Saturday, January 2, 2010
तहफ़्फ़ुज़-ए-आज़ादी के मतवालों के नाम
मेरे सामने भारत में पिछले तीन वर्षो में अर्थात 2006 से 2008 तक हुए आतंकवादी हमलों का विवरण है और पिछले चार वर्षो में अर्थात 2006 से 2009 तक पाकिस्तान में जितने बम धमाके और मौते हुयीं, उनके विवरण हैं। साथ ही मैं अध्यन कर रहा हूँ कि इस बीच डेविड कोलमैन हेडली और तहव्वुर हुसैन राना ने कितनी बार और किन-किन तिथियों में भारत और पाकिस्तान का दौरा किया। साथ ही मेरी निगाह इस बीच अमेरिकी शासकों व अमेरिकी खुफ़िया एजेंसियों के अधिकारियों के भारत-पाक दौरे पर भी है। इस समय रिसर्च का विषय कुल मिलाकर 9/11 और उसके बाद इस्लामी देशों व भारत की बदलती हुई परिस्थिति है। डेविड कोलमैन हेडली और तहव्वुर हुसैन राना के साथ-साथ एक और नाम ‘‘केनेथ हेवुड’’ का भी मेरे दिमाग़ में है, जिसकी फाइल इस समय मेरे सामने है। पाठकों को याद होगा कि अहमदाबाद बम धमाकों के बाद आतंकवादियों की ओर से भेजा गया ई-मेल केनेथ हेवुड के वाई.फाई सिस्टम से था और यह अमेरिकी नागरिक भी लुक आउट नोटिस जारी होने के बावजूद भारत से फ़रार होने में सफल हो गया था, जबकि इन बम धमाकों का मास्टर माइंड बता कर मुफ्ती अबुलबशर को गिरफ्तार कर लिया गया। मुफ्ती अबुलबशर की गिरफ्तारी के बाद 10 सितम्बर 2008 को मैंने भारत के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मिल कर देश के ताज़ा तारीन हालात उनके सामने रखे। मुसलमानों के सामने आने वाली समस्याओं का उल्लेख किया और मुफ्ती अबुलबशर के भाई अबुज़फ़र का लिखा हुआ पत्र भी प्रधानमंत्री की सेवा में पेश किया। यह तमाम विवरण उस पत्र सहित 13 सितम्बर 2008 को अपने सिलसिलेवार लेख ‘‘मुसलमानाने हिन्द..... माज़ी, हाल और मुस्तिक़बिल???’’ की 22वीं क़िस्त में प्रकाशित किए। दुर्भाग्य से उसी दिन शाम को जिस दिन यह लेख प्रकाशित हुआ दिल्ली बम धमाकों से दहल उठी और उसके एक सप्ताह के अंदर ही 19 सितम्बर 2009 को आतिफ और साजिद का संदिग्ध एन्काउंटर हुआ। आज मैं इन तमाम मामलों को फिर से उठाए जाने की आवश्यकता महसूस करता हूँ। उन दिनों में मेरे लिखे गए मेरे लेख इस समय मेरे सामने हैं और जो कुछ नए रहस्योद्घाटन अब सामने आ रहे हैं, वह भी सबके सामने हैं। अगर वास्तविकता यह सामने आती है कि भारत में होने वाले बम धमाकों के अपराधियों के रूप में जिन व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया, उनके अलावा भी कुछ और लोग जो वास्तव में मास्टर माइंड हैं इस अपराध में शामिल हैं और यह भी संभव है कि वास्तविक अपराधी डेविड कोलमैन हेडली जैसे लोग ही निकलें। दरअसल हर बम धमाके के बाद मुसलमानों को आरोपित कर दिया जाना एक आम परम्परा बन गई थी और एक विशेष मानसिकता के लोग यह कहते नज़र आते थे कि सब मुसलमान आतंकवादी न सही, परन्तु सब आतंकवादी मुसलमान हैं, फिर इसके बाद मालेगांव जांच के बीच शहीद हेमन्त करकरे ने आतंकवाद का एक और चेहरा सामने रखा, अब बारी मुसलमानों की थी, वह कहने लगे कि देखो अब सामने आने लगे हैं बम धमाकों के वास्तविक अपराधी। इसके बाद 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर हुआ आतंकवादी हमला। स्पष्ट शब्दों में कोई कहे या न कहे, मगर ऐसे लोग भी मौजूद थे जो दबी ज़बान में हेमन्त करकरे की मौत के कारण जानना चाहते थे। अगर कुछ देर के लिए ही सही यह कल्पना हमारा ध्यान आकर्षित कर ले कि भारत में हर धमाके के बाद मुसलमानों से और मालेगांव व शहीद हेमंत करकरे की मौत को हिन्दुओं से जोड़ कर देखे जाने के पीछे यह सोच तो नहीं है कि भारत गृह युद्ध का शिकार हो जाए। कभी हिन्दु मुसलमनों को आरोपित करें, कभी मुसलमान हिन्दुओं पर दोषारोपण करें। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाते रहें। यही लोग पकड़े जाते रहे और सज़ा पाते रहें, कहीं और ज़हन जाए ही नहीं। जबकि यह षड़यंत्र बहुत गहरा हो और उनकी ओर किसी का ध्यान जाने ही न दिया जाए, जो परदे के पीछे से भारत को तबाह व बरबाद करने का षड़यंत्र रच रहे हों। अतः जब मैंने पूर्व और वर्तमान की घटनाओं की कड़ियां जोड़नी आरंभ की और अपने ही लिखे हुए पुराने लेखों को सामने रखा तो पाया कि यह पहला अवसर नहीं है जब मैंने भारत सरकार और देश की जनता का ध्यान इस ओर आकर्षित करने का प्रयास किया हो। इससे पूर्व हैदराबाद के बम धमाकों के बाद मैंने 22 अगस्त 2008 को ‘‘हेवुड फ़रार, मुफ्ती अबुलबशर गिरफ्तार, वाह रे हमारी सरकार’’ के शीर्षक से जो कुछ लिखा, वह आज एक बार फिर पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह इसलिए भी कि काश उन्होंने इस लेख की गंभीरता को समझते हुए उसीे समय इस आवाज़ में आवाज़ मिला दी होती तो जो तथ्य अब सामने आ रहे हैं, सम्भवतः उसी समय सामने आजाते और अगर कुछ बेगुनाहों की गिरफ्तारियां जो इन बम धमाकों के सिलसिले में हुई हैं तो वह इस मानसिक और शारीरिक कष्ट से बच जाते। क़ौम के दामन पर बदनामी का दाग़ भी न लगता।
((आज से लगभग एक वर्ष पूर्व 25 अगस्त 2007 को हैदराबाद के लुम्बनी पार्क और गोकुल चाट भंडार पर बम धमाका हुआ, जिसमें 42 लोग मारे गये और 60 से अधिक घायल हुए। हमने रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा के 28 अगस्त 2007 के प्रकाशनों में इस शीर्षक के साथ ख़बर प्रकाशित की कि ‘‘शक की सुई आई.एस.आई और हूजी पर ही क्यों? सी.आई.ए. पर क्यों नहीं?’’। इसका एक मुख्य कारण यह भी था कि हैदराबाद शहर में इन धमाकों से पूर्व अमेरिका से संबंध रखने वाले कुछ लोग उपस्थित थे, जिनमें से मुख्य रूप से एक अमेरिकी महिला थी, जिसके कुछ दिन बाद यह बम धमाके हुए। पुलिस और प्रशासन से हमारा प्रश्न था कि यदि अमेरिका की बजाय पाकिस्तान, बंग्लादेश या अफ़ग़ानिस्तान के लोग बम धमाकों से एक सप्ताह पूर्व हैदराबाद शहर में आए होते तब भी क्या राज्य सरकार उनकी उपस्थिति को इसी तरह अनदेखा करती? संभवतः नहीं। तो फिर क्या कारण था कि अमेरिकी दूतावास से संबंध रखने वाले इन व्यक्तियों पर विशेषतः उस विदेशी महिला पर नज़र नहीं रखी गई?
ऐसा ही अहमदाबाद में हुए सीरियल बम धमाकों के बाद देखने में आया कि वह अमेरिकी व्यक्ति जो नवी मुम्बई में ठहरा हुआ था और जिसके कम्प्यूटर से वह ई-मेल भेजा गया। किस तरह भारत से भागने में सफल हुआ। हम चाहते हैं पाठक एक बार फिर इस समाचार का ध्यानपूर्वक अध्यन करें और उसके बाद मुफ़्ती अबुलबशर की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर निगाह डालें ताकि अनुमान कर सकें कि किस तरह एक शातिर दिमाग़ अमेरिकी को हमारी पुलिस ने आराम से इस देश को छोड़ने का मार्ग प्रशस्त किया, और किस तरह एक धार्मिक परिवार से संबंध रखने वाले अबुलबशर की गिरफ्तारी और दोष स्वीकारोक्ति का कारनामा अंजाम दिया।
अहमदाबाद बम धमाकों के मामले में संदिग्ध अमेरिकी नागरिक ‘‘हेवुड’’ के विरूद्ध तलाशी नोटिस जारी होने के बाद देश से उसके फ़रार होने की घटना की केन्द्र जांच कर रहा है, हालांकि यह बात अचंभित करने वाली है कि हेवुड लुक आउट नोटिस के बावजूद भारत छोड़ कर जाने में कैसे सफल हो गया। अमेरिकी अधिकारियों ने इस मामले में शामिल होने से इंकार किया है। प्रश्न यह भी पैदा होता है कि मुम्बई पुलिस ने लुक आउट नोटिस जारी होने के बावजूद उसका पासपोर्ट ज़ब्त क्यों नहीं किया? इमिग्रेशन विभाग से हुई इस ‘‘मानवीय भूल’’ के बाद अब गृह मंत्रालय की ख़ामोशी से यह प्रश्न और गहरा हो गया है, हालांकि आज (12.9.2008) गृह मंत्रालय ने एक बयान जारी करके लीपापोती करने का प्रयास किया है। गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि इस मामले की जांच की जा रही है।
स्पष्ट रहे कि हेवुड का वाई.फाई सिस्टम चंद मिनिट पहले धमकी भरा ई-मेल भेजने के लिए प्रयोग किया गया था। राष्ट्र व्यापी स्तर पर तलाशी नोटिस जारी किए जाने के बावजूद हेवुड दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से फ़रार होने में सफल हो गया।
महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधी दस्ते ने पिछले तीन दिन में कई बार उसे बुलाया लेकिन वह पेश नहीं हुआ। इसे साधारण बात क्यों समझा गया? आतंकवाद निरोधी दस्ता उसका नारको टेस्ट करना चाहता था तो किया क्यों नहीं जा सका? ऐसी क्या विवशता सामने थी? एक टी.वी चैनल के अनुसार मंगलवार को अमेरिकी दूतावास ने स्पष्ट रूप से कहा कि हेवुड के भारत से जाने में हमारी कोई भूमिका नहीं थी, दूतावास ने यह भी कहा कि हेवुड अमेरिका का प्राइवेट नागरिक है। यह भी बताया जाता है कि हेवुड अमेरिकी जासूस है। क्या मान लिया जाए कि हेवुड को भारत से बाहर जाने में अमेरिका से सहायता नहीं मिली होगी। क्या दिल्ली में स्थित अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों ने भारत की खुफ़िया एजेंसियों के अधिकारियों पर दबाव डाला और इसी वजह से वह भारत से निकल गया, पहले वह अमेरिकी दूतावास गया जिसके बाद वहां के अधिकारियों ने खुफ़िया अधिकारियों के साथ बंद कमरे में मीटिंग की। सूचना यह भी है कि हेवुड का लाई डिटेक्टर और ब्रेन मैपिंग टेस्ट किया जा चुका था?
दिल्ली हवाई अड्डे पर इमिग्रेशन की प्रारम्भिक जांच में पता चला कि उसके पास यात्रा के लिए ज़रूरी काग़ज़ात थे, इसलिए उसे वहां से निकलने में कोई कठिनाई नहीं हुई। रविवार रात 11 बजे जेट एयर वेज़ की फ़्लाइट न. 9ॅ.230 में सवार हुआ। जेट एयर वेज़ की दिल्ली-ब्रूसेल्स-न्युयार्क फ्लाइट के लिए उसके पास कन्फर्म टिकट था। इससे पता चलता है कि भारत से निकलने की योजना पहले ही बन चुकी थी। प्रश्न यह पैदा होता है कि इस गंभीर चूक के लिए कौन उत्तरदायी है?मुम्बई पुलिस इसका आरोप दिल्ली पुलिस पर मढ़ रही है। प्रश्न यह पैदा होता है कि हेवुड की गतिविधियों की निगरानी क्यों नही की गई? ए.टी.एस को हेवुड के निकल जाने की सूचना किससे और कब मिली? जांच जारी रहने के बावजूद उसका पासपोर्ट ज़ब्त क्यों नहीं किया गया? दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आख़िर क्या हुआ? देश के तमाम हवाई अड्डो को हेवुड के विरूद्ध जारी लुक आउट नोटिस की जानकारी क्यों नही दी गई? अमरीका ने अपने देश के नागरिक क़ानून का हवाला देते हुए हेवुड के विषय में कोई भी सूचना देने से इंकार कर दिया, जिससे यह मामला काफी सनसनीपूर्ण हो गया। क्या किसी मुस्लिम देश के नागरिक के इस तरह भाग जाने को इतने ही साधारण रूप में लिया जाता?हम अबुलबशर के बचाव में कुछ भी कहना नहीं चाहते लेकिन अगर शाही इमाम जामा मस्जिद सय्यद अहमद बुख़ारी, सांसद अबूआसिम आज़मी ने आज़मगढ़ पहुंच कर अबुलबशर और उसके परिवार के निर्दोष होने का उल्लेख किया तो उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। इससे एक दिन पूर्व मौलाना उबैदुल्लाह ख़ां आज़मी ने भी अपने बयान में अबुलबशर के बम धमाकों में शामिल होने को अविश्वसनीय बताया था। कहीं इसका कारण यह तो नहीं कि पुलिस और प्रशासन एक सोचे समझे षड़यंत्र के अंतर्गत मुसलमानों को ही दोषी ठहराता है, जिससे वास्तविक अपराधियों को न केवल बच निकलने का अवसर मिलता है बल्कि उनका उत्साहवर्धन भी होता है। परिणाम स्वरूप ऐसी अप्रिय घटनाऐं एक के बाद एक अनेक शहरों में सामने आती ही रहती हैं। जहां तक अमेरिकी नागरिक के फ़रार होने में सुविधा पहुंचाने का संबंध है तो लेखक इसका पूरी तरह अनुमान लगा सकता है। क्योंकि जब हमने हैदराबाद बम धमाकों के बाद सी.आई.ए की तरफ उंगली उठाई थी तो भारत की राजधानी नई दिल्ली में स्थित अमेरिकी दूतावास हरकत में आ गया था और उसने गहरी नाराज़गी प्रकट की थी।एक और अवसर पर अमेरिकी दूतावास की प्रतिक्रिया के बारे में विस्तार से लिख चुका हूँ। आज फिर से इस विषय में कुछ भी लिखने की बजाय मैं यह प्रश्न पुलिस प्रशासन और पाठकों पर छोड़ता हूँ कि जब इन बम धमाकों में संलिप्त होने का संदेह पहले उस अमेरिकी हेवुड पर गया तो फिर किस तरह लुक आउट नोटिस जारी होने के बावजूद हमारी पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने, उस पर नज़र रखने की बजाय उसे भारत से भागने का अवसर दिया और आज़मगढ़ के अबुलबशर को अहमदाबाद के सीरियल बम धमाकों के सिलसिले में गिरफ्तार कर लिया और उनसे उनकी अपराध कु़बूल भी करा लिया। यह पहला अवसर नहीं है जब पठन पाठन से जुड़े किसी धार्मिक व्यक्ति या पेशइमाम को पुलिसिया आतंक का सामना करना पड़ा हो। बहुधा मुसलमान ऐसे पुलिस अत्याचारों का शिकार होते रहे हैं जबकि इस वास्तविकता से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारत के स्वाधीनता संघर्ष में हमारे उलमा-ए-कराम की यादगार भूमिका रही है, जोकि इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।))
Friday, January 1, 2010
WHO IS THE REAL TERRORIST


Wednesday, December 30, 2009
............अलविदा-2009............
साल 2009 समाप्ति पर है, अगर हम एक उचटती हुई नज़र अपने देश और क़ौम के हालात पर डालें तो अंदाज़ा होगा कि जहां देश आतंकवाद की समस्या को लेकर परेशान रहा और हमारी केंद्रीय सरकार हर क्षण आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष करती नज़र आई, वहीं हमारी क़ौम के लिए भी कोई राहत का मुक़ाम नहीं था। अल्लाह का बड़ा करम और एहसान है कि पिछले वर्षों की तरह इस वर्ष हमारे युवकों को आतंकवादी कार्रवाइयों में इस तरह तो लिप्त नहीं दिखाया गया, जैसा कि एक धारणा बन गई थी। निःसंदेह यह सिलसिला अभी भी बंद तो नहीं हुआ है, मगर जिस तरह पिछले 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले ने हमारे दिलों को दहला कर रख दिया था और हम भयभीत थे। हर क्षण यह लगता था कि जिस तरह 11 जुलाई 2006 को मुम्बई लोकल ट्रेन में होने वाले बम धमाकों, 8 सितम्बर 2006 को मालेगांव बम धमाकों, 18 मई 2007 को हैदराबाद में मक्का मस्जिद बम ब्लास्ट और दिल्ली में 13 सितम्बर 2008 को हुए बम धमाकों के बाद बड़े पैमाने पर मुस्लिम युवकों की गिरफ़तारियां हुईं, उन्हें संदिग्ध एन्काउन्टर में मार दिया गया। 26 नवम्बर 2008 के इस आतंकवादी हमले के बाद तो ख़ुदा जाने और कितनी भयावह तस्वीर हमारे सामने होगी। लेकिन अल्लाह ने हमें इस शाप से बचा लिया, हम एक बार फिर उसका शुक्र अदा करते हैं। मुम्बई के इन आतंकवादी हमलों की जांच का काम तो जारी रहा, अलग-अलग दिशा में यह जांच जारी रही, मगर ऐसा कभी नहीं लगा कि भारतीय मुसलमानों को उसी तरह निशाना बनाया जा रहा है, जैसा कि इससे पहले नज़र आता था। निश्चय ही इसके लिए शहीद हेमंत करकरे बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने मालेगांव जांच द्वारा आतंकवाद का एक दूसरा चेहरा भी देश के सामने रखा। ‘‘रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा’’ ने भी हर क़दम पर यह कोशिश की कि सच्चाई को सामने रखने का अभियान जारी रहे।
साम्प्रदायिक शक्तियों द्वारा ‘वंदे मात्रम’ का प्रश्न एक बार फिर से उठाकर हमारे देश प्रेम पर प्रश्न चिन्ह लगाए गए। दारुलउलूम देवबंद को निशाना बनाया गया। यहां तक कि उस पवित्र शिक्षण संस्थान के पुतले भी जलाए गए। यह अत्यंत अफ़सोस का मुक़ाम है कि एक धर्मनिरपेक्ष देश में एक धर्मनिरपेक्ष सरकार से हम यह उम्मीद नहीं करते। इस मुद्दे पर भरपूर चर्चा जारी थी, इससे यह स्पष्ट होने लगा था कि ‘वंदे मात्रम’ के रचयिता की मन्शा क्या थी और उनका नॉविल ‘आनन्द मठ’ जिसका प्रमुख अंश यह गीत था, आख़िर उसे लिखे जाने का बुनियादी कारण क्या था। नॉविल के मुख्य अंशों का अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि यह नाॅवेल अंग्रेज़ों के समर्थन में लिखा गया था और जहां स्पष्ट रूप से इस रचना को मुस्लिम विरोधी मानसिकता के मुखपत्र के रूप में देखा जा सकता है, वहीं यह नॉविल हिंदू समुदाय के पक्ष में भी नहीं था। इसलिए कि नाॅवेल का लेखक अंगे्रज़ों के सत्ता में आने से ख़ुश और संतुष्ट नज़र आता है। ‘‘रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा’’ द्वारा सामने लाए गए ख़ुलासे अगर अंतिम चरण तक पहुंच जाते तो अति संभव है कि सारे भारत की जनता जान जाती कि आख़िर विवाद की बुनियाद क्या है और क्यों साम्प्रदायिक मानसिकता के लोग बार-बार इस प्रश्न को उठाते हैं?
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के माइनोरिटी कैरेक्टर का मुद्दा वर्तमान वर्ष में भी अधर में पड़ा रहा। भारत सरकार कोई ठोस क़दम इस दिशा में नहीं उठा सकी। हालांकि यह उम्मीद थी कि इस बार चूंकि इस सरकार के वजूद में आने के पीछे अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों की प्रमुख भूमिका रही है, इसलिए यह सरकार नरमी के साथ उन मामलों पर विचार करेगी, जिन्हें अभी तक ठंडे बस्ते में रखा गया है। हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले साल 2010 में इस समस्या को हल किया जाएगा और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के माइनोरिटी कैरेक्टर को स्वीकार किया जाएगा लेकिन हम केवल उम्मीदों के सहारे बैठे नहीं रह सकते, इसके लिए हमें आवाज़ उठानी होगी मस्जिदों के मीनारों से भी, शिक्षण संस्थानों से भी, मीडिया के माध्यम से भी और हमारे धर्मनिरपेक्ष प्रतिनिधि जो संसद तथा विधानसभाओं में बैठे हैं, उनके द्वारा भी।
वर्तमान वर्ष चूंकि संसदीय चुनावों का वर्ष था और देखना यह था कि केंद्र में कोई धर्मनिरपेक्ष सरकार अस्तित्व में आती है, साम्प्रदायिक शक्तियों को सत्ता में आने का अवसर मिलता है या फिर टुकड़ों में बंटे तीसरे मोर्चे के लोगों को यह अवसर मिलता है। कांगे्रेस के नेतृत्व में देश को एक बार फिर धर्मनिरपेक्ष सरकार मिली और 6 दिसम्बर 1992 के बाद यह पहला अवसर है, जब मुसलमानों ने कांगे्रेस का खुले मन से समर्थन किया और साथ ही एक उल्लेखनीय बात यह भी रही कि अब तक मुसलमानों की हमदर्द और प्रतिनिधि समझी जाने वाली समाजवादी पार्टी ने कल्याण सिंह के मामले को लेकर मुसलमानों के मन में संदेह पैदा किए। मुसलमान उनसे नाराज़ हुए और यह नाराज़गी इतनी बढ़ी कि उन्हें मुसलमानों के समर्थन से हाथ धोना पड़ा। परिणामस्वरूप मुलायम सिंह यादव अपने उस फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए विवश हुए। हम इसे मुस्लिम एकता की एक शानदार कामयाबी समझते हैं। यह पहला अवसर था जब राजनीतिक दलों को मुसलमानों ने यह सोचने पर विवश किया कि हमें केवल वोटर न समझा जाए, हमारी भावनाओं का भी सम्मान किया जाए। अगर राजनीतिज्ञों के मन में यह बात घर कर गई है कि हम उनका हर फैसला सर झुका कर स्वीकार कर लेंगे तो यह बात मन से निकाल दें। अब कोई भी धोखा, कोइ भी लालच हमें अपने सिद्धांतों से समझौता करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट का एक लम्बे समय से इंतिज़ार था। कारण यह नहीं था कि उसके द्वारा कुछ ऐसे राज़ सामने आएंगे, जिनसे पर्दा उठने का बेचैनी से इंतिज़ार है, कुछ ऐसे रहस्योदघाटन होंगे जो कल्पना से बहुत दूर है, फिर भी इंतिज़ार इसलिए था कि सरकारें अभी तक बाबरी मस्जिद के अपराधियों को इस कारण से सज़ा नहीं दे पा रही थीं कि उनके पास दस्तावेज़ी सबूतों की कमी थी, लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट उस कमी को पूरा कर देगी और अब अविलंब अल्लाह के घर को ध्वस्त करने वालों को उनके अंजाम तक पहुंचाया जाएगा। लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद भी, संसद में इस पर चर्चा किए जाने के बावजूद भी हमें यह उम्मीद नज़र नहीं आती कि ऐसा संभव हो पाएगा। शायद इस देश की राजनीतिक व्यवस्था की सबसे बड़ी कमी है कि जहां अपराधी को सज़ा देने की कार्रवाई भी उनके लिए एक पुरस्कार सिद्ध हो सकती है, उन्हें और अधिक लोकप्रियता प्राप्त हो सकती है, एक विशेष दल उनके समर्थन में ज़मीन व आसमान एक कर सकता है, उनकी राजनीतिक स्थिति और सुदृढ़ हो सकती है, इसलिए दोष सिद्ध हो जाने पर भी इस मामले को ठंडे बस्ते में ही पड़ा रहने दिया जाए, इस पर अधिक बातचीत ही न की जाए। गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार और नरेंद्र मोदी का सत्ता में बने रहना शायद इन व्यवस्थागत राजनीतिक त्रुटियों का सबसे बड़ा उदाहरण है। हम न्यायालय का ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे कि अगर यह सिलसिला इसी तरह क़ायम रहा तो फिर किस तरह घर्मस्थल सुरक्षित रहेंगे और कैसे मानवता का नरसंहार रुकेगा? अगर हमारी सरकारें अपनी राजनीतिक मजबूरियों को भली-भांति जानती हैं तो फिर ऐसे आयोगों के गठन का क्या अर्थ? क्यों अपार धन राशि ख़र्च की जाती है? क्यों बरसों तक कार्रवाई जारी रखी जाती है? क्यों मासूम जनता की भावनाओं से खेला जाता है? अब भारत सरकार को यह तय करना होगा कि वह अब इस तरह के आयोग गठन करने का सिलसिला बंद करे या फिर उसके अंदर इतना साहस हो कि अपराधी चाहे जितना बड़ा और सशक्त हो उसे सज़ा भी दी जाए। हमारे लिए यह मुद्दा ध्यान देने योग्य कुछ इसलिए भी है कि अब तक जितने भी आयोग गठित हुए हैं, उनमें से अधिकांश बल्कि लगभग सभी आयोग अल्पसंख्यकों की बर्बादी, हत्या व लूटपाट और उनके धर्मस्थलों को ध्वस्त किए जाने से संबंधित हैं, तो क्या मान लिया जाए ज़ालिम अगर ज़ुल्म करता है तो इंसाफ़ दिलाने का वादा करने वाला भी उनका समर्थक ही साबित होता है।
मुस्लिम समुदाए की समस्याएं इतनी कम नहीं है कि उन्हें एक अभिभाषण में बयान किया जा सके या एक लेख में पूरा किया जा सके, इसके लिए समय का भी ध्यान रखना होता है और हमसे यह भी नहीं हो सकता कि हमारी बातचीत केवल हम तक सीमित रहे, इसलिए जितना हमारे लिए हमारी क़ौम महत्वपूर्ण है उससे अधिक हमारे लिए हमारा देश महत्वपूर्ण है। बातचीत को ख़तम करने से पहले आज हम भारत को दरपेश समस्याओं पर भी ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे। हमने बात आतंकवाद और आतंकवादी हमलों से शुरू की थी और इसकी समाप्ति भी हम इसी विषय के साथ करेंगे, मगर हम मुस्लिम समुदाय से अधिक अपने प्रिय देश भारत की सुरक्षा के लिए चिंतिंत हैं। इसलिए बात इसी रौशनी में करेंगे। अभी तक आतंकवाद की जो तस्वीर सारे भारत के सामने पेश की जा रही थी, वह यह थी कि कुछ भ्रमित युवक हैं, कुछ मुसलमानों या इस्लाम के नाम पर बनाए गए आतंकवादी संगठन हैं, जो पूरे भारत में आतंकवाद फैला रहे हैं और पाकिस्तान जो आतंकवादियों की सबसे बड़ी शरणस्थली है, वह अब ख़ुद अपनी ही आग में जल रहा है, लेकिन ताज़ा ख़ुलासे अब जो वास्तविकता बयान कर रहे हैं, वह बहुत भिन्न है कि इस विचार से भी भिन्न जिसका अभी हमने उल्लेख किया, यानी के यह भ्रमित मुस्लिम युवकों की प्रतिक्रिया है, मुस्लिम आतंकवादी संगठनों का शर्मनाक कारनामा है और अब यह कह सकते हैं कि हेमंत करकरे ने जो रहस्योदघाटन किए, आज की सच्चाई उससे भी आगे की कहानी बयान करती है। इसलिए अब हम सबको धर्म और समुदाय के भेदभाव के बिना, हम मुसलमान हों, हिंदू, सिख या ईसाई सबको एकजुट होकर अपने देश की सुरक्षा के लिए तैयार होना होगा। इसलिए कि आतंकवाद की इन कार्रवाइयों के पीछे जो असल शक्तियां नज़र आती हैं, वह कहीं अधिक ख़तरनाक हैं और उनके मंसूबे कहीं अधिक भयानक हो सकते हैं। हमें उन तक पहुंचने के लिए चाहिए मज़बूत इच्छा शक्ति और ऐसी ईमानदाराना कोशिश, जो दूध का दूध और पानी का पानी अलग करने का साहस रखती हो। इसलिए कि हमारा प्यारा देश पहले भी फिरंगियों का गुलाम हो चुका है और अब हमारी कोई भी चूक फिर हमारे देश के लिए एक बड़ा ख़तरा साबित हो सकती है, हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि हमारे देश को किसी भी आंतरिक या बाहरी ख़तरे से सुरक्षित रखे। हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि तमाम मानवता को हर बला व मुसीबत से सुरक्षित रखे और आने वाला साल हमारे लिए सुखद संदेश लेकर आए। हमारा देश अधिक शक्तिशाली हो, हम संगठित हों, हमारे बीच के मतभेद समाप्त हों और नए साल का सूरज हमारे जीवन में हम सब के लिए ऐसी रौशनी लेकर आए कि हमारी आने वाली पीढ़ियां भी आज के अंधेरे का एहसास न कर सकें।
जैसा कि मैंने अपने पाठकों की सेवा में निवेदन किया था, मेरा आज का लेख विशेष रूप से हमारे आदर्णीय इमामों के लिए होगा, ताकि नए साल में जुमा की नमाज़ के दौरान जब वह नमाज़ियों से ख़िताब कर रहे हों तो हम उन्हें कुछ ऐसा मवाद उपलब्ध कर सकें जिसका संबंध हमारी क़ौम से भी है और हमारे देश से भी। हमारी यह छोटी सी कोशिश आज इसीलिए है। हम जानते हैं कि हमारे आदर्णीय इमाम ज्ञान का ख़ज़ाना हैं, उनके पास जितनी दीनी और दुनियावी जानकारियां हैं, हम उनमें थोड़ी भी वृद्धि के लायक़ नहीं हैं, फिर भी हमें यह लगा कि अगर हम अपने दिल की आवाज़ उन तक पहुंचा सकेंगे तो यह हमारे दिल के सुकून के लिए होगा और हमें महसूस होगा कि मानो इस अवसर पर हमने भी अपना फ़र्ज़ अदा करने की एक कोशिश की।
नोटः- वादे के मुताबिक़ हमारा कल का लेख एक ऐसा ख़ुलासा करेगा जो न केवल आतंकवाद के चेहरे पर पड़ी नक़ाब उलट देगा बल्कि यह भी कि यह ख़ूनी खेल कब से और किस तरह चल रहा है, लेकिन हम में से किसी का ध्यान इस ओर अभी तक गया ही नहीं। ............
और अब सिलसिला साज़िश से परदा उठाने का
26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले इस समय हमारे लिए जांच का विषय हैं और जितनी गहराई से हम इस पर रिसर्च करते जाते हैं, आश्चर्यजनक रहस्योद्घाटन सामने आते जाते हैं। 1 जनवरी 2010 शुक्रवार को प्रकाशित होने वाला मेरा लेख उन आतंकवादी गतिविधियों की एक ऐसी सच्चाई आपके सामने रखेगा जो सारे देश को चैंका देगी, यह तथ्य भारत सरकार को नए सिरे से इस दिशा में सोचने के लिए विवश कर देगा, जिस पर अभी तक ध्यान ही नहीं दिया गया है और हिंदू भाइयों के मन मस्तिष्क में अभी तक इन आतंकवादी घटनाओं से संबंधित जो चित्र बसाई गई है, वह उस पर एक बार फिर विचार करने के लिए मजबूर होंगे और अतिसंभव है कि फिर इस षड़यंत्र से पर्दा कुछ इस तरह उठे कि हमारे इस लेख में उन्हें असल अपराधियों का चेहरा साफ़-साफ़ नज़र आने लगे।
डेविड कोलमैन हेडली उर्फ़ दाऊद गीलानी मुसलमान है, यहूदी है या ईसाई है, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। वह पाकिस्तानी है या अमरिकी, इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता उसका संबंध लशकर-ए-तय्यबा से है, अलक़ाएदा से या सी।आई.ए से, इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता। चैंकिए मत, मानता हूं कि सी.आई.ए के साथ संबंध सिद्ध हो जाने से काफी अंतर पड़ता है, मगर अभी ज़रा रुकिए। हमारे सामने पहली बात यह होनी चाहिए कि वह, 26 नवम्बर 2008 को भारत पर हुए आतंकवादी हमले में लिप्त था, इसलिए साफ़ सामने दिखाई देने वाला वह आतंकवादी चेहरा है, जो मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमलों के लिए ज़िम्मेदार है। अब उसके बाद प्रश्न यह पैदा होगा कि क्या वह केवल अपनी इच्छा से, अपने निर्णय पर अपनी आतंकवादी मानसिकता के कारण इस हमले में लिप्त था या वह केवल एक मोहरा था, एक हथियार था? तो जब तक हम इन पर्दे के पीछे रहने वाले अपराधियों तक नहीं पहुंचेंगे, जो आतंकवादी हमलों के प्रेरक हैं, उस समय तक आतंकवाद पर नियंत्रण नहीं पा सकेंगे। मुहरे पिटते रहेंगे, मुहरे मिटते रहेंगे। प्रेरक नए मुहरे ईजाद करते रहेंगे, उनके नाम, उनका धर्म, उनकी राष्ट्रीयता हमारे लिए हर बार एक नया धोखा होगी, ताकि हम उनके बुने इस जाल में उलझ कर रह जाएं और जो असल अपराधी हैं उनके चेहरे पर नक़ाब यूं ही पड़ी रहे। इसलिए नक़ाब-कुशाई की खोज में जब हम हेडली (तहव्वुर हुसैन राना की चर्चा बाद में करेंगे) की कुण्डी तलाश करने बैठे और यह समझने की कोशिश की कि आख़िर वह इतनी सहजता से बार-बार हमारे देश में प्रवेश करने और आतंकवादी हमलों को अंजाम देने में कैसे सफल हो गया तो सच्चाई सामने आई। आइये नज़र डालते हैं हम अपनी कमियों और दूसरों की चालाकियों पर, जिनका ख़ुलासा अत्यंत सुन्दरता के साथ किया है श्री बी॰ रमन ने, जो केन्द्रीय सरकार के केबिनेट सचिवालय में अतिरिक्त सचिव रह चुके हैं और वर्तमान में इंस्टीट्यूट फार ट्रोपिकल स्टडीज़ चिन्नई में निदेशक के पद पर नियुक्त हैं। क्योंकि वह स्वयं एक ब्यूरोक्रेट/डिप्लोमेट हैं, इसलिए उन कमियों को भलीभांति उजागर कर सकते हैं जो पासपोर्ट और वीज़ा से संबंधित आम आदमी की पकड़ में नहीं आती। हम यह उल्लेख इत्यादि इसलिए भी इकट्ठा कर रहे हैं और प्रकाशित कर रहे हैं कि जिनके मन हमारी ओर से साफ़ नहीं हैं, वह स्पष्ट रूप में समझ लें कि देश से प्रेम रखने वालों की सोच एक जैसी ही होती है, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। मुलाहिज़ा करें वह तकनीकी त्रूटियां जिन्हें हम अपने कोन्सिलेट की चूक भी कह सकते हैं और हेडली के अभिभावकों की जालसाज़ी भी।
जब एक व्यक्ति अपना नाम बदलता है और पासपोर्ट के लिए आवेदन करता है तो उसके साथ यह पुष्टि पत्र आवश्यक होता है कि उस व्यक्ति ने इससे पूर्व अमुक नाम से और अमुक पासपोर्ट नं॰ से यात्रा की है। अगर शिकागो में भारतीय उच्च आयुक्त ने ध्यान के साथ उसके पासपोर्ट और वीज़ा आवेदन को देखा होता, जैसा कि नियमानुसार होता है, तो उन लोगों ने निम्नलिखित बातों का अवश्य नोटिस लिया होताः न।1- उसने भारतीय वीज़ा लेने से ठीक पहले अपने आवास को फ़्लेडेल्फ़िया से शिकागो स्थानान्तरित किया। दूसरे- उसने भारतीय वीज़ा लेने से ठीक पहले अपना नाम बदल कर नया पासपोर्ट प्राप्त कर लिया। तीसरे- उसके पिता मुसलमान थे और उनका नाम भी मुसलमानों की तरह ही था जबकि वीज़ा का आवेदन करने वाले का नाम ईसाईयों जैसा था।
उसके तुरंत बाद ही आवेदनकर्ता के साथ पर्सनल इंटरव्यू होता है, जिसमें उससे उन बिंदुओं पर प्रश्न किए जाते है। हम जानते हैं कि दूसरे देशों के वीज़ा के लिए भारत में उनके दूतावास में आवेदन देने पर कितने लोगों को पर्सनल इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है और अगर पासपोर्ट की जांच पड़ताल में कहीं कोई संदेह की बात नज़र आ जाए तो गहन जांच की जाती है।
पूरी दुनिया के उच्च आयुक्त और इमेग्रेशन अधिकारी उस व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखते हैं, जो नया पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए अपना नाम तब्दील करता है। कट्टर देश जो आतंकवाद के संदिग्ध व्यक्तियों के साथ कठोरता से पेश आते हैं, उनके यहां वीज़ा के लिए आवेदन करते समय दो विशेष कॉलम ज़रूर भरने होते हैं। प्रश्न नं॰ 1- क्या आपने कभी दूसरे पासपोर्ट से यात्रा की है? अगर हां तो, विवरण दें। प्रश्न नं॰2- क्या आपने कभी अन्य नाम से यात्रा की है? यदि हां तो, विवरण दें। जैसे इन प्रश्नों के उत्तर में कोई संदेह पैदा होता है तो उसको साक्षातकार का सामना करना ही होता है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हेडली पाकिस्तानी नागरिक है या अमेरिकी नागरिक जो पाकिस्तान में पैदा हुआ या एक अमेरिकी नागरिक जो अमेरिका में पैदा हुआ। इस षड़यंत्र के आरंभिक चरणों से ही यह अपराधिक सबूत है कि उसने अपनी मुस्लिम पहचान को छुपाने के लिए नाम तब्दील किया और इस बात को उसकी यात्रा के आरंभ में शिकागो में ही पता चलाया जा सकता था न कि भारत में उसके आगमन के बाद।
इसके बावजूद भी अगर वह अमेरिकी नागरिक है, जो अमेरिका में पैदा हुआ तो भी उससे पूछताछ करने से हमें रोका नहीं जाना चाहिए। हम जानते हैं कि किस तरह अमेरिकी इमेग्रेशन अधिकारियों ने फ़िल्म अभिनेता शाहरुख़ ख़ान से लगभग 1 घंटे तक पूछताछ की। जबकि वास्तिविकता यह थी कि वह भारत के सम्मानित नागरिक हैं और अमेरिका के भारत के साथ अच्छे संबंध हैं इसके बावजूद उनसे प्रश्न करने से उनको रोका नहीं गया।
टूरिस्ट या बिज़नेस वीज़ा के लिए आवेदन करने वालों को पासपोर्ट के साथ कुछ अन्य दस्तावेज़ देने होते हैं। उसमें आनेजाने का हवाई जहाज़ का टिकट, उन शहरों के नाम जहां वह जाना चाहते है और वह स्थन जहां वह ठहरेगे, और भारत में उनको जानने वाले व्यक्ति की ओर से एक स्पांसरशिप का पत्र (चाहे वह मित्र, रिशतेदार या कॉर्पोरेट हाउस कोई भी हो) भी देना होता है। बिना इन काग़ज़ात के वीज़ा नहीं दिया जा सकता है जब तक कि आवेदन कर्ता उच्च आयुक्त को निजीतौर पर जानता न हो और वह उच्च आयुक्त का विश्वास प्राप्त करने की स्थिति में हो।
जब आवेदन कर्ता व्यवसायिक वीज़ा के लिए आवेदन करता है तो अतिरिक्त दस्तावेज़ों की जांच और गहनता के साथ की जाती है। शिकागो का षड़यंत्रह्न जिसके परिणाम में 166 लोगों को आतंकवादियों ने मारा, उसी दिन आरंभ हो गया था जिस दिन वह भारतीय उच्च आयुक्त के कार्यालय में अपनी मुस्लिम पहचान को छुपाने के लिए एक बदले हुए नाम और नए पासपोर्ट जिससे उसने कहीं भी इससे पूर्व यात्रा नहीं की थी और व्यवसायिक वीज़ा के लिए आवेदन किया। उसके वीज़ा से जुड़े तमाम काग़ज़ात उस षड़यंत्र का भेद जानने के लिए महत्वपूर्ण प्रमाण बन गए हैं। जिस समय एफबीआई ने भारत सरकार को हेडली की गिरफ़तारी और उसकी यात्रा के बारे में अक्तूबर में बताया था उसी समय विदेश मंत्रालय को उच्च आयुक्त से उसके दस्तावेज़ एक मुहरबंद लिफ़ाफ़े में भारत भेजने के लिए कहना चाहिए था ताकि जांच एजंसियां जांच कर सकें। यह आश्चर्यजनक है कि लगभग 2 माह तक ऐसा नहीं किया गया।
अब हमें भारत से बाहर अपने उच्च आयोग के सुरक्षा केन्द्र से वीज़ा आवेदन से जुड़े काग़ज़ात को प्राप्त करने के बारे में असंतोषजनक कहानी बताई जा रही है। मैंने विदेशों में 8 वर्षों तक वीज़ा अधिकारी के रूप में कार्य किया है। इसमें कुछ मिनटों से अधिक समय नहीं लगना चाहिए कि काग़ज़ात को निकाला जाए और उसे दिल्ली रवाना किया जाए। आप वीज़ा रजिस्टर लें उस नम्बर को प्राप्त करें, जिसके तहत उसे वीज़ा जारी किया गया और उसी नम्बर की सहायता से आवेदन तथा अन्य काग़ज़ात प्राप्त किए जा सकते हैं।
तो यह है षड़यंत्र से परदा उठाने की पहली कड़ी। अब मेरा हर लेख आपके हाथों में एक और कड़ी की तरह आता रहेगा, आप तो बस कड़ियां जोड़ते जाइयें, फिर देखिये यह ज़ंज़ीर किस की गर्दन तक पहुंचती है।...............
Sunday, December 27, 2009
क्या चुप रहते, अगर यह बेटा आपका होता!
देश वापसी हुई तो 26/11/2008 को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले को एक वर्ष पूरा हो चुका था और मीडिया में फिर इससे संबंधित ख़बरें आने लगी थीं। इस बीच एस।एम।मुशरिफ़ की पुस्तक ``Who killed karkare'' विनीता काम्टे की पुस्तक ``To the last bullet'' भी सामने आ चुकी थीं। जिनसे कुछ नए प्रश्न सामने आए। शहीद हेमंत करकरे की विधवा श्रीमति कविता करकरे ने भी यह कह कर चैंका दिया कि उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है। डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गीलानी व तहव्वुर हुसैन राना के रूप में दो नए नाम सामने आए जो अप्रवासी पाकिस्तानी हैं फिर जब गहराई से उन दोनों आतंवादियों के बारे में जानकारियां प्रापत करनी शुरू की थीं तो इतने आश्चर्यजनक रहस्योदघाटन होने शुरू हुए, जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इस समय भी मेरे लिखने का विषय भी यही है, मगर कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें न तो नज़रअंदाज़ किया जा सकता है और न देर तक उनकी अनदेखी की जा सकती है। मैंने कुछ दिन पूर्व ‘कोटा’ के एक युवक शादाब असदक़ के हवाले से लिखना शुरू किया था, जो चलती रेल गाड़ी से ग़ायब पाया गया और आज तक नहीं मिला। उसके परिवार के लोग लगातार इधर-उधर धक्के खाते रहे, ताने सुनते रहे, परेशान होते रहे, आंसू बहाते रहे मगर किसी ने उनकी गुहार नहीं सुनी। इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया। मुझे याद है और निश्चित ही हमारे पाठकों को भी याद होगा कि जब देश के गृहमंत्री की बेटी का आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया था तो पूरा भारत इस मुद्दे को लेकर विचलित था। अफ़सोस कि शादाद असदक़ देश के किसी ज़िम्मेदार व्यक्ति का पुत्र नहीं है, इसलिए सब चुप हैं। एक ताज़ा घटना जो कुछ महीने पहले मुम्बई में घटित हुई जब बिहार के एक युवक राहुल राज को मुम्बई में गोली मार दी गयी थी तो बिहार के तीनों बड़े नेता मुख्यमंत्री नितीश कुमार, उस समय के रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव और स्टील मंत्री राम विलास पासवान ने एक मंच पर आकर उस हत्या की निंदा की थी, उसे मुद्दा बनाया था, हालांकि यह तीनों राजनीतिज्ञ अपने राजनैतिक मदभेदों के कारण एक साथ इकट्ठा नहीं होते थे परन्तु अपने राज्य के एक युवक की मौत ने उन्हें संगठित कर दिया। हमारी क़ौम के राजनीतिज्ञ, धर्म निर्पेक्षता के अगुवा और केंद्रीय सरकार में सम्मिलित मंत्री क्या उन माता-पिता के दर्द को नहीं समझ सकते, जिनके बेटे को लापता हुए लगभग तीन माह हो गए हैं। वह केंद्रीय गृहमंत्री से गुहार लगा चुके हैं। अपने राज्य के मुख्य मंत्री तक अपने दिल की पीड़ा पहुंचा चुके हैं। कई बार हैदराबाद के चक्कर लगा चुके हैं, जहां से उनके घर का चिराग़ रेल में सवार हुआ था। जिस कंपनी में शादाब असदक़ नौकरी करता था, उसके अधिकारियों से बार-बार मिल कर अपना दुखड़ा सुना चुके हैं, मगर किसी ने भी यह ध्यान नहीं दिया कि आख़िर उसके साथ हुआ क्या है। शायद आज इस विषय पर मुझे फिर से क़लम उठाने की आवश्यकता न पड़ी होती, अगर उस कंपनी के ज़िम्मेदारों ने शादाब असदक़ के आदर्णीय पिता से यह न कहा होता कि वह मुसलमान था, युवा था, चला गया होगा आतंकवादी बनने। क्या इस अपराधिक मानसिकता के लोग सज़ा के पात्र नहीं हैं? मैंने पहले भी भारत सरकार तक इस गुमशदा युवक का विवरण पहुंचाने की कोशिश की है, आज फिर उसके पिता मुमशाद असदक़ का वह पत्र जो मुझ तक पहुंचा प्रकाशित कर रहा हूं, ताकि उस पर ध्यान दिया जाए और जल्द से जल्द उस युवक को तलाश करने की कोशिश की जाए।
मोहतरम जनाब,
मैं एक बदक़िसमत, असहाय पिता हूं, जिसका जवान बेटा अत्यंत संदिग्ध अवस्था में नागपुर रेलवे स्टेशन से ग़ायब हो गया है। वह आदर्णीय संदेश शर्मा (जनरल मैनेजर आईएल कंपनी), आदर्णीय रवि प्रभाकर (एडिशनल जनरल मैनेजर आईएल कंपनी) के साथ आईएल कंपनी (इंस्ट्रूमेटेशन इंडिया लि॰) के लिए सरकारी टेंडर जमा करके सिकंदराबाद से जयपुर-सिकंदराबाद हाली डे स्पेशल टेªल 0995 द्वारा वास लौट रहे थे।
अत्यंत दुखद सूचना मिलने के बाद मैं कोटा रेलवे स्टेशन के सरकारी अधिकारियों तक पहुंचा। कोटा जीआरपी ने केस दर्ज करने की रसम अदा की, जिसका नं॰ 4979।09।09.2009 है। और उन्होंने निर्देश दिया कि नागपुर रेलवे स्टेशन पर नियमित एफआईआर दर्ज कराओ। अगले दिन यानी 10.09.2009 को मैं नागपुर पहुंचा और नागपुर के पुलिस आयुक्त श्रीमान दीक्षित और क्राइम ब्रांच के एसीपी श्रीमान कुलथे से मुलाक़ात की। 10 दिनों तक नागपुर में ठहरने के बाद मैं निराश कोटा लौट आया।
लगभग 20 दिन पूर्व मेरे लेण्डलाइन फोन पर कुछ मिसकाॅल दिखाई दी। मैंने उन मिस्कालों के बारे में फौरन नागपुर पुलिस को सूचित किया। मिसकौल के नं॰4044378130, 4044378030, 4044378060, 4066986160, 4066986130, और एक मोबाइल नं॰9177890808 भी है।
मैंने उपरोक्त नम्बरों के बारे में जो हैदराबाद (आंध्रप्रदेश) के हैं, अपने तौर पर उन मिसकाॅलों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिशें कीं फिर मैं उपरोक्त मिस्कालों के विवरण जमा करके हैदराबाद भागा जहां 20 दिन तक ठहरा रहा। इस दौरान मैंने आंध्राप्रदेश के पुलिस डायरेक्टर जनरल और दूसरे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से भी मुलाक़ात की। इन विवरणों के बारे में आंध्रप्रदेश पुलिस ने भी कोई मदद नहीं की। अन्ततः मैं कोटा (राजस्थान) लौट आया।
मैं इंतिहाई शुक्रगुज़ार होंगा कि अगर आप अपनी कृपा और निजि हस्तक्षेप से इस उपरोक्त मामले में संबंधित अधिकारीगण को प्रभावित करके मेरे जवान बेटे के बारे में जानकारी प्राप्त कराएं कि वह कहां है।आपकी सहानुभूतिपूर्ण कृपा का मुन्तजिर रहूंगा।
मुमशाद असदक़
73-डी, आईएल टाउनशिप, कोटा (राजस्थान)मोबाइल-9982330307, फोन - 0744-२४२८३०६
शादाब असदक़ की गुमशुदगी अत्यंत विचलित करने वाली न होती, न उसके परिवार वालों के लिए न हमारे लिए अगर इस क़ौम के साथ गुज़रने वाली पीड़ादायक घटनाएं सामने न आई होतीं। कभी किसी मुस्लिम युवक का रेल से उठा लिया जाना, कभी किसी को सड़क से उठाकर बिना नं॰ प्लेट की गाड़ी में ले जाना और फिर उसें आतंकवादी बताकर या तो एन्काउन्टर कर दिया जाना या कुछ दिनों बाद किसी भी बम धमाके में, आतंकवादी घटना में लिप्त बताकर उनकी गिरफ़्तारी दिखाए जाने का सिलसिला आम न होता। ऐसे कई एन्काउन्टर फर्ज़ी सिद्ध हो चुके हैं। हमारे जर्नलिस्टिक प्रयास द्वारा ऐसे युवक जो तिहाड़ जेल में बंद थे, रिहा किए जा चुके हैं। जो कार में उठा कर ले जा रहे थे हमारे हस्तक्षेप के बाद सही सलामत अपने घर पहुंच चुके हैं (देहली के ओखला का मामला)। हमें नहीं मालूम इस युवक के साथ क्या हुआ है या क्या होगा? लेकिन इन्सानियत के नाते यह प्रयास करना तो हमें अपनी ज़िम्मेदारी नज़र आती है कि कारण जो भी हो उसके साथ जो भी हुआ हो, आख़िर उसके घर वालों को इसकी जानकारी तो मिले। ऐसा भी क्या कि बार-बार गुहार लगाने के बावजूद भी सरकारें ख़ामोश रहें। इस ओर ध्यान ही न दें और सबको न्याय देने का दावा भी करें।
अभी पिछले दिनों दिल्ली में फ़िलिस्तीन से संबंधित एक कांफ्रेंस का विज्ञापन नज़र से गुज़रा, जिसमें मुलायम सिंह यादव, राम विलास पासवान, एबी बर्धन, सीता रात यचूरी, नटवर सिंह, महमूद मदनी, सुल्तान हैदर और शाहिद सिद्दीक़ी इत्यादि नेताओं के शामिल होने का ज़िक्र था। निसंदेह यह सब लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले इतने संवेदनशील लोग समझे गए कि उन्हें फ़िलिस्तीन के दर्द में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया। उनमें से कई आए भी, विचार भी व्यक्त किया, मैं उस सम्मेलन की तफ़सील में नहीं जाना चाहता। इस समय इस सम्मेलन की तफ़सील बयान करना मेरा उद्देश्य नहीं है मैं केवल ध्यान इस बात की ओर दिलाना चाहता हूं कि यदि यह केवल राजनीति नहीं है, वास्तव में पीड़ितों के साथ सहानुभूति की भावना है और वह इतनी है कि हम भारत की धर्ती पर रहते हुए फिलिस्तीन की पीड़ा को समझते हैं जोकि एक अच्छी बात है तो फिर हमारी सहानुभूतियों से हमारे युवक ही क्यों वंचित रहें? क्या यह और इन जैसे राजनेता ध्यान देंगे शादाब असदक़ की गुमशुदगी पर? हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि अगर वह मानवीय भावना के मद्देदनज़र अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए या अपनी पहुंच का प्रयोग करते हुए उस घर को उसका चिराग़ लौटाने में उनकी सहायता करेंगे तो ऐसे सम्मेलनों के समाचारों से कहीं अधिक बड़े क्षेत्र में जाकर उनकी इस जन-सेवा को पहुंचाने की हम कोशिश करेंगे। दरअसल बात केवल एक युवक के लापता होने की नहीं है। उस भय-भीत क़ौम को सदमे और भय से बाहर निकालना भी है। बच्चों को शिक्षा से निराश होने से रोकना भी है। जो क़ौम एक लम्बी अवधि से जिहालत का ताना सुनती चली आ रही है, जिसे अनपढ़ और जाहिल ठहराया जाता रहा हो, जब उसके शिक्षित युवक इस तरह प्रकोप का शिकार हों या फिर इस तरह ग़ायब होते रहें कि उनकी ख़बर भी न मिले तो फिर यह एक अत्यंत दुखद व ध्यान देने योग्य मुद्दा बन जाता है। इसलिए कि एक तो वह घर अपने गुमशुदा युवक की ख़ैरियत के लिए चिंतित होता है और दूसरे हर पल भय के साथ जीने को विवश होता है कि पता नहीं कब उसे किस आतंकवादी घटना से जोड़ दिया जाए और उनका समाज में रहना भी कठिन हो जाए। ...................
जो हमने लिखा वही पूर्व डी.जी.पी पश्चिमी बंगाल ने भी!
कुछ लोग यानी एक विशेष मानसिकता के अनुयायी (अब यह सपष्ट करने की आवश्यकता नहीं है कि मैं किस मानसिकता की बात कर रहा हूं) लगातार यह भाव देने का प्रयास कर रहे हैं कि 26/11 के संबंध में, मैं जो कुछ लिख रहा हूं यह मुझे नहीं लिखना चाहिए, यह सब लिखकर मैं असल अपराधियों से ध्यान हटाने व जांच को एक दिशा देने का प्रयास कर रहा हूं, और मेरी सोच जो कि उनके नज़दीक ग़लत है, देश से ग़द्दारी है और भारत सरकार के विरुद्ध है। जहांतक मैं समझता हूं मेरे यह लेख मेरे द्वारा अपने देश भारत की मुहब्बत में लिखे गए हैं और यह भारत सरकार के लिए आतंकवाद से छुटकारा पाने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। हां, मगर जो लोग स्वाधीनता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के बजाए एक किनारे पर खड़े होकर अंग्रेज़ों के अनुयायी बन गए थे, उनके गीत गा रहे थे, उस मानसिकता के पोशित आज भी आतंकवाद के माध्यम से हमारे देश को विनाश के कगार पर पहुंचाने वालों तक नहीं पहुंचने देना चाहते, वरना क्या कारण है कि जो प्रमाण और तथ्य स्पष्ट संकेत दे रहे हैं, न केवल उनकी अनदेखी करने के लिए विवश किया जा रहा है, बल्कि ऐसी कोशिश करने वाले देश प्रेमी लोगों को निशाना भी बनाया जा रहा है। जहां तक डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गीलानी और तहव्वुर हुसैन राना का मामला है तो यह दोनों आतंकवादी हैं, पाकिस्तानी हैं और दोनों ही 26/11 को भारत में हुए आतंकवादी हमले में लिप्त हैं। अभी तक जो एफबीआई की रिपोर्टें भारत तक पहुंच रही हैं, वह यही हैं। अब उन तमाम जानकारिायेां को हू-बहू मान लेने के बाद जो प्रश्न पैदा होते हैं, उन पर वह भड़कते हों तो भड़कें, शक की सूई जिनकी ओर जा रही है, मगर हमारे अपने अगर इस पर नाराज़ दिखाई दें तो उचित नहीं लगता। यही कारण है कि हम अपनी रिसर्च के दौरान सामने आई समस्त जानकारियों को प्रकाशित करने के साथ-साथ इस पर नज़र रखते हैं कि देश भर में या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में और कौन-कौन ज़िम्मेदार व्यक्ति या संस्थान लिख रहे हैं या सोच रहे हैं, उनका दृष्टिकोण भी अपने पाठकों ही नहीं, बल्कि भारत सरकार और सम्पूर्ण भारतीय समाज के सामने रखा जाए। इसी सोच के मद्देनज़र हमने वीर संघवी के दृष्टिकोण पर आधारित लेख और विनीता काम्टे की पुस्तक ‘‘टू दि लास्ट बुलेट’’ पर की गई समीक्षा प्रकाशित की और ‘‘लाॅस एंजिलिस टाइम्स’’ में प्रकाशित रिपोर्ट को सामने रखना आवश्यक समझा। इसी तरह आज प्रातः ०८.३० बजे हाजी नगर, 24 पर्गना, पश्चिम बंगाल के मुहम्मद ज़ुबैर ने पहले एसएमएस और फिर फोन करके जब यह बताया कि कोलकाता से प्रकाशित होने वाले हिंदी दैनिक ‘‘सन्मार्ग’’ में पूर्व डीजीपी पश्चिम बंगाल दिनेश चंद्र वाजपई ने ‘‘26/11: हेडली और अमेरिका’’ के शीर्षक से जो कुछ लिखा है वह हमारे ख़ुलासों के ऐन मुताबिक़ है तो आवश्यक लगा कि एक उच्च पद पर रहने वाले पुलिस अधिकारी का दृष्टिकोण भी आज अपने पाठकों की सेवा में पेश किया जाए। हालांकि विचार यह था कि आज हमने अपनी कल की क़िस्त-62 जो बहुत छोटी थी, उसमें हेडली और तहव्वुर राना के पासपोर्ट अमेरिका और कनाडा में एक ही सप्ताह के भीतर 3 और 10 मार्च 2006 को जारी होने पर अपनी बात आगे बढ़ाएंगे और साथ ही अपने पाठकों की जो प्रतिक्रियाएं कल दिन भर हम तक पहुंचती रहीं, आज उसी विषय पर कुछ पाठकों के विचार भी प्रकाशित करेंगे, लेकिन यह सब बाद के प्रकाशनों में, आज दिनेश चंद्र वाजपेई के विचारणीय दृष्टिकोण पर आधारित लेख:
डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गीलानी को अमेरीका में गिरफ्तार हुए प्रायः तीन महीने हुए, लेकिन अभी तक भारतीय जांच अधिकारी न तो उससे पूछताछ कर पाये हैं और न ही उसके बारे में हमें पूरी सूचना दी गयी है, हालांकि उसके ऊपर स्वयं अमेरीका का मुख्य आरोप है मुम्बई पर हुए 26/11 के आक्रमण का षड़यंत्र रचने का। जबकि अमेरीकी एफ।बी।आई के अफसर कसाब से जिरह कर चुके हैं, हालांकि उसका अमेरीका पर हुए आक्रमण से कोई संबंध नहीं था। इसी बीच उसके बारे में जो आधी-अधूरी सूचनाएं आ रही हैं, उससे उसका जेम्स बोंडये चरित्र और रहस्यमय होता जा रहा है। दाऊद सईद गिलानी का जन्म वाशिंगटन में हुआ, जहां उसके माता-पिता अमरीकी दूतावास में कार्यरत थे। पिता, सईद सलीम गीलानी एक कूटनीतिज्ञ थे, जो एक कवि और संगीतशास्त्री भी थे और अमरीकी माता सेरिल हेडली एक लिपिक थीं। 1960 में परिवार लाहौर आ गया किंतु पिता की कट्टर इस्लामी संस्कृति और माता की पाश्चात्य विचारधारा व रहन-सहन में समन्वय न हो सकने के कारण दोनों में मनमुटाव, फिर संबंध विच्छेद हुआ और 1970 में सेरिल परिवार को छोड़कर अमेरीका के फिलाडेल्फीया में रहने लगी। कुछ समय बाद उसने ‘खैबर पास’ नाम का एक मदिरालय खरीद लिया और उसे चलाने लगी। बचपन में दाऊद की परवरिश पाकिस्तान में एक कट्टरपंथी वातावरण में हुई। 1977 में पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता से घबराकर सेरिल पाकिस्तान जाकर दाऊद को जो उस समय 17 वर्ष का था और विशिष्ट आवासीय सैनिक स्कूल अब्दुल कैडेट कालेज में पढ़ रहा था, अमेरीका ले आयी। इन दो पृष्ठभूमियों के कारण दाऊद हमेशा दो संस्कृतियों, कट्टरपंथी इस्लामी संस्कृति और उदारवादी पाश्चात्य संस्कृति के बीच खिंचता रहा। कभी वह शराबी हो जाता, कभी परम्पराशील मुसलमान। उसकी एक पाकिस्तानी पत्नी है किंतु एक अमरीकी महिला (मेकअप कर्मी) से उसके संबंध हैं। उसके अन्कल (मामा) विलियम हेडली का कहना है, अधिकतर लोगों के जीवन में कुछ विरोधाभास होते हैं, किंतु वह उनमें सामंजस्य करना सीख जाते हैं, किंतु दाऊद ऐसा नहीं कर पाया और यही उसकी समस्या है और आज दाऊद एक कट्टरपंथी जिहादी है। अमरीकी अन्वेषक पत्रकारों ने पता लगाया कि दाऊद पहली बार 1988 में मादक द्रव्यों के व्यवसाय के आरोप में 2 के.जी.हेरोइन के साथ पकाड़ा गया। उसकी स्वीकारोक्ति के कारण उसे कम सज़ा हुई और फिर वह ड्रग अधिकारियों को गुप्त सूचनाएं देने लगा। विशेषकर पाकिस्तान से हो रही मादक द्रव्यों की तस्करी की सूचनाएं। उसी समय वह पाकिस्तानी आतंकवादियों के संपर्क में आया और उसका पाकिस्तान आना जाना शुरू हुआ। उसकी पत्नी ने अमरीकी समाचारपत्र फिलाडेल्फिया इन्क्वायरर को बताया कि वह भारतियों से घृणा करता था और भारत से बदला लेने की बात करता था। दाऊद 1998 में अंतिम बार अमेरीका में मादक द्रव्यों के व्यवसाय के आरोप में पकड़ा गया और फिर स्वीकारोक्ति के कारण उसे कम सज़ा हुई । ड्रग अधिकारियों की मदद कर वह फिर उनके करीब आया और अमेरीका पर हुए 9/11 के आक्रमण के बाद जब अमरीकी अधिकारियों को पाकिस्तान के आतंकवादियों के बीच काम करने के लिए गुप्तचरों की ज़रूरत पड़ी तो दाऊद को छोड़ दिया गया। उसे दाऊद से हेडली बना दिया गया और एक नया पासपोर्ट देकर उसे पाकिस्तान भेज दिया गया। अमेरीका की मादक द्रव्य विरोधी संस्था ड्रग एनफोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा मादक द्रव्य व्यवसाय में घुसपैठ कर गुप्तचर बनकर काम करने को। इसके बाद वह अमेरीका से पाकिस्तान और भारत लगातार यात्राएं करता रहा। बिना किसी रोक-टोक के जो एक सजायाफ्ता अपराधी के लिए 9/11 के बाद के कड़े सुरक्षा वातारवण में अचंभे की बात है और संदेह की भी। यदि वह अमेरीका की सुरक्षा के लिए खतरा होता तो क्या उसके लिए वह संभव हो पाता। क्योंकि वह केवल भारत की सुरक्षा के लिए खतरा था इसलिए क्या उसे यह करने दिया गया? क्या उसको नया पासपोर्ट व नया नाम केवल इसलिए दिया गया जिससे उसे भारत में लम्बी अवधि का वीज़ा मिल सके, उसकी अपराधी पृष्ठभूमि को छिपाकर? शिकागो स्थित भारतीय कौंसिल जनरल अशोक कुमार अत्री को यह देखकर भी संदेह नहीं हुआ कि वीज़ा आवेदनकर्ता अमरीकी है जिसका नाम डेविड कोलमैन हेडली है, जबकि उसके पाकिस्तानी पिता का नाम सईद सलीम गीलानी है? क्या उसे एक बार पूछताछ के लिए भी बुलाना नहीं चाहिए था? क्या उनके ऊपर वीज़ा देने के लिए कोई दबाव था? यदि वह जांच करते उसकी पृष्ठभूमि की तो उन्हें पता लगता कि हेडली ने फिलाडेल्फिया की अदालत में एफिडेविट देकर कुछ ही दिन पहले अपना नाम बदला है और पहले नाम से उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि का भी पता लगता। उसके बाद वह नौ बार भारत आया और प्रत्येक बार भारत से लौटकर वह पाकिस्तान गया किंतु भारत में इमिग्रेशन अफसरों को भी उसमें कुछ संदेहजनक नहीं लगा? क्या अमेरीका ने उसको अलग पासपोर्ट दिया था पाकिस्तान जाने के लिए? अक्टूबर 2009 में एफ.बी.आई द्वारा पकड़े जाने के बाद हेडली के ऊपर 26/11 के आक्रमण में शामिल होने के आरोप लगाये गये। हेडली ने लश्कर-ए-तय्यबा से अपने संबंध के बारे में बताया, भारत में आकर सैन्य व परमाणु ठिकानों के वीडियो बनाने, 26/11 के निशाने पर जो स्थान थे उनके बारे में जानकारी लेने व आक्रमण की साज़िश रचने और कराची से आतंकवादियों को निर्देश देने के बारे में बताया है। एफ.बी.आई के आरोपपत्र और अमरीकी समाचारपत्रों के खुलासों ने अमेरीका की नीयत पर प्रश्न चिन्ह लगा दिये हैं। अमेरीका ने 26/11 की आगामी ख़बर दी तो किंतु इतनी छिटफुट कि उसे रोका न जा सका। यदि अमेरीका को हेडली के आतंकवादी होने की ख़बर 2008 में लग गयी थी तो उसने भारत को सतर्क क्यों नहीं किया? यदि किया होता तो वह 26/11 के पहले ही भारत में पकड़ लिया गया होता और 26/11 की तबाही रोकी जा सकती थी। क्या हेडली को पकड़ा गया डेनमार्क पर हमला रोकने के लिए ही? 26/11 के आक्रमण के बाद जब अमेरीका को हेडली की भूमिका का पता लग गया तब भी भारत को खबर नहीं दी गयी और मार्च 2009 में भारत आया, अगले आक्रमण की तैयारी करने और दिल्ली, पुष्कर, गोवा और मुम्बई गया। अमेरीका क्यों नहीं चाहता था कि हेडली भारत में गिरफ्तार हो और क्या अमेरीका अपनी बदनीयती को छुपाने को हेडली से पूछताछ नहीं करने दे रहा है? अब हमारी नज़रें रहेंगी शिकागो में हेडली के ऊपर चल रहे मुक़दमे पर। यदि वह फिर अल्प सज़ा पाकर छूट जाता है तो यह अमेरीका पर हमारे संदेह को पक्का ही करेगा। अमरीकी रवैये को देखकर क्या यह आशा की जा सकती है कि हम हेडली को भारत लाने और उसपर मुक़दमा चलाने में सफल हो पायेंगे? शायद नहीं।..............................
Friday, December 25, 2009
ग़ल्ती हुई मुझसे, शायद मुझे अपने पाठकों से यह निवेदन नहीं करना चाहिए था कि वह मेरे आज के लेख ‘‘अगर है कोई जवाब इसका तो बताओ’’ पर अपने विचार मुझ तक पहुंचाने का निवेदन नहीं करना चाहिए था, या फिर बात यह हुई कि मुझे यह अनुमान ही नहीं था कि रेस्पांस इतना अधिक होगा। पाठकों की प्रतिक्रिया इतनी बड़ी संख्या में मुझ तक पहुंचेगी कि आज का पूरा दिन एस।एम.एस. पढ़ने, टेलीफ़ोन पर बात करने और अन्य सूत्रों से जो उनके दृष्टिकोण मुझ तक पहुंचे उनका अध्य्यन करने में ही सारा दिन बीत जायेगा फिर इतना समय ही नहीं बचेगा कि मैं आज एक नया लेख लिख कर अपने पाठकों की सेवा में प्रस्तुत कर सकूँ। फिर भी इस कवायद का एक सुखद पहलू यह है कि इस समय जो कुछ लिखा जा रहा है वह बेवजह नहीं है। न केवल यह कि बहुत पढ़ा जा रहा है बल्कि उसे विशेष महत्व भी मिल रहा है, इसलिए आशा की जा सकती है कि स्थितियों में निरन्तर परिवर्तन आयेगा और इतना नहीं कि अब तक आतंकवाद के नाम पर आंख बंद करके जिन्हें गिरफ्तार किया जा रहा था अब उनको निशाना बनाने के बजाय जो वास्तव में आतंकवादी हैं, आतंकवादियों को शरण दे रहे हैं, आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं और अपने घिनौने उद्देश्यों के लिए जान बूझ कर आतंकवाद फैला रहे हैं, उनका असल चेहरा सामने आएगा, निसंदेह यह देश और राष्ट्र के हित में है, बल्कि कहा जा सकता है कि पूरी मानवता के हित में है।विचार था कि आज डेविड कोलमैन हेडली के साथ-साथ तहव्वुर हुसैन राणा पर भी लिखँूगा इसलिए कि एक सबसे चैंका देने वाली जानकारी जो मेरे सामने है, वह यह कि हेडली को पासपोर्ट जारी हुआ 10 मार्च 2006 को अमेरिका में और तहव्वुर हसैन राणा को पासपोर्ट जारी हुआ 3 मार्च 2006 को कनाडा में। अर्थात केवल एक सप्ताह के भीतर दोनों को पासपोर्ट दो अलग-अलग देशों से जारी होते हैं। हेडली के बारे में तो यह सच्चाई सामने आ ही गई है कि बदले हुए नाम के साथ उसके लिए यह एक नया पासपोर्ट अमेरिका में जारी किया गया, अब देखना यह है कि 48 वर्षीय तहव्वुर हुसैन राणा का भी यह कोई नए और बदले हुए नाम से बनाया गया पासपोर्ट है या फिर उसका असल नाम यही है और उसे 45 वर्ष की आयु तक पासपोर्ट की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। जो व्यक्ति पाकिस्तान में पैदा हुआ, अमेरिका में रहा वहां उसका मकान भी है और फिर कनाडा में जाकर बस गया, उसका यह पहला पासपोर्ट तो नहीं होना चाहिए, इसलिए कि पाकिस्तान में जन्म लेने के बाद जब वह अमेरिका और फिर कनाडा पहुंचा होगा तो उसके पास कोई पासपोर्ट तो अवश्य रहा होगा और उसने उन देशों के लिए वीज़ा भी प्राप्त किया होगा। ऐसी स्थिति में उसका पहला पासपोर्ट पाकिस्तानी होना चाहिए जहां वह पैदा हुआ और शिक्षा पाई।रिसर्च का सिलसिला जारी है, काफ़ी कुछ रिसर्च पेपर्स मेरे सामने हैं, जिनका अध्य्यन अभी तक नहीं कर पाया हूँ और अख़बार के प्रेस भेजने का समय निकट आता चला जा रहा है। अगर सरसरी तौर पर लिखकर इस बात को आगे बढ़ा दिया गया तो न विषय से न्याय होगा और न मेरे लिए अपने लेख के साथ ही, लिहाज़ा आज बस इतना ही। मुलाहिज़ा करें मेरे इस किस्तवार लेख की अगली कड़ी कल।
