Saturday, November 7, 2009

हम पहुंचाएंगे यह दर्द सरकार तक

जमीअत उलेमा-ए-हिन्द के तीसवें अधिवेशन में पेश किये गये 25 प्रस्तावों में से 13 पर टिप्पणी कल के लेख तक की जा चुकी है। आज इस सिलसिले को और आगे बढ़ाया जा रहा है। हालांकि यह सब रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा के विभिन्न प्रकाशनों में अधिवेशन की कार्यवाई की रिपोर्ट के साथ संक्षिप्त रूप में पाठकों की सेवा में पेश किया जा चुका है, मगर हमारा श्रृंखलाबद्ध कालम ‘‘आज़ाद भारत का इतिहास’’ जिसे हम एक दस्तावेज़ की शक्ल देना चाहते हैं (किताबी शक्ल में भी), ताकि आने वाली पीढ़ियों तक भी आज के हालात पहुंचें। कौम के सामने क्या समस्याएं थी और उनके समाधान के लिए क्या कुछ किया जा रहा था यह भी उनके संज्ञान में रहे अतः यह तमाम प्रस्ताव टिप्पणी के साथ इस लगातार कालम में शामिल करना आवश्यक लगा।

आज जिन प्रस्तावों का उल्लेख किया जाना है वह प्रस्ताव संख्या 14,15 और 17 हैं 14वें प्रस्ताव में जमीअत उलेमा-ए-हिन्द के इस अधिवेशन में फिलिस्तीन के दर्द को महसूस किया गया है। हम यह प्रस्ताव पूर्ण समर्थन के साथ ज्यूं का त्यूं प्रकाशित कर रहे हैं।

जमीअत उलेमा-ए-हिन्द का यह अधिवेशन फिलिस्तीनियों के उद्देश्यों का समर्थन करते हुए वहां इस्राइल की तरफ से जारी हिंसा की आलोचना करता है, वहां आये दिन की इस्राइली घेराबन्दी, फिलिस्तीनियों की नाकाबन्दी, आर्थिक स्त्रोतों, निर्माणकारी ढांचे, कार्यालयों, अस्पताल, स्कूल की तबाही और जीवन की मौलिक आवश्यकताओं से वंचित करने की इस्राइली कार्यवाईयों को गहरी चिंता की नज़र से देखता है, फिलिस्तीन में फिलिस्तीनियों की सरकार की स्थापना व मज़बूती में इस्राइल की नाजायज़ रूकावटों को खराबी के लिए मूल कारण समझता है।

पिछली जनवरी 2009 में इस्राइल ने आधुनिक अमरीकी हथियारों से ग़ाज़ा के निर्दोष फिलिस्तीनियों का जो कत्ल-ए-आम किया था और जिस तरह खुले आम युद्ध अपराध किये थे उनको 17 अक्टूबर 2009 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी स्वीकार किया है। अतः यह अधिवेशन इस्राइल की ओर से शांति प्रक्रिया को भंग करने के सुनियोजित प्रयासों की आलोचना करते हुए मांग करता है कि विश्व बिरादरी, विशेष रूप से यूरोपी व पश्चिमी सरकारें, संस्थाएं और संयुक्त राष्ट्र संघ फिलिस्तीन में शांति स्थापना के लिए ईमानदारी से प्रयास करें, यह अधिवेशन नई यहूदी बस्तियों के निर्माण और खुदाई से मस्जिद अक्सा की नींव को पैदा होने वाले खतरों पर चिंता प्रकट करता है। अमरीका से बड़े-बड़े वादों और मौखिक हमदर्दी पर भरोसा करके फिलिस्तीनी जनता पर जारी इस्राइली निर्ममता को और सहन नहीं किया जाना चाहिए।

दुनिया की तमाम शांति प्रिय शक्तियों और अरब नेताओं को चाहिए कि वह अमरीका पर दबाव डालें कि वह अपनी कथनी और करनी में अन्तर की पालिसी को छोड़े और इस्राइल को अमली रूप से फिलिस्तीन के सम्बन्ध में की जाने वाली आक्रामक कार्यवाईयों को फौरन रोके, साथ ही स्वाधीन, स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को निश्चित करे ताकि पश्चिमी एशिया में स्थाइ शांति स्थापित हो सके। निहत्थे फिलिस्तीनी राज्य का इस्राइली प्रस्ताव फिलिस्तीनियों का अधिक अपमान और उन्हें गुलाम बनाने जैसा है। यह अधिवेशन यह भी मांग करता है।

भारत सरकार फिलिस्तीनियों के हित में पूर्व की नीति पर काम करे और उनके नरसंहार को रोकने और फिलिस्तीन के मसले के समाधान के लिए मुख्य भूमिका निभाये।

2-विश्व बिरादरी और संयुक्त राष्ट्र संगठन से मांग है कि शीघ्र अति शीघ्र अधिकार प्राप्त मज़बूत फिलिस्तीनी सरकार की स्थापना की रूकावटों को दूर किया जाये।

3-फिलिस्तीनी जनता के लिए जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने का रास्ता हमवार किया जाये।


4-गज़ा में भयानक युद्ध अपराध करने पर इस्राइल पर अंतराष्ट्रीय जंगी अदालत में मुकदमा चलाया जाये।

5- यह अधिवेशन अपील करता है कि हम्मास, अलफतह और अन्य फिलिस्तीनी गु्रप आपसी मतभेदों को भुला कर अधिकार प्राप्त फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना और फिलिस्तीनी उद्देश्यों के लिए मिलजुलकर काम करें।

पिछली 16 जुलाई 2009 अर्थात लगभग 100 दिन पूर्व जब मैं भारत के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के साथ शर्मअलशेख में गुटनिर्पेक्ष .देशों की कांफ्रेंस में उपस्थित था तब लेखक ने फिलिस्तीन के सन्दर्भ में बात की थी और प्रधानमंत्री ने इस सिलसिले में भारत सरकार का दृष्टिकोण सामने रखा था, मुझे विश्वास है कि पाठकों को प्रधानमंत्री के वह वाक्य और मेरी रिपोर्ट याद होगी। एक बार फिर इसका प्रमुख भाग मैं इसे लेख के साथ पेश कर रहा हूं।
‘‘गुटनिर्पेक्ष देशों की कांफ्रेंस के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में फिलिस्तीन का उल्लेख करके यह अहसास दिलाया कि अब भारत की सरकार फिलिस्तीन के दर्द को शिद्दत से महसूस करने लगी है और अरब की धरती पर इस समस्या को उठाकर शांतिपूर्ण हल तलाश करने की जो बात उन्होंने की वह समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस लेखक ने प्रधानमंत्री के इस दृष्टिकोण को उनके भाषण का एक महत्वपूर्ण अंग मानते हुए प्रेस कांफ्रेंस के दौरान जब उनसे अपने इस दृष्टिकोण पर और अधिक प्रकाश डालने के लिए कहा और साथ ही यह भी निवेदन किया कि क्या मान लिया जाये कि भारत अब इस्राइल के मुकाबले में फिलिस्तीन को महत्व दे रहा है और उसके दर्द को महसूस करने लगा है तो प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने तुरन्त कहा कि यह हमारी सरकार का दृष्टिकोण है।

अर्थात यह उनकी निजी राय नहीं थी बल्कि भारत के प्रधानमंत्री ने गुटनिर्पेक्ष देशों की कांफ्रेंस में फिलिस्तीन की समस्या को उठाकर भारत के पक्ष को स्पष्ट किया था। फिलिस्तीन और अरब देशों के सम्बन्ध में यह बहुत बड़ी बात है और भारत का मुसलमान जो लगातार फिलिस्तीन के दर्द को महसूस कर रहा था और इस्राइल के साथ भारत की नज़दीकियों को नापसन्दीदगी की निगाह से देख रहा था, निश्चित रूप से उसके लिए यह बेहद खुशगवार परिवर्तन है’’

हम आशा करते हैं कि भारत सरकार अपने इस दृष्टिकोण पर दृढ़ रहेगी और एक पत्रकार के रूप में हम सरकार की कारकरदगी पर गहरी नज़र रखेंगे, अगर कहीं इसमें कोई परिवर्तन नज़र आया तो रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा व आलमी सहारा अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटेगा।

अधिवेशन में पेश किया गया 15वां प्रस्ताव ईराक पर अमरीकी आक्रामकता के सन्दर्भ में है। निःसंदेह इस प्रस्ताव में जो कुछ भी लिखा गया है उस पर न केवल मुसलमानों को बल्कि तमाम शांतिप्रिय लोगों को अपना समर्थन देना चाहिए। लेखक ने स्वयं इन हालात का गहराई से अध्ययन किया है और ‘‘सद्दाम सफर जिन्दगी का’’ के शीर्षक से ऊर्दू , हिन्दी और अंग्रेज़ी में एक पुस्तक भी लिखी है, जिसमें ईराक के हमले के कारण और ईराकियों पर अत्याचार की दास्तान दर्ज है। हम जमीअत उलेमा-ए-हिन्द के नीचे दिये गये इस प्रस्ताव का पूरी तरह समर्थन करते हैं और इस उद्देश्य के लिए हर कदम पर उसके साथ हैं।

जमीअत उलेमा-ए-हिन्द का यह अधिवेशन ईराक के कष्टदायक हालात पर गहरी चिंता प्रकट करते हुए अमरीका और उसके सहयोगियों की आक्रमकता की सख्त आलोचना करता है। मुस्लिम देशो की निष्प्रभावी भूमिका बेहद अफसोसनाक है, ईराकी जनता के कष्टों में दिन प्रतिदिन इजाफा चिंता का विषय है। लोकतंत्र, आज़ादी और ईराकी जनता को जुल्म व न्याय से मुक्ति दिलाने के नाम पर अमरीका ने ईराक पर सैनिक कार्यवाई की थी लेकिन इनमें से किसी भी चीज़ का दूर-दूर तक नाम व निशान नहीं। लोकतंत्र और आज़ादी के नाम पर ईराक को बदतरीन संकट, अनारकी और बिखराव के भंवर में डाल दिया गया है, साक्षरता की दर में भारी गिरावट आ गई है, बच्चों की शिक्षा के रास्ते बन्द होते जा रहे हैं, अशांति हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाओं व आत्मघाती हमलों का सिलसिला बराबर जारी है, अमरीका के नेतृत्व में विदेशी सेनाओं की उपस्थिति से स्थितियां और अधिक खराब और ईराकी जनता के दुख व क्रोध में वृद्धि हो रही है।

नई अमरीकी ओबामा सरकार ने ईराक से आहिस्ता-आहिस्ता सेना को हटाने का संकेत दिया था, लेकिन गुज़रते दिनों के साथ स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन दिखाई नहीं दे रहा है। ईराक आर्थिक, शैक्षणिक व समाजिक दृष्टि से पिछड़ेपन की ओर बढ़ रहा है। इस समय जो ईराक की अकथनीय स्थिति है उसको देखते हुए जमीअत उलेमा-ए-हिन्द का यह अधिवेशनः

1-संयुक्त राष्ट्र संगठन और विश्व बिरादरी से मांग करता है कि वह ईराक में शांति स्थापना और जनता की पसन्द के अनुसार लोकतांत्रिक ढंग से सरकार के गठन में सहायता करे।

2-ईराक को अनाधिकृत कब्ज़ा करने वाली फौज से खाली कराके वहां की जनता को सत्ता हस्तान्तरित की जाए।17वें प्रस्ताव का सम्बन्ध अफगानिस्तान पर अमरीकी आक्रमकता से है। निःसंदेह इसका भी पूर्ण समर्थन किया जाना चाहिए।जमीअत उलेमा-ए-हिन्द का यह अधिवेशन अफगानिस्तान की चिंताजनक स्थिति पर बेहद दुख प्रकट करते हुए अमरीका के नेतृत्व में आतंकवाद को समाप्त करने के नाम पर दिन प्रतिदिन विदेशी शक्तियों के बढ़ते हस्तक्षेप की पूर्ण आलोचना करता है।

अफगानिस्तान में विदेशी फौजी हस्तक्षेप से अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों और सीमाओं के उल्लंघन और आतंक व डर में इजाफा हो रहा है। प्राकृतिक संसाधन और भौतिक सम्पदा के जख़ीरों पर अधिक से अधिक कंट्रोल और उपयोग की अत्यधिक हवस ने अफगानिस्तान की आर्थिक राजनीतिक, शैक्षणिक स्थिति को बद से बदतर बना दिया है और देश के मूल निवासियों के भविष्य को और अधिक अंधेरे में झोंकने के साथ स्थिति को बिल्कुल बर्बाद कर दिया है, अफगानी जनता के कष्टों में हर दिन बढ़ौतरी हो रही है, शांति स्थापना और आपसी समझौते की केवल बातें हो रही हैं, वास्तव में टकराव, हमलों, निर्दोषों के जीवन की हानि में वृद्धि हो रही है, अफीम की पैदावार और विदेशी सेनाओं में वृद्धि का सिलसिला भी जारी है जिससे अफगानी जनता में ग़म व गुस्सा और विरोधी भावनाएं बढ़ रही हैं।

यह अफसोसनाक बात है कि अमरीका की नई ओबामा सरकार ने अफगानिस्तान में मज़बूती और शांति की स्थापना में किसी प्रभावी पेशकदमी की बजाए वहां सेनाओं की संख्या बढ़ाने की बात कही है। इसे देखते हुए यह अधिवेशन संयुक्त राष्ट्र संघ, विकसित विश्व बिरादरी और तीसरी दुनिया के विकासशील देशों से पुरज़ोर अपील करता है कि अफगानिस्तान की स्थिति बेहतर बनाने और बेजा अमरीकी हस्तक्षेप व आक्रमकता पर रोक लगाकर अफगानी जनता की इच्छा के अनुसार लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना में अपने प्रभाव का उपयोग करें।

फिलिस्तीन इराक और अफगानिस्तान के हालात को एक नज़र से देखा जा सकता है, जहां मुसलमानों पर अत्याचार, अमरीका और इस्राइल की आक्रामकता साफ दिखाई देती है। भारत सरकार पूर्व में ईराक, अफगानिस्तान और फिलिस्तीन से मित्रवत सम्बन्ध रखती रही है, मगर अफगानिस्तान और ईराक पर थोपी गई जंग के दौरान उससे जो आशाएं की गई थीं उन पर वह पूरी नहीं उतरीं। अब अमरीका के सदर बाराक हुसैन ओबामा हैं जिनके दृष्टिकोण में नरमी दिखाई देती है और भारत की मौजूदा सरकार भी अब इस दर्द को ज्यादा महसूस करती नज़र आ रही है, जिसको प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस लेखक की मौजूदगी में शर्मअलशेख में गुटनिर्पेक्ष देशों की कांफ्रेंस के बीच स्पष्ट किया था, मगर इस समस्या को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देखे जाने की आवश्यकता है।

बात केवल सत्ताधारी दल के सम्बन्ध में न हो, बल्कि भारत की पूरी संसद इन मामलात पर इसी तरह एक नज़र आए जिस तरह 26/11 को मुम्बई पर आतंकवादी हमले के बाद नज़र आई थी, तब अधिक बेहतर परिणामों की आशा की जा सकती है और इस मामले में जमीअत उलेमा-ए-हिन्द की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है, इसलिए कि इसके जनरल सेक्रेटरी जिस पार्टी से राज्यसभा के सदस्य हैं उसके न केवल लोकसभा में 6 सदस्य हैं बल्कि भारतीय जनता पार्टी से उसका गठजोड़ भी है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी इस्राइल की समर्थक रही है और मुसलमानों व मुस्लिम देशों के सम्बन्ध में उसका दृष्टिकोण भी जगजाहिर है।

अतः अगर जमीअत उलेमा-ए-हिन्द अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके अपनी पार्टी के समर्थक और उन मुस्लिम विरोधियों के दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सके तो कागज़ी कार्यवाई से ऊपर उठकर इन समस्याओं के समाधान की आशा की जा सकती है।

(जारी)

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