अपने किस्तवार लेख ‘‘आज़ाद भारत का इतिहास’’ की 150वीं क़िस्त को मैं ‘कश्मीर समस्या’ को भेंठ करना चाहता था और उसके प्रकाशन के लिए भी मेरे मन में अपने पिछले लेख ‘‘मुसलमानाने हिंद’ह्न माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल???’’ की 100वीं क़िस्त की तरह एक दस्तावेज़ी हैसियत में पेश करने की योजना हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी में थी और जिस तरह इसे 100 से अधिक पृष्ठों पर आधारित मैग़ज़ीन के रूप में प्रकाशित किया गया था, इसी तरह कश्मीर समस्या पर हमारी यह प्रस्तुति भी एक ऐसे ही दस्तावेज़ के रूप में सामने आनी थी। बहुत हद तक ‘आलमी सहारा’ के ताज़ा अंक ‘‘कश्मीर-2010’’ के द्वारा हमने एक छोटी सी कोशिश की भी है, लेकिन फिलहाल यह इरादा हमें छोड़ना पड़ा, क्योंकि इस बीच संघ परिवार का वह विनाशकारी चेहरा पूरी तरह सामने आ गया, जिससे नक़ाब उठाने की कोशिशें हम अपने इन क्रमवार लेखों में पिछले कुछ वर्षों से करते आ रहे हैं। हमने अपने पिछले क़िस्तवार लेख ‘‘मुसलमानाने हिंद’ह्न माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल???’’ की जिस 100वीं क़िस्त का अभी उल्लेख किया उसके सम्पादकीय में भी संघ परिवार के इस चेहरे को सामने रखा था। इस समय वह विशेष अंक भी मेरे सामने है और दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अंग्रेज़ी दैनिक ‘मेल टुडे’ का वह महत्वपूर्ण अंक भी, जिसमें उसने उपराष्ट्रपति जनाब हामिद अंसारी की हत्या की साज़िश में लिप्त दिल्ली के अपोलो अस्पताल के डा॰ आर॰पी॰ सिंह की बातचीत के हवाले से यह स्पष्ट किया है कि देश में आतंकवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं और उन्हें अंजाम देने वाले किस स्तर के लोग हैं। 15 अगस्त के बाद मैं एक बार फिर संघ परिवार की आतंकवादी गतिविधियों, 9/11 व 26/11 पर विस्तृत लेखों का एक सिलसिला आरंभ करने जा रहा हूं, लेकिन आज का यह विशेष लेख और इस के बाद के कुछ लेखों में उस हिंदू आतंकवाद के द्वारा देश को उत्पन्न ख़तरा तक ही सीमित रखना चाहता हूं, इसलिए पहले एक पैराग्राफ़ उस ऐतिहासिक दस्तावेज़ से जो मैंने संघ परिवार और हिंदू राष्ट्र का सपना देखने वाले साम्प्रदायिकों की मानसिकता को सामने रखते हुए अपने पिछले लेख की 100वीं क़िस्त में लिखा था और साथ ही ‘मेल टुडे’ की खोजी रिपोर्ट के कुछ प्रमुख अंश, अपने पाठको की सेवा में प्रस्तुत करने जा रहा हूं। इसके बाद कल इसी विषय पर मेरी गुफ़्तगू का सिलसिला जारी रहेगा।
(मुसलमानाने हिंद माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल’ह्न??? की 100वीं क़िस्त से)
‘‘मैं संघी, फिरंगी और जंगी तीनों की मानसिकता से भलीभांति परिचित हूं, संघी वे जो इस देश को हिन्दू राष्ट्र के बहाने अपनी दूषित मानसिकता का दास बनाना चाहते हैं और जिन्हें शहीद हेमन्त करकरे बेनक़ाब कर रहे थे, फिरंगी वह मानसिकता है जो केवल ब्रिटिशों तक सीमित नहीं, आज अमेरिकी मानसिकता इससे कहीं अधिक खतरनाक रूप में हमारे सामने है और जो सारे विश्व पर अपना वर्चस्व चाहती हैं अब रहा सवाल जंगी का तो यह जंगी तथाकथित मुजाहिदीन लश्करे तैयबा आई एस आई, अलक़ायदा, इंडियन मुजाहिदीन यह सब उन संघियों और फिरंगियों के हथियार हैं, इनमें शामिल आतंकवादी मुसलमान हो सकते हैं, परन्तु यह मुसलमानों के जिहादी ग्रुप नहीं हो सकते इस्लाम के अनुयायी नहीं हो सकते, बल्कि यह उन उपरोक्त शक्तियों के खिलौने हैं, जब सोवियत संघ को टुकड़े टुकड़े करना था तो यही बिनलादैन और अलक़ायदा, बुश परिवार के सर्वोत्तम मित्र थे, जब ईरान का विनाश करना था तो सद्दाम हुसैन उनकी पहली पसन्द थे और जब इराक़ का विनाश करना था तो पाकिस्तान उनका दोस्त था, जब भारत को आतंकवाद की आग में झोंकना था तो कश्मीर के रास्ते यही लश्करे तयैबा उनका हथियार था, उन ही की सहायता से यह पला बढ़ा और पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था आईएसआई से इन्द्रेश के कितने निकट सम्बंध थे, यह रहस्योद्घाटन भी किया था शहीद हेमन्त करकरे ने अपनी जांच में कि आईएसआई से 3 करोड़ रूपये प्राप्त किये थेे इन्दे्रश ने । आज यही संघी, फिरंगी और जंगी के त्रिकोण में चैथा कोण शामिल हुआ इस्राईल और मोसाद का जो शायद 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई के रास्ते भारत पर आतंकवादी हमलों के लिए जिम्मेदार है।
ज़रा सोचिए’ह्न! क्या केवल 10 आतंकवादी पाकिस्तान से आकर भारत पर इतना बड़ा हमला कर सकते हैं, बिना किसी की सहायता के? और हां! यह सामान्य लोगों की सहायता से भी नहीं हो सकता यह तभी संभव है जब देश के बहुत बड़े प्रभावशाली और कद्दावर व्यक्तियों की छत्रछाया उनको प्राप्त हो। सम्भवतः अपने घिनौने उद्देश्य को पूरा करने के लिए संघी, जंगी और फिरंगी सबके इस गठजोड़ ने 10 भाड़े के टट्टुओं का सहारा लेकर और उन्हें सभी प्रकार की सुविधायें उपलब्ध कराकर भारत पर यह शर्मनाक हमला किया और वही सब आज इस रहस्य से पर्दा नहीं उठने देना चाहते ताकि उनके चेहरे बेनक़ाब न हों।
परन्तु ऐसा होगा नहीं, यह आरूषि मर्डर केस का मामला नहीं है जो एक घर परिवार की चहारदीवारी तक सीमित था, यह हमारे प्यारे देश भारत के मान सम्मान का मामला है, सौ करोड़ भारतीयों के स्वाभिमान का मामला है, इसे कब तक दबाया जा सकेगा। देश की मर्यादा पर मर मिटने वाले शहीदों की अन्तरात्मा की आवाज़ को, सीमा पर खड़े होकर देश पर बलिदान हो जाने वाले सैनिकों की आवाज़ को, ताज, ओबराय और नरीमन हाऊस को आज़ाद कराने वाले जाॅंबाज़ सिपाहियों के ज़मीर की आवाज़ को हमेशा हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। क्या यह सब नहीं जानते कि वास्तविकता क्या है? क्या यह नहीं जानते कि उनके साथियों की मूल्यवान जानें किस उद्देश्य कि लिए कुर्बान हुई हैं? हां हो सकते हैं हमारी पुलिस और सेना में दो चार गुमराह जो धोखे में आ जायें और कोई गल्ती कर बैंठें परन्तु हमारी पुलिस व सेना के भरोसे पर पूरा देश और समाज टिका है, कब तक उनको बहकाया जा सकेगा, कब तक उनकी आवाज़ को दबाया जा सकेगा!
यही बतायेंगें सच, इस आतंकवादी हमले का ! यही बचायेंगें अपने देश को असली और नक़ली आतंकवादियों से, इसी मिट्टी में जन्मे है ये! यह धरती इनकी मां है और मां के मान की ओर कोई आंख उठाकर देखे, उसे इस धरती के सपूत कभी सहन नहीं कर सकते! मजबूरी, विपरीत परिस्थिति, डर और भय कुछ देर तो चुप रख सकता है, सदैव के लिए नहीं। आखिर मरता कौन है, रण भूमि में जाकर सीने पर गोली कौन खाता है, किसके बच्चे अनाथ होते हैं, किसका परिवार बेसहारा होता है, क्या भीख में मिले यह चांदी के कुछ सिक्के उस परिवार को उसके घर का चिराग लौटा सकते हैं।
नहीं! अब और घरों में अंधेरा नहीं होने देंगें। कुर्सी के भूखे और देश द्रोहियों के लिए अपने प्राणों का बलिदान नहीं होने देंगें, जो दृश्य देखा गेटवे आॅफ इंडिया और पूरे भारत ने 29 नवम्बर 2008 को वही शान्ति और एकता का दृश्य सारी दुनिया देखेगी।’’
लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व लिखी गईं यह कुछ पंक्तियां आज अल्लाह के करम और आप सबकी दुआओं से हक़ीक़त का रूप धारण कर रही हैं बधाई की पात्र है सीबीआई जिसने इस सत्य को दबाया नहीं बल्कि अपने दायित्व के निर्वाहन का सबूत देते हुए इस ख़तरनाक बातचीत को उजागर कर दिया। हमने अपनी उपरोक्त कुछ पंक्तियों में ऐसे ही देशभक्त अधिकारियों को आवाज़ दी थी।
साथ ही बधाई का पात्र है अंग्रेज़ी दैनिक मेल टुडे भी जिसने इस पर्दाफ़ाश करने वाली रिपोर्ट को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया। मुलाहिज़ा फ़रमाएं आशिश खेतान की यह विशेष रिपोर्ट:
ख़ुफ़िया एजेंसी सीबीआई ने अपनी जांच में हिन्दुत्व के इन नापाक इरादों का पर्दा फ़ाश किया है, जिसके तहत वह उपराष्ट्रपति हामिद अन्सारी की 2007 में जामिया मिल्लिया के एक कन्वोकेशन प्रोग्राम में हत्या करना चाहते थे। सीबीआई को यह जानकारी मालेगांव ब्लास्ट के अभियुक्तों और स्वंयभु शंकर आचार्य दयानंद पांडे के लैपटाॅप और उनकी बातचीत की आॅडियो रिकाॅर्डिंग की जांच के दौरान प्राप्त हुई है। सीबीआई को महत्वपूर्ण सुराग़ शंकर आचार्य और दिल्ली अपोलो अस्पताल के डाक्टर आर॰पी॰ सिहं से हुई बातचीत से भी मिला। शंकर आचार्य और डाक्टर आर॰पी॰ सिंह के बीच यह बातचीत जनवरी 2008 में हुई थी।
शंकर आचार्य: ‘देश के उपराष्ट्रपति हामिद अन्सारी जामिया मिल्लिया के कन्वोकेशन समारोह में उपस्थित थे।’
डा॰ आर॰पी॰ सिंह: ‘‘मैं वहां उनके विरुद्ध प्रदर्शन करने के लिए गया था, मैं अपने साथ 15 लीटर पैट्रोल भी ले गया था, परंतु मुझे कुछ करने का अवसर नहीं मिल सका।’’
आॅडियो रिकाॅर्डिंग की फाॅरेन्सिक जांच होने पर दोनों व्यक्तियों की आवाज़ की पुष्टि हुई। इस जांच के बाद सीबीआई ने डा॰ आर॰पी॰ सिंह से पूछताछ की और बाद में उन्हें छोड़ दिया। लेकिन उसके बाद उनसे कोई पूछताछ नहीं हुई जबकि दयानंद पांडे को महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे ने 26/11 अर्थात अपनी शहादत से एक दिन पूर्व गिरफ़्तार किया था और वह अब तक नासिक जेल में बंद है।
आॅडियो रिकार्डिंग में पांडे और डा॰ आर॰पी॰ सिंह के बीच की यह वह बातचीत है, जो फ़रीदाबाद में उन लोगों ने कथित हिन्दू आतंकवाद की योजनाबंदी करने के लिए की थी। फ़रीदाबाद की इस मीटिंग में मालेगांव धमाके का प्रमुख अभियुक्त लेफ़्टिनेंट कर्नल पुरोहित और दिल्ली भाजपा के नेता तथा पूर्व सांसद बी॰एल॰ शर्मा भी मौजूद थे। इस मीटिंग में कर्नल पुरोहित ने यह घोषणा की थी कि उसका भारत के संविधान से विश्वास उठ चुका है और अब वह हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए युद्ध आरंभ करेगा।
उसने कहा कि ‘अगर हम इसी तरह भारत के संविधान पर भरोसा करते रहे तो हम भी उन जैसे लोगों की तरह हो जाएंगे, इसलिए हम इस संविधान के विरुद्ध लड़ाई लड़ना चाहते हैं। हम इस देश के लिए लड़ाई लड़ेंगे जो हमारा नहीं है। हम आज़ादी की लड़ाई लड़ेंगे अर्थात हिन्दू आज़ादी की लड़ाई।’
यह जानकारियां भी हैडलाइंस टुडे ने इकट्ठा की हैं। ख़ुफ़िया विभाग से जो कुछ जानकारियां प्राप्त हुई हैं उनसे साफ़ है कि डा॰ सिंह भगवा ब्रिगेड के आतंकवाद का प्रमुख अभियुक्त है, फिर भी वह आज़ाद है, जबकि दयानंद पांडे को आतंकवाद के आरोप में जेल भेजा जा चुका है।
महाराष्ट्र एटीएस ने हैडलाइंस टुडे को जानकारी देते हुए बताया कि डा॰ सिंह के विरुद्ध मालेगांव ब्लास्ट के सिलसिले में कोई पुख़्ता सबूत न होने के कारण छोड़ दिया गया फिर भी वह सीबीआई की जांच के दायरे में है।
पांडे के लैपटाॅप की रिकाॅर्डिंग से डा॰ सिंह के कई साम्प्रदायिक मन्सूबों का पता चला है, जैसे ‘तुम्हारा नं॰ एक दुश्मन मुसलमान है, मैं उनकी हत्या का सिलसिला दिल्ली से आरंभ करूंगा, मैं हत्या के साथ उन हज़ार दो हज़ार लोगों को भी लूटूंगा जिन्होंने यहां शोरूम खोल रखे हैं।’
अपने इक़बालिया बयान में डा॰ सिंह ने यह भी स्वीकार किया है कि वह अल्पसंख्यक समुदाय के लोगांे को निशाना बनाने के लिए हथियार और गोला-बारूद भी मुहैया कराता था। एक मीटिंग में वह कर्नल पुरोहित से ग्रेनेड, डेटोनेटर और आरडीएक्स मुहैया कराने की बात करते हुए सुना गया है।
लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित: ‘हम फोन पर बातचीत करते रहेंगे, में आपको वह सब जानकारियां देता रहूंगा जो कुछ मैं करता रहूंगा और आप जो कुछ करें उसकी भी जानकारियंा हमें देते रहें। उसका उद्देश्य यह है कि हम योजनाबंदी में एक दूसरे की सहायता कर सकें। जहां तक ट्रेनिंग कैम्प की समस्या है इसके बारे में आप हमसे कभी भी यानी आधी रात को भी बात कर सकते हैं।’
डा॰ सिंह: ‘हमें हाई वोल्टेज, डेटोनेटर, बैटरियंा, ग्रेनेड और आरडीएक्स चाहिए। हमने जिससे सम्पर्क किया था उन्होंने कहा कि यह आरमी दे सकती है, अगर हमें यह उपलब्ध हो जाता है तो हम एक बड़ा युद्ध आरंभ कर सकते हैं, हम आपको कम से कम जम्मू से 100 आत्मघाति हमलावर दे सकते हैं।’
बहरहाल जैसा कि सीबीआई हिन्दू आतंकवाद की कड़ियां जोड़ रही है, इससे लगता है कि अभी वह केवली ऊपरी सतह तक ही पहुंच सकी है।
Thursday, July 22, 2010
Monday, July 19, 2010
کب تک نہیں پہچانیں گے ہم اصل دہشت گردوں اور ان کے منصوبوں کو
عزیز برنی

کوئی حیرانی نہیں ہوئی مجھے اس وقت جب نائب صدرجمہوریہ جناب حامدانصاری صاحب کو قتل کرنے کی سازش کا رازفاش ہوا۔ دراصل ہمیں سنگھ پریوار کے پروردہ ناتھورام گوڈسے کے ہاتھوں مہاتماگاندھی کے قتل کے بعد ہی سمجھ لینا چاہےے تھا کہ ملک کی آزادی کے معنی فرقہ پرست طاقتوں کے لےے کیا ہیں اور ان کے ذہن میں کیسے ہندوستان کا تصور ہے اور اپنے اس تصور کو حقیقت میں بدلنے کے لےے وہ کیسے کیسے خطرناک منصوبے بنا سکتے ہیں، کتنی قیمتی جانیں لے سکتے ہیں۔ لیکن افسوس کہ ہم نہیں سمجھ سکے ان کی ذہنیت کو، اس لےے کہ اس وقت ملک کے وزیرداخلہ سردار ولبھ بھائی پٹیل تھے، جن کی قیادت مہاتماگاندھی کے قاتلوں کے تحفظ کے لےے زیادہ فکرمند تھی، بالمقابل مہاتماگاندھی کی زندگی کو فاشسٹ طاقتوں سے بچانے کے۔ ہمیں بار بار لکھنا پڑتا ہے اس وقت کے حالات کو، سردار پٹیل کے نظریات کو، سنگھ پریوار کی کارکردگیوں کو، اس لےے کہ جس طرح ان تمام واقعات کو آزادی کے فوراً بعد سے ہی دبانے کی کوشش متواتر کی جاتی رہی ہے، وہ اس قدر زیادہ ہے کہ ہم اگر ان تمام حقائق کو سوبار منظرعام پر لائیں، تب بھی کل ہندوستان ان تمام حقائق سے واقف ہوپائے گا،یہ یقین کے ساتھ نہیں کہاجاسکتا۔ …لیکن فضا اب کچھ بدلتی نظر آرہی ہے۔ ایسی تمام خبریں جنہیں یا تو جگہ ہی نہیں ملتی تھی یا اگر کچھ جگہ مل بھی جاتی تھی تو اس طرح کہ انہیں شامل اشاعت تو کردیا جاتا، مگر وہ قارئین کی توجہ اپنی جانب مرکوز نہیں کرپاتیں۔ نتیجہ دہشت گردی کے تمام واقعات کو ایک مخصوص فرقہ سے جوڑ کر ہی پیش کیا جاتا رہا، کیوں کہ صرف ایسی ہی خبریں نمایاں طور پر جگہ پاتی رہیں، جن میں دہشت گرد مسلمان نظر آتے ہوں۔ انہی ناموں کی تشہیر کی جاتی رہی، جن کا تعلق ایک مخصوص مذہب سے رہا۔ مگر سچ سات پردوں میں ہو تب بھی ایک روز باہر آہی جاتا ہے۔
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آج صبح جب میں دہلی سے شائع انگریزی روزنامہ ’’ہندوستان ٹائمز‘‘ کے صفحہـپر چھپی زیر نظر خبر کو پڑھ رہا تھا تو مجھے یہ احساس ہوا کہ ’روزنامہ راشٹریہ سہارا‘ تو برسوں سے ان تمام واقعات کو منظرعام پر لاتا رہا ہے۔ مکہ مسجد بم بلاسٹ کی بات ہو یا خواجہ معین الدین چشتیؒ کی درگاہ اجمیر کا واقعہ ہو، مالیگاؤں کا بم دھماکہ ہو یا سمجھوتہ ایکسپریس سانحہ، لیکن پولیس اور خفیہ ایجنسیوں نے صحیح مجرموں تک پہنچنے کی سنجیدہ کوشش کی ہی نہیں۔ راقم الحروف نے تواسی وقت حیدرآباد مکہ مسجد میں ہوئے بم دھماکہ کی جگہ پر جاکر اور ہلاک شدگان کے گھروں تک پہنچ کر ان کے اہل خانہ سے ملاقات کی، متعدد عینی شاہدوں سے گفتگو کی اور اسی وقت یہ سچ سامنے آنے لگا کہ جن لوگوں کی گرفتاریاں کی گئی ہیں، ان میں پولیس کا تعصب صاف نظر آتا ہے تو آندھراپردیش کے وزیراعلیٰ وائی ایس آر ریڈی سے ملاقات کی۔ بعد میں کچھ بے گناہ ملزمین کورہائی بھی ملی، لیکن اس وقت اس آواز میں آواز ملانے والے عوام کی سطح تک تو موجود تھے، مگر ہمارے قومی میڈیا نے اس پر اتنی توجہ نہیں دی، جتنی کہ دی جانی چاہےے تھی۔ بہرحال اب اندازفکر بدلنے لگا ہے اور ان خبروں کو بھی جگہ دی جانے لگی ہے، جن میں دہشت گردی کی زد میں فرقہ پرست تنظیموں کے کارکنان وابستہ نظر آتے ہیں۔ زیرنظر خبر سی بی آئی کی جانچ پر مبنی ہے، لہٰذا آج ہم کہہ سکتے ہیں کہ ’روزنامہ راشٹریہ سہارا‘ جن باتوں کی طرف اسی وقت سے اشارہ کرتا رہاتھا، اگر توجہ دی جاتی تو یہ حقیقت بہت پہلے منظرعام پر آسکتی تھی۔
kقارئین کو اچھی طرح یاد ہوگا کہ کانپورکے رہائشی علاقہ میں ایک گھر کے اندر بم بنانے کی فیکٹری چلائی جارہی تھی۔ بجرنگ دل کے دوکارکن موقع پر ہی اس کوشش میں ہلاک ہوئے، لیکن کیا اس کی تہہ تک جاکر یہ جاننے اور سمجھنے کی کوشش کی گئی کہ ان بموں کا استعمال کہاںہونا تھا؟ یہ بم کن کے لےے بنائے جاتے تھے؟ اسی طرح کا واقعہ ناندیڑ اور اڑیسہ میں بھی سامنے آیا۔ انہیں بھی دبانے کی حتی الامکان کوشش کی گئی اور کامیاب کوشش کی گئی، جو کچھ بھی منظرعام پر لایا گیا وہ زیادہ تر اردو اخبارات کے ذریعہ ہی، جس میں اے ٹی ایس اور مقامی پولیس نے معاملہ کو رفع دفع کرنے کی کوشش کو سامنے رکھا گیا، مگر ہماری خفیہ ایجنسیوں نے پوری سچائی کو سامنے لانے کی ضرورت محسوس نہیں کی۔ ہم پھر یہ کہنا چاہیں گے کہ ایک دہشت گرد صرف دہشت گرد ہے، اسے مذہب کے چشمہ سے نہ دیکھا جائے، خواہ اس کا تعلق کسی بھی مذہب سے کیوں نہ ہو۔ مگر ان واقعات کو سامنے رکھ کر کچھ لکھنا اس لےے ضروری لگتا ہے کہ آج پوری دنیا میں دہشت گردی کو اسلام سے جوڑ کر دیکھا جارہا ہے اور بدقسمتی سے ہندوستان میں بھی یہی ہورہا ہے۔ شاید اسی وجہ سے دہشت گردی پر قابو پانا ہمارے لےے بہت مشکل ہوگیا ہے کہ ہم حقائق کا سامنا کرنا ہی نہیں چاہتے۔ اصل مجرموں تک پہنچنا ہی نہیں چاہتے۔ ایسا لگتا ہے کہ ہر بم دھماکہ کے بعد پہلے سے طے شدہ اسکرپٹ پر ہی کام کیا جاتا ہے۔ بس کچھ نام بدل جاتے ہیں، کچھ مقام بدل جاتے ہیں۔ نتیجہ بٹلہ ہاؤس انکاؤنٹر جیسے واقعات کی شکل میں سامنے آتا ہے، جس پر آج تک مرکزی حکومت کوئی واضح موقف اختیار نہیں کرسکی ہے۔ بھلے ہی حکمراں جماعت کانگریس کے جنرل سکریٹری اور ترجمان دگ وجے سنگھ خود اس انکاؤنٹر پر سوال اٹھاتے رہے ہوں۔
گزشتہ چند روز سے میں اپنے اس قسط وار کالم میں کشمیر کے موضوع پر گفتگو کررہا تھا۔ بیشک ابھی بھی اس سلسلہ کو جاری رکھنے کی ضرورت ہے اور انشاء اللہ رہے گی، لیکن تازہ انکشافات کی روشنی میں مجھے یہ ضروری لگتا ہے کہ کل سے کچھ روز تک دہشت گردی کے اس مخصوص چہرے کو سامنے رکھا جائے اور ایک بار پھر اس سوال پر سنجیدگی کے ساتھ غور کیا جائے کہ شہید ہیمنت کرکرے کے دہشت گردانہ حملہ میں مارے جانے کا مکمل سچ کیا ہے۔
اگر وہ اس 26/11کے دہشت گردانہ حملہ کا شکار ہوئے، جو ہندوستان کی سالمیت پر اب تک کا سب سے بڑا حملہ تھا تو پھر اسے ایک حیران کن اتفاق ہی کہا جائے گا کہ 26/11سے چند روز قبل شہیدہیمنت کرکرے اپنی جان کو خطرہ محسوس کررہے تھے۔ انہیں فون پر دھمکیاں دی جارہی تھیں۔ آخر وہ کون تھے اور کیوں ان کی جان لینا چاہتے تھے۔ ایک اعلیٰ پولیس افسر نے اپنے انٹرویو میں اس بات کا اظہار بھی کیا تھااور ایک انگریزی روزنامہ نے ایسی خبریں بھی شائع کیں، جن میں ہیمنت کرکرے کو جان سے مارنے کا ذکر تھا۔ وہ ٹیلی فون نمبربھی شائع کیا گیا، جس سے دھمکی دی گئی تھی۔ کیا اس سوال پر قطعاً غور کرنے کی ضرورت نہیں ہے کہ آئی ایس آئی یاپاکستانی دہشت گرد شہید ہیمنت کرکرے کو کیوں مارنا چاہتے تھے۔ کیا انہیں مالیگاؤں انویسٹی گیشن سے کوئی پریشانی تھی؟ کیا پاکستانی دہشت گرد اور آئی ایس آئی نہیں چاہتے تھے کہ سادھوی پرگیہ سنگھ، کرنل پروہت اور اپادھیائے کے نام سامنے آئیں؟ کیا 26/11کے دہشت گردوں کو، سمجھوتہ ایکسپریس سانحہ میں ملوث مجرموں کے سامنے آنے سے کوئی تکلیف تھی؟ وہ کیوں نہیں چاہتے تھے کہ آرڈی ایکس کس کے ذریعہ اور کہاں سے دستیاب ہوا، یہ منظرعام پر آئے؟
جب تک ہمارے ذہن میں صرف اور صرف ایک ہی بات نہیں ہوگی کہ ہمیں ہرحال میں اپنے ملک کو دہشت گردی سے پاک کرنا ہے، مجرم کوئی بھی ہو، اسے اس کے کیفرکردار تک پہنچانا ہے، یہ عزم نہیں ہوگا تو خودغرض سیاست کبھی فرقہ پرستی کے ذریعہ، کبھی دہشت گردی کے ذریعہ ہمارے ملک میں تباہی کا کھیل کھیلتی رہے گی اور ہم اس سازش کا شکار بنے رہیں گے۔ بات صرف اتنی سی نہیں ہے کہ دہشت گردی کے تمام واقعات سے ایک مخصوص فرقہ کے لوگوں کو جوڑ دیاجاتا ہے۔ ان کے لےے دلوں میں نفرت پیداکی جارہی ہے، بلکہ اس سچ سے بھی نظریں کیسے چرائیں گے کہ بالآخر ہمارا ملک تباہ ہورہا ہے، بے گناہ انسان دہشت گردی کا شکار ہورہے ہیں اور ہم ترقی اور خوشحالی کی سمت میں آگے بڑھنے کی بجائے ایک منظم دہشت گردی کی گھناؤنی سازش کا شکار ہوتے چلے جارہے ہیں۔ ہمیں یقین ہے کہ جمہوریت کا چوتھا ستون میڈیا اگر یہ عزم کرلے کہ اپنے ملک کو بچانے کے لےے، دہشت گردی کو نیست و نابود کرنے کے لےے بلاتفریق مذہب و ملت جو بھی مجرمانہ چہرے سامنے آئیں گے، انہیں منظرعام پر لائے گا اور اس جنگ کو اس وقت تک جاری رکھے گا، جب تک کہ ’دودھ کا دودھ اور پانی کا پانی‘ واضح طور پر سامنے نہ آجائے… تو ہم امید کرسکتے ہیں کہ ملک دہشت گردی سے بھی پاک ہوگا اور فرقہ وارانہ منافرت بھی ختم ہوگی۔
مکہ مسجد، اجمیر درگاہ دھماکوں کے
ملزم کا منھ ہندو گروپ نے ہمیشہ کے لےے بند کردیا
ابھیشیک شرن
نئی دہلیـ سی بی آئی کو شک ہے کہ مہو کے آر ایس ایس پرچارک سنیل جوشی کا قتل انہی افراد نے کیا تھا، جن کا تعلق ہندو دہشت گردی کے ان کے اپنے نیٹ ورک سے تھا۔ خیال رہے کہ جوشی کا قتل جوکہ مئی 2007میں کئے جانے والے مکہ مسجد بم دھماکوں اور اکتوبر007-کے اجمیر درگاہ بم دھماکوں کے سلسلے میں تفتیشی ایجنسیوں کے شک کے گھیرے میں تھا، 29دسمبر007کو گولی مار کر کیاگیا تھا۔
سی بی آئی کے ایک افسر کے مطابق جوشی کا قتل اس وقت ہوا تھا، جبکہ تحقیقاتی ایجنسیاں ان کے اور ان کے ساتھیوں کے گرد اپنا دائرہ تنگ کرتی جارہی تھیں اور اس کی بنیادی وجہ یہ تھی کہ مکہ مسجد اور اجمیر درگاہ بم دھماکوں میں بھی ویسے ہی آتش گیر مادے کا استعمال کیا گیا تھا، جوکہ چار برس قبل جوشی نے بھوپال کے دینی اجتماع کو نشانہ بنانے کی کوشش کے تحت کیا تھا۔
’’یہی وہ وقت تھا، جب سنیل جوشی کی زبان بند کرنے کی غرض سے اسے ہمیشہ کے لےے خاموش کردیا گیا۔‘‘
ہندوستان ٹائمز نے سب سے پہلے یہ خبر شائع کی تھی کہ جوشی اور اس کے مفرور قریبی ساتھی رام چندر کالسنگارا نے، جوکہ اس کے ساتھ مکہ مسجد اور اجمیردرگاہ کے بم دھماکوں میں ملوث تھا، ان دھماکوں کی پہلی ریہرسل (DRY RUN) 23دسمبر003کو بھوپال میں دینی اجتماع کے شرکاء کو نشانہ بنانے کی اپنی کوشش کے تحت کی تھی۔ ان دونوں کا تیارکردہ یہ بم آر ڈی ایکس اور ٹی این ٹی کا مرکب ہی تھا، جسے 10انچ 3انچ طول وعرض کے ایک دھات والے پائپ میں پیک کیا گیا تھااور اسے ایک موبائل فون سے منسلک کیا گیا تھا، تاکہ موبائل فون پر گھنٹی دے کر اس بم دھماکے کی کارروائی کو انجام دیا جاسکے۔ سی بی آئی کو شبہ ہے کہ ستمبرـ008کے مالیگاؤں بم دھماکے کی ملزمہ پرگیہ سنگھ ٹھاکر سے سنیل جوشی کی مبینہ قربت ہی اس کی موت کا سبب بنی تھی اور ملزمہ سے اس کے قریبی تعلقات اس کے نیٹ ورک کے دیگر ساتھیوں کو قطعی ناپسند تھے۔
پرگیہ ٹھاکر کی ایل ایم ایل فریڈم بائیک کا استعمال، جواس نے جوشی کو دی تھی، کا لسنگارا نے مالیگاؤں کے بم دھماکوں کے لےے کیا تھا۔ مدھیہ پردیش پولیس کو ابتدائی سطح پر یہ شبہ تھا کہ جوشی کا قتل شاید اس بناء پر کیا گیا تھا، کیوں کہ اس پر ایک مقامی کانگریسی سیاستداں اور اس کے بیٹے کے قتل کے سلسلے میں شک کیا جارہا تھا۔ اگرچہ پولیس نے جوشی کے قتل کے سلسلے میں اسٹوڈنٹ اسلامک موومنٹ آف انڈیا کو بھی اپنی چھان بین کے دائرے میں شامل کیا تھا، تاہم پولیس کو اس تنظیم کے خلاف کوئی بھی ثبوت حاصل کرنے میں کامیابی نہیں مل پائی تھی
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آج صبح جب میں دہلی سے شائع انگریزی روزنامہ ’’ہندوستان ٹائمز‘‘ کے صفحہـپر چھپی زیر نظر خبر کو پڑھ رہا تھا تو مجھے یہ احساس ہوا کہ ’روزنامہ راشٹریہ سہارا‘ تو برسوں سے ان تمام واقعات کو منظرعام پر لاتا رہا ہے۔ مکہ مسجد بم بلاسٹ کی بات ہو یا خواجہ معین الدین چشتیؒ کی درگاہ اجمیر کا واقعہ ہو، مالیگاؤں کا بم دھماکہ ہو یا سمجھوتہ ایکسپریس سانحہ، لیکن پولیس اور خفیہ ایجنسیوں نے صحیح مجرموں تک پہنچنے کی سنجیدہ کوشش کی ہی نہیں۔ راقم الحروف نے تواسی وقت حیدرآباد مکہ مسجد میں ہوئے بم دھماکہ کی جگہ پر جاکر اور ہلاک شدگان کے گھروں تک پہنچ کر ان کے اہل خانہ سے ملاقات کی، متعدد عینی شاہدوں سے گفتگو کی اور اسی وقت یہ سچ سامنے آنے لگا کہ جن لوگوں کی گرفتاریاں کی گئی ہیں، ان میں پولیس کا تعصب صاف نظر آتا ہے تو آندھراپردیش کے وزیراعلیٰ وائی ایس آر ریڈی سے ملاقات کی۔ بعد میں کچھ بے گناہ ملزمین کورہائی بھی ملی، لیکن اس وقت اس آواز میں آواز ملانے والے عوام کی سطح تک تو موجود تھے، مگر ہمارے قومی میڈیا نے اس پر اتنی توجہ نہیں دی، جتنی کہ دی جانی چاہےے تھی۔ بہرحال اب اندازفکر بدلنے لگا ہے اور ان خبروں کو بھی جگہ دی جانے لگی ہے، جن میں دہشت گردی کی زد میں فرقہ پرست تنظیموں کے کارکنان وابستہ نظر آتے ہیں۔ زیرنظر خبر سی بی آئی کی جانچ پر مبنی ہے، لہٰذا آج ہم کہہ سکتے ہیں کہ ’روزنامہ راشٹریہ سہارا‘ جن باتوں کی طرف اسی وقت سے اشارہ کرتا رہاتھا، اگر توجہ دی جاتی تو یہ حقیقت بہت پہلے منظرعام پر آسکتی تھی۔
kقارئین کو اچھی طرح یاد ہوگا کہ کانپورکے رہائشی علاقہ میں ایک گھر کے اندر بم بنانے کی فیکٹری چلائی جارہی تھی۔ بجرنگ دل کے دوکارکن موقع پر ہی اس کوشش میں ہلاک ہوئے، لیکن کیا اس کی تہہ تک جاکر یہ جاننے اور سمجھنے کی کوشش کی گئی کہ ان بموں کا استعمال کہاںہونا تھا؟ یہ بم کن کے لےے بنائے جاتے تھے؟ اسی طرح کا واقعہ ناندیڑ اور اڑیسہ میں بھی سامنے آیا۔ انہیں بھی دبانے کی حتی الامکان کوشش کی گئی اور کامیاب کوشش کی گئی، جو کچھ بھی منظرعام پر لایا گیا وہ زیادہ تر اردو اخبارات کے ذریعہ ہی، جس میں اے ٹی ایس اور مقامی پولیس نے معاملہ کو رفع دفع کرنے کی کوشش کو سامنے رکھا گیا، مگر ہماری خفیہ ایجنسیوں نے پوری سچائی کو سامنے لانے کی ضرورت محسوس نہیں کی۔ ہم پھر یہ کہنا چاہیں گے کہ ایک دہشت گرد صرف دہشت گرد ہے، اسے مذہب کے چشمہ سے نہ دیکھا جائے، خواہ اس کا تعلق کسی بھی مذہب سے کیوں نہ ہو۔ مگر ان واقعات کو سامنے رکھ کر کچھ لکھنا اس لےے ضروری لگتا ہے کہ آج پوری دنیا میں دہشت گردی کو اسلام سے جوڑ کر دیکھا جارہا ہے اور بدقسمتی سے ہندوستان میں بھی یہی ہورہا ہے۔ شاید اسی وجہ سے دہشت گردی پر قابو پانا ہمارے لےے بہت مشکل ہوگیا ہے کہ ہم حقائق کا سامنا کرنا ہی نہیں چاہتے۔ اصل مجرموں تک پہنچنا ہی نہیں چاہتے۔ ایسا لگتا ہے کہ ہر بم دھماکہ کے بعد پہلے سے طے شدہ اسکرپٹ پر ہی کام کیا جاتا ہے۔ بس کچھ نام بدل جاتے ہیں، کچھ مقام بدل جاتے ہیں۔ نتیجہ بٹلہ ہاؤس انکاؤنٹر جیسے واقعات کی شکل میں سامنے آتا ہے، جس پر آج تک مرکزی حکومت کوئی واضح موقف اختیار نہیں کرسکی ہے۔ بھلے ہی حکمراں جماعت کانگریس کے جنرل سکریٹری اور ترجمان دگ وجے سنگھ خود اس انکاؤنٹر پر سوال اٹھاتے رہے ہوں۔
گزشتہ چند روز سے میں اپنے اس قسط وار کالم میں کشمیر کے موضوع پر گفتگو کررہا تھا۔ بیشک ابھی بھی اس سلسلہ کو جاری رکھنے کی ضرورت ہے اور انشاء اللہ رہے گی، لیکن تازہ انکشافات کی روشنی میں مجھے یہ ضروری لگتا ہے کہ کل سے کچھ روز تک دہشت گردی کے اس مخصوص چہرے کو سامنے رکھا جائے اور ایک بار پھر اس سوال پر سنجیدگی کے ساتھ غور کیا جائے کہ شہید ہیمنت کرکرے کے دہشت گردانہ حملہ میں مارے جانے کا مکمل سچ کیا ہے۔
اگر وہ اس 26/11کے دہشت گردانہ حملہ کا شکار ہوئے، جو ہندوستان کی سالمیت پر اب تک کا سب سے بڑا حملہ تھا تو پھر اسے ایک حیران کن اتفاق ہی کہا جائے گا کہ 26/11سے چند روز قبل شہیدہیمنت کرکرے اپنی جان کو خطرہ محسوس کررہے تھے۔ انہیں فون پر دھمکیاں دی جارہی تھیں۔ آخر وہ کون تھے اور کیوں ان کی جان لینا چاہتے تھے۔ ایک اعلیٰ پولیس افسر نے اپنے انٹرویو میں اس بات کا اظہار بھی کیا تھااور ایک انگریزی روزنامہ نے ایسی خبریں بھی شائع کیں، جن میں ہیمنت کرکرے کو جان سے مارنے کا ذکر تھا۔ وہ ٹیلی فون نمبربھی شائع کیا گیا، جس سے دھمکی دی گئی تھی۔ کیا اس سوال پر قطعاً غور کرنے کی ضرورت نہیں ہے کہ آئی ایس آئی یاپاکستانی دہشت گرد شہید ہیمنت کرکرے کو کیوں مارنا چاہتے تھے۔ کیا انہیں مالیگاؤں انویسٹی گیشن سے کوئی پریشانی تھی؟ کیا پاکستانی دہشت گرد اور آئی ایس آئی نہیں چاہتے تھے کہ سادھوی پرگیہ سنگھ، کرنل پروہت اور اپادھیائے کے نام سامنے آئیں؟ کیا 26/11کے دہشت گردوں کو، سمجھوتہ ایکسپریس سانحہ میں ملوث مجرموں کے سامنے آنے سے کوئی تکلیف تھی؟ وہ کیوں نہیں چاہتے تھے کہ آرڈی ایکس کس کے ذریعہ اور کہاں سے دستیاب ہوا، یہ منظرعام پر آئے؟
جب تک ہمارے ذہن میں صرف اور صرف ایک ہی بات نہیں ہوگی کہ ہمیں ہرحال میں اپنے ملک کو دہشت گردی سے پاک کرنا ہے، مجرم کوئی بھی ہو، اسے اس کے کیفرکردار تک پہنچانا ہے، یہ عزم نہیں ہوگا تو خودغرض سیاست کبھی فرقہ پرستی کے ذریعہ، کبھی دہشت گردی کے ذریعہ ہمارے ملک میں تباہی کا کھیل کھیلتی رہے گی اور ہم اس سازش کا شکار بنے رہیں گے۔ بات صرف اتنی سی نہیں ہے کہ دہشت گردی کے تمام واقعات سے ایک مخصوص فرقہ کے لوگوں کو جوڑ دیاجاتا ہے۔ ان کے لےے دلوں میں نفرت پیداکی جارہی ہے، بلکہ اس سچ سے بھی نظریں کیسے چرائیں گے کہ بالآخر ہمارا ملک تباہ ہورہا ہے، بے گناہ انسان دہشت گردی کا شکار ہورہے ہیں اور ہم ترقی اور خوشحالی کی سمت میں آگے بڑھنے کی بجائے ایک منظم دہشت گردی کی گھناؤنی سازش کا شکار ہوتے چلے جارہے ہیں۔ ہمیں یقین ہے کہ جمہوریت کا چوتھا ستون میڈیا اگر یہ عزم کرلے کہ اپنے ملک کو بچانے کے لےے، دہشت گردی کو نیست و نابود کرنے کے لےے بلاتفریق مذہب و ملت جو بھی مجرمانہ چہرے سامنے آئیں گے، انہیں منظرعام پر لائے گا اور اس جنگ کو اس وقت تک جاری رکھے گا، جب تک کہ ’دودھ کا دودھ اور پانی کا پانی‘ واضح طور پر سامنے نہ آجائے… تو ہم امید کرسکتے ہیں کہ ملک دہشت گردی سے بھی پاک ہوگا اور فرقہ وارانہ منافرت بھی ختم ہوگی۔
مکہ مسجد، اجمیر درگاہ دھماکوں کے
ملزم کا منھ ہندو گروپ نے ہمیشہ کے لےے بند کردیا
ابھیشیک شرن
نئی دہلیـ سی بی آئی کو شک ہے کہ مہو کے آر ایس ایس پرچارک سنیل جوشی کا قتل انہی افراد نے کیا تھا، جن کا تعلق ہندو دہشت گردی کے ان کے اپنے نیٹ ورک سے تھا۔ خیال رہے کہ جوشی کا قتل جوکہ مئی 2007میں کئے جانے والے مکہ مسجد بم دھماکوں اور اکتوبر007-کے اجمیر درگاہ بم دھماکوں کے سلسلے میں تفتیشی ایجنسیوں کے شک کے گھیرے میں تھا، 29دسمبر007کو گولی مار کر کیاگیا تھا۔
سی بی آئی کے ایک افسر کے مطابق جوشی کا قتل اس وقت ہوا تھا، جبکہ تحقیقاتی ایجنسیاں ان کے اور ان کے ساتھیوں کے گرد اپنا دائرہ تنگ کرتی جارہی تھیں اور اس کی بنیادی وجہ یہ تھی کہ مکہ مسجد اور اجمیر درگاہ بم دھماکوں میں بھی ویسے ہی آتش گیر مادے کا استعمال کیا گیا تھا، جوکہ چار برس قبل جوشی نے بھوپال کے دینی اجتماع کو نشانہ بنانے کی کوشش کے تحت کیا تھا۔
’’یہی وہ وقت تھا، جب سنیل جوشی کی زبان بند کرنے کی غرض سے اسے ہمیشہ کے لےے خاموش کردیا گیا۔‘‘
ہندوستان ٹائمز نے سب سے پہلے یہ خبر شائع کی تھی کہ جوشی اور اس کے مفرور قریبی ساتھی رام چندر کالسنگارا نے، جوکہ اس کے ساتھ مکہ مسجد اور اجمیردرگاہ کے بم دھماکوں میں ملوث تھا، ان دھماکوں کی پہلی ریہرسل (DRY RUN) 23دسمبر003کو بھوپال میں دینی اجتماع کے شرکاء کو نشانہ بنانے کی اپنی کوشش کے تحت کی تھی۔ ان دونوں کا تیارکردہ یہ بم آر ڈی ایکس اور ٹی این ٹی کا مرکب ہی تھا، جسے 10انچ 3انچ طول وعرض کے ایک دھات والے پائپ میں پیک کیا گیا تھااور اسے ایک موبائل فون سے منسلک کیا گیا تھا، تاکہ موبائل فون پر گھنٹی دے کر اس بم دھماکے کی کارروائی کو انجام دیا جاسکے۔ سی بی آئی کو شبہ ہے کہ ستمبرـ008کے مالیگاؤں بم دھماکے کی ملزمہ پرگیہ سنگھ ٹھاکر سے سنیل جوشی کی مبینہ قربت ہی اس کی موت کا سبب بنی تھی اور ملزمہ سے اس کے قریبی تعلقات اس کے نیٹ ورک کے دیگر ساتھیوں کو قطعی ناپسند تھے۔
پرگیہ ٹھاکر کی ایل ایم ایل فریڈم بائیک کا استعمال، جواس نے جوشی کو دی تھی، کا لسنگارا نے مالیگاؤں کے بم دھماکوں کے لےے کیا تھا۔ مدھیہ پردیش پولیس کو ابتدائی سطح پر یہ شبہ تھا کہ جوشی کا قتل شاید اس بناء پر کیا گیا تھا، کیوں کہ اس پر ایک مقامی کانگریسی سیاستداں اور اس کے بیٹے کے قتل کے سلسلے میں شک کیا جارہا تھا۔ اگرچہ پولیس نے جوشی کے قتل کے سلسلے میں اسٹوڈنٹ اسلامک موومنٹ آف انڈیا کو بھی اپنی چھان بین کے دائرے میں شامل کیا تھا، تاہم پولیس کو اس تنظیم کے خلاف کوئی بھی ثبوت حاصل کرنے میں کامیابی نہیں مل پائی تھی
कब तक नहीं पहचानेंगे हम अस्ल आतंकवादियों और उनकी योजनाओं को
अज़ीज़ बर्नी

कोई आश्चर्य नहीं हुआ मुझे उस समय जब उपराष्ट्रपति जनाब हामिद अंसारी साहब की हत्या करने के षड़यंत्र का रहस्योदघाटन हुआ। दरअसल हमें संघ परिवार के पोषित नाथुराम गोडसे के हाथों महात्मा गांधी की हत्या के बाद ही समझ लेना चाहिए था कि देश की आज़ादी का अर्थ साम्प्रदायिक शक्तियों के लिए क्या है और उनके मन में कैसे भारत की कल्पना है, और अपनी इस कल्पना को वास्तविकता में बदलने के लिए वह कैसी कैसी ख़तरनाक योजनाएं बना सकते हैं, कितनी क़ीमती जानें ले सकते हैं, परंतु अफ़सोस कि हम नहीं समझ सके उनकी इस मानसिकता को इसलिए कि उस समय देश के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल थे, जिनका नेतृत्व महात्मा गांधी के हत्यारों की सुरक्षा के लिए अधिक चिंतित था, महात्मा गांधी के जीवन को फाशिस्ट ताक़तों से बचाने के लिए कम। हमें बार बार लिखना पड़ता है उस समय के हालात को, सरदार पटेल के दृष्टिकोण को, संघ परिवार के कारनामों को, इसलिए कि जिस तरह उन सभी घटनाओं को आज़ादी के फौरन बाद से दबाने का प्रयास लगातार किया जाता रहा है, वह इतना अधिक है कि अगर हम इन तमाम तथ्यों को सौ बार सामने लाएं तब भी पूरा भारत इन तमाम तथ्यों से अवगत हो पाएगा, यह विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता ह्न परंतु वातावरण अब कुछ बदलता नज़र आ रहा है। ऐसे सभी समाचार जिन्हें या तो स्थान ही नहीं मिलता था या अगर कुछ स्थान मिल भी जाता था तो इस तरह कि उन्हें प्रकाशित तो कर दिया जाता परंतु वह पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाते। परिणाम आतंकवाद की सभी घटनाओं को एक विशेष समुदाय से जोड़ कर ही प्रस्तुत किया जाता रहा, क्योंकि केवल ऐसी ही ़ख़बरें प्रमुखता के साथ जगह पाती रहीं जिनमें आतंकवादी मुसलमान दिखाई देते हों, उन्हीं नामों की पब्लिसिटी की जाती रही, जिनका संबंध एक विशेष धर्म से रहा। परंतु सच सात पर्दों में हो तब भी एक दिन बाहर आ ही जाता है।
आज सुबह जब मैं दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेज़ी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स के पृष्ठ 8 पर प्रकाशित इस ख़बर को पढ़ रहा था तो मुझे यह एहसास हुआ कि ‘रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा’ तो वर्षों से इन सभी घटनाओं को सामने लाता रहा है। मक्का मस्जिद बम ब्लास्ट की बात हो या ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की घटना, मालेगांव का बम धमाका हो या समझौता एक्सप्रेस की त्रासदि, परंतु पुलिस और गुप्तचर एजेंसियों ने सही अपराधियों तक पहुंचने के गंभीर प्रयास किए ही नहीं। लेखक ने तो उसी समय हैदराबाद मक्का मस्जिद में हुए बम धमाका के स्थान पर जाकर और मृतकों के घरों तक पहुंच कर उनके परिवार वालों से भेंट की, कई ऐनी शाहिदों से गुफ्तगू की और उसी समय यह सच सामने आने लगा कि जिन लोगों की गिरफ़्तारियां की गई हैं, उनमें पुलिस का पक्षपात साफ़ नज़र आता है तो आंध्र प्रदेश के मुख्य मंत्री वाई॰एस॰आर रेड्डी से भेंट की। बाद में कुछ बेगुनाह अभियुक्तों को रिहाई भी मिली, परंतु उस समय इस आवाज़ में आवाज़ मिलाने वाले जनता के स्तर तक तो मौजूद थे, मगर हमारे राष्ट्रीय मीडिया ने उस पर इतना ध्यान नहीं दिया, जितना कि देना चाहिए था। बहरहाल अब सोचने का ढंग बदलने लगा है और उन समाचारों को भी जगह दी जाने लगी है जिनमें आतंकवाद की लपेट में साम्प्रदायिक संगठनों के सदस्य जुड़े नज़र आते हैं। निम्नलिखित समाचार सीबीआई की जांच पर आधारित है इसलिए आज हम कह सकते हैं रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा जिन बातों की ओर उसी समय से इशारा करता रहा था, अगर ध्यान जाता तो यह हक़ीक़त बहुत पहले सामने आ सकती थी।
पाठकों को अच्छी तरह याद होगा कि कानपुर के आवासीय क्षेत्र में एक घर के अंदर बम बनाने की फैक्ट्री चलाई जा रही थी। बजरंग दल के दो सदस्य घटना स्थल पर ही इस प्रयास में हताहत हुए, लेकिन क्या उसकी तह तक जाकर यह जानने और समझने का प्रयास किया गया कि इन बमों का प्रयोगा कहां होना था? यह बम किन के लिए बनाए जाते थे? इसी तरह की घटना नांदेड़ और उड़ीसा में भी सामने आई, उन्हें भी दबाने का यथासंभव प्रयास किया गया और सफल प्रयास किया गया, जो कुछ भी सामने लाया गया वह अधिकांश उर्दू अख़बारों द्वारा ही, जिसमें एटीएस और स्थानीय पुलिस ने मामले को रफ़ा-दफ़ा करने का प्रयास किया गया, परंतु हमारी गुप्तचर एजेंसियों ने पूरी सच्चाई को सामने लाने की ज़रूरत महसूस नहीं की। हम फिर यह कहना चाहेंगे कि एक आतंकवादी केवल आतंकवादी है, उसे धर्म के चश्मे से न देखा जाए, चाहे उसका संबंध किसी भी धर्म से क्यों न हो। मगर इन घटनाओं को सामने रख कर कुछ लिखना इसलिए आवश्यक लगता है कि आज पूरी दुनिया में आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ कर देखा जा रहा है और दुर्भाग्य से भारत में भी यही हो रहा है। शायद इसी कारण से आतंकवाद पर क़ाबू पाना हमारे लिए बहुत कठिन हो गया है कि हम तथ्यों का सामना करना ही नहीं चाहते। असल अपराधियों तक पहुंचना ही नहीं चाहते। ऐसा लगता है कि हर बम धमाका के बाद पहले से निर्धारित स्क्रिप्ट पर ही काम किया जाता है। बस कुछ नाम बदल जाते हैं, कुछ स्थान बदल जाते हैं। परिणाम बटला हाऊस एन्काउन्टर जैसी घटनाओं के रूप में सामने आता है जिस पर आज तक केंद्रीय सरकार कोई स्पष्ट स्टैंड नहीं ले सकी है। भले ही शासक दल कांगे्रस के महासचिव और प्रवक्ता दिग्विजय सिंह स्वयं इस एन्काउंटर पर प्रश्न उठाते रहे हों।
पिछले कुछ दिनों से मैं अपने इस क़िस्तवार काॅलम में कश्मीर के ईशू पर गुफ़्तगू कर रहा था। निःसंदेह अभी भी इस सिलसिले को जारी रखने की ज़रूरत है और इन्शाअल्लाह रहेगा भी। परंतु वर्तमान रहस्योदघाटनों की रोशनी में मुझे यह आवश्यक लगता है कि कल से कुछ दिनों तक आतंकवाद के इस विशेष चेहरे को सामने रखा जाए और एक बार फिर इस प्रश्न पर गंभीरता के साथ विचार किया जाए कि शहीद हेमंत करकरे के आतंकवादी हमलों में मारे जाने का सम्पूर्ण सच क्या है।
अगर वह इस 26/11 के आतंकवादी हमले का शिकार हुए हैं, जो भारत की अखंडता पर अब तक का सबसे बड़ा हमला था तो फिर इसे आश्चर्यजनक संयोग ही कहा जाएगा कि 26/11 से कुछ दिन पूर्व शहीद हेमंत करकरे अपनी जान को ख़तरा महसूस कर रहे थे। उन्हें फोन पर धमकियां दी जा रही थीं। आख़िर वह कौन थे और क्यों उनकी जान लेना चाहते थे। एक उच्च पुलिस अधिकारी ने अपने इंटरव्यू में इस बात का उल्लेख भी किया था और एक अंग्रेज़ी दैनिक ने ऐसी ख़बरें भी प्रकाशित कीं जिनमें हेमंत करकरे को जान से मारने का उल्लेख था। वह टेलीफोन नम्बर भी प्रकाशित किया गया जिससे धमकी दी गई थी। क्या इस प्रश्न पर बिल्कुल विचार करने की आवश्यकता नहीं है कि आईएसआई या पाकिस्तानी आतंकवादी शहीद हेमंत करकरे को क्यों मारना चाहते थे। क्या उन्हें मालेगांव इन्वेस्टिगेशन से कोई परेशानी थी? क्या पाकिस्तानी आतंकवादी और आईएसआई नहीं चाहते थे कि साध्वी प्रज्ञा सिंह, कर्नल प्रोहित और उपाध्याय के नाम सामने आएं? क्या 26/11 के आतंकवादियों को, समझौता एक्सप्रेस त्रासदि में लिप्त अपराधियों के सामने आने से क्या कष्ट था? वह क्यों नहीं चाहते थे कि आरडीएक्स किसके द्वारा और कहां से उपलब्ध हुआ, यह सामने आए?
जब तक हमारे मन में केवल और केवल एक ही बात नहीं होगी कि हमें हर हाल में अपने देश को आतंकवाद से पाक करना है, अपराधी कोई भी हो, उसे उसके परिणाम तक पहुंचाना है, यह संकल्प नहीं होगा, तो ख़ुदग़र्ज़ राजनीति कभी साम्प्रदायिकता के माध्यम से कभी आतंकवाद के माध्यम से हमारे देश में तबाही का खेल खेलती रहेगी और हम इस साज़िश का शिकार बने रहेंगे। बात केवल इतनी ही नहीं है कि आतंकवाद की तमाम घटनाओं से एक विशेष समुदाय के लोगों को जोड़ दिया जाता है, उनके लिए दिलों में घृणा पैदा की जा रही है बल्कि इस सच से भी नज़रें कैसे चुराएंगे कि अंततः हमारा देश तबाह हो रहा है, बेगुनाह इन्सान आतंकवाद का शिकार हो रहे हैं और हम प्रगति तथा उन्नति की ओर आगे बढ़ने की बजाए एक सुनियोजित आतंकवाद की घिनौनी साज़िश का शिकार होते चले जा रहे हैं। हमें विश्वास है कि लोकतंत्र का चैथा स्तंभ मीडिया अगर यह संकल्प कर ले कि अपने देश को बचाने के लिए, आतंकवाद को नेस्तो नाबूद करने के लिए, बिना धर्म और समुदाय का भेदभाव किए जो भी आपराधिक चेहरे सामने आएंगे, उन्हें सामने लाएगा और इस जंग को उस समय तक जारी रखेगा जब तक कि दूध का दूध और पानी का पानी स्पष्ट रूप से सामने न आज जाए ह्न तो हम आशा कर सकते हैं कि देश आतंकवाद से भी पाक होगा और साम्प्रदायिक घृणा भी समाप्त होगी।
मक्का मस्जिद, अजमेर दरगाह धमाकों के
अभियुक्त का मुंह हिंदू ग्रूप ने हमेशा के लिए बंद कर दिया
अभिषेक शरण
नई दिल्ली- सीबीआई को संदेह है कि मऊ के आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी की हत्या उन्हीं लोगों ने की थी जिनका संबंध हिंदू आतंकवाद के उनके अपने नेटवर्क से था। ख़याल रहे कि जोशी की हत्या मई 2007 में किए जाने वाले मक्का मस्जिद बम धमाकों और अक्तूबर 2007 के अजमेर दरगाह बम धमाकों के सिलसिले में जांच एजेंसियों के संदेह के घेरे में था, 29 दिसम्बर 2007 को गोली मार कर की गई थी।
सीबीआई के एक अधिकारी के अनुसार जोशी की हत्या उस समय हुई थी, जबकि जांच एजेंसिया उनके और उनके साथियों के गिर्द अपना घेरा तंग करती जा रही थीं और उसका बुनियादी कारण यह था कि मक्का मस्जिद और अजमेर दरगाह बम धमाकों में भी वैसी ही ज्वलंत सामग्री का प्रयोग किया गया था, जोकि 4 वर्ष पूर्व जोशी ने भोपाल के धार्मिक इजतेमा को निशाना बनाने के प्रयास के तहत किया था।
‘यही वह समय था, जब सुनील जोशी की ज़ुबान बंद करने की ग़र्ज़ से उसे हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया गया।’ हिंदुस्तान टाइम्स ने सबसे पहले यह ख़बर प्रकाशित की थी कि जोशी और उसके भगौड़े निकटवर्ती साथी रामचंद्र कालसंगारा ने, जोकि उसके साथ मक्का मस्जिद और अजमेर दरगाह के बम धमाकों में लिप्त था, इन धमाकों की पहली रिहरसल ;कतलतनदद्ध 23 दिसम्बर 2003 को भोपाल में धार्मिक इजतेमा में भाग लेने वालों को निशाना बनाने के अपने प्रयास के तहत की थी। इन दोनों का बनाया हुआ यह बम आरडीएक्स और टीएनटी का मिश्रण ही था, जिसे 10ग्3 इंच आकार के एक धातु वाले पाइप में पैक किया गया था और उसे एक मोबाइल फोन से जोड़ दिया गया था ताकि मोबाइल फोन पर घंटी देकर इस बम धमाके की कार्यवाही को अंजाम दिया जा सके। सीबीआई को संदेह है कि सितम्बर 2008 के मालेगांव बम धमाके की अभियुक्त प्रज्ञा सिंह ठाकुर से सुनील जोशी की कथित निकटता ही उसकी मृत्यु का कारण बनी थी और अभियुक्त से उसके निकटवर्तीय संबंध उसके नेटवर्क के अन्य साथियों को बिल्कुल पसंद नहीं थे।
प्रज्ञा ठाकुर की एलएमएल फ्ऱीडम बाइक का प्रयोग, जो उसने जोशी को दी थी, कालसंगारा ने मालेगांव के बम धमाकों के लिए किया था। मध्य प्रदेश पुलिस को आरंभिक स्तर पर यह संदेह था कि जोशी की हत्या शायद इस आधार पर की गई थी क्योंकि उस पर एक स्थानीय कांग्रेसी राजनीतिज्ञ और उसके बेटे की हत्या के सिलसिले में संदेह किया जा रहा था। अगर्चे पुलिस ने जोशी की हत्या के संबंध में स्टुडेंट्स इस्लामि मूवमेंट आॅफ इंडिया को भी अपनी जांच के दायरे में शामिल किया था, यद्यपि पुलिस को इस संगठन के विरुद्ध कोई भी प्रमाण प्राप्त करने में सफलता नहीं मिल पाई थी।
ملائم سنگھ کی معافی-سیکولرزم کی جیت
عزیز برنی
عنوان کا انتخاب کرتے وقت میں نے ذرا تکلف سے کام لیا۔ اگر میں یوں لکھتا کہ ملائم سنگھ کی معافی ’روزنامہ راشٹریہ سہارا‘ یا میری تحریک کی کامیابی ہے تو بھی غلط نہ ہوتا، مگر میری یہ تنگ نظری ہوتی۔ دراصل عنوان ہونا چاہےے تھا ’’ملائم سنگھ یادو کی معافیـ مسلمانوں کی کامیابی‘‘۔ ہاں، یہی صحیح تھا، پھر بھی میں نے عنوان دیا ’’ملائم سنگھ کی معافیـسیکولرزم کی جیت‘‘، اس لےے کہ میں ملک کے سیکولرزم کو مضبوط ہوتے ہوئے دیکھنا چاہتا ہوں اور ملائم سنگھ کی معافی کو بھی اسی زاوےے سے دیکھ رہا ہوں۔ میری یادداشت میں یہ پہلا موقع ہے کہ جب مسلمانوں کی مستقل مزاجی نے کسی بڑے سیاستداں کو اس طرح اپنا موقف بدلنے کے لےے مجبور کیا۔ ہم مسلمانوں کے سیاست میں مقام کو ذہن میں رکھتے ہوئے اسے ایک خوش آئند پیغام سمجھ سکتے ہیں۔ میرا خیال ہے ہمیں کھلے دل کے ساتھ ملائم سنگھ یادو کے معافی نامہ کو قبول کرلینا چاہےے، تاکہ وہ تمام سیکولر سیاستداں جن کے نزدیک کبھی مسلمان رہا، مگر ان کے مزاج میں تبدیلی آنے پر الگ ہوگیا، وہ یہ احساس کرسکیں کہ ان سے کب اور کہاں غلطی ہوئی …اور پھر اسی طرح اپنے فیصلوں پر نظرثانی کے لےے مجبور ہوں، ساتھ ہی اب دیکھنا یہ بھی ہے کہ ملائم سنگھ یادو اپنی اس معذرت کے بعد کیا واقعی پھر سے مسلمانوں کے مسائل میں دلچسپی لیتے ہیں۔ پارلیمنٹ اور اسمبلی میں ان کی ترجمانی کا ارادہ رکھتے ہیں یا پھر یہ اپنی گھٹتی ہوئی سیاسی طاقت سے مجبور ہوکر کیا گیا ایک فیصلہ ہے۔
گزشتہ پارلیمانی الیکشن سے قبل ملائم سنگھ یادو نے جب کلیان سنگھ کا دامن تھاما تو روزنامہ راشٹریہ سہارا میں اپنے مضامین کے ذریعہ ہم نے ان کی سخت مخالفت کی تھی، اس لےے کہ ملائم سنگھ یادو کا ماضی ہمارے سامنے تھا، جنہیں ہم نے ہمیشہ مسلمانوں کا ہمدرد پایا۔ اچانک ان کے مزاج میں آئی تبدیلی سے ہم پریشان بھی تھے اورحیران بھی۔ بارہا ہم نے یہ احساس دلانے کی کوشش کی کہ ملائم سنگھ یادو کا ماضی اور ان کی پارٹی کا سیکولر مزاج انہیں ایسے کسی بھی قدم کی اجازت نہیں دیتا۔ بہت بہتر ہوتا، اگر اسی وقت انہوں نے اپنے فیصلے پر نظرثانی کرلی ہوتی، لیکن دیر سے ہی کیا گیا ، ان کا یہ ایک درست فیصلہ ہے۔ اتنا تو وہ بھی سمجھتے ہوں گے کہ اگر اس تاخیر کا کوئی نقصان پہنچا تو خود انہیںہی، مسلمانوں کو نہیں۔ ہاں، البتہ کانگریس کو اس کا فائدہ ضرور ہوا۔ جہاں تک مسلمانوں کو سیاست میں اپنا کھویا ہوا وقار حاصل کرنے کی بات ہے تو ہمیں لگتا ہے کہ اس کے لےے سیکولر طاقتوں کا مضبوط ہونا بیحد ضروری ہے۔ کانگریس کی تمام خامیوں کے باوجود اس کا ساتھ دینے کے پیچھے اگر کوئی وجہ تھی تو صرف یہ کہ فرقہ پرست طاقتوںکو برسراقتدار آنے سے روکنا تھا۔ کانگریس آج بھی جہاں فرقہ پرست طاقتوں کو تنہا روکنے کی حیثیت رکھتی ہے، اس پر توجہ دی جاسکتی ہے، مگر ملک میں سیکولرزم کو مضبوط کرنے کے لےے یہ بھی ضروری ہے کہ کانگریس کے علاوہ جو دیگر سیکولر سیاستداں یا سیاسی پارٹیاں ہیں، انہیں بھی کمزور نہ ہونے دیاجائے۔ ہاں، مگر کسی حالت میں بھی ووٹ کی تقسیم فرقہ پرستوں کو مضبوط نہ ہونے دے، اس کا خاص خیال رکھنا بیحد ضروری ہے۔
بہار میں نریندر مودی کی آمد سے قبل نتیش کمار کے معاملے میں بھی رائے یہی تھی کہ وہ سیکولر مزاج رکھتے ہیں اور ابھی بھی ان سے امیدیں ختم نہیں کی جانی چاہئیں، مگر بہار میں بھارتیہ جنتا پارٹی کو کسی کے سہارے بھی مضبوط ہونے کا موقع ملتا ہے تو آنے والے وقت میں ہمیں اس کی بڑی قیمت چکانی پڑسکتی ہے۔ اگر ہم ماضی میں کئے گئے اپنے ایک غلط فیصلہ کا تجزیہ کریں تو اس تلخ حقیت کو سمجھنے میں زیادہ دیر نہیں لگے گی کہ وشوناتھ پرتاپ سنگھ کے بھارتیہ جنتا پارٹی کا دامن تھامنے اور مسلمانوں کے سامنے اپنا سیکولر چہرہ پیش کرکے اس کے لےے ووٹ مانگنے اور اسے اقتدار تک پہنچانے کا جو کام انہوں نے کیاتھا، اس کا خمیازہ مسلمان آج تک بھگت رہا ہے اور نہ جانے کب تک اسے بھگتنا ہوگا۔ آج کانگریس بیشک ایک سیکولر سیاسی پارٹی کی شکل میں حکمراں ہے، مگر بھارتیہ جنتا پارٹی نے اپنے دوراقتدار میں وشوناتھ پرتاپ سنگھ کے وزیراعظم بننے کے دور سے لے کر 2004میں اٹل بہاری واجپئی کے و زیراعظم رہنے تک جب جب بھی اسے موقع ملا، اس نے اپنے ’کمیونل انجینئرنگ ‘Communal Engineering)کے فارمولہ کے ذریعہ بیوروکریسی اور فوج سمیت تقریباً تمام شعبوں میں ایسے عناصر داخل کردئے کہ اب کوئی بھی سرکار آسانی کے ساتھ اپنے تمام فیصلوں کو آسانی سے عملی جامہ نہیں پہناسکتی۔ یہی وجہ ہے کہ آج ملک کے وزیرداخلہ لال کرشن اڈوانی نہیں ہیں، مگر وہ چاہے شیوراج پاٹل رہے ہوں یا پی چدمبرم، مسلمانوں کے تئیں مزاج میں کوئی خاص تبدیلی نظر نہیں آتی۔ بم دھماکوں کی تعداد میں کمی ضرور آئی ہے، مسلم نوجوانوں کو دہشت گرد بتا کر انکاؤنٹر میں مار دئے جانے کی رفتار میں کمی ضرور آئی ہے، مگر یہ سلسلہ ختم ہوگیا ہے، اب دہشت گردی کے الزام میں پھنسائے گئے بے گناہوں کو انصاف ملنے لگا ہے، یہ کہنا بہت مشکل ہے۔ آج بھی ہمارے سامنے ایسی مثالیں موجود ہیں کہ کانگریس پارٹی کے سینئر لیڈر دگ وجے سنگھ واضح طور پر کہتے ہیں کہ ’بٹلہ ہاؤس انکاؤنٹر صحیح نہیں تھا اور سر پر پانچ گولیاں نہیں لگ سکتی تھیں‘، باوجود اس حقیقت بیانی اور تمام سیکولر پارٹیوں کے مطالبات کے سرکار ایماندارانہ جانچ کا فیصلہ نہیں لے سکی۔ کیا فرق رہا پی چدمبرم اور شیوراج پاٹل میں؟ آج بھی ہم ڈیوڈکولمین ہیڈلی جو ہندوستان میں سب سے بڑے دہشت گردانہ حملہ کا کلیدی مجرم ہے، اس کے ذریعہ عشرت جہاں کو لشکرطیبہ کا ایجنٹ بتادینے پر اس کی تشہیر کرتے ہیں اور یہ ثابت کرنے میں جٹ جاتے ہیں کہ گویا نریندرمودی سرکار جو کہہ رہی تھی وہ سچ تھا اور ایف بی آئی و لشکرطیبہ کا مشترکہ ایجنٹ جو کہہ رہا ہے وہ سچ ہے۔
بہرحال ہم ذکر کررہے تھے ملائم سنگھ یادو کا کھلے دل کے ساتھ مسلمانوں سے معافی مانگنے کا۔ تو ہم بیحد ادب کے ساتھ ان کی خدمت میں یہ عرض کرنا چاہتے ہیں کہ اب وقت بدل گیا ہے، اب ہم وعدوں اور جذبات کے سہارے فیصلہ لینے کا سلسلہ بند کرچکے ہیں اور صرف اس بات کے لےے کہ فلاں شخص یا پارٹی نے فرقہ پرست طاقتوں سے ٹکرانے کا اعلان کیا ہے، اب ہمارے ساتھ کھڑے ہونے کی وجہ نہیں بن سکتا۔ سیاست میں "Give, and Take"، یعنی اس ہاتھ لے، اس ہاتھ دے کی روش اب بالکل عام ہوگئی ہے، اسے صاف لفظوں میں ’سودا‘ بھی کہا جاسکتا ہے، لہٰذا ہم بھی ملائم سنگھ یادو کے سامنے ایسی ہی کچھ شرائط رکھیں تو بیجا نہ ہوگا کہ اگر انہیں ہماری حمایت درکار ہے، وہ کھوئی ہوئی اپنی سیاسی طاقت کو پھر سے حاصل کرنے کے لےے مسلمانوں کی مدد چاہتے ہیں تو الیکشن کے بعد وہ مسلمانوں کے لےے کیا کریں گے، یہ تو بہت بعد کی بات ہے۔ انہیں ابھی طے کرنا ہوگا کہ کیا آج وہ مسلمانوں کا اتنے ہی کھلے دل سے ساتھ دینے کے لےے تیار ہیں، جتنے کھلے دل سے انہوں نے معافی مانگی ہے یا پھر یہ محض ایک سیاسی حکمت عملی ہے، جیسا کہ ان کے کچھ مخالفین کہہ رہے ہیں۔ کیا وہ پارلیمنٹ میں مسلم مسائل پر آواز اٹھانے کا فیصلہ لینے کے لےے تیار ہیں؟ کشمیر میں دہشت گردی کی آڑ لے کر جو خونریزی کی جارہی ہے، 9سال تک کے بچوں کو ہلاک کیا جارہا ہے، کیا ان کی پارٹی پارلیمنٹ میں اس کے خلاف آواز بلند کرنے کے لےے تیار ہے؟ امرناتھ یاترا جو لال کرشن اڈوانی رتھ یاترا کی طرز پر پھر سے فرقہ وارانہ منافرت کی وجہ بنتی نظر آرہی ہے، کیا وہ اور ان کی پارٹی اس معاملہ میں حقیقت کو بے نقاب کرنے کا ارادہ رکھتی ہے؟ جس طرح یکے بعد دیگرے سنگھ پریوار کے کارنامے سامنے آنے لگے ہیں، دہشت گردی میں جن ہندوفرقہ پرست تنظیموں کے نام سامنے آنے لگے ہیں، کیا ملائم سنگھ اور ان کی پارٹی پارلیمنٹ کے اندر اور باہر ان کے خلاف آواز بلند کرنے کا ارادہ رکھتے ہیں؟ بٹلہ ہاؤس سمیت دیگر متعدد انکاؤنٹرس یا بم دھماکوں میں ملوث ہونے کا الزام لگا کر، جن بے گناہ نوجوانوں کو جیل کی سلاخوں کے پیچھے ڈال دیا گیا ہے، کیا انہیں انصاف دلانے کا عزم رکھتے ہیں؟ بیشک اگر ان میں سے کچھ واقعی گنہگار ہیں تو انہیں سزا دلانے سے بھی گریز نہ کریں۔(تفصیلات ہم مہیا کریں گے) مسلمانوں کی تعلیمی درسگاہوں کو دہشت گردی کا اڈہ بتانے کی جو مہم سنگھ پریوار نے شروع کی ہے، کیا اس کے دفاع میں وہ اور ان کی پارٹی کھڑے ہونے کا ارادہ رکھتی ہے؟ یہ اس لےے بھی ضروری ہے کہ مسلمانوں کے دینی مدارس اور ان کی کارکردگی سے وہ بخوبی واقف ہیں اور ان مدارس نے بارہا بے غرض ان کا ساتھ دیا ہے۔ علی گڑھ مسلم یونیورسٹی اور جامعہ ملیہ اسلامیہ کے اقلیتی کردار کا معاملہ ابھی تک التوا میں ہے، کیا وہ پارلیمنٹ میں اپنی سیاسی طاقت کا استعمال کرکے ان اداروں کو ان کا واجب حق دلانے میں کرسکتے ہیں؟ اگر ان جیسے تمام سوالوں کا جواب وہ خلوص دل سے ’ہاں‘ میں دیتے ہیں تو وہ اس قوم سے مثبت رویہ کی امید کرسکتے ہیں، ورنہ معافی کے چند جملے کتنے کارگر ہونے چاہئیں، اس کا اندازہ وہ خود کرسکتے ہیں۔
اب ہمارے سامنے کلیان سنگھ اور ملائم سنگھ کی دوستی جیسا دوسرا معاملہ بہار میں جے ڈی یو اور بھارتیہ جنتاپارٹی کی دوستی کا ہے۔ شردیادو نے کھل کر یہ کہہ دیا ہے کہ بھارتیہ جنتا پارٹی سے ہمارے دیرینہ مراسم ہیں اور ہم مل کر الیکشن لڑیں گے۔ بیشک وہ اپنے سیاسی مستقبل کو ذہن میں رکھ کر کوئی بھی فیصلہ لینے کے لےے آزاد ہیں۔ نتیش کمار سیکولر رہیں گے یا فرقہ پرست، یہ فیصلے بھی انہیں کو کرنا ہے۔ وہ نریندر مودی اور اس کی سوچ کے لوگوں کو کمزور کرنا چاہتے ہیں یا طاقتور بنانا چاہتے ہیں، یہ فیصلہ بھی انہیں ہی کرنا ہے۔ ہم نے سپول کے ایک جلسہ میں لاکھوں سامعین کی موجودگی میں انہیں مخاطب کرتے ہوئے کہا تھا کہ حضرت علی نے ہمارے دوستوں اور دشمنوںکی شناخت کرنے کا ایک فارمولہ ہمارے سامنے رکھا ہے، وہ یہ کہ ہمارے تین دوست ہیں اور تین دشمن۔ ہمارے تین دوست وہ ہیں جو کہ براہ راست ہمارے دوست ہیں، دوستوں کے دوست ہیں یا ہمارے دشمنوں کے دشمن ہیں۔ اسی طرح ہمارے تین دشمن وہ ہیں، جو ہمارے دشمن ہیں، ہمارے دوستوں کے دشمن ہیں یا ہمارے دشمنوں کے دوست ہیں۔ اب وہ فیصلہ خود کرسکتے ہیں کہ اس فارمولہ کے تحت وہ کس زمرے میں آتے ہیں۔ گجرات، مہاراشٹر، مدھیہ پردیش، چھتیس گڑھ جیسی ریاستوں میں فرقہ پرست طاقتوں کے مضبوط ہونے کا ہم نے ہی نہیں اس ملک نے بڑا نقصان اٹھایا ہے۔ بہار کی سیکولرزمین فرقہ پرست طاقتوں کے حوالے کردینا ایک بڑی بھول ہوگی، بلکہ اب تو وہ وقت آگیا ہے کہ جن جن ریاستوں میں فرقہ پرست طاقتیں ذرا بھی مضبوط ہوگئی ہیں، وہاں انہیں کمزور کرنے کے لےے سبھی سیکولر طاقتوں کو متحد ہونا چاہےے، اسی میں ملک کا بھی بھلا ہے اور ہندوستانی عوام کا بھی۔ ابھی آئندہ چند ماہ میں بہار کا الیکشن ہمارے سامنے ہے، جو کچھ اترپردیش میں کلیان سنگھ اور ملائم سنگھ کے ساتھ کو لے کر ہم نے فیصلہ کیا، وہی فیصلہ نتیش کمار اور نریندر مودی کے سیاسی گٹھ جوڑ کو سامنے رکھ کر بہار میں کرنے کی ضرورت ہے۔ اب یہ فیصلہ نتیش کمار کو کرنا ہے کہ وہ وقت رہتے ہوئے فرقہ پرست عناصر سے فاصلہ اختیار کرپاتے ہیں یا پھر ملائم سنگھ یادو کی طرح ٹھوکر کھانے کے بعد کوئی فیصلہ لینے کے بارے میں سوچیں گے، مگر یہاں ایک بات واضح کردینا بیحد ضروری ہے، وہ یہ کہ ملائم سنگھ یادو کا پورا سیاسی کرئیر ہمارے سامنے ہے، تقریباً 25برس تک سیکولرزم کے علمبردار بنے رہنے، بابری مسجد کو شہادت سے بچانے، مسلمانوں کی ہر موڑ پر ترجمانی کرنے، یہاں تک کہ مولانا ملائم سنگھ یادو کا خطاب حاصل کرنے والے شخص نے ایک غلطی کی اور ٹھوکر کھانے کے بعد معذرت کرلی۔ ان کے سابقہ کردار کو سامنے رکھ کر اس معافی کو قبول کرنے میں مسلمانوں کو شاید اتنی جھجھک نہ ہو، مگر یہی بات نتیش کمار کے معاملہ میں نہیں کہی جاسکتی، اس لےے کہ نہ تو وہ ملائم سنگھ یادو کی طرح سیکولرزم کے علمبردار رہے ہیں اور نہ مسلمانوں نے کبھی انہیں اپناترجمان سمجھا ہے۔ ہاں ان کے دوراقتدار میں مسلمانوں کو بی جے پی کا ہمنوا ہونے کے باوجود زیادہ شکایتیں نہیں رہیں، مگر جس طرح اب نریندر مودی اس ریاست میں فرقہ پرستی پھیلاتے نظر آرہے ہیں، ان کے خوفناک نتائج کو سمجھا جاسکتا ہے، لہٰذا مسلمان نتیش کمار کے کاندھوں پر سوار ہوکر نریندرمودی کو طاقتور بنانے کا فیصلہ نہیں لے سکتا۔ وہ یہ بات بھی ذہن سے نکال دیں کہ مسلمانوں میں اگڑے اور پچھڑے کی تفریق پیدا کرکے وہ انہیں دو ٹکڑوں میں بانٹنے میں کامیاب ہوجائیں گے۔ نریندر مودی یا فرقہ پرست طاقتوں کے سوال پر اس تفریق کے کوئی معنی نہیں ہیں، وہ سبھی آپ کو ایک ساتھ کھڑے نظر آئیں گے۔ ملائم سنگھ یادوکی مثال آپ کے سامنے ہے اور ابھی فیصلہ کا موقع بھی آپ کے پاس ہے
گزشتہ پارلیمانی الیکشن سے قبل ملائم سنگھ یادو نے جب کلیان سنگھ کا دامن تھاما تو روزنامہ راشٹریہ سہارا میں اپنے مضامین کے ذریعہ ہم نے ان کی سخت مخالفت کی تھی، اس لےے کہ ملائم سنگھ یادو کا ماضی ہمارے سامنے تھا، جنہیں ہم نے ہمیشہ مسلمانوں کا ہمدرد پایا۔ اچانک ان کے مزاج میں آئی تبدیلی سے ہم پریشان بھی تھے اورحیران بھی۔ بارہا ہم نے یہ احساس دلانے کی کوشش کی کہ ملائم سنگھ یادو کا ماضی اور ان کی پارٹی کا سیکولر مزاج انہیں ایسے کسی بھی قدم کی اجازت نہیں دیتا۔ بہت بہتر ہوتا، اگر اسی وقت انہوں نے اپنے فیصلے پر نظرثانی کرلی ہوتی، لیکن دیر سے ہی کیا گیا ، ان کا یہ ایک درست فیصلہ ہے۔ اتنا تو وہ بھی سمجھتے ہوں گے کہ اگر اس تاخیر کا کوئی نقصان پہنچا تو خود انہیںہی، مسلمانوں کو نہیں۔ ہاں، البتہ کانگریس کو اس کا فائدہ ضرور ہوا۔ جہاں تک مسلمانوں کو سیاست میں اپنا کھویا ہوا وقار حاصل کرنے کی بات ہے تو ہمیں لگتا ہے کہ اس کے لےے سیکولر طاقتوں کا مضبوط ہونا بیحد ضروری ہے۔ کانگریس کی تمام خامیوں کے باوجود اس کا ساتھ دینے کے پیچھے اگر کوئی وجہ تھی تو صرف یہ کہ فرقہ پرست طاقتوںکو برسراقتدار آنے سے روکنا تھا۔ کانگریس آج بھی جہاں فرقہ پرست طاقتوں کو تنہا روکنے کی حیثیت رکھتی ہے، اس پر توجہ دی جاسکتی ہے، مگر ملک میں سیکولرزم کو مضبوط کرنے کے لےے یہ بھی ضروری ہے کہ کانگریس کے علاوہ جو دیگر سیکولر سیاستداں یا سیاسی پارٹیاں ہیں، انہیں بھی کمزور نہ ہونے دیاجائے۔ ہاں، مگر کسی حالت میں بھی ووٹ کی تقسیم فرقہ پرستوں کو مضبوط نہ ہونے دے، اس کا خاص خیال رکھنا بیحد ضروری ہے۔
بہار میں نریندر مودی کی آمد سے قبل نتیش کمار کے معاملے میں بھی رائے یہی تھی کہ وہ سیکولر مزاج رکھتے ہیں اور ابھی بھی ان سے امیدیں ختم نہیں کی جانی چاہئیں، مگر بہار میں بھارتیہ جنتا پارٹی کو کسی کے سہارے بھی مضبوط ہونے کا موقع ملتا ہے تو آنے والے وقت میں ہمیں اس کی بڑی قیمت چکانی پڑسکتی ہے۔ اگر ہم ماضی میں کئے گئے اپنے ایک غلط فیصلہ کا تجزیہ کریں تو اس تلخ حقیت کو سمجھنے میں زیادہ دیر نہیں لگے گی کہ وشوناتھ پرتاپ سنگھ کے بھارتیہ جنتا پارٹی کا دامن تھامنے اور مسلمانوں کے سامنے اپنا سیکولر چہرہ پیش کرکے اس کے لےے ووٹ مانگنے اور اسے اقتدار تک پہنچانے کا جو کام انہوں نے کیاتھا، اس کا خمیازہ مسلمان آج تک بھگت رہا ہے اور نہ جانے کب تک اسے بھگتنا ہوگا۔ آج کانگریس بیشک ایک سیکولر سیاسی پارٹی کی شکل میں حکمراں ہے، مگر بھارتیہ جنتا پارٹی نے اپنے دوراقتدار میں وشوناتھ پرتاپ سنگھ کے وزیراعظم بننے کے دور سے لے کر 2004میں اٹل بہاری واجپئی کے و زیراعظم رہنے تک جب جب بھی اسے موقع ملا، اس نے اپنے ’کمیونل انجینئرنگ ‘Communal Engineering)کے فارمولہ کے ذریعہ بیوروکریسی اور فوج سمیت تقریباً تمام شعبوں میں ایسے عناصر داخل کردئے کہ اب کوئی بھی سرکار آسانی کے ساتھ اپنے تمام فیصلوں کو آسانی سے عملی جامہ نہیں پہناسکتی۔ یہی وجہ ہے کہ آج ملک کے وزیرداخلہ لال کرشن اڈوانی نہیں ہیں، مگر وہ چاہے شیوراج پاٹل رہے ہوں یا پی چدمبرم، مسلمانوں کے تئیں مزاج میں کوئی خاص تبدیلی نظر نہیں آتی۔ بم دھماکوں کی تعداد میں کمی ضرور آئی ہے، مسلم نوجوانوں کو دہشت گرد بتا کر انکاؤنٹر میں مار دئے جانے کی رفتار میں کمی ضرور آئی ہے، مگر یہ سلسلہ ختم ہوگیا ہے، اب دہشت گردی کے الزام میں پھنسائے گئے بے گناہوں کو انصاف ملنے لگا ہے، یہ کہنا بہت مشکل ہے۔ آج بھی ہمارے سامنے ایسی مثالیں موجود ہیں کہ کانگریس پارٹی کے سینئر لیڈر دگ وجے سنگھ واضح طور پر کہتے ہیں کہ ’بٹلہ ہاؤس انکاؤنٹر صحیح نہیں تھا اور سر پر پانچ گولیاں نہیں لگ سکتی تھیں‘، باوجود اس حقیقت بیانی اور تمام سیکولر پارٹیوں کے مطالبات کے سرکار ایماندارانہ جانچ کا فیصلہ نہیں لے سکی۔ کیا فرق رہا پی چدمبرم اور شیوراج پاٹل میں؟ آج بھی ہم ڈیوڈکولمین ہیڈلی جو ہندوستان میں سب سے بڑے دہشت گردانہ حملہ کا کلیدی مجرم ہے، اس کے ذریعہ عشرت جہاں کو لشکرطیبہ کا ایجنٹ بتادینے پر اس کی تشہیر کرتے ہیں اور یہ ثابت کرنے میں جٹ جاتے ہیں کہ گویا نریندرمودی سرکار جو کہہ رہی تھی وہ سچ تھا اور ایف بی آئی و لشکرطیبہ کا مشترکہ ایجنٹ جو کہہ رہا ہے وہ سچ ہے۔
بہرحال ہم ذکر کررہے تھے ملائم سنگھ یادو کا کھلے دل کے ساتھ مسلمانوں سے معافی مانگنے کا۔ تو ہم بیحد ادب کے ساتھ ان کی خدمت میں یہ عرض کرنا چاہتے ہیں کہ اب وقت بدل گیا ہے، اب ہم وعدوں اور جذبات کے سہارے فیصلہ لینے کا سلسلہ بند کرچکے ہیں اور صرف اس بات کے لےے کہ فلاں شخص یا پارٹی نے فرقہ پرست طاقتوں سے ٹکرانے کا اعلان کیا ہے، اب ہمارے ساتھ کھڑے ہونے کی وجہ نہیں بن سکتا۔ سیاست میں "Give, and Take"، یعنی اس ہاتھ لے، اس ہاتھ دے کی روش اب بالکل عام ہوگئی ہے، اسے صاف لفظوں میں ’سودا‘ بھی کہا جاسکتا ہے، لہٰذا ہم بھی ملائم سنگھ یادو کے سامنے ایسی ہی کچھ شرائط رکھیں تو بیجا نہ ہوگا کہ اگر انہیں ہماری حمایت درکار ہے، وہ کھوئی ہوئی اپنی سیاسی طاقت کو پھر سے حاصل کرنے کے لےے مسلمانوں کی مدد چاہتے ہیں تو الیکشن کے بعد وہ مسلمانوں کے لےے کیا کریں گے، یہ تو بہت بعد کی بات ہے۔ انہیں ابھی طے کرنا ہوگا کہ کیا آج وہ مسلمانوں کا اتنے ہی کھلے دل سے ساتھ دینے کے لےے تیار ہیں، جتنے کھلے دل سے انہوں نے معافی مانگی ہے یا پھر یہ محض ایک سیاسی حکمت عملی ہے، جیسا کہ ان کے کچھ مخالفین کہہ رہے ہیں۔ کیا وہ پارلیمنٹ میں مسلم مسائل پر آواز اٹھانے کا فیصلہ لینے کے لےے تیار ہیں؟ کشمیر میں دہشت گردی کی آڑ لے کر جو خونریزی کی جارہی ہے، 9سال تک کے بچوں کو ہلاک کیا جارہا ہے، کیا ان کی پارٹی پارلیمنٹ میں اس کے خلاف آواز بلند کرنے کے لےے تیار ہے؟ امرناتھ یاترا جو لال کرشن اڈوانی رتھ یاترا کی طرز پر پھر سے فرقہ وارانہ منافرت کی وجہ بنتی نظر آرہی ہے، کیا وہ اور ان کی پارٹی اس معاملہ میں حقیقت کو بے نقاب کرنے کا ارادہ رکھتی ہے؟ جس طرح یکے بعد دیگرے سنگھ پریوار کے کارنامے سامنے آنے لگے ہیں، دہشت گردی میں جن ہندوفرقہ پرست تنظیموں کے نام سامنے آنے لگے ہیں، کیا ملائم سنگھ اور ان کی پارٹی پارلیمنٹ کے اندر اور باہر ان کے خلاف آواز بلند کرنے کا ارادہ رکھتے ہیں؟ بٹلہ ہاؤس سمیت دیگر متعدد انکاؤنٹرس یا بم دھماکوں میں ملوث ہونے کا الزام لگا کر، جن بے گناہ نوجوانوں کو جیل کی سلاخوں کے پیچھے ڈال دیا گیا ہے، کیا انہیں انصاف دلانے کا عزم رکھتے ہیں؟ بیشک اگر ان میں سے کچھ واقعی گنہگار ہیں تو انہیں سزا دلانے سے بھی گریز نہ کریں۔(تفصیلات ہم مہیا کریں گے) مسلمانوں کی تعلیمی درسگاہوں کو دہشت گردی کا اڈہ بتانے کی جو مہم سنگھ پریوار نے شروع کی ہے، کیا اس کے دفاع میں وہ اور ان کی پارٹی کھڑے ہونے کا ارادہ رکھتی ہے؟ یہ اس لےے بھی ضروری ہے کہ مسلمانوں کے دینی مدارس اور ان کی کارکردگی سے وہ بخوبی واقف ہیں اور ان مدارس نے بارہا بے غرض ان کا ساتھ دیا ہے۔ علی گڑھ مسلم یونیورسٹی اور جامعہ ملیہ اسلامیہ کے اقلیتی کردار کا معاملہ ابھی تک التوا میں ہے، کیا وہ پارلیمنٹ میں اپنی سیاسی طاقت کا استعمال کرکے ان اداروں کو ان کا واجب حق دلانے میں کرسکتے ہیں؟ اگر ان جیسے تمام سوالوں کا جواب وہ خلوص دل سے ’ہاں‘ میں دیتے ہیں تو وہ اس قوم سے مثبت رویہ کی امید کرسکتے ہیں، ورنہ معافی کے چند جملے کتنے کارگر ہونے چاہئیں، اس کا اندازہ وہ خود کرسکتے ہیں۔
اب ہمارے سامنے کلیان سنگھ اور ملائم سنگھ کی دوستی جیسا دوسرا معاملہ بہار میں جے ڈی یو اور بھارتیہ جنتاپارٹی کی دوستی کا ہے۔ شردیادو نے کھل کر یہ کہہ دیا ہے کہ بھارتیہ جنتا پارٹی سے ہمارے دیرینہ مراسم ہیں اور ہم مل کر الیکشن لڑیں گے۔ بیشک وہ اپنے سیاسی مستقبل کو ذہن میں رکھ کر کوئی بھی فیصلہ لینے کے لےے آزاد ہیں۔ نتیش کمار سیکولر رہیں گے یا فرقہ پرست، یہ فیصلے بھی انہیں کو کرنا ہے۔ وہ نریندر مودی اور اس کی سوچ کے لوگوں کو کمزور کرنا چاہتے ہیں یا طاقتور بنانا چاہتے ہیں، یہ فیصلہ بھی انہیں ہی کرنا ہے۔ ہم نے سپول کے ایک جلسہ میں لاکھوں سامعین کی موجودگی میں انہیں مخاطب کرتے ہوئے کہا تھا کہ حضرت علی نے ہمارے دوستوں اور دشمنوںکی شناخت کرنے کا ایک فارمولہ ہمارے سامنے رکھا ہے، وہ یہ کہ ہمارے تین دوست ہیں اور تین دشمن۔ ہمارے تین دوست وہ ہیں جو کہ براہ راست ہمارے دوست ہیں، دوستوں کے دوست ہیں یا ہمارے دشمنوں کے دشمن ہیں۔ اسی طرح ہمارے تین دشمن وہ ہیں، جو ہمارے دشمن ہیں، ہمارے دوستوں کے دشمن ہیں یا ہمارے دشمنوں کے دوست ہیں۔ اب وہ فیصلہ خود کرسکتے ہیں کہ اس فارمولہ کے تحت وہ کس زمرے میں آتے ہیں۔ گجرات، مہاراشٹر، مدھیہ پردیش، چھتیس گڑھ جیسی ریاستوں میں فرقہ پرست طاقتوں کے مضبوط ہونے کا ہم نے ہی نہیں اس ملک نے بڑا نقصان اٹھایا ہے۔ بہار کی سیکولرزمین فرقہ پرست طاقتوں کے حوالے کردینا ایک بڑی بھول ہوگی، بلکہ اب تو وہ وقت آگیا ہے کہ جن جن ریاستوں میں فرقہ پرست طاقتیں ذرا بھی مضبوط ہوگئی ہیں، وہاں انہیں کمزور کرنے کے لےے سبھی سیکولر طاقتوں کو متحد ہونا چاہےے، اسی میں ملک کا بھی بھلا ہے اور ہندوستانی عوام کا بھی۔ ابھی آئندہ چند ماہ میں بہار کا الیکشن ہمارے سامنے ہے، جو کچھ اترپردیش میں کلیان سنگھ اور ملائم سنگھ کے ساتھ کو لے کر ہم نے فیصلہ کیا، وہی فیصلہ نتیش کمار اور نریندر مودی کے سیاسی گٹھ جوڑ کو سامنے رکھ کر بہار میں کرنے کی ضرورت ہے۔ اب یہ فیصلہ نتیش کمار کو کرنا ہے کہ وہ وقت رہتے ہوئے فرقہ پرست عناصر سے فاصلہ اختیار کرپاتے ہیں یا پھر ملائم سنگھ یادو کی طرح ٹھوکر کھانے کے بعد کوئی فیصلہ لینے کے بارے میں سوچیں گے، مگر یہاں ایک بات واضح کردینا بیحد ضروری ہے، وہ یہ کہ ملائم سنگھ یادو کا پورا سیاسی کرئیر ہمارے سامنے ہے، تقریباً 25برس تک سیکولرزم کے علمبردار بنے رہنے، بابری مسجد کو شہادت سے بچانے، مسلمانوں کی ہر موڑ پر ترجمانی کرنے، یہاں تک کہ مولانا ملائم سنگھ یادو کا خطاب حاصل کرنے والے شخص نے ایک غلطی کی اور ٹھوکر کھانے کے بعد معذرت کرلی۔ ان کے سابقہ کردار کو سامنے رکھ کر اس معافی کو قبول کرنے میں مسلمانوں کو شاید اتنی جھجھک نہ ہو، مگر یہی بات نتیش کمار کے معاملہ میں نہیں کہی جاسکتی، اس لےے کہ نہ تو وہ ملائم سنگھ یادو کی طرح سیکولرزم کے علمبردار رہے ہیں اور نہ مسلمانوں نے کبھی انہیں اپناترجمان سمجھا ہے۔ ہاں ان کے دوراقتدار میں مسلمانوں کو بی جے پی کا ہمنوا ہونے کے باوجود زیادہ شکایتیں نہیں رہیں، مگر جس طرح اب نریندر مودی اس ریاست میں فرقہ پرستی پھیلاتے نظر آرہے ہیں، ان کے خوفناک نتائج کو سمجھا جاسکتا ہے، لہٰذا مسلمان نتیش کمار کے کاندھوں پر سوار ہوکر نریندرمودی کو طاقتور بنانے کا فیصلہ نہیں لے سکتا۔ وہ یہ بات بھی ذہن سے نکال دیں کہ مسلمانوں میں اگڑے اور پچھڑے کی تفریق پیدا کرکے وہ انہیں دو ٹکڑوں میں بانٹنے میں کامیاب ہوجائیں گے۔ نریندر مودی یا فرقہ پرست طاقتوں کے سوال پر اس تفریق کے کوئی معنی نہیں ہیں، وہ سبھی آپ کو ایک ساتھ کھڑے نظر آئیں گے۔ ملائم سنگھ یادوکی مثال آپ کے سامنے ہے اور ابھی فیصلہ کا موقع بھی آپ کے پاس ہے
मुलायम सिंह की माफ़ी-सैक्युलरिज़्म की जीत
अज़ीज़ बर्नी
शीर्षक का चयन करते समय मैंने ज़रा संकोच से काम लिया। अगर मैं यूं लिखता कि मुलायम सिंह की माफ़ी ‘रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा’ या मेरे अभियान की सफलता है तो भी ग़लत न होता, मगर यह मेरी तंगनज़री होती। दरअसल शीर्षक होना चाहिए था ‘मुलायम सिंह यादव की माफ़ी- मुसलमानों की सफलता’। हां, यही सही था, फिर भी मैंने शीर्षक दिया ‘‘मुलायम सिंह की माफी-सैक्युलरिज़्म की जीत’’, इसलिए कि मैं देश की धर्मनिर्पेक्षता को मज़बूत होते हुए देखता चाहता हूँ और मुलायम सिंह की माफी को भी इसी दृष्टिकोण से देख रहा हूँ। मेरी याददाश्त में यह पहला अवसर है कि जब मुसलमानों की मांसिक स्थिरता ने किसी बड़े राजनीतिज्ञ को इस तरह अपना स्टैंड बदलने के लिए मजबूर किया। हम मुसलमानों के राजनीति में महत्व को मन में रखते हुए इसे एक सुखद संदेश समझ सकते हैं। मेरा ख़याल है हमें खुले दिल के साथ मुलायम सिंह यादव की क्षमा याचना को स्वीकार कर लेना चाहिए ताकि वह सभी धर्मनिर्पेक्ष राजनीतिज्ञ जिनके नज़दीक कभी मुसलमान रहा, मगर उनके मिज़ाज में परिवर्तन आने पर अलग हो गया, वह यह एहसास कर सकें कि उनसे कब और कहां ग़लती हुई है’ह्न’ह्न और फिर इसी तरह अपने फैसलों पर पुनर्विचार के लिए मजबूर हों, साथ ही अब देखना यह भी है कि मुलायम सिंह यादव अपनी इस क्षमा याचना के बाद क्या वाक़ई फिर से मुसलमानों की समस्याओं में रुचि लेते हैं। संसद और विधानसभा में उनके प्रतिनिधित्व का इरादा रखते हैं या फिर यह अपनी घटती हुई राजनीतिक शक्ति से मजबूर होकर किया गया एक फैसला है।
पिछले संसदीय चुनाव से पूर्व मुलायम सिंह यादव ने जब कल्याण सिंह का दामन थामा तो रोज़नामा राष्ट्रीय सहरा में अपने लेखों द्वारा हमने उनका घोर विरोध किया था, इसलिए कि मुलायम सिंह यादव का अतीत हमारे सामने था, जिन्हें हमने हमेशा मुसलमानों का शुभचिंतक पाया था। अचानक उनके मिज़ाज में आए परिवर्तन से हम परेशान भी थे और आश्चर्यचकित भी। कई बार हमने यह एहसास दिलाने की कोशिश की कि मुलायम सिंह यादव का माज़ी और उनकी पार्टी का धर्मनिर्पेक्ष मिज़ाज उन्हें ऐसे किसी भी क़दम की इजाज़त नहीं देता। बहुत अच्छा होता, अगर उसी समय उन्होंने अपने फैसले पर पुनर्विचार कर लिया होता, लेकिन देर से ही किया गया उनका यह एक दुरुस्त फैसला है। इतना तो वह भी समझते होंगे कि अगर इस विलम्ब का कोई नुक़्सान पहुंचा तो स्वयं उन्हें ही, मुसलमानों को नहीं। हां, अलबत्ता कांग्रेस को इसका फायदा ज़रूर हुआ। जहां तक मुसलमानों को राजनीति में अपना खोया हुआ सम्मान प्राप्त करने की बात है तो हमें लगता है कि इसके लिए धर्मनिर्पेक्ष ताक़तों का मज़बूत होना अत्यंत आवश्यक है। कांग्रेस की सारी कमियों के बावजूद उसका साथ देने के पीछे अगर कोई कारण था तो केवल यह कि साम्प्रदायिक ताक़तों को सत्ता में आने से रोकना ज़रूरी था। कांग्रेस आज भी जहां साम्प्रदायिक ताक़तों को अकेला रोकने की हैसियत रखती है, उस पर ध्यान दिया जा सकता है, परंतु देश में धर्मनिर्पेक्षता को मज़बूत करने के लिए यह भी ज़रूरी है कि कांग्रेस के अलावा जो अन्य धर्मनिर्पेक्ष राजनीतिज्ञ या राजनीतिक पार्टियां हैं, उन्हें भी कमज़ोर न होने दिया जाए। हाँ, मगर किसी हालत में भी वोट का विभाजन साम्प्रदायिक शक्तियों को मज़बूत न होने दे, इसका विशेष ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।
बिहार में नरेंद्र मोदी के आगमन से पूर्व नितीश कुमार के मामले में भी राय यही थी कि वह धर्मनिर्पेक्ष मिज़ाज रखते हैं और अभी भी उनसे उम्मीदें समाप्त नहीं की जानी चाहिएं, परंतु बिहार में भारतीय जनता पार्टी को किसी के सहारे भी मज़बूत होने का अवसर मिलता है तो आने वाले समय में हमें इसकी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। अगर हम अतीत में किए गए अपने इस ग़लत फैसले की समीक्षा करें तो इस कटु तथ्य को समझने में ज़्यादा देर नहीं लगेगी कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के भारतीय जनता पार्टी का दामन थामने और मुसलमानों के सामने अपना सैक्युलर चेहरा पेश कर उसके लिए वोट मांगने और उसे सत्ता तक पहुंचाने का काम जो उन्होंने किया था, उसका ख़ामियाज़ा मुसलमान आज तक भुगत रहा है और न जाने कब तक उसे भुगतना होगा। आज कांग्रेस बेशक एक धर्मनिर्पेक्ष राजनीतिक दल के रूप में शासक है, मगर भारतीय जनता पार्टी ने अपने शासनकाल में विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री बनने के समय से लेकर 2004 में अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहने तक जब जब भी उसे अवसर मिला, उसने अपने ‘कम्युनल इंजीनियरिंग’ ब्वउउनदंस म्दहपदममतपदीह के फार्मूले द्वारा ब्योरोक्रेसी तथा फ़ौज समेत लगभग सभी क्षेत्रों में ऐसे तत्व दाख़िल कर दिए कि अब कोई भी सरकार अपने सभी निर्णयों को आसानी से अमली जामा नहीं पहना सकती। यह कारण है कि आज देश के गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवानी नहीं हैं, परंतु वह चाहे शिवराज पाटिल रहे हों या पी॰ चिदम्बरम, मुसलमानों के प्रति मिज़ाज में कोई विशेष तब्दीली दिखाई नहीं देती। बम धमाकों की संख्या में कमी ज़रूर आई है, मुस्लिम युवाओं को आतंकवादी बताकर एन्काउन्टर में मार दिए जाने की रफ़्तार में कमी ज़रूर आई है, परंतु यह सिलसिला समाप्त हो गया है, अब आतंकवाद के आरोप में फंसाए गए बेगुनाहों को इन्साफ़ मिलने लगा है, यह कहना बहुत कठिन है। आज भी हमारे सामने ऐसे उदाहरण मौजूद हैं कि कांगे्रस पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ‘बटला हाउस एन्कान्टर सही नहीं था और सर पर पांच गोलियां नहीं लग सकती थीं’, बावजूद इस हक़ीक़त बयानी और सभी धर्मनिर्पेक्ष पार्टियों की मांगों के, सरकार ईमानदाराना जांच का फैसला नहीं ले सकी। क्या अंतर रहा पी॰ चिदम्बरम और शिवराज पाटिल में? आज भी हम डेविड कोलमैन हेडली जो भारत में सबसे बड़े आतंकवादी हमले का प्रमुख अपराधी है, उसके द्वारा इशरत जहां को लशकर-ए-तैयबा का ऐजेंट बता देने पर उसको महत्व देते हैं और यह सिद्ध करने में जुट जाते हैं कि गोया नरेंद्र मोदी सरकार जो कह रही थी वह सच था और एफबीआई तथा लशकर-ए-तैयबा का संयुक्त एजेंट जो कह रहा है वह सच है।
बहरहाल हम चर्चा कर रहे थे मुलायम सिंह यादव की खुले दिल के साथ मुसलमानों से माफ़ी मांगने की। तो हम अत्यंत आदर के साथ उनकी सेवा में यह निवेदन करना चाहते हैं कि अब समय बदल गया है, अब हम वादों और भावनाओं के सहारे फैसला लेने का सिलसिला बंद कर चुके हैं और केवल इस बात के लिए कि अमुक व्यक्ति या पार्टी ने साम्प्रदायिक शक्तियों से टकराने की घोषणा की है, अब हमारे साथ खड़े होने का कारण नहीं बन सकता। राजनीति में ळपअम ंदक ज्ंाम यानी इस हाथ ले, और उस हाथ दे, का चलन अब पूरी तरह आम हो गया है, इसे स्पष्ट शब्दों में ‘सौदा’ भी कहा जा सकता है इसलिए हम भी मुलायम सिंह यादव के सामने ऐसी ही कुछ शर्तें रखें तो बेजा न होगा कि अगर उन्हें हमारा समर्थन दरकार है, वह अपनी खोई हुई राजनीतिक शक्ति को फिर से प्राप्त करने के लिए मुसलमानों का सहयोग चाहते हैं तो चुनावों के बाद वह मुसलमानों के लिए क्या करेंगे, यह तो बहुत बाद की बात है, उन्हें अभी तय करना होगा कि क्या आज वह मुसलमानों का उतने ही खुले दिल से साथ देने के लिए तैयार हैं जितने खुले दिल से उन्हांेंने माफ़ी मांगी है या फिर केवल यह एक राजनीतिक रणनीति है, जैसा कि उनके कुछ विरोधी कह रहे हैं। क्या वह संसद में मुसलमानों की समस्याओं पर आवाज़ उठाने का फैसला लेने के लिए तैयार हैं? कश्मीर में आतंकवाद की आड़ लेकर जो रक्तपात किया जा रहा है, 9 वर्श तक के बच्चों को मार दिया जा रहा है, क्या उनकी पार्टी संसद में इसके विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए तैयार है? अमरनाथ यात्रा जो लालकृष्ण आडवानी की रथ यात्रा की तर्ज़ पर फिर से साम्प्रदायिक घृणा का कारण बनती नज़र आ रही है, क्या वह और उनकी पार्टी इस मामले में हक़ीक़त को बेनक़ाब करने का इरादा रखती है? जिस तरह एक के बाद दूसरा संघ परिवार का कारनामा सामने आने लगा है, आतंकवाद में जिन हिंदु साम्प्रदायिक संगठनों के नाम सामने आने लगे है,ं क्या मुलायम सिंह और उनकी पार्टी संसद के भीतर और बाहर उनके विरुद्ध आवाज़ उठाने का इरादा रखते हैं? बटला हाउस सहित अन्य एन्काउन्टर या बम धमाकों में लिप्त होने का आरोप लगाकर जिन बेगुनाह युवकों को जेल की सलाख़ों के पीछे डाल दिया गया है, क्या उन्हें न्याय दिलाने का इरादा रखते हैं? बेशक अगर उनमें से कुछ वाक़ई गुनहगार हैं तो उन्हें सज़ा दिलाने से भी परहेज़ न करें। (विवरण हम उपलब्ध करेंगे।) मुसलमानों के शैक्षणिक संस्थानों को आतंकवाद का अड्डा बताने का जो अभियान संघ परिवार ने शुरू किया है, क्या उसकी प्रतिरक्षा में वह और उनकी पार्टी खड़े होने का इरादा रखती है। यह इसलिए भी ज़रूरी है कि मुसलमानों के धार्मिक मदरसे और उनके कार्यों से वह भलीभांति अवगत हैं और इन मदरसों नेे कई बार निस्वार्थ भाव से उनका साथ दिया है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के मायनाॅरेटी कैरेक्टर का मामला अभी भी लंबित है, क्या वह संसद में अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रयोग करके इन संस्थानों को उनका वाजिब अधिकार दिलाने में कर सकते हैं? अगर इस जैसे तमाम प्रश्नों का जवाब वह सच्चे दिल से ‘हां’ में देते हैं तो, वह इस समुदाय से सकारात्मक रवैये की उम्मीद कर सकते हैं, वरना माफ़ी के कुछ वाक्य कितने कारगर होने चाहिए, इसका अंदाज़ा वह स्वयं कर सकते हैं।
अब हमारे सामने कल्याण सिंह और मुलायम सिंह की दोस्ती जैसा दूसरा मामला बिहार में जे.डी.यू और भारतीय जनता पार्टी की दोस्ती का है। शरद यादव ने खुल कर यह कह दिया है कि भारतीय जनता पार्टी से हमारे पूराने संबंध हैं और हम मिल कर चुनाव लड़ेंगे। निःसन्देह वह अपने राजनीतिक भविष्य को ज़हन में रख कर कोई भी निर्णय लेने के लिए आज़ाद हैं। नितीश कुमार धर्मनिर्पेक्ष रहेंगे या साम्प्रदायिक, यह निर्णय भी उन्हीं को करना है। वह नरेन्द्र मोदी और उसकी सोच के लोगों को कमज़ोर करना चाहते हैं या शक्तिशाली बनाना चाहते हैं, यह निर्णय भी उन्हें ही करना है। हमने सुपौल की एक जनसभा में लाखों की भीड़ की उपस्थिति में उन्हें संबोधित करते हुए कहा था कि हज़रत अली ने हमारे दोस्तों और दुश्मनों को पहचानने का एक फार्मूला हमारे सामने रखा है, वह यह कि हमारे तीन दोस्त हैं और तीन दुश्मन। हमारे तीन दोस्त वह हैं जो कि सीधे हमारे दोस्त हैं, दोस्तो के दोस्त हैं या हमारे दुश्मनों के दुश्मन हैं। इसी तरह हमारे तीन दुश्मन हैं, जो हमारे दुश्मन हैं, हमारे दोस्तों के दुश्मन हैं या हमारे दुश्मनों के दोस्त हैं। अब वह निर्णय स्वयं कर सकते हैं कि इस फार्मूले के तहत वह किस श्रेणी में आते हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में साम्प्रदायिक शक्तियों के मज़बूत होने की हमने ही नहीं इस देश ने बड़ी हानि उठाई है। बिहार की धर्मनिर्पेक्ष ज़मीन साम्प्रदायिक शक्तियों के हवाले कर देना एक बड़ी भूल होगी, बल्कि अब तो वह समय आगया है कि जिन जिन राज्यों में साम्प्रदायिक ताक़तें ज़रा भी मज़बूत हो गई हैं, वहां उन्हें कमज़ोर करने के लिए सभी धर्मनिर्पेक्ष ताक़तों को एकजुट होना चाहिए, इसी में देश का भी भला है और भारतीय जनता का भी। अभी आईंदा चंद माह में बिहार का चुनाव हमारे सामने है। जो कुछ उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह और मुलायम सिंह के साथ को लेकर हमने निर्णय लिया, वही निर्णय नितीश कुमार और नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक गठजोड़ को सामने रख कर बिहार में करने की आवश्यकता है। अब यह निर्णय नितीश कुमार को करना है कि वह समय रहते साम्प्रदायिक तत्वों से दूरी बना पाते हैं या फिर मुलायम सिंह यादव की तरह ठोकर खाने के बाद कोई निर्णय लेने के बारे में सोचेंगे, मगर यहां एक बात स्पष्ट कर देना अतिआवश्यक है, वह यह कि मुलायम सिंह यादव का पूरा राजनीतिक कैरियर हमारे सामने है, लगभग 25 वर्ष तक धर्मनिर्पेक्षता के अलमबरदार बने रहने, बाबरी मस्जिद को शहादत से बचाने, मुसलमानों की हर मोड़ पर प्रतिनिधित्व करने, यहां तक कि मौलाना मुलायम सिंह यादव का खिताब प्राप्त करने वाले व्यक्ति ने एक ग़लती की और ठोकर खाने के बाद क्षमा याचना कर ली। उनकी पिछली भूमिका को सामने रख कर इस माफी को स्वीकार करने में मुसलमानों को शायद इतना संकोच न हो, मगर यही बात नीतिश कुमार के मामले में नहीं कही जा सकती, इसलिए कि न तो वह मुलायम सिंह यादव की तरह धर्मनिर्पेक्षता के अलमबरदार रहे हैं और न मुसलमानों ने उन्हें कभी अपना प्रतिनिधि समझा है। उनके शासनकाल में मुसलमानों को बी.जे.पी का सहभागी होने के बावजूद अधिक शिकायतें नहीं रहीं, मगर जिस तरह अब नरेन्द्र मोदी इस राज्य में साम्प्रदायिकता फैलाते नज़र आ रहे हैं, उनके भयानक परिणामों को समझा जा सकता है, इसलिए मुसलमान नीतिश कुमार के कांधों पर सवार हो कर नरेन्द्र मोदी को ताक़तवर बनाने का निर्णय नहीं ले सकते। वह यह बात भी मन से निकाल दें कि मुसलमानों में अगड़े पिछड़े का अंतर पैदा करके वह उन्हें दो टुकड़ों में बांटने में सफल हो जाएंगे। नरेन्द्र मोदी या साम्प्रदायिक शक्तियों के सवाल पर इस विभेद का कोई अर्थ नहीं है, वे सभी आपको एक साथ खड़े नज़र आएगें। मुलायम सिंह यादव का उदाहरण आपके सामने है और अभी निर्णय का अवसर भी आपके पास है।
पिछले संसदीय चुनाव से पूर्व मुलायम सिंह यादव ने जब कल्याण सिंह का दामन थामा तो रोज़नामा राष्ट्रीय सहरा में अपने लेखों द्वारा हमने उनका घोर विरोध किया था, इसलिए कि मुलायम सिंह यादव का अतीत हमारे सामने था, जिन्हें हमने हमेशा मुसलमानों का शुभचिंतक पाया था। अचानक उनके मिज़ाज में आए परिवर्तन से हम परेशान भी थे और आश्चर्यचकित भी। कई बार हमने यह एहसास दिलाने की कोशिश की कि मुलायम सिंह यादव का माज़ी और उनकी पार्टी का धर्मनिर्पेक्ष मिज़ाज उन्हें ऐसे किसी भी क़दम की इजाज़त नहीं देता। बहुत अच्छा होता, अगर उसी समय उन्होंने अपने फैसले पर पुनर्विचार कर लिया होता, लेकिन देर से ही किया गया उनका यह एक दुरुस्त फैसला है। इतना तो वह भी समझते होंगे कि अगर इस विलम्ब का कोई नुक़्सान पहुंचा तो स्वयं उन्हें ही, मुसलमानों को नहीं। हां, अलबत्ता कांग्रेस को इसका फायदा ज़रूर हुआ। जहां तक मुसलमानों को राजनीति में अपना खोया हुआ सम्मान प्राप्त करने की बात है तो हमें लगता है कि इसके लिए धर्मनिर्पेक्ष ताक़तों का मज़बूत होना अत्यंत आवश्यक है। कांग्रेस की सारी कमियों के बावजूद उसका साथ देने के पीछे अगर कोई कारण था तो केवल यह कि साम्प्रदायिक ताक़तों को सत्ता में आने से रोकना ज़रूरी था। कांग्रेस आज भी जहां साम्प्रदायिक ताक़तों को अकेला रोकने की हैसियत रखती है, उस पर ध्यान दिया जा सकता है, परंतु देश में धर्मनिर्पेक्षता को मज़बूत करने के लिए यह भी ज़रूरी है कि कांग्रेस के अलावा जो अन्य धर्मनिर्पेक्ष राजनीतिज्ञ या राजनीतिक पार्टियां हैं, उन्हें भी कमज़ोर न होने दिया जाए। हाँ, मगर किसी हालत में भी वोट का विभाजन साम्प्रदायिक शक्तियों को मज़बूत न होने दे, इसका विशेष ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।
बिहार में नरेंद्र मोदी के आगमन से पूर्व नितीश कुमार के मामले में भी राय यही थी कि वह धर्मनिर्पेक्ष मिज़ाज रखते हैं और अभी भी उनसे उम्मीदें समाप्त नहीं की जानी चाहिएं, परंतु बिहार में भारतीय जनता पार्टी को किसी के सहारे भी मज़बूत होने का अवसर मिलता है तो आने वाले समय में हमें इसकी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। अगर हम अतीत में किए गए अपने इस ग़लत फैसले की समीक्षा करें तो इस कटु तथ्य को समझने में ज़्यादा देर नहीं लगेगी कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के भारतीय जनता पार्टी का दामन थामने और मुसलमानों के सामने अपना सैक्युलर चेहरा पेश कर उसके लिए वोट मांगने और उसे सत्ता तक पहुंचाने का काम जो उन्होंने किया था, उसका ख़ामियाज़ा मुसलमान आज तक भुगत रहा है और न जाने कब तक उसे भुगतना होगा। आज कांग्रेस बेशक एक धर्मनिर्पेक्ष राजनीतिक दल के रूप में शासक है, मगर भारतीय जनता पार्टी ने अपने शासनकाल में विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री बनने के समय से लेकर 2004 में अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहने तक जब जब भी उसे अवसर मिला, उसने अपने ‘कम्युनल इंजीनियरिंग’ ब्वउउनदंस म्दहपदममतपदीह के फार्मूले द्वारा ब्योरोक्रेसी तथा फ़ौज समेत लगभग सभी क्षेत्रों में ऐसे तत्व दाख़िल कर दिए कि अब कोई भी सरकार अपने सभी निर्णयों को आसानी से अमली जामा नहीं पहना सकती। यह कारण है कि आज देश के गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवानी नहीं हैं, परंतु वह चाहे शिवराज पाटिल रहे हों या पी॰ चिदम्बरम, मुसलमानों के प्रति मिज़ाज में कोई विशेष तब्दीली दिखाई नहीं देती। बम धमाकों की संख्या में कमी ज़रूर आई है, मुस्लिम युवाओं को आतंकवादी बताकर एन्काउन्टर में मार दिए जाने की रफ़्तार में कमी ज़रूर आई है, परंतु यह सिलसिला समाप्त हो गया है, अब आतंकवाद के आरोप में फंसाए गए बेगुनाहों को इन्साफ़ मिलने लगा है, यह कहना बहुत कठिन है। आज भी हमारे सामने ऐसे उदाहरण मौजूद हैं कि कांगे्रस पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ‘बटला हाउस एन्कान्टर सही नहीं था और सर पर पांच गोलियां नहीं लग सकती थीं’, बावजूद इस हक़ीक़त बयानी और सभी धर्मनिर्पेक्ष पार्टियों की मांगों के, सरकार ईमानदाराना जांच का फैसला नहीं ले सकी। क्या अंतर रहा पी॰ चिदम्बरम और शिवराज पाटिल में? आज भी हम डेविड कोलमैन हेडली जो भारत में सबसे बड़े आतंकवादी हमले का प्रमुख अपराधी है, उसके द्वारा इशरत जहां को लशकर-ए-तैयबा का ऐजेंट बता देने पर उसको महत्व देते हैं और यह सिद्ध करने में जुट जाते हैं कि गोया नरेंद्र मोदी सरकार जो कह रही थी वह सच था और एफबीआई तथा लशकर-ए-तैयबा का संयुक्त एजेंट जो कह रहा है वह सच है।
बहरहाल हम चर्चा कर रहे थे मुलायम सिंह यादव की खुले दिल के साथ मुसलमानों से माफ़ी मांगने की। तो हम अत्यंत आदर के साथ उनकी सेवा में यह निवेदन करना चाहते हैं कि अब समय बदल गया है, अब हम वादों और भावनाओं के सहारे फैसला लेने का सिलसिला बंद कर चुके हैं और केवल इस बात के लिए कि अमुक व्यक्ति या पार्टी ने साम्प्रदायिक शक्तियों से टकराने की घोषणा की है, अब हमारे साथ खड़े होने का कारण नहीं बन सकता। राजनीति में ळपअम ंदक ज्ंाम यानी इस हाथ ले, और उस हाथ दे, का चलन अब पूरी तरह आम हो गया है, इसे स्पष्ट शब्दों में ‘सौदा’ भी कहा जा सकता है इसलिए हम भी मुलायम सिंह यादव के सामने ऐसी ही कुछ शर्तें रखें तो बेजा न होगा कि अगर उन्हें हमारा समर्थन दरकार है, वह अपनी खोई हुई राजनीतिक शक्ति को फिर से प्राप्त करने के लिए मुसलमानों का सहयोग चाहते हैं तो चुनावों के बाद वह मुसलमानों के लिए क्या करेंगे, यह तो बहुत बाद की बात है, उन्हें अभी तय करना होगा कि क्या आज वह मुसलमानों का उतने ही खुले दिल से साथ देने के लिए तैयार हैं जितने खुले दिल से उन्हांेंने माफ़ी मांगी है या फिर केवल यह एक राजनीतिक रणनीति है, जैसा कि उनके कुछ विरोधी कह रहे हैं। क्या वह संसद में मुसलमानों की समस्याओं पर आवाज़ उठाने का फैसला लेने के लिए तैयार हैं? कश्मीर में आतंकवाद की आड़ लेकर जो रक्तपात किया जा रहा है, 9 वर्श तक के बच्चों को मार दिया जा रहा है, क्या उनकी पार्टी संसद में इसके विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए तैयार है? अमरनाथ यात्रा जो लालकृष्ण आडवानी की रथ यात्रा की तर्ज़ पर फिर से साम्प्रदायिक घृणा का कारण बनती नज़र आ रही है, क्या वह और उनकी पार्टी इस मामले में हक़ीक़त को बेनक़ाब करने का इरादा रखती है? जिस तरह एक के बाद दूसरा संघ परिवार का कारनामा सामने आने लगा है, आतंकवाद में जिन हिंदु साम्प्रदायिक संगठनों के नाम सामने आने लगे है,ं क्या मुलायम सिंह और उनकी पार्टी संसद के भीतर और बाहर उनके विरुद्ध आवाज़ उठाने का इरादा रखते हैं? बटला हाउस सहित अन्य एन्काउन्टर या बम धमाकों में लिप्त होने का आरोप लगाकर जिन बेगुनाह युवकों को जेल की सलाख़ों के पीछे डाल दिया गया है, क्या उन्हें न्याय दिलाने का इरादा रखते हैं? बेशक अगर उनमें से कुछ वाक़ई गुनहगार हैं तो उन्हें सज़ा दिलाने से भी परहेज़ न करें। (विवरण हम उपलब्ध करेंगे।) मुसलमानों के शैक्षणिक संस्थानों को आतंकवाद का अड्डा बताने का जो अभियान संघ परिवार ने शुरू किया है, क्या उसकी प्रतिरक्षा में वह और उनकी पार्टी खड़े होने का इरादा रखती है। यह इसलिए भी ज़रूरी है कि मुसलमानों के धार्मिक मदरसे और उनके कार्यों से वह भलीभांति अवगत हैं और इन मदरसों नेे कई बार निस्वार्थ भाव से उनका साथ दिया है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के मायनाॅरेटी कैरेक्टर का मामला अभी भी लंबित है, क्या वह संसद में अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रयोग करके इन संस्थानों को उनका वाजिब अधिकार दिलाने में कर सकते हैं? अगर इस जैसे तमाम प्रश्नों का जवाब वह सच्चे दिल से ‘हां’ में देते हैं तो, वह इस समुदाय से सकारात्मक रवैये की उम्मीद कर सकते हैं, वरना माफ़ी के कुछ वाक्य कितने कारगर होने चाहिए, इसका अंदाज़ा वह स्वयं कर सकते हैं।
अब हमारे सामने कल्याण सिंह और मुलायम सिंह की दोस्ती जैसा दूसरा मामला बिहार में जे.डी.यू और भारतीय जनता पार्टी की दोस्ती का है। शरद यादव ने खुल कर यह कह दिया है कि भारतीय जनता पार्टी से हमारे पूराने संबंध हैं और हम मिल कर चुनाव लड़ेंगे। निःसन्देह वह अपने राजनीतिक भविष्य को ज़हन में रख कर कोई भी निर्णय लेने के लिए आज़ाद हैं। नितीश कुमार धर्मनिर्पेक्ष रहेंगे या साम्प्रदायिक, यह निर्णय भी उन्हीं को करना है। वह नरेन्द्र मोदी और उसकी सोच के लोगों को कमज़ोर करना चाहते हैं या शक्तिशाली बनाना चाहते हैं, यह निर्णय भी उन्हें ही करना है। हमने सुपौल की एक जनसभा में लाखों की भीड़ की उपस्थिति में उन्हें संबोधित करते हुए कहा था कि हज़रत अली ने हमारे दोस्तों और दुश्मनों को पहचानने का एक फार्मूला हमारे सामने रखा है, वह यह कि हमारे तीन दोस्त हैं और तीन दुश्मन। हमारे तीन दोस्त वह हैं जो कि सीधे हमारे दोस्त हैं, दोस्तो के दोस्त हैं या हमारे दुश्मनों के दुश्मन हैं। इसी तरह हमारे तीन दुश्मन हैं, जो हमारे दुश्मन हैं, हमारे दोस्तों के दुश्मन हैं या हमारे दुश्मनों के दोस्त हैं। अब वह निर्णय स्वयं कर सकते हैं कि इस फार्मूले के तहत वह किस श्रेणी में आते हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में साम्प्रदायिक शक्तियों के मज़बूत होने की हमने ही नहीं इस देश ने बड़ी हानि उठाई है। बिहार की धर्मनिर्पेक्ष ज़मीन साम्प्रदायिक शक्तियों के हवाले कर देना एक बड़ी भूल होगी, बल्कि अब तो वह समय आगया है कि जिन जिन राज्यों में साम्प्रदायिक ताक़तें ज़रा भी मज़बूत हो गई हैं, वहां उन्हें कमज़ोर करने के लिए सभी धर्मनिर्पेक्ष ताक़तों को एकजुट होना चाहिए, इसी में देश का भी भला है और भारतीय जनता का भी। अभी आईंदा चंद माह में बिहार का चुनाव हमारे सामने है। जो कुछ उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह और मुलायम सिंह के साथ को लेकर हमने निर्णय लिया, वही निर्णय नितीश कुमार और नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक गठजोड़ को सामने रख कर बिहार में करने की आवश्यकता है। अब यह निर्णय नितीश कुमार को करना है कि वह समय रहते साम्प्रदायिक तत्वों से दूरी बना पाते हैं या फिर मुलायम सिंह यादव की तरह ठोकर खाने के बाद कोई निर्णय लेने के बारे में सोचेंगे, मगर यहां एक बात स्पष्ट कर देना अतिआवश्यक है, वह यह कि मुलायम सिंह यादव का पूरा राजनीतिक कैरियर हमारे सामने है, लगभग 25 वर्ष तक धर्मनिर्पेक्षता के अलमबरदार बने रहने, बाबरी मस्जिद को शहादत से बचाने, मुसलमानों की हर मोड़ पर प्रतिनिधित्व करने, यहां तक कि मौलाना मुलायम सिंह यादव का खिताब प्राप्त करने वाले व्यक्ति ने एक ग़लती की और ठोकर खाने के बाद क्षमा याचना कर ली। उनकी पिछली भूमिका को सामने रख कर इस माफी को स्वीकार करने में मुसलमानों को शायद इतना संकोच न हो, मगर यही बात नीतिश कुमार के मामले में नहीं कही जा सकती, इसलिए कि न तो वह मुलायम सिंह यादव की तरह धर्मनिर्पेक्षता के अलमबरदार रहे हैं और न मुसलमानों ने उन्हें कभी अपना प्रतिनिधि समझा है। उनके शासनकाल में मुसलमानों को बी.जे.पी का सहभागी होने के बावजूद अधिक शिकायतें नहीं रहीं, मगर जिस तरह अब नरेन्द्र मोदी इस राज्य में साम्प्रदायिकता फैलाते नज़र आ रहे हैं, उनके भयानक परिणामों को समझा जा सकता है, इसलिए मुसलमान नीतिश कुमार के कांधों पर सवार हो कर नरेन्द्र मोदी को ताक़तवर बनाने का निर्णय नहीं ले सकते। वह यह बात भी मन से निकाल दें कि मुसलमानों में अगड़े पिछड़े का अंतर पैदा करके वह उन्हें दो टुकड़ों में बांटने में सफल हो जाएंगे। नरेन्द्र मोदी या साम्प्रदायिक शक्तियों के सवाल पर इस विभेद का कोई अर्थ नहीं है, वे सभी आपको एक साथ खड़े नज़र आएगें। मुलायम सिंह यादव का उदाहरण आपके सामने है और अभी निर्णय का अवसर भी आपके पास है।
Thursday, July 15, 2010
महाराजा को अपनी चिंता थी, कश्मीर की नहीं
अज़ीज़ बर्नी
मैंने अपने कल के लेख में महाराजा हरि सिंह ’ द्वारा सरदार पटेल के नाम लिखे पत्र के उन बिंदुओं पर बात करनी शुरू की थी, जिन्हें अंडर लाइन किया गया था। सबसे पहले मैंने उस पत्र के लिखे जाने की तिथि 31 जनवरी 1948 अर्थात महात्मा गांधी की हत्या के ठीक अगले दिन को सामने रखा और उस दिन के हालात को भी जो मौलाना आज़ाद ने काफ़ी विस्तार के साथ अपनी पुस्तक में लिखे हैं। उसके बाद कई ऐसे बिंदु हैं, जिन्हें चर्चा में लाया जा सकता है, लेकिन मैं गुफ़्तगू को बहुत तूल देना नहीं चाहता, इसलिए केवल उन बिंदुओं पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रहा हूं जो अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जैसे:
महाराजा हरि सिंह ने अपने पत्र में लिखाः
न केवल मुझे बल्कि तमाम हिंदुओं और सिखों के साथ राज्य के वह लोग जो नेशनल कान्फ्ऱेंस से संबंध रखते हैं, के लिए अनिश्चितता की स्थिति’ बन गयी है और उलझाव पैदा हो रहा है। यह भावनाएं सुदृढ़ होने का औचित्य प्राप्त कर रहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ग़लत फैसला करेगी और आख़िरकार राज्य का पाकिस्तान के साथ विलय हो जाएगा। ऐसे में हिंदु और सिख जनता ने राज्य से बाहर निकलना शुरू कर दिया है। नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेता भी ऐसा ही महसूस करते हैं कि अंततः संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के फैसले को स्वीकार करने में उनको निराशा होगी और यह किसी बड़ी दुघर्टना से कम नहीं होगी।
महाराजा हरि सिंह के पत्र की उपरोक्त पंक्तियां जिन्हें एक बार फिर मैंने पाठकों के सामने रखा, दो प्रमुख पहलुआंे की ओर इशारा करती हैं।
पहला यह कि संयुक्त राष्ट्र के फैसले को लेकर उस समय की स्थिति यह थी कि महाराजा हरि सिंह, कश्मीर राज्य के हिंदू और सिख तथा नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेता ऐसा महसूस करते थे कि फैसला पाकिस्तान के साथ विलय के रूप में सामने आएगा। इस फैसले को लेकर केवल महाराजा हरि सिंह ही परेशान नहीं थे बल्कि जम्मू व कश्मीर राज्य की जनता भी परेशान थी। परेशानी का आलम यह था कि राज्य के हिंदू और सिख घाटी छोड़ कर जाने लगे थे, इतना ही नहीं इस पत्र के अनुसार नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेता भी इस फै़सले को लेकर निराशा प्रकट कर रहे थे और इसे किसी बड़ी दुर्घटना के रूप में देख रहे थे। अगर हम 1989 के बाद के हालात पर विचार करें तो बड़ी संख्या में राज्य के हिंदू कश्मीर छोड़ने को मजबूर हुए और उसकी सीधी ज़िम्मेदारी कश्मीर के मुसलमानों पर डाल दी गई। इसे यूं भी कह सकते हैं कि कश्मीर के अलगाववादियों पर डाल दी गई। मैं उनके बचाव में कुछ भी नहीं कहना चाहूंगा, लेकिन इतना अवश्य कहना चाहता हूं कि देश के विभाजन के बाद से ही जम्मू व कश्मीर विशेष रूप से कश्मीर के हिंदू और सिखों ने राज्य को छोड़ने का मन बना लिया था और इस पत्र की इबारत से भी यह भी स्पष्ट होता है कि संयुक्त राष्ट्र के फैसले के अनुमान को लेकर आबादी के इस पलायन में और तेज़ी आई थी, क्योंकि उन्हें यह अंदाज़ा हो गया था कि जम्मू व कश्मीर का विलय पाकिस्तान के साथ हो सकता है, इसलिए आज यह आरोप लगाना पूरी तरह अनुचित होगा कि राज्य के हिंदुओं या सिखों को घाटी छोड़ने के लिए मुसलमानों ने मजबूर किया, बकिल देश के विभाजन के बाद जो हालात पैदा हुए, उनमें हिंदू हों या मुसलमान, उन्हें यही अधिक उचित लगा कि जहां वह अत्यंत अल्पसंख्या में हैं, वह क्षेत्र छोड़ कर उस ओर पलायन कर जाएं, जहां उनके अपने समुदाय या धर्म के लोग अधिक हैं।
दूसरा जो विचारणीय पहलू है, वह यह कि नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेता पाकिस्तान के साथ विलय की कल्पना से ही निराश थे, यानी वह उसे नापसंद करते थे। उस समय नेशनल कान्फ्ऱेंस के मुखिया और राज्य के प्रधानमंत्री शेख़ मुहम्मद अब्दुल्लाह थे और आज जम्मू व कश्मीर के मुख्यमंत्री उनके पोते उमर अब्दुल्लाह हैं, यानी नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेतागण उस समय भी भारत के साथ ही रहना चाहते थे और आज भी। अब रहा प्रश्न कश्मीरी जनता का तो आजकी बदली हुई स्थिति की जो सच्चाई है, उस पर गुफ़्तगू इस लेख की अगली क़िस्तों में की जाएगी, लेकिन उस समय कश्मीरी जनता यानी मुसलमानों का फैसला भी वही था जो नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेताओं का था, यानी वह भारत के साथ ही रहना चाहते थे, पाकिस्तान के साथ विलय की कल्पना भी उन्हें गवारा नहीं थी। मैं इस पर विशेष ध्यान इसलिए दिलाना चाहता हूं कि आज अगर कुछ पृथकतावादी तत्व सक्रिय हैं और वह भारत के साथ नहीं रहना चाहते तो उसे सब का फैसला माना नहीं जा सकता। साथ ही ध्यान इस बात पर भी देना होगा कि आख़िर उनका मन पृथकतावादी क्यों बना। जब हम नक्सलाइट मूवमेंट के कारणों पर विचार करने का मन रखते हैं तो क्या हमें कश्मीर के वर्तमान हालात को मन में रखते हुए इस अलगाववादी मिज़ाज के कारणों पर विचार करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
महाराजा हरि सिंह अपने इसी पत्र में आगे लिखते हैंः
इस मामले में मेरी स्थिति चिंताजनक है। आप जानते हैं कि मैं निश्चित रूप से भारत के साथ विलय करूंगा, इस विचार के साथ कि भारत मुझे मुसीबत में नहीं छोड़ेगा और मेरी स्थिति और मेरे शाही रुतबे सुरक्षित रहेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि आंतरिक व्यवस्था के मामले में मैंने भारत सरकार के सुझाव को स्वीकार किया है।
इस ऐतिहासिक पत्र की उपरोक्त पंक्तियां स्पष्ट रूप में यह इशारा करती हैं कि महाराजा हरि सिंह ने निजी स्वार्थों के मद्देनज़र उस समय भारत सरकार के साथ जम्मू व कश्मीर की जनता की क़ीमत पर एक सौदा किया था और इस सौदेबाज़ी में जहां जम्मू व कश्मीर का विलय भारत के पक्ष में करने का फैसला था, वहीं दूसरी ओर भारत सरकार की ओर से उनके शाही रुतबे की सुरक्षा भी मांगी गयी थी। यानी इस विलय में उन्हें इस बात की बिल्कुल चिंता नहीं थी कि राज्य की जनता क्या चाहती है? उसकी इच्छा क्या है? यह अलग बात है कि क़बाइलियों की ओर से कश्मीर पर किए गए आक्रमण को लेकर राज्य की जनता ख़ुद पास्कितान से नाराज़ थी और उसके साथ विलय नहीं चाहती थी, इसलिए कि वह मानती थी कि कश्मीर पर क़बाइलियों का हमला पाकिस्तान की शह पर है औन उन्हें पाकिस्तान से सहयोग प्राप्त हो रहा है, लेकिन इन सबसे हट कर स्वयं महाराजा हरि सिंह के अपने ही पत्र से उनकी नियत स्पष्ट हो रही है, जो पत्र देश की आज़ादी या देश के विभाजन के दिन मात्र 5 माह 15 दिन महीने बाद ही लिखा गया था।
अपने इस पत्र में महाराजा हरि सिंह आगे लिखते हैं:
कई बार मुझे लगता है कि भारत के साथ विलय की प्रक्रिया को वापस ले लेना चाहिए। भारतीय संघ ने अंतरिम रूप से विलय को स्वीकार किया है और अगर संघ हमारे क्षेत्र को हमें वापस नहीं कर सकता है और सुरक्षा परिषद के फैसले को स्वीकार करने जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप हमें पाकिस्तान को हस्तांतरित किया जा सकता है तो ऐसे में भारत के साथ विलय पर क़ायम रहने का कोई अर्थ नहीं है।
मेरे पास एक सम्भावित विकल्प है और वह यह कि विलय के फैसले को वापस ले लिया जाए ताकि संयुक्त राष्ट्र रेफ्ऱेंस का मामला समाप्त हो जाए क्योंकि भारतीय संघ को इस कार्यवाही को जारी रखने का कोई अधिकार नहीं है, अगर विलय के फैसले को वापस ले लिया जाए, उसका परिणाम यह होगा कि राज्य विलय से पहले के हालात में पहंुच जाएगा।
अंतिम चंद पंक्तियों को इस पत्र के जवाब में रद्द करते हुए भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जो पत्र लिखा था वह अपने इस मुसलसल लेख की अगली क़िस्तों में प्रकाशित किया जाएगा। फ़िलहाल इन पंक्तियों के उल्लेख का मतलब केवल इतना है कि महाराजा हरि सिंह लगातार असमंजस की स्थिति में थे और वह केवल अपने बारे में ही सोच रहे थे। वह भारत के साथ विलय के फैसले पर भी पुनरविचार कर रहे थे और भारत सरकार के साथ उन्होंने उन हालात में जो विलय का फैसला किया था वह भी कुछ शर्तों पर आधारित था। अगर राज्य की जनता के हितों पर इस समय बहस न करें तो स्पष्ट रूप से यह बात सामने आती है कि उनका बुनियादी उद्देश्य अपने रुतबे की रक्षा था और जब जब उन्हंे यह महसूस होता था कि भारत सरकार उनके अधिकारों की रक्षा नहीं कर पा रही है या ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि उनका शासन ख़तरे में पड़ जाए तो वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे।
महाराजा हरि सिंह के इस पत्र की कुछ अंतिम पंक्तियां जिन्हें मैंने प्रमुख रूप से सामने रखा था, निम्नलिखित हैं:
मैं अपने वर्तमान जीवन से दुखी हो गया हूं और यह मेरे लिए बेहतर होगा कि लड़ते हुए अपनी जान न्यौछावर कर दूं। इसके मुक़ाबले कि अपने लोगों की कठिनाइयों को असहाय देखता रहूं।
महाराजा हरि सिंह की निराशा इन पंक्तियों में स्पष्ट रूप में नज़र आती है। अगर उनका मतलब यह समझा जाए कि अपने अधिकारों की सुरक्षा न होने की स्थिति में वह आत्महत्या तक करने पर उतारू थे तो अंदाज़ा किया जा सकता है कि आज इस राज्य की जनता जिस रास्ते पर चल पड़ी है, इस स्थिति में उनके पास कितने विकल्प मौजूद हैं। यानी जिस तरह हालात अनुकूल नज़र न आने पर वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे इसी तरह आज इस राज्य की जनता हालात अपने अनुकूल न देख कर किसी हद तक जाती नज़र आ रही है।
हमें इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ को सामने रखने की आवश्यकता केवल इसलिए महसूस हुई ताकि हम देश के ज़िम्मेदारों को यह बता सकें, उनसे यह निवेदन कर सकें कि कश्मीर के हालात केवल आज या पिछले कुछ वर्षों से ख़राब नहीं हैं, बल्कि लगभग देश के विभाजन के बाद से ही उन्हें इन हालात का सामना करना पड़े उन्हें, बार-बार पीड़ादायक स्थितियों से गुज़रना पड़ा है। उन्हांेंने बड़े विश्वास के साथ पाकिस्तान के मुक़ाबले भारत को वरीयता दी थी, आज अगर उनमें से कुछ लोग भी इससे अलग हट कर सोचने लगे हैं तो हमें यह समझना होगा कि अपने अनुकूल हालात न देख कर पुनर्विचार का फैसला तो महाराजा हरि सिंह ने भी किया था। क्या हम उन्हें किसी क्षण भी इस श्रेणी में रखा है, जिस श्रेणी में हम आज पुनर्विचार करने वालों को रखते हैं? यह अंतिम कुछ वाक्य लिखने का कारण केवल इतना है कि सारी परिस्थितियों पर सहानुभूतिपूर्ण तथा गंभीरता के साथ विचार किया जाए, नफ़रत का जवाब नफ़रत, समस्या का समाधान नहीं हो सकता। बहरहाल कश्मीर समस्या पर अभी बहुत कुछ लिखना और प्रस्तुत करना बाक़ी है। चूंकि महाराजा हरि सिंह के इस पत्र की इबारत और हमारे विष्लेशण के बाद यह आवश्यक है कि हम सरदार पटेल की ओर से दिए गए उत्तर का अंश भी पाठकों के सामने प्रस्तुत करें, जिसका उल्लेख हमने आजके इस लेख में किया है।
इस पत्र का उत्तर सरदार पटेल ने 9 फरवरी 1948 को दिया और अपने उत्तर में लिखा:
मुझे अंदाज़ा है कि आप कितने चिंताजनक समय से गुज़र रहे हैं। मैं आपको संतोष दिलाना चाहूंगा, मैं भी कश्मीर के हालात और जो कुछ संयुक्त राष्ट्र में हो रहा है, उस पर कम परेशान नहीं हूं, लेकिन जो भी वर्तमान परिस्थितियां हों निराशा के सुझाव का प्रश्न ही नहीं उठता है।
अपने इस संक्षिप्त उत्तर में सरदार पटेल ने केवल हल्की सी सांत्वना देकर बात समाप्त कर दी उन सभी बिंदुओं पर कोई उचित उत्तर नहीं दिया जो महाराजा हरि सिंह ने सामने रखे थे। हमारा अध्ययन जारी है अगर कहीं इस से अधिक विवरण प्राप्त होता है तो वह भी प्रकाशित किया जाएगा।
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महाराजा हरि सिंह ने अपने पत्र में लिखाः
न केवल मुझे बल्कि तमाम हिंदुओं और सिखों के साथ राज्य के वह लोग जो नेशनल कान्फ्ऱेंस से संबंध रखते हैं, के लिए अनिश्चितता की स्थिति’ बन गयी है और उलझाव पैदा हो रहा है। यह भावनाएं सुदृढ़ होने का औचित्य प्राप्त कर रहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ग़लत फैसला करेगी और आख़िरकार राज्य का पाकिस्तान के साथ विलय हो जाएगा। ऐसे में हिंदु और सिख जनता ने राज्य से बाहर निकलना शुरू कर दिया है। नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेता भी ऐसा ही महसूस करते हैं कि अंततः संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के फैसले को स्वीकार करने में उनको निराशा होगी और यह किसी बड़ी दुघर्टना से कम नहीं होगी।
महाराजा हरि सिंह के पत्र की उपरोक्त पंक्तियां जिन्हें एक बार फिर मैंने पाठकों के सामने रखा, दो प्रमुख पहलुआंे की ओर इशारा करती हैं।
पहला यह कि संयुक्त राष्ट्र के फैसले को लेकर उस समय की स्थिति यह थी कि महाराजा हरि सिंह, कश्मीर राज्य के हिंदू और सिख तथा नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेता ऐसा महसूस करते थे कि फैसला पाकिस्तान के साथ विलय के रूप में सामने आएगा। इस फैसले को लेकर केवल महाराजा हरि सिंह ही परेशान नहीं थे बल्कि जम्मू व कश्मीर राज्य की जनता भी परेशान थी। परेशानी का आलम यह था कि राज्य के हिंदू और सिख घाटी छोड़ कर जाने लगे थे, इतना ही नहीं इस पत्र के अनुसार नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेता भी इस फै़सले को लेकर निराशा प्रकट कर रहे थे और इसे किसी बड़ी दुर्घटना के रूप में देख रहे थे। अगर हम 1989 के बाद के हालात पर विचार करें तो बड़ी संख्या में राज्य के हिंदू कश्मीर छोड़ने को मजबूर हुए और उसकी सीधी ज़िम्मेदारी कश्मीर के मुसलमानों पर डाल दी गई। इसे यूं भी कह सकते हैं कि कश्मीर के अलगाववादियों पर डाल दी गई। मैं उनके बचाव में कुछ भी नहीं कहना चाहूंगा, लेकिन इतना अवश्य कहना चाहता हूं कि देश के विभाजन के बाद से ही जम्मू व कश्मीर विशेष रूप से कश्मीर के हिंदू और सिखों ने राज्य को छोड़ने का मन बना लिया था और इस पत्र की इबारत से भी यह भी स्पष्ट होता है कि संयुक्त राष्ट्र के फैसले के अनुमान को लेकर आबादी के इस पलायन में और तेज़ी आई थी, क्योंकि उन्हें यह अंदाज़ा हो गया था कि जम्मू व कश्मीर का विलय पाकिस्तान के साथ हो सकता है, इसलिए आज यह आरोप लगाना पूरी तरह अनुचित होगा कि राज्य के हिंदुओं या सिखों को घाटी छोड़ने के लिए मुसलमानों ने मजबूर किया, बकिल देश के विभाजन के बाद जो हालात पैदा हुए, उनमें हिंदू हों या मुसलमान, उन्हें यही अधिक उचित लगा कि जहां वह अत्यंत अल्पसंख्या में हैं, वह क्षेत्र छोड़ कर उस ओर पलायन कर जाएं, जहां उनके अपने समुदाय या धर्म के लोग अधिक हैं।
दूसरा जो विचारणीय पहलू है, वह यह कि नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेता पाकिस्तान के साथ विलय की कल्पना से ही निराश थे, यानी वह उसे नापसंद करते थे। उस समय नेशनल कान्फ्ऱेंस के मुखिया और राज्य के प्रधानमंत्री शेख़ मुहम्मद अब्दुल्लाह थे और आज जम्मू व कश्मीर के मुख्यमंत्री उनके पोते उमर अब्दुल्लाह हैं, यानी नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेतागण उस समय भी भारत के साथ ही रहना चाहते थे और आज भी। अब रहा प्रश्न कश्मीरी जनता का तो आजकी बदली हुई स्थिति की जो सच्चाई है, उस पर गुफ़्तगू इस लेख की अगली क़िस्तों में की जाएगी, लेकिन उस समय कश्मीरी जनता यानी मुसलमानों का फैसला भी वही था जो नेशनल कान्फ्ऱेंस के नेताओं का था, यानी वह भारत के साथ ही रहना चाहते थे, पाकिस्तान के साथ विलय की कल्पना भी उन्हें गवारा नहीं थी। मैं इस पर विशेष ध्यान इसलिए दिलाना चाहता हूं कि आज अगर कुछ पृथकतावादी तत्व सक्रिय हैं और वह भारत के साथ नहीं रहना चाहते तो उसे सब का फैसला माना नहीं जा सकता। साथ ही ध्यान इस बात पर भी देना होगा कि आख़िर उनका मन पृथकतावादी क्यों बना। जब हम नक्सलाइट मूवमेंट के कारणों पर विचार करने का मन रखते हैं तो क्या हमें कश्मीर के वर्तमान हालात को मन में रखते हुए इस अलगाववादी मिज़ाज के कारणों पर विचार करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
महाराजा हरि सिंह अपने इसी पत्र में आगे लिखते हैंः
इस मामले में मेरी स्थिति चिंताजनक है। आप जानते हैं कि मैं निश्चित रूप से भारत के साथ विलय करूंगा, इस विचार के साथ कि भारत मुझे मुसीबत में नहीं छोड़ेगा और मेरी स्थिति और मेरे शाही रुतबे सुरक्षित रहेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि आंतरिक व्यवस्था के मामले में मैंने भारत सरकार के सुझाव को स्वीकार किया है।
इस ऐतिहासिक पत्र की उपरोक्त पंक्तियां स्पष्ट रूप में यह इशारा करती हैं कि महाराजा हरि सिंह ने निजी स्वार्थों के मद्देनज़र उस समय भारत सरकार के साथ जम्मू व कश्मीर की जनता की क़ीमत पर एक सौदा किया था और इस सौदेबाज़ी में जहां जम्मू व कश्मीर का विलय भारत के पक्ष में करने का फैसला था, वहीं दूसरी ओर भारत सरकार की ओर से उनके शाही रुतबे की सुरक्षा भी मांगी गयी थी। यानी इस विलय में उन्हें इस बात की बिल्कुल चिंता नहीं थी कि राज्य की जनता क्या चाहती है? उसकी इच्छा क्या है? यह अलग बात है कि क़बाइलियों की ओर से कश्मीर पर किए गए आक्रमण को लेकर राज्य की जनता ख़ुद पास्कितान से नाराज़ थी और उसके साथ विलय नहीं चाहती थी, इसलिए कि वह मानती थी कि कश्मीर पर क़बाइलियों का हमला पाकिस्तान की शह पर है औन उन्हें पाकिस्तान से सहयोग प्राप्त हो रहा है, लेकिन इन सबसे हट कर स्वयं महाराजा हरि सिंह के अपने ही पत्र से उनकी नियत स्पष्ट हो रही है, जो पत्र देश की आज़ादी या देश के विभाजन के दिन मात्र 5 माह 15 दिन महीने बाद ही लिखा गया था।
अपने इस पत्र में महाराजा हरि सिंह आगे लिखते हैं:
कई बार मुझे लगता है कि भारत के साथ विलय की प्रक्रिया को वापस ले लेना चाहिए। भारतीय संघ ने अंतरिम रूप से विलय को स्वीकार किया है और अगर संघ हमारे क्षेत्र को हमें वापस नहीं कर सकता है और सुरक्षा परिषद के फैसले को स्वीकार करने जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप हमें पाकिस्तान को हस्तांतरित किया जा सकता है तो ऐसे में भारत के साथ विलय पर क़ायम रहने का कोई अर्थ नहीं है।
मेरे पास एक सम्भावित विकल्प है और वह यह कि विलय के फैसले को वापस ले लिया जाए ताकि संयुक्त राष्ट्र रेफ्ऱेंस का मामला समाप्त हो जाए क्योंकि भारतीय संघ को इस कार्यवाही को जारी रखने का कोई अधिकार नहीं है, अगर विलय के फैसले को वापस ले लिया जाए, उसका परिणाम यह होगा कि राज्य विलय से पहले के हालात में पहंुच जाएगा।
अंतिम चंद पंक्तियों को इस पत्र के जवाब में रद्द करते हुए भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जो पत्र लिखा था वह अपने इस मुसलसल लेख की अगली क़िस्तों में प्रकाशित किया जाएगा। फ़िलहाल इन पंक्तियों के उल्लेख का मतलब केवल इतना है कि महाराजा हरि सिंह लगातार असमंजस की स्थिति में थे और वह केवल अपने बारे में ही सोच रहे थे। वह भारत के साथ विलय के फैसले पर भी पुनरविचार कर रहे थे और भारत सरकार के साथ उन्होंने उन हालात में जो विलय का फैसला किया था वह भी कुछ शर्तों पर आधारित था। अगर राज्य की जनता के हितों पर इस समय बहस न करें तो स्पष्ट रूप से यह बात सामने आती है कि उनका बुनियादी उद्देश्य अपने रुतबे की रक्षा था और जब जब उन्हंे यह महसूस होता था कि भारत सरकार उनके अधिकारों की रक्षा नहीं कर पा रही है या ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि उनका शासन ख़तरे में पड़ जाए तो वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे।
महाराजा हरि सिंह के इस पत्र की कुछ अंतिम पंक्तियां जिन्हें मैंने प्रमुख रूप से सामने रखा था, निम्नलिखित हैं:
मैं अपने वर्तमान जीवन से दुखी हो गया हूं और यह मेरे लिए बेहतर होगा कि लड़ते हुए अपनी जान न्यौछावर कर दूं। इसके मुक़ाबले कि अपने लोगों की कठिनाइयों को असहाय देखता रहूं।
महाराजा हरि सिंह की निराशा इन पंक्तियों में स्पष्ट रूप में नज़र आती है। अगर उनका मतलब यह समझा जाए कि अपने अधिकारों की सुरक्षा न होने की स्थिति में वह आत्महत्या तक करने पर उतारू थे तो अंदाज़ा किया जा सकता है कि आज इस राज्य की जनता जिस रास्ते पर चल पड़ी है, इस स्थिति में उनके पास कितने विकल्प मौजूद हैं। यानी जिस तरह हालात अनुकूल नज़र न आने पर वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे इसी तरह आज इस राज्य की जनता हालात अपने अनुकूल न देख कर किसी हद तक जाती नज़र आ रही है।
हमें इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ को सामने रखने की आवश्यकता केवल इसलिए महसूस हुई ताकि हम देश के ज़िम्मेदारों को यह बता सकें, उनसे यह निवेदन कर सकें कि कश्मीर के हालात केवल आज या पिछले कुछ वर्षों से ख़राब नहीं हैं, बल्कि लगभग देश के विभाजन के बाद से ही उन्हें इन हालात का सामना करना पड़े उन्हें, बार-बार पीड़ादायक स्थितियों से गुज़रना पड़ा है। उन्हांेंने बड़े विश्वास के साथ पाकिस्तान के मुक़ाबले भारत को वरीयता दी थी, आज अगर उनमें से कुछ लोग भी इससे अलग हट कर सोचने लगे हैं तो हमें यह समझना होगा कि अपने अनुकूल हालात न देख कर पुनर्विचार का फैसला तो महाराजा हरि सिंह ने भी किया था। क्या हम उन्हें किसी क्षण भी इस श्रेणी में रखा है, जिस श्रेणी में हम आज पुनर्विचार करने वालों को रखते हैं? यह अंतिम कुछ वाक्य लिखने का कारण केवल इतना है कि सारी परिस्थितियों पर सहानुभूतिपूर्ण तथा गंभीरता के साथ विचार किया जाए, नफ़रत का जवाब नफ़रत, समस्या का समाधान नहीं हो सकता। बहरहाल कश्मीर समस्या पर अभी बहुत कुछ लिखना और प्रस्तुत करना बाक़ी है। चूंकि महाराजा हरि सिंह के इस पत्र की इबारत और हमारे विष्लेशण के बाद यह आवश्यक है कि हम सरदार पटेल की ओर से दिए गए उत्तर का अंश भी पाठकों के सामने प्रस्तुत करें, जिसका उल्लेख हमने आजके इस लेख में किया है।
इस पत्र का उत्तर सरदार पटेल ने 9 फरवरी 1948 को दिया और अपने उत्तर में लिखा:
मुझे अंदाज़ा है कि आप कितने चिंताजनक समय से गुज़र रहे हैं। मैं आपको संतोष दिलाना चाहूंगा, मैं भी कश्मीर के हालात और जो कुछ संयुक्त राष्ट्र में हो रहा है, उस पर कम परेशान नहीं हूं, लेकिन जो भी वर्तमान परिस्थितियां हों निराशा के सुझाव का प्रश्न ही नहीं उठता है।
अपने इस संक्षिप्त उत्तर में सरदार पटेल ने केवल हल्की सी सांत्वना देकर बात समाप्त कर दी उन सभी बिंदुओं पर कोई उचित उत्तर नहीं दिया जो महाराजा हरि सिंह ने सामने रखे थे। हमारा अध्ययन जारी है अगर कहीं इस से अधिक विवरण प्राप्त होता है तो वह भी प्रकाशित किया जाएगा।
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مہاراجا کو اپنی فکر تھی، کشمیر کی نہیں
عزیز برنی
=میں نے اپنے کل کے مضمون میں مہاراجا ہری سنگھ کے ذریعہ سردار پٹیل کے نام لکھے گئے خط کے ان نکات پر بات کرنا شروع کی تھی، جنہیں انڈرلائن کیا گیا تھا۔ سب سے پہلے میں نے اس خط کے لکھے جانے کی تاریخ 3جنوری948، یعنی مہاتماگاندھی جی کے قتل کے ٹھیک اگلے روز سامنے رکھا اور اس دن کے حالات کو بھی جو مولانا ابوالکلام آزاد نے بہت وضاحت کے ساتھ اپنی کتاب میں درج کئے ہیں۔ اس کے بعد متعدد ایسے نکات ہیں، جنہیں زیربحث لایا جاسکتا ہے، لیکن میں گفتگو کو بہت طول نہیں دینا چاہتا، اس لےے صرف ان نکات پر روشنی ڈالنے کی کوشش کررہا ہوں، جو انتہائی اہم ہیں۔مثلاً
مہاراجا ہری سنگھ نے اپنے مضمون میں لکھا کہ
!نہ صرف مجھے بلکہ تمام ہندو اور سکھوں کے ساتھ ریاست کے وہ لوگ جو نیشنل کانفرنس سے تعلق رکھتے ہیں، کے لئے غیر یقینی حالات اور الجھاؤ پیدا ہورہاہے۔ یہ جذبات مضبوط ہونے کا جواز حاصل کر رہے ہیں کہ اقوام متحدہ کی سلامتی کونسل نقصان دہ فیصلہ کرے گی اور آخر کارریاست کا پاکستان کے ساتھ الحاق ہو جائے گا۔ ایسے میں ہندو اور سکھ عوام نے ریاست سے باہر نکلنا شروع کردیا ہے۔…… نیشنل کانفرنس کے لیڈران بھی ایسا محسوس کرتے ہیں کہ آخرکار سلامتی کونسل کے فیصلہ کو قبول کرنے میں ان کو مایوسی ہوگی اور یہ ان کے لےے کسی بڑے حادثے سے کم نہیں ہوگا۔
مہاراجا ہری سنگھ کے خط کی مذکورہ بالا سطریں جنہیں ایک بار پھر میں نے قارئین کے سامنے رکھا، دو خاص پہلوؤں کی جانب اشارہ کرتی ہیں۔
پہلا یہ کہ اقوام متحدہ کے فیصلہ کو لے کر اس وقت کی صورتحال یہ تھی کہ مہاراجا ہری سنگھ، ریاست کشمیر کے ہندو اور سکھ و نیشنل کانفرنس کے لیڈران ایسا محسوس کرتے تھے کہ فیصلہ پاکستان کے ساتھ الحاق کی شکل میں سامنے آئے گا۔ اس فیصلہ کو لے کرصرف مہاراجا ہری سنگھ ہی پریشان نہیں تھے، بلکہ ریاست جموںوکشمیر کے عوام بھی پریشان تھے اور پریشانی کا عالم یہ تھا کہ ریاست کے ہندو اور سکھ وادی چھوڑ کر جانے لگے تھے۔ اتنا ہی نہیں اس خط کے مطابق نیشنل کانفرنس کے لیڈران بھی اس فیصلے کو لے کر مایوسی کا اظہار کررہے تھے اور اسے کسی بڑے حادثہ کی شکل میں دیکھ رہے تھے۔ اگر ہم 1989کے بعد کے حالات پر غور کریں تو بڑی تعداد میں ریاست کے ہندو کشمیر چھوڑنے کے لےے مجبور ہوئے اور اس کی سیدھی ذمہ داری کشمیر کے مسلمانوں پر عائد کی گئی۔ اسے یوں بھی کہہ سکتے ہیں کہ کشمیر کے انتہاپسندوں پر عائد کی گئی۔ میں ان کے بچاؤ میں کچھ بھی نہیں کہنا چاہتا، لیکن اتنا ضرور کہنا چاہتا ہوں کہ تقسیم وطن کے بعد سے ہی جموںوکشمیر خاص طور پر کشمیر کے ہندواور سکھوں نے ریاست کو چھوڑنے کا ذہن بنالیا تھا اور اس خط کی عبارت سے بھی یہ واضح ہوتا ہے کہ اقوام متحدہ کے فیصلہ کے قیاس کو لے کر آبادی کی اس منتقلی میں اور تیزی آئی تھی، کیوں کہ انہیں یہ اندازہ ہوگیا تھا کہ جموں وکشمیر کا الحاق پاکستان میں ہوسکتا ہے، لہٰذا آج یہ الزام عائد کرنا قطعاً غیرمناسب ہوگا کہ ریاست کے ہندوؤں کو یا سکھوں کو وادی چھوڑنے کے لےے مسلمانوں نے مجبور کیا، بلکہ تقسیم وطن کے بعد جو حالات پیدا ہوئے، ان میں ہندو ہوں یا مسلمان، انہیں یہی زیادہ مناسب لگا کہ جہاں وہ انتہائی اقلیت میں ہیں، وہ علاقہ چھوڑ کر اس طرف منتقل ہوجائیں، جہاں ان کی اپنی برادری یا مذہب کے لوگ زیادہ ہیں۔
دوسرا جو قابل غور پہلو ہے، وہ یہ کہ نیشنل کانفرنس کے لیڈران پاکستان کے ساتھ الحاق کے تصور سے ہی مایوس تھے، یعنی وہ اسے ناپسند کرتے تھے۔ اس وقت نیشنل کانفرنس کے سربراہ اور ریاست کے وزیراعظم شیخ محمد عبداللہ تھے اور آج جموںوکشمیر کے وزیراعلیٰ ان کے پوتے عمرعبداللہ ہیں، یعنی نیشنل کانفرنس کے لیڈران اس وقت بھی ہندوستان کے ساتھ ہی رہنا چاہتے تھے اور آج بھی۔ اب رہا سوال کشمیری عوام کا تو آج کی بدلی ہوئی صورتحال کی جو سچائی ہے، اس پر گفتگو اس مضمون کی آئندہ قسطوں میں کی جائے گی، لیکن اس وقت کشمیری عوام یعنی مسلمانوں کا فیصلہ بھی وہی تھا جو نیشنل کانفرنس کے لیڈران کاتھا، یعنی وہ ہندوستان کے ساتھ ہی رہنا چاہتے تھے، پاکستان کے ساتھ الحاق کا تصور بھی انہیں گوارا نہیں تھا۔ میں اس پر خصوصی توجہ اس لےے دلانا چاہتا ہوں کہ آج اگر کچھ علیحدگی پسند عناصر سرگرم ہیں اور وہ ہندوستان کے ساتھ نہیں رہنا چاہتے تو اسے سب کا فیصلہ تسلیم نہیں کیا جاسکتا۔ ساتھ ہی توجہ اس بات پر بھی دینی ہوگی کہ آخر ان کا علیحدگی پسندانہ ذہن کیوں بنا۔ جب ہم نکسلائٹ موومنٹ کی وجوہات پر غور کرنے کا ذہن رکھتے ہیں تو کیا ہمیں کشمیر کے موجودہ حالات کو ذہن میں رکھتے ہوئے اس انتہاپسندانہ مزاج کی وجوہات پر غور کرنے کی ضرورت نہیں ہونی چاہےے۔
مہاراجا ہری سنگھ اپنے اسی خط میں آگے لکھتے ہیں :
اس معاملے میں میری پوزیشن تشویش ناک ہے۔ آپ جانتے ہیں کہ میں یقینی طور پر ہندوستان کے ساتھ الحاق کروں گا، اس خیال کے ساتھ کہ ہندوستان مجھے مصیبت میں نہیں چھوڑے گا اور یہ کہ میری پوزیشن اور میرے شاہی مراتب محفوظ رہےں گے۔ ایسا اس لئے کیونکہ داخلی انتظام کے معاملے میں میں نے حکومت ہند کے مشورہ کو منظور کیا ہے۔
اس تاریخی خط کی مذکورہ عبارت واضح طور پر یہ اشارہ کرتی ہے کہ مہاراجا ہری سنگھ نے ذاتی مفادات کے پیش نظر اس وقت حکومت ہند کے ساتھ جموںوکشمیر کے عوام کی قیمت پر ایک سودا کیا تھا اور اس سودے بازی میں جہاں جموںوکشمیر کا الحاق ہندوستان کے حق میں کرنے کا فیصلہ تھا، وہیں دوسری طرف حکومت ہند کی جانب سے ان کے شاہی مرتبہ کا تحفظ بھی مانگا تھا، یعنی اس الحاق میں انہیں اس بات کی قطعاً فکر نہیں تھی کہ ریاست کے عوام کیا چاہتے ہےں؟ ان کی خواہش کیا ہے؟ یہ الگ بات ہے کہ قبائلیوں کی جانب سے کشمیر پر کئے گئے حملہ کو لے کر ریاست کے عوام خود پاکستان سے بدظن تھے اور اس کے ساتھ الحاق نہیں چاہتے تھے، اس لےے کہ وہ مانتے تھے کہ کشمیر پر قبائلیوں کا حملہ پاکستان کی شہ پر ہے اور انہیں پاکستان سے مدد حاصل ہورہی ہے، لیکن ان سب کے قطع نظر خود مہاراجا ہری سنگھ کے اپنے ہی خط سے ان کی نیت واضح ہورہی ہے، جو خط ملک کی آزادی یا تقسیم وطن کے محض 5ماہ5دن بعد ہی لکھا گیا تھا۔
اپنے اس خط میں مہاراجا ہری سنگھ آگے لکھتے ہیں:
کئی بار مجھے لگتا ہے کہ ہندوستان کے ساتھ الحاق کے عمل کو واپس لے لینا چاہئے۔ہندوستانی یونین نے عبوری طور پر الحاق کو قبول کیا ہے اور اگر یونین ہمارے علاقے کو ہمیں واپس نہیں کرسکتی ہے اور سلامتی کونسل کے فیصلے کو قبول کرنے جارہی ہے جس کے نتیجے میں ہمیں پاکستان کو منتقل کیا جاسکتا ہے تو ایسے میں ہندوستان کے ساتھ الحاق کے فیصلے پر قائم رہنے کا کوئی مطلب نہیں ہے ۔
میرے پاس ایک ممکن متبادل ہے اور وہ یہ کہ الحاق کے فیصلے کو واپس لے لیا جائے تاکہ اقوام متحدہ کے ریفرنس کا معاملہ ختم ہوجائے کیونکہ ہندوستانی یونین کو اس کارروائی کو جاری رکھنے کا کوئی حق نہیں ہے، اگر الحاق کے فیصلے کو واپس لے لیا جائے اور اس کا نتیجہ یہ ہوگا کہ ریاست الحاق سے پہلے کے حالات میں پہنچ جائے گی۔
آخری چند سطروں کو اس خط کے جواب میں رد کرتے ہوئے ہندوستان کے وزیراعظم پنڈت جواہر لعل نہرو نے جو خط لکھا تھا، وہ اپنے اس مسلسل مضمون کی آئندہ قسطوں میں شامل اشاعت کیا جائے گا۔ فی الحال ان سطروں کا حوالہ دینے کا مطلب صرف اتنا ہے کہ مہاراجا ہری سنگھ مسلسل تذبذب کے عالم میں تھے اور وہ صرف اپنے بارے میں ہی سوچ رہے تھے۔ وہ ہندوستان کے ساتھ الحاق کے فیصلے پر بھی نظرثانی کررہے تھے اور ہندوستان کی حکومت کے ساتھ انہوں نے ان حالات میں جو الحاق کا فیصلہ کیا تھا، وہ بھی کچھ شرطوں پر مبنی تھا۔ اگر ریاست کے عوام کے مفادات پر اس وقت بحث نہ کریں تو واضح طور پر یہ بات سامنے آتی ہے کہ ان کا بنیادی مقصد اپنی حکمرانی کا تحفظ تھا اور جب جب انہیں یہ محسوس ہوتا تھا کہ حکومت ہند ان کی حکمرانی کا تحفظ نہیں کرپارہی ہے یا ایسی صورتحال پیدا ہوسکتی ہے کہ ان کی حکمرانی خطرے میں پڑجائے تو وہ کسی بھی حد تک جانے کے لےے تیار تھے۔
مہاراجاہری سنگھ کے اس خط کی آخری چند سطریں جنہیں میں نے نمایاں طور پر سامنے رکھا تھا، مندرجہ ذیل ہےں:
میں اپنی موجودہ زندگی سے بیزار ہوگیا ہوں اور یہ میرے لئے بہتر ہوگا کہ لڑتے ہوئے اپنی جان نچھاور کردوں بہ نسبت اس کے کہ اپنے لوگوں کی پریشانیوں کو بے یارو مددگار دیکھتا رہوں۔
مہاراجا ہری سنگھ کی مایوسی ان سطروں میں صاف طور پر نظر آتی ہے۔ اگر ان کا مطلب یہ سمجھا جائے کہ اپنے حقوق کا تحفظ نہ ہونے کی صورت میں وہ خودکشی تک پر آمادہ تھے تو اندازہ کیا جاسکتا ہے کہ آج اس ریاست کے عوام جس راستہ پر چل پڑے ہےں، اس صورتحال میں ان کے پاس کتنے متبادل موجود ہیں، یعنی جس طرح حالات سازگار نظر نہ آنے پر وہ کسی بھی حد تک جانے کے لےے تیار تھے، اسی طرح آج اس ریاست کے عوام حالات اپنے تئیں سازگار نہ دیکھ کر کسی بھی حد تک جاتے نظر آرہے ہےں۔
ہمیں اس تاریخی دستاویز کو سامنے رکھنے کی ضرورت صرف اس لےے محسوس ہوئی، تاکہ ہم ملک کے ذمہ داران کو یہ باور کراسکیں، ان سے یہ درخواست کرسکیں کہ کشمیر کے حالات صرف آج یا گزشتہ چند برسوں سے خراب نہیں ہیں، بلکہ کم و بیش تقسیم وطن کے بعد سے ہی انہیں ان حالات کا سامنا کرنا پڑا ہے۔ انہیں بار بار تکلیف دہ صورتحال سے گزرنا پڑا ہے۔ انہوں نے بڑے اعتماد کے ساتھ پاکستان کے مقابلے ہندوستان کو ترجیح دی تھی، آج اگر ان میں سے کچھ لوگ بھی اس سے الگ ہٹ کر سوچنے لگے ہیں تو ہمیں یہ سمجھنا ہوگا کہ اپنے من کے موافق حالات نہ دیکھ کر نظرثانی کا فیصلہ تو مہاراجا ہری سنگھ نے بھی کیا تھا۔ کیا ہم نے انہیں کسی پل بھی اس زمرے میں رکھا ہے، جس زمرے میں ہم آج نظرثانی کی بات کرنے والوں کو رکھتے ہیں؟ یہ آخری چند جملے لکھنے کی وجہ صرف اتنی ہے کہ تمام صورتحال پر ہمدردی اور سنجیدگی کے ساتھ غور کیا جائے، نفرت کا جواب نفرت مسئلہ کا حل نہیں ہوسکتا۔ بہرحال مسئلہ کشمیر پر ابھی اور بہت کچھ لکھنا اور پیش کرنا باقی ہے، چونکہ مہاراجاہری سنگھ کے اس خط کی عبارت اور ہمارے تبصرہ کے بعد یہ لازمی ہے کہ ہم سردار پٹیل کی جانب سے دئے گئے جواب کا جزبھی قارئین کے سامنے پیش کریں، جس کا حوالہ ہم نے آج کے اس مضمون میں دیا ہے۔
اس خط کا جواب سردار پٹیل نے 9فروری948کو دیا اور اپنے جواب میں لکھا:
’مجھے اندازہ ہے کہ آپ کس قدر تشویشناک وقت سے گزر رہے ہیں۔ میں آپ کو اطمینان دلانا چاہوں گا، میں بھی کشمیر کے حالات اور جو کچھ اقوام متحدہ میں ہورہا ہے، اس پر کم پریشان نہیں ہوں، لیکن جو بھی موجودہ حالات ہوں، ناامیدی کے مشورے کا سوال ہی نہیں اٹھتا ہے۔‘
اپنے اس مختصر سے جواب میں سردار پٹیل نے صرف ہلکی سی تسلی دے کر بات ختم کردی۔ ان تمام نکات پر کوئی معقول جواب نہیں دیا، جو مہاراجا ہری سنگھ نے سامنے رکھے تھے۔ ہماری تحقیق جاری ہے، اگر کہیں اس سے زیادہ تفصیل حاصل ہوتی ہے تو وہ شامل اشاعت کی جائے گی۔
……………
مہاراجا ہری سنگھ نے اپنے مضمون میں لکھا کہ
!نہ صرف مجھے بلکہ تمام ہندو اور سکھوں کے ساتھ ریاست کے وہ لوگ جو نیشنل کانفرنس سے تعلق رکھتے ہیں، کے لئے غیر یقینی حالات اور الجھاؤ پیدا ہورہاہے۔ یہ جذبات مضبوط ہونے کا جواز حاصل کر رہے ہیں کہ اقوام متحدہ کی سلامتی کونسل نقصان دہ فیصلہ کرے گی اور آخر کارریاست کا پاکستان کے ساتھ الحاق ہو جائے گا۔ ایسے میں ہندو اور سکھ عوام نے ریاست سے باہر نکلنا شروع کردیا ہے۔…… نیشنل کانفرنس کے لیڈران بھی ایسا محسوس کرتے ہیں کہ آخرکار سلامتی کونسل کے فیصلہ کو قبول کرنے میں ان کو مایوسی ہوگی اور یہ ان کے لےے کسی بڑے حادثے سے کم نہیں ہوگا۔
مہاراجا ہری سنگھ کے خط کی مذکورہ بالا سطریں جنہیں ایک بار پھر میں نے قارئین کے سامنے رکھا، دو خاص پہلوؤں کی جانب اشارہ کرتی ہیں۔
پہلا یہ کہ اقوام متحدہ کے فیصلہ کو لے کر اس وقت کی صورتحال یہ تھی کہ مہاراجا ہری سنگھ، ریاست کشمیر کے ہندو اور سکھ و نیشنل کانفرنس کے لیڈران ایسا محسوس کرتے تھے کہ فیصلہ پاکستان کے ساتھ الحاق کی شکل میں سامنے آئے گا۔ اس فیصلہ کو لے کرصرف مہاراجا ہری سنگھ ہی پریشان نہیں تھے، بلکہ ریاست جموںوکشمیر کے عوام بھی پریشان تھے اور پریشانی کا عالم یہ تھا کہ ریاست کے ہندو اور سکھ وادی چھوڑ کر جانے لگے تھے۔ اتنا ہی نہیں اس خط کے مطابق نیشنل کانفرنس کے لیڈران بھی اس فیصلے کو لے کر مایوسی کا اظہار کررہے تھے اور اسے کسی بڑے حادثہ کی شکل میں دیکھ رہے تھے۔ اگر ہم 1989کے بعد کے حالات پر غور کریں تو بڑی تعداد میں ریاست کے ہندو کشمیر چھوڑنے کے لےے مجبور ہوئے اور اس کی سیدھی ذمہ داری کشمیر کے مسلمانوں پر عائد کی گئی۔ اسے یوں بھی کہہ سکتے ہیں کہ کشمیر کے انتہاپسندوں پر عائد کی گئی۔ میں ان کے بچاؤ میں کچھ بھی نہیں کہنا چاہتا، لیکن اتنا ضرور کہنا چاہتا ہوں کہ تقسیم وطن کے بعد سے ہی جموںوکشمیر خاص طور پر کشمیر کے ہندواور سکھوں نے ریاست کو چھوڑنے کا ذہن بنالیا تھا اور اس خط کی عبارت سے بھی یہ واضح ہوتا ہے کہ اقوام متحدہ کے فیصلہ کے قیاس کو لے کر آبادی کی اس منتقلی میں اور تیزی آئی تھی، کیوں کہ انہیں یہ اندازہ ہوگیا تھا کہ جموں وکشمیر کا الحاق پاکستان میں ہوسکتا ہے، لہٰذا آج یہ الزام عائد کرنا قطعاً غیرمناسب ہوگا کہ ریاست کے ہندوؤں کو یا سکھوں کو وادی چھوڑنے کے لےے مسلمانوں نے مجبور کیا، بلکہ تقسیم وطن کے بعد جو حالات پیدا ہوئے، ان میں ہندو ہوں یا مسلمان، انہیں یہی زیادہ مناسب لگا کہ جہاں وہ انتہائی اقلیت میں ہیں، وہ علاقہ چھوڑ کر اس طرف منتقل ہوجائیں، جہاں ان کی اپنی برادری یا مذہب کے لوگ زیادہ ہیں۔
دوسرا جو قابل غور پہلو ہے، وہ یہ کہ نیشنل کانفرنس کے لیڈران پاکستان کے ساتھ الحاق کے تصور سے ہی مایوس تھے، یعنی وہ اسے ناپسند کرتے تھے۔ اس وقت نیشنل کانفرنس کے سربراہ اور ریاست کے وزیراعظم شیخ محمد عبداللہ تھے اور آج جموںوکشمیر کے وزیراعلیٰ ان کے پوتے عمرعبداللہ ہیں، یعنی نیشنل کانفرنس کے لیڈران اس وقت بھی ہندوستان کے ساتھ ہی رہنا چاہتے تھے اور آج بھی۔ اب رہا سوال کشمیری عوام کا تو آج کی بدلی ہوئی صورتحال کی جو سچائی ہے، اس پر گفتگو اس مضمون کی آئندہ قسطوں میں کی جائے گی، لیکن اس وقت کشمیری عوام یعنی مسلمانوں کا فیصلہ بھی وہی تھا جو نیشنل کانفرنس کے لیڈران کاتھا، یعنی وہ ہندوستان کے ساتھ ہی رہنا چاہتے تھے، پاکستان کے ساتھ الحاق کا تصور بھی انہیں گوارا نہیں تھا۔ میں اس پر خصوصی توجہ اس لےے دلانا چاہتا ہوں کہ آج اگر کچھ علیحدگی پسند عناصر سرگرم ہیں اور وہ ہندوستان کے ساتھ نہیں رہنا چاہتے تو اسے سب کا فیصلہ تسلیم نہیں کیا جاسکتا۔ ساتھ ہی توجہ اس بات پر بھی دینی ہوگی کہ آخر ان کا علیحدگی پسندانہ ذہن کیوں بنا۔ جب ہم نکسلائٹ موومنٹ کی وجوہات پر غور کرنے کا ذہن رکھتے ہیں تو کیا ہمیں کشمیر کے موجودہ حالات کو ذہن میں رکھتے ہوئے اس انتہاپسندانہ مزاج کی وجوہات پر غور کرنے کی ضرورت نہیں ہونی چاہےے۔
مہاراجا ہری سنگھ اپنے اسی خط میں آگے لکھتے ہیں :
اس معاملے میں میری پوزیشن تشویش ناک ہے۔ آپ جانتے ہیں کہ میں یقینی طور پر ہندوستان کے ساتھ الحاق کروں گا، اس خیال کے ساتھ کہ ہندوستان مجھے مصیبت میں نہیں چھوڑے گا اور یہ کہ میری پوزیشن اور میرے شاہی مراتب محفوظ رہےں گے۔ ایسا اس لئے کیونکہ داخلی انتظام کے معاملے میں میں نے حکومت ہند کے مشورہ کو منظور کیا ہے۔
اس تاریخی خط کی مذکورہ عبارت واضح طور پر یہ اشارہ کرتی ہے کہ مہاراجا ہری سنگھ نے ذاتی مفادات کے پیش نظر اس وقت حکومت ہند کے ساتھ جموںوکشمیر کے عوام کی قیمت پر ایک سودا کیا تھا اور اس سودے بازی میں جہاں جموںوکشمیر کا الحاق ہندوستان کے حق میں کرنے کا فیصلہ تھا، وہیں دوسری طرف حکومت ہند کی جانب سے ان کے شاہی مرتبہ کا تحفظ بھی مانگا تھا، یعنی اس الحاق میں انہیں اس بات کی قطعاً فکر نہیں تھی کہ ریاست کے عوام کیا چاہتے ہےں؟ ان کی خواہش کیا ہے؟ یہ الگ بات ہے کہ قبائلیوں کی جانب سے کشمیر پر کئے گئے حملہ کو لے کر ریاست کے عوام خود پاکستان سے بدظن تھے اور اس کے ساتھ الحاق نہیں چاہتے تھے، اس لےے کہ وہ مانتے تھے کہ کشمیر پر قبائلیوں کا حملہ پاکستان کی شہ پر ہے اور انہیں پاکستان سے مدد حاصل ہورہی ہے، لیکن ان سب کے قطع نظر خود مہاراجا ہری سنگھ کے اپنے ہی خط سے ان کی نیت واضح ہورہی ہے، جو خط ملک کی آزادی یا تقسیم وطن کے محض 5ماہ5دن بعد ہی لکھا گیا تھا۔
اپنے اس خط میں مہاراجا ہری سنگھ آگے لکھتے ہیں:
کئی بار مجھے لگتا ہے کہ ہندوستان کے ساتھ الحاق کے عمل کو واپس لے لینا چاہئے۔ہندوستانی یونین نے عبوری طور پر الحاق کو قبول کیا ہے اور اگر یونین ہمارے علاقے کو ہمیں واپس نہیں کرسکتی ہے اور سلامتی کونسل کے فیصلے کو قبول کرنے جارہی ہے جس کے نتیجے میں ہمیں پاکستان کو منتقل کیا جاسکتا ہے تو ایسے میں ہندوستان کے ساتھ الحاق کے فیصلے پر قائم رہنے کا کوئی مطلب نہیں ہے ۔
میرے پاس ایک ممکن متبادل ہے اور وہ یہ کہ الحاق کے فیصلے کو واپس لے لیا جائے تاکہ اقوام متحدہ کے ریفرنس کا معاملہ ختم ہوجائے کیونکہ ہندوستانی یونین کو اس کارروائی کو جاری رکھنے کا کوئی حق نہیں ہے، اگر الحاق کے فیصلے کو واپس لے لیا جائے اور اس کا نتیجہ یہ ہوگا کہ ریاست الحاق سے پہلے کے حالات میں پہنچ جائے گی۔
آخری چند سطروں کو اس خط کے جواب میں رد کرتے ہوئے ہندوستان کے وزیراعظم پنڈت جواہر لعل نہرو نے جو خط لکھا تھا، وہ اپنے اس مسلسل مضمون کی آئندہ قسطوں میں شامل اشاعت کیا جائے گا۔ فی الحال ان سطروں کا حوالہ دینے کا مطلب صرف اتنا ہے کہ مہاراجا ہری سنگھ مسلسل تذبذب کے عالم میں تھے اور وہ صرف اپنے بارے میں ہی سوچ رہے تھے۔ وہ ہندوستان کے ساتھ الحاق کے فیصلے پر بھی نظرثانی کررہے تھے اور ہندوستان کی حکومت کے ساتھ انہوں نے ان حالات میں جو الحاق کا فیصلہ کیا تھا، وہ بھی کچھ شرطوں پر مبنی تھا۔ اگر ریاست کے عوام کے مفادات پر اس وقت بحث نہ کریں تو واضح طور پر یہ بات سامنے آتی ہے کہ ان کا بنیادی مقصد اپنی حکمرانی کا تحفظ تھا اور جب جب انہیں یہ محسوس ہوتا تھا کہ حکومت ہند ان کی حکمرانی کا تحفظ نہیں کرپارہی ہے یا ایسی صورتحال پیدا ہوسکتی ہے کہ ان کی حکمرانی خطرے میں پڑجائے تو وہ کسی بھی حد تک جانے کے لےے تیار تھے۔
مہاراجاہری سنگھ کے اس خط کی آخری چند سطریں جنہیں میں نے نمایاں طور پر سامنے رکھا تھا، مندرجہ ذیل ہےں:
میں اپنی موجودہ زندگی سے بیزار ہوگیا ہوں اور یہ میرے لئے بہتر ہوگا کہ لڑتے ہوئے اپنی جان نچھاور کردوں بہ نسبت اس کے کہ اپنے لوگوں کی پریشانیوں کو بے یارو مددگار دیکھتا رہوں۔
مہاراجا ہری سنگھ کی مایوسی ان سطروں میں صاف طور پر نظر آتی ہے۔ اگر ان کا مطلب یہ سمجھا جائے کہ اپنے حقوق کا تحفظ نہ ہونے کی صورت میں وہ خودکشی تک پر آمادہ تھے تو اندازہ کیا جاسکتا ہے کہ آج اس ریاست کے عوام جس راستہ پر چل پڑے ہےں، اس صورتحال میں ان کے پاس کتنے متبادل موجود ہیں، یعنی جس طرح حالات سازگار نظر نہ آنے پر وہ کسی بھی حد تک جانے کے لےے تیار تھے، اسی طرح آج اس ریاست کے عوام حالات اپنے تئیں سازگار نہ دیکھ کر کسی بھی حد تک جاتے نظر آرہے ہےں۔
ہمیں اس تاریخی دستاویز کو سامنے رکھنے کی ضرورت صرف اس لےے محسوس ہوئی، تاکہ ہم ملک کے ذمہ داران کو یہ باور کراسکیں، ان سے یہ درخواست کرسکیں کہ کشمیر کے حالات صرف آج یا گزشتہ چند برسوں سے خراب نہیں ہیں، بلکہ کم و بیش تقسیم وطن کے بعد سے ہی انہیں ان حالات کا سامنا کرنا پڑا ہے۔ انہیں بار بار تکلیف دہ صورتحال سے گزرنا پڑا ہے۔ انہوں نے بڑے اعتماد کے ساتھ پاکستان کے مقابلے ہندوستان کو ترجیح دی تھی، آج اگر ان میں سے کچھ لوگ بھی اس سے الگ ہٹ کر سوچنے لگے ہیں تو ہمیں یہ سمجھنا ہوگا کہ اپنے من کے موافق حالات نہ دیکھ کر نظرثانی کا فیصلہ تو مہاراجا ہری سنگھ نے بھی کیا تھا۔ کیا ہم نے انہیں کسی پل بھی اس زمرے میں رکھا ہے، جس زمرے میں ہم آج نظرثانی کی بات کرنے والوں کو رکھتے ہیں؟ یہ آخری چند جملے لکھنے کی وجہ صرف اتنی ہے کہ تمام صورتحال پر ہمدردی اور سنجیدگی کے ساتھ غور کیا جائے، نفرت کا جواب نفرت مسئلہ کا حل نہیں ہوسکتا۔ بہرحال مسئلہ کشمیر پر ابھی اور بہت کچھ لکھنا اور پیش کرنا باقی ہے، چونکہ مہاراجاہری سنگھ کے اس خط کی عبارت اور ہمارے تبصرہ کے بعد یہ لازمی ہے کہ ہم سردار پٹیل کی جانب سے دئے گئے جواب کا جزبھی قارئین کے سامنے پیش کریں، جس کا حوالہ ہم نے آج کے اس مضمون میں دیا ہے۔
اس خط کا جواب سردار پٹیل نے 9فروری948کو دیا اور اپنے جواب میں لکھا:
’مجھے اندازہ ہے کہ آپ کس قدر تشویشناک وقت سے گزر رہے ہیں۔ میں آپ کو اطمینان دلانا چاہوں گا، میں بھی کشمیر کے حالات اور جو کچھ اقوام متحدہ میں ہورہا ہے، اس پر کم پریشان نہیں ہوں، لیکن جو بھی موجودہ حالات ہوں، ناامیدی کے مشورے کا سوال ہی نہیں اٹھتا ہے۔‘
اپنے اس مختصر سے جواب میں سردار پٹیل نے صرف ہلکی سی تسلی دے کر بات ختم کردی۔ ان تمام نکات پر کوئی معقول جواب نہیں دیا، جو مہاراجا ہری سنگھ نے سامنے رکھے تھے۔ ہماری تحقیق جاری ہے، اگر کہیں اس سے زیادہ تفصیل حاصل ہوتی ہے تو وہ شامل اشاعت کی جائے گی۔
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