जिस समय आप यह लेख पढ़ रहे होंगे, मैं विदेश यात्रा के लिए रवाना हो चुका हूंगा। आज 6 दिसम्बर है अर्थात् वह तिथि जिस दिन बाबरी मस्जिद शहीद की गई थी। मुझे उस दिन के लिए एक महत्वपूर्ण लेख लिखना था, परन्तु जब मैंने ‘‘आलमी सहारा’’ के ताज़ा प्रकाशन में प्रकाशित ‘‘गिरधर राठी साहब’’ का प्रस्तुत लेख ‘‘इस पाप की सज़ा क्या है?’’ पढ़ा, जोकि पहली बार 20 दिसम्बर 1992 को अर्थात् बाबरी मस्जिद घटना के केवल दो सप्ताह बाद प्रकाशित किया गया तो मुझे एहसास हुआ कि आजके दिन के लिए इससे बेहतर कोई दूसरा लेख हो ही नहीं सकता, इसलिए आपकी सेवा में प्रस्तुत है राठी साहब का यह एतिहासिक लेखः
हे राम!
क्या मैं गिरधर राठी अर्थात् एक भारतीय नागरिक किकर्तत्वय विमूढ़ हूं? चूंकि 6 दिसम्बर 1992 को भाजपा और उसके गिरोहों ने बाबरी मस्जिद और उसी में स्थित राम चबूतरा और सीता रसोई को नेस्तो नाबूद कर दिया है, इसलिए क्या एक बहुधर्मी, बहुभाषी, बहुजातीय समाज का, एक लोकतांत्रिक, धर्मनिर्पेक्ष, समाजवादी गणराज्य का नागरिक, मैं कुछ नहीं कर सकता? क्या मैं इसलिए स्तब्ध हूं कि संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाले राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उसकी सरकार, राज्य का मुख्यमंत्री, और उसकी सरकार, पुलिस प्रशासन, फौज और सर्वोच्चय न्यायालय के साथ-साथ तमाम न्यायालय इस असभ्य, असंस्कृत और असंवैधानिक हादसे को और रोज़ सैकड़ों की दर से निर्दोष नागरिकों की हत्या को आग ज़नी और लूट-पाट को, मूक, अबोध और अशक्त दर्शक बने देखते रहे और अब भी देख रहे हैं और कुछ नहीं कर पा रहे?
एक भारतीय नागरिक के रूप में क्या मुझे सिर्फ अपनी निजी जान व माल की अपनी नौकरी और ऐशो आराम की चिंता है, और यह चिंता नहीं है कि 85 करोड़ मनुष्यों को यह देश धू-धू कर जल रहा है और आज नहीं तो कल इसके न केवल पचास टुकड़े हो जाएंगे बल्कि उन टुकड़ों में भी आत्मसम्मान के साथ सांस लेना असंभव होगा? क्या अपनी मौत मैं सिर्फ कल तक के लिए टाल रहा हूं?
स्वतंत्र भारत में पले पुसे एक नागरिक के रूप में मुझे कोई असंमंजस, कोई किंकर्तव्य विमूढ़ता नज़र नहीं आती। मेरा कर्तव्य, मेरा दायित्व, मेरा धर्म बिल्कुल स्पष्ट है।
चूंकि यह पूरी प्रेत-लीला धर्म के नाम पर हो रही है इसलिए उसी से शुरू करूं।
हिन्दु समाज में पैदाइश और परवरिश के कारण मेरे दिमाग़ में राम और रावण की, दुर्गा और रक्तबीज की, धर्म और अधर्म की, पुण्य और पाप की छवियां, परिकल्पनाएं और दीक्षाएं साफ़-साफ़ उभर रही हैं। आज के हिन्दू धर्म की एक मात्र जीवित धारा वह है जो कबीर, रहीम, नानक, तुलसी, सूर और मीरा ने चलाई थी। वही धारा जो तमाम तरह के वैषणव, शाक्त, श्वैत और निर्गुण पंथों के अनुयायी आज मान रहे हैं। इस धारा की सबसे बड़ी सीख है- ‘वैष्णव जन तो तैणे कहिए जै पीर पराई जाणै रें’। नरसी मेहता की यही टेक तुलसी में है। ‘परिहत सरिस धर्म नहीं, भाई। भर पीड़ा सम नहीं अधमाई’।
इस धर्म धारा में सबके सब एक ही प्रभु की सन्तान हैं। दुश्मन कोई नहीं है अगर कोई त्याज्य है तो वह जो ‘पर पीड़ा’ में लगा हुआ हैः जैसे आडवाणी और उसके 10 मुंह, 20 हाथ, वे रक्तबीज जो सिर्फ अपने जैसे दानवों को, राक्षसों को जन्म दे रहे हैं। वह अधम और अधार्मिक गिरोह जो ख़ुद किसी ईशवर या देवता के भक्त नहीं हैं, अगर हैं तो एक दानवी राजनैतिक सत्ता के, जिनका कोई ईमान नहीं है सिवाए छल, फरेब, कपट और पाखंड के हिंसा और प्रति हिंसा के।
हिंदू धर्म की इस विराट जनधारा का ‘सेक्यूलरइज़्म’ से कभी कोई मत भेद नहीं रहा, न ही हो सकता है। यदि कोई नेता या दल सेक्यूलरवाद के नाम पर धोखा धड़ी करते रहे हैं, तब भी ‘सर्व धर्म संभाव’ का आदर्श अपनी जगह क़ायम है। इस लोकतांत्रिक सर्व धर्म संभावी, समाजवादी कहलाने वाले गणराज्य के संविधान में प्रतिष्ठित आदर्श को मानने वाले एक नागरिक के रूप में मुझ पर आडवाणी जैसों के इस कुतर्क का कोई असर नहीं होता कि सेक्यूलरवाद ग़लत है या कि छदम है। अगर वे ‘छदम’ है जो उसे छदम के स्तर से उठाकर एक सत्य बनाने का फर्ज़ मेरा भी है।
(मैं उस हंसी को सहने को तैयार हूं जो संविधान के ‘समाजवाद’ को लेकर की जाएगी। मख़ौल तो दरअसल गणराज्य का, लोकतंत्र का और सैक्युलरवाद का उड़या ही है इन गिरोहों ने।)
हिंदू धर्म की व्यापक धारा धर्म के उन 10 लक्षणों पर परिचालित है जो सत्य, असत्य, क्षमा, वरुणा जैसे शब्दों से व्यक्त होती है। मैं इन शब्दों में इनकी व्यावारिक्ता में उनकी अप्रहार्यरता में उसी तरह निष्ठा रखता हूं जिस तरह अपने शरीर की चमड़ी के होने और उस पर होने वाले प्रहारों से पैदा होने वाले दर्द में।
इस नाते मैं मानता हूं कि बाबरी मस्जिद का और उसी के साथ साथ राम चबूतरा और सीता रसोई का विध्वंश करके भाजपा और उसके गिरोहों ने धर्मद्ररोह किया है। न केवल इस्लाम धर्म का बल्कि ख़ुद हिंदू धर्म का जघन्य अपमान है यह ‘कार सेवा’।
अभी कुछ ही दिन पहले इन्हीं ‘कारसेवकों’ ने अयोध्या के वे परम पावन मंदिर तोड़े थे जिनके दर्शनों के लिए देश भर की साक्षर-निरक्षर जनता उमड़ी पड़ती थी।
ग़नीमत है- और यही हमारी ताक़त है?, मेरे धर्म की शक्ति है- कि कोई भी शंकर आचार्य, कोई भी महंत, कोई भी बाबा, कोई भी धार्मिक अदालत इस देश में इस हैसियत में नहीं है जो इन धर्मधवंसकों को इनके पाप का सर्वोच्य दण्ड देने का फतवा दे। मूर्तियूजक और मूर्तिपूजक, आस्तिक और नास्तिक-सब धर्म धुरींण हिंदू समाज में और लोकतांत्रिक घर्म निर्पेक्ष समाजवादी गणराज्य में रह सकते हैं। प्रायश्चित करें तो पापियों को भी सुधरने का अवसर है।
लेकिन क्या पाप का कोई दण्ड नहीं है? मेरी धार्मिक चेतना, मेरे संस्कार, मेरे इतिहास-पुराण मुझे सिखाते हैं कि पाप का दण्ड अवश्य मिलता है। इस लोक में नहीं तो प्रलोक में, इस जन्म में नहीं तो दूसरे जन्मों में। 10 मुंह से 10 तरह के झूठ कपट में लिप्त पापियों को दण्ड अवश्य मिलेगा।लेकिन मैं आज 20वीं सदी के अंतिम दशक में हूं और विज्ञान और दूसरी चिंताधाराओं के ज़रिए यह भी जानता हूं कि इस हिंदू धर्म में भाग्यवाद, नियतीवाद ही सब कुछ नहीं है। 4 पुरुषार्थ भी हैं और उन्हीं में धर्म एक है और उसी की रक्षा या प्राप्ति के लिए मुझे करम करना है। लेकिन अपनी नवीन शिक्षा-दीक्षा मुझे यह भी बताती है कि भाजपा यह सब क्यूं कर रही है।
मेरा धर्म जहां यह कहता है कि यह ‘कारसेवक’ और उनसे भी ज़्यादा उनके सूत्रधार पापी हैं वहीं मेरी नई शिक्षा कहती है कि राजनीतिक सत्ता के लोलुप यह कारिंदे दरअसल मनोरोगी हैं।
इनका मनोरोग यह है कि महात्मा गांधी की हत्या में इन्हीं के जैसे लोग शामिल थे। उस हत्या का रक्त इनके हाथों से धुला नहीं है- धुल नहीं सकता। दूसरे इनके पास अपना कोई गौरवमय इतिहास नहीं है। स्वतंत्रता के आंदोलन के समय यह अंग्रेज़ों के भक्त थे, स्वतंत्रय-आंदोलन के विरोधी, हिंदू समाज को कट्टर बनाने में तल्लीन। यह अपराधबोध उन्हें अपनी शूरवीरता, त्याग, बलिदान वगैरह के झूठे इतिहास की रचना के लिए बाध्य करता है। लेकिन भगत सिंह, शिवाजी और राणा प्रताप को, विवेकानंद, राम कृष्ण और अरविंद को पटेल और जयप्रकाश को यह अपने पूर्वज के रूप में लाख कोशिशों के बावजूद पचा नहीं पाए। यह सभी व्यक्तित्व या तो धार्मिक हिंदू थे या सेक्यूलर, इनकी रीति-नीति, राजनीति, कूटनीति, शिक्षा-दीक्षा और आदर्श एक ऐसे व्यापक समाज की परिकल्पना से संयुक्त थे जिसमें हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी और तमाम दूसरे पंथ एक ही व्यापक धर्म-समाज के अंग हैं। उनकी लड़ाइयां सम्प्रदायिक, कट्टर हिंदू वादी नहीं थी, अगर उनमें से कोई मुसलमान से लड़ा भी तो राज कारणों से, न कि साम्प्रदायिक कारणों से।
अपने नाम को रोशन करने के लिए एक आदर्श-पूर्व परम्परा गढ़ने की इस कोशिश में वह विफल रहे हैं। मुसलमान को हिंदू समाज का आद्य शत्रु बताने और बनाने, या उनके ख़िलाफ़ ख़ुद को सूरमा के रूप में स्थापित करने के लिए उनके मिथ मिथ्या साबित हुए हैं। इतिहास में कुछ आक्रमणों को छोड़ कर बाक़ी तमाम लड़ाइयां राज गद्दी की रही हैं, जिनमें अगर हिंदू-मुसलमान लड़े तो अपने अपने समुदायों से भी लड़े।
संघ परिवार जो अपनी पूर्वज परमपरा बनाना चाहता था, उसमें सभी ने वास्तव में दूसरे धर्मों का सम्मान किया है, किसी ने मस्जिदें बनवाकर दीं तो किसी ने मुसलमान कार्यकर्ता को सर्वोच्य पद दिया, किसी ने उन्हें सबसे बड़ा विशवासपात्र मान कर अपनाया। ताज़ा उदाहरण लें तो सोमनाथ मंदिर के सिलसिले में पटेल के पत्र राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के या भाजपा के तमाम प्रचारों को झूठ ज़ाहिर कर देते हैं। या फिर सुभाष चंद्र बोस के सिपह सालार कौन थे, ज़रा याद करें।
लिहाज़ा गांधी-हत्या का अपराध बोध और एक गौरवशाली पूर्वज परम्परा का अविष्कार करने की असमर्थता से खीज कर भाजपा और उसके गिरोह मुस्लिम-द्वेष, ईसाई-द्वेष, सिख द्वेष, बौद्ध-द्वेष पैदा करने की भ्रसक कोशिश में हैं।
उन्हें एक ‘शत्रु’ चाहिए जिसके ख़िलाफ वह अपने को सूरमा कह सकें।
मुमकिन है यह कुछ हज़ार या कुछ लाख धर्म द्वेषी लोग निहत्थे बच्चों, बूढ़ों, औरतों और गरीबों को तबाह कर ख़ुद को ‘सूरमा’ साबित भी कर दें लेकिन एक भारतीय नागरिक के रूप में और हिंदू समाज के एक घटक के रूप में मैं इस द्वेष रचना को अवैध, अस्वीकार्य और तिरस्कार्य मानता हूं।
अपनी तमाम आस्तिकता या नास्तिकता के बावजूद मैं जिस देश-समाज का हिस्सा हूं उसमें संविधान, क़ानून और मानवीय आचरण के सामान्य नियम लागू हैं। पंजाब, कशमीर, असम या दूसरे राज्यों में, दूसरे क्षेत्रों में उठने वाले आतंकवादी आंदोलनों के पास तो फिर भी काई जायज़ शिकायत, मांगें, मसले और परिप्रेक्ष हो सकते हैं लेकिन इन भाजपाई गिरोहों के पास तो कोई भी तर्क नहीं है। सिवाए इसके कि इनकी धक्काशाही हुकूमत को मैं मान लूं।
मेरी समझ से संविधान की शपथ लेकर उसके ख़िलाफ काम करने की वजह से आडवाणी सहित उनके तमाम गिरोहों के तमाम अग्रणीय लोग सज़ा के पात्र हैं। धर्मनिर्पेक्ष्ता का तिरस्कार, दूसरों की निजी धार्मिक-सामाजिक स्वतंत्रता का हनन, उसके ख़िलाफ़ जन-समूह को भड़काना, तोड़ फोड़ और हिंसा की तैयारी कराना और देश व्यापी दंगे कराना। इन कर्मों के ख़िलाफ भारतीय संविधान, ताज़ीराते हिंद और चुनाव संहिता में तमाम सारे क़ानून हैं जिनके तहत इन पर मुक़दमा चलना चाहिए।
दरअसल मुक़दमा चलना चाहिए राष्ट्रद्रोह का, क्योंकि राष्ट्र के ऐतिहासिक और संवैधानिक स्वरूप को तोड़ कर यह लोग एक बर्बर और हिंसक और जंगली समाज की रचना करना चाहते हैं। यह चाहते हैं कि दिल्ली समेत प्रदेश और देश की हर राजधानी में इनका राज हो। अपने आपमें यह कोई ग़लत महत्वकांक्षा नहीं है लेकिन इसे पाने के उनके तरीक़े और पाने के बाद देश की परिकल्पना जघन्य, अधार्मिक और असंवैधानिक है। विश्व बंधुत्व और विश्व कल्याण जिस देश का आदर्श हो उसके शासक संप्रदायक गिरोह के सरग़ना हों, लोकतंत्र के दुश्मन हों यह एक भारतीय नागरिक के रूप में मुझे मंजू़र नहीं। मैं समझता हूं कि मेरी तरह करोड़ों भारतीय नागरिक हैं।
गांव और शहरों में, देश और विदेश में जो भाजपाई ‘राष्ट्र’ को आत्मघात का कटघरा मानते हैं।सरकार और क़ानून क्या करेगा, इसका कोई इल्म मुझे नहीं है। एक नागरिक के रूप में मेरी चिंता यह है कि मैं क्या कर सकता हूं। और एक पत्रकार, लेखक या कवि के रूप में मैं क्या कर सकता हूं।
मैं समझता हूं कि सबसे पहले मैं उन तमाम लोगों का सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक बहिष्कार करना चाहूंगा जो अधर्म और पाप की इस प्रेत-लीला के करणधार हैं। पत्रकार के रूप में मैं चाहूं कि इनके कारोबार का पता मुझे रहे, लेकिन इन्हें मैं अपने समाज के नायक, शूरवीर, नेता या सम्मान्य नागरिक के रूप में पेश नहीं करना चाहूंगा। मसलन मैं भूतपूर्व मुख्यमंत्री को, कल्याण सिंह जी को ‘जी’ लगा कर सम्मानित करूंगा। मेरी नज़र में वह व्यक्ति प्रथम श्रेणी का अपराधी है।
6 दिसंबर से पहले, अक्टूबर में, मुझे याद है कि गांधी-हत्या का अपराध बोध उस व्यक्ति के मुंह से साफ़ ज़ाहिर हुआ था। मेरी नज़र में आडवाणी, सिंघल, जोशी, विजय राजय सिंधिया, रितंभरा, ऊमा भारती, डालमिया और कटियार जैसे तमाम लोग प्रथम श्रेणी के अपराधी हैं। उन पर क़ानून सम्मत मुक़दमे चलें यह ज़रूरी है। उनका राजनीतिक और सामाजिक बहिष्कार हो यह इससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।
समता, न्याय, स्वतंत्रता, विवेक, सहिष्णुता, परस्पर सम्मान जैसे मूल्य हर हालत में बचाने होंगे। अन्ततः पूरी राजनीति एक विनम्र मानववादी राजनीति बनानी होगी। मैं सिर्फ अपने लिए कह सकता हूं इसके लिए हर तरह की तैयारी मुझे करनी है।
Monday, December 7, 2009
Thursday, December 3, 2009
बाबरी मस्जिद, राम जन्म भूमि या राष्ट्रीय मीनार
‘‘मैं हज यात्रा से वापस लौट रहा हूं, अभी एयरपोर्ट से बाहर निकलने पर मेरे साथियों ने मुझे आपका लेख दिखाया, जिसका संबंध लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट से है। इस लेख में आपने जो सुझाव दिया है, मुझे लगता है कि वह ध्यान देने योग्य है, और इस सिलसिले में एक विस्तृत बातचीत की जानी चाहिए।’’
यह वाक्य देश के जिस प्रसिद्ध व्यक्ति के हैं वह एक मुस्लिम नेता ही नहीं सांसद भी हैं। इस समय उनका नाम इसलिए नहीं लिख रहा हूं क्योंकि मैंने उनसे अनुमति नहीं ली है और इस बीच जब मैंने आज के लेख की यह चंद पंक्तियां ही लिखी थीं कि, प्रसिद्ध पत्रकार श्री महफूज़ुर्रहमान का टेलीफोन प्राप्त हुआ जिसमें उन्होंने भी इसी लेख पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘‘देख लीजिए, रास्ता बहुत ख़तरनाक है जिस पर आपने क़दम रखा है, मगर इसके सिवा अब कोई रास्ता भी नज़र नहीं आता।’’ प्रतिक्रियाएं और भी मिलीं हैं, मगर इन दोनों उल्लेखनीय व्यक्तियों की प्रतिक्रियाओं का गहरा प्रभाव मैं आज के इस लेख पर महसूस करता हूं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसा कोई भी प्रस्ताव जो मस्जिद या मंदिर से हट कर हो आसानी से स्वीकार्य तो होगा नहीं, और जहां तक मस्जिद और मंदिर का सम्बंध है, तो जो मस्जिद देखना चाहते हैं वह मंदिर की बात सुनना नहीं चाहेंगे और जिनका इरादा है मंदिर बनाना, उन्हें मस्जिद का नाम बर्दाश्त नहीं होगा, उनमें से अगर आम हिन्दुओं और मुसलमानों का उल्लेख न करें, जिनका राजनीति या धर्म से ऐसा गहरा सम्बंध नहीं है कि उनकी धार्मिक या राजनीतिक पहचान ही उनके व्यक्तित्व पर हावी हो, तो शेष सबसे यह आशा की जा सकती है कि वह इस राय पर ध्यान दें। हालांकि अप्रिय होने पर इसे पूरी तरह रद्द किया जा सकता है, मगर फिर इसके सिवा होगा क्या, वही जो पिछले 50 वर्षों से होता रहा है अर्थात् मंदिर और मस्जिद के नाम पर राजनीति चलती रहेगी।
कभी किसी का पलड़ा भारी होगा तो कभी किसी का। इस राजनीति के हम्माम में सब एक जैसे हैं। कोई कम तो कोई अधिक, दूध का धुला तो कोई भी नहीं। और रहा प्रश्न धार्मिक व्यक्तियों का तो विश्वास कीजिए कि आज का यह लेख लिखने में मुझे जो हौसला मिला वह इसी धार्मिक व्यक्ति का वाक्य था जो हज से वापिस तशरीफ ला रहे थे और उन्होंने अविलम्ब इस संदर्भ में मेरे कल के लिखे गये लेख पर अपनी प्रतिक्रिया मुझ तक पहुंचाई और मैं भी इतना संतोष न कर सका कि विस्तृत बातचीत तक अपने लेख के क्रम को रोके रखता। यूँ भी इस श्रृंखला बद्ध लेख को क्योंकि हर रोज़ लिखना होता है और आज का विषय भी यही था, इसलिए अधिक प्रतीक्षा की गुंजाइश भी नहीं थी।
मेरे अध्ययन में बाबरी मस्जिद घटना के संबंध में बहुत कुछ है और अब थोड़ा-थोड़ा लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट पर निगाह डालना शुरू कर दिया है। जिन गंभीर और ज़िम्मेदार लोगों ने लिब्राहन कमीशन की इस रिपोर्ट को पढ़ा है, उनके विचार भी मेरे अध्ययन में हैं। कुछ ऐसी बातें भी हैं जो जस्टिस लिब्राहन तक भी बहुत संभव है कि न पहुंची हों। उदाहरणतः मेरे हाथ में उन मरने वालों की सूचि भी है जिन्हें 6 या 7 दिसम्बर को 1992 को बहुत निर्ममतापूर्वक क़त्ल कर दिया गया था। जिनमें 75 वर्षीय ताहिर हुसैन का नाम भी शामिल है जो अयोध्या में मोहल्ला शेख़ाना के रहने वाले थे और जिनको 7 दिसम्बर को क़त्ल किया गया मगर जिनकी लाश को दफ़न 11 दिन बाद 18 दिसम्बर को संभव हो पाया।
इस सूचि में 15 वर्षीय मासूम बच्चा मोहम्मद इज़हार भी है जो मोहल्ला रामकोट, प्रहलाद घाट अयोध्या का रहने वाला था, जिसे 6 दिसम्बर 1992 को क़त्ल किया गया और 8 दिसम्बर को दफ़न किया गया। सूचि के शेष नामों को विस्तार के साथ इस लेख में शामिल किया जा सकता है, मगर मैं सोचता हूं कि आज अगर एक सकारात्मक पहलू को विचार के लिए सामने रखा जा रहा है तो फिर कड़वी बातों का उल्लेख ही न करें। ख़ुदा करे कि ज़़ख़्मों को भूल कर हम अब उन मुहब्बत के रास्तों पर चल पड़ें ताकि प्रगति अब इस देश का भाग्य बन जाए, और साम्प्रदायिक सोहार्द इस देश की जनता का। अन्यथा दूसरा रास्ता जिस पर हम 1949 के बाद से ही चल रहे हैं, वह तो हमारे सामने है ही।
रास्ता वह भी ख़तरनाक था और यह भी ख़तरनाक है। हम इस खतरनाक रास्ते पर तो पिछले 60 वर्षों से चल ही रहे हैं जो या तो मस्जिद की तरफ जाता है या मंदिर की तरफ़, और हर बार हमारी ज़ख़्मी और रक्तरंजित क़ौम न मस्जिद की सीढ़ियों तक पहुंचती है और न मंदिर के दरवाज़े पर। हां, इस रास्ते पर चलने वाले राजनीतिक व्यक्ति सत्ता की मंज़िलें अवश्य तय कर लेते हैं, अब चाहे वह भगवा रंग में रंगे हों चाहे वह सब रंगों को साथ लेकर चलने का दावा करते हों, अर्थात् हर बार बाबरी मस्जिद या राम जन्म भूमि राजनीति का केंद्र ही बनी है, परन्तु कोई नतीजा बरामद न हुआ, बहस चलती रही, कभी संसद के अंदर, कभी सड़कों पर और कभी यह वाद विवाद तक सीमित रही और कभी तीर-व-तलवार हमारे जिस्मों को, हमारी रूहों को यहां तक कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य तक को ज़ख़्मी करते रहे।
क्या अब इन ज़ख़्मी दिलों को दवा नसीब हो सकती है? क्या हम किसी ऐसे विकल्प पर विचार कर सकते हैं जो हम सबको स्वीकार हो। सहर्ष न हो तो मजबूरी में ही सही।
हमारा वह राष्ट्रीय प्रतीक जो पूरी दुनिया में हमारी पहचान बन चुका है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद ही नहीं हम भारत की पहचान पूरी दुनिया के सामने जब भी रखना चाहते हैं तो यही एक पहचान हमारी आंखों के सामने होती है, जो हमारे हर सिक्के पर भी होती है, क्या ऐसी ही कोई पहचान, एक ‘‘राष्ट्रीय प्रतीक’’ के रूप में इस समस्या का समाधान बन सकती है। यूं भी मुग़ल काल के बाद हमने कोई ऐसी यादगार इमारत नहीं बनाई है जिसे हम दिल्ली की कुतुब मीनार और पेरिस के एफिल टाॅवर से भी बेहतर कह सकें।
क्या यह विचार जो इस लेख के साथ-साथ आपके सामने है, उन मासूम दिलों के सपनों को साकार कर सकता है जो असीम श्रृद्धा के बावजूद मंदिर के नाम से भी घबरा जाते हैं और मस्जिद के नाम से भी। यह 6 दिसंबर हर बार उनके दिलों पर एक दहशत बन कर आता है। क्या यह सरकार करेगी साहस? और बंद होगा यह नफ़रत का सिलसिला?
यह वाक्य देश के जिस प्रसिद्ध व्यक्ति के हैं वह एक मुस्लिम नेता ही नहीं सांसद भी हैं। इस समय उनका नाम इसलिए नहीं लिख रहा हूं क्योंकि मैंने उनसे अनुमति नहीं ली है और इस बीच जब मैंने आज के लेख की यह चंद पंक्तियां ही लिखी थीं कि, प्रसिद्ध पत्रकार श्री महफूज़ुर्रहमान का टेलीफोन प्राप्त हुआ जिसमें उन्होंने भी इसी लेख पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘‘देख लीजिए, रास्ता बहुत ख़तरनाक है जिस पर आपने क़दम रखा है, मगर इसके सिवा अब कोई रास्ता भी नज़र नहीं आता।’’ प्रतिक्रियाएं और भी मिलीं हैं, मगर इन दोनों उल्लेखनीय व्यक्तियों की प्रतिक्रियाओं का गहरा प्रभाव मैं आज के इस लेख पर महसूस करता हूं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसा कोई भी प्रस्ताव जो मस्जिद या मंदिर से हट कर हो आसानी से स्वीकार्य तो होगा नहीं, और जहां तक मस्जिद और मंदिर का सम्बंध है, तो जो मस्जिद देखना चाहते हैं वह मंदिर की बात सुनना नहीं चाहेंगे और जिनका इरादा है मंदिर बनाना, उन्हें मस्जिद का नाम बर्दाश्त नहीं होगा, उनमें से अगर आम हिन्दुओं और मुसलमानों का उल्लेख न करें, जिनका राजनीति या धर्म से ऐसा गहरा सम्बंध नहीं है कि उनकी धार्मिक या राजनीतिक पहचान ही उनके व्यक्तित्व पर हावी हो, तो शेष सबसे यह आशा की जा सकती है कि वह इस राय पर ध्यान दें। हालांकि अप्रिय होने पर इसे पूरी तरह रद्द किया जा सकता है, मगर फिर इसके सिवा होगा क्या, वही जो पिछले 50 वर्षों से होता रहा है अर्थात् मंदिर और मस्जिद के नाम पर राजनीति चलती रहेगी।
कभी किसी का पलड़ा भारी होगा तो कभी किसी का। इस राजनीति के हम्माम में सब एक जैसे हैं। कोई कम तो कोई अधिक, दूध का धुला तो कोई भी नहीं। और रहा प्रश्न धार्मिक व्यक्तियों का तो विश्वास कीजिए कि आज का यह लेख लिखने में मुझे जो हौसला मिला वह इसी धार्मिक व्यक्ति का वाक्य था जो हज से वापिस तशरीफ ला रहे थे और उन्होंने अविलम्ब इस संदर्भ में मेरे कल के लिखे गये लेख पर अपनी प्रतिक्रिया मुझ तक पहुंचाई और मैं भी इतना संतोष न कर सका कि विस्तृत बातचीत तक अपने लेख के क्रम को रोके रखता। यूँ भी इस श्रृंखला बद्ध लेख को क्योंकि हर रोज़ लिखना होता है और आज का विषय भी यही था, इसलिए अधिक प्रतीक्षा की गुंजाइश भी नहीं थी।
मेरे अध्ययन में बाबरी मस्जिद घटना के संबंध में बहुत कुछ है और अब थोड़ा-थोड़ा लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट पर निगाह डालना शुरू कर दिया है। जिन गंभीर और ज़िम्मेदार लोगों ने लिब्राहन कमीशन की इस रिपोर्ट को पढ़ा है, उनके विचार भी मेरे अध्ययन में हैं। कुछ ऐसी बातें भी हैं जो जस्टिस लिब्राहन तक भी बहुत संभव है कि न पहुंची हों। उदाहरणतः मेरे हाथ में उन मरने वालों की सूचि भी है जिन्हें 6 या 7 दिसम्बर को 1992 को बहुत निर्ममतापूर्वक क़त्ल कर दिया गया था। जिनमें 75 वर्षीय ताहिर हुसैन का नाम भी शामिल है जो अयोध्या में मोहल्ला शेख़ाना के रहने वाले थे और जिनको 7 दिसम्बर को क़त्ल किया गया मगर जिनकी लाश को दफ़न 11 दिन बाद 18 दिसम्बर को संभव हो पाया।
इस सूचि में 15 वर्षीय मासूम बच्चा मोहम्मद इज़हार भी है जो मोहल्ला रामकोट, प्रहलाद घाट अयोध्या का रहने वाला था, जिसे 6 दिसम्बर 1992 को क़त्ल किया गया और 8 दिसम्बर को दफ़न किया गया। सूचि के शेष नामों को विस्तार के साथ इस लेख में शामिल किया जा सकता है, मगर मैं सोचता हूं कि आज अगर एक सकारात्मक पहलू को विचार के लिए सामने रखा जा रहा है तो फिर कड़वी बातों का उल्लेख ही न करें। ख़ुदा करे कि ज़़ख़्मों को भूल कर हम अब उन मुहब्बत के रास्तों पर चल पड़ें ताकि प्रगति अब इस देश का भाग्य बन जाए, और साम्प्रदायिक सोहार्द इस देश की जनता का। अन्यथा दूसरा रास्ता जिस पर हम 1949 के बाद से ही चल रहे हैं, वह तो हमारे सामने है ही।
रास्ता वह भी ख़तरनाक था और यह भी ख़तरनाक है। हम इस खतरनाक रास्ते पर तो पिछले 60 वर्षों से चल ही रहे हैं जो या तो मस्जिद की तरफ जाता है या मंदिर की तरफ़, और हर बार हमारी ज़ख़्मी और रक्तरंजित क़ौम न मस्जिद की सीढ़ियों तक पहुंचती है और न मंदिर के दरवाज़े पर। हां, इस रास्ते पर चलने वाले राजनीतिक व्यक्ति सत्ता की मंज़िलें अवश्य तय कर लेते हैं, अब चाहे वह भगवा रंग में रंगे हों चाहे वह सब रंगों को साथ लेकर चलने का दावा करते हों, अर्थात् हर बार बाबरी मस्जिद या राम जन्म भूमि राजनीति का केंद्र ही बनी है, परन्तु कोई नतीजा बरामद न हुआ, बहस चलती रही, कभी संसद के अंदर, कभी सड़कों पर और कभी यह वाद विवाद तक सीमित रही और कभी तीर-व-तलवार हमारे जिस्मों को, हमारी रूहों को यहां तक कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य तक को ज़ख़्मी करते रहे।
क्या अब इन ज़ख़्मी दिलों को दवा नसीब हो सकती है? क्या हम किसी ऐसे विकल्प पर विचार कर सकते हैं जो हम सबको स्वीकार हो। सहर्ष न हो तो मजबूरी में ही सही।
हमारा वह राष्ट्रीय प्रतीक जो पूरी दुनिया में हमारी पहचान बन चुका है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद ही नहीं हम भारत की पहचान पूरी दुनिया के सामने जब भी रखना चाहते हैं तो यही एक पहचान हमारी आंखों के सामने होती है, जो हमारे हर सिक्के पर भी होती है, क्या ऐसी ही कोई पहचान, एक ‘‘राष्ट्रीय प्रतीक’’ के रूप में इस समस्या का समाधान बन सकती है। यूं भी मुग़ल काल के बाद हमने कोई ऐसी यादगार इमारत नहीं बनाई है जिसे हम दिल्ली की कुतुब मीनार और पेरिस के एफिल टाॅवर से भी बेहतर कह सकें।
क्या यह विचार जो इस लेख के साथ-साथ आपके सामने है, उन मासूम दिलों के सपनों को साकार कर सकता है जो असीम श्रृद्धा के बावजूद मंदिर के नाम से भी घबरा जाते हैं और मस्जिद के नाम से भी। यह 6 दिसंबर हर बार उनके दिलों पर एक दहशत बन कर आता है। क्या यह सरकार करेगी साहस? और बंद होगा यह नफ़रत का सिलसिला?
लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट के बाद.................?
लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट पेश की जा चुकी है। संसद के अंदर और बाहर हंगामा जारी है। मैंने अभी यह रिपोर्ट पढ़ी नहीं है और पढ़ने में कोई विशेष रुचि भी नहीं है, मगर पढ़ना आवश्यक है और केवल पढ़ना ही नहीं, इस रिपोर्ट का ध्यानपूर्वक अध्ययन भी आवश्यक है, लेकिन 900 पृष्ठों से अधिक पृष्ठों पर आधारित इस रिपोर्ट को पढ़ने में बड़ा समय लगेगा। और मैं समय नष्ट किए बिना भारत सरकार और देश की जनता (हिन्दू और मुसलमानों सहित) सादर निवेदन करना चाहता हूं कि क्या हमें बेहद गंभीरता के साथ वर्तमान स्थिति पर नज़र नहीं रखनी चाहिए। ज़मीनी सच्चाई क्या है?
क्या हम नहीं जानते, क्या हमें यह आशा नज़र आती है कि लिब्राहन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में जिन्हें बाबरी मस्जिद की शहादत का ज़िम्मेदार ठहराया है, उन्हें सज़ाएं दी जा सकती हैं? उन्हें गिरफ़्तार करके जेल भेजा जा सकता है? नहीं, अधिक से अधिक उन पर मुक़दमे चलाए जा सकते हैं, जो वर्षों तक चलते रहेंगे और उनकी राजनीति भी चलती रहेगी, अदालत में उनकी हर पेशी पर समाचार पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर समाचार प्रकाशित किए जाते रहेंगेे, रेडियो और टीवी पर वह छाए रहेंगे, उनके समर्थन में जगह जगह धरने और प्रदर्शन होंगे, इन सबकी तैयारियां अभी से की जा रही होंगी, अतः इस रिपोर्ट के पेश किए जाने के बाद भी क्या होगा?
कम से कम मुझे तो बिल्कुल भी यह आशा नहीं है कि बाबरी मस्जिद की शहादत के 17 साल बाद भी वास्तव में किसी एक अपराधी को सज़ा दी जा सकेगी। भले ही उसने अपना अपराध स्वीकार क्यों न कर हो।
फिर क्या आज हमारे सामने इन अपराधियों का अपराध केवल बाबरी मस्जिद को शहीद कर देना ही है? क्या केवल उन पर इस बात के लिए ही मुक़दमा चलाया जाना काफी ठहराया जा सकता है कि बाबरी मस्जिद को उनके उकसावे पर शहीद किया गया। उन्होंने जनता की भावनाओं को उग्र करने वाले भाषण दिए, बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किए जाने की साज़िशें रचीं या फिर हमें अब इस सच्चाई को भी स्वीकार करना चाहिए कि उनका अपराध एक मस्जिद को शहीद कर देना ही नहीं है, बल्कि पिछले 17 वर्षों में बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद जो साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं गुजरात में हुए मुसलमानों के नरसंहार के वह सब भी शामिल रखे जाएं और बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध के साथ-साथ इस ख़ून-ख़राबे का ज़िम्मेदार भी उन्हें ठहराया जाए, यह एक ऐसा सच है जो खुली आंखों से सबको दिखाई देता है, मगर इसे साबित नहीं किया जा सकता।
शायद किसी भी राजनीतिज्ञ को सज़ा नहीं दी जा सकती, इसलिए कि पहले तो उसे अदालत की दहलीज़ तक लाना ही बहुत कठिन होगा और यदि ले भी आया गया तो यह मुक़दमे उनकी राजनीति के लिए ही काम आएंगे, इसे उनकी राजनीतिक भूमि तैयार करने के लिए साम्प्रदायिक रंग दिया जाएगा और कुछ दिन के बाद वह ससम्मान बरी होकर फिर से जनता के बीच यही साम्प्रदायिकता का ज़हर फैलाते दिखाई देंगे। आख़िर कब तक चलेगा यह सिलसिला? कब तक मासूम भारतीय जनता की भावनाओं से खेला जाएगा?
फिर प्रश्न पैदा होगा तो क्या कुछ भी न किया जाए? क्या मुक़दमे भी न चलाए जाएं। प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है, मुक़दमे अवश्य चलाए जाएं, मगर इस रूप में कि जब सरकार कुछ महीनों के अंदर ही ‘फास्ट ट्रेक अदालत’ में मुक़दमा चलाकर उन्हें उनके अंजाम तक पहुंचाने का साहस रखती हो। अगर भारत सरकार(कांग्रेस) का उद्देश भी अपने वोट बैंक को आकर्षित करने के लिए इस रिपोर्ट को जनता के सामने लाना और अपराधियों पर केवल मुक़दमे क़ायम करना ही है तो फिर जनता को सिवाए हानि के इसका कोई लाभ दिखाई नहीं देता।
भारत सरकार के साथ-साथ भारत की जनता अर्थात हिन्दुओं और मुसलमानो को भी अब इस सच्चाई पर ध्यान देना होगा कि क्या उनकी मांगें पूरी हो सकती हैं? वह जिस ज़िद पर अड़े हैं क्या वह पूरी हो सकती है, क्या अपने-अपने दृष्टिकोण से जिसे वह न्याय मानते हैं क्या उसे वर्तमान स्थिति में कार्यरूप दिया जा सकता है? और अगर ऐसा प्रयास भी किया गया तो उसके लिए क्या मूल्य चुकाना पड़ेगा? कितने इन्सानी जीवन कुरबान करने पड़ेंगे? यह सोचना होगा। जोश और भावनाओं की रौ में बह कर यह कहा तो जा सकता है कि राम के नाम पर या अल्लाह के नाम पर हज़ारों जानों की कुरबानी दी जा सकती है, मगर क्या यह बुद्धिमानी होगी?
क्या वास्तव में यह श्री राम और अल्लाह को प्रसन्न करने वाला क़दम होगा? आज कौनसी अदालत ऐसे किसी भी फ़ैसले को लागू करने की स्थिति में हे जो वहां मस्जिद के पुनर्माण के पक्ष में हो, या राम मंदिर के पक्ष में हो? दोनों ही स्थितियों में राष्ट्रव्यापी साम्प्रदायिक दंगों की आशंका रहेगी। तब क्या कोई ऐसा रास्ता निकालने पर ध्यान नहीं देना चाहिए, कि देश में शांति भी बनी रहे और साम्प्रदायिक सोहार्द भी बना रहे, राम मंदिर भी बने, बाबरी मस्जिद भी बने, मगर उस विवादित स्थान पर हमेशा हमेशा के लिए ही यह विवाद ख़त्म करने की नियत से कोई ऐसा राष्ट्रीय स्मार्क बने जिसका किसी विशेष धर्म से कोई संबंध न हो।
निसंदेह मुट्ठी भर हिंदू या मुसलमान ऐसे किसी भी फैसले को रद्द करने में देर नहीं लगाएंगे, इसलिए कि ऐसे किसी भी फैसले से बहुतों की राजनीतिक दुकानें बंद होने का खतरा पैदा हो जाएगा। पिछले 17 वर्षों में बल्कि इससे भी कहीं पहले से बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि के नाम पर जो राजनीति का कारोबार चल रहा है, वह फिर किस तरह जारी रहेगा? लेकिन यह ऐतिहासिक काम करने का साहस वर्तमान केंद्रीय सरकार कर सकती है। स्थितियां बहुत हद तक इसके लिए अनुकूल हैं। संसदीय चुनावों को गुज़रे हुए अभी 7 माह भी नहीं हुए हैं, अर्थात अगला संसदीय चुनाव लगभग साढ़े 4 वर्ष दूर है।
उत्तर प्रदेश जो सबसे अधिक इस निर्णय से प्रभावित होने वाला राज्य है, वहां भी चुनावों में अभी लगभग दो वर्ष शेष हैं, अर्थात तुरंत ऐसे किसी भी निर्णय को राजनीति पर हावी होने का अवसर नहीं मिलेगा और अगर कांग्रेस अपने इस शासनकाल में ऐसा कोई निर्णय लेने का कारनामा अंजाम दे पाती है तो भारतीय राजनीति में इस सरकार का उल्लेख स्वर्ण अक्षरों में किया जाएगा। इसलिए कि कभी न कभी तो कोई एक निर्णय लेना ही होगा, आख़िर कब तक इसे यूं ही टाला जाता रहेगा। साम्प्रदायिक दंगे होते रहेंगे, बेगुनाह इन्सानों की जानें जाती रहेंगी और इन्सानी जीवन के मूल्य पर राजनीतिक तमग़े प्राप्त किए जाते रहेंगे।
हम जानते हैं कि यदि राज ठाकरे जैसे एक मामूली राजनीतिज्ञ को गिरफ़्तार करने का प्रयास महाराष्ट्र के अंदर तूफान बरपा कर देता है, मुम्बई में सैंकड़ों गाड़ियों को तोड़ दिया जाता है, अगर बाल ठाकरे के लिए एक अप्रिय वाक्य किसी न्यूज़ चैनल को हानि पहुंचाने का कारण बन सकता है तो फिर पिछले 50 वर्षों से साम्प्रदायिक राजनीति के झण्डा बरदारों पर मुक़दमा चलाने और सज़ा देने का निर्णय कितना कठिन साबित हो सकता है। निसंदेह इस वाक्य के साथ यह दुखद स्थिति भी पैदा हो सकती है कि तब तो किसी राजनीतिज्ञ को किसी भी बड़े से बड़े अपराध के बावजूद सज़ा नहीं दी जा सकती। हां सच तो यही है चाहे कितना ही कष्टदायक क्यों न हो।
क्योंकि हर राजनीतिक दल ने अपने कार्यकर्ताओं के रूप में अपने सुरक्षा दस्ते बना लिए हैं जो हर हाल में अपने स्वामी को बचाना ही अपना उत्तरदायित्व समझते हैं। चाहे इसके लिए उन्हें कुछ भी क्यों न करना पड़े, उनके द्वारा की जाने वाली तोड़-फोड़, आगज़नी, ख़ूनख़राबा सब कुछ क्षमा योग्य है। क़ानून उनके लिए कोई महत्व नहीं रखता, पहले तो किसी की गिरफ्तारी होती ही नहीं और अगर होती भी है तो उसे कोई सज़ा नहीं होती।
मैं अभी लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट की समीक्षा पेश नहीं कर रहा हूं, हां मगर इस रिपोर्ट के संदर्भ में बात अवश्य कर रहा हूं। इसलिए कि आख़िर इस रिपोर्ट में ऐसा क्या होगा जिसका जनता को पता नहीं है। अधिक से अधिक कुछ नामों का इज़ाफा होगा, ऐसे कुछ सुबूत होंगे, एसे कुछ गवाहों को उल्लेख होगा जिससे कि यह साबित हो सके कि यह वही लोग हैं जो बाबरी मस्जिद की शहादत के लिए उत्तरदायी हैं, फिर इसके बाद क्या होगा? मेरा प्रश्न तो यही है कि आख़िर सब कुछ सुबूतों के साथ प्राप्त हो जाने पर भी क्या उनको सज़ाएं दी जा सकेंगी? गुजरात में मुसलामनों के नरसंहार के बाद अदालत ने नरेन्द्र मोदी को ‘नीरो’ तक कहा।
तमाम केन्द्रीय नाजनीतिज्ञों ने नरेन्द्र मोदी के अपराध को चिन्हित किया, मगर क्या नरेन्द्र मोदी पर कोई मुक़दमा चला? क्या यह आशा की जा सकती है कि ठोस सुबूत मिल जाने पर भी नरेन्द्र मोदी को कोई सज़ा दी जा सकेगी? हमने माना कि लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट में अटल बिहारी वाजपेयी का नाम एक नया रहस्योदघाटन है, मगर लाल कृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, बाल ठाकरे, उमा भारती, विनय कटियार जैसे नाम किसकी ज़बान पर नहीं थे। कौन नहीं जानता कि यह लोग केवल बाबरी मस्जिद की शहादत के लिए ही उत्तरदायी नहीं हैं, बल्कि इसके बाद होने वाले साम्प्रदायिक दंगो के लिए भी उत्तरदायी हैं, जिनमें हज़ारों निर्दोष लोगों की जानें गईं।
इनमें हिन्दू भी थे, इनमें मुसलामन भी थे और भारत भर में होने वाले बम धमाके क्या इसी सोच से प्रभावित नहीं हैं? क्या मालीगांव बम धमाकों की जांच से नतीजा कुछ और निकल रहा था। शहीद हेमंत करकरे ने जिन अपराधियों की निशानदही की, क्या वह राम मंदिर आंदोलन से जुड़े दिखाई नहीं देते? क्या यह सच नहीं है कि बाबरी मस्जिद की शहादत के लिए उत्तर दायी लाल कुष्ण आडवानी माली गांव बम धमाकों के अपराधियों के लिए सबसे बड़ी ढाल बन गए थे? साध्वी प्रज्ञा सिंह को बचाने के लिए उसके साथ लचीला रवैया अपनाने की बात करने के लिए वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाह कार एम॰के॰ नारायनण से भी मिले और प्रधानमंत्री डा॰ मनमोहन सिंह से भी, इसीलिए तो मैंने शुरू में निवेदन कर दिया था कि मैंने लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट अभी पढ़ी नहीं है और पढ़ने मैं कोई विशेष रुचि भी नहीं है, इसलिए कि मैं वर्षों से हर रोज़ दर्जनों अख़बार पढ़ता हूं उनमें छपी ख़बरों में ऐसे तमाम चेहरे साफ-साफ दिखाई देते रहते हैं। वैसे भी ऐसे तमाम कमीशनों की अब तक की रिपोर्टों का क्या हाल हुआ, यह सारा देश जानता है।
हमारी सरकारें कितनी कमज़ोर हैं, हमारी व्यवस्था कितनी कमज़ोर है, हम इस राजनीतिक ग़ुंडागर्दी के सामने कितने लाचार और बेबस हो गए हैं, यह अब कोई ढकी-छुपी बात नहीं है। महाराष्ट्र की राजनीतिक ग़ंुडागर्दी सड़कों पर भी देखने को मिली और विधान सभा में भी, क्या कर सके हम?
अब जिस समय मैं यह लेख लिख रहा हूं तो मेरी निगाहों के सामने टीवी न्यूज़ चैनलों की स्क्रीन पर संसद में होने वाला हंगामा जारी है। कारण हमारे गृहमंत्री पी॰ चिदम्बरम ने अपने बयान के बीच शब्द ‘हिन्दू आतंकवाद’ का प्रयोग क्या कर दिया, संसद में उपस्थित एक विशेष मानसिकता के लोगों के लिए यह बिल्कुल असहनीय हो गया, इसलिए कि उनकी ज़बानें मुस्लिम आतंकवाद, इस्लामी आतंकवाद कहने की आदी हैं और यही शब्द सुनने की आदत उनके कानों को पड़ गई, अतः न तो शहीद हेमंत करकरे के द्वारा दिखाया गया ‘हिन्दू आतंकवाद का चेहरा’ उन्हें बर्दाश्त हो सका, न पी॰चिदम्बरम की ज़बान से निकला ‘हिन्दू आतंकवाद’ का वाक्य।
ऐसी स्थिति में बाबरी मस्जिद की शहादत जो ‘हिन्दू आतंकवाद’ का जीता जागता इतिहास है और लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट एक दस्तावेज़ है जो ऐसे चेहरों को बेनक़ाब करती है तो फिर क्या आशा की जाए कि उनके अपराधी साबित हो जाने के बाद भी उन्हें कोई सज़ा दी जा सकेगी।
Tuesday, December 1, 2009
वतन वापसी के बाद अब फिर‘वन्दे मातरम्’, लिब्राहन कमीशन’ और ‘26/11’
वाशिंगटन (Washington)
हां वह एक पत्रकार मैं ही था, जिसे व्हाइट हाउस में प्रवेश करने से रोक दिया गया। हो सकता है कुछ लोगों की निगाह में यह बात बहुत अपमान की हो, अगर वह चाहें तो ऐसा भी सोच सकते हैं, मगर मेरे लिये यह परवर दिगार-ए-आलम का बहुत बड़ा ईनाम है और व्हाइट हाउस द्वारा भेंट किया गया एक ऐसा सम्मान जिसे मैं हमेशा याद रखना चाहूंगा। मुझे भी विश्वास नहीं आता, अगर यह सच्चाई सामने न आई होती कि मेरे लिखने का इतना प्रभाव अमरीकी सरकार महसूस करती है।
व्हाइट हाउस को अपने दूतावास व अन्य माध्यमों से प्राप्त सामग्री इस निर्णय का कारण बनी इसमें लगभग एक माह तक 9/11 पर लिखे गये मेरे लेख, सद्दाम हुसैन को दी गई फांसी के विरूद्ध मेरे लेख, अफगानिस्तान और ईराक के विनाश पर मेरे विचार व ईराक़ हमले पर आधारित मेरी पुस्तक ‘‘सद्दाम सफ़र ज़िंदगी का’’ व हैदराबाद में हुए बम धमाके पर लिखा गया लेख ‘‘शक के दायरे में हूजी और आई.एस.आई. ही क्यों, सी.आई.ए. क्यों नहीं?’’ ;04.09.2007द्ध और Mr. Bush Listen Me Please ;27.09.2007द्ध
24 नवम्बर को व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया गया था भारत के प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह जी को और उनके साथ शिष्ट मण्डल में सम्मिलित तमाम व्यक्तियों को मीडिया डेलीगेट सहित.......और इस नाते अपने देश के प्रधानमंत्री के सम्मान को देखते हुए मेरा नैतिक दायित्व था इस दरवाज़े तक पहुंचना। अब यह करम अल्लाह का कि उसने मुझे उस दस्तर ख्वान तक पहुंचने से रोक लिया, जिस पर ईराक और अफगानिस्तान के शहीदों के खून के छींटे थे, निश्चित रूप से इस इमारत के दरो-दीवार में आज भी उन बेगुनाह मासूम शहीदों की आहें सुरक्षित होंगी, जिन्हें दुनिया के पर्दे से मिटाने के लिए साज़िश रची गई थी इस व्हाइट हाउस में।
मेरे कलम का जिहाद जारी रहेगा इसी अन्दाज़ में उन मज़लूमों के लिए जब तक कि अफगानिस्तान और ईराक की जनता को अमरीकी फौज और उन पर थोपे गये कठपुतली शासकों से मुक्ति नहीं मिल जाती, संभवतः यही शंका थी व्हाइट हाउस के उन पहरेदारों को कि डर गये वह एक पत्रकार के कदमों की आहट से। बहरहाल मैं वाशिंगटन से लौट आया हूं, अतः शीघ्र ही इस विषय पर लिखे जाने वाले लेखों का क्रम प्रस्तुत किया जाएगा आपके सामने, फिलहाल उल्लेख उसी विषय का जिस पर बात जारी थी।
वंदे मातरम् (Vande मातरम)
इस संदर्भ में पिछले लगभग एक महीने में काफ़ी कुछ लिखा है मैंने और अभी बहुत कुछ लिखा जाना शेष है। अभी तक यह प्रश्न मुसलमानों से था कि वंदे मातरम् का गाया जाना वतन से मुहब्बत की पहचान है। अब यह प्रश्न उन लोगों से होगा जो अब तक मुसलमानों से यह प्रश्न करते रहे थे कि वह बताएं क्या ‘वंदे मातरम्’ का गाया जाना राष्ट्र पे्रम की निशानी हो सकती है? जबकि हमारे पास ऐसे बहुत से ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं कि वास्तव में यह तो अंग्रेज़ों से मुहब्बत की निशानी थी और ‘‘आनंद मठ’’ में जो कुछ भी लिखा गया है ‘वह न तो हिन्दुस्तान के पक्ष में था और न हिंदुओं के पक्ष में बल्कि इस उपन्यास का उद्देश्य तो सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों की दुश्मनी थी। हां, यदि इस उपन्यास से किसी का समर्थन उद्देश्य था तो वह केवल अंग्रेज़ थे।
आज के इस लेख में इस सिलसिले को अगर आगे बढ़ाया गया तो अन्य महम्वपूर्ण विषयों पर कुछ वाक्य लिखना भी सम्भव नहीं होगा, अतः वंदे मातरम् पर मेरे लेख का सिलसिला देखें कल से और इजाज़त दें आज कुछ वाक्य लिब्राहन कमीशन और 26/11 पर लिखने के लिए।
लिब्राहन कमीशन (Liberhan Commission)
मुझे आश्चर्य है कि जस्टिस लिब्राहन कमीशन ने यह रिपोर्ट इतनी कम अवधि में कैसे पूरी कर ली? क्या वह थक गए थे प्रमाण जमा करते-करते या कोई विवशता थी उनकी, एक अपूर्ण रिपोर्ट को इतनी जल्दी में पेश कर देने की? नहीं यह कोई व्यंगात्मक वाक्य नहीं है। हां उन्हें अवश्य ऐसा लगता होगा जो पिछले कुछ दिनों से रिपोर्ट को देर से पेश किए जाने का राग अलाप रहे हैं। जहां तक मैं समझता हूं लिब्राहन कमीशन बाबरी मस्जिद की शहादत से जुड़े तथ्यों पर जांच का काम कर रहा था और बाबरी मस्जिद की शहादत में जानबूझ कर या अनजाने में जो व्यक्ति भी शामिल थे उन्हें चिन्हित करना इस कमीशन का उद्देश्य था। क्या बाबरी मस्जिद की शहादत से जुड़ी अपराधिक सरगर्मियां बंद हो गई हैं?
हत्याओं और विनाश का सिलसिला रुक गया है? अगर नहीं तो यह जांच बंद कैसे हो सकती है? हां इस रिपोर्ट को जांच का एक भाग अवश्य ठहराया जा सकता है, फिर इस एक भाग में भी देखना होगा कि क्या इसमें गुजरात में हुए मुस्लिम नरसंहार का उल्लेख है, क्योंकि अयोध्या से चली ‘साबरमती एक्सप्रेस’ के गोधरा पहुंचने के बाद ‘कारसेवकों’ के हवाले से जो कुछ गुजरात में हुआ 28 फरवरी 2002 के बाद, क्या वह 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद की शहादत से जुड़ा नहीं था। छाती ठोंक कहा बाल ठाकरे ने कि ‘जिन कोठारी भाइयों ने मस्जिद के गुंबदों को तोड़ा था और भगवा झंडा लहराया था वह शिव सैनिक थे और मुझे उन पर गर्व है।’
क्या महाराष्ट्र में और विशेष कर मुम्बई में चुन-चुन कर मुसलमानों के घरों ओर दुकानों को आग लगा देने वाले शिव सैनिकों का उल्लेख है इस रिपोर्ट में? अभी दो दिन पहले प्ठछ.7 न्यूज़ चैनल के एक कार्यक्रम में भारतीय जनता पार्टी के महासचिव विनय कटियार ने कहा कि अगर उनका बस चलता (सत्ता में होते) तो बाबरी मस्जिद को बाबरी मस्जिद कहने वालों की राष्ट्रीयता समाप्त कर देते। क्या इस अपराधिक वाक्य को दर्ज करने की गुंजाइश है इस रिपोर्ट में? अगर नहीं तो यह रिपोर्ट अभी पूर्ण कैसे हो सकती है, अब प्रश्न यह अवश्य पैदा होता कि यह रिपोर्ट जिन अपराधियों को चिन्हित करती है, अगर 17 वर्ष बाद भी हम उन्हें सज़ा देने की स्थिति में नहीं हैं तो फिर अब तक की गई या आगे की जा सकने वाली जांच का क्या अर्थ?
हमने चुनाव किया है इस विषय का भी अपनी जांच के लिए और लिखने के लिए, आजके यह आरम्भिक वाक्य तो केवल इसलिए हैं कि बाबरी मेस्जिद की शहादत के लिए ज़िम्मेदार अपराधियों को चिन्हित करने के साथ-साथ बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद भारत भर में जो साम्प्रदायिक दंगे हुए और जो इन दंगों के लिए उत्तरदायी हैं उन सबको भी इस जांच के दायरे में लाना होगा। अब यह निर्णय करना भारत सरकार का काम है कि वह इसके लिए कितने कमीशन बिठाती है? या लिब्राहन कमीशन को कितने भागों में अपनी रिपोर्ट पेश करने की इजाज़त देती है और फिर क्या वह इन तमाम अपराधियों को सज़ा भी दे पाती है।
अन्यथा क्या लाभ इस काग़ज़ी कार्यवाही का इसमें ऐसा क्या है जो हम नहीं जानते? यह अपराधी कोई नक़ाबपोश हमलावर नहीं थे, जो कुछ हुआ दिन के उजाले में हुआ सबकी नज़रों के सामने हुआ और किसके उकसावे पर हुआ कौन नहीं जानता, अब क़ौम की दिलचस्पी नाम जानने में नहीं अपराधियों को सज़ा दिये जाने में है।
26/11
‘‘मुसलमानाने हिंद........ माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल???’’ अर्थात् मेरे पिछले क़िस्तवार लेखों की 100 वीं क़िस्त जो 100 पृष्ठों से अधिक पर आधारित एक दस्तावेज़ के रूप में पाठकों के सामने पेश की गई, उसका शीर्षक यही था और आज भी जब मैं इस विषय पर लिखना शूरू करूंगा तो 100 पृष्ठों से कहीं अधिक दरकार होंगे। मगर आज जबकि केवल चंद पंक्तियां ही लिखनी हैं और वह चंद पंक्तियां भी ऐसी कि अपने आप में न केवल पूर्ण हों और बल्कि कई लेखों पर भारी हों तो एक-एक शब्द ध्यान देने योग्य होना ही चाहिए।
26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर हुआ आतंकवादी हमला 10 पाकिस्तानी आतंकवादियों का कारनामा था, जिसकी साज़िश रची गई पाकिस्तान की धरती पर..... स्वीकार, 100 बार स्वीकार, कोई बहस नहीं इस पर। अब हमारे पास मौजूद हैं 9 आतंकवादी लाशें और दसवां जीवित आतंकवादी। क्या कोई 11वां भी है? अगर नहीं तो कम से कम एक बात तो अब् तय हो जाए कि इन 10 आतंकवादियों के अलावा कोई 11वां आतंकवादी इस हमले में शामिल नहीं था। फिर प्रश्न यह पैदा होगा कि शहीद हेमंत करकरे की विधवा कविता करकरे ने जो सवाल उठाए हैं, चाहे वह हेमंत करकरे की बुलेट प्रूफ़ जैकेट के संबंध में हों या यह कि मेरे पति तो सड़क पर आतंकवादियों की गोलियों से छलनी आख़री सांसें लेते रहे और आतंकवादियों को अस्पताल पहुंचाया जाता रहा, ऐसा क्यों?
अब इस प्रश्न का उत्तर वह 9 आतंकवादी लाशें देंगी या दसवां जीवित बचा आतंकवादी?..... महाराष्ट्र पुलिस के पूर्व आई।जी. एस.एम मुशरिफ की किताब "Who Killed Karkare? The Real face of Terrorism in India" अशोक काम्टे की विधवा विनीता काम्टे की किताब ^^To the Last Bullet** ने जो प्रश्न खडे़ किए उनका उत्तर हाफ़िज़ सईद से मिलेगा या ज़कीउर्रहमान लखवी से. .......26 नवम्बर को हेमंत करकरे की शहादत से 24 घंटे पहले उन्हें मौत की धमकी इन 9 आतंकवादी लाशों ने दी थी या दस्वें जीवित बचे आतंकवादी ने? ‘‘इंडियन एक्सप्रेस और रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा ने अपने प्रकाशनों में वह टेलीफोन नं॰ प्रकाशित किया था, वह नम्बर किसके द्वारा प्रयोग किया गया, उन 9 आतंकवादी लाशों के द्वारा या दसवें जीवित बचे आतंकवादी के द्वारा, या फिर 11वां कोई और........था?
सरकार और मीडिया के पास आतंकवादियों के द्वारा की गई बातचीत के टेलीफोन रिकॉर्ड मौजूद हैं, जो विभिन्न टीवी चैनलों पर भी दिखाए गए। होटल ताज, होटल ओबराय से की गई अन्य कालों का रिकॉर्ड कहां और किसके पास है? इतनी बड़ी संख्या में हथियार वहां कैसे पहुंचे? अनिता उदया को ख़ुफिया रूप से अमरीका क्यों ले जाया गया और हाल ही में हुए नए रहस्योदघाटन की क्या हेडली एफबीआई का एजेंट है, इन प्रश्नों का उत्तर मुर्दा घर में पड़ी वह 9 आतंकवादी लाशें देंगी या एक जीवित बचा आतंकवादी?
कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस तरह हम बटला हाऊस का सच सामने नहीं लाना चाहते, कोई सीबीआई जांच या न्यायिक जांच नहीं करना चाहते, क्योंकि उससे जो नतीजे सामने आ सकते हैं उससे हमारी पुलिस के उत्साह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, क्या उसी तरह 26/11 के 10 आतंकवादियों के बाद हम किसी 11वें आतंकवादी की तरफ इसलिए उंगली नहीं उठाना चाहते कि................
बात जारी रहेगी, प्रतीक्षा कीजिए 26/11 पर लेखों के नए सिलसिले का और तब तक नज़र डालिए हमारे प्रकाशित लेखों के बाद होने वाले रहस्योदघाटनों पर, क्या यह सब लगभग वही तो नहीं हैं, जिसका इशारा हमने 26/11 के तुरंत बाद अपने लेखों में कर दिया था।
हां वह एक पत्रकार मैं ही था, जिसे व्हाइट हाउस में प्रवेश करने से रोक दिया गया। हो सकता है कुछ लोगों की निगाह में यह बात बहुत अपमान की हो, अगर वह चाहें तो ऐसा भी सोच सकते हैं, मगर मेरे लिये यह परवर दिगार-ए-आलम का बहुत बड़ा ईनाम है और व्हाइट हाउस द्वारा भेंट किया गया एक ऐसा सम्मान जिसे मैं हमेशा याद रखना चाहूंगा। मुझे भी विश्वास नहीं आता, अगर यह सच्चाई सामने न आई होती कि मेरे लिखने का इतना प्रभाव अमरीकी सरकार महसूस करती है।
व्हाइट हाउस को अपने दूतावास व अन्य माध्यमों से प्राप्त सामग्री इस निर्णय का कारण बनी इसमें लगभग एक माह तक 9/11 पर लिखे गये मेरे लेख, सद्दाम हुसैन को दी गई फांसी के विरूद्ध मेरे लेख, अफगानिस्तान और ईराक के विनाश पर मेरे विचार व ईराक़ हमले पर आधारित मेरी पुस्तक ‘‘सद्दाम सफ़र ज़िंदगी का’’ व हैदराबाद में हुए बम धमाके पर लिखा गया लेख ‘‘शक के दायरे में हूजी और आई.एस.आई. ही क्यों, सी.आई.ए. क्यों नहीं?’’ ;04.09.2007द्ध और Mr. Bush Listen Me Please ;27.09.2007द्ध
24 नवम्बर को व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया गया था भारत के प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह जी को और उनके साथ शिष्ट मण्डल में सम्मिलित तमाम व्यक्तियों को मीडिया डेलीगेट सहित.......और इस नाते अपने देश के प्रधानमंत्री के सम्मान को देखते हुए मेरा नैतिक दायित्व था इस दरवाज़े तक पहुंचना। अब यह करम अल्लाह का कि उसने मुझे उस दस्तर ख्वान तक पहुंचने से रोक लिया, जिस पर ईराक और अफगानिस्तान के शहीदों के खून के छींटे थे, निश्चित रूप से इस इमारत के दरो-दीवार में आज भी उन बेगुनाह मासूम शहीदों की आहें सुरक्षित होंगी, जिन्हें दुनिया के पर्दे से मिटाने के लिए साज़िश रची गई थी इस व्हाइट हाउस में।
मेरे कलम का जिहाद जारी रहेगा इसी अन्दाज़ में उन मज़लूमों के लिए जब तक कि अफगानिस्तान और ईराक की जनता को अमरीकी फौज और उन पर थोपे गये कठपुतली शासकों से मुक्ति नहीं मिल जाती, संभवतः यही शंका थी व्हाइट हाउस के उन पहरेदारों को कि डर गये वह एक पत्रकार के कदमों की आहट से। बहरहाल मैं वाशिंगटन से लौट आया हूं, अतः शीघ्र ही इस विषय पर लिखे जाने वाले लेखों का क्रम प्रस्तुत किया जाएगा आपके सामने, फिलहाल उल्लेख उसी विषय का जिस पर बात जारी थी।
वंदे मातरम् (Vande मातरम)
इस संदर्भ में पिछले लगभग एक महीने में काफ़ी कुछ लिखा है मैंने और अभी बहुत कुछ लिखा जाना शेष है। अभी तक यह प्रश्न मुसलमानों से था कि वंदे मातरम् का गाया जाना वतन से मुहब्बत की पहचान है। अब यह प्रश्न उन लोगों से होगा जो अब तक मुसलमानों से यह प्रश्न करते रहे थे कि वह बताएं क्या ‘वंदे मातरम्’ का गाया जाना राष्ट्र पे्रम की निशानी हो सकती है? जबकि हमारे पास ऐसे बहुत से ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं कि वास्तव में यह तो अंग्रेज़ों से मुहब्बत की निशानी थी और ‘‘आनंद मठ’’ में जो कुछ भी लिखा गया है ‘वह न तो हिन्दुस्तान के पक्ष में था और न हिंदुओं के पक्ष में बल्कि इस उपन्यास का उद्देश्य तो सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों की दुश्मनी थी। हां, यदि इस उपन्यास से किसी का समर्थन उद्देश्य था तो वह केवल अंग्रेज़ थे।
आज के इस लेख में इस सिलसिले को अगर आगे बढ़ाया गया तो अन्य महम्वपूर्ण विषयों पर कुछ वाक्य लिखना भी सम्भव नहीं होगा, अतः वंदे मातरम् पर मेरे लेख का सिलसिला देखें कल से और इजाज़त दें आज कुछ वाक्य लिब्राहन कमीशन और 26/11 पर लिखने के लिए।
लिब्राहन कमीशन (Liberhan Commission)
मुझे आश्चर्य है कि जस्टिस लिब्राहन कमीशन ने यह रिपोर्ट इतनी कम अवधि में कैसे पूरी कर ली? क्या वह थक गए थे प्रमाण जमा करते-करते या कोई विवशता थी उनकी, एक अपूर्ण रिपोर्ट को इतनी जल्दी में पेश कर देने की? नहीं यह कोई व्यंगात्मक वाक्य नहीं है। हां उन्हें अवश्य ऐसा लगता होगा जो पिछले कुछ दिनों से रिपोर्ट को देर से पेश किए जाने का राग अलाप रहे हैं। जहां तक मैं समझता हूं लिब्राहन कमीशन बाबरी मस्जिद की शहादत से जुड़े तथ्यों पर जांच का काम कर रहा था और बाबरी मस्जिद की शहादत में जानबूझ कर या अनजाने में जो व्यक्ति भी शामिल थे उन्हें चिन्हित करना इस कमीशन का उद्देश्य था। क्या बाबरी मस्जिद की शहादत से जुड़ी अपराधिक सरगर्मियां बंद हो गई हैं?
हत्याओं और विनाश का सिलसिला रुक गया है? अगर नहीं तो यह जांच बंद कैसे हो सकती है? हां इस रिपोर्ट को जांच का एक भाग अवश्य ठहराया जा सकता है, फिर इस एक भाग में भी देखना होगा कि क्या इसमें गुजरात में हुए मुस्लिम नरसंहार का उल्लेख है, क्योंकि अयोध्या से चली ‘साबरमती एक्सप्रेस’ के गोधरा पहुंचने के बाद ‘कारसेवकों’ के हवाले से जो कुछ गुजरात में हुआ 28 फरवरी 2002 के बाद, क्या वह 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद की शहादत से जुड़ा नहीं था। छाती ठोंक कहा बाल ठाकरे ने कि ‘जिन कोठारी भाइयों ने मस्जिद के गुंबदों को तोड़ा था और भगवा झंडा लहराया था वह शिव सैनिक थे और मुझे उन पर गर्व है।’
क्या महाराष्ट्र में और विशेष कर मुम्बई में चुन-चुन कर मुसलमानों के घरों ओर दुकानों को आग लगा देने वाले शिव सैनिकों का उल्लेख है इस रिपोर्ट में? अभी दो दिन पहले प्ठछ.7 न्यूज़ चैनल के एक कार्यक्रम में भारतीय जनता पार्टी के महासचिव विनय कटियार ने कहा कि अगर उनका बस चलता (सत्ता में होते) तो बाबरी मस्जिद को बाबरी मस्जिद कहने वालों की राष्ट्रीयता समाप्त कर देते। क्या इस अपराधिक वाक्य को दर्ज करने की गुंजाइश है इस रिपोर्ट में? अगर नहीं तो यह रिपोर्ट अभी पूर्ण कैसे हो सकती है, अब प्रश्न यह अवश्य पैदा होता कि यह रिपोर्ट जिन अपराधियों को चिन्हित करती है, अगर 17 वर्ष बाद भी हम उन्हें सज़ा देने की स्थिति में नहीं हैं तो फिर अब तक की गई या आगे की जा सकने वाली जांच का क्या अर्थ?
हमने चुनाव किया है इस विषय का भी अपनी जांच के लिए और लिखने के लिए, आजके यह आरम्भिक वाक्य तो केवल इसलिए हैं कि बाबरी मेस्जिद की शहादत के लिए ज़िम्मेदार अपराधियों को चिन्हित करने के साथ-साथ बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद भारत भर में जो साम्प्रदायिक दंगे हुए और जो इन दंगों के लिए उत्तरदायी हैं उन सबको भी इस जांच के दायरे में लाना होगा। अब यह निर्णय करना भारत सरकार का काम है कि वह इसके लिए कितने कमीशन बिठाती है? या लिब्राहन कमीशन को कितने भागों में अपनी रिपोर्ट पेश करने की इजाज़त देती है और फिर क्या वह इन तमाम अपराधियों को सज़ा भी दे पाती है।
अन्यथा क्या लाभ इस काग़ज़ी कार्यवाही का इसमें ऐसा क्या है जो हम नहीं जानते? यह अपराधी कोई नक़ाबपोश हमलावर नहीं थे, जो कुछ हुआ दिन के उजाले में हुआ सबकी नज़रों के सामने हुआ और किसके उकसावे पर हुआ कौन नहीं जानता, अब क़ौम की दिलचस्पी नाम जानने में नहीं अपराधियों को सज़ा दिये जाने में है।
26/11
‘‘मुसलमानाने हिंद........ माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल???’’ अर्थात् मेरे पिछले क़िस्तवार लेखों की 100 वीं क़िस्त जो 100 पृष्ठों से अधिक पर आधारित एक दस्तावेज़ के रूप में पाठकों के सामने पेश की गई, उसका शीर्षक यही था और आज भी जब मैं इस विषय पर लिखना शूरू करूंगा तो 100 पृष्ठों से कहीं अधिक दरकार होंगे। मगर आज जबकि केवल चंद पंक्तियां ही लिखनी हैं और वह चंद पंक्तियां भी ऐसी कि अपने आप में न केवल पूर्ण हों और बल्कि कई लेखों पर भारी हों तो एक-एक शब्द ध्यान देने योग्य होना ही चाहिए।
26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर हुआ आतंकवादी हमला 10 पाकिस्तानी आतंकवादियों का कारनामा था, जिसकी साज़िश रची गई पाकिस्तान की धरती पर..... स्वीकार, 100 बार स्वीकार, कोई बहस नहीं इस पर। अब हमारे पास मौजूद हैं 9 आतंकवादी लाशें और दसवां जीवित आतंकवादी। क्या कोई 11वां भी है? अगर नहीं तो कम से कम एक बात तो अब् तय हो जाए कि इन 10 आतंकवादियों के अलावा कोई 11वां आतंकवादी इस हमले में शामिल नहीं था। फिर प्रश्न यह पैदा होगा कि शहीद हेमंत करकरे की विधवा कविता करकरे ने जो सवाल उठाए हैं, चाहे वह हेमंत करकरे की बुलेट प्रूफ़ जैकेट के संबंध में हों या यह कि मेरे पति तो सड़क पर आतंकवादियों की गोलियों से छलनी आख़री सांसें लेते रहे और आतंकवादियों को अस्पताल पहुंचाया जाता रहा, ऐसा क्यों?
अब इस प्रश्न का उत्तर वह 9 आतंकवादी लाशें देंगी या दसवां जीवित बचा आतंकवादी?..... महाराष्ट्र पुलिस के पूर्व आई।जी. एस.एम मुशरिफ की किताब "Who Killed Karkare? The Real face of Terrorism in India" अशोक काम्टे की विधवा विनीता काम्टे की किताब ^^To the Last Bullet** ने जो प्रश्न खडे़ किए उनका उत्तर हाफ़िज़ सईद से मिलेगा या ज़कीउर्रहमान लखवी से. .......26 नवम्बर को हेमंत करकरे की शहादत से 24 घंटे पहले उन्हें मौत की धमकी इन 9 आतंकवादी लाशों ने दी थी या दस्वें जीवित बचे आतंकवादी ने? ‘‘इंडियन एक्सप्रेस और रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा ने अपने प्रकाशनों में वह टेलीफोन नं॰ प्रकाशित किया था, वह नम्बर किसके द्वारा प्रयोग किया गया, उन 9 आतंकवादी लाशों के द्वारा या दसवें जीवित बचे आतंकवादी के द्वारा, या फिर 11वां कोई और........था?
सरकार और मीडिया के पास आतंकवादियों के द्वारा की गई बातचीत के टेलीफोन रिकॉर्ड मौजूद हैं, जो विभिन्न टीवी चैनलों पर भी दिखाए गए। होटल ताज, होटल ओबराय से की गई अन्य कालों का रिकॉर्ड कहां और किसके पास है? इतनी बड़ी संख्या में हथियार वहां कैसे पहुंचे? अनिता उदया को ख़ुफिया रूप से अमरीका क्यों ले जाया गया और हाल ही में हुए नए रहस्योदघाटन की क्या हेडली एफबीआई का एजेंट है, इन प्रश्नों का उत्तर मुर्दा घर में पड़ी वह 9 आतंकवादी लाशें देंगी या एक जीवित बचा आतंकवादी?
कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस तरह हम बटला हाऊस का सच सामने नहीं लाना चाहते, कोई सीबीआई जांच या न्यायिक जांच नहीं करना चाहते, क्योंकि उससे जो नतीजे सामने आ सकते हैं उससे हमारी पुलिस के उत्साह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, क्या उसी तरह 26/11 के 10 आतंकवादियों के बाद हम किसी 11वें आतंकवादी की तरफ इसलिए उंगली नहीं उठाना चाहते कि................
बात जारी रहेगी, प्रतीक्षा कीजिए 26/11 पर लेखों के नए सिलसिले का और तब तक नज़र डालिए हमारे प्रकाशित लेखों के बाद होने वाले रहस्योदघाटनों पर, क्या यह सब लगभग वही तो नहीं हैं, जिसका इशारा हमने 26/11 के तुरंत बाद अपने लेखों में कर दिया था।
रिसर्च सिद्ध करेगी ‘‘वन्दे मातरम्’’ पर सवाल कितने सही कितने ग़लत
‘‘वन्दे मातरम्’’ के संबंध से हमारी रिसर्च में अभी इतना कुछ बाक़ी है कि इस चर्चा को किसी परिणाम तक पहुंचाया जासके और फिर भारत सरकार और देशभक्त हमारे भारतवासियों से निवेदन किया जासके कि इन सभी तथ्यों की रोशनी में ज़रा ध्यान दें ‘‘वन्दे मातरम्’’ और ‘‘वन्दे मातरम्’’ पर उठने वाले सवालों पर कि यह सही हैं या ग़लत।
हिन्दुस्तान से बाहर रह कर भी यह सिलसिला इसी प्रकार जारी रह सकता है, परन्तु इस बीच ‘‘ईद-ए-क़ुरबां’’ भी है, जो आपके लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है और हमारे लिए भी, इसलिए आज वाशिंगटन से पोर्ट ऑफ़ स्पेन के लिए रवाना होने से पहले मैं प्रो. मुशीरुल हसन का लेख जो मुल्क की पचासवीं वर्षगांठ पर लिखा गया ‘‘हिन्दू आस्थाऐं और मुसलमानों की शंकाएं’’ प्रकाशित करके पाठकों से निवेदन करना चाहूंगा कि मेरे इस लगातार लेख की आगामी कड़ी अब आप मेरी हिन्दुस्तान वापसी अर्थात् ‘‘ईद-उल-अज़हा’’ के बाद पढ़ सकेंगे, तब तक के लिए इजाज़त।
इस बात को छोड़ दें कि 15 अगस्त 1947 की आधी रात को हज़ारों स्वाधीनता सेनानियों का मिशन पूरा हुआ या नहीं, सबसे महत्वपूर्ण चीज़ यूनियन जैक का उतरना था और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह था कि अब यह ध्वज दोबारा कभी उस लाल क़िले पर या भारत में अन्य स्थानों पर नहीं लहराएगा जहां यह 1857 से लहरा रहा था। अब तिरंगे को यह अवसर मिला था कि वह आसमानों की ऊँचाइयों पर लहराए। यह ध्वज अब केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि सारे विश्व के लिए लोकतंत्र और स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया था।
इसीलिए लाल क़िले की ओर एक जनसमूह इसलिए उमड़ रहा था ताकि अपनी खोई हुई धरोहर को पुनः प्राप्त कर सके और एक नए सवेरे के आगमन का हमेशा-हमेशा जश्न मनाता रहे। यह जनसमूह उस समय ख़ुशियों में डूब गया जब उसने भारत के पहले प्रधानमंत्री की भावनाओं में डूबी हुई आवाज़ सुनी।
नौजवान लड़के लड़कियां अपनी स्कूली यूनिफ़ार्म पहने हुए एक ही आवाज़ में चाचा नेहरू ज़िंदा बाद, चाचा नेहरू ज़िंदा बाद के नारे लगा रहे थे। कुछ लोग मध्दिम सुरों में टैगोर का लिखा राष्ट्रगान गा रहे थे। ध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय चिन्ह तीन ऐसे प्रतीक हैं जिनके द्वारा कोई भी स्वतंत्र देश अपनी पहचान और सार्वभौमिकता प्रकट करता है और इन्हीं तीनों से जुड़ कर वफ़ादारी और सम्मान भी प्रकट किया जाता है।
इन तीनों प्रतीकों में राष्ट्र की पृष्ठ भूमि, सोच और संस्कृति छुपे होते हैं। आज जबकि देश अपने लोकतंत्र के 50 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा है ऐसे में एक विवाद सामने है जो राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीकों के कारण नहीं बल्कि ‘वंदे मातरम्’ को गाए जाने से पैदा हुआ है। हाल ही में जो कुछ लखनऊ में हुआ वह ज़ाहिर में एक साधारण घटना है, लेकिन यह हमारे समाज में मौजूद विवाद की द्योतक है।
लेकिन जो बात एक चिन्तनीय के क्षण की सी हैसियत रखती है वह यह है कि बहुत आसानी के साथ वामपंथी आवाज़ों को दबा कर इतिहास को दोबारा लिखने का काम बड़े पैमाने पर आरंभ कर दिया गया है। इसी तरह यह बात भी चिंतित करती है कि गुजरात की सरकार यह क़ानून पास करने में सफल हो जाती है कि आर॰एस॰एस॰ के लोगों को सरकारी नौकरियों में लिया जा सकता है, और हमारे विशाल हृदय और मध्यम मार्गी प्रधानमंत्री इस पर स्वीकारोक्ति की मुहर लगा देते हैं।
एक ऐसी पार्टी जिसको संसद में स्पष्ट बहुमत भी प्राप्त नहीं है क़ानून में संशोधन करके ताबूत में अंतिम कील जड़ देती है। एनडीए और बीजेपी में शामिल पूर्व समाजवादी नेतागण इससे अंजान नज़र आते हैं कि उनके चेम्बरों और बंगलों के बाहर क्या हो रहा है और देश में पुराने धार्मिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विवादों पर कुश्ती होती रहती है।
कोटि धन्यवाद कि हमारे देश में एक ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति है जिसने हमारे संविधान की रक्षा के लिए असीम साहस और ज़बरदस्त हिम्मत का प्रदर्शन करते हुए स्वयं को इसका रक्षक साबित किया है। आशा की एक यही किरण शेष है कि हम उसकी ओर बेहतरीन राय और नेतृत्व के लिए रुख़ कर सकते हैं।
मैं बंकिम चंद्र चटर्जी के द्वारा लिखे गए गीत वंदे मातरम् की तरफ़ फिर वापस आता हूं। इस गीत के कारण 1930 के दशक में कई बार बहुत लम्बे धार्मिक वाद-विवाद हो चुके हैं। जब 1937 में कांगे्रस ने सत्ता की ओर बढ़ना शुरू किया तो उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत से स्कूलों में वंदे मातरम् गाया जाना अनिवार्य क़रार दे दिया गया, मुस्लिम लीग ने इस मामले में बग़ैर सोचे-समझे विरोध करना शुरू कर दिया ताकि मंत्रालयों के द्वारा किए जा रहे अनुचित कामों को चिन्हित करके उनकी साख को हानि पहुंचाई जा सके।
उदाहरणतः हिन्दी के सम्मान में वृद्धि करते हुए उर्दू का विरोध करने, मुसलमानों को सरकारी नौकरियां न दिए जाने, वर्धा व विद्या मंदिर कार्यक्रमों के लागू करने और परम्परागत इस्लामी मदरसों में दी जाने वाली परम्परागत शिक्षा के बारे में वह पहले से आवाज़ उठा रही थी।
इन बातों के कारण हिन्दू-मुस्लिम विवाद में लगातार उबाल आ रहा था और दोनों के बीच मोर्चा बंदी के लिए ज़मीन तैयार हो रही थी। वैसे साधारणतः देखा जाए तो कांगे्रस इस बात के पक्ष में थी कि विवादित मुद्दों को ब्रिटिश सामराज के विरुद्ध चल रहे संघर्ष से अलग रखा जाए। लेकिन जब वंदे मातरम् का प्रश्न उठा तो कुछ लोगों ने कहा कि यह स्वाधीनता संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। इस बात में कोई सच्चाई हो या ना हो कि इस गीत पर बहस की जा सकती है लेकिन इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं कि इस गीत ने ऐसे हज़ारों लोगों को राष्ट्र प्रेम की प्रेरणा दी जिनमें से अधिकतर वह बंगाली हिंदू थे जिन्होंने 1905 में बंगाल के विभाजन के समय विरोध प्रकट किया था।
टैगोर ने इस तराने के पहले भाग की धुन बनाई थी और कांगे्रस के कलकत्ता अधिवेषण में इसे गाया भी था। जिससे इस बात का अंदाज़ा होता है कि वंदे मातरम् की अपनी एक अलग पहचान बन गई थी और उसका अपना एक महत्व भी था, हालांकि टैगोर ने इस बात को स्वीकार किया था कि अगर इस गीत को उसके मूल अर्थों के साथ गाया जाए तो इससे मुसलमानों की भावनाएं आहत होंगी। वह एक ऐसे हिन्दू गीत की बात कर रहे थे जिसमें उन हिन्दू आस्थाओं का चित्रण था जिसके अनुसार देश को एक देवी कहा गया था।
अगर आज अल्प संख्यक वर्ग के लोग इस गान के अर्थ व भावार्थ पर सवाल उठा रहे हैं तो मुझे नहीं लगता कि इन व्यक्तियों के संदेहों और शंकाओं को पूरी तरह दरकिनार कर दिया जाना चाहिए। मेरे विचार में किसी धर्मनिर्पेक्ष देश को किसी भी कीमत पर इस बात का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता कि वह हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई छात्रों को उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई गाना गाने पर विवश करे। यही एक धर्मनिर्पेक्ष लोकतंत्र की मूल आत्मा है और अगर कोई गीत मुसलमानों के विरुद्ध हो तो?
हमको इस विषय पर लाठी-डंडे लेकर सामने आने की बजाए एक गंभीर बात-चीत शुरू करनी चाहिए। हमको चाहिए कि राजनीतिक पंडितों को लाल क़िले के साए में जमा करें जहां वह आरोप और प्रत्यारोप लगाने के बजाए अपने-अपने दृष्टिकोण को सामने रखें।
हमको इस मामले पर राष्ट्रीय स्तर पर जनमत बनाना है। जब हम इसमें सफल हो जाएंगे तब हम इन मामलों को हल करने की राह में भी आगे बढ़ सकते हैं जो समय-समय पर उठते रहते हैं। इस वाद-विवाद के बीच या तो हमको यह मालूम होगा कि हमारे सामने मुसलमानों की शंकाओं को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया था या फिर वंदे मातरम् को जबरन थोपने वाले समझा लेंगे कि किसी के गले में कोई गीत ज़बरदस्ती थोपना संविधान के पूरी तरह विरुद्ध है। इससे पहले कि हम एक खुली बात-चीत पर सहमत हों हम को चाहिए कि हम इस राष्ट्रीय कविता का वह अनुवाद पढ़ लें जो अरबिंदो घोष ने किया है क्यूंकि अज्ञान में हमेशा भलाई नहीं होती है।................................
वतन एक ही है
हिन्दू मुस्लिम हों चाहे दो पै1 वतन एक ही है
दोनों के वास्ते डायर की भी गन एक ही है
एक ही मां के हैं आग़ोश2 में बैठे दोनों
सर पै दोनों के मियां चर्ख़े कुहन3 एक ही है
एक ही ख़ाक से पैदा हुए हिन्दू मुस्लिम
एक ही सब की ख़ुशी रंजो महन4 एक ही है
लुत्फ़ दिखलाया है आपस की मुहब्बत ने यह क्या
शेर दो रहते हैं मिल-जुल के गो5 बन एक ही है
गांधी वादी, अली भाई, लाल, मालविया,
लाल सदहा6 है मगर मुल्के अमन एक ही है
कोई क़ुमरी7,कोई बुलबुल, कोई कोयल हो भले
मरने जीने को वले8 सबके चमन एक ही है
दम घुटा जाता है फरयाद भी कर सकते नहीं
लाख शिकवे हैं मगर आहे दहन9 एक ही है
मुख़्तलिफ रंगे मज़ामीं हों मुसाफ़िर चाहे।
तेरा हर हाल में पर तर्ज़े सुख़न10 एक ही है
‘‘स्वराज्य गीतांजली’’ किताब से माख़ूज़
1. पै-पर/लेकिन 2.आगोश-गोद 3.चर्खे कुहन-प्राचीन आकाश4. रंजो महन-दुख 5.गो-यद्यपि 6.सदहा-सैकड़ो 7. कुमारी-एक पक्षी कानाम 8.वले-लेकिन 9. ओह दहन-मुंह से निकलने वाली आह 10.लेकिनतर्ज़े सुखन-शैली
हिन्दुस्तान से बाहर रह कर भी यह सिलसिला इसी प्रकार जारी रह सकता है, परन्तु इस बीच ‘‘ईद-ए-क़ुरबां’’ भी है, जो आपके लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है और हमारे लिए भी, इसलिए आज वाशिंगटन से पोर्ट ऑफ़ स्पेन के लिए रवाना होने से पहले मैं प्रो. मुशीरुल हसन का लेख जो मुल्क की पचासवीं वर्षगांठ पर लिखा गया ‘‘हिन्दू आस्थाऐं और मुसलमानों की शंकाएं’’ प्रकाशित करके पाठकों से निवेदन करना चाहूंगा कि मेरे इस लगातार लेख की आगामी कड़ी अब आप मेरी हिन्दुस्तान वापसी अर्थात् ‘‘ईद-उल-अज़हा’’ के बाद पढ़ सकेंगे, तब तक के लिए इजाज़त।
इस बात को छोड़ दें कि 15 अगस्त 1947 की आधी रात को हज़ारों स्वाधीनता सेनानियों का मिशन पूरा हुआ या नहीं, सबसे महत्वपूर्ण चीज़ यूनियन जैक का उतरना था और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह था कि अब यह ध्वज दोबारा कभी उस लाल क़िले पर या भारत में अन्य स्थानों पर नहीं लहराएगा जहां यह 1857 से लहरा रहा था। अब तिरंगे को यह अवसर मिला था कि वह आसमानों की ऊँचाइयों पर लहराए। यह ध्वज अब केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि सारे विश्व के लिए लोकतंत्र और स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया था।
इसीलिए लाल क़िले की ओर एक जनसमूह इसलिए उमड़ रहा था ताकि अपनी खोई हुई धरोहर को पुनः प्राप्त कर सके और एक नए सवेरे के आगमन का हमेशा-हमेशा जश्न मनाता रहे। यह जनसमूह उस समय ख़ुशियों में डूब गया जब उसने भारत के पहले प्रधानमंत्री की भावनाओं में डूबी हुई आवाज़ सुनी।
नौजवान लड़के लड़कियां अपनी स्कूली यूनिफ़ार्म पहने हुए एक ही आवाज़ में चाचा नेहरू ज़िंदा बाद, चाचा नेहरू ज़िंदा बाद के नारे लगा रहे थे। कुछ लोग मध्दिम सुरों में टैगोर का लिखा राष्ट्रगान गा रहे थे। ध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय चिन्ह तीन ऐसे प्रतीक हैं जिनके द्वारा कोई भी स्वतंत्र देश अपनी पहचान और सार्वभौमिकता प्रकट करता है और इन्हीं तीनों से जुड़ कर वफ़ादारी और सम्मान भी प्रकट किया जाता है।
इन तीनों प्रतीकों में राष्ट्र की पृष्ठ भूमि, सोच और संस्कृति छुपे होते हैं। आज जबकि देश अपने लोकतंत्र के 50 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा है ऐसे में एक विवाद सामने है जो राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीकों के कारण नहीं बल्कि ‘वंदे मातरम्’ को गाए जाने से पैदा हुआ है। हाल ही में जो कुछ लखनऊ में हुआ वह ज़ाहिर में एक साधारण घटना है, लेकिन यह हमारे समाज में मौजूद विवाद की द्योतक है।
लेकिन जो बात एक चिन्तनीय के क्षण की सी हैसियत रखती है वह यह है कि बहुत आसानी के साथ वामपंथी आवाज़ों को दबा कर इतिहास को दोबारा लिखने का काम बड़े पैमाने पर आरंभ कर दिया गया है। इसी तरह यह बात भी चिंतित करती है कि गुजरात की सरकार यह क़ानून पास करने में सफल हो जाती है कि आर॰एस॰एस॰ के लोगों को सरकारी नौकरियों में लिया जा सकता है, और हमारे विशाल हृदय और मध्यम मार्गी प्रधानमंत्री इस पर स्वीकारोक्ति की मुहर लगा देते हैं।
एक ऐसी पार्टी जिसको संसद में स्पष्ट बहुमत भी प्राप्त नहीं है क़ानून में संशोधन करके ताबूत में अंतिम कील जड़ देती है। एनडीए और बीजेपी में शामिल पूर्व समाजवादी नेतागण इससे अंजान नज़र आते हैं कि उनके चेम्बरों और बंगलों के बाहर क्या हो रहा है और देश में पुराने धार्मिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विवादों पर कुश्ती होती रहती है।
कोटि धन्यवाद कि हमारे देश में एक ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति है जिसने हमारे संविधान की रक्षा के लिए असीम साहस और ज़बरदस्त हिम्मत का प्रदर्शन करते हुए स्वयं को इसका रक्षक साबित किया है। आशा की एक यही किरण शेष है कि हम उसकी ओर बेहतरीन राय और नेतृत्व के लिए रुख़ कर सकते हैं।
मैं बंकिम चंद्र चटर्जी के द्वारा लिखे गए गीत वंदे मातरम् की तरफ़ फिर वापस आता हूं। इस गीत के कारण 1930 के दशक में कई बार बहुत लम्बे धार्मिक वाद-विवाद हो चुके हैं। जब 1937 में कांगे्रस ने सत्ता की ओर बढ़ना शुरू किया तो उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत से स्कूलों में वंदे मातरम् गाया जाना अनिवार्य क़रार दे दिया गया, मुस्लिम लीग ने इस मामले में बग़ैर सोचे-समझे विरोध करना शुरू कर दिया ताकि मंत्रालयों के द्वारा किए जा रहे अनुचित कामों को चिन्हित करके उनकी साख को हानि पहुंचाई जा सके।
उदाहरणतः हिन्दी के सम्मान में वृद्धि करते हुए उर्दू का विरोध करने, मुसलमानों को सरकारी नौकरियां न दिए जाने, वर्धा व विद्या मंदिर कार्यक्रमों के लागू करने और परम्परागत इस्लामी मदरसों में दी जाने वाली परम्परागत शिक्षा के बारे में वह पहले से आवाज़ उठा रही थी।
इन बातों के कारण हिन्दू-मुस्लिम विवाद में लगातार उबाल आ रहा था और दोनों के बीच मोर्चा बंदी के लिए ज़मीन तैयार हो रही थी। वैसे साधारणतः देखा जाए तो कांगे्रस इस बात के पक्ष में थी कि विवादित मुद्दों को ब्रिटिश सामराज के विरुद्ध चल रहे संघर्ष से अलग रखा जाए। लेकिन जब वंदे मातरम् का प्रश्न उठा तो कुछ लोगों ने कहा कि यह स्वाधीनता संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। इस बात में कोई सच्चाई हो या ना हो कि इस गीत पर बहस की जा सकती है लेकिन इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं कि इस गीत ने ऐसे हज़ारों लोगों को राष्ट्र प्रेम की प्रेरणा दी जिनमें से अधिकतर वह बंगाली हिंदू थे जिन्होंने 1905 में बंगाल के विभाजन के समय विरोध प्रकट किया था।
टैगोर ने इस तराने के पहले भाग की धुन बनाई थी और कांगे्रस के कलकत्ता अधिवेषण में इसे गाया भी था। जिससे इस बात का अंदाज़ा होता है कि वंदे मातरम् की अपनी एक अलग पहचान बन गई थी और उसका अपना एक महत्व भी था, हालांकि टैगोर ने इस बात को स्वीकार किया था कि अगर इस गीत को उसके मूल अर्थों के साथ गाया जाए तो इससे मुसलमानों की भावनाएं आहत होंगी। वह एक ऐसे हिन्दू गीत की बात कर रहे थे जिसमें उन हिन्दू आस्थाओं का चित्रण था जिसके अनुसार देश को एक देवी कहा गया था।
अगर आज अल्प संख्यक वर्ग के लोग इस गान के अर्थ व भावार्थ पर सवाल उठा रहे हैं तो मुझे नहीं लगता कि इन व्यक्तियों के संदेहों और शंकाओं को पूरी तरह दरकिनार कर दिया जाना चाहिए। मेरे विचार में किसी धर्मनिर्पेक्ष देश को किसी भी कीमत पर इस बात का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता कि वह हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई छात्रों को उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई गाना गाने पर विवश करे। यही एक धर्मनिर्पेक्ष लोकतंत्र की मूल आत्मा है और अगर कोई गीत मुसलमानों के विरुद्ध हो तो?
हमको इस विषय पर लाठी-डंडे लेकर सामने आने की बजाए एक गंभीर बात-चीत शुरू करनी चाहिए। हमको चाहिए कि राजनीतिक पंडितों को लाल क़िले के साए में जमा करें जहां वह आरोप और प्रत्यारोप लगाने के बजाए अपने-अपने दृष्टिकोण को सामने रखें।
हमको इस मामले पर राष्ट्रीय स्तर पर जनमत बनाना है। जब हम इसमें सफल हो जाएंगे तब हम इन मामलों को हल करने की राह में भी आगे बढ़ सकते हैं जो समय-समय पर उठते रहते हैं। इस वाद-विवाद के बीच या तो हमको यह मालूम होगा कि हमारे सामने मुसलमानों की शंकाओं को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया था या फिर वंदे मातरम् को जबरन थोपने वाले समझा लेंगे कि किसी के गले में कोई गीत ज़बरदस्ती थोपना संविधान के पूरी तरह विरुद्ध है। इससे पहले कि हम एक खुली बात-चीत पर सहमत हों हम को चाहिए कि हम इस राष्ट्रीय कविता का वह अनुवाद पढ़ लें जो अरबिंदो घोष ने किया है क्यूंकि अज्ञान में हमेशा भलाई नहीं होती है।................................
वतन एक ही है
हिन्दू मुस्लिम हों चाहे दो पै1 वतन एक ही है
दोनों के वास्ते डायर की भी गन एक ही है
एक ही मां के हैं आग़ोश2 में बैठे दोनों
सर पै दोनों के मियां चर्ख़े कुहन3 एक ही है
एक ही ख़ाक से पैदा हुए हिन्दू मुस्लिम
एक ही सब की ख़ुशी रंजो महन4 एक ही है
लुत्फ़ दिखलाया है आपस की मुहब्बत ने यह क्या
शेर दो रहते हैं मिल-जुल के गो5 बन एक ही है
गांधी वादी, अली भाई, लाल, मालविया,
लाल सदहा6 है मगर मुल्के अमन एक ही है
कोई क़ुमरी7,कोई बुलबुल, कोई कोयल हो भले
मरने जीने को वले8 सबके चमन एक ही है
दम घुटा जाता है फरयाद भी कर सकते नहीं
लाख शिकवे हैं मगर आहे दहन9 एक ही है
मुख़्तलिफ रंगे मज़ामीं हों मुसाफ़िर चाहे।
तेरा हर हाल में पर तर्ज़े सुख़न10 एक ही है
‘‘स्वराज्य गीतांजली’’ किताब से माख़ूज़
1. पै-पर/लेकिन 2.आगोश-गोद 3.चर्खे कुहन-प्राचीन आकाश4. रंजो महन-दुख 5.गो-यद्यपि 6.सदहा-सैकड़ो 7. कुमारी-एक पक्षी कानाम 8.वले-लेकिन 9. ओह दहन-मुंह से निकलने वाली आह 10.लेकिनतर्ज़े सुखन-शैली
Thursday, November 26, 2009
कितना सेकुलर है वंदे मातरम्?
26 नवम्बर अर्थात् भारत के इतिहास का वह अशुभ दिन जब हमें एक आतंकवादी हमले का सामना करना पड़ा। 26 नवम्बर अर्थात् भारत के इतिहास का वह अशुभ दिन जब हमें अपने ऐसे जांबाज़ पुलिस अधिकारी को खोना पड़ा जो अपनी जान की परवाह किए बिना आतंकवादी गतिविधियों के सच को सामने रखने का प्रयास कर रहा था। 26 नवम्बर भारत के इतिहास का वह अर्थपूर्ण दिन जहां तमाम सुविधाओं के बावजूद हम अभी तक ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में असफल हैं जो प्रश्न शहीद हेमंत करकरे की विधवा कविता करकरे अर्थात् भाभी मां ने उठाए हैं। निःसंदेह अभी तक के प्रमाणों के आधार पर पाकिस्तान इन हमलों के लिए ज़िम्मेदार है, मगर श्रीमति कविता करकरे के बुलट प्रूफ़ जेकेट के मामले में उठाए गए प्रश्नों का उत्तर पाकिस्तान सरकार से तो नहीं मांगा जा सकता।
विचित्र संयोग है कि पिछले वर्ष 25-26 नवम्बर को मैं भारत में नहीं था और इस बार भी 25-26 नवम्बर को मैं भारत में नहीं हूं। उस समय हुए इस आतंकवादी हमले पर मैंने पहला लेख विदेश से ही लिखा था और इस बार भी स्थिति यही है। व्हाइट हाउस में भारत के प्रधानमंत्री डा॰ मनमोहन सिंह को दिए गए शानदार स्वागत भोज के आयोजन के बीच अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भाषण में भी 26/11 अर्थात् मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमलों का उल्लेख था। क्या हम उनका धन्यवाद करें कि वह हमारे दुख में बराबर के शरीक हैं? क्या हम उनके भाषण में इस उल्लेख को उनकी राजनीतिक रणनीति समझें?
क्या हम इस आतंकवादी हमले का उल्लेख करते हुए 9/11 की पृष्ठ भूमि और उसके बाद की स्थितियों की ओर भारत को संकेत देने का प्रयास समझें? अभी विस्तार से इस विषय पर लिखा जाना कठिन होगा, हां मगर इन्शाअल्लाह भारत वापसी के बाद, इस विदेशी धरती पर बीते एक-एक क्षण को लिखने का प्रयास किया जाएगा। एक बार फिर उन तमाम भाषणों के सार का अध्ययन किया जाएगा जो हमारे प्रधानमंत्री या विदेशी राष्ट्राध्यक्षों द्वारा दिये गये, इसलिए कि उनका संबंध हमारी क़ौम के भविष्य से है, हमारे देश के भविष्य से है। बात वंदे मातरम् की जारी थी, जारी है और अभी इसे जारी रखने की आवश्यकता भी है।
सिलसिला रोक दिया तो कुछ दिनों में हम सब कुछ भूल जाएंगे, जो तूफान उठा इस प्रश्न पर वह भी, जो पुतले जलाए गए पवित्र, धार्मिक शिक्षा संस्थान दारुल उलूम के वह भी, और जब कुछ वर्ष बीत जाएंगे तो मुसलमानों को अपमानित करने के लिए इस्लाम दुशमन शक्तियों के हाथ में फिर यह हथियार होगा, अतः बावजूद इसके कि मैं स्विटज़रलैंड, अमरीका, पोर्ट ऑफ़ स्पेन, ट्रीनीडाड, टोबेको की यात्रा पर हूं और लेखों के इस सिलसिले को जारी रखने के लिए मुझे आधी रात, अर्थात् रात के लग भग 3 बजे इस कॉलम के अंतर्गत छपने वाले लेखों को अंतिम रूप देना होता है, मगर मैं महसूस करता हूं कि यदि किसी परिणाम पर पहुंचे बगैर यह सिलसिला टूट गया तो सम्भवतः फिर यह स्वीकार किया जाता रहेगा कि मुसलमानों की आपत्ति अकारण थी उनके पास अपने प्रश्नों को उठाने के लिए कोई ठोस दलील नहीं थी, अतः मैं आवश्यक समझता हूं कि न केवल यह कि सिलसिला जारी रहे बल्कि किसी परिणाम पर भी पहुंचे।
मेरे ई-मेल और मेरे ब्लॉग पर, टेलीफोन द्वारा और फैक्स द्वारा भी लोगों की भावनाएं मुझ तक पहुंच रही हैं, इसमें एक विचार का मैं विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगा, मुहम्मद उबैदुल्ला का। मेरा उनसे निवेदन है कि वह लेख निःसंदेह मेरे कॉलम के अंतर्गत प्रकाशित किया गया, मगर इस बीच मैं विभिन्न दृष्टिकोणों पर आधारित लेख प्रकाशित कर रहा हूं, ताकि वंदे मातरम् विवाद का हर पहलू सामने आ जाए, जैसे आज भी इस कालम के अंतर्गत मैं प्रो॰ ए॰ जी नूरानी का लेख प्रकाशित कर रहा हूं, जो प्रसिद्ध विधिवेता हैं और जिन्होंने वैधानिक दृष्टिकोण से वंदे मातरम् के दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला है।
देखें प्रो॰ ए॰जी॰ नूरानी का लेख ‘‘कितना सेक्युलर है वंदे मातरम्’’?:
वंदे मातरम् को गाने की अनिवार्यता भारतीय संविधान की धारा 28 (1) और (3) के विपरीत है। पहली धारा में कहा गया है कि सरकारी धन से चलने वाले विद्यालयों को किसी भी तरह का धार्मिक निर्देश नहीं दिया जा सकता। दूसरी धारा में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति जो इस तरह के विद्यालयों में अध्ययन करता है, वह उस संस्थान के परिसर में आयोजित किसी धार्मिक प्रार्थना में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं है।संविधान में दिया गया यह प्रावधान पूरी तरह स्पष्ट है। सुप्रीम कोर्ट भी यह व्यवस्था दे चुका है कि किसी भी व्यक्ति को राष्ट्र गान गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
स्वाभाविक रूप से, यह बात राष्ट्रीय गीत पर भी लागू होती है। भाजपा के लोग कहते हैं कि वंदे मातरम् में किसी तरह का धार्मिक अंश नहीं है। यह पूरी तरह असत्य है। यदि ऐसा न होता तो 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति को यह बयान न देना पड़ता- समिति इस गीत के कुछ हिस्सों के प्रति मुसलमान दोस्तों की तरफ से उठाई गई आपत्तियों को महसूस करती है।’ कार्यसमिति ने कहा था कि वंदे मातरम् के सिर्फ दो शुरूआती अंतरे ही गाए जाने चाहिएं। जिस गीत को काट-छांट कर गानापड़े वह सर्वत्र स्वीकार्यता की आशा नहीं कर सकता।
अपनी पुस्तक ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ एन अननोन इंडियन’ में नीरद सी चैधरी ने वंदे मातरम् के लिखे जाने की परिस्थितियों का बहुत सटीक विवरण दिया है, “बंकिम चंद्र चटर्जी ओर रमेश चंद्र की ऐतिहासिक रचनाओं मुस्लिम शासन के विरुद्ध हिन्दू बग़ावत को महिमामंडित किया गया है और मुसलमानों को बड़े अनुचित ढंग से पेश किया गया है। बंकिम चंद्र असंदिग्ध रूप से और बहुत प्रखरता के साथ मुस्लिम विरोधी थे।” इतिहासकार आरसी मजूमदार ने लिखा है कि 1905 से 1947 तक वंदे मातरम् भारत के देशभक्त सपूतों का युद्धघोष था और हजारों लोगों ने वंदे मातरम् का उच्चारण करते हुए ब्रिटिश पुलिस की यातनाएं सहते हुए प्राण त्याग दिए थे।
आनंद मठ की मूलभूत परिकल्पना उन सन्यासियों (जिन्हें सनातन कहा जाता था) या बच्चों पर केंद्रित है जिन्होंने अपने घर त्याग कर अपने जीवन को मातृभूमि के लिए समर्पित कर दिया था। ये लोग अपनी मातृभूमि को मां काली के रूप में पूजते थे। आनंद मठ के इस पहलू और मां काली की परिकल्पना को देखते हुए इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि बंकिम चंद्र का राष्ट्रवाद हिंदू राष्ट्रवाद था, भारतीय राष्ट्रवाद नहीं। उनकी अन्य रचनाओं में यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है जिनमें मुस्लिमों के हाथों भारत की पराधीनता को लेकर भावावेश में भरी आक्रामक टिप्पणियां की गई हैं। उसी दिन हमारे गौरव का सूर्य अस्त हो गया।
उनकी रचनाओं में मुसलमानों के प्रति नकारात्मक और कई बार अप्रासंगिक टिप्पणियां मिलती हैं। मजूमदार लिखते हैं कि ‘बंकिम चंद्र ने देशभक्ति को धर्म और धर्म को देशभक्ति के साथ मिला दिया था।
उनका उपन्यास आनंद मठ ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ भी नहीं था। उसके अंतिम अध्याय में कोई परामानवीय शक्ति सन्यासियों के नेता सत्यानंद को युद्ध रोकने के लिए समझाती हुई दिखाई गई है। दोनों के बीच होने वाली बातचीत काफी दिलचस्प हैःशक्तिः तुम्हारा कार्य संपन्न हो गया है। मुसलमानों की सत्ता का विनाश हो चुका है। अब तुम्हारे करने के लिए कुछ नहीं बचा। बेवजह की हत्याएं करने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।
सत्यानंदः मुस्लिम सत्ता जरूर नष्ट हो गई है लेकिन हिंदू साम्राज्य अभी तक स्थापित नहीं हुआ है। कलकत्ता पर अब भी ब्रिटिशों का क़ब्ज़ा है।
शक्तिः हिंदू साम्राज्य अभी स्थापित नहीं होगा। अगर तुम अपने काम में लगे रहे तो लोग बेवजह मारे जाएंगे। इसलिए मेरे साथ आओ।
सत्यानंद (दुख के साथ): हे भगवान, यदि हिंदू साम्राज्य की स्थापना नहीं होगी तो फिर कौन शासन करेगा? क्या मुस्लिम शासक लौट आएंगे?
शक्तिः नहीं, अब अंग्रेज़ शासन करेंगे।सत्यानंद विरोध करते हैं लेकिन परामानवीय शक्ति उन्हें हथियार डालने के लिए मना लेती है।
शक्तिः तुम्हारा प्रण पूरा हो चुका है। तुम अपनी मां के लिए समृद्धि ला चुके हो। तुमने एक ब्रिटिश सरकार की स्थापना करवा दी है। अब लड़ाई छोड़ दो। लोगों को अपने काम करने दो। धरती को फसलों से हरी-भरी होने दो और लोगों को धन-संपत्ति से समृद्ध होने दो।
सत्यानंद (रोते हुए): मैं अपनी मां को उसके शत्रुओं के रक्त से सींच कर उस पर समृद्धि की फसल उगाऊंगा।शक्तिः शत्रु कौन है? अब कोई शत्रु नहीं है। अंगे्रज तो दोस्त हैं और शासक भी। और उन्हें कोई हरा नहीं सकता।
सत्यानंदः अगर ऐसा है तो मैं मां की प्रतिमा के सामने स्वयं को समाप्त कर दूंगा।
शक्तिः नासमझी में? आओ और जानो। हिमालय में मां का एक मंदिर है। मैं तुम्हें वहां उसकी छवि दिखाऊंगा।ऐसा कहकर उसने सत्यानंद का हाथ पकड़ लिया।
पूरे उपन्यास में मुस्लिम विरोधी अंश बहुतायत से मौजूद हैं। जीवानंद जब हाथ में तलवार लिए हुए मंदिर के द्वार पर खड़ा है और मां काली के भक्तों का आहवान करता है- हमने कई बार मुस्लिम शासन के घोंसले को तोड़ने और इन हमलावरों को खींच कर नदी में फेंक देने और भस्मीभूत कर भूमि मां को मुक्त कराने की बात सोची है। मित्रो, अब वह दिन आ गया है। जब भावानंद महेंद्र को आनंद मठ ले जाकर संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रेरित करता है तब उसे पहले काली की प्रतिमा के सामने और फिर दुर्गा की प्रतिमा के सामने ले जाया जाता है और ‘वंदे मातरम्’ का उच्चारण करने को कहा जाता है।
उपन्यास के एक अन्य दृश्य में कुछ लोग ‘मुसलमानों को मार दो-मार दो’ के नारे लगाते हुए दिखाए गए हैं। उसी समय कुछ और लोग ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगा रहे हैं और कुछ कह रहे हैं कि ‘क्या वह दिन कभी आएगा जब हम उनकी मस्जिदें तोड़कर उनके स्थान पर मंदिरों का निर्माण कर सकेंगे?’
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हिन्दोस्तां
न कौस से ग़रज़ है, न मतलब अज़ां से है
मुझ को अगर है इश्क़ तो हिन्दोस्तां से है
तहज़ीबे हिन्द का नहीं चश्मा2 अगर अज़ल3
यह मौजे रंग रंग फिर आई कहां से है
ज़र्रे में गर तड़प है तो इस ख़ाके पाक से
सूरज में रोशनी है तो इस आसमां से है
है इस के दम से गरमी-ए-हंगाम-ए- जहां4
मग़रिब5 की सारी रोनक इसी एक दुकां से है
मौलाना ज़फ़र अली ख़ां1.घण्टा, 2.ज़रिया, 3.क़ुदरत, 4.दुनिया की उथल पुथल, 5. पश्चिम
विचित्र संयोग है कि पिछले वर्ष 25-26 नवम्बर को मैं भारत में नहीं था और इस बार भी 25-26 नवम्बर को मैं भारत में नहीं हूं। उस समय हुए इस आतंकवादी हमले पर मैंने पहला लेख विदेश से ही लिखा था और इस बार भी स्थिति यही है। व्हाइट हाउस में भारत के प्रधानमंत्री डा॰ मनमोहन सिंह को दिए गए शानदार स्वागत भोज के आयोजन के बीच अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भाषण में भी 26/11 अर्थात् मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमलों का उल्लेख था। क्या हम उनका धन्यवाद करें कि वह हमारे दुख में बराबर के शरीक हैं? क्या हम उनके भाषण में इस उल्लेख को उनकी राजनीतिक रणनीति समझें?
क्या हम इस आतंकवादी हमले का उल्लेख करते हुए 9/11 की पृष्ठ भूमि और उसके बाद की स्थितियों की ओर भारत को संकेत देने का प्रयास समझें? अभी विस्तार से इस विषय पर लिखा जाना कठिन होगा, हां मगर इन्शाअल्लाह भारत वापसी के बाद, इस विदेशी धरती पर बीते एक-एक क्षण को लिखने का प्रयास किया जाएगा। एक बार फिर उन तमाम भाषणों के सार का अध्ययन किया जाएगा जो हमारे प्रधानमंत्री या विदेशी राष्ट्राध्यक्षों द्वारा दिये गये, इसलिए कि उनका संबंध हमारी क़ौम के भविष्य से है, हमारे देश के भविष्य से है। बात वंदे मातरम् की जारी थी, जारी है और अभी इसे जारी रखने की आवश्यकता भी है।
सिलसिला रोक दिया तो कुछ दिनों में हम सब कुछ भूल जाएंगे, जो तूफान उठा इस प्रश्न पर वह भी, जो पुतले जलाए गए पवित्र, धार्मिक शिक्षा संस्थान दारुल उलूम के वह भी, और जब कुछ वर्ष बीत जाएंगे तो मुसलमानों को अपमानित करने के लिए इस्लाम दुशमन शक्तियों के हाथ में फिर यह हथियार होगा, अतः बावजूद इसके कि मैं स्विटज़रलैंड, अमरीका, पोर्ट ऑफ़ स्पेन, ट्रीनीडाड, टोबेको की यात्रा पर हूं और लेखों के इस सिलसिले को जारी रखने के लिए मुझे आधी रात, अर्थात् रात के लग भग 3 बजे इस कॉलम के अंतर्गत छपने वाले लेखों को अंतिम रूप देना होता है, मगर मैं महसूस करता हूं कि यदि किसी परिणाम पर पहुंचे बगैर यह सिलसिला टूट गया तो सम्भवतः फिर यह स्वीकार किया जाता रहेगा कि मुसलमानों की आपत्ति अकारण थी उनके पास अपने प्रश्नों को उठाने के लिए कोई ठोस दलील नहीं थी, अतः मैं आवश्यक समझता हूं कि न केवल यह कि सिलसिला जारी रहे बल्कि किसी परिणाम पर भी पहुंचे।
मेरे ई-मेल और मेरे ब्लॉग पर, टेलीफोन द्वारा और फैक्स द्वारा भी लोगों की भावनाएं मुझ तक पहुंच रही हैं, इसमें एक विचार का मैं विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगा, मुहम्मद उबैदुल्ला का। मेरा उनसे निवेदन है कि वह लेख निःसंदेह मेरे कॉलम के अंतर्गत प्रकाशित किया गया, मगर इस बीच मैं विभिन्न दृष्टिकोणों पर आधारित लेख प्रकाशित कर रहा हूं, ताकि वंदे मातरम् विवाद का हर पहलू सामने आ जाए, जैसे आज भी इस कालम के अंतर्गत मैं प्रो॰ ए॰ जी नूरानी का लेख प्रकाशित कर रहा हूं, जो प्रसिद्ध विधिवेता हैं और जिन्होंने वैधानिक दृष्टिकोण से वंदे मातरम् के दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला है।
देखें प्रो॰ ए॰जी॰ नूरानी का लेख ‘‘कितना सेक्युलर है वंदे मातरम्’’?:
वंदे मातरम् को गाने की अनिवार्यता भारतीय संविधान की धारा 28 (1) और (3) के विपरीत है। पहली धारा में कहा गया है कि सरकारी धन से चलने वाले विद्यालयों को किसी भी तरह का धार्मिक निर्देश नहीं दिया जा सकता। दूसरी धारा में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति जो इस तरह के विद्यालयों में अध्ययन करता है, वह उस संस्थान के परिसर में आयोजित किसी धार्मिक प्रार्थना में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं है।संविधान में दिया गया यह प्रावधान पूरी तरह स्पष्ट है। सुप्रीम कोर्ट भी यह व्यवस्था दे चुका है कि किसी भी व्यक्ति को राष्ट्र गान गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
स्वाभाविक रूप से, यह बात राष्ट्रीय गीत पर भी लागू होती है। भाजपा के लोग कहते हैं कि वंदे मातरम् में किसी तरह का धार्मिक अंश नहीं है। यह पूरी तरह असत्य है। यदि ऐसा न होता तो 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति को यह बयान न देना पड़ता- समिति इस गीत के कुछ हिस्सों के प्रति मुसलमान दोस्तों की तरफ से उठाई गई आपत्तियों को महसूस करती है।’ कार्यसमिति ने कहा था कि वंदे मातरम् के सिर्फ दो शुरूआती अंतरे ही गाए जाने चाहिएं। जिस गीत को काट-छांट कर गानापड़े वह सर्वत्र स्वीकार्यता की आशा नहीं कर सकता।
अपनी पुस्तक ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ एन अननोन इंडियन’ में नीरद सी चैधरी ने वंदे मातरम् के लिखे जाने की परिस्थितियों का बहुत सटीक विवरण दिया है, “बंकिम चंद्र चटर्जी ओर रमेश चंद्र की ऐतिहासिक रचनाओं मुस्लिम शासन के विरुद्ध हिन्दू बग़ावत को महिमामंडित किया गया है और मुसलमानों को बड़े अनुचित ढंग से पेश किया गया है। बंकिम चंद्र असंदिग्ध रूप से और बहुत प्रखरता के साथ मुस्लिम विरोधी थे।” इतिहासकार आरसी मजूमदार ने लिखा है कि 1905 से 1947 तक वंदे मातरम् भारत के देशभक्त सपूतों का युद्धघोष था और हजारों लोगों ने वंदे मातरम् का उच्चारण करते हुए ब्रिटिश पुलिस की यातनाएं सहते हुए प्राण त्याग दिए थे।
आनंद मठ की मूलभूत परिकल्पना उन सन्यासियों (जिन्हें सनातन कहा जाता था) या बच्चों पर केंद्रित है जिन्होंने अपने घर त्याग कर अपने जीवन को मातृभूमि के लिए समर्पित कर दिया था। ये लोग अपनी मातृभूमि को मां काली के रूप में पूजते थे। आनंद मठ के इस पहलू और मां काली की परिकल्पना को देखते हुए इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि बंकिम चंद्र का राष्ट्रवाद हिंदू राष्ट्रवाद था, भारतीय राष्ट्रवाद नहीं। उनकी अन्य रचनाओं में यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है जिनमें मुस्लिमों के हाथों भारत की पराधीनता को लेकर भावावेश में भरी आक्रामक टिप्पणियां की गई हैं। उसी दिन हमारे गौरव का सूर्य अस्त हो गया।
उनकी रचनाओं में मुसलमानों के प्रति नकारात्मक और कई बार अप्रासंगिक टिप्पणियां मिलती हैं। मजूमदार लिखते हैं कि ‘बंकिम चंद्र ने देशभक्ति को धर्म और धर्म को देशभक्ति के साथ मिला दिया था।
उनका उपन्यास आनंद मठ ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ भी नहीं था। उसके अंतिम अध्याय में कोई परामानवीय शक्ति सन्यासियों के नेता सत्यानंद को युद्ध रोकने के लिए समझाती हुई दिखाई गई है। दोनों के बीच होने वाली बातचीत काफी दिलचस्प हैःशक्तिः तुम्हारा कार्य संपन्न हो गया है। मुसलमानों की सत्ता का विनाश हो चुका है। अब तुम्हारे करने के लिए कुछ नहीं बचा। बेवजह की हत्याएं करने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।
सत्यानंदः मुस्लिम सत्ता जरूर नष्ट हो गई है लेकिन हिंदू साम्राज्य अभी तक स्थापित नहीं हुआ है। कलकत्ता पर अब भी ब्रिटिशों का क़ब्ज़ा है।
शक्तिः हिंदू साम्राज्य अभी स्थापित नहीं होगा। अगर तुम अपने काम में लगे रहे तो लोग बेवजह मारे जाएंगे। इसलिए मेरे साथ आओ।
सत्यानंद (दुख के साथ): हे भगवान, यदि हिंदू साम्राज्य की स्थापना नहीं होगी तो फिर कौन शासन करेगा? क्या मुस्लिम शासक लौट आएंगे?
शक्तिः नहीं, अब अंग्रेज़ शासन करेंगे।सत्यानंद विरोध करते हैं लेकिन परामानवीय शक्ति उन्हें हथियार डालने के लिए मना लेती है।
शक्तिः तुम्हारा प्रण पूरा हो चुका है। तुम अपनी मां के लिए समृद्धि ला चुके हो। तुमने एक ब्रिटिश सरकार की स्थापना करवा दी है। अब लड़ाई छोड़ दो। लोगों को अपने काम करने दो। धरती को फसलों से हरी-भरी होने दो और लोगों को धन-संपत्ति से समृद्ध होने दो।
सत्यानंद (रोते हुए): मैं अपनी मां को उसके शत्रुओं के रक्त से सींच कर उस पर समृद्धि की फसल उगाऊंगा।शक्तिः शत्रु कौन है? अब कोई शत्रु नहीं है। अंगे्रज तो दोस्त हैं और शासक भी। और उन्हें कोई हरा नहीं सकता।
सत्यानंदः अगर ऐसा है तो मैं मां की प्रतिमा के सामने स्वयं को समाप्त कर दूंगा।
शक्तिः नासमझी में? आओ और जानो। हिमालय में मां का एक मंदिर है। मैं तुम्हें वहां उसकी छवि दिखाऊंगा।ऐसा कहकर उसने सत्यानंद का हाथ पकड़ लिया।
पूरे उपन्यास में मुस्लिम विरोधी अंश बहुतायत से मौजूद हैं। जीवानंद जब हाथ में तलवार लिए हुए मंदिर के द्वार पर खड़ा है और मां काली के भक्तों का आहवान करता है- हमने कई बार मुस्लिम शासन के घोंसले को तोड़ने और इन हमलावरों को खींच कर नदी में फेंक देने और भस्मीभूत कर भूमि मां को मुक्त कराने की बात सोची है। मित्रो, अब वह दिन आ गया है। जब भावानंद महेंद्र को आनंद मठ ले जाकर संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रेरित करता है तब उसे पहले काली की प्रतिमा के सामने और फिर दुर्गा की प्रतिमा के सामने ले जाया जाता है और ‘वंदे मातरम्’ का उच्चारण करने को कहा जाता है।
उपन्यास के एक अन्य दृश्य में कुछ लोग ‘मुसलमानों को मार दो-मार दो’ के नारे लगाते हुए दिखाए गए हैं। उसी समय कुछ और लोग ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगा रहे हैं और कुछ कह रहे हैं कि ‘क्या वह दिन कभी आएगा जब हम उनकी मस्जिदें तोड़कर उनके स्थान पर मंदिरों का निर्माण कर सकेंगे?’
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हिन्दोस्तां
न कौस से ग़रज़ है, न मतलब अज़ां से है
मुझ को अगर है इश्क़ तो हिन्दोस्तां से है
तहज़ीबे हिन्द का नहीं चश्मा2 अगर अज़ल3
यह मौजे रंग रंग फिर आई कहां से है
ज़र्रे में गर तड़प है तो इस ख़ाके पाक से
सूरज में रोशनी है तो इस आसमां से है
है इस के दम से गरमी-ए-हंगाम-ए- जहां4
मग़रिब5 की सारी रोनक इसी एक दुकां से है
मौलाना ज़फ़र अली ख़ां1.घण्टा, 2.ज़रिया, 3.क़ुदरत, 4.दुनिया की उथल पुथल, 5. पश्चिम
Tuesday, November 24, 2009
वन्दे मातरम् राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं है-2
पिछले का शेष............
लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद वह कांगे्रस और हिन्दू महा सभा दोनों में काम करते रहे। गांधी जी के अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लेकर ख़िलाफ़त आन्दोलन के वे आलोचक हो गए व पकड़े भी गए और 1922 में जेल से छूटे। नागपुर में 1923 के दंगों में उन्होंने डा॰ मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया। अगले साल सावरकर का ‘‘हिन्दुत्व’’ निकला जिसकी पाण्डुलिपि उनके पास भी थी। सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए ही हेडगेवार ने 1925 में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंमसेवक संघ की स्थापना की।
तब से वे निजी हैसियत में तो आज़ादी के आन्दोलन और राजनीति में रहे। लेकिन संघ को इन सबसे अलग रखा। सारा देश जब नमक सत्या गृह और सिविल नाफ़रमानी में कूद पड़ा तो हेडगेवार भी उसमें आए लेकिन राष्ट्रीय स्वयंमसेवक संघ की कमान परांजपे को सौंप गए। वह स्वयंसेवकों को उनकी निजी हैसियत में तो आज़ादी के आन्दोलन में भाग लेने देते थे लेकिन संघ को उनने सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधि में लगाया न अहिंसक असहयोग आन्दोलन में लगने दिया। संघ ऐसे समर्पित लोगों के चरित्र निर्माण का कार्य कर रहा था जो देश के लिए कुरबान हो जाएंगे। सावरकर ने तब चिढ़ कर बयान दिया था, ‘‘संघ के स्वयं सेवकों के समाधि लेख में लिखा होगा, वे जन्मा संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया।
हेडगेवार तो फिर भी क्रान्तिकारियों और असहयोग आन्दोलन कार्यों में रहे, दूसरे सर संचालक माधव सदाशिव गोलवलकर तो ऐसे हिन्दू राष्ट्र निष्ठ थे कि राष्ट्रीय आन्दोलन, क्रान्तिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश विरोध से उनने संघ और स्वयं सेवकों को बिल्कुल अलग कर लिया। वाल्टर एन्डरसन और श्रीधर दामले ने संघ पर जो पुस्तक ‘‘द ब्रदर हुड इन सेफराॅन’ लिखी है उसमें कहा है ‘‘गोलवलकर मानते थे के राष्ट्रीय स्वयंमसेवक संघ पर पाबंदी लगाने का कोई बहाना अंग्रेज़ों को न दिया जाए।’’ अंग्रेजों ने जब गैर सरकारी संगठनों में वर्दी पहनना और सैनिक क़वायद पर पाबंदी लगाई तो संघ ने इसे तत्काल स्वीकार किया। 29 अप्रैल 1943 को गोलवल्कर ने संघ के लोगों को एक दस्ती पत्र भेजा इसमें संघ की सैनिक शाखा बंद करने का आदेश था।
दस्ती पत्र की भाषा से पता चलता है कि संघ पर पाबंदी की उन्हें कितनी चिंता थी। ‘‘हमने सैनिक क़वायद और वर्दी पहनने पर पाबंदी जैसे सरकारी आदेश मान कर ऐसी सब गतिविधियों छोड़ दी हैं ताकि हमारा काम क़ानून के दायरे में रहे, जैसा कि क़ानून को मानने वाले हर संगठन को करना चाहिए। ऐसा हमने इस उम्मीद में किया कि हालात सुधर जाएंगे और हम फिर यह प्रशिक्षण देने लगेंगे। लेकिन अब हम तय कर रहे हैं कि वक़्त के बदलने का इंतिज़ार किए बिना यह गतिविधियां और यह विभाग ही समाप्त कर देंगे।’’ (यह वह दौर था जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रान्तिकारी अपने तरीक़े से संघर्ष कर रहे थे।) पारंपरिक अर्थों में गोलवलकर क्रान्तिकारी नहीं थे। अंग्रेज़ो ने इसे ठीक से समझ लिया था।1943 में संघ की गतिविधियों पर तैयार की गई एक सरकारी रिपोर्ट में गृह विभाग ने निष्कर्ष निकाला था कि संघ से विधि और व्यवस्था को कोई आसन्न संकट नहीं है।
1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में हुई हिंसा पर टिप्पणी करते हुए मुंम्बई के गृह विभाग ने कहा था ‘‘संघ ने बड़ी सावधानी से अपने को क़ानूनी दायरे में रखा है, ख़ासकर 1942 में जो हिंसक उपद्रव हुए हैं उनमें संघ ने बिल्कुल भाग नहीं लिया है।’’ हेडगेवार 1925 से 1940 तक सर संघ संचालक रहे और उनके बाद आज़ादी मिलने तक गोलवलकर रहे। इन 22 वर्षों में आज़ादी के आन्दोलन में संघ ने कोई योगदान या सहयोग नहीं किया। संघ परिवारियों के लिए संघ कार्य ही राष्ट्र सेवा और राष्ट्र भक्ति का सबसे बड़ा काम था। संघ का कार्य क्या है? हिन्दू राष्ट्र के लिए मर मिटने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवकों का संगठन बनाना, इन स्वंय सेवकों का चरित्र निर्माण करना उनमें राष्ट्र भक्ति को ही जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति मानने की परम आस्था बैठाना।
1947 में जब देश आज़ाद हुआ तो देश में कोई 7 हज़ार शाखाओं में 6 से 7 लाख स्वयं सेवक भाग ले रहे थे। आप पूछ सकते हैं कि एकनिष्ठ देश भक्त स्वयं सेवकों ने आज़ादी के आन्दोलन में क्या किया? अगर यह सशस्त्र क्रान्ति में विश्वास करते थे तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इनने कितने सशस्त्र उपद्रव किए, कितने अंगे्रज़ों को मारा और उनके कितने संस्थानों को नष्ट किया। कितने स्वयं सेवक अंगे्रज़ों की गोलियों से मरे और कितने वन्दे मातरम् कह कर फांसी पर झूल गए। हिन्दुत्व वादियों के हाथ से एक निहत्था अहिंसक गांधी ही मारा गया।
संघ और इन स्वयं सेवकों के लिए आज़ादी के आन्दोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के लिए संगठन बनाना और स्वयं सेवक तैयार करना था। संगठन को अंगे्रज़ों की पाबंदी से बचाना था। इनके लिए स्वतंत्र भारत राष्ट्र अंगे्रज़ों से आज़ाद कराया गया भारत नहीं था। इनका हिन्दू राष्ट्र तो कोई पाँच हज़ार साल से ही बना हुआ है। उसे पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेज़ों से मुक्त कराना है। मुसलमान हिन्दू राष्ट्र का दुशमन नं॰ 1 और अंग्रेज़ नं॰ 2 था। सिर्फ अंग्रेज़ों को बाहर करने से इनका हिन्दू राष्ट्र आज़ाद नहीं होता। मुसलमानों को भी या तो बाहर करना होगा या उनहें हिन्दू संस्कृति को मानना होगा। इसलिए अब उनका नारा है वंदे मातरम् गाना होगा, नहीं तो यहां से जाना होगा।
सवाल यह है कि जब आज़ादी का आन्दोलन संघ परिवारियों के लिए स्वैच्छिक था तो स्वतंत्र धर्म निर्पेक्ष लोकतांत्रिक भारत में वंदे मातरम् गाना स्वैच्छिक क्यूँ नहीं हो सकता? भारत ने हिन्दू राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया है। यह भारत संघियों का हिन्दू राष्ट्र नहीं है। वंदे मातरम् राष्ट्र गीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं है।..........................................
सरफ़रोशी की तमन्ना
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है ज़ोर कितना बाजू-ए-क़ातिल में है।।
रह रवे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में।
लज़्ज़ते सहरा नवरदी दूरिये मंज़िल में है।।
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आस्मां।
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।।
आके मक़तल में यह क़ातिल कह रहा है बार बार।
क्या तमन्नाये शहादत भी किसी के दिल में है।।
ऐ शहीदे मुल्को मिल्लत तेरे कदमों पर निसार।
तेरी क़ुरबानी का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।।
अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़।
एक मिट जाने की हसरत अब दिले बिस्मिल में है।।
असीर सियालकोटी
लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद वह कांगे्रस और हिन्दू महा सभा दोनों में काम करते रहे। गांधी जी के अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लेकर ख़िलाफ़त आन्दोलन के वे आलोचक हो गए व पकड़े भी गए और 1922 में जेल से छूटे। नागपुर में 1923 के दंगों में उन्होंने डा॰ मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया। अगले साल सावरकर का ‘‘हिन्दुत्व’’ निकला जिसकी पाण्डुलिपि उनके पास भी थी। सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए ही हेडगेवार ने 1925 में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंमसेवक संघ की स्थापना की।
तब से वे निजी हैसियत में तो आज़ादी के आन्दोलन और राजनीति में रहे। लेकिन संघ को इन सबसे अलग रखा। सारा देश जब नमक सत्या गृह और सिविल नाफ़रमानी में कूद पड़ा तो हेडगेवार भी उसमें आए लेकिन राष्ट्रीय स्वयंमसेवक संघ की कमान परांजपे को सौंप गए। वह स्वयंसेवकों को उनकी निजी हैसियत में तो आज़ादी के आन्दोलन में भाग लेने देते थे लेकिन संघ को उनने सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधि में लगाया न अहिंसक असहयोग आन्दोलन में लगने दिया। संघ ऐसे समर्पित लोगों के चरित्र निर्माण का कार्य कर रहा था जो देश के लिए कुरबान हो जाएंगे। सावरकर ने तब चिढ़ कर बयान दिया था, ‘‘संघ के स्वयं सेवकों के समाधि लेख में लिखा होगा, वे जन्मा संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया।
हेडगेवार तो फिर भी क्रान्तिकारियों और असहयोग आन्दोलन कार्यों में रहे, दूसरे सर संचालक माधव सदाशिव गोलवलकर तो ऐसे हिन्दू राष्ट्र निष्ठ थे कि राष्ट्रीय आन्दोलन, क्रान्तिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश विरोध से उनने संघ और स्वयं सेवकों को बिल्कुल अलग कर लिया। वाल्टर एन्डरसन और श्रीधर दामले ने संघ पर जो पुस्तक ‘‘द ब्रदर हुड इन सेफराॅन’ लिखी है उसमें कहा है ‘‘गोलवलकर मानते थे के राष्ट्रीय स्वयंमसेवक संघ पर पाबंदी लगाने का कोई बहाना अंग्रेज़ों को न दिया जाए।’’ अंग्रेजों ने जब गैर सरकारी संगठनों में वर्दी पहनना और सैनिक क़वायद पर पाबंदी लगाई तो संघ ने इसे तत्काल स्वीकार किया। 29 अप्रैल 1943 को गोलवल्कर ने संघ के लोगों को एक दस्ती पत्र भेजा इसमें संघ की सैनिक शाखा बंद करने का आदेश था।
दस्ती पत्र की भाषा से पता चलता है कि संघ पर पाबंदी की उन्हें कितनी चिंता थी। ‘‘हमने सैनिक क़वायद और वर्दी पहनने पर पाबंदी जैसे सरकारी आदेश मान कर ऐसी सब गतिविधियों छोड़ दी हैं ताकि हमारा काम क़ानून के दायरे में रहे, जैसा कि क़ानून को मानने वाले हर संगठन को करना चाहिए। ऐसा हमने इस उम्मीद में किया कि हालात सुधर जाएंगे और हम फिर यह प्रशिक्षण देने लगेंगे। लेकिन अब हम तय कर रहे हैं कि वक़्त के बदलने का इंतिज़ार किए बिना यह गतिविधियां और यह विभाग ही समाप्त कर देंगे।’’ (यह वह दौर था जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रान्तिकारी अपने तरीक़े से संघर्ष कर रहे थे।) पारंपरिक अर्थों में गोलवलकर क्रान्तिकारी नहीं थे। अंग्रेज़ो ने इसे ठीक से समझ लिया था।1943 में संघ की गतिविधियों पर तैयार की गई एक सरकारी रिपोर्ट में गृह विभाग ने निष्कर्ष निकाला था कि संघ से विधि और व्यवस्था को कोई आसन्न संकट नहीं है।
1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में हुई हिंसा पर टिप्पणी करते हुए मुंम्बई के गृह विभाग ने कहा था ‘‘संघ ने बड़ी सावधानी से अपने को क़ानूनी दायरे में रखा है, ख़ासकर 1942 में जो हिंसक उपद्रव हुए हैं उनमें संघ ने बिल्कुल भाग नहीं लिया है।’’ हेडगेवार 1925 से 1940 तक सर संघ संचालक रहे और उनके बाद आज़ादी मिलने तक गोलवलकर रहे। इन 22 वर्षों में आज़ादी के आन्दोलन में संघ ने कोई योगदान या सहयोग नहीं किया। संघ परिवारियों के लिए संघ कार्य ही राष्ट्र सेवा और राष्ट्र भक्ति का सबसे बड़ा काम था। संघ का कार्य क्या है? हिन्दू राष्ट्र के लिए मर मिटने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवकों का संगठन बनाना, इन स्वंय सेवकों का चरित्र निर्माण करना उनमें राष्ट्र भक्ति को ही जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति मानने की परम आस्था बैठाना।
1947 में जब देश आज़ाद हुआ तो देश में कोई 7 हज़ार शाखाओं में 6 से 7 लाख स्वयं सेवक भाग ले रहे थे। आप पूछ सकते हैं कि एकनिष्ठ देश भक्त स्वयं सेवकों ने आज़ादी के आन्दोलन में क्या किया? अगर यह सशस्त्र क्रान्ति में विश्वास करते थे तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इनने कितने सशस्त्र उपद्रव किए, कितने अंगे्रज़ों को मारा और उनके कितने संस्थानों को नष्ट किया। कितने स्वयं सेवक अंगे्रज़ों की गोलियों से मरे और कितने वन्दे मातरम् कह कर फांसी पर झूल गए। हिन्दुत्व वादियों के हाथ से एक निहत्था अहिंसक गांधी ही मारा गया।
संघ और इन स्वयं सेवकों के लिए आज़ादी के आन्दोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के लिए संगठन बनाना और स्वयं सेवक तैयार करना था। संगठन को अंगे्रज़ों की पाबंदी से बचाना था। इनके लिए स्वतंत्र भारत राष्ट्र अंगे्रज़ों से आज़ाद कराया गया भारत नहीं था। इनका हिन्दू राष्ट्र तो कोई पाँच हज़ार साल से ही बना हुआ है। उसे पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेज़ों से मुक्त कराना है। मुसलमान हिन्दू राष्ट्र का दुशमन नं॰ 1 और अंग्रेज़ नं॰ 2 था। सिर्फ अंग्रेज़ों को बाहर करने से इनका हिन्दू राष्ट्र आज़ाद नहीं होता। मुसलमानों को भी या तो बाहर करना होगा या उनहें हिन्दू संस्कृति को मानना होगा। इसलिए अब उनका नारा है वंदे मातरम् गाना होगा, नहीं तो यहां से जाना होगा।
सवाल यह है कि जब आज़ादी का आन्दोलन संघ परिवारियों के लिए स्वैच्छिक था तो स्वतंत्र धर्म निर्पेक्ष लोकतांत्रिक भारत में वंदे मातरम् गाना स्वैच्छिक क्यूँ नहीं हो सकता? भारत ने हिन्दू राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया है। यह भारत संघियों का हिन्दू राष्ट्र नहीं है। वंदे मातरम् राष्ट्र गीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं है।..........................................
सरफ़रोशी की तमन्ना
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है ज़ोर कितना बाजू-ए-क़ातिल में है।।
रह रवे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में।
लज़्ज़ते सहरा नवरदी दूरिये मंज़िल में है।।
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आस्मां।
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।।
आके मक़तल में यह क़ातिल कह रहा है बार बार।
क्या तमन्नाये शहादत भी किसी के दिल में है।।
ऐ शहीदे मुल्को मिल्लत तेरे कदमों पर निसार।
तेरी क़ुरबानी का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।।
अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़।
एक मिट जाने की हसरत अब दिले बिस्मिल में है।।
असीर सियालकोटी
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