उस ने भी न केवल कुछ ऐसे ही प्रशन उठाये हैं अपितु पृष्ठ एक पर "वीर सांघवी" ने कुछ रहस्योद्घाटन भी किए हैं। जो हमारी सरकार की असफलता की ओर संकेत करते हैं। हम इन सभी बिन्दुओं को एकत्रित करके अपने पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करेंगे। परन्तु इस समय मैं आवयशक समझता हूँ की प्रसिद्द इतिहासकार और बुद्धिजीवी "अमरेश मिश्रा" के वे लेख अपने पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करूँ जो उन्होंने ईमेल द्वारा तीन अलग अलग टुकडों में मुझ तक पहुंचाए बहुत सम्भव है की इस आतंकवादी हमले की तह तक जाने में उन के द्वारा उठाये गए प्रशन भी अत्याधिक महत्त्वपूर्ण साबित हों।

मैं जिस "थेओरी" को बयान कर रहा हूँ, उस पर कई लोगों ने संदेह प्रकट किए हैं, शायद इन्टरनेट पर। उन्हें किसी भी व्यक्ति अथवा किसी भी चीज़ पर संदेह करने और उस के सम्बन्ध में प्रशन करने का अधिकार है। हो भी क्यों न, सही दिशा में सोचने की बुन्याद आख़िर संदेह ही तो है।

मैंने मौत की धमकी सुनी, मेरे पास घृणा से भरे मेल आए, परन्तु साहस के कारण मुझे प्रशंसाएं भी सुनने को मिलीं।

कुछ लोग इस बात को नहीं समझते की मुंबई पर आतंकवादी हमले जैसे पेचीदा हालत में जैसे जैसे नई सच्चियां सामने आती जाएँगी, नए नए दृष्टिकोण भी उभरते चले जायेंगे परन्तु इस का अर्थ यह नहीं है की किसी व्यक्ति को सरकारी अधिकारीयों की आलोचना करने से रोक दिया जाए या मीडिया की बात को नकार दिया जाए।

मेरी बुनयादी थेओरी की संघ परिवार के तत्वों ने आतंकवादी हमलों के लिए मार्ग प्रशस्त किया है, अब अधिक सशक्त हो चुकी है. वास्तव में संघ परिवार से कहीं ज़्यादा इस में मोदी का अमल नज़र आता है. जी हाँ वह हिन्दुस्तानी फासीवाद के नए और आधुनिक चेहरे हैं। वह एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने वास्तव में कई मामलों में आर एस एस को भी पीछे छोड़ दिया है, वह मोसाद के मित्र नंबर एक हैं, हाल ही में आर एस एस के एक बड़े अधिकारी ने मुझे बताया की "अमरेश हम ने अपने केद्रों के ऊपर अपना कंट्रोल खो दिया है। हम कभी नहीं चाहते थे की उरिसा और कर्णाटक में हालत काबू से बहार हो जाएँ. उरिसा के अन्दर तो हम ने ईसाई नेताओं के साथ एक साझी घोषणा जारी करने की योजना भी बनाई थी, परन्तु निचले स्टार से बगावत हो गई। वि एह पी और बजरंग दल ने हमारी बातों को मानने से इनकार कर दिया इस के बाद उन्हें मोदी जैसे व्यक्ति से समर्थन प्राप्त हो गया हम लोग असहाय रह गएबुनयादी रूप से आर एस एस ने जो संघटन खड़ा किया था, उस के ऊपर अब स्वयं उस का कंट्रोल नहीं रहा। मोदी के रूप में इस संघटन ने मोसाद से संथ गाँठ कर li है यहाँ पर इस बात को भी याद रखिये की मोसाद के सम्बन्ध विनाश में लिप्त आई एस आई में के साथ भी हैं. यह भी याद रखें की पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्यपूर्व में सक्रिय बहुत से "जिहादी" गिरोहों का रिमोट कंट्रोल या तो मोसाद (इस्राइली खुफिया एजेन्सी) के हाथ में है या फिर सी आई ऐ (अमेरिकी खुफ्या एजेन्सी) के हाथ में. हाल ही में यमन में एक ऐसे मुस्लिम "जिहादी" संघटन का पता चला है, जिसकी स्थापना मोसाद ने की थी. इसी लिए यह सम्भव है की जिन आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला किया, उन्होंने ने पाकिस्तान को अपने अड्डे के रूप में प्रयोग किया हो परन्तु उन का सम्बन्ध अलग अलग देशों से हो सकता है, उन में से कुछ ब्रिटेन के भी मुस्लमान हो सकते हैं उन में से कम से कम एक के बारे में पता चला है की वह मौरिशुस का रहने वाला है।

अब यह बात भी सामने आ रही है की साउदी अरब के एक व्यक्ति (जिसे इस समय मौलाना बेदी कहा जा रहा है) ने शायद उन "जिहादियों" को एकत्रित किया और यहाँ पर भेजा। इस मास्टर मंद को धन किस से प्राप्त हुआ होगा, यह पता लगना आवयशक है। ऐसे मास्टर मिन्ड्स की कोई विचारधारा नहीं होती। यह अमेरिका की पैदावार हैं जो पैसे के लिए काम करते हैं, बल्कि कई बार तो अमेरिकी हितों के विरुद्ध भी काम करते हैं। यह एक बार फिर एक पेचीदा परन्तु स्पष्ट तथ्य है।

स्वयं ओबेरॉय होटल के मालिक भी मोदी के घनिष्ट मित्र हैं उन्होंने गुजरात में करोरों रुपयों की पूँजी लगाई है ओपेराशन से पहले आख़िर इतने दिनों तक यह आतंकवादी कैसे ताज और ओबेरॉय में ठहरे हुए थे? इन दोनों ही पाँच सितारा होटलों में कई दिनों तक भला हथ्यार और गोला बारूद कैसे जमा किए जाते रहे? क्या कोई साधारण व्यक्ति ऐसा कर सकता है? होटल प्रबंधन की जानकारी के बिना क्या यह सब सम्भव है?

नरीमन हाउस की यदि बात करें तो मैं वास्तव में आश्चर्यचकित हूँ की मोसाद समर्थन से होने वाले ओपेराशन में यहूदियों को क्यों मारा जायेगा? लेकिन क्यूँ नहीं? मोसाद हर स्तिथि में बर्बर ज़ेओनिज़्म (यहूदीवाद) का समर्थन करता है जो के संघ परिवार के हिंदुत्व की ही तरह एक आधुनिक धार्मिक व फासीवादी विचारधारा है ज़ेओनिज़्म, जुदैज्म का भाग नहीं है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हिंदुत्व सनातन धर्म का भाग नहीं है जो की हिन्दुओं का वास्तविक धर्म है। प्रज्ञा सिंह के मामले में सनातन धर्म के लोगों ने ऐसे हिंदुत्व का विरोध किया, विशेष कर जिस प्रकार उन्होंने हेमंत करकरे को बदनाम किया।

" मोसाद" और ज़ओनिस्ट साधारण यहूदियों को मारने के लिए जाने जाते रहे हैं आख़िर हिंदुत्व विचारधारा ने महात्मा गाँधी की भी हत्या कर दी थी, क्या कोई इस से इंकार कर सकता है?

इस बात पर भी विचार करें की विश्व में बुराई का बोल बाला है क्योंकि अछे के अन्दर सोचने की कमी है। कुछ समय के लिए बुराई की ही जीत होती है क्योंकि इस के अन्दर अच्छाई से भी अधिक सोचने की क्षमता है।

जो लोग अपने आप को मोदी और अडवानी का समर्थक कहते हैं वह लोग महात्मा गाँधी के कातिलों के भी समर्थक हैं हिंदुत्व विचारधारा और राजनीती प्रारम्भ से ही धर्म निरपेक्ष राज्य का विरोध करते रहे हैं जिसकी बुन्याद १९४७ में पड़ी थी उन्होंने १९४७ में भारतीय राज्य के विरुद्ध भी बगावत की थी इस बात के प्रमाण मौजूद हैं की आर एस एस प्रमुख गोलवलकर ने मुसलमानों के विरुद्ध हमला करने के लिए ब्रिटिश सेना की सहायता की थी यह बात उस समय के उनितेद प्रोविंस (मौजूदा उत्तर प्रदेश) के गृह सचिव, राजेश्वर दयाल को बताई गई थी, जिन्होंने ने U. P. के उस समय के मुख्या मंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त को इस समाचार से सूचित किया था।

१९४७ के बाद जो मुस्लमान हिंदुस्तान में ही ठहर गए थे, उन्होंने ऐसा अपनी इच्छा से किया था। स्वयं मुसलमानों में इस बात को ले कर काफ़ी विरोधाभास था। जिस के कारण जिन्नाह और मुस्लिम लीग एक और हो गए थे जबकि दूसरे मुस्लिम उल्माओं और उन के समर्थकों ने कांग्रेस का साथ दिया था।

करकरे की मौत: अब करकरे का मामला : इस से सम्बंधित दो बातें पहले से ही आरही हैं। यह बात अब तक साफ़ नहीं है की उनको कैसे मारा गया? इस को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। करकरे की माँ टी वी पर आई और वह यह जानना चाहती थी की उनके बेटे को कैसे मारा गया। सलस्कर के चछेरे भाई ने भी यह प्रश्न उठाया।

बहादुर शहीदों के रिश्तेदार न्याय की मांग कर रहे हैं। वह यह महसूस करते हैं की जो कुछ नज़रों के सामने दिखाई दे रहा है। उससे से भी परे कोई बात अवश्य है और कहीं न कहीं करकरे, काम्टे और सलस्कर की मौत मालेगओं धमाकों की जांच से जुड़ी हुई है, जो करकरे की निगरानी में चल रही थी।

आख़िर करकरे की पत्नी और बेटे ने मोदी द्वारा घोषित की गई १ करोड़ की राशि को लेने से इनकार क्यूँ कर दिया? करकरे का यह बेटा बाद में ओबेरॉय होटल भी आया, जहाँ पर फायरिंग का सिलसिला अभी जारी था। उस ने एक बयान भी दिया जो किसी को भी पसंद नहीं आया मोदी शायद येही सोच रहे थे की उन्होंने विपक्ष की इस घड़ी में एक समस्या को दूर कर दिया जो की मध्यप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के चुनाव से पहले पैदा हुई थी जिस में आतंकवादी हमलों से पूर्व भाजपा की स्पष्ट असफलता दिखाई दे रही थी।

ज़रा सोचिये, मुंबई आने वाली नाव गुजरात सरकार की मदद के बिना वहां तक नहीं पहुँच सकती थी।

सच्चाई यह है वह सभी हिंदुत्व शक्तियां जो करकरे और पूरी मुंबई ऐ टी एस टीम को अपना निशाना बनाये हुए थी और उन्हें विल्लें और "हिन्दुओं का शत्रु" बता रही थी, वह आज अचानक उन्हें हीरो कहने लगी हैं? कैसे द्विमुखी लोग हैं! यह कुछ लोगों ने मुझे मेल भेजे हैं और कह रहे हैं की वे अडवाणी और मोदी का समर्थन करते हैं यह सभी लोग करकरे की मौत का समर्थन कर रहे हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे उन्होंने महात्मा गाँधी की मौत का समर्थन किया था। लेकिन हमें यह जानना चाहिए, हमें यह जानने का अधिकार है की कुछ हिंदुत्व वादी करकरे से घृणा रखते थे, क्या उन्होंने ने ही उन की मौत के पीछे अपना दिमाग लगाया और क्या ऐसे लोग ही उन की हत्या के लिए जिम्मेदार हैं. करकरे हमारे महान हीरो हैं. धर्म निरपेक्षता के लिए अपनी जान निछावर करने वाले शहीद हैं।

मोदी, अडवाणी और सभी सनातनी विरुद्धि हिंदू जो इन्टरनेट पर स्वयं को हिंदू कह रहे हैं, मुस्लिम दुश्मनी में लिप्त यह लोग "मालेगाँव" धमाके की जांच को देखना नहीं चाहते थे, जिस में करकरे बहुत हलद प्रवीन तोगडिया का नाम भी लेने वाले थे, यहाँ तक के छोटे राजन का भी लेकिन इस से पहले ही करकरे को रास्ते से हटा दिया गया।

विदेशी एजेंसियों के संरक्षण में सांप्रदायिक शक्तियां भारत को नष्ट कर देना चाहती हैं. अमेरिका पाकिस्तान को नष्ट कर देना और चीन का घेराव करना चाहता है इत्यादि और इस के लिए वह चाहता है की भारत भी अमेरिका और इस्राइल के प्रभाव क्षेत्र में दाखिल हो जाए इसी कारण अमेरिकियों, ब्रितानियों तथा इस्रैलियों को निशाना बनाया गया नरीमन हाउस एक ऐसा केन्द्र था जहाँ पर चश्मदीद गवाहों के अनुसार बहुत से संदिग्ध इस्राइली आया जाया करते थे इसलिए यह सम्भव है की वोही लोग आतंकवादी हमलों में भी शामिल रहे हों और उन्होंने ने ही स्वयं अपने लोगों को मार दिया हो।

मुंबई पर होने वाला आतंकवादी हमला एक बड़ा प्रयोग था अर्थार्थ भारत में मौजूद उन शक्तियों के लिए जिन में से एक भारत को खतरनाक और आत्मघाती अमेरिकी व इस्राइली प्रभाव क्षेत्र में ले जाना चाहता है तथा दूसरी वह शक्ति जो भारत को स्वतंत्र देखना चाहती है और पाकिस्तान, चीन और इरान के साथ उस के संबंधों को सुध्रुध करना चाहती है इस युद्ध में सम्मिलित प्रत्येक शक्ति का चेहरा पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं है परन्तु यह पैटर्न धीरे धीरे साफ़ होता जा रहा है भारतीय राष्ट्रीय वाद को पुन : स्पष्ट करने की आव्यशकता है अमेरिका समर्थक, इस्राइल समर्थक निति और हिंदुत्व की और भारत का धीरे धीरे झुकाव मौलाना बेदी और मूसद के लिए यह मैदान तैयार कर रहा है की वह भारत पर हमला करें भारत को उपनिवेशवाद से पूर्व की हिंदू मुस्लिम एकता और १८५७ के हिंदुत्व विरोधी राष्ट्रवाद की और वापास जन होगा।

आख़िर १८५७ की १५० वी वर्षगाँठ को भारत में इतना महत्व क्यूँ नहीं दिया गया? क्यूंकि अमेरिका समर्थक और इस्राइल समर्थक लोब्बी १८५७ को पसंद नहीं करती जो की वास्तविक भारतीय राष्ट्रवाद का सच्चा लक्षण था।

विचार कीजिये ........थोड़ा सोचिये .........हम करकरे और एन एस जी और सेना के सभी वीरों को नमन करते हैं।

Tuesday, December 2, 2008

करकरे के बाद भी क्या बेनकाब हो पाएंगे सफ़ेद पोश दहशत गर्द?

मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद गृह मंत्री शिवराज पाटिल और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम् के नारायणन के त्यागपत्र ग़लत समय पर उठाये गए सही क़दम हैं। यह दोनों त्याग पात्र ओपेराशन बटला हाउस के बाद पुलिस की कार्यशैली पर उठाये गए प्रशनों के पश्चात् आने चाहिए थे। उडीसा, मध्यप्रदेश और कर्णाटक में ईसाइयों और गिरजाघरों पर हमले के बाद आने चाहिए थे। जयपुर, अहमदाबाद, मालेगओं, दिल्ली और गुवाहाटी में हुए बम धमाकों के बाद आने चाहिए थे। भैंसा ( आँध्रप्रदेश), धुलिया (महाराष्ट्र), में सांप्रदायिक दंगे और वाटोली (आदिलाबाद) में एक फौजी के परिवार के सभी ६ व्यक्तियों को जिंदा जला दिए जाने के बाद आने चाहिए थे। इस में कोई संदेह नहीं की मुंबई पर आतंकवादी हमला इतनी बड़ी घटना है जिस के लिए गृह मंत्री शिवराज पाटिल और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को त्याग पात्र देदेना चाहिए था। परन्तु पिछली तमाम असफलताओं के बावजूद शिवराज पाटिल और एम् के नारायणन के अपने पदों पर रहते हुए ही मुंबई ऐ टी एस प्रमुख हेमंत करकरे और उन की टीम ने मालेगओं धमाकों की जांच के दौरान कुछ ऐसे रहस्योद्घाटन किए जिन से स्पष्ट हो गया था की सांप्रदायिक राजनीतिज्ञों की छत्रछाया में कुछ साधू और साध्वियों के भगवा चोलों के पीछे आतंकवाद का खेल खेला जा रहा था। खतरनाक योजनायें तैयार हो रही थी। यहाँ तक की आतंकवाद के यह खतरनाक कीटाणु इस भगवा ब्रिगेड के गंदे मानसिकता के कारन भारतीय सेना तक पहुँच गए थे। लेफ्टनेंट कर्नल प्रोहित और भूतपूर्व सेना अधिकारी उपाध्याय को गिरफ्तार किया जा चुका था। हेमंत करकरे मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों की भेंट न चढ़े होते तो शायद आतंकवाद के इस पूरे नेटवर्क को बेनकाब कर देते। परन्तु साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर पर हिरासत के दौरान हुई प्रताड़ना का बहाना बना कर विपक्ष के नेता लाल कृष्ण अडवानी का प्रधान मंत्री से मिलना और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम् के नारायणन का सफाई पेश करने के लिए लाल कृष्ण अडवानी के घर तक जाना दो ऐसी घटनाएं थी जिन्होंने इस बात का इशारा कर दिया था की अब संभवत: केन्द्र सरकार को मालेगाँव बम धमाकों के सिलसिले में चल रही ऐ टी एस की जांच पर रोक लगाने को मजबूर होना पड़े परन्तु यह सोच से परे की बात थी की जांच के प्रमुख हेमंत करकरे को एक आतंकवादी हमले में मौत के घाट उतार दिया जायेगा! क्या मोहन चंद शर्मा और हेमंत करकरे एक जैसी दुर्घटनाओं के शिकार हुए हैं। क्या आतंकवादी अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। मुंबई पर आतंकवादी हमलों में लिप्त होने का पहला आरोप दक्कन मुजाहिदीन पर आया बल्कि यह कहना ज़्यादा उचित होगा की सबसे पहले यह ज़िम्मेदारी दक्कन मुजाहिदीन ने स्वीकार की लेकिन यह नाम सामने आते ही मीडिया और बुद्धिजीवियों ने प्रशन करदिया की क्या एक अनजान संघटन जिसका सम्बन्ध केवल और केवल हैदराबाद दक्षिण तक नज़र आता है वह इतना बड़ा और भयानक हमला करसकती है तब जाकर इस मामले में पाकिस्तान के शामिल होने की बात कही जाने लगी। हम इस आरोप को न तो रद्द कर रहे हैं और न ही स्वीकार कर रहे हैं। इस आरोप से जुड़े कुछ प्रशन हैं जिनका उल्लेख करना अनिवार्य है। यदि इस के बाद यह हमला पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा किए जाना प्रमाणित हो जाए तो फिर पुलिस का बयान सच्चा और अगर उठने वाले प्रशन, परिस्थितियों और घटनाएं उस के मन घडत कहानी होने की ओर इशारा करें तो फिर निर्णय पाठकों का, हमें कुछ नहीं कहना। इस समय यह सब प्रशन केवल हमारे मस्तिष्क में ही नहीं हैं और भी लोग हैं जो इस दिशा में सोच रहे हैं की ऐ टी एस प्रमुख हेमंत करकरे के नेतृत्व में मालेगाँव बम धमाकों की जांच बहुत से ऐसे रहस्यों का परदा फाश कर रही थी जिस से साधू और संतों के चोले में छुपे आतंकवादी चेहरे बेनकाब हो रहे थे। और अब यह आग संघ परिवार ही नहीं उस की राजनितिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के दामन तक भी पहुँचने लगी थी। इस सन्दर्भ में हमारी जांच और विचार लगातार पाठकों की सेवाओं में पेश किए जाते रहेंगे। इस की पहली कड़ी के रूप में आज हम प्रकाशित कर रहे हैं हेमंत करकरे के अन्तिम संस्कार के समय दिया गया वरिष्ठ अधिकारी जूलियो रिबेरो का बयान।