26 नवम्बर 2008 को मुम्बई के रास्ते भारत पर हुए आतंकवादी हमले की गंभीरता आज इस स्थान पर पहुंच चुकी है कि बाक़ी सभी सम्स्याएं छोटी नज़र आती हैं। आज मेरे लिए यह विषय इस हद तक रिसर्च का विषय है कि इसके सिवा कुछ और सूझता ही नहीं। मैं चाहता हूं कि आज इस संबंध में एक लेख आपकी सेवा में प्रस्तुत करूं, मगर नहीं, अभी कुछ और......... जो इस सिलसिले की महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध हो सकता है। इसलिए आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं प्रधानमंत्री डां मनमोहन सिंह के भाषण के दो वाक्यें जो उन्होंने आतंकवादी हमले के कुछ दिन बाद 11.12.2008 को अपने भाषण में कहे और फिर वीर सांघवी का लेख, जो पिछले रविवार को अंग्रेज़ी दैनिक ‘‘हिन्दुस्तान टाइम्स’’ में प्रकाशित हुआ। कृपया कर के इस सिलसिले के सभी लेखों का न सिर्फ अध्यन करें, बल्कि उन्हें संभाल कर भी रखें, इसलिए कि यह इस दौर का इतिहास है।
‘‘जहां तक मुम्बई का प्रश्न है, यह अत्यंत सुनियोजित और दुष्टतापूर्ण हमला था, जिसका मक़सद व्यापक आतंक पैदा करना और भारत की छवि को आघात पहुंचाना था। इस हमले के पीछे जो ताक़तें काम कर रही थीं, उनका इरादा हमारी धर्मनिरपेक्ष राजनीति को अस्थिर करना, साम्प्रदायिक फूट डालना और हमारे देश की आर्थिक तथा सामाजिक प्रगति में रूकावट डालना था।
हमारी तात्कालिक प्राथमिकता यह है कि भारत के लोगों में सुरक्षा की भावना बहाल की जाये। हम ऐसी स्थिति बर्दाशत नहीं कर सकते जिसमें आतंकवादियों या अन्य उग्रवादी ताकतों के हमलों से हमारे नागरिकों की सुरक्षा को क्षति पहुंचे।’’
अमेरिका क्या छुपाना चाहता है?
यह एक काल्पनिक स्थिति है! कल्पना कीजिए कि भारतीय पुलिस एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ़्तार करती जिसे है 9/11 के प्लान की पूर्व जानकारी हो और वह व्यक्ति केवल षड़यंत्रकारी तत्वों के साथ कार्य ही नहीं कर चुका हो, बल्कि उसे कई बार न्यूयार्क भी भेजा गया हो, ताकि हमले को सफल बनाने के लिए आतंकवादियों को सूचनाएं उपलब्ध करा सके।
स्वभाविक रूप से अमेरिका यह चाहेगा कि उस व्यक्ति को उसके हवाले किया जाए, ताकि वर्तमान में होने वाले भयानक आतंकवादी हमलों में उसके लिप्त होने के संबंध में अमेरिकी अदालत में उसके विरुद्ध मुक़दमा चलाया जाए। अब ज़रा यह कल्पना कीजिए कि भारत प्रत्यार्पण के मामले में न केवल बातचीत से, बल्कि फेड्रल ब्यूरो आॅफ इन्वेस्टिगेशन (एफ॰बी॰आई॰, अमेरिकी गुप्तचर एजंेसी) को उस व्यक्ति से पूछताछ की भी अनुमति देने से इनकार कर दे और सेंट्रल ब्यूरो आॅफ इन्वेस्टिगेशन (सी॰बी॰आई॰, भारतीय गुप्तचर एजंसी) इस बात पर अड़ी रहे कि उस व्यक्ति से परोक्षरूप से पूछताछ करने की अनुमति देने की कोई संभावना नहीं है, हां यह हो सकता है क वह पूछताछ के जवाब में जो बताएगा, उससे एफ॰बी॰आई॰ को अवगत करा दिया जाएगा।
हमारे इस दृश्य को थोड़ा और बड़ा कीजिए। 9/11 के हमले में इस महत्वपूर्ण सुराग़ को अमेरिका की पहुंच में देने से इनकार के बाद भारत यह घोषणा करे कि उस व्यक्ति से उसकी एक डील हो गई है और वह अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को स्वीकार करेगा, इसलिए हमारे क़ानून के अनुसार उसको मृत्यु दंड देने का कोई प्रश्न ही पैदा नहीं होता है और न ही इस बात की कोई संभावना है कि उसके विरुद्ध अमेरिकी क़ानून के तहत मुक़दमा चलाया जाए। इस डील का एक भाग यह भी है कि हमने उसे यह विश्वास भी दिला दिया है कि उसे हवाले नहीं किया जाएगा और जहां तक सज़ा का संबंध है इसे भी अभी तय किया जाना बाक़ी है, फिर भी हमने उस आतंकवादी से जो डील की है, उसी के आधार पर उसका फैसला किया जाएगा।
आप क्या समझते हैं कि इस पर अमेरिका की किस प्रकार की प्रतिक्रिया होगी?
उत्तर स्पष्ट है, यह एक राजनयिक दुर्घटना बन जाएगी। अमेरिका का सेक्रेट्री आॅफ स्टेट हमारे गृहमंत्री (अतिसंभव है कि प्रधामंत्री) को बुलाएगा और इस बात पर बल देगा कि उस आतंकवादी को एफ॰बी॰आई॰ के हवाले किया जाए और भारत पर आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में धोखा देने का आरोप भी लगाया जाएगा।
हम यह प्रश्न करेंगे की हम उस पर किस तरह भारत में मुक़दमा चला सकते हैं, जबकि वह अमेरिका में होने वाले अपराध में लिप्त था? उसके बाद धमकियों का सिलसिला शुरू हो जाएगा, यह भी हो कि हमें दी जाने वाली सहायता भी बंद कर दी जाए, बैठकें रद्द कर दी जाएं इत्यादि इत्यादि।
मैंने इस परिदृश्य की रूपरेखा तैयार करने में कुछ समय लगाया है, क्योंकि यह उस वास्तविक घटना के बहुत क़रीब या सामानांतर है। सिवाए इसके कि इस केस में वह आतंकवादी 9/11 के बजाए 26/11 की घटना में लिप्त है और यह भारत नहीं, बल्कि अमेरिका है जो उसके प्रत्यार्पण से इनकार कर रहा है और हम से कह रहा है कि जाएं छलांग लगा दें।
यह देखना मुश्किल नहीं है कि डेविड हेडली का केस भारतीयों में इतनी अधिक उत्तेजना क्यों पैदा कर रहा है। हमारे लिए 26/11 उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अमेरिकियों के लिए 9/11। अंतर केवल इतना है कि अमेरिका वह सब कुछ जानता है जो 9/11 के बाद उसे जानना चाहिए था, विशेषरूप से जब अलक़ायदा ने बाज़ाबता इस हमले की ज़िम्मेदारी स्वीकार कर ली है।
जबकि भारत उस हमले के बाद से अब तक इस षड़यंत्र के विवरणों का सुराग़ लगाने में लगा है। यह अमेरिका ही था जिसने हमसे कहा था कि डेविड हेडली 26/11 के हमले से पहले कई बार भारत आया और जासूसी करके वापस गया था। इसलिए हम यह समझने में ग़लत नहीं है कि ऐसा व्यक्ति न केवल भारतीय अदालत से सज़ा का पात्र है, बल्कि उससे मिलने वाली सूचनाएं 26/11 के हमले के सिलसिले में कई रहस्यों से भी पर्दा हटाएंगी। ऊपर से यह भी कि हेडली ने पुणे को भी संभावित आतंकवादी हमले का निशाना बनाया हो और इस प्रकार के और कितने आतंकवादी टार्गेट उसने निर्धारित किए हों, इसके बारे में हमें उस समय तक ज्ञान नहीं हो सकता, जब तक हम उससे पूछताछ नहीं करते।
इसलिए अमेरिका इस तरह क्यों पेश आ रहा है? अमेरिकियों के बारे में आप जो चाहें कहें, फिर भी यह सच है कि उन्होंने आतंकवाद के विरुद्ध जंग मंे दुनिया की तमाम गुप्तचर एजंसियों को सम्मिलित किया है और उनसे लगातार सहायता ली।
अब वह यह सहयोग स्वयं क्यों नहीं दे रहा है? अब केवल एक आतंकवादी के लिए वह भारत को पराया क्यों कर रहा है? मैं भारतीय जांच कर्ताओं को डेविड हेडली से पूछताछ करने की अनुमति न देकर पुणे जैसे हमलों में और लोगों के मारे जाने की अनुमति क्यांे दे रहा है?
मैं यह समझता हूं कि इन तथ्यों पर केवल एक ही बात फिट बैठती है और इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर है कि
‘‘डेविड हेडली एक अमेरिकी एजेंट है’’
जब मैंने पहली बार यह काल्पनिक दृश्य इन पृष्ठों पर परस्तुत किया था तो वह पहले तो वस्तु स्थिति से थोड़ा सा अलग महसूस हो रहा था, फिर भी अब मुझे यह दुख हो रहा है कि इस कल्पना में पूरा दम है और हर बीतने वाला दिन इस थेसिस के समर्थन में एक सबूत बनता जा रहा है।
हम जानते हैं कि हेडली (जो स्वयं को इस समय दाऊद गीलानी कहता था) मादक पदार्थों के आरोप में सज़ायाफ़्ता था और अमेरिकी जेल में भी रह चुका है। हम यह भी जानते है कि वह उसके बाद जेल से रिहा किया गया और ड्रग इन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डी॰ई॰ए॰) के हवाले किया गया, जिसके बारे में कहा गया है कि वह (डी॰ई॰ए॰) उसे अन्डरकवर एजेंट के रूप में पाकिस्तान भेजना चाहता था। यह सभी बातें पब्लिक रिकाॅर्ड में हैं।
अमेरिका की ओर से हेडली को पाकिस्तान भेजे जाने और कुछ महीनों पूर्व उसे शिकागो एयरपोर्ट पर गिरफ़्तार किए जाने के बीच में क्या हुआ? एक अमेरिकी एजेंट एक आतंकवादी कैसे बन गया? इसके बारे में अमेरिका ने कुछ नहीं कहा।
सपष्ट रूप से तीन संभावनाएं हो सकती हैं। प्रथम- यह समभव है कि वह अब भी डी॰ई॰ए॰ का एजेंट हो और उसी ड्रग एजेंसी के पेरोल पर जिहादी गिरोहों के साथ संलिप्त हो।
द्वितीय- यह भी संभव है कि वह कभी भी डी॰ई॰ए॰ का एजेंट न रहा हो। 9/11 के बाद जब यह पता चहला कि जिहादी नेटवर्क में अमेरिका के भी कुछ एजेंट हैं तो तमाम अमेरिकी एजेंसियां आतंकवादी गिराहों के विरुद्ध एकजुट हो गईं। यह भी संभव है कि 9/11 के बाद वह जेल से भागा और अदालत से यह कहा गया हो कि वह सी॰आई॰ए॰ की बजाए डी॰ई॰ए॰ को वान्टेड है। क्योंकि उस पर ड्रग से संबंधित आरोप थे।
अगर आप अन्य सभावनाओं पर विचार करेंगे तो इससे यह ज़ाहिर होता है कि हेडली दोहरा एजेंट था जिसे जिहादी गिरोहों में घुसपैठ के लिए भेजा गया, जिसके बाद वह स्वयं ही आतंकवादी बन गया और अपने अमेरिकी आक़ाओं को धोखा दिया।
दोनों संभावनाओं को स्पष्ट करना आवश्यक है। अमेरिकी हमें हेडली से पूछताछ क्यों नहीं करने देना चाहते। वह नहीं चाहते हैं कि अमेरिकी एजेंट (सी॰आई॰ए॰ या डी॰ई॰ए॰ जो भी हो) के रूप में हेडली की भूमिका सामने आए।
फिर भी तीसरी संभावना भी है। एक थ्योरी जो अमेरिकी मीडिया और ‘द डेली बैस्ट’ की वैबसाइट पर भी है, वह यह कि हेडली अब भी आख़िर तक अमेरिकी एजेंट ही हो। हेडली एक माध्यम था, जिसने अमेरिकियों को 26/11 के बारे में बताया, जिसके बाद अमेरिका ने घटना से पूर्व एक वार्निंग जारी की (यह वारर्निंग स्पष्ट न होने के कारण हमारी एजंसियों ने उसकी अनदेखी कर दी।)
अगर आप इस थ्योरी पर विचार करें और इसी पर भारतीय एजेंसियों के कुछ अधिकारी भी विचार कर रहे हैं कि अमेरीकियो ने हेडली को वापस बुला लिया क्योंकि उन्हें यह संदेह था कि भारतीय एजेंटों को उसके बारे में सच्चाई पता चल जाएगी। उन्होंने यह उचित समझा कि उसे विदेशी एजेंटों तथा एजेंसियों की पहुंच से दूर रखने के लिए अमेरिकी हिरासत में ही ले लिया जाए।
हमारे पास ऐसा कोई पक्का प्रमाण नहीं है कि जिससे हम किसी निश्चित निष्कर्श पर पहुंचें। यह तीनों सम्भावनाएं वास्तविक घटना से काफी निकट हैं, लेकिन एक बात यह भी है कि अब कोई संदेह नहीं रह गया है कि डेविड हेडली के केस में अमेरिका भारत के साथ अत्यंत पराएपन का व्यवहार कर रहा है, वह कुछ छुपाना चाहता है और उसे भय है कि हेडली उसे ज़ाहिर न कर दे।
वीर संाघवी (हिन्दुस्तान टाइम्स, 21 मार्च, 2010)
Wednesday, March 24, 2010
تقریر وزیراعظم کی، تحریر ویرسانگھوی کی، موضوع6/11
عزیز برنی…………………………………قسط 106
26 نومبر 2008کو ممبئی کے راستے ہندوستان پر ہوئے دہشت گردانہ حملے کی سنجیدگی آج اس مقام پر پہنچ چکی ہے کہ باقی تمام مسائل چھوٹے نظر آتے ہیں۔آج میرے لئے یہ موضوع اس حد تک ریسرچ کا موضوع ہے کہ اس کے سوا کچھ اور سوجھتا ہی نہیں۔میں چاہتا تھا کہ آج اس ضمن میں ایک مفصل تحریر آپ کی خدمت میں پیش کروں ،مگر نہیں۔ابھی کچھ اور……، جو اس سلسلے کی اہم کڑی ثابت ہو سکتا ہے،لہٰذا پیش خدمت ہیں وزیراعظم ڈاکٹر منموہن سنگھ کی تقریر کے دو جملے، جو انھوں نے دہشت گردانہ حملے کے چند روز بعد 11دسمبر008کو اپنی تقریر کے دوران کہے اور پھر ویر سانگھوی کا مضمون،جو گزشتہ اتوار کو انگریزی روزنامہ ہندوستان ٹائمز میں شائع ہوا۔ازراہ کرم اس تسلسل کے تمام مضامین کا نہ صرف مطالعہ کریں، بلکہ انھیں محفوظ بھی رکھیں، اس لئے کہ یہ اس دور کی تاریخ ہے ۔
جہاں تک ممبئی کا سوال ہے، ےہ انتہائی منظم اور سفاکانہ حملہ تھا، جس کا مقصد وسیع پیمانے پر دہشت پیدا کرنا اور ہندوستان کی شبیہ کو نقصان پہنچانا تھا۔ اس حملے کے پےچھے جو طاقتیں کام کررہی تھیں، ان کا ارادہ ہماری سیکولر سیاست کو غیر مستحکم کرنا، فرقہ وارانہ پھوٹ ڈالنا اور ہمارے ملک کی اقتصادی اور سماجی ترقی میں رکاوٹ ڈالنا تھا۔
ہماری فوری ترجیح ےہ ہے کہ ہندوستان کے لوگوں میں تحفظ کا جذبہ بحال کیا جائے۔ ہم ایسی صورتحال برداشت نہیں کرسکتے، جس میں دہشت گردوں یا دیگر انتہا پسند طاقتوں کے حملے سے ہمارے شہریوں کی سلامتی کو نقصان پہنچے۔
امریکہ کیا چھپانا چاہتا ہے؟
یہ ایک خیالی صورتحال ہے!تصور کیجئے کہ ہندوستانی پولس ایک ایسے شخص کو گرفتار کرتی ہے، جسے/11کے پلان کی پیشگی اطلاع ہواور وہ شخص صرف سازشی عناصر کے ساتھ کام ہی نہیں کرچکاہو، بلکہ اسے متعدد بار نیو یارک بھی بھیجاگیاہو، تاکہ حملہ کو کامیاب بنانے کیلئے دہشت گردوں کو اطلاعات فراہم کرسکے۔
فطری طور پر امریکہ یہ چاہے گا کہ اس شخص کواس کے حوالے کیاجائے، تاکہ حال کے دنوں میں ہونے والے بھیانک دہشت گردانہ حملوں میں اس کے ملوث ہونے کے سلسلے میں امریکی عدالت میں اس کے خلاف مقدمہ چلایاجائے۔اب ذرا یہ تصور کیجئے کہ ہندوستان حوالگی کے معاملہ میں نہ صرف بات چیت سے، بلکہ فیڈرل بیورو آف انویسٹی گیشن (ایف بی آئی،امریکی سراغ رساں ادارہ) کواس شخص سے پوچھ گچھ کی بھی اجازت دینے سے انکار کردے اور سنٹرل بیوروآف انویسٹی گیشن(سی بی آئی، ہندوستانی سراغ رساں ادارہ) اس بات پر مصر رہے کہ اس شخص سے براہ راست پوچھ گچھ کی اجازت دینے کاکوئی امکان نہیںہے، ہاں البتہ یہ ہوسکتا ہے کہ وہ پوچھ گچھ کے جواب میں جو بتائے گا، اس سے ایف بی آئی کو واقف کرادیاجائے گا۔
ہمارے اس تصوراتی منظر کو تھوڑا اور وسیع کیجئے! 9/11کے حملہ میں اس اہم ترین سراغ کو امریکہ کی رسائی میں دینے سے انکار کے بعد ہندوستان یہ اعلان کرے کہ اس شخص سے اس کی ایک ڈیل ہوگئی ہے اور وہ اپنے اوپر عائد کردہ تمام الزامات کو قبول کرے گا، اس لئے ہمارے قانون کے مطابق اس کو سزائے موت دینے کاکوئی سوال ہی پیدا نہیں ہوتاہے اور نہ ہی اس بات کاکوئی امکان ہے کہ اس کے خلاف امریکی قانون کے تحت مقدمہ چلایاجائے۔اس ڈیل کا ایک حصہ یہ بھی ہے کہ ہم نے اسے یہ یقین دہانی بھی کرائی ہے کہ اسے حوالے نہیں کیاجائے گااور جہاں تک سزا کا تعلق ہے اس کا اب بھی تعین کیاجاناباقی ہے، تاہم ہم نے اس دہشت گرد سے جو ڈیل کی ہے، اسی کی بنیاد پر اس کا فیصلہ کیاجائے گا۔
آپ کیا سمجھتے ہیں کہ اس پر امریکہ کیسے ردعمل کرے گا؟
جواب واضح ہے،یہ ایک سفارتی حادثہ بن جائے گا۔امریکہ کا سکریٹری آف اسٹیٹ ہمارے وزیرداخلہ ( غالب امکان ہے کہ وزیراعظم) کو طلب کرے گااور اس بات پر زور دے گا کہ اس دہشت گردکو ایف بی آئی کے حوالے کیاجائے اور ہندوستان پر دہشت گردی کے خلاف جنگ میں دھوکہ دہی کا الزام بھی لگایاجائے گا۔
ہم یہ سوال کریں گے کہ ہم اس پر کس طرح ہندوستان میں مقدمہ چلا سکتے ہیں، جبکہ وہ امریکہ میں ہونے والے جرم میں ملوث تھا؟اس کے بعد دھمکیوں کا سلسلہ شروع ہوجائے گا، یہ بھی ہو کہ ہمیں دی جانے والی امداد بھی بند کردی جائیں، اجلاس منسوخ کردیئے جائیں وغیرہ وغیرہ۔
میں نے اس منظر نامہ کاخاکہ تیار کرنے میں کچھ وقت لگایا ہے، کیوں کہ یہ اس حقیقی واقعہ سے انتہائی بالمقابل اور متوازی ہے۔سوائے اس کے کہ اس کیس میں وہ دہشت گرد 9/11کی بجائے 26/11کے واقعہ میں ملوث ہے اور یہ ہندوستان نہیں،بلکہ امریکہ ہے، جو اسے حوالے کرنے سے انکار کررہا ہے اور ہم سے کہہ رہا ہے کہ جائیں چھلانگ لگادیں۔
یہ دیکھنا مشکل نہیں ہے کہ ڈیوڈ ہیڈلی کا کیس ہندوستانیوں میں اتنا زبردست ہیجان کیوں برپاکررہا ہے۔ ہمارے لئے 26/11اتنا ہی اہم ہے، جتنا امریکیوں کیلئے/11۔فرق صرف اتنا ہے کہ امریکہ وہ سب کچھ جانتا ہے، جو 9/11کے بعد اسے جانناچاہئے تھا،خاص طور سے جب القاعدہ نے باضابطہ اس حملہ کی ذمہ داری قبول کرلی ہے۔
جبکہ ہندوستان اس حملہ کے بعد سے اب تک اس سازش کی تفصیلات کا سراغ لگانے میں مصروف ہے ۔ یہ امریکہ ہی تھا جس نے ہم سے کہاتھا کہ ڈیوڈ ہیڈلی6/11کے حملہ سے پہلے کئی مرتبہ ہندوستان آیا اور جاسوسی کرکے واپس گیاتھا۔ لہٰذا ہم یہ سمجھنے میں حق بجانب ہیں کہ ایساشخص نہ صرف ہندوستانی عدالت سے سزاکا مستحق ہے،بلکہ اس سے ملنے والی اطلاعات6/11کے حملے کے سلسلے میں کئی رازوں سے بھی پردہ ہٹائیں گی۔مزید یہ بھی کہ ہیڈلی نے پونا کو بھی ممکنہ دہشت گردانہ حملہ کا ہدف بنایا ہو اور اس طرح کے اور کتنے دہشت گردانہ ٹارگٹ کا اس نے تعین کیا ہو، اس کے بارے میں ہمیں اس وقت تک علم نہیں ہوسکتا، جب تک ہم اس سے تفتیش نہیںکرتے۔
لہٰذا امریکہ اس طرح کیوں پیش آرہاہے؟امریکیوں کے بارے میں آپ جوچاہیں کہیں، تاہم یہ حقیقت ہے کہ انہوں نے دہشت گردی کے خلاف جنگ میں دنیا کی تمام انٹلی جینس ایجنسیوں کو ملوث کیا اور ان سے مسلسل مدد لی۔
اب وہ یہ تعاون خود کیوں نہیں کررہا ہے؟اب صرف ایک دہشت گرد کیلئے وہ ہندستان کو پرایا کیوں کررہاہے؟وہ ہندوستانی تفتیش کاروں کو ڈیوڈہیڈلی سے تفتیش کرنے کی اجاز ت نہ دے کر پونا جیسے حملوں میں اور لوگوںکے مارے جانے کی اجازت کیوں دے رہاہے؟
میں یہ سمجھتا ہوں کہ ان حقائق پر صرف ایک ہی توضیح فٹ بیٹھتی ہے اوراس سوال کا صرف ایک ہی جواب ہے کہ
’’ڈیوڈ ہیڈلی ایک امریکی ایجنٹ ہے ‘‘
جب میں نے پہلی بار یہ مفروضہ ان صفحات پر پیش کیاتھاتو وہ پہلے تو حقیقت حال سے تھوڑا سا الگ محسوس ہورہاتھا، تاہم اب مجھے یہ دکھ ہورہاہے کہ اس مفروضہ میںپورا دم ہے اور ہر گزرنے والا دن اس تھیسس کی حمایت میں ایک ثبوت بنتا جارہاہے۔
ہم جانتے ہیں کہ ہیڈلی ( جو خود کو اس وقت دائود گیلانی کہتاتھا) منشیات کے الزام میں سزایافتہ تھا اور امریکی جیل میں بھی رہ چکاہے۔ ہم یہ بھی جانتے ہیں کہ وہ اس کے بعد جیل سے رہا کیاگیا اور ڈرگ انفورسمنٹ ایڈمنسٹریشن ( ڈی ای اے) کے حوالے کیاگیا، جس کے بارے میں کہاگیا ہے کہ وہ ( ڈی ای اے) اسے انڈر کوور ایجنٹ کے طور پر پاکستان بھیجنا چاہتا ہے ۔یہ تمام باتیں پبلک ریکارڈ میںہیں۔
امریکہ کی جانب سے ہیڈلی کو پاکستان بھیجے جانے اور کچھ مہینوں قبل اسے شکاگو ائیرپورٹ پر گرفتار کئے جانے کے دوران یہ کیا ہوا؟ ایک امریکی ایجنٹ ایک دہشت گرد میں کیسے بدل گیا؟اس کے بارے میں امریکہ نے کچھ نہیں کہا۔
واضح طور پر تین امکانات ہوسکتے ہیں۔اولاً یہ ممکن ہے کہ وہ ا ب بھی ڈی ای اے کا ایجنٹ ہو اوراسی ڈرگ ایجنسی کے پے رول پرجہادی گروپوں کے ساتھ ملوث ہو ۔
ثانیاً یہ بھی امکان ہے کہ وہ کبھی بھی صرف ڈی ای اے کا ہی ایجنٹ نہ رہا ہو۔/11کے بعد جب یہ پتہ چلا کہ جہادی نیٹ ورک میں امریکہ کے بھی کچھ ایجنٹ ہیں تو تمام امریکی ایجنسیاں دہشت گرد گروپوں کے خلاف متحد ہوگئیں۔ یہ بھی امکان ہے کہ 9/11کے بعد وہ جیل سے فرار ہوا اور عدالت سے یہ کہاگیا ہو کہ وہ سی آئی اے کی بجائے ڈی ای اے کو مطلوب ہے، کیوں کہ اس پرڈرگ سے متعلق الزامات تھے۔
اگر آپ دوسرے امکان پر غور کریں گے تو اس سے یہ ظاہر ہوتا ہے کہ ہیڈلی ڈبل ایجنٹ تھاجسے جہادی گروپوں میں دراندازی کیلئے بھیجاگیا، جس کے بعد وہ خود ہی دہشت گرد بن گیا اور اپنے امریکی آقائوں کو دھوکہ دیا ۔
دونوں امکانات کی وضاحت ضروری ہے ۔ امریکی ہمیں ہیڈلی سے پوچھ گچھ کیوں نہیں کرنے دینا چاہتے۔وہ نہیں چاہتے ہیں کہ امریکی ایجنٹ ( سی آئی اے یا ڈی ای اے جو بھی ہو) کے طور پر ہیڈلی کا کردار سامنے آئے ۔
تاہم تیسرا امکان بھی ہے۔ ایک تھیوری جو امریکی میڈیا اور دی ڈیلی بیسٹ کی ویب سائٹ پر بھی ہے، وہ یہ کہ ہیڈلی اب بھی آخر تک امریکی ایجنٹ ہی ہو۔ ہیڈلی ایک ذریعہ تھا، جس نے امریکیوں کو6/11کے بارے میں بتایا،جس کے بعد امریکہ نے واقعہ سے قبل ایک وارننگ جاری کی (یہ وارننگ واضح نہیں ہونے کی وجہ سے ہماری ایجنسیوں نے اسے نظرانداز کردیا)
اگر آپ اس تھیوری پر غور کریں اور اسی پر ہندستانی ایجنسیوں کے کچھ افسران بھی غور کررہے ہیں کہ امریکیوں نے ہیڈلی کو واپس بلالیا، کیوں کہ انہیں یہ شبہ تھا کہ ہندوستانی ایجنٹوں کو اس کے بارے میں سچائی پتہ چل جائے گی۔انہوں نے یہ بہتر سمجھاکہ اسے غیر ملکی ایجنٹوں اور ایجنسیوں کی رسائی سے دور رکھنے کیلئے امریکی تحویل میں ہی لے لیاجائے۔
ہمارے پاس ایساکوئی پختہ ثبوت نہیں ہے کہ جس سے ہم کسی حتمی نتیجہ پر پہنچیں۔ یہ تینوں امکانات حقیقی واقعہ سے قریب تر ہیں، لیکن ایک بات یہ بھی ہے کہ اب کوئی شبہ نہیں رہ گیا ہے کہ ڈیوڈ ہیڈلی کے کیس میں امریکہ ہندستان کے ساتھ انتہائی اجنبیت والا سلوک کررہا ہے، وہ کچھ چھپاناچاہتا ہے اور اسے خوف ہے کہ ہیڈلی اسے ظاہر نہ کردے ۔
ویر سانگھوی (ہندستان ٹائمز1مارچ010)
جہاں تک ممبئی کا سوال ہے، ےہ انتہائی منظم اور سفاکانہ حملہ تھا، جس کا مقصد وسیع پیمانے پر دہشت پیدا کرنا اور ہندوستان کی شبیہ کو نقصان پہنچانا تھا۔ اس حملے کے پےچھے جو طاقتیں کام کررہی تھیں، ان کا ارادہ ہماری سیکولر سیاست کو غیر مستحکم کرنا، فرقہ وارانہ پھوٹ ڈالنا اور ہمارے ملک کی اقتصادی اور سماجی ترقی میں رکاوٹ ڈالنا تھا۔
ہماری فوری ترجیح ےہ ہے کہ ہندوستان کے لوگوں میں تحفظ کا جذبہ بحال کیا جائے۔ ہم ایسی صورتحال برداشت نہیں کرسکتے، جس میں دہشت گردوں یا دیگر انتہا پسند طاقتوں کے حملے سے ہمارے شہریوں کی سلامتی کو نقصان پہنچے۔
امریکہ کیا چھپانا چاہتا ہے؟
یہ ایک خیالی صورتحال ہے!تصور کیجئے کہ ہندوستانی پولس ایک ایسے شخص کو گرفتار کرتی ہے، جسے/11کے پلان کی پیشگی اطلاع ہواور وہ شخص صرف سازشی عناصر کے ساتھ کام ہی نہیں کرچکاہو، بلکہ اسے متعدد بار نیو یارک بھی بھیجاگیاہو، تاکہ حملہ کو کامیاب بنانے کیلئے دہشت گردوں کو اطلاعات فراہم کرسکے۔
فطری طور پر امریکہ یہ چاہے گا کہ اس شخص کواس کے حوالے کیاجائے، تاکہ حال کے دنوں میں ہونے والے بھیانک دہشت گردانہ حملوں میں اس کے ملوث ہونے کے سلسلے میں امریکی عدالت میں اس کے خلاف مقدمہ چلایاجائے۔اب ذرا یہ تصور کیجئے کہ ہندوستان حوالگی کے معاملہ میں نہ صرف بات چیت سے، بلکہ فیڈرل بیورو آف انویسٹی گیشن (ایف بی آئی،امریکی سراغ رساں ادارہ) کواس شخص سے پوچھ گچھ کی بھی اجازت دینے سے انکار کردے اور سنٹرل بیوروآف انویسٹی گیشن(سی بی آئی، ہندوستانی سراغ رساں ادارہ) اس بات پر مصر رہے کہ اس شخص سے براہ راست پوچھ گچھ کی اجازت دینے کاکوئی امکان نہیںہے، ہاں البتہ یہ ہوسکتا ہے کہ وہ پوچھ گچھ کے جواب میں جو بتائے گا، اس سے ایف بی آئی کو واقف کرادیاجائے گا۔
ہمارے اس تصوراتی منظر کو تھوڑا اور وسیع کیجئے! 9/11کے حملہ میں اس اہم ترین سراغ کو امریکہ کی رسائی میں دینے سے انکار کے بعد ہندوستان یہ اعلان کرے کہ اس شخص سے اس کی ایک ڈیل ہوگئی ہے اور وہ اپنے اوپر عائد کردہ تمام الزامات کو قبول کرے گا، اس لئے ہمارے قانون کے مطابق اس کو سزائے موت دینے کاکوئی سوال ہی پیدا نہیں ہوتاہے اور نہ ہی اس بات کاکوئی امکان ہے کہ اس کے خلاف امریکی قانون کے تحت مقدمہ چلایاجائے۔اس ڈیل کا ایک حصہ یہ بھی ہے کہ ہم نے اسے یہ یقین دہانی بھی کرائی ہے کہ اسے حوالے نہیں کیاجائے گااور جہاں تک سزا کا تعلق ہے اس کا اب بھی تعین کیاجاناباقی ہے، تاہم ہم نے اس دہشت گرد سے جو ڈیل کی ہے، اسی کی بنیاد پر اس کا فیصلہ کیاجائے گا۔
آپ کیا سمجھتے ہیں کہ اس پر امریکہ کیسے ردعمل کرے گا؟
جواب واضح ہے،یہ ایک سفارتی حادثہ بن جائے گا۔امریکہ کا سکریٹری آف اسٹیٹ ہمارے وزیرداخلہ ( غالب امکان ہے کہ وزیراعظم) کو طلب کرے گااور اس بات پر زور دے گا کہ اس دہشت گردکو ایف بی آئی کے حوالے کیاجائے اور ہندوستان پر دہشت گردی کے خلاف جنگ میں دھوکہ دہی کا الزام بھی لگایاجائے گا۔
ہم یہ سوال کریں گے کہ ہم اس پر کس طرح ہندوستان میں مقدمہ چلا سکتے ہیں، جبکہ وہ امریکہ میں ہونے والے جرم میں ملوث تھا؟اس کے بعد دھمکیوں کا سلسلہ شروع ہوجائے گا، یہ بھی ہو کہ ہمیں دی جانے والی امداد بھی بند کردی جائیں، اجلاس منسوخ کردیئے جائیں وغیرہ وغیرہ۔
میں نے اس منظر نامہ کاخاکہ تیار کرنے میں کچھ وقت لگایا ہے، کیوں کہ یہ اس حقیقی واقعہ سے انتہائی بالمقابل اور متوازی ہے۔سوائے اس کے کہ اس کیس میں وہ دہشت گرد 9/11کی بجائے 26/11کے واقعہ میں ملوث ہے اور یہ ہندوستان نہیں،بلکہ امریکہ ہے، جو اسے حوالے کرنے سے انکار کررہا ہے اور ہم سے کہہ رہا ہے کہ جائیں چھلانگ لگادیں۔
یہ دیکھنا مشکل نہیں ہے کہ ڈیوڈ ہیڈلی کا کیس ہندوستانیوں میں اتنا زبردست ہیجان کیوں برپاکررہا ہے۔ ہمارے لئے 26/11اتنا ہی اہم ہے، جتنا امریکیوں کیلئے/11۔فرق صرف اتنا ہے کہ امریکہ وہ سب کچھ جانتا ہے، جو 9/11کے بعد اسے جانناچاہئے تھا،خاص طور سے جب القاعدہ نے باضابطہ اس حملہ کی ذمہ داری قبول کرلی ہے۔
جبکہ ہندوستان اس حملہ کے بعد سے اب تک اس سازش کی تفصیلات کا سراغ لگانے میں مصروف ہے ۔ یہ امریکہ ہی تھا جس نے ہم سے کہاتھا کہ ڈیوڈ ہیڈلی6/11کے حملہ سے پہلے کئی مرتبہ ہندوستان آیا اور جاسوسی کرکے واپس گیاتھا۔ لہٰذا ہم یہ سمجھنے میں حق بجانب ہیں کہ ایساشخص نہ صرف ہندوستانی عدالت سے سزاکا مستحق ہے،بلکہ اس سے ملنے والی اطلاعات6/11کے حملے کے سلسلے میں کئی رازوں سے بھی پردہ ہٹائیں گی۔مزید یہ بھی کہ ہیڈلی نے پونا کو بھی ممکنہ دہشت گردانہ حملہ کا ہدف بنایا ہو اور اس طرح کے اور کتنے دہشت گردانہ ٹارگٹ کا اس نے تعین کیا ہو، اس کے بارے میں ہمیں اس وقت تک علم نہیں ہوسکتا، جب تک ہم اس سے تفتیش نہیںکرتے۔
لہٰذا امریکہ اس طرح کیوں پیش آرہاہے؟امریکیوں کے بارے میں آپ جوچاہیں کہیں، تاہم یہ حقیقت ہے کہ انہوں نے دہشت گردی کے خلاف جنگ میں دنیا کی تمام انٹلی جینس ایجنسیوں کو ملوث کیا اور ان سے مسلسل مدد لی۔
اب وہ یہ تعاون خود کیوں نہیں کررہا ہے؟اب صرف ایک دہشت گرد کیلئے وہ ہندستان کو پرایا کیوں کررہاہے؟وہ ہندوستانی تفتیش کاروں کو ڈیوڈہیڈلی سے تفتیش کرنے کی اجاز ت نہ دے کر پونا جیسے حملوں میں اور لوگوںکے مارے جانے کی اجازت کیوں دے رہاہے؟
میں یہ سمجھتا ہوں کہ ان حقائق پر صرف ایک ہی توضیح فٹ بیٹھتی ہے اوراس سوال کا صرف ایک ہی جواب ہے کہ
’’ڈیوڈ ہیڈلی ایک امریکی ایجنٹ ہے ‘‘
جب میں نے پہلی بار یہ مفروضہ ان صفحات پر پیش کیاتھاتو وہ پہلے تو حقیقت حال سے تھوڑا سا الگ محسوس ہورہاتھا، تاہم اب مجھے یہ دکھ ہورہاہے کہ اس مفروضہ میںپورا دم ہے اور ہر گزرنے والا دن اس تھیسس کی حمایت میں ایک ثبوت بنتا جارہاہے۔
ہم جانتے ہیں کہ ہیڈلی ( جو خود کو اس وقت دائود گیلانی کہتاتھا) منشیات کے الزام میں سزایافتہ تھا اور امریکی جیل میں بھی رہ چکاہے۔ ہم یہ بھی جانتے ہیں کہ وہ اس کے بعد جیل سے رہا کیاگیا اور ڈرگ انفورسمنٹ ایڈمنسٹریشن ( ڈی ای اے) کے حوالے کیاگیا، جس کے بارے میں کہاگیا ہے کہ وہ ( ڈی ای اے) اسے انڈر کوور ایجنٹ کے طور پر پاکستان بھیجنا چاہتا ہے ۔یہ تمام باتیں پبلک ریکارڈ میںہیں۔
امریکہ کی جانب سے ہیڈلی کو پاکستان بھیجے جانے اور کچھ مہینوں قبل اسے شکاگو ائیرپورٹ پر گرفتار کئے جانے کے دوران یہ کیا ہوا؟ ایک امریکی ایجنٹ ایک دہشت گرد میں کیسے بدل گیا؟اس کے بارے میں امریکہ نے کچھ نہیں کہا۔
واضح طور پر تین امکانات ہوسکتے ہیں۔اولاً یہ ممکن ہے کہ وہ ا ب بھی ڈی ای اے کا ایجنٹ ہو اوراسی ڈرگ ایجنسی کے پے رول پرجہادی گروپوں کے ساتھ ملوث ہو ۔
ثانیاً یہ بھی امکان ہے کہ وہ کبھی بھی صرف ڈی ای اے کا ہی ایجنٹ نہ رہا ہو۔/11کے بعد جب یہ پتہ چلا کہ جہادی نیٹ ورک میں امریکہ کے بھی کچھ ایجنٹ ہیں تو تمام امریکی ایجنسیاں دہشت گرد گروپوں کے خلاف متحد ہوگئیں۔ یہ بھی امکان ہے کہ 9/11کے بعد وہ جیل سے فرار ہوا اور عدالت سے یہ کہاگیا ہو کہ وہ سی آئی اے کی بجائے ڈی ای اے کو مطلوب ہے، کیوں کہ اس پرڈرگ سے متعلق الزامات تھے۔
اگر آپ دوسرے امکان پر غور کریں گے تو اس سے یہ ظاہر ہوتا ہے کہ ہیڈلی ڈبل ایجنٹ تھاجسے جہادی گروپوں میں دراندازی کیلئے بھیجاگیا، جس کے بعد وہ خود ہی دہشت گرد بن گیا اور اپنے امریکی آقائوں کو دھوکہ دیا ۔
دونوں امکانات کی وضاحت ضروری ہے ۔ امریکی ہمیں ہیڈلی سے پوچھ گچھ کیوں نہیں کرنے دینا چاہتے۔وہ نہیں چاہتے ہیں کہ امریکی ایجنٹ ( سی آئی اے یا ڈی ای اے جو بھی ہو) کے طور پر ہیڈلی کا کردار سامنے آئے ۔
تاہم تیسرا امکان بھی ہے۔ ایک تھیوری جو امریکی میڈیا اور دی ڈیلی بیسٹ کی ویب سائٹ پر بھی ہے، وہ یہ کہ ہیڈلی اب بھی آخر تک امریکی ایجنٹ ہی ہو۔ ہیڈلی ایک ذریعہ تھا، جس نے امریکیوں کو6/11کے بارے میں بتایا،جس کے بعد امریکہ نے واقعہ سے قبل ایک وارننگ جاری کی (یہ وارننگ واضح نہیں ہونے کی وجہ سے ہماری ایجنسیوں نے اسے نظرانداز کردیا)
اگر آپ اس تھیوری پر غور کریں اور اسی پر ہندستانی ایجنسیوں کے کچھ افسران بھی غور کررہے ہیں کہ امریکیوں نے ہیڈلی کو واپس بلالیا، کیوں کہ انہیں یہ شبہ تھا کہ ہندوستانی ایجنٹوں کو اس کے بارے میں سچائی پتہ چل جائے گی۔انہوں نے یہ بہتر سمجھاکہ اسے غیر ملکی ایجنٹوں اور ایجنسیوں کی رسائی سے دور رکھنے کیلئے امریکی تحویل میں ہی لے لیاجائے۔
ہمارے پاس ایساکوئی پختہ ثبوت نہیں ہے کہ جس سے ہم کسی حتمی نتیجہ پر پہنچیں۔ یہ تینوں امکانات حقیقی واقعہ سے قریب تر ہیں، لیکن ایک بات یہ بھی ہے کہ اب کوئی شبہ نہیں رہ گیا ہے کہ ڈیوڈ ہیڈلی کے کیس میں امریکہ ہندستان کے ساتھ انتہائی اجنبیت والا سلوک کررہا ہے، وہ کچھ چھپاناچاہتا ہے اور اسے خوف ہے کہ ہیڈلی اسے ظاہر نہ کردے ۔
ویر سانگھوی (ہندستان ٹائمز1مارچ010)
TERROR WAR (9/11-26/11) vs. CYBER WAR
How many e-mail addresses of your friends do you have? How many media persons you are acquainted with? How many news agencies you are in contact with? Go into the contacts and in-box of your cell phones and see, how many mobile numbers of various persons do you have in .Oh yes; indeed, I am going to say any such thing, which you know, but still don’t want to tell anybody. But now, you can tell it. Because, I am saying it …your own Aziz Burney, and through me, when you will say this, you will not be even remotely hurt … and nobody will ever tell you to speak slowly, what if any body listens.Forget it brother: whether you live frightened or fearlessly, everybody will have to meet same fate. Then ,listen ,this may not be truth, may be it is only guess ,but help me to try to reach upon truth ,then ,definitely , my point will not seem to be dishonesty . There was no terrorist attack, which was publicized as 9/11.All this was a master plan of America. In fact, the dream to rule all over the world could have fulfilled, through this only.This was a unique way for war against terror and to use its own weapons for which America created cause, itself. These terrorist organizations like ,Al Qaeda ,Lashkar e Taiba ,Taliban etc are nothing but the out-fits of CIA which created these, in Muslim names ,to continue their activities .if anybody things my these assertion as rubbish ,it is upto him and if you believe it true ,you can. I decided to launch my own web site along with newspapers, because what you can say on web site in a moment and as you wish, in few sentences, it takes months to write the same in the language of newspaper.Afghanistan would not have destroyed if 9/11 has not happened…..Iraq would not have been ruined ….Saddam Hussein would not have been hanged….If all these could not have happened ,land of Pakistan might not have been used ….Pakistan could not have become victim of terrorism…Clouds of war could not hover over Iran….Bomb blast could not have occurred in India…There could not have been any excuse for civil war…..If all these would not have happened the, what America would have been doing …who could have are for it…how weapons could they sell weapons….what would have happened to it’s infantry developed in Israel…How those weapons could be exhibited which re used against Palestinians….How could they get purchase orders from all over the world…?Which is the deadliest weapon ,which country posses these …which country ,to strengthen it’s defense system needs which American missile..?How it will be decided? Withfootages of weapons of wars used in Afghanistan and Iraq……with footages showing shreds of human dead bodies ……tears can roll out of you eyes….your heart can weep…You can held your head…but who are obsessed to rule over whole world …those include such Neros who may be playing flute when Rome burns and there may be such Bushes that when tall buildings of new York comes down, then they are busy telling stories of goats to school children.I could not have mentioned the destruction of Iraq and Afghanistan…I could have been free from any worry about Iran’s future , if flame could not have reached at my doors ….if the danger has not knocked at my country India. May be I am alone to start this war. I have become the Indian , following the principles of Gandhi ,who don’t fear firangis.May be the spirit of Subhash Chander Bose possessed within me.
Therefore I started using my pen as pistol. May be I ma preparing noose for myself and this can also be possible that I am going to repeat the history of Maulana abulkalam Azad ,the editor of Alhilal and al bilagh.You think as you like. But I think that 26-11 was not different from 9/11 of New York…planning in both was same…only terrorist act was different…For 9/11 ,purpose was to destroy Iraq ,Afghanistan ,and to warn Islamic world that you be under the tip of our shoes ,otherwise will be hanged like Saddam.Just pray for journalistlike Muntazir alzaidi , who changed this message by his shoes …and purpose of 26/11 was to blame Pakistan…to instigate India to attack Pakistan …..to create situation of civil war in India…first destruction of Pakistan through a country like India …to occupy weakened India as has been done in Saudi Arab, Iraq and Afghanistan….
The story is not baseless. The only change is that I started it from the climax. Wait for the flash back...Soon I will start it...then you will have opportunity to see flashes of facts in every scene …..These will get links in such a way that you will not feel bizarre. Pray, that it should not discontinue till the last scene is written…and also you reading should also continue….May be Almighty has decided to teach lessons to the enemies of humanity. And instead of battle ground, it will be taught through cyber war. Therefore along with pen and paper, I also entered in the world of internet. As I believe on your cooperation.
Tuesday, March 23, 2010
भारत सरकार को नाराज़गी ज़ाहिर करनी चाहिए
अज़ीज़ बर्नी
मैंने किसी टिप्पणी के बिना प्रकाशित किया था कल बी॰रमन साहब के लेख को और आज श्रीमति बरखा दत्त के लेख पर भी किसी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है, जो 20 मार्च शनिवार के दिन अंगे्रज़ी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुआ। इन लेखों का एक-एक शब्द चीख़-चीख़ कर कहता है कि कहीं हमारे साथ न्याय नहीं हो रहा है। हमें तथ्यों तक पहुंचने से रोके जाने का प्रयास हो रहा है। कोई है जो नहीं चाहता कि हम भारत पर हुए आतंकवादी हमले की गहराई तक पहुंचें। क्या यह समझना कोई पहेली हल करने जैसा कठिन कार्य है, वह कौन है और क्यों ऐसा चाहता है? क्या यह इतना जटिल प्रश्न है जिसके जवाब के लिए हमें दिमाग़ पर बहुत अधिक ज़ोर डालने की आवश्यकता है? नहीं, उत्तर बहुत सरल है। फिर भी हम इतनी सहजता से इस उत्तर तक पहुंचना नहीं चाहते। क्यों, क्या मजबूरी है हमारी? क्यों हमारे क़लम उस धारा प्रवाह रूप से नहीं चलते जिस धारा प्रवाह ढंग से चला करते हैं? क्यों हमारी ज़बान पर यह नाम आते-आते रुक जाता है? हम सत्य को डंके की चोट पर कहने में झिझकते क्यांे हैं?
बहरहाल देर आयद दुरुस्त आयद की तरह फिज़ा कुछ बदल रही है। हम समझते हैं कि हमारे देश के लिए यह एक सुखद संदेश है और हम संतुष्ट इसलिए भी हैं कि जो कुछ हमने घटना के तुरंत बाद से लिखना आरंभ किया, आज उसे ऐसे सुप्रसिद्ध लेखकों के लेखों से काफी बल मिल रहा है। हम फिर बहुत ज़ोरदार ढंग से उससे आगे की कहानी तक पहुंचने का इरादा रखते हैं। सारी रूप रेखा दिमाग़ में है। आज और इसी समय लिखा जा सकता है। परंतु अभी थोड़ा इंतिज़ार। इस कड़ी में कुछ और लोगों को शामिल हो लेने दीजिए, यह आवाज़ सभी दिशाओं से उठ लेने दीजिए। कहीं ऐसा न लगे कि जो कुछ हम सामने रख रहे हैं वह केवल हम बोल रहे हैं, बल्कि हर लेख से लगे कि हक़ बोल रहा है। और फिर जब यह आवाज़ पहुंचे, हमारे सत्ता के गलियारों तक और उस केंद्रीय किरदार तक जो सब कुछ आईने की तरह साफ होने पर भी आईने को धुंधला करने के प्रयासों में लगे हैं, तो फिर वह मान लेगा कि यह खोज बेनतीजा नहीं है। बेशक! सच को हज़ार पर्दों से ढक दिया जाए, परंतु सच को उजागर होने से कोई रोक नहीं सकता।
एक परछाईं का पीछा
नई दिल्ली ने आमिर अजमल क़साब से पूछताछ के लिए एफबीआई को अनुमति दे दी थी लेकिन अमेरिका डेविड हेडली के रास्ते में रुकावट खड़ी कर रहा है। अब यह बात स्पष्ट हो गई है कि पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी, जिसने भारत के विरुद्ध युद्ध का वातावरण तैयार किया और मुम्बई को तबाह करने का प्रयास किया, अंततः उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। हमसे कहा गया है कि सब कुछ नष्ट नहीं हुआ है। लेकिन अमेरिका के साथ डेविड के मामले पर हो रही पहल से ऐसा लग रहा है कि भारत उस व्यक्ति को प्राप्त करने में असफल साबित होगा, जिसने भारत में सीमा पार से आकर उथल पुथल का माहौल पैदा किया, बम धमाके कराए, कई स्थानों का निरीक्षण किया और कई लोगों को अपने मिशन में शामिल किया। लेकिन ऊपरी तौर पर हम फिर भी ख़ुश हैं कि भारत की जांच ऐजंसियां किसी न किसी रूप में उस व्यक्ति से पूछताछ करने में सफल हो सकती हैं तो क्या वह सरकार जो हेडली के प्रत्यार्पण की मांग कर रही थी अब हेडली की कम सज़ा पर चुप्पी साध लेने में ही अपनी भलाई समझती है।
हमें इस अपमान को नहीं भूलना चाहिए जब हमारे देश की जांच ऐजंसी पहली बार डेविड हेडली से पूछताछ करने अमेरिका गई थी तो उसे पूछताछ किए बिना ही वापस लौटा दिया गया था जबकि आमिर अजमल क़साब से पूछताछ भारत ने एफबीआई को पूरी छूट दी थी और एफबीआई ने 9 घंटे से अधिक क़साब से पूछताछ भी की थी। 26/11 के हमले में 6 अमेरिकी नागरिकों की मृत्यु से एफबीआई ने अपने आप यह समझ लिया था कि उसे पूछताछ करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। जबकि इसी तरह के हमले में 100 से अधिक भारतीय नागरिक की जान जाती है जिसके कारण भारत को सदैव के लिए एक गहरा आघात लगा, इस मामले में हमें पूछताछ की अनुमति नहीं दी जाती है, बल्कि यह कहा जाता है कि सब भूल जाइए और इसी में प्रसन्न रहिए कि वीडियो कान्फ्ऱेंसिंग द्वारा हेडली से पूछताछ का अवसर प्राप्त हो सकता है।
इस विचित्र दोमूंहे पन के दो कारण हो सकते हैं, धोखा या गोपनीयता। पिछले कुछ महीनों से हेडली के रहस्यमय अतीत के बारे में प्रश्न उठाए जा रहे हैं? एक तो उसकी विभिन्न प्रकार की आंखें अर्थात् एक भूरी और एक नीली ैबीप्रव च्ीतमदपं में डूबे हुए जीवन का संकेत हो सकती हैं, दूसरे हमें ज्ञात है कि उसकी दो पत्नियां हैं और एक मां है। मां एक ठंत चलाती है और बाप जो पाकिस्तानी राजनयिक है, जो उसे कट्टरवाद की ओर ले गया। हेडली को पूरब और पश्चिम दोनों की जानकारी होने के कारण वह अमेरिकी ड्रग इन्फोर्समंेट एडमिनिस्ट्रेशन के लिए मुख़बिरी का काम करने लगा। अब यह रहस्योदघाटन हुआ है कि 1998 के ड्रग स्मगलिंग के एक मामले में पकड़े जाने पर वह अपनी 10 वर्ष की सज़ा को 2 साल में परिवर्तित करने पर मुख़बिरी करने के लिए राज़ी हुआ था। अब कहानी यहां पर एक नया मोड़ लेती है, लेकिन ऐसा तो नहीं कि हेडली पाकिस्तान में मादक पदार्थों के रास्ते अमेरिकी मुख़बिर के रूप में लशकर-ए-तैयबा में शामिल हो गया हो या किसी कारणवश अमेरिका को धोखा देकर उसने उसके लिए काम करना तो बंद नहीं कर दिया था? अगर ऐसा है तो क्या यह 26/11 से पहले हुआ? एक आदमी किस तरह से अमेरिका में और अमेरिका से बाहर यहां तक की दुनिया भर में इतनी सहजता से आता जाता रहा? यहां एक विशेष बात यह है कि हेडली अगर 26/11 से एक महीना पूर्व एफबीआई की जांच के घेरे में था तो यह सूचना भारत को क्यों नहीं दी गई। यहां तक कि वह मुम्बई हमले के पांच महीने बाद अप्रैल 2009 में भारत आने में कैसे सफल रहा। हालांकि यह सभी प्रश्न जासूसी नाविल पढ़ने वालों के काल्पनिक प्रश्न कह कर रद्द कर दिए गए हैं, लेकिन यदि हम सभी ग़लत थे तो क्या कोई हमें यह बताएगा कि उसकी वैकल्पिक कहानी क्या हो सकती है?
अमेरिका ने भारतीय ऐजंसी को 26/11 की महत्वपूर्ण भूमिका से पूछताछ करने से यूंही मना नहीं किया, बल्कि उसने हेडली की जान भी बचाई है।
अब यह दूसरा अवसर है जब हेडली ने हिरासत के दौरान कोई समझौता किया है। क्या यह किसी को संदेह में डालने के लिए पर्याप्त नहीं है? मुम्बई के फिल्मी हीरो और ‘‘जिम’’ के मालिक राहुल भट्ट जिनकी कई महीनों तक हेडली से दोस्ती रही, उनका कहना है कि वह हेडली को सदैव ‘‘ऐजेंट हेडली’’ कह कर बुलाते थे क्योंकि ‘‘वह रहस्यमय ढंग से आता था और बातचीत भी गुप्त रूप से करता था। उसे अपने टारगेट का ज्ञान था।’’ सरकार इन बातों को रद्द कर सकती है लेकिन सच्चाई यह है कि भट्ट को हेडली के जेल में बंद होने की सूचना अमेरिकी अधिकारियों की ओर से भारत को बताने से पहले ही से थी। गृहमंत्रालय के अनुसार हेडली के बारे में अमेरिका का इनकार हेडली के ऐजंेट के कारणवश नहीं है। लेकिन भारत के प्रमुख वान्टेड आतंकवादी के साथ अमेरिकी रवैया के कारण इस जिज्ञासा भरे मामले की व्याख्या कैसे की जा सकती है?
अमेरिकी ड्रग इन्फोर्समंेट एडमिनिस्ट्रेशन के मुख़बिर के रूप में अगर हेडली का अतीत न देखा जाए तो भी इस मामले में अमेरिका की ओर से हैंडिल किया जाना विचित्र सा लगता है, डेनमार्क के पत्रकारों के हवाले से यह ख़बर आई है कि डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के विरुद्ध प्रतिशोध की कार्रवाई के बारे में हेडली से डेनमार्क के जांचकर्ताओं ने पहले ही पूछताछ कर ली है, तो ऐसी परिस्थितियों में भारत को इतने लम्बे समय से क्यों पूछताछ की अनुमति नहीं दी जा रही है? इस मामले को कोई अमेरिका विरोधी मानसिकता के कारण नहीं उठा रहा है, बल्कि सच्चाई यह है कि अब यह जानने की उत्सुकता बढ़ रही है कि अमेरिका आतंकवाद विरोधी युद्ध में भारत का गंभीर सहयोगी है कि नहीं। या हमें यह जंग अकेले ही लड़नी होगी। ओबामा प्रशासन जिस तरह अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से संबंधित नीति बना रहा है उससे पहले ही यह लग रहा था कि उसे भारत की चिंता नहीं है।
हेडली पर जिज्ञासा जिस तरह क़ायम है उससे कभी भी सब्र का प्याला भर सकता है। ऐसे में आशा की जा सकती है कि एक विशाल परिपेक्ष में भारतीय सरकार को अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। बहरहाल हेडली से पूछताछ के लिए उसे भारत को सौंपा जाएगा या नहीं, इस पर अभी अनिश्चत्ता की स्थिति क़ायम है। देखना यह भी होगा कि क्या यह सचमुच की जांच होगी या फिर यह अमेरिका की इच्छा के अनुसार होगी? अभी तक तो सरकार किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है जिसके कारण कई और परेशान करने वाले प्रश्न पैदा होते हैं। अगर एक 40 वर्षीय मास्टर मांइड को जीवन यापन करने का अधिकार मिल जाता है तो 21 वर्षीय क़साब जो हेडली की योजना का मात्र एक पैदल सिपाही है, उसे संभावित मृत्यु का सामना करना चाहिए?
बरखा दत्त (ग्रुप एडीटर, एनडीटीवी)
बहरहाल देर आयद दुरुस्त आयद की तरह फिज़ा कुछ बदल रही है। हम समझते हैं कि हमारे देश के लिए यह एक सुखद संदेश है और हम संतुष्ट इसलिए भी हैं कि जो कुछ हमने घटना के तुरंत बाद से लिखना आरंभ किया, आज उसे ऐसे सुप्रसिद्ध लेखकों के लेखों से काफी बल मिल रहा है। हम फिर बहुत ज़ोरदार ढंग से उससे आगे की कहानी तक पहुंचने का इरादा रखते हैं। सारी रूप रेखा दिमाग़ में है। आज और इसी समय लिखा जा सकता है। परंतु अभी थोड़ा इंतिज़ार। इस कड़ी में कुछ और लोगों को शामिल हो लेने दीजिए, यह आवाज़ सभी दिशाओं से उठ लेने दीजिए। कहीं ऐसा न लगे कि जो कुछ हम सामने रख रहे हैं वह केवल हम बोल रहे हैं, बल्कि हर लेख से लगे कि हक़ बोल रहा है। और फिर जब यह आवाज़ पहुंचे, हमारे सत्ता के गलियारों तक और उस केंद्रीय किरदार तक जो सब कुछ आईने की तरह साफ होने पर भी आईने को धुंधला करने के प्रयासों में लगे हैं, तो फिर वह मान लेगा कि यह खोज बेनतीजा नहीं है। बेशक! सच को हज़ार पर्दों से ढक दिया जाए, परंतु सच को उजागर होने से कोई रोक नहीं सकता।
एक परछाईं का पीछा
नई दिल्ली ने आमिर अजमल क़साब से पूछताछ के लिए एफबीआई को अनुमति दे दी थी लेकिन अमेरिका डेविड हेडली के रास्ते में रुकावट खड़ी कर रहा है। अब यह बात स्पष्ट हो गई है कि पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी, जिसने भारत के विरुद्ध युद्ध का वातावरण तैयार किया और मुम्बई को तबाह करने का प्रयास किया, अंततः उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। हमसे कहा गया है कि सब कुछ नष्ट नहीं हुआ है। लेकिन अमेरिका के साथ डेविड के मामले पर हो रही पहल से ऐसा लग रहा है कि भारत उस व्यक्ति को प्राप्त करने में असफल साबित होगा, जिसने भारत में सीमा पार से आकर उथल पुथल का माहौल पैदा किया, बम धमाके कराए, कई स्थानों का निरीक्षण किया और कई लोगों को अपने मिशन में शामिल किया। लेकिन ऊपरी तौर पर हम फिर भी ख़ुश हैं कि भारत की जांच ऐजंसियां किसी न किसी रूप में उस व्यक्ति से पूछताछ करने में सफल हो सकती हैं तो क्या वह सरकार जो हेडली के प्रत्यार्पण की मांग कर रही थी अब हेडली की कम सज़ा पर चुप्पी साध लेने में ही अपनी भलाई समझती है।
हमें इस अपमान को नहीं भूलना चाहिए जब हमारे देश की जांच ऐजंसी पहली बार डेविड हेडली से पूछताछ करने अमेरिका गई थी तो उसे पूछताछ किए बिना ही वापस लौटा दिया गया था जबकि आमिर अजमल क़साब से पूछताछ भारत ने एफबीआई को पूरी छूट दी थी और एफबीआई ने 9 घंटे से अधिक क़साब से पूछताछ भी की थी। 26/11 के हमले में 6 अमेरिकी नागरिकों की मृत्यु से एफबीआई ने अपने आप यह समझ लिया था कि उसे पूछताछ करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। जबकि इसी तरह के हमले में 100 से अधिक भारतीय नागरिक की जान जाती है जिसके कारण भारत को सदैव के लिए एक गहरा आघात लगा, इस मामले में हमें पूछताछ की अनुमति नहीं दी जाती है, बल्कि यह कहा जाता है कि सब भूल जाइए और इसी में प्रसन्न रहिए कि वीडियो कान्फ्ऱेंसिंग द्वारा हेडली से पूछताछ का अवसर प्राप्त हो सकता है।
इस विचित्र दोमूंहे पन के दो कारण हो सकते हैं, धोखा या गोपनीयता। पिछले कुछ महीनों से हेडली के रहस्यमय अतीत के बारे में प्रश्न उठाए जा रहे हैं? एक तो उसकी विभिन्न प्रकार की आंखें अर्थात् एक भूरी और एक नीली ैबीप्रव च्ीतमदपं में डूबे हुए जीवन का संकेत हो सकती हैं, दूसरे हमें ज्ञात है कि उसकी दो पत्नियां हैं और एक मां है। मां एक ठंत चलाती है और बाप जो पाकिस्तानी राजनयिक है, जो उसे कट्टरवाद की ओर ले गया। हेडली को पूरब और पश्चिम दोनों की जानकारी होने के कारण वह अमेरिकी ड्रग इन्फोर्समंेट एडमिनिस्ट्रेशन के लिए मुख़बिरी का काम करने लगा। अब यह रहस्योदघाटन हुआ है कि 1998 के ड्रग स्मगलिंग के एक मामले में पकड़े जाने पर वह अपनी 10 वर्ष की सज़ा को 2 साल में परिवर्तित करने पर मुख़बिरी करने के लिए राज़ी हुआ था। अब कहानी यहां पर एक नया मोड़ लेती है, लेकिन ऐसा तो नहीं कि हेडली पाकिस्तान में मादक पदार्थों के रास्ते अमेरिकी मुख़बिर के रूप में लशकर-ए-तैयबा में शामिल हो गया हो या किसी कारणवश अमेरिका को धोखा देकर उसने उसके लिए काम करना तो बंद नहीं कर दिया था? अगर ऐसा है तो क्या यह 26/11 से पहले हुआ? एक आदमी किस तरह से अमेरिका में और अमेरिका से बाहर यहां तक की दुनिया भर में इतनी सहजता से आता जाता रहा? यहां एक विशेष बात यह है कि हेडली अगर 26/11 से एक महीना पूर्व एफबीआई की जांच के घेरे में था तो यह सूचना भारत को क्यों नहीं दी गई। यहां तक कि वह मुम्बई हमले के पांच महीने बाद अप्रैल 2009 में भारत आने में कैसे सफल रहा। हालांकि यह सभी प्रश्न जासूसी नाविल पढ़ने वालों के काल्पनिक प्रश्न कह कर रद्द कर दिए गए हैं, लेकिन यदि हम सभी ग़लत थे तो क्या कोई हमें यह बताएगा कि उसकी वैकल्पिक कहानी क्या हो सकती है?
अमेरिका ने भारतीय ऐजंसी को 26/11 की महत्वपूर्ण भूमिका से पूछताछ करने से यूंही मना नहीं किया, बल्कि उसने हेडली की जान भी बचाई है।
अब यह दूसरा अवसर है जब हेडली ने हिरासत के दौरान कोई समझौता किया है। क्या यह किसी को संदेह में डालने के लिए पर्याप्त नहीं है? मुम्बई के फिल्मी हीरो और ‘‘जिम’’ के मालिक राहुल भट्ट जिनकी कई महीनों तक हेडली से दोस्ती रही, उनका कहना है कि वह हेडली को सदैव ‘‘ऐजेंट हेडली’’ कह कर बुलाते थे क्योंकि ‘‘वह रहस्यमय ढंग से आता था और बातचीत भी गुप्त रूप से करता था। उसे अपने टारगेट का ज्ञान था।’’ सरकार इन बातों को रद्द कर सकती है लेकिन सच्चाई यह है कि भट्ट को हेडली के जेल में बंद होने की सूचना अमेरिकी अधिकारियों की ओर से भारत को बताने से पहले ही से थी। गृहमंत्रालय के अनुसार हेडली के बारे में अमेरिका का इनकार हेडली के ऐजंेट के कारणवश नहीं है। लेकिन भारत के प्रमुख वान्टेड आतंकवादी के साथ अमेरिकी रवैया के कारण इस जिज्ञासा भरे मामले की व्याख्या कैसे की जा सकती है?
अमेरिकी ड्रग इन्फोर्समंेट एडमिनिस्ट्रेशन के मुख़बिर के रूप में अगर हेडली का अतीत न देखा जाए तो भी इस मामले में अमेरिका की ओर से हैंडिल किया जाना विचित्र सा लगता है, डेनमार्क के पत्रकारों के हवाले से यह ख़बर आई है कि डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के विरुद्ध प्रतिशोध की कार्रवाई के बारे में हेडली से डेनमार्क के जांचकर्ताओं ने पहले ही पूछताछ कर ली है, तो ऐसी परिस्थितियों में भारत को इतने लम्बे समय से क्यों पूछताछ की अनुमति नहीं दी जा रही है? इस मामले को कोई अमेरिका विरोधी मानसिकता के कारण नहीं उठा रहा है, बल्कि सच्चाई यह है कि अब यह जानने की उत्सुकता बढ़ रही है कि अमेरिका आतंकवाद विरोधी युद्ध में भारत का गंभीर सहयोगी है कि नहीं। या हमें यह जंग अकेले ही लड़नी होगी। ओबामा प्रशासन जिस तरह अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से संबंधित नीति बना रहा है उससे पहले ही यह लग रहा था कि उसे भारत की चिंता नहीं है।
हेडली पर जिज्ञासा जिस तरह क़ायम है उससे कभी भी सब्र का प्याला भर सकता है। ऐसे में आशा की जा सकती है कि एक विशाल परिपेक्ष में भारतीय सरकार को अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। बहरहाल हेडली से पूछताछ के लिए उसे भारत को सौंपा जाएगा या नहीं, इस पर अभी अनिश्चत्ता की स्थिति क़ायम है। देखना यह भी होगा कि क्या यह सचमुच की जांच होगी या फिर यह अमेरिका की इच्छा के अनुसार होगी? अभी तक तो सरकार किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है जिसके कारण कई और परेशान करने वाले प्रश्न पैदा होते हैं। अगर एक 40 वर्षीय मास्टर मांइड को जीवन यापन करने का अधिकार मिल जाता है तो 21 वर्षीय क़साब जो हेडली की योजना का मात्र एक पैदल सिपाही है, उसे संभावित मृत्यु का सामना करना चाहिए?
बरखा दत्त (ग्रुप एडीटर, एनडीटीवी)
عزیز برنی…………………………………قسط 105
حکومت ہند کو ناراضگی ظاہر کرنی چاہےے
میں نے کسی تبصرے کے بغیر شامل اشاعت کیا تھا کل بی رمن صاحب کی تحریر کو اور آج محترمہ برکھاد ت کے مضمون پر بھی کسی تبصرے کی ضرورت نہیں ہے،جو 20مارچ بروز ہفتہ انگریزی روزنامہ ’’ہندوستان ٹائمز‘‘ میں شائع ہوا۔ان تحریروں کا ہر ہر لفظ چیخ چیخ کر کہتا ہے کہ کہیں ہمارے ساتھ انصاف نہیں ہو رہا ہے۔ ہمیں حقائق تک پہنچنے سے روکے جانے کی کوشش ہو رہی ہے۔کوئی ہے جو نہیں چاہتا کہ ہم ہندوستان پر ہوئے دہشت گردانہ حملے کی تہہ تک پہنچیں۔کیا یہ سمجھنا کوئی معمہ حل کرنے جیسا مشکل کام ہے کہ وہ کون ہے اور کیوں ایسا چاہتا ہے؟ کیا یہ اتنا پیچیدہ سوال ہے، جس کے جواب کے لئے ہمیں دماغ پر بہت زیادہ زور ڈالنے کی ضرورت ہے؟نہیں! جواب بہت آسان ہے،پھر بھی ہم اتنی آسانی سے اس جواب تک پہنچنا نہیں چاہتے، کیوں کیا مجبوری ہے ہماری؟ کیوں ہمارے قلم اس روانی سے نہیں چلتے، جس روانی سے چلا کرتے ہیں؟کیوں ہماری زبان پر یہ نام آتے آتے رک جاتا ہے؟ہم سچ کو ببانگ دہل کہنے میں جھجکتے کیوں ہیں؟بہرحال دیر آید درست آید کی طرز پر فضا کچھ بدل رہی ہے۔ہم سمجھتے ہیں کہ ہمارے ملک کیلئے یہ ایک خوش آئند پیغام ہے اور ہم مطمئن اس لئے بھی ہیں کہ جو کچھ ہم نے حادثے کے فوراً بعد سے لکھنا شروع کیا،آج اسے ایسے معروف قلم کاروں کی تحریروں سے بڑی تقویت مل رہی ہے۔ ہم پھربہت پرزور انداز میں اس سے آگے کی کہانی تک پہنچنے کا ارادہ رکھتے ہیں۔ تمام خاکہ ذہن میں ہے۔آج اور اسی وقت لکھا جا سکتا ہے،مگر ابھی تھوڑا انتظار۔اس صف میں کچھ اور لوگوں کو شامل ہو لینے دیجئے۔ یہ آواز ہر سمت سے اٹھنے دیجئے۔کہیں ایسا نہ لگے کہ جو کچھ ہم سامنے رکھ رہے ہیں وہ صرف ہم بول رہے ہیں، بلکہ ہر تحریر سے لگے کہ حق بول رہا ہے اور پھر جب یہ آواز پہنچے ہمارے ایوان اقتدار تک اور اس مرکزی کردار تک، جو سب کچھ آئینہ کی طرح صاف ہونے پر بھی آئینہ کو دھندلا کرنے کی کوششوں میں مصروف ہے تو پھر وہ مان لے گا کہ یہ جستجو لا حاصل ہے۔بے شک سچ کو ہزار پردوں سے ڈھک دیا جائے، مگرسچ کو عیاں ہونے سے کوئی روک نہیں سکتا۔ایک سا ئے کا تعاقبنئی دہلی نے عامر اجمل قصاب سے پوچھ گچھ کے لیے FBIکو اجازت دے دی تھی، لیکن امریکہ ڈیوڈ ہیڈلی کے معاملے میں ہندوستان کی راہ میں رکاوٹ پیدا کررہا ہے۔ اب یہ بات واضح ہو گئی ہے کہ پاکستانی نژاد امریکی، جس نے ہندوستان کے خلاف جنگ کا ماحول تیار کیا اور ممبئی کو تباہ کرنے کی کوشش کی، آخر کاراس نے اپناگناہ قبول کرلیا ہے۔ ہم سے کہا گیا ہے کہ سب کچھ تباہ نہیں ہوا ہے،لیکن امریکہ کے ساتھ ڈیوڈ کے معاملے پر ہورہی پیش رفت سے ایسا لگ رہا ہے کہ ہندوستان اس شخص کو حاصل کرنے میں ناکام ثابت ہوگا جس نے ہندوستان میں سرحد پار سے آکر افرا تفری کا ماحول پیدا کیا،بم دھماکے کرائے، کئی جگہوں کا جائزہ لیا اور کئی لوگوں کو اپنے مشن میں شریک کیا، لیکن ظاہری طو رہم پھر بھی خوش ہیں کہ ہندوستان کی تحقیقاتی ایجنسیاں کسی نہ کسی شکل میں اس شخص سے پوچھ گچھ کرنے میںکامیاب ہوسکتی ہےں۔ تو کیا وہ حکومت جو ہیڈلی کی سپردگی کا مطالبہ کررہی تھی، اب ہیڈلی کی کم سزا پر خاموشی اختیار کرلینے میں ہی اپنی بہتری سمجھتی ہے۔ہمیں اس شرمندگی کو نہیںبھولنا چاہیے جب ہمارے ملک کی تحقیقاتی ایجنسی پہلی مرتبہ ڈیوڈ ہیڈلی سے پوچھ گچھ کرنے کے لیے امریکہ گئی تھی تو اسے بغیرپوچھ گچھ کئے ہی واپس لوٹا دیا گیا تھا،جبکہ اجمل عامر قصاب سے پوچھ گچھ کے لیے ہندوستان نے ایف بی آئی کو پوری طرح چھوٹ دی تھی اور ایف بی آئی نے 9گھنٹے سے زیادہ قصاب سے پوچھ گچھ بھی کی تھی۔6/11کے حملے میں 6امریکی باشندوں کی جان جانے سے ایف بی آئی نے خود بخود یہ سمجھ لیا تھا کہ اسے پوچھ گچھ کرنے کا پورا اختیارحاصل ہے،جبکہ اسی طرح کے حملے میں 100سے زائد ہندوستانیوں کی جان جاتی ہے، جس کی وجہ سے ہندوستان کو ہمیشہ کے لیے ایک گہرا زخم لگا، اس معاملے میں ہمیں پوچھ گچھ کی اجازت نہیں دی جاتی ہے، بلکہ یہ کہا جاتا ہے کہ سب بھول جائے اور اسی میںخوش رہیے کہ ویڈیو کانفرنسنگ کے ذریعہ ہیڈلی سے پوچھ گچھ کا موقع مل سکتا ہے۔O اس عجیب دو رخے پن کی دو وجوہات ہوسکتی ہیں، فریب یا راز داری۔پچھلے کچھ مہینوں سے ہیڈلی کے پر اسرار ماضی کے بارے میں سوالات اٹھائے جارہے ہیں۔ ایک تو اس کی مختلف قسم کی آنکھیں یعنی ایک بھوری اور ایک نیلی Schizo Phreniaمیں ڈوبی ہوئی زندگی کی علامت ہوسکتی ہےں۔دوسرے ہمیں یہ پتہ ہے کہ اس کی دو بیویاں ہیں او رایک ماں ہے۔ ماں ایک Bar چلاتی ہے او رباپ جو پاکستانی سفیر ہے جس نے اسے شدت پسند ی کی طرف راغب کیا۔ ہیڈلی کو مشرق اور مغرب دونوں کی معلومات ہونے کی وجہ سے وہ امریکی ڈرگ انفورسمنٹ ایڈ منسٹریشن کے لیے مخبری کا کام کرنے لگا۔ اب یہ انکشاف ہوا ہے کہ 1998میں ڈرگ اسمگلنگ کے ایک معاملے میں گرفتار ہونے پروہ اپنی0سال کی سزا کو دو سال میں تبدیل کرنے کے عوض میں مخبری کرنے کے لیے راضی ہوا تھا۔ اب کہانی یہاں پر ایک نیا موڑ لیتی ہے۔ لیکن ایسا تو نہیں کہ ہیڈلی پاکستان میں منشیات کے راستے امریکی مخبرکی حیثیت سے لشکر طیبہ میں شامل ہوگیاہو؟ یایہ کہ کسی وجہ سے امریکہ کو فریب دے کر اس نے اس کے لیے کام کرنا بند تو نہیں کردیا تھا؟ اگر ایسا ہے تو کیا یہ 26/11سے پہلے ہوا؟ ایک آدمی کس طرح سے امریکہ میں اور امریکہ سے باہر یہاں تک دنیا بھر میں اتنی آسانی سے آتا جاتا رہا؟ یہاں ایک خاص بات یہ ہے کہ ہیڈلی اگر 26/11سے ایک مہینے قبل FBIکی تحقیقات کے دائرے میں تھا تو یہ اطلاع ہندوستان کو کیوں نہیں دی گئی ۔ یہاں تک کہ وہ ممبئی حملے کے پانچ ماہ بعد اپریل009میں ہندوستان آنے میںکیسے کامیاب رہا۔حالانکہ یہ تمام سوالات جاسوسی ناول پڑھنے والوں کے تصوراتی سوالات کہہ کر مسترد کردیئے گئے ہیں، لیکن اگر ہم سبھی غلط تھے تو کیا کوئی ہمیں یہ بتائے گا کہ اس کی متبادل کہانی کیا ہوسکتی ہے۔؟امریکہ نے ہندوستانی ایجنسی کو 26/11کے اہم کردار سے پوچھ گچھ کرنے سے یوں ہی منع نہیں کیا، بلکہ اس نے ہیڈلی کی جان بھی بچائی ہے۔اب یہ دوسرا موقع ہے جب ہیڈلی نے حراست کے دوران کوئی سمجھوتہ کیا ہے۔ کیا یہ کسی کو شبہ میں ڈالنے کے لیے کافی نہیں ہے؟ ممبئی کے فلم اداکار اور ’’جم‘‘ کے مالک راہل بھٹ جن کی کئی مہینوں تک ہیڈلی سے دوستی رہی، ان کا کہنا ہے کہ وہ ہیڈلی کو ہمیشہ ’’ایجنٹ ہیڈلی‘‘ کہہ کر پکارتے تھے کیونکہ ’’وہ پُراسرار طریقے سے آتا تھا اور بات چیت بھی خفیہ طریقے سے کرتا تھا‘‘ اسے اپنے ٹارگیٹ کا علم تھا۔‘‘حکومت ان باتوں کو مسترد کرسکتی ہے، لیکن حقیقت یہ ہے کہ بھٹ کو ہیڈلی کے جیل میں بند ہونے کی اطلاع امریکی حکام کی جانب سے ہندوستان کو بتانے سے پہلے ہی تھی۔ وزارت داخلہ کے مطابق ہیڈلی کے متعلق امریکہ کا انکار ہیڈلی کے ایجنٹ ہونے کی وجہ سے نہیں ہے،لیکن ہندوستان کے اہم مطلوبہ دہشت گرد کے ساتھ امریکی رویہ کی وجہ سے اس پر تجسس کے معاملے کی وضاحت کیسے کی جاسکتی ہے؟امریکہ کے ڈرگ انفورسمنٹ ایڈمنسٹریشن کے مخبر کے طور پر اگر ہیڈلی کا ماضی نہ دیکھا جائے تو بھی اس معاملے کو امریکہ کی جانب سے ہینڈل کیا جانا بھی عجیب لگتا ہے۔ ڈنمارک کے صحافیوں کے حوالے سے یہ خبر آئی ہے کہ ڈنمارک کے کا رٹونسٹ کے خلاف انتقامی کارروائی کے بارے میں ہیڈلی سے ڈنمارک کے تفتیش کاروں نے پہلے ہی پوچھ گچھ کرلی ہے، تو ایسے حالات میں ہندوستان کو اتنے لمبے عرصے سے کیوں پوچھ گچھ کی اجازت نہیں دی جارہی ہے؟ اس معاملے کو کوئی امریکہ مخالف ذہنیت کی وجہ سے نہیں اٹھارہا ہے بلکہ سچائی یہ ہے کہ اب یہ جاننے کی بے چینی بڑھ رہی ہے کہ امریکہ دہشت گردی مخالف جنگ میں ہندوستان کا سنجیدہ ساتھی ہے کہ نہیں! یا ہمیں یہ جنگ اکیلے ہی لڑنی ہوگی۔ اوباما انتظامیہ جس طرح افغانستان اور پاکستان کے متعلق پالیسی بنارہا ہے، اس سے پہلے ہی یہ لگ رہا ہے کہ اسے ہندوستان کی فکر نہیں ہے۔ ہیڈلی کا تجسس جس طرح برقرار ہے اس سے کبھی بھی صبر کا پیمانہ لبریز ہوسکتا ہے ۔ ایسے میں امید کی جاسکتی ہے کہ ایک وسیع تناظر میں ہندوستانی حکومت کو اپنی ناراضگی ظاہر کرنے میں کوئی ہچکچاہٹ نہیںہونی چاہیے۔ بہر حال ہیڈلی سے پوچھ گچھ کے لیے اسے ہندوستان کو سونپا جائے گا یا نہیں، اس پر ابھی غیر یقینی صورت حال برقرار ہے۔ دیکھنا یہ بھی ہوگا کہ کیا یہ سچ مچ کی تفتیش ہوگی یا محض امریکہ کی منشا کے مطابق ہوگی؟ ابھی تک تو حکومت کسی نتیجے پر نہیں پہنچی ہے جس کی وجہ سے کئی اور پریشان کن سوالات پیدا ہوتے ہیں۔ اگر ایک0سالہ ماسٹر مائنڈ کو زندگی جینے کا حق مل جاتا ہے تو کیا 21سالہ قصاب جو ہیڈلی کے منصوبے کامحض ایک پیدل سپاہی ہے ، اسے ممکنہ موت کا سامنا کرنا چاہیے؟ برکھادت (گروپ ایڈیٹر،DTV)
Monday, March 22, 2010
امریکہ نہیں چاہتا سچ سامنے آئےـکیوں؟
عزیز برنی…………………………………قسط 104
سابق ایڈیشنل سکریٹری، حکومت ہند، نئی دہلی (موجودہ) ڈائریکٹر انسٹی ٹیوٹ فار ٹراپیکل اسٹڈیز، چنئی جناب بی رمن کا 26نومبر 2008کو ممبئی کے راستے ہندوستان پر ہوئے دہشت گر دانہ حملے سے متعلق مضمون اس وقت آپ کے زیر نظر ہے ۔کل یعنی اتوار کے روز ’’ہندوستان ٹائمز‘‘ کے ادارتی صفحہ پر ویر سانگھوی کا مضمون ’’امریکہ کیا چھپانا چاہتا ہے ‘‘ اور اس سے ایک روز قبل ’این ڈی ٹی وی‘ کی گروپ ایڈیٹر ’’برکھا دت‘‘ کا مضمون میری نظر سے گزرا ۔سبھی کا موضوع ایک ہی تھااور مجھے بہت اچھا لگا کہ اب ہمارا قومی میڈیا بھی بہت سنجیدگی کے ساتھ اسی سمت میں سوچ رہا ہے، جس پر ہم روز اول سے بات کر رہے تھے ۔ یہ مضامین ہمارے قارئین کی نظر سے بھی گزرنے چاہئےں، وہ اس لئے کہ 26/11پر اس دہشت گردانہ حملے کے فورا ً بعد سے اب تک جو روزنامہ راشٹریہ سہارا میں میرے اس متواتر کالم کے تحت یا دیگر مضامین اور خبروں کی شکل میں شائع ہوا، اس کو ذہن میں رکھتے ہوئے جب ان سب کا مطالعہ کریں گے تو بخوبی اندازہ کیا جا سکے گا کہ اس دہشت گردانہ حملے میں محرک کے طور پر ہم جس طرف اشارہ کر رہے تھے، اب وہ حقیقت منظر عام پہ آنے لگی ہے اور کچھ اس طرح کہ اب اسے چھپایا بھی نہیں جا سکتا،لیکن کیا بس بات اتنی سی ہے یا ابھی بہت کچھ پوشیدہ ہے؟ جہاں تک ہماری نظر ہے ،6نومبر008کو ہوئے اس دہشت گردانہ حملے کی حیثیت تو ہانڈی کے ایک چاول سے زیادہ کچھ بھی نہیں ہے۔اگر اس کی گہرائی میں جا کر دیکھیں گے تو اندازہ ہوگا کہ یہ سازش کتنی گہری ہے۔ بہرحال ملاحظہ فرمائیں آج بی رمن نے جو لکھا، اس کے بعد برکھا دت اور ویر سانگھوی کے تاثرات ۔پھر اس کے بعد ہمارے مضامین کا سلسلہ بدستور جاری رہے گا۔
ہےڈلی اور 26/11:ہند وستان کے ساتھ امرےکہ کا گندا کھےل
اکتوبر009 ،جب سے ڈےوڈ کولےمن ہےڈلی کا کےس سامنے آیا ہے،مےں بارہا اپنے مضامےن اور ٹی وی انٹروےوز مےں ان باتوں کو بتا رہا ہوں۔
ہےڈلی اےک ساتھ کئی لو گوں کا اےجنٹ تھا، جن مےںامرےکہ کی ڈرگ انفورسمنٹ اےڈمنسٹریشن(ڈی ای اے)،فےڈرل بےورو آف انوےسٹی گےشن (اےف بی آئی)،دی سنٹرل انٹلیجنس اےجنسی(سی آئی اے) اور لشکر طےبہ(اےل ای ٹی) شامل ہےں۔
اےف بی آئی نے ہےڈلی کے لئے اےک اپےل دائر کی ہے، جس کی بنےا د پر ہےڈلی کے خلا ف کو ئی بھی ثبو ت عدالت مےں پےش نہےں کےا جا سکتا،جس سے ہےڈلی کا امر ےکہ کی خفےہ اےجنسےوں کے ساتھ ساز باز ہونے کا پر دہ فا ش ہوسکتا ہے۔
اےف بی آئی اس کو ہندوستان کے حوالے نہےں کر ے گا اور نہ ہی ہند وستانی اےجنسےوں کی اس تک رسائی ہونے دے گا ےا پو چھ گچھ کر نے کی اجا زت دے گا،صرف اس لئے ہند وستانی اےجنسےوں کو روکا جا ئے گا، تاکہ اےک طرف امرےکہ کے ساتھ اس کے تعلقات کا راز سامنے نہ آنے پا ئے اور دوسری طرف پاکستانی انٹلیجنس کے ساتھ اس کے تعلقات کی بات بھی سامنے نہ آنے پائے۔
-2مےرے دو مضمون،جو مےں نے اس مو ضوع پر 12 دسمبراور6دسمبر 2009 کولکھے تھے، ان کے اقتبا سات ےہاں پر شامل ہےں۔مےں گزشتہ پا نچ مہےنوں سے جو لکھ رہاہو ں ےا پو چھ رہا ہوں، وہ سب درست ثابت ہو رہا ہے۔ذرائع ابلا غ نے 8ما رچ010 کی صبح کو بتا ےاکہ ہےڈلی اپنے جرم کا اعتراف کر ے گا، جو کہ اےف بی ائی نے اپنی درخواست اپےل کے عمل مےں داخل کی تھی۔اس کا کےا مطلب ہے؟پہلی بات وہ ےہ کہ جو اس کے خلا ف ثبو ت ہے، اس کا کو ئی رسمی تعارف اور نہ ہی کس طرح کی جرح کی جائے گی۔دوسری با ت وہ ےہ کہ 26/11 حملہ مےں مارے گئے 166 معصوم لوگوں کے لو احقےن کو عدالت اس بات کی اجا زت نہےں دے گی کہ ان کا وکےل ان سے 26/11 کے دہشت گردانہ حملوں کے بارے میں سوالات پو چھے۔تےسری با ت وہ ےہ کہ امرےکہ کی انٹلیجنس کے ساتھ ان کے رابطے اور تعلقات کو راز مےں ہی رکھا جا ئے گا۔چو تھی بات وہ ےہ کہ پا کستان کے دو شہری، 313 بر ےگےڈ کا الےا س کشمےری، جس نے ہندوستان مےں ہو نے والے اس سال اسپورٹس مےلہ پر حملہ کی دھمکی دی تھی او ر پا کستانی فو ج کا رےٹائرڈمےجر عبدالرحمن ہا شمی سعےد عرف پا شا جو پا کستان مےں رہ رہے ہےں، جن کو اےف بی آئی کے کےس، جو ہےڈلی کے خلا ف ہےں مےں ملو ث ٹھہرا ےا ہے۔ان دونوںپر ہےڈلی کا دفتر سنبھالنے کا جرم ہے اور ےہ دونوں استغاثہ کی کا رروائی سے بچ نکلےں گے۔
-3جب تک کو ئی اس بات سے اوپر اُٹھ کر نہےں سو چے گا، تب تک اصل بات تک نہےں پہنچا جا سکے گا۔ ےہ بات شروع سے ہی صاف تھی کہ اوباما انتظامےہ اور اس کی اےف بی آئی نے سخت کوشش کی ہے کہ ہےڈلی کے با رے مےں سچ سامنے آنے سے روکا جا سکے۔مےں نے 12دسمبر 2009کو لکھا تھا کہ وہائٹ ہاؤس اور اےف بی آئی کے سےنئر حکام تحقےقات اور استغاثہ مےں غےر معمو لی اور گہری دلچسپی لے رہے تھے۔اےف بی آئی کے نا ظم نے خود اس بات کو بتا ےا تھا، ہےڈلی کو عدالت مےں پےش کر نے سے قبل اس نے شکاگو کا دورہ کےا تھا۔ ہند وستان مےں کئی لو گو ں نے اس بات کا تجزےہ کےا کہ ےہ صدر اوبا ما کی دہشت گر د مخالف مہم اور ہندوستان کے ساتھ تعاون کا اشارہ ہے۔اس بات کی مزےدوضاحت ےہ ہے کہ وہائٹ ہاؤس اور اےف بی آئی مےں اس بات پر ےہ سوچا جارہا ہے کہ اگر استغاثہ کو صحیح ڈھنگ سے رخ نہےں دےا گےاتو کےس کا نتےجہ بم شےل جےسا ہو گا اور اگر ےہ بات اُبھر کر سامنے آئے گی کہ 26/11 کی سازش رچنے والا امرےکی اےجنسی کااےجنٹ تھا۔ےہ معاملہ ان امرےکےوں،اسرائیلےوں اور دوسرے غےر ملکی جو مارے گئے امرےکی حکو مت کے خلا ف مقدمہ اور بھا ری نقصانا ت کی شکل مےں سامنے آئے گا۔
-4لہٰذاہےڈلی کو بچا ےا جا ئے گا۔اےف بی آئی کو بچا ےا جا ئے گا۔امرےکی حکو مت کو بچا ےا جا ئے گا۔آئی اےس آئی کو بچا ےا جا ئے گا۔پا کستا نی حکو مت اور اس کی فو ج کو بچا ےا جا ئے گا۔
-5صرف ہم غرےب ہند وستانی بچ نہےں پا ئےں گے، کےو نکہ حکو مت ہند جس کی سر بر اہی ڈاکٹر منمو ہن سنگھ کر رہے ہےں ،ہمےں نہےں بچا پا ئے گی۔
6۔کےا سادگی ہے، جناب وزےر اعظم !کےا سادگی ہے!(8.3.2010)
Annexure-I
(مےر ے مضمو ن کے اقتبا سات جو 12دسمبر009 بعنوان ’’ ہےڈلی کے نارکو ٹکس کنڑول اےجنسی کے ساتھ رابطے کو اےف بی آئی نظر انداز کر رہی ہے‘‘کو لکھا تھا۔
(http://www.southasiaanalysis.org/papers36/paper3545.html)
امرےکہ کے کچھ مےڈےا حلقوں مےں اس بات کو کہا گےا کہ اصل بات ےہ ہے کہ 7 دسمبر کو عدالت مےں اےف بی آئی کی طرف سے اس کے خلاف پےش کر دہ رپور ٹ کو جر ائم انفارمےشن رپوٹ بتا ےا گےا نہ کہ ملو ث ہونے کی رپورٹ، جس سے اس بات کا اشارہ مل رہا ہے کہ اےف بی آئی نے پہلے ہی اس کے ساتھ ےہ طے کرلیا ہے کہ اس کے خلا ف کچھ الزامات اس وقت عائد کئے جا ئےں گے، جب اگلے مہےنے کےس کی سنوائی شر وع ہو جا ئے گی اور اےف بی آئی اس کے خلا ف دوسرے الزامات کے لئے دباؤ نہےں ڈالے گی۔ اس کے کچھ الزامات کا اعتراف اور اےف بی آئی کی طرف سے کچھ الزامات کو واپس لےنا اس اعتراض کو پہلے ہی دور کر دے گا اور اےک مفصل ٹرےل جو تفصےلی ثبوت کی ضرورت کو محسوس کر ے گی۔
ےہ دانستہ ےا غےر دانستہ طورپر اس کے ڈی ای اے کے لئے افغانستان اورپاکستان کے خطے مےں اس کے کام اور مشن کے انکشاف کو افشا ہو نے نہےں دے گا،جو قرےب سے ان کے پا کستانی ہم منصب کےلئے کا م کر تا رہا۔دونوں ہی کے کچھ مشتر کہ آپرےشنز ہےں۔
ےہ بھی ممکن ہے کہ امرےکہ، ہندوستانی تفتےش کا روں کو اس کی آزاد پو چھ گچھ کی اجا زت نہےں دے گااور اس کو سپر د کر نے کی بھی اجا زت نہےں دے گا۔اےسا اگر ہو گا تو شا ےد ہندوستانی حکام کو نہ صرف اس بات کی خبر ہو گی کہ اس کے رابطے پا کستانی اےجنسےوں کے ساتھ ہےں، بلکہ ڈی ای اے کے ساتھ رابطوں کا بھی انکشاف ہو گا۔
Annexure-II
(میرے مضمون کے اقتباسات جو6دسمبر009کو بعنوان ’’ہیڈلی چومکھی ایجنٹ‘‘ شائع ہوا)
(htpp//www.southasiaanalysis.org/papers36/paper3552.html)
مندر جہ ذےل اقتبا سات کا مطالعہ،جو اےف بی آئی نے جمع کئے بشمول اےف بی آئی کے دوسرے دستاوےزات کے،جو اےف بی آئی نے عدالت مےں جمع کئے اور امر ےکی ذرائع ابلاغ نے ہےڈلی کے ڈی ای اے کے ساتھ رابطوں کے بارے مےں لکھا،ان سے کو ئی بھی ےہ جا ئزہ لے سکتا ہے۔
-Aہےڈلی دوہرا اےجنٹ نہےں تھا،بلکہ کئی لو گوں کے لئے کام کر تا تھا۔998 کے آس پاس اس نے ڈی ای اے کے ساتھ کا م کر نا شر وع کےا۔اگر چہ کو ئی اس با ت کو محسوس کررہا ہے کہ ابتدا مےں سی آئی اے اور اےف بی آئی کے کا م کی کو ئی جا نکا ری نہےں تھی، حالانکہ انہےں 2004 مےں ہی اس کے بارے مےں جا نکاری ہو نی چا ہےے تھی، جب بش انتظا مےہ اےک عام چارٹر اور عام ڈاٹا بےس قومی مخالف دہشت گر د سےنٹر کی بنےا د ڈائرےکٹر نےشنل انٹلیجنس کے طور پر ڈالی گئی، جس کو حالےہ دنوں مےں وجود مےں لا ےا گےا تھا۔
Y-2 2005 کے آس پا س اس نے لشکر طےبہ کے ساتھ کا م کر نا شروع کےا۔ےہ بات صاف نہےں ہے کہ آےا اس نے خو د ہی اس کا فےصلہ کےا تھا ےا پھر اس نے اےف بی آئی ےا سی آئی اے ےا دونوں کے کہنے پر کام کر نا شر وع کےا تھا۔998سے وہ ڈی ای اے کے کہنے پر پہلے ہی پاکستان کا دورہ کر تا رہا ہے۔ 2006سے وہ انڈےا کا دورہ کر تا رہا۔ڈی ای اے اور ایف بی آئی اس کے دوروں کے متعلق خبر دار ہوتے، چو نکہ جب بھی کسی اےجنسی کاہو شےار اےجنٹ غےر ملکی دورے پر جا تا ہے، اس کے پا سپو رٹ کی چھان بےن اس کی واپسی پر کی جا تی ہے۔ےہ اےک حفا ظتی تدبےرہے، جس پر ساری سراغ رساں اےجنسےاںعمل کر تی ہےں۔
-cاس نے 2008کے آخر مےں الےاس کشمےر ی کی 313 بر یگےڈکے ساتھ کا م کر نا شر وع کےااور اسی سلسلے مےں اس نے کو پن ہےگن جا نے کے لئے اپنی رضا مند ی ظاہر کی، تا کہ وہ وہاں سے ممکنہ دہشت گر دانہ حملہ کی جا نکا ری حا حل کر سکے۔ےہ سب کچھ شاےد اےف بی آئی کی منشا پر نہےں کےا گےا۔اےف بی آئی کو اس کی جا نکا ری حادثاتی طور پر تب ملی، جب وہ اےک فو جی اسکول جو حسن ابدل مےں واقع ہے کے پرانے طلبا کے چاٹ روم کا معائنہ کر رہے تھے۔اےف بی آئی نے عدالت کے حکم پر ہےڈلی کو الےکٹرانک جانچ پر رکھا تھا۔
-Dالےکڑانک جا نچ کے دوران ہےڈلی کی شما لی ےا کو پن ہےگن ےا مکی ہا ؤس پر وجےکٹ مےں اس کے ملوث ہونے کی جا نچ ہو ئی۔ےہ کا م اس نے 313بر ےگیڈ کے لئے کےا تھا۔اسی جا نچ کے دوران جو لا ئی اور اگست 2009 مےں اےف بی آئی کو سلسلہ وار-mails درےافت ہو ئیں، جن سے ےہ جا نکا ری ملی کہ ہےڈلی نے لشکر کو 26/11 دہشت گر دانہ حملو ں کی تےا ری مےں معا ونت کی تھی۔ان E-mailsسے ہی یہ جانکاری بھی ملی کہ ہےڈلی نے لشکر کو ہندوستان مےںاےک اور حملہ کر انے کے لئے اپنی منظوری دی تھی۔اس اثنا مےں اس کو ہند وستان کا دورہ کر نا تھا۔اےف بی آئی نے ہےڈلی اور رانا کی ملا قاتوں اور تبادلۂ خےا ل پر نظر رکھی تھی۔انہوں نے ہےڈلی اور رانا کی 7ستمبر009 مےں اےک کار مےں ہوئی گفتگو رےکا رڈ کی تھی، جس سے ان دونوں کے 26/11 کے دہشت گر دانہ حملوں مےں ملو ث ہو نے کے پختہ ثبوت ملے۔
E۔ہےڈلی اور پا کستان مےں اس کے آقا، جن کی با ت چےت جولائیـ اگست مےں اےف بی آئی نے رےکارڈ کی، اس سے اس بات کے اشارے ملے کہ ہےڈلی اکتوبر مےں ہندوستان کا دورہ کر نے کی تےا ری کر رہا تھا، تاکہ وہ وہاں مز ےد حملے کے لئے راستہ ہمو ار کر سکے۔اےف بی آئی کے پا س دو راستے تھے۔ پہلا ےہ کہ ہےڈلی کو ہند وستان جا نے کی اجا زت دی جا ئے، مگرہند وستانی خفےہ اےجنسےوں کو آگا ہ کےا جائے، تا کہ وہ اس پر نظر رکھ سکے۔ےا اس سے ہندوستان اور پا کستان جا نے سے پہلے ہی گر فتار کےا جاسکے۔اگر ا س کو ہندوستان جا نے کی اجا زت دی گئی ہو تی اور ہند وستان کی خفےہ اےجنسےاں اس پر نظر رکھتےںاور گر فتا ر کر تےں تو ہےڈلی کے امر ےکی اےجنسےوں کے ساتھ ما ضی کے رابطوں اور 26/11 کے حملوں مےں اس کے ملو ث ہو نے کا انکشاف ہند وستانی اےجنسےوں کے سامنے ہو تا۔جو لا ئی 2009 سے پہلے اےف بی آئی کو ہےڈلی کے 26/11 حملوں مےں ملو ث ہو نے کی جا نکا ری تھی، اس کا اب تک کوئی ثبوت نہےں ہے۔انہےں محض اس بات کی جا نکا ری تھی کہ ہےڈلی کے ہندـپا ک دورے ڈی ای اے کے کہنے پر کئے تھے۔اےف بی آئی نے ہےڈ لی کو اس وقت گر فتار کےا، جب وہ 3اکتو بر کو ہندـپاک کے لئے روانہ ہو رہا تھا۔
ہےڈلی اور 26/11:ہند وستان کے ساتھ امرےکہ کا گندا کھےل
اکتوبر009 ،جب سے ڈےوڈ کولےمن ہےڈلی کا کےس سامنے آیا ہے،مےں بارہا اپنے مضامےن اور ٹی وی انٹروےوز مےں ان باتوں کو بتا رہا ہوں۔
ہےڈلی اےک ساتھ کئی لو گوں کا اےجنٹ تھا، جن مےںامرےکہ کی ڈرگ انفورسمنٹ اےڈمنسٹریشن(ڈی ای اے)،فےڈرل بےورو آف انوےسٹی گےشن (اےف بی آئی)،دی سنٹرل انٹلیجنس اےجنسی(سی آئی اے) اور لشکر طےبہ(اےل ای ٹی) شامل ہےں۔
اےف بی آئی نے ہےڈلی کے لئے اےک اپےل دائر کی ہے، جس کی بنےا د پر ہےڈلی کے خلا ف کو ئی بھی ثبو ت عدالت مےں پےش نہےں کےا جا سکتا،جس سے ہےڈلی کا امر ےکہ کی خفےہ اےجنسےوں کے ساتھ ساز باز ہونے کا پر دہ فا ش ہوسکتا ہے۔
اےف بی آئی اس کو ہندوستان کے حوالے نہےں کر ے گا اور نہ ہی ہند وستانی اےجنسےوں کی اس تک رسائی ہونے دے گا ےا پو چھ گچھ کر نے کی اجا زت دے گا،صرف اس لئے ہند وستانی اےجنسےوں کو روکا جا ئے گا، تاکہ اےک طرف امرےکہ کے ساتھ اس کے تعلقات کا راز سامنے نہ آنے پا ئے اور دوسری طرف پاکستانی انٹلیجنس کے ساتھ اس کے تعلقات کی بات بھی سامنے نہ آنے پائے۔
-2مےرے دو مضمون،جو مےں نے اس مو ضوع پر 12 دسمبراور6دسمبر 2009 کولکھے تھے، ان کے اقتبا سات ےہاں پر شامل ہےں۔مےں گزشتہ پا نچ مہےنوں سے جو لکھ رہاہو ں ےا پو چھ رہا ہوں، وہ سب درست ثابت ہو رہا ہے۔ذرائع ابلا غ نے 8ما رچ010 کی صبح کو بتا ےاکہ ہےڈلی اپنے جرم کا اعتراف کر ے گا، جو کہ اےف بی ائی نے اپنی درخواست اپےل کے عمل مےں داخل کی تھی۔اس کا کےا مطلب ہے؟پہلی بات وہ ےہ کہ جو اس کے خلا ف ثبو ت ہے، اس کا کو ئی رسمی تعارف اور نہ ہی کس طرح کی جرح کی جائے گی۔دوسری با ت وہ ےہ کہ 26/11 حملہ مےں مارے گئے 166 معصوم لوگوں کے لو احقےن کو عدالت اس بات کی اجا زت نہےں دے گی کہ ان کا وکےل ان سے 26/11 کے دہشت گردانہ حملوں کے بارے میں سوالات پو چھے۔تےسری با ت وہ ےہ کہ امرےکہ کی انٹلیجنس کے ساتھ ان کے رابطے اور تعلقات کو راز مےں ہی رکھا جا ئے گا۔چو تھی بات وہ ےہ کہ پا کستان کے دو شہری، 313 بر ےگےڈ کا الےا س کشمےری، جس نے ہندوستان مےں ہو نے والے اس سال اسپورٹس مےلہ پر حملہ کی دھمکی دی تھی او ر پا کستانی فو ج کا رےٹائرڈمےجر عبدالرحمن ہا شمی سعےد عرف پا شا جو پا کستان مےں رہ رہے ہےں، جن کو اےف بی آئی کے کےس، جو ہےڈلی کے خلا ف ہےں مےں ملو ث ٹھہرا ےا ہے۔ان دونوںپر ہےڈلی کا دفتر سنبھالنے کا جرم ہے اور ےہ دونوں استغاثہ کی کا رروائی سے بچ نکلےں گے۔
-3جب تک کو ئی اس بات سے اوپر اُٹھ کر نہےں سو چے گا، تب تک اصل بات تک نہےں پہنچا جا سکے گا۔ ےہ بات شروع سے ہی صاف تھی کہ اوباما انتظامےہ اور اس کی اےف بی آئی نے سخت کوشش کی ہے کہ ہےڈلی کے با رے مےں سچ سامنے آنے سے روکا جا سکے۔مےں نے 12دسمبر 2009کو لکھا تھا کہ وہائٹ ہاؤس اور اےف بی آئی کے سےنئر حکام تحقےقات اور استغاثہ مےں غےر معمو لی اور گہری دلچسپی لے رہے تھے۔اےف بی آئی کے نا ظم نے خود اس بات کو بتا ےا تھا، ہےڈلی کو عدالت مےں پےش کر نے سے قبل اس نے شکاگو کا دورہ کےا تھا۔ ہند وستان مےں کئی لو گو ں نے اس بات کا تجزےہ کےا کہ ےہ صدر اوبا ما کی دہشت گر د مخالف مہم اور ہندوستان کے ساتھ تعاون کا اشارہ ہے۔اس بات کی مزےدوضاحت ےہ ہے کہ وہائٹ ہاؤس اور اےف بی آئی مےں اس بات پر ےہ سوچا جارہا ہے کہ اگر استغاثہ کو صحیح ڈھنگ سے رخ نہےں دےا گےاتو کےس کا نتےجہ بم شےل جےسا ہو گا اور اگر ےہ بات اُبھر کر سامنے آئے گی کہ 26/11 کی سازش رچنے والا امرےکی اےجنسی کااےجنٹ تھا۔ےہ معاملہ ان امرےکےوں،اسرائیلےوں اور دوسرے غےر ملکی جو مارے گئے امرےکی حکو مت کے خلا ف مقدمہ اور بھا ری نقصانا ت کی شکل مےں سامنے آئے گا۔
-4لہٰذاہےڈلی کو بچا ےا جا ئے گا۔اےف بی آئی کو بچا ےا جا ئے گا۔امرےکی حکو مت کو بچا ےا جا ئے گا۔آئی اےس آئی کو بچا ےا جا ئے گا۔پا کستا نی حکو مت اور اس کی فو ج کو بچا ےا جا ئے گا۔
-5صرف ہم غرےب ہند وستانی بچ نہےں پا ئےں گے، کےو نکہ حکو مت ہند جس کی سر بر اہی ڈاکٹر منمو ہن سنگھ کر رہے ہےں ،ہمےں نہےں بچا پا ئے گی۔
6۔کےا سادگی ہے، جناب وزےر اعظم !کےا سادگی ہے!(8.3.2010)
Annexure-I
(مےر ے مضمو ن کے اقتبا سات جو 12دسمبر009 بعنوان ’’ ہےڈلی کے نارکو ٹکس کنڑول اےجنسی کے ساتھ رابطے کو اےف بی آئی نظر انداز کر رہی ہے‘‘کو لکھا تھا۔
(http://www.southasiaanalysis.org/papers36/paper3545.html)
امرےکہ کے کچھ مےڈےا حلقوں مےں اس بات کو کہا گےا کہ اصل بات ےہ ہے کہ 7 دسمبر کو عدالت مےں اےف بی آئی کی طرف سے اس کے خلاف پےش کر دہ رپور ٹ کو جر ائم انفارمےشن رپوٹ بتا ےا گےا نہ کہ ملو ث ہونے کی رپورٹ، جس سے اس بات کا اشارہ مل رہا ہے کہ اےف بی آئی نے پہلے ہی اس کے ساتھ ےہ طے کرلیا ہے کہ اس کے خلا ف کچھ الزامات اس وقت عائد کئے جا ئےں گے، جب اگلے مہےنے کےس کی سنوائی شر وع ہو جا ئے گی اور اےف بی آئی اس کے خلا ف دوسرے الزامات کے لئے دباؤ نہےں ڈالے گی۔ اس کے کچھ الزامات کا اعتراف اور اےف بی آئی کی طرف سے کچھ الزامات کو واپس لےنا اس اعتراض کو پہلے ہی دور کر دے گا اور اےک مفصل ٹرےل جو تفصےلی ثبوت کی ضرورت کو محسوس کر ے گی۔
ےہ دانستہ ےا غےر دانستہ طورپر اس کے ڈی ای اے کے لئے افغانستان اورپاکستان کے خطے مےں اس کے کام اور مشن کے انکشاف کو افشا ہو نے نہےں دے گا،جو قرےب سے ان کے پا کستانی ہم منصب کےلئے کا م کر تا رہا۔دونوں ہی کے کچھ مشتر کہ آپرےشنز ہےں۔
ےہ بھی ممکن ہے کہ امرےکہ، ہندوستانی تفتےش کا روں کو اس کی آزاد پو چھ گچھ کی اجا زت نہےں دے گااور اس کو سپر د کر نے کی بھی اجا زت نہےں دے گا۔اےسا اگر ہو گا تو شا ےد ہندوستانی حکام کو نہ صرف اس بات کی خبر ہو گی کہ اس کے رابطے پا کستانی اےجنسےوں کے ساتھ ہےں، بلکہ ڈی ای اے کے ساتھ رابطوں کا بھی انکشاف ہو گا۔
Annexure-II
(میرے مضمون کے اقتباسات جو6دسمبر009کو بعنوان ’’ہیڈلی چومکھی ایجنٹ‘‘ شائع ہوا)
(htpp//www.southasiaanalysis.org/papers36/paper3552.html)
مندر جہ ذےل اقتبا سات کا مطالعہ،جو اےف بی آئی نے جمع کئے بشمول اےف بی آئی کے دوسرے دستاوےزات کے،جو اےف بی آئی نے عدالت مےں جمع کئے اور امر ےکی ذرائع ابلاغ نے ہےڈلی کے ڈی ای اے کے ساتھ رابطوں کے بارے مےں لکھا،ان سے کو ئی بھی ےہ جا ئزہ لے سکتا ہے۔
-Aہےڈلی دوہرا اےجنٹ نہےں تھا،بلکہ کئی لو گوں کے لئے کام کر تا تھا۔998 کے آس پاس اس نے ڈی ای اے کے ساتھ کا م کر نا شر وع کےا۔اگر چہ کو ئی اس با ت کو محسوس کررہا ہے کہ ابتدا مےں سی آئی اے اور اےف بی آئی کے کا م کی کو ئی جا نکا ری نہےں تھی، حالانکہ انہےں 2004 مےں ہی اس کے بارے مےں جا نکاری ہو نی چا ہےے تھی، جب بش انتظا مےہ اےک عام چارٹر اور عام ڈاٹا بےس قومی مخالف دہشت گر د سےنٹر کی بنےا د ڈائرےکٹر نےشنل انٹلیجنس کے طور پر ڈالی گئی، جس کو حالےہ دنوں مےں وجود مےں لا ےا گےا تھا۔
Y-2 2005 کے آس پا س اس نے لشکر طےبہ کے ساتھ کا م کر نا شروع کےا۔ےہ بات صاف نہےں ہے کہ آےا اس نے خو د ہی اس کا فےصلہ کےا تھا ےا پھر اس نے اےف بی آئی ےا سی آئی اے ےا دونوں کے کہنے پر کام کر نا شر وع کےا تھا۔998سے وہ ڈی ای اے کے کہنے پر پہلے ہی پاکستان کا دورہ کر تا رہا ہے۔ 2006سے وہ انڈےا کا دورہ کر تا رہا۔ڈی ای اے اور ایف بی آئی اس کے دوروں کے متعلق خبر دار ہوتے، چو نکہ جب بھی کسی اےجنسی کاہو شےار اےجنٹ غےر ملکی دورے پر جا تا ہے، اس کے پا سپو رٹ کی چھان بےن اس کی واپسی پر کی جا تی ہے۔ےہ اےک حفا ظتی تدبےرہے، جس پر ساری سراغ رساں اےجنسےاںعمل کر تی ہےں۔
-cاس نے 2008کے آخر مےں الےاس کشمےر ی کی 313 بر یگےڈکے ساتھ کا م کر نا شر وع کےااور اسی سلسلے مےں اس نے کو پن ہےگن جا نے کے لئے اپنی رضا مند ی ظاہر کی، تا کہ وہ وہاں سے ممکنہ دہشت گر دانہ حملہ کی جا نکا ری حا حل کر سکے۔ےہ سب کچھ شاےد اےف بی آئی کی منشا پر نہےں کےا گےا۔اےف بی آئی کو اس کی جا نکا ری حادثاتی طور پر تب ملی، جب وہ اےک فو جی اسکول جو حسن ابدل مےں واقع ہے کے پرانے طلبا کے چاٹ روم کا معائنہ کر رہے تھے۔اےف بی آئی نے عدالت کے حکم پر ہےڈلی کو الےکٹرانک جانچ پر رکھا تھا۔
-Dالےکڑانک جا نچ کے دوران ہےڈلی کی شما لی ےا کو پن ہےگن ےا مکی ہا ؤس پر وجےکٹ مےں اس کے ملوث ہونے کی جا نچ ہو ئی۔ےہ کا م اس نے 313بر ےگیڈ کے لئے کےا تھا۔اسی جا نچ کے دوران جو لا ئی اور اگست 2009 مےں اےف بی آئی کو سلسلہ وار-mails درےافت ہو ئیں، جن سے ےہ جا نکا ری ملی کہ ہےڈلی نے لشکر کو 26/11 دہشت گر دانہ حملو ں کی تےا ری مےں معا ونت کی تھی۔ان E-mailsسے ہی یہ جانکاری بھی ملی کہ ہےڈلی نے لشکر کو ہندوستان مےںاےک اور حملہ کر انے کے لئے اپنی منظوری دی تھی۔اس اثنا مےں اس کو ہند وستان کا دورہ کر نا تھا۔اےف بی آئی نے ہےڈلی اور رانا کی ملا قاتوں اور تبادلۂ خےا ل پر نظر رکھی تھی۔انہوں نے ہےڈلی اور رانا کی 7ستمبر009 مےں اےک کار مےں ہوئی گفتگو رےکا رڈ کی تھی، جس سے ان دونوں کے 26/11 کے دہشت گر دانہ حملوں مےں ملو ث ہو نے کے پختہ ثبوت ملے۔
E۔ہےڈلی اور پا کستان مےں اس کے آقا، جن کی با ت چےت جولائیـ اگست مےں اےف بی آئی نے رےکارڈ کی، اس سے اس بات کے اشارے ملے کہ ہےڈلی اکتوبر مےں ہندوستان کا دورہ کر نے کی تےا ری کر رہا تھا، تاکہ وہ وہاں مز ےد حملے کے لئے راستہ ہمو ار کر سکے۔اےف بی آئی کے پا س دو راستے تھے۔ پہلا ےہ کہ ہےڈلی کو ہند وستان جا نے کی اجا زت دی جا ئے، مگرہند وستانی خفےہ اےجنسےوں کو آگا ہ کےا جائے، تا کہ وہ اس پر نظر رکھ سکے۔ےا اس سے ہندوستان اور پا کستان جا نے سے پہلے ہی گر فتار کےا جاسکے۔اگر ا س کو ہندوستان جا نے کی اجا زت دی گئی ہو تی اور ہند وستان کی خفےہ اےجنسےاں اس پر نظر رکھتےںاور گر فتا ر کر تےں تو ہےڈلی کے امر ےکی اےجنسےوں کے ساتھ ما ضی کے رابطوں اور 26/11 کے حملوں مےں اس کے ملو ث ہو نے کا انکشاف ہند وستانی اےجنسےوں کے سامنے ہو تا۔جو لا ئی 2009 سے پہلے اےف بی آئی کو ہےڈلی کے 26/11 حملوں مےں ملو ث ہو نے کی جا نکا ری تھی، اس کا اب تک کوئی ثبوت نہےں ہے۔انہےں محض اس بات کی جا نکا ری تھی کہ ہےڈلی کے ہندـپا ک دورے ڈی ای اے کے کہنے پر کئے تھے۔اےف بی آئی نے ہےڈ لی کو اس وقت گر فتار کےا، جب وہ 3اکتو بر کو ہندـپاک کے لئے روانہ ہو رہا تھا۔
अमरीका नहीं चाहता सच सामने आए-क्यों?
अज़ीज़ बर्नी
पूर्व अतिरिक्त सचिव भारत सरकार नई दिल्ली (वर्तमान) डायरेक्टर इंस्टीट्यूट फार ट्रापिकल स्टडीज़ चैन्नई श्री बी रमन का 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई के रास्ते हिंदुस्तान पर हुए आतंकवादी हमले से सम्बन्धित लेख इस समय आपके सामने है। कल अर्थात रविवार के दिन ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के सम्पादकीय पृष्ठ पर वीर सांघवी का लेख ‘अमेरिका क्या छुपाना चाहता है’ और इसके एक दिन पूर्व ‘एन॰डी॰टी॰वी॰’ की ग्रुप एडिटर बरखा दत्त का लेख मेरी नज़र से गुज़रा। सब ही का शीर्षक एक ही था और मुझे बहुत अच्छा लगा कि अब हमारा राष्ट्रीय मीडिया भी बहुत गंभीरता के साथ इसी दिशा में सोच रहा है, जिस पर हम पहले दिन से बात कर रहे हैं। यह लेख हमारे पाठको की नज़र से भी गुज़रने चाहिएं। वह इसलिए कि 26/11 पर इस आतंकवादी हमले के फौरन बाद से अब तक जो रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा में मेरे इस लगातार काॅलम के तहत या दूसरे लेखों की शक्ल में प्रकाशित होते आ रहे हैं, इसको ध्यान में रखते हुए जब इन सब को पढ़ेंगे तो स्वयं ही अंदाज़ा किया जा सकेगा कि इस आतंकवादी हमले में मास्टर माइन्ड के तौर पर हम जिस ओर इशारा कर रहे थे अब वह हक़ीक़त स्पष्ट होने लगी है और कुछ इस तरह कि अब इसे छुपाया भी नहीं जा सकता। लेकिन क्या बात बस इतनी सी है या अभी बहुत कुछ छुपा हुआ है? जहां तक हमारी दृष्टि है 26/11/2008 को हुए इस आतंकवादी हमले की हैसियत तो हांडी के एक चावल से अधिक कुछ भी नहीं है। यदि इसकी गहराई में जाकर देखेंगे तो अंदाज़ा होगा कि यह साज़िश कितनी गहरी है। बहरहाल मुलाहिज़ा फरमाएं आज बी-रमन ने जो लिखा, इसके बाद बरखा दत और वीर सांघवी के विचार फिर इसके बाद हमारे लेखों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा।
हेडली और 26/11ः भारत के साथ अमेरिका का गंदा खेल
अक्तूबर 2009 जब से डेविड कोलमेन हेडली का केस सामने आ गया मैं बार बार अपने लेखों और टी॰वी इन्टरव्यूज़ में इन बातों को बता रहा हूं।
हेडली एक साथ कई लोगों का ऐजंेट था, जिनमें अमेरिका की ड्रग इन्फ़ोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डी॰ई॰ए) फेडरल ब्यूरो आॅफ इन्वेस्टिगेशन (एफ॰बी॰आई) सेंट्रल इंटेलिजेंस ऐजंसी (सी॰आई॰ए) और लशकर-ए-तैयबा (एल॰ई॰टी) शामिल हैं।
एफबीआई ने हेडली के लिए एक अपील दायर की है जिसके आधार पर हेडली के विरुद्ध कोई भी सुबूत अदालत में पेश नहीं किया जा सकता। जिससे हेडली के अमेरिका के ख़ुफिया ऐजेंसियों के साथ साज़बाज़ होने का पर्दा फ़ाश हो सकता है।
एफ॰बी॰आई॰ उसको भारत के हवाले नहीं करेगी और न ही भारतीय ऐजंसियों को उस तक पहुंचने देगी, और न पूछताछ करने की इजाज़त देगी। केवल इसलिए भारतीय ऐजंसियों को रोका जाएगा ताकि एक तरफ अमेरिका के साथ उसके संबंधों का राज़ सामने न आ पाए और दूसरी तरफ़ पाकिस्तानी इंटेलीजेंस के साथ उसके सम्पर्कों की बात भी सामने न आने पाए।
2. मेरे दो लेख जो मैंने इस विषय पर 12 दिसम्बर और 16 दिसम्बर 2009 को लिखे थे उनके अंश यहां पर शामिल हैं। मैं पिछले पांच महीनों से जो लिख रहा हूं या पूछ रहा हूं वह सब ठीक साबित हो रहा है। मीडिया ने 9 मार्च 2010 की सुबह को बताया कि हेडली अपना अपराध स्वीकार करेगा। एफ॰बी॰आई॰ ने इस मामले में अपनी दरख़ास्त दी थी, इसका क्या मतलब है? पहली बात जो है वह यह कि उसके विरुद्ध जो सुबूत हैं उनका कोई औपचारिक परिचय है और न ही उससे किसी तरह की जिरह की जाएगी। दूसरी बात यह कि 26/11 हमले में मारे गए 166 निर्दोष लोगों के परिवार वालों को अदालत इस बात की अनुमति नहीं देगी कि उनका वकील उनसे 26/11 के आतंकवादी हमलों से संबंधित प्रश्न पूछे। तीसरी बात यह कि अमेरिका की इंटेलिजेंस के साथ उसके सम्पर्क और संबंधों को राज़ में ही रखा जाएगा। चैथी बात यह कि पाकिस्तान के दो नागरिक, 313 ब्रिगेड का इलियास कशमीरी, जिसने भारत में होने वाले इस वर्ष के खेल मेले पर हमलों की धमकी दी थी और पाकिस्तानी फौज का रिटायर्ड मेजर अब्दुर्रेहमान हाशमी सईद उर्फ पाशा जो पाकिस्तान में रह रहा है जिनको एफ॰बी॰आई॰ के केस में जो हेडली के ख़िलाफ हैं, में शामिल ठहराया गया है। उन दोनों पर हेडली का कार्यालय संभालने का आरोप है और यह दोनों अभियोजन की कार्यवाही से बच निकलेंगे।
3. जब तक कोई इस बात से ऊपर उठ कर नहीं सोचेगा तब तक असल बात तक नहीं पहुंचा जा सकेगा। यह बात शुरू से ही साफ थी कि ओबामा प्रशासन और एफबीआई ने सख़्त प्रयास किया है कि हेडली के बारे में सच को सामने आने से रोका जा सके। मैंने 12 दिसम्बर 2009 को लिखा था कि व्हाइट हाउस और एफबीआई के वरिष्ठ अधिकारी जांच और अभियोजन में असाधारण व गहरी दिलचस्पी ले रहे थे। एफबीआई के अधिकारी ने स्वयं इस बात को बताया था कि हेडली को अदालत में पेश करने से पूर्व उसने शिकागो का दौरा किया था। भारत में कई लोगों ने इस बात का विश्लेषण किया कि यह राष्ट्रपति ओबामा की आतंकवाद विरोधी मुहिम और भारत के साथ सहयोग का संकेत है। इस बात का और स्पष्टीकरण यह है कि व्हाइट हाउस और एफ॰बी॰आई॰ में इस बात पर यह सोचा जा रहा है कि अगर अभियोजन को सही दिशा नहीं दी गई तो केस का नतीजा बमशैल जैसा होगा और अगर यह बात उभर कर सामने आएगी कि 26/11 की साज़िश रचने वाला अमेरिका का ऐजेंट था तो यह मामला उन अमरीकियों, इस्राईलियों और दूसरे विदेशी जो मारे गए अमेरिकी सरकार के विरुद्ध मुक़दमा और भारतीय हानि के रूप में सामने आएगा।
4. लिहाज़ा हेडली को बचाया जाएगा, एफबीआई को बचाया जाएगा, अमेरिकी सरकार को बचाया जाएगा, आईएसआई को बचाया जाएगा, पाकिस्तानी सरकार और उसकी फौज को बचाया जाएगा।
5. केवल हम ग़्ारीब भारतीय बच नहीं पाएंगे क्योंकि भारत सरकार जिसका नेतृत्व डा॰ मनमोहन सिंह कर रहे हैं हमें नहीं बचा पाएगी।
6. क्या सादगी है आदर्णीय प्रधानमंत्री की क्या सादगी है! (18/3/2010)
Annexure-I
मेरे लेख के अंश जो 12 दिसम्बर 2009 को ‘हेडली के नारकोटिक कंट्रोल ऐजंसी के साथ संबंध को एफबीआई अनदेखा कर रही है’ शीर्षक अंतर्गत लिखा गया था।
(http://www.southasiaanalysis.org/papers36/paper3545.html)अमेरिका के कुछ मीडिया हल्क़ों में इस बात को कहा गया कि मूल बात यह है कि 7 दिसम्बर को अदालत में एफबीआई ने उसके विरुद्ध पेश की गई रिपोर्ट को क्राइम इन्फोर्मेशन रिपोर्ट बताया न कि शामिल होने की रिपोर्ट, जिससे इस बात का संकेत मिल रहा है कि एफबीआई ने पहले ही उसके साथ यह तय किया कि उसके विरुद्ध कुछ आरोप उस समय लगाए जाएंगे जब अगले महीने केस की सुनवाई शुरू हो जाएगी। और एफबीआई उसके विरुद्ध अन्य आरोपों के लिए दबाव नहीं डालेगी। उसके कुछ आरोपों की स्वीकारोक्ति और एफबीआई की तरफ से कुछ आरोपों को वापस लेना इस आपत्ति को पहले ही दूर कर देगा और एक विस्तृत मुक़दमा जो विस्तृत सुबूत की आवश्यकता महसूस करेगा। यह जानबूझ कर या अनजाने में उसके डी॰ई॰ए॰ के लिए अफग़ानिस्तान और पाकिस्तान के क्षेत्र में उसके काम और उसके मिशन को सामने नहीं आने देगा। जो क़रीब से उनके पाकिस्तानी समकक्ष के लिए काम करता रहा है। दोनों ही के कुछ मिले जुले आपशंस हैं।
यह भी संभव है कि अमेरिका भारतीय जांच कर्ता कंपनियों को उससे पूछताछ की अनुमति नहीं देगा और उसको सुपुर्द करने की भी अनुमति नहीं देगा। अगर ऐसा होगा तो भारतीय अधिकारियों को न केवल इस बात की ख़बर होगी कि उसके सम्पर्क पाकिस्तानी ऐजंसियों के साथ हैं बल्कि डी॰ई॰ए॰ के साथ सम्पर्कों का भी पता चलेगा।
Annexure-II(मेरे लेख के अंश जो 16 दिसम्बर 2009 को ‘हेडली चैमुखी ऐजंेट’ के शीर्षक से प्रकाशित हुआ।)
(htpp//www.southasiaanalysis.org/papers36/paper3552.html)
निम्नलिखित अंशों का अध्ययन, जो एफबीआई ने जमा किए, एफबीआई के अन्य दस्तावेज़ों सहित जो एफबीआई ने अदालत में जमा किए और अमेरिकी मीडिया ने हेडली के डी॰ई॰ए के साथ सम्पर्कोंं के बारे में लिखा उनसे कोई भी यह जायज़ा ले सकता है। A हेडली दोहरा ऐजेंट नहीं था बल्कि कई लोगों के लिए काम करता था। 1998 के आसपास उसने डी॰ई॰ए के साथ काम करना शुरू किया। हालांकि कोई इस बात को महसूस कर रहा है कि आरंभ में सीआईए और एफ॰बी॰आई को उसके काम की कोई जानकारी नहीं थी। हालांकि उन्हें 2004 मंे ही उसके बारे में जानकारी होनी चाहिए थी। जब बुश प्रशासन ने एक आम चार्टर और आम डाटा बेस राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केन्द्र की नींव डाएरेक्टर नेशनल इंटेलिजेंस, जिसको हालिया दिनों में अस्तित्व में लाया गया था।
Y- 2005 के आसपास उसने लशकर-ए-तैयबा के साथ काम करना शुरू किया। यह बात साफ नहीं है कि उसने स्वयं ही इसका निर्णय किया था या फिर एफबीआई या सीआईए दोनों के निर्णय पर काम करना शुरू किया था। 1998 से वह डी॰ई॰ए के कहने पर पहले ही पाकिस्तान का दौरा करता रहा है। 2006 से वह भारत के दौरे पर था। डी॰ई॰ए॰ और एफ॰बी॰आई उसके दौरों के बारे में जानते थे, क्योंकि जब भी किसी एजेंसी का होशियार ऐजेंट विदेशी दौरे पर जाता है तो उसके पासपोर्ट की छानबीन उसकी वापसी पर की जाती है। यह एक सुरक्षात्क तरीक़ा है जिस पर सारी गुप्तचर ऐजंसियां अमल करती हैं।
mails 2008 के अंत में इलियास कशमीरी की 313 ब्रिगेड के साथ काम करना शुरू किया और इसी सिलसिले में उसने कोपनहेगन जाने के लिए अपनी रज़ामंदी दी ताकि वहां से संभावित आतंकवादी हमले की जानकारी प्राप्त कर सके। यह सब कुछ संभवतः एफबीआई की इच्छा पर नहीं किया गया। एफबीआई को इसकी जानकारी दुर्घटनावश तब मिली जब वह एक फौजी स्कूल जो हसन अब्दाल में स्थित है के पुराने छात्रों के चेट रूम का मुआयना कर रहे थे। एफबीआई ने अदालत के आदेश पर हेडली को इलेक्ट्रानिक जांच पर रखा था।
क्ण् इलैक्ट्रानिक जांच के दौरान हेडली की उत्तरी या कोपनहेगन या मिकी हाऊस प्रोजेक्ट में उसके शामिल होने की जांच हुई। यह काम उसने 313 ब्रिगेड के लिए किया था। इसी जांच के बीच में जुलाई और अगस्त 2009 में एफबीआई को सिलसिले वार ई-मेल्स का पता चला जिनसे यह जानकारी मिली कि हेडली ने लशकर को 26/11 के आतंवादी हमलों की तैयारी में सहयोग दिया था। इन ई-मेलों से ही यह जानकारी भी मिली कि हेडली ने लश्कर को भारत में एक और हमला करने के लिए अपनी स्वीकृति दी थी। इसी बीच उसको भारत का दौरा करना था। एफबीआई ने हेडली और राना की मुलाक़ातों और विचारों के आदान प्रदान पर निगाह रखी थी उन्होंने हेडली और राना की 7 सितम्बर 2009 में एक कार में हुई बातचीत रिकाॅर्ड की थी जिससे उन दोनों के 26/11 के आतंकवादी हमले में शामिल होने के पुख़्ता सुबूत मिले।
म्ण् हेडली और पाकिस्तान में उसके आक़ा, जिनकी बातचीत हुई। अगस्त में एफबीआई ने जो रिकाॅर्ड किया उससे इस बात के संकेत मिले कि हेडली अक्तूबर में भारत का दौरा करने की तैयारी कर रहा था ताकि वह वहां और हमले के लिए राह हमवार कर सके। एफबीआई के पास दो रास्ते थे पहला यह कि हेडली को भारत जाने की अनुमति दी जाए मगर भारतीय ख़ु़िफ़या एजंसियों को आगाह किया जाए ताकि वह उस पर नज़र रख सकें या उसे भारत और पाकिस्तान जाने से पहले ही गिरफ़्तार किया जा सके। अगर उसे भारत जाने की अनुमति दी गई और भारत की ख़ुफ़िया ऐजंसियां उस पर नज़र रखतीं और गिरफ़्तार करतीं तो हेडली के अमेरिकी ऐजंसियों के साथ पूर्व के सम्पर्कों और 26/11 के हमलों में उसके शामिल होने का ख़ुलासा भारतीय ऐजंसियों के सामने होता। जुलाई 2009 से पहले एफबीआई को हेडली के 26/11 के हमलों में शामिल होने की जानकारी थी। इसका अब तक कोई सबूत नहीं है उन्हें केवल इस बात की जानकारी थी कि हेडली ने भारत पाक दौरे डी॰ई॰ए॰ के कहने पर किए थे। एफबीआई ने हेडली को उस समय गिरफ़्तार किया जब वह 13 अक्तूबर को भारत-पाक के लिए रवाना हो रहा था।
हेडली और 26/11ः भारत के साथ अमेरिका का गंदा खेल
अक्तूबर 2009 जब से डेविड कोलमेन हेडली का केस सामने आ गया मैं बार बार अपने लेखों और टी॰वी इन्टरव्यूज़ में इन बातों को बता रहा हूं।
हेडली एक साथ कई लोगों का ऐजंेट था, जिनमें अमेरिका की ड्रग इन्फ़ोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डी॰ई॰ए) फेडरल ब्यूरो आॅफ इन्वेस्टिगेशन (एफ॰बी॰आई) सेंट्रल इंटेलिजेंस ऐजंसी (सी॰आई॰ए) और लशकर-ए-तैयबा (एल॰ई॰टी) शामिल हैं।
एफबीआई ने हेडली के लिए एक अपील दायर की है जिसके आधार पर हेडली के विरुद्ध कोई भी सुबूत अदालत में पेश नहीं किया जा सकता। जिससे हेडली के अमेरिका के ख़ुफिया ऐजेंसियों के साथ साज़बाज़ होने का पर्दा फ़ाश हो सकता है।
एफ॰बी॰आई॰ उसको भारत के हवाले नहीं करेगी और न ही भारतीय ऐजंसियों को उस तक पहुंचने देगी, और न पूछताछ करने की इजाज़त देगी। केवल इसलिए भारतीय ऐजंसियों को रोका जाएगा ताकि एक तरफ अमेरिका के साथ उसके संबंधों का राज़ सामने न आ पाए और दूसरी तरफ़ पाकिस्तानी इंटेलीजेंस के साथ उसके सम्पर्कों की बात भी सामने न आने पाए।
2. मेरे दो लेख जो मैंने इस विषय पर 12 दिसम्बर और 16 दिसम्बर 2009 को लिखे थे उनके अंश यहां पर शामिल हैं। मैं पिछले पांच महीनों से जो लिख रहा हूं या पूछ रहा हूं वह सब ठीक साबित हो रहा है। मीडिया ने 9 मार्च 2010 की सुबह को बताया कि हेडली अपना अपराध स्वीकार करेगा। एफ॰बी॰आई॰ ने इस मामले में अपनी दरख़ास्त दी थी, इसका क्या मतलब है? पहली बात जो है वह यह कि उसके विरुद्ध जो सुबूत हैं उनका कोई औपचारिक परिचय है और न ही उससे किसी तरह की जिरह की जाएगी। दूसरी बात यह कि 26/11 हमले में मारे गए 166 निर्दोष लोगों के परिवार वालों को अदालत इस बात की अनुमति नहीं देगी कि उनका वकील उनसे 26/11 के आतंकवादी हमलों से संबंधित प्रश्न पूछे। तीसरी बात यह कि अमेरिका की इंटेलिजेंस के साथ उसके सम्पर्क और संबंधों को राज़ में ही रखा जाएगा। चैथी बात यह कि पाकिस्तान के दो नागरिक, 313 ब्रिगेड का इलियास कशमीरी, जिसने भारत में होने वाले इस वर्ष के खेल मेले पर हमलों की धमकी दी थी और पाकिस्तानी फौज का रिटायर्ड मेजर अब्दुर्रेहमान हाशमी सईद उर्फ पाशा जो पाकिस्तान में रह रहा है जिनको एफ॰बी॰आई॰ के केस में जो हेडली के ख़िलाफ हैं, में शामिल ठहराया गया है। उन दोनों पर हेडली का कार्यालय संभालने का आरोप है और यह दोनों अभियोजन की कार्यवाही से बच निकलेंगे।
3. जब तक कोई इस बात से ऊपर उठ कर नहीं सोचेगा तब तक असल बात तक नहीं पहुंचा जा सकेगा। यह बात शुरू से ही साफ थी कि ओबामा प्रशासन और एफबीआई ने सख़्त प्रयास किया है कि हेडली के बारे में सच को सामने आने से रोका जा सके। मैंने 12 दिसम्बर 2009 को लिखा था कि व्हाइट हाउस और एफबीआई के वरिष्ठ अधिकारी जांच और अभियोजन में असाधारण व गहरी दिलचस्पी ले रहे थे। एफबीआई के अधिकारी ने स्वयं इस बात को बताया था कि हेडली को अदालत में पेश करने से पूर्व उसने शिकागो का दौरा किया था। भारत में कई लोगों ने इस बात का विश्लेषण किया कि यह राष्ट्रपति ओबामा की आतंकवाद विरोधी मुहिम और भारत के साथ सहयोग का संकेत है। इस बात का और स्पष्टीकरण यह है कि व्हाइट हाउस और एफ॰बी॰आई॰ में इस बात पर यह सोचा जा रहा है कि अगर अभियोजन को सही दिशा नहीं दी गई तो केस का नतीजा बमशैल जैसा होगा और अगर यह बात उभर कर सामने आएगी कि 26/11 की साज़िश रचने वाला अमेरिका का ऐजेंट था तो यह मामला उन अमरीकियों, इस्राईलियों और दूसरे विदेशी जो मारे गए अमेरिकी सरकार के विरुद्ध मुक़दमा और भारतीय हानि के रूप में सामने आएगा।
4. लिहाज़ा हेडली को बचाया जाएगा, एफबीआई को बचाया जाएगा, अमेरिकी सरकार को बचाया जाएगा, आईएसआई को बचाया जाएगा, पाकिस्तानी सरकार और उसकी फौज को बचाया जाएगा।
5. केवल हम ग़्ारीब भारतीय बच नहीं पाएंगे क्योंकि भारत सरकार जिसका नेतृत्व डा॰ मनमोहन सिंह कर रहे हैं हमें नहीं बचा पाएगी।
6. क्या सादगी है आदर्णीय प्रधानमंत्री की क्या सादगी है! (18/3/2010)
Annexure-I
मेरे लेख के अंश जो 12 दिसम्बर 2009 को ‘हेडली के नारकोटिक कंट्रोल ऐजंसी के साथ संबंध को एफबीआई अनदेखा कर रही है’ शीर्षक अंतर्गत लिखा गया था।
(http://www.southasiaanalysis.org/papers36/paper3545.html)अमेरिका के कुछ मीडिया हल्क़ों में इस बात को कहा गया कि मूल बात यह है कि 7 दिसम्बर को अदालत में एफबीआई ने उसके विरुद्ध पेश की गई रिपोर्ट को क्राइम इन्फोर्मेशन रिपोर्ट बताया न कि शामिल होने की रिपोर्ट, जिससे इस बात का संकेत मिल रहा है कि एफबीआई ने पहले ही उसके साथ यह तय किया कि उसके विरुद्ध कुछ आरोप उस समय लगाए जाएंगे जब अगले महीने केस की सुनवाई शुरू हो जाएगी। और एफबीआई उसके विरुद्ध अन्य आरोपों के लिए दबाव नहीं डालेगी। उसके कुछ आरोपों की स्वीकारोक्ति और एफबीआई की तरफ से कुछ आरोपों को वापस लेना इस आपत्ति को पहले ही दूर कर देगा और एक विस्तृत मुक़दमा जो विस्तृत सुबूत की आवश्यकता महसूस करेगा। यह जानबूझ कर या अनजाने में उसके डी॰ई॰ए॰ के लिए अफग़ानिस्तान और पाकिस्तान के क्षेत्र में उसके काम और उसके मिशन को सामने नहीं आने देगा। जो क़रीब से उनके पाकिस्तानी समकक्ष के लिए काम करता रहा है। दोनों ही के कुछ मिले जुले आपशंस हैं।
यह भी संभव है कि अमेरिका भारतीय जांच कर्ता कंपनियों को उससे पूछताछ की अनुमति नहीं देगा और उसको सुपुर्द करने की भी अनुमति नहीं देगा। अगर ऐसा होगा तो भारतीय अधिकारियों को न केवल इस बात की ख़बर होगी कि उसके सम्पर्क पाकिस्तानी ऐजंसियों के साथ हैं बल्कि डी॰ई॰ए॰ के साथ सम्पर्कों का भी पता चलेगा।
Annexure-II(मेरे लेख के अंश जो 16 दिसम्बर 2009 को ‘हेडली चैमुखी ऐजंेट’ के शीर्षक से प्रकाशित हुआ।)
(htpp//www.southasiaanalysis.org/papers36/paper3552.html)
निम्नलिखित अंशों का अध्ययन, जो एफबीआई ने जमा किए, एफबीआई के अन्य दस्तावेज़ों सहित जो एफबीआई ने अदालत में जमा किए और अमेरिकी मीडिया ने हेडली के डी॰ई॰ए के साथ सम्पर्कोंं के बारे में लिखा उनसे कोई भी यह जायज़ा ले सकता है। A हेडली दोहरा ऐजेंट नहीं था बल्कि कई लोगों के लिए काम करता था। 1998 के आसपास उसने डी॰ई॰ए के साथ काम करना शुरू किया। हालांकि कोई इस बात को महसूस कर रहा है कि आरंभ में सीआईए और एफ॰बी॰आई को उसके काम की कोई जानकारी नहीं थी। हालांकि उन्हें 2004 मंे ही उसके बारे में जानकारी होनी चाहिए थी। जब बुश प्रशासन ने एक आम चार्टर और आम डाटा बेस राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केन्द्र की नींव डाएरेक्टर नेशनल इंटेलिजेंस, जिसको हालिया दिनों में अस्तित्व में लाया गया था।
Y- 2005 के आसपास उसने लशकर-ए-तैयबा के साथ काम करना शुरू किया। यह बात साफ नहीं है कि उसने स्वयं ही इसका निर्णय किया था या फिर एफबीआई या सीआईए दोनों के निर्णय पर काम करना शुरू किया था। 1998 से वह डी॰ई॰ए के कहने पर पहले ही पाकिस्तान का दौरा करता रहा है। 2006 से वह भारत के दौरे पर था। डी॰ई॰ए॰ और एफ॰बी॰आई उसके दौरों के बारे में जानते थे, क्योंकि जब भी किसी एजेंसी का होशियार ऐजेंट विदेशी दौरे पर जाता है तो उसके पासपोर्ट की छानबीन उसकी वापसी पर की जाती है। यह एक सुरक्षात्क तरीक़ा है जिस पर सारी गुप्तचर ऐजंसियां अमल करती हैं।
mails 2008 के अंत में इलियास कशमीरी की 313 ब्रिगेड के साथ काम करना शुरू किया और इसी सिलसिले में उसने कोपनहेगन जाने के लिए अपनी रज़ामंदी दी ताकि वहां से संभावित आतंकवादी हमले की जानकारी प्राप्त कर सके। यह सब कुछ संभवतः एफबीआई की इच्छा पर नहीं किया गया। एफबीआई को इसकी जानकारी दुर्घटनावश तब मिली जब वह एक फौजी स्कूल जो हसन अब्दाल में स्थित है के पुराने छात्रों के चेट रूम का मुआयना कर रहे थे। एफबीआई ने अदालत के आदेश पर हेडली को इलेक्ट्रानिक जांच पर रखा था।
क्ण् इलैक्ट्रानिक जांच के दौरान हेडली की उत्तरी या कोपनहेगन या मिकी हाऊस प्रोजेक्ट में उसके शामिल होने की जांच हुई। यह काम उसने 313 ब्रिगेड के लिए किया था। इसी जांच के बीच में जुलाई और अगस्त 2009 में एफबीआई को सिलसिले वार ई-मेल्स का पता चला जिनसे यह जानकारी मिली कि हेडली ने लशकर को 26/11 के आतंवादी हमलों की तैयारी में सहयोग दिया था। इन ई-मेलों से ही यह जानकारी भी मिली कि हेडली ने लश्कर को भारत में एक और हमला करने के लिए अपनी स्वीकृति दी थी। इसी बीच उसको भारत का दौरा करना था। एफबीआई ने हेडली और राना की मुलाक़ातों और विचारों के आदान प्रदान पर निगाह रखी थी उन्होंने हेडली और राना की 7 सितम्बर 2009 में एक कार में हुई बातचीत रिकाॅर्ड की थी जिससे उन दोनों के 26/11 के आतंकवादी हमले में शामिल होने के पुख़्ता सुबूत मिले।
म्ण् हेडली और पाकिस्तान में उसके आक़ा, जिनकी बातचीत हुई। अगस्त में एफबीआई ने जो रिकाॅर्ड किया उससे इस बात के संकेत मिले कि हेडली अक्तूबर में भारत का दौरा करने की तैयारी कर रहा था ताकि वह वहां और हमले के लिए राह हमवार कर सके। एफबीआई के पास दो रास्ते थे पहला यह कि हेडली को भारत जाने की अनुमति दी जाए मगर भारतीय ख़ु़िफ़या एजंसियों को आगाह किया जाए ताकि वह उस पर नज़र रख सकें या उसे भारत और पाकिस्तान जाने से पहले ही गिरफ़्तार किया जा सके। अगर उसे भारत जाने की अनुमति दी गई और भारत की ख़ुफ़िया ऐजंसियां उस पर नज़र रखतीं और गिरफ़्तार करतीं तो हेडली के अमेरिकी ऐजंसियों के साथ पूर्व के सम्पर्कों और 26/11 के हमलों में उसके शामिल होने का ख़ुलासा भारतीय ऐजंसियों के सामने होता। जुलाई 2009 से पहले एफबीआई को हेडली के 26/11 के हमलों में शामिल होने की जानकारी थी। इसका अब तक कोई सबूत नहीं है उन्हें केवल इस बात की जानकारी थी कि हेडली ने भारत पाक दौरे डी॰ई॰ए॰ के कहने पर किए थे। एफबीआई ने हेडली को उस समय गिरफ़्तार किया जब वह 13 अक्तूबर को भारत-पाक के लिए रवाना हो रहा था।
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