Thursday, January 29, 2009

कब तक जकडे रहेंगे इन लोहे की ज़ंजीरों में?

मत पढिये आज का लेख........इस में न निरंतरता है कोई विशेष शीर्षक, मैं जो बात करने जारहा हूँ, यह कुछ बिखरे हुए से विचार हैं, शायद आज मैं जो कुछ लिख रहा हूँ वह अपनी मानसिक संतोष के लिए आने वाली पीढी के लिए ताके जब वो पढ़ें तो आज का लेख उन्हें यह अनुभव कराता रहे के उस दौर में भी कोई था जो सभी हालात से जागृक करता रहा, परन्तु यह कौम इतनी लाचार , बेबस और मजबूर थी के सब कुछ जानते, समझते हुए भी कोई कदम न उठा सकी, कोई ऐसी योजना न बना सकी के जिन परेशानियों का सामना स्वतंत्रता के तुंरत बाद से इस कौम को करना पड़ा, उन से छुटकारा पा सकती या कम से कम आने वाली पीढी के लिए ही कोई ऐसी योजना बना पाती के कम से कम उन्हें तो इन हालत का सामना न करना पड़ता, वो तो अपना भविष्य संवार लेते।

समस्याएँ अनेक हैं, एनकाउंटर बटला हाउस पर लिखिए, मालेगाँव की छानबीन के सिमटते दायरे पर बात कीजिये, समझौता एक्सप्रेस की वास्तविकता सामने आने पर भी चुप्पी बंध जाने के कारण पर ध्यान दीजिये, अंसल प्लाजा बेसमेंट में हुए फर्जी एनकाउंटर से परदा उठाने की कोशिश कीजिये, रामपुर सी आर पी ऍफ़ कैंप में हुए आतंकवादी हमले की फाइल ले कर बैठिये, पन्ने पलट पलट कर पाठ करते जाइये और अपना ही सर पीटते जाइए, इस लिए के सब कुछ आप के सामने हो तब भी आप सत्य को सत्य साबित नहीं कर सकते। बाबरी मस्जिद का मामला अठारा वर्षों से लम्बित है, जिन्हें इस मामले में दोषी होना चाहिए अब उन की सराहना की जा रही है। पार्लिमेंट में हुए हमले को लेकर हम बड़े चिंतित रहे परन्तु जितना गहराई में जा कर इसे देखते हैं, जांच का दायरा आगे बढाते हैं या जो जांच सामने आई है, उसी पर ध्यान देते हैं तो गूड़ता बढती चली जाती हैं। इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा वहां भी थे, इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा अंसल प्लाजा के फर्जी एनकाउंटर में भी थे, इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा बटला हाउस के उस संदिग्ध एनकाउंटर में भी थे, जिस की जुडिशिअल इन्कुएरी की बात अब केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह कर रहे हैं। इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा का नाम अशोक चक्र के लिए भी नामांकित किया जा रहा है। अगर अंसल प्लाजा एनकाउंटर फर्जी था, अगर बटला हाउस का एनकाउंटर फर्जी साबित होता है तो इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा को किसी पुरुस्कार का हकदार करार दिया जायेगा या निर्दोषों की हत्या का ज़िम्मेदार.......?


इस्राइल की राजधानी तिल अबीब में अब संघ परिवार का दफ्तर बनेगा, हिंदू राष्ट्र का आन्दोलन अब इस्राइल की मार्गदर्शन में चलाया जायेगा, उस का झंडा क्या होगा, संविधान क्या होगा, यह सब यहूदियों के मार्गदर्शन में तय होगा, इस लिए के आज इस्लाम दुश्मन शक्तियों में उन्हों ने अपनी जगह सब से ऊपर लिखा ली है और जिन का मस्तिष्क इस्लाम और मुसलमानों के विरोध में काम करता हो, उन के लिए यहूदियों से बेहतर मित्र कौन हो सकते हैं? इस्राइल से बेहतर जगह कौन सी हो सकती है? उन के सपनों को साकार करने के लिए तिल अबीब से बेहतर जगह कौन सी हो सकती है? हिंदू राष्ट्र के केन्द्र की खबरें तो अब आना शुरू हुई हैं, हमारे लिए तो मुंबई का नरीमन हाउस या छाबड़ हाउस भी संघ परिवार के केंद्रीय दफ्तर से कम नहीं था और अगर हमें यह शक है तो शक निराधार नहीं है। मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले का केन्द्र येही था और ऐ ti एस के चीफ हेमंत करकरे की शहादत के बाद सब से पहले खुशियाँ इसी इमारत में माने गई थीं। अगर पुलिस, प्रशासन, राज्य सरकार, केंद्रीय सरकार सब के सब इस सत्य को छुपाने का मन बना लें जो चीख चीख कर बोल रहा है तब आप सत्य को सत्य तो मान सकते हैं किंतु सत्य साबित नहीं कर सकते, फिर भी हमारा यह संघर्ष जारी रहेगा।

अंसार बरनी पाकिस्तानी नागरिक हैं, मेरे अच्छे मित्र हैं, भाई की तरह हैं, जब वो सरबजीत की रिहाई के लिए आवाज़ उठाते हैं तो हम हिन्दुस्तानियों की नज़र में उन का मर्तबा देवताओं की तरह होता है। मैं ने जगह जगह उन्हें सराहे जाते देखा है, राज्य सरकारें पलकें बिछा कर उन का स्वागत करती हैं, हिन्दुस्तानी जनता उन्हें सर आंखों पर बिठाती है, शायद येही हमारी सभ्यता है, हमें गर्व है अपनी रिवायत पर, मगर मैं यह कह दूँ के हिंदुस्तान, मुंबई आतंकवादी हमलों के बाद से लगातार पाकिस्तान पर हमले की बात क्यूँ कर रहा है? इस तरह के बयानात क्यूँ आ रहे हैं? इस आतंकवादी हमले का पूर्ण सत्य सामने आए बिना पाकिस्तानी सरकार के षड़यंत्र की पुष्टि के बिना हमले की बात क्यूँ? अकेले जीवित पकड़ में आया आतंकवादी अजमल आमिर कसाब अगर पाकिस्तानी है तो सिर्फ़ इस के पाकिस्तानी होने से यह बात कैसे साबित हो जाती है के इस में पाकिस्तान की सरकार शामिल है और उसे पाकिस्तान पर हमले का बहाना मान लिया जाना चाहिए अगर वो नौ लाशें पाकिस्तानियों की साबित हो जाती हैं तो भी यह साबित करना होगा के यह नौ लाशें उन्हीं आतंकवादियों की हैं, जिन्होंने २६ नवम्बर को मुंबई में आतंकवादी हमला किया, उस के साफ़ सबूत होने चाहिए। अगर सबूतों के साथ यह साबित हो जाता है के येही वो १० आतंकवादी, एक जीवित और नौ लाशें उस आतंकवादी हमले में शामिल थे तो देखना होगा के पाकिस्तान में किस ने हिन्दुस्तानके विरुद्ध षड़यंत्र रचा था, अगर वो कोई ऐसा ही गुमराह व्यक्ति जैसे हमारे देश का लेफ्टनेंट कर्नल पुरोहित या धर्म के चोले में आतंक फैलाने वाले दयानंद पांडे जैसा, तो पाकिस्तानी सरकार ज़िम्मेदार क्यूँ? हाँ! पाकिस्तान से यह अवश्य कहा जा सकता है के ऐसे लोगों को कड़ा दंड दिया जाए. जब तक पाकिस्तान की सरकार का षड़यंत्र में शामिल होना साबित न हो, पाकिस्तान पर हमले की बात करना क्या अन्य सम्भव दोषियों को राहत पहुँचने वाला कार्य नहीं है?

न जाने आतंकवाद की कितनी घटनाएं हमारे सामने हैं, जिन्हें बार बार हम ने अपने इस रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के पन्नों पर जगह दी है, देश भर में कई भाषणों में कहा के निर्दोषों को दोषी साबित करके जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया, वर्षों तक वो उन पापों की सज़ा काटते रहे जो उन्होंने किए ही नहीं, उन्होंने जेल से पत्र लिखा, हम ने प्रकाशित किया, आवाज़ उठाई, वह निर्दोष साबित हुए, बाद में यह समाचार राष्ट्रीय मीडिया के ज़रिये भी सामने आया किंतु रिहाई का समय आते आते उन्हें निर्दोष साबित करने वाले सी बी आई अफसर को पुलिस के ज़रिये जान से मार देने की धमकियाँ मिलने लगीं. अगर सत्य को सत्य साबित करने के संघर्ष में एक पुलिस अधिकारी की जान दूसरा पुलिस अधिकारी लेने के लिए तैयार हो जाए तो फिर सत्य को सत्य कौन साबित करेगा? अगर आतंकवाद के चेहरे बेनकाब करने की कोशिश में ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे को जान से मारने की धमकियाँ मिलने लगीं और आख़िर में सच की जान चली जाए तो उस का अर्थ समझा जा सकता है, इन हालात के क्या परिणाम होंगे यह समझा जा सकता है. अगर एक चश्म दीद गवाह को इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा को हत्यारा करार दे और इंसपेक्टर शर्मा को पुरस्कार से सम्मानित किया जाए तो प्रोत्साहन इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा जैसी सोच रखने वालों की होगी या फिर देश के लिए अपने प्राणों की बलि देने वाले हेमंत करकरे जैसे लोगों की, जिन को अपने जीवन में देश के जिम्मेदार लोगों की ज़बान से देशद्रोही तक सुनना पड़ा, तो क्या हेमंत करकरे जैसी सोच रखने वालों की सराहना होगी?


पिछले ४-६ महीनों के दैनिकों का पाठ कीजिये, जगह जगह भारी मात्रा में विस्फोटक पदार्थ पाया गया, देश के कई राज्यों में बम बनने की कोशिश करते हुए बजरंग दल के कार्यकर्ता मरे गए, पकड़े गए, छोड़ दिए गए, मगर ऐसे समाचारों को या तो उचित स्थान नहीं मिला और अगर मिला भी तो इतना के इस पर बहस न हो सकी. किसी भी राज्य या केंद्रीय सरकार में यह रूचि नहीं दिखाई दी के इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक पदार्थ का पाया जाना जो हजारों मासूम हिन्दुस्तानियों की जान लेने के लिए पर्याप्त था, यह सब लोगों ने किसलिए जमा किया था? क्यूँ एक जगह से दूसरी जगह ले जारहे थे? क्यूँ नहीं उन की खतरनाक योजनाओं की जानकारी प्राप्त की गई? ऐसे लोगों को कमज़ोर बनाने के लिए उन्हें दंड दिया जाए, परन्तु न ही हमारी पुलिस इस में कोई रूचि रखती है और न ही हमारी सरकार.......

फिर भी दावा यह के हमारी सरकार देश से आतंकवाद का खात्मा करना चाहती है. आतंकवादियों की सराहना होगी, आतंकवाद की घटनाओं को छुपाया जायेगा, पाया जाने वाले विस्फोटक को छुपाया जायेगा, निर्दोषों को फंसाया जायेगा, उन्हें दोषी साबित किया जायेगा, क्या येही तरीका है आतंकवाद पर काबू पाने का?


पुलिस अपनी चार्जशीट में ख़ुद यह कहती है के इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा को ओपरेशन बटला हाउस के दौरान जो गोलियाँ लगीं, वो उन संदिग्ध आतंकवादियों की थी जो जायेवार्दात से फरार होने में सफल हो गए, सभी मीडिया ने नक्षा बनाकर इलस्ट्रेशन के ज़रिये पूरे इलाके को देख कर हज़ार बार यह बात कही के आरोपियों का वहां से फरार हो जाना सम्भव ही नहीं है क्यूँ की बिल्डिंग से नीचे कूदा नहीं जा सकता, सीढियाँ ही एक रास्ता हैं जहाँ से नीचे जाया जा सकता था और वहां पुलिस तैनात थी, फिर कैसे वो संदिग्ध आतंकवादी फरार होने में सफल हो गए? इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा गोलियाँ लगने के बाद चार मंजिलों वाली इमारत की सीढियों से उतर कर पैदल ज़मीन तक आरहे हैं, सड़क पर आने के बाद दो साथियों की सहायता से गाड़ी में सवार हो रहे हैं, पाँच मिनट के फासले पर अस्पताल में चिकित्सा सहायता प्राप्त हो रही है, मगर अगले कुछ मिनट में उन की मृत्यु हो जाती है. देश के प्रसिद्ध सर्जन की सेवा प्राप्त करके हम पूछते हैं के ऐसी कौन सी गोलियां हो सकती हैं जो इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा की मृत्यु का कारण बनीं. उत्तर मिलता है के जो घाव दिखाई दे रहे हैं उन के हिसाब से तो मोहन चंद शर्मा की मृत्यु नहीं होना चाहिए. पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट कहाँ है, वो क्या कहती है? उसे सामने क्यूँ नहीं लाया गया. अब सी एस ऍफ़ एल की रिपोर्ट आतिफ और साजिद के ज़रिये गोलियों का चलाया जाना साबित कर रही है, शायद अर्जुन सिंह के ज़रिये जुडिशिअल इन्कुएरी की बात कह देने का परिणाम है के अब पुलिस एक बार फिर मीडिया की सहायता से यह साबित करने की कोशिश में व्यस्त है के किसी न किसी तरह एनकाउंटर बटला हाउस को सही साबित करदिया जाए. बटला हाउस से लेकर सराय मीर, आज़म गढ़ तक हजारों लोग उन के निर्दोष होने का सबूत दें तो भी पुलिस और सरकार मानने के लिए तैयार नहीं. लेखक ने एल १८ बटला हाउस के उस फ्लैट से लेकर उस के सामने की इमारत, दरवाज़ा, सीढियां, आस पास की इमारतें और जगह जा कर सभी जानकारियां इकठ्ठा कीं , ऐसे सभी सबूत जो सत्य को दिखा सकते हैं सामने रखे, सराय मीर, आज़म गढ़ जाकर उन के पुश्तैनी बैकग्राउंड को समझा, सेंकडों लोगों से बात की, परन्तु पुलिस जो साबित करना चाहती है, वो साबित करने में शायद सफल हो जायेगी, इस लिए के हमारे पास एनकाउंटर बटला हाउस में डॉक्टर हरिकृष्ण जैसा चश्मदीद गवाह नहीं है, जो अपनी जान पर खेल कर भी यह साबित करने का इरादा रखता हो के वो सत्य को सत्य साबित करके रहेगा.

हमें इस सत्य पर भी ध्यान देना होगा के बम धमाकों के बाद हम जिन्हें आतंकवादी मान लेते हैं, पुलिस जिन्हें आतंकवादी बता कर गिरफ्तार कर लेती है, दंड देती है, फिर वर्षों बाद वो निर्दोष साबित होते हैं और उन्हें छोड़ दिया जाता है, तो भी क्या उन के साथ पूर्ण न्याय हो पाता है? मक्का मस्जिद, हैदराबाद का ताज़ा उदहारण हमारे सामने है. हम ने ख़ुद वहां जाकर हालात को देखा. मस्जिद के आँगन में जहाँ बम धमाके हुए वहां खून की बूंदों से लेकर टूटे हुए पत्थर तक, मृतकों के घरों तक जाकर भी देखा जिन्हें दोषी बताकर गिरफ्तार किया, उन के परिवार से मिले, फिर मुख्यमंत्री से निवेदन किया के जिस तरह मालेगाँव छानबीन के बाद आतंकवादियों का एक नया चेहरा सामने आरहा है, फिर से सभी घटनाओं की छानबीन की जाए, सभी के सभी २१ आरोपी रिहा कर दिए गए, मगर हम यह मानते हैं के उन के साथ न्याय नहीं हुआ.

यह कैसा न्याय है, अगर आज पुलिस, अदालत और सरकार यह मानती है के यह सभी निर्दोष हैं इसलिए उन्हें रिहा कर दिया जाना चाहिए. अगर हमारी आवाज़ ऊंची करने के बाद तिहाड़ जेल से पत्र लिखने वाले निर्दोष साबित होगये थे और अब उन्हें रिहाई भी मिल जायेगी तो क्या येही पूर्ण न्याय है.....? जिन लोगों ने उन के निर्दोष होते हुए भी उन्हें आतंकवादी साबित किया, उन्हें मानसिक और शारीरिक पीडाएं दीं, उन के परिवारों को रुसवा किया, समाज में उन का जीना कठिन कर दिया, क्या उन के दामन पर लगा दाग इतनी आसानी से धुल जायेगा? क्या उन की खुशियाँ जो छीन ली गई थी, वापस मिल जायेंगी? क्यूँ नहीं उन सभी पुलिस वालों और अदालती कार्यवाही के दौरान पुलिस के बयानात को सही मान लेने वालों को जिन की वजह से यह जेल की सलाखों के पीछे जीवन काटने पर विवश हुए, उन्हें दोषी माना जाए? क्या वो उन पर हुए अत्याचार के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? क्या उन पुलिस वालों को दंड नहीं मिलना चाहिए? अगर उन को दंड नहीं मिलेगा तो फिर किस प्रकार पुलिस वालों से कर्तव्य को निभाने की आशा की जासकती है? वो जिसे चाहेंगे आतंकवादी साबित करदेंगे और जिस आतंकवादी को चाहेंगे, उसे निर्दोष साबित कर देंगे.

मई १९८७ में मीरठ, मल्याना, हाशिम पूरा में निर्दोषों को नहर के किनारे खड़ा कर के गोली मार दी गई. १६५ पृष्ठों पर आधारित रिपोर्ट और अनुमानित १००० पृष्ठों पर आधारित अन्य विस्तार का पाठ किया जा रहा है, किंतु क्या दोषियों को दंड मिल पायेगा? आज २२ वर्ष बीत जाने के बाद भी अगर अपराधी आजाद हैं और अगर आने वाले कुछ वर्षों में उन का अपराध साबित हो भी जाए तो भी उन के लिए दंड का अर्थ क्या? और कितने अपराधी उस दंड को पाने के लिए जीवित रहेंगे? अगर न्याय की येही धीमी गति जारी रही तो किस तरह आतंकवाद का सर्वनाश होगा?

क्या हमें यह मान लेना चाहिए के पुलिस या पी ऐ सी के ज़रिये किसी भी निर्दोष की जान लेना आतंकवाद नहीं है, क्या हमें यह मान लेना चाहिए के राजनीतिज्ञों के मार्गदर्शन में जन्म लेने वाला आतंकवाद, आतंकवाद नहीं है तो फिर हमें समझना होगा के आख़िर सरकार के नज़दीक आतंकवाद का पैमाना क्या है? वो किन को आतंकवादी मानती है? आज मालेगाँव छानबीन के बाद ऐ टी एस की चार्जशीट में जिन ११ लोगों को आतंकवाद के मामलात में शामिल करार दिया गया है, वो सभी समाज में सम्मानित जीवन जी रहे थे और आज भी जिस तरह के समाचार उन लोगों के सम्बन्ध में पेश किए जा रहे हैं, वो यह के उन का उद्देश्य हिंदू राष्ट्र का निर्माण था अर्थात जनता का एक बड़ा हिस्सा दंड पाने के बाद भी उन का आभारी रहे, उन को सम्मान की निगाह से देखे, उन के आतंकवाद को आतंकवाद न समझे, बलके हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए उसे उन का बलिदान माना जाए, क्या यह ठीक है? क्या इस तरह इस का प्रचार किया जाना चाहिए?

अब चुनाव की सरगर्मियां आरम्भ हो गई हैं, कुछ ही दिनों में संसद चुनाव का एलान हो जायेगा, कुछ घटनाएं जो राजनीतिज्ञों को चुनाव का मुद्दा बनाने में काम आयेंगे, उन पर बहस जारी रहेगी, बाकी सभी घटनाओं पर बहस बंद हो जायेगी, सब कुछ चुनाव के शोर में समाप्त हो जायेगा, फिर कोई यह साबित करने के लिए सामने नहीं आएगा के बटला हाउस का एनकाउंटर सही नहीं था, अंसल प्लाजा के फर्जी एनकाउंटर पर बातचीत बंद हो जायेगी, अगर कोई मीरठ, मल्याना, हाशिम्पूरा की घटनाओं को दोहराने की कोशिश करेगा तो कहा जायेगा के क्यूँ गधे मुर्दे उखाड़ते हो, यह समय ऐसी बातें करने का नहीं है, अगर आप खून में लिप्त गुजरात की बात करेंगे तो कौन आप की आवाज़ में आवाज़ मिलाएगा? अब जबके अनिल अम्बानी और रतन टाटा वाइब्रेंट गुजरात की बात कर रहे हैं और सरकार से लेकर सरकार के सहायक तक कोई खून से लिप्त गुजरात की बात नहीं कर रहा है तो फिर आप कौन होते हैं घाव कुरेदने वाले? हाँ! साबित कर दिया होगा जस्टिस श्री कृष्ण ने अपनी रिपोर्ट में के महाराष्ट्र के जातिवादी दंगों के दौरान शिव सेना के कार्यकर्ताओं ने चुन चुन कर मुसलमानों को मारा, उन के कारोबार को बर्बाद किया और उस रिपोर्ट के सामने आजाने के बाद न दोषियों को दंड मिला, न दोषियों पर मुकदमा चला तो फिर आव्यशकता ही क्या है किसी एन्कुएरी कमीशन के बिठाए जाने की। क्यूँ अर्जुन सिंह जुडिशिअल एन्कुएरी की बात कर रहे हैं? क्या यूँही कुछ समय के लिए घाव पर मरहम रख कर चुनाव में सफलता पाना ही उद्देश्य रह गया है। खुदा के लिए बस कीजिये इस राजनैतिक खेल को.

हाँ हम जानते हैं के हम चारों ओर से घिरे हुए हैं, हर आतंकवादी हमले के बाद हमें ही मैदान में आकर साबित करना है के हम आतंकवाद के विरुद्ध जलसा करके उल्माए कराम से लेकर बुद्धिजीवियों तक सब को मंच पर आकर आतंकवाद की निंदा करना है, आतंकवाद के विरुद्ध बयान देना है, क्या सिर्फ़ एक विशेष संप्रदाय की ज़िम्मेदारी है यह? क्या इस में सभी हिन्दुस्तानियों को इस तरह शामिल नहीं होना चाहिए? क्या ६१ वर्षों बाद भी हिंदुस्तान के एक मखसूस तबके को ख़ुद को देश प्रेमी साबित करना होगा? क्या यह ऐतिहासिक सच्चाई नहीं है के हिन्दुस्तंका मुस्लमान दुन्या की वो एक कौम है, जिस के पास अपनी मर्ज़ी का देश चुनने का अवसर था, देश के बटवारे के बाद वो पाकिस्तान या हिंदुस्तान में से किसी एक देश को चुन सकता था, उस ने जब हिंदुस्तान को चुन कर अपना फ़ैसला उसी वक्त सुना दिया तो आज उस से यह प्रशन क्यूँ?

अब फिर एक नई उलझन हमारे सामने है, आने वाले संसद चुनाव में मुसलमानों के वोट का अधिकारी कौन है? वो सेकुलर पार्टियों के साथ जाना चाहता है मगर सेकुलरिस्म का पैमाना क्या है? क्या सिर्फ़ मुस्लमान ही देश को सेकुलर बना पायेंगे? नहीं, बहुमत चाहेंगे तभी देश सेकुलर रहेगा। बात निराशा की नहीं, किंतु चिंता की अवश्य है। अगर मुस्लमान वर्षों तक किसी पार्टी को सेकुलर मान कर उस को मज़बूत बनाने की कोशिश करता रहे, उसे इस लायक बना दे के केंद्रीय सरकार उस के रहमो करम पर टिकी है, उस की हिमायत जारी रही तो सरकार का वजूद बाकी रहे, वो हिमायत वापस लेले तो सरकार खतरे में पड़ जाए, फिर वही पार्टी मुसलमानों की भावनाओं, अनुभूति की हत्या करते हुए एक ऐसे व्यक्ति को अपने साथ लेले, जिस ने स्वतंत्रता के बाद देश में आतंकवादी दौर की शुरुआत की हो, जिस ने बाबरी मस्जिद की शहादत के साथ देश में जातिवाद और आतंकवाद के न समाप्त होने वाले दौर की शुरुआत की हो.

चलिए बंद करते हैं इस बहस को...........

मैं क्यूँ आप का समय ख़राब कर रहा हूँ, शायद यह सब बेकार बातें हैं, सब की अपनी अपनी मजबूरियाँ हैं, कोई स्वयं उमीदवार है, संसद की सदस्यता के सपने का बलिदान कैसे करे, कोई किसी उमीदवार से जुडा हुआ है, वो कैसे उस का दामन छोड़ दे?
कोई एहसानों के बोझ टेल दबा है तो किसी को यह आशा है के आने वाला कल आज की हिमायत की शक्ल में अच्छी सौगात ले कर आएगा। शायद सब कुछ इसी तरह चलता रहेगा, हम नेतृत्व के आभाव का मातम करते रहेंगे, मजलूम हो कर भी जालिम करार दिए जाते रहेंगे। आतंकवाद का शिकार हो कर भी आतंकवादी कहलाये जाते रहेंगे, देश प्रेमी होते हुए भी संदिग्ध निगाहों से देखे जाते रहेंगे और यह राजनैतिक उलझनें हमारे पैरों में लोहे की जंजीरों की तरह पड़ी रहेंगी। हम अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों से छुटकारा पाने का संघर्ष तो कर सकते हैं, परन्तु यह जंजीरें जिन्हें हम अपने पैरों की सुंदर पायल समझ बैठे हैं, जिन्हें हम ने स्वयं अपने पैरों में डाला है, उन से कब और किस प्रकार छुटकारा पाएंगे? शायद कभी नहीं........! मैं ने कहा था न मत पढिये इसे, यह सब लिखना बेमतलब है फिर भी लिख रहा हूँ के आने वाली पीढी यह न कहें के सब कुछ देखता रहा और खामोश रहा।

Thursday, January 22, 2009

इन्कुएरी न्याय के लिए या वोट के लिए......?


एनकाउंटर बटला हाउस पर केंद्रीय मंत्री श्रीमान अर्जुन सिंह का बयान के इस एनकाउंटर की जुडिशिअल इन्कुएरी कराइ जानी चाहिए, सरकार इस पर गौर कर रही है। उन के इस बयान से हम निश्चित हो गए हैं के इलेक्शन अब बस नज़दीक आ ही चुका है.....नहीं! हमें श्रीमान अर्जुन सिंह के बयान या सरकार की निय्यत पर कोई शक नहीं है, अगर एक केंद्रीय मंत्री ने यह बात कही है तो इस के महत्त्व को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता, किंतु क्या करें अभी कुछ दिनों पहले की ही तो बात है, एक और केंद्रीय मंत्री को अपने बयान पर काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा था। विरोध पक्ष तो हमलावर था ही, अपनों की सहायता से भी वो वंचित ही रहे। अब खुदा जाने अर्जुन सिंह के इस बयान के बाद उन का क्या अंजाम हो, भारतीय जनता पार्टी ने तो अपने कड़े तेवरों को जता ही दिया है। हो सकता है, इस बार सरकार और कांग्रेस पार्टी ऐसा व्योहार न करे जो उन्होंने केंद्रीय मंत्री (अल्पसंख्यकों के मामले) श्रीमान अब्दुर रहमान अंतुले के मामले में किया था। और यह भी हो सकता है के मुसलमानों को प्रभावित करने के लिए, उन का वोट पाने के लिए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की सहायता से एक विशेष कार्यक्रम की व्यवस्थता में उप राष्ट्रपति की उपस्थिति में जानबूझ कर यह बयान सरकार की योजनानुसार ही दिया गया हो, इस लिए के इलेक्शन से पहले अब किसी भी इन्कुएरी का परिणाम आने की आशा तो है नहीं, क्यूँ न इन्कुएरी के फैसले की बात कह कर वाहवाही लूट ली जाए।

मैं ने २० जनवरी के अपने लेख में लिखा था के एनकाउंटर बटला हाउस का मामला तो हमारे सामने है ही, उसी दिन जब मैं अन्य दैनिकों का पाठ कर रहा था तो मैं ने "टाईम्स ऑफ़ इंडिया" के पहले पन्ने पर एनकाउंटर बटला हाउस के लिए इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा को "अशोक चक्र" के अवार्ड के लिए मनोनीत किए जाने का समाचार पढ़ा और ठीक उसी समय जब अर्जुन सिंह दिल्ली के विज्ञान भवन में एनकाउंटर बटला हाउस की जुडिशिअल इन्कुएरी की बात कर रहे थे, एक सब से तेज़ चैनल बटला हाउस का समाचार प्रसार कर रहा था और वो आतिफ और साजिद को "इंडियन मुजाहिदीन "का मास्टर माइंड, दिल्ली के बम धमाकों का जिम्मेदार साबित करते हुए टेलीफोन पर हुई बात चीत को ड्रामाई अंदाज़ में पेश कर रहा था। हो सकता है यह उस की तेज़ी हो या फिर जैसे बहुत सारे संयोग हम ने २६ नवम्बर २००८ को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले में देखे, यह भी ऐसा ही एक संयोग हो? वैसे डॉक्टर हरी कृष्ण के हवाले से अंसल प्लाजा फर्जी एनकाउंटर चश्म दीद गवाह के अनुसार इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा का कार्य करने का तरीका बयान कर रहे थे जो हम ने अपनी पिछली कड़ियों में आप के सामने पेश की, अगर वो सत्य है (झूठा होने की कोई वजह भी दिखाई नहीं देती) और केंद्रीय मंत्री श्रीमान अर्जुन सिंह एनकाउंटर बटला हाउस की इन्कुएरी की बात भी कर रहे हैं तो फिर २६ जनवरी के उस कारनामे के लिए अशोक चक्र अवार्ड दिए जाने का अर्थ!

ऐसे ही अनगिनत प्रशन हैं, जिन्हें अर्जुन सिंह के इस बयान के बाद उठाया जायेगा, अगर सरकार वास्तव में गंभीर है तो उसे दो बातों का यकीन दिलाना होगा , एक तो यह के इन्कुएरी वोट डालने के समय से पहले पूर्ण हो जायेगी और उस का परिणाम आजायेगा। दूसरे यह के अपराधियों को दंड अवश्य दिया जाएगा और उस का अंजाम पिछले इन्कुएरी कमिशनों की रिपोर्ट की तरह नहीं होगा।

इस लिए आज हम ने इस शीर्षक को सिर्फ़ अपने लेख तक सीमित न रखते हुए दस्तावेज़ का शीर्षक इस लिए बना लिया के अब हम यह इशु जनता के हवाले कर रहे हैं ताके वो अपनी राय जता सकें।


उसे पता था की उस की हत्या कर दी जायेगी
नहीं यह लेख मेरा नहीं है परन्तु इस लेख में, मैं एक चित्र देख रहा हूँ, शायद आप को भी वही चित्र नज़र आए। आज लिखना था मुझे एनकाउंटर बटला हाउस पर, किंतु जब मैंने श्री लंकन दैनिक " दी सन्डे लीडर" के संपादक लेसंथा विक्रम तुंगा के जीवन का यह आखरी लेख पढ़ा तो मुझे लगा के आज एक महान पत्रकार का यह विशेष लेख आप को पेश करूँ। निश्चित रूप से आप को यह जान कर दुःख होगा के संपादक विक्रम तुंगा की इसी ८ जनवरी को हत्या कर दी गयी और उन का यह लेख उन की हत्या के बाद उन के अन्तिम लेख की सूरत में उन के दैनिक में प्रकाशित किया गया।
इस लेख ने मेरे इरादों को दुर्बल नहीं किया बल्कि और भी अधिक ठोस कर दिया है इस लिए कल जब मैं एनकाउंटर बटला हाउस पर लिख रहा होऊंगा तब और भी मजबूती से अपना dरुश्तिकों पाठकों और हिन्दुस्तानी सरकार के सामने रख पाउँगा।
श्रीलंका में पत्रकारिता के अलावा ऐसा कोई दूसरा मैदान नहीं है जिस में आप से यह उम्मीद की जाती हो के आप अपनी जान पर खेल कर अपने हुनर का उपयोग सेना के बचाव के लिए करेंगे। पिछले कुछ वर्षों में स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमलों में बढोतरी हुई है। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के दफ्तरों को जलाया गया है, उन पर बमबारी हुई है, उन्हें सील किया गया है और दबाया गया है। कई पत्रकारों को परेशान किया गया, धमकाया गया और मार डाला गया है। मेरे लिए चिंता की बात है के मैं उस ग्रुप का हिस्सा हूँ।
मैं पत्रकारिता के पेशे में बहुत समय से हूँ। २००९ में "दी सन्डे लीडर" को १५ साल हो जायेंगे। इस दौर में श्री लंका में कई चीज़ें बदल चुकी हैं। अधिकतर की हालत ख़राब ही हुई है। हम एक ऐसी गृहयुद्ध में गिरफ्तार हैं, जिस में शामिल खून के प्यासों का कोई अंत नहीं। आतंक हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी है, चाहे वो आतंकवादियों की तरफ़ से हो या सरकार की। हत्या वो पहला हथ्यार है, जिस का उपयोग सरकार स्वंतंत्रता के इस स्रोत पर कंट्रोल के लिए करती है। आज पत्रकार हैं कल जज होंगे। किसी के लिए भी खतरा कम या ज़्यादा नहीं है।
परन्तु मैं यह काम क्यूँ करता हूँ, मैं एक पति हूँ, मेरे तीन हँसते खेलते बच्चे हैं। मेरे मित्र कहते हैं के मुझे कोई दूसरा सुरक्षित और बेहतर काम करना चाहिए दोनों ही ग्रुपों के राजनीतिकों ने मुझ से कई बार कहा को मैं राजनीती में आजाऊँ, मुझे मंत्रिपद की पेशकश भी की गई। राजदूतों को पता है के श्री लंका में पत्रकारिता करना कितना भयानक है। उन्हों ने मुझे किसी दूसरे देश में सुरक्षित ठिकाना देने की बात की, परन्तु मैं ने किसी की न सुनी। ऊंचे पद , नाम और सुरक्षा से भी एक बड़ी वस्तु होती है, आत्मा की आवाज़।
दी सन्डे लीडर एक विवादास्पद दैनिक है क्यूंकि उस में चोर को चोर कहते हैं और हत्यारे को हत्यारा। उसे हम शब्दों के उलट फेर में नहीं घुमाते। अगर हम परदा फाश करते हैं तो उस के कागजी सबूत भी देते हैं। सभी इन्केशाफत के बावजूद पिछले १५ वर्षों में हमें कोई ग़लत साबित नहीं कर सका है। स्वतंत्र मीडिया एक आईने के प्रकार होता है, जिस में लोग अपनी सूरत देख सकते हैं। कभी कभी लोगों को उस में अपनी सूरत अच्छी नहीं लगती। इसी लिए उस आईने को पकड़ने वाला पत्रकार खतरों में घिरा रहता है। हमारा प्रण श्री लंका में स्वच्छ, सेकुलरिस्म के लिए है। इन शब्दों को गौर से देखिये। साफ़ यानी सरकार की जवाबदेही लोगों के लिए हो और वह राजपाट का दुरूपयोग न करे। सेकुलर ताके हमारे जैसे बहु धर्मीय और सांस्कृतिक समाज में एक साथ रह सकें। उदार ताके हम दूसरों को वह जैसे भी हैं स्वीकार करें और अगर आप मुझ से सेकुलरिस्म का महत्त्व नहीं जानना चाहते हैं तो यह अच्छा होगा के आप मेरा दैनिक खरीदना बंद कर दें।
दी सन्डे लीडर ने बहुमत की हाँ में हाँ मिलाकर सुरक्षित रहना कभी पसंद नहीं किया। हम ने प्राय: उन विचारों को पेश किया जो बहुत से लोगों को पसंद नहीं आते। उदहारण के तौर पर हम यह कहते रहे के जुदाई पसंदी और आतंकवाद को ख़त्म कर दिया जाना चाहिए, लेकिन अधिक महत्त्वपूर्ण है के आतंकवाद के आधार को समाप्त किया जाए। हम ने श्री लंका सरकार से निवेदन किया के वह नस्लवाद के तनाव को एतिहासिक नज़रिए से देखे, आतंकवाद के नज़रिए से नहीं। हम ने आतंकवाद के खिलाफ लडाई में सरकार के इस आतंकवाद का भी विरोध किया, जो अपने ही नागरिकों पर बम बरसाती है।
कुछ लोग मानते हैं के सन्डे लीडर का कोई राजनैतिक एजेंडा है, हमारा ऐसा कोई एजेंडा नहीं है। हम प्राय: सरकार की नुकता चीनी विरोधियों से भी अधिक करते हैं तो सिर्फ़ इस लिए के विरोधियों की नुकता चीनी का लाभ भी क्या है? हम ने जो इन्केशाफत किए हैं, उन की वजह से हम यु एम् पी सरकार की आँख का सब से बड़ा काँटा बने हुए हैं, परन्तु हम तमिल टाइगर की पॉलिसियों के भी उतने ही विरोधी हैं। एल टी टी ई जैसी बेदर्द और लहू की प्यासी संघठन इस धरती पर दूसरी कोई नहीं है, इसे समाप्त किया ही जाना चाहिए, लेकिन यह कार्य सामान्य तमिल जनता पर फाइरिंग और बमबारी करके नहीं होना चाहिए। यह ग़लत तो है ही, संहली जनता के लिए भी लज्जा की बात है।
दो बार मुझ पर हमला हो चुका है और मेरे घर पर मशीन गन से फाइरिंग भी हो चुकी है, न पुलिस ने इस की कभी गंभीरता से छानबीन की और न हमला करने वालों को कभी गिरफ्तार ही किया जा सका। कई कारणों से मैं मानता हूँ के हमला करने वालों को सरकार से ही सीख मिली थी और अगर मैं मारा गया तो सरकार ही असली अपराधी होगी। बहुत कम लोग जानते हैं के मैं और महेंद्र राज पक्षे एक चौथाई शताब्दी तक मित्र रहे हैं। मैं उन लोगों में से हूँ जो महेंद्र को उस के पहले नाम से पुकारते हैं। शायद ही कोई ऐसा महिना हो जब हम न मिलते हों। २००५ में जब उन का नाम राष्ट्रपति पद के लिए आया तो उस का जितना स्वागत इस कालम में हुआ उतना कहीं नहीं हुआ। मानवाधिकार के लिए उन के हौसले को उस समय हर व्यक्ति जानता था फिर एक गलती हुई और "हमबन टोटा" का स्कैंडल सामने आगया।
एक बहुत बड़ी समस्या से जूजने के बाद हम ने वह रिपोर्ट प्रकाशित की थी और उस से निवेदन किया था की वो पैसा वापस कर दें और कई सप्ताह के बाद जब उन्होंने यह किया तो उन की इमेज को धक्का लग चुका था।
मैं जानता हूँ के मेरी मृत्यु के बाद आप भी दुःख व्यक्त करेंगे। तुंरत ही छानबीन का एलान भी होगा, लेकिन पिछली सभी जांचों के प्रकार इस बार भी सत्य सामने नहीं आएगा। हम दोनों को पता है के इस के पीछे कौन है, लेकिन कोई नाम नहीं लेगा। मेरे ही नहीं आपके जीवन के पीछे भी वही है।
देश के उत्तर पूर्वी हिस्सा जो के सेना के कब्जे में है, वहां तमिल जनता बिल्कुल द्वितीय श्रेणी के नागरिक बन कर रहने पर विवश हैं। उन को आत्म सम्मान से अलग कर दिया गया है। ऐसा सोचिये भी मत के आप युद्ध के बाद उन को सिर्फ़ प्रगतिशील कार्य और निर्माण के नाम पर अपना दीवाना बना लेंगे। युद्ध के घाव उन को सदा के लिए आप से दूर कर देंगे। वह आप से और अधिक घृणा करने लगेंगे और एक समस्या जिस का राजनीती से समाधान किया जा सकता है, वह एक ऐसा घाव बन जायेगा जो सदा बहता रहेगा। अगर मैं गुस्सा हूँ या असंतुष्ट हुआ तो अपने स्वदेशियों के कारन होऊंगा और सब से अधिक तर अपनी सरकार के कारन होऊंगा। मैं यह पूर्ण वर्तमान स्थिति दीवार पर स्वच्छ लिखी हुई देख रहा हूँ।
तुम ने मुझे कई बार बताया था के तुम राष्ट्रपति बन्ने में अधिक रूचि नहीं रखते, तुम को इस पद के पीछे भागने की आव्यशकता नहीं है। यह पद तो तुम्हारी झोली में यूँही गिर गया है। तुम ने मुझ से कई बार कहा के तुम्हारे सुपुत्र तुम्हारे लिए सब से ज़्यादा खुशी की वजह है और मैं अपने भाइयों को राज्य प्रशासन चलाने के लिए छोड़ देता हूँ। यह प्रशासन इतना शानदार और अच्छी तरह से काम कर रहा होता है के यूँ लगता है के अब मेरी भी आव्यशकता नही है, परन्तु अफ़सोस की बात यह है की वो सभी सपने जो तुमने अपने देश के लिए बचपन से सजा रखे थे, एक ढेर में बदल चुके हैं। तुम ने देश प्रेम के नाम पर सभी मानवाधिकार को नष्ट किया है। तुम ने करप्शन का इस प्रकार पालन पोसन किया है और जनता के धन को इस प्रकार नष्ट किया है के इस से पहले किसी राष्ट्रपति ने ऐसा नहीं किया।
तुम्हारा व्योहार एक ऐसे बच्चे जैसा हो गया है जिस को अचानक खिलोने की दुकान में छोड़ दिया जाए, खैर यहाँ यह उदहारण ठीक नहीं है के तुम ने अपने नागरिकों के अधिकारों से अपने हाथों को लहुलहान कर दिया है। आज तुम अपने राज्य के नशे में इतने मदहोश हो के तुम को कुछ दिखायी नहीं दे रहा है। तुम को इस बात पर अफ़सोस होगा की तुम्हारे बच्चों को ऐसी विरासत मिली है, जो सिर्फ़ दुखद का पूर्वानुमान साबित हो सकता है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है मैं अपने जन्मदाता के साथ साफ़ आत्मा के साथ भेंट करूँगा। मेरी भी येही इच्छा है के तुम जब अपने जन्मदाता से मिलो तो तुम्हारी आत्मा भी ऐसी ही हो जैसी के मेरी है।
मेरे लिए यह संतोषजनक है के मैं जब कभी चला एक ऊंचे व्यक्ति के प्रकार चला, मैं किसी के आगे झुका नहीं, लेकिन मैंने जीवन का सफर अकेले नहीं काटा, मेरे साथ काम करने वाले, अन्य पत्रकार मीडिया से जुड़े हैं, मेरे साथ रहे। उन में से अधिक तर की मृत्यु हो चुकी है या बिना किसी मुक़दमे के जेलों में सड़ रहे हैं या दूसरे स्थानों पर देशनिकाले का जीवन बिता रहे हैं। कई पत्रकार तुम्हारे राष्ट्रपति पद के कारन उपजे मृत्यु के भयंकर साए के अन्दर जी रहे हैं। यह वही हालत है जिस के विरोध में तुम ने कड़ा संघर्ष किया था। तुम को कभी इस बात की अनुमति नहीं दी जायेगी के मेरी मृत्यु तुम्हारी देख रेख में हो। मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है के तुम्हारे पास मेरे हत्यारे का बचाव करने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। तुम इस बात का पूरा ख्याल रखोगे के कोई भी अपराधी दंड न पासके। तुम्हारे पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है, मुझे तुम पर अफ़सोस हो रहा है।
दी सन्डे लीडर के पाठकों के लिए मैं क्या कह सकता हूँ सिवाय इस के की वो हमारे मिशन का साथ दें, हम ने एक अप्रसिद्ध इशु को उठाया है। हम ने ऐसे लोगों से पंगा लिया है जो राज के नशे में इतने बलवान हो गए हैं के वह अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं। ऐसे लोगों के विरोध में बगावत की है जो जनता की मेहनत की कमाई को बर्बाद कर रहे हैं और वो ऐसे हालात पैदा कर रहे हैं के जनता तक सिर्फ़ विपरीत बयान ही पहुँच सके। इस कार्य के लिए मैंने और मेरे खानदान ने कीमत चुकाई है। मुझे इस बात का अंदाजा था के मुझ को इस की कीमत चुकानी पड़ेगी। मैं सदा इस हालत के लिए तैयार रहा हूँ। मैंने इस हालत को पैदा होने से रोकने के लिए कुछ नहीं किया है। न सुरक्षा प्रबंध किए हैं न ख़ुद को बचाने के लिए कुछ और। मैं अपने हत्यारे को बता देना चाहता हूँ के मैं ऐसा कोई बुजदिल नहीं हूँ, जो बहुत बड़ी भीड़ के पीछे खड़ा हो। क्या मुझ जैसे बहुत से लोग नहीं हैं। शायद यह पहले ही लिखा जा चुका है के मरी ज़िन्दगी कौन लेगा। शायद सिर्फ़ यह लिखा जाना बाक़ी है के यह जान कब ली जायेगी और हाँ यह भी लिखा जा चुका है के सन्डे लीडर अपना संघर्ष जारी रखेगा। मैं जानता हूँ के यह युद्ध मैं अकेले नहीं लड़ रहा हूँ, मुझ से पहले बहुत से लोग मारे जा चुके हैं और मेरे बाद भी बहुत से लोग मारे जायेंगे।
लीडर की जब अन्तिम क्रिया कर दी जायेगी। मुझे आशा है के मरी हत्या स्वतंत्रता की हार नहीं होगी। मरी हत्या उन लोगों को काम करने के लिए हिम्मत देती रहेगी जो अपना प्रयास जारी रखना चाहते हैं और मरी हत्या उन लोगों को हौसला भी देती रहेगी जो मानव की आत्मनिर्भरता और देश की स्वतंत्रता के लिए काम करना चाहते हैं। मुझे आशा है के मेरी हत्या मेरे राष्ट्रपिता की आँखें खोल देगी और उन को इस बात का अनुभव हो जायेगा के देश भक्ति के नाम पर बहुत से लोग मारे जाते रहेंगे परन्तु मानवता की अनुभूति बढती रहेगी और राजा पक्से जैसे लोग इस अनुभूति को फ़ना करने में सफल नहीं हो सकते हैं।
लोग मुझ से पूछते हैं के मैं ऐसे खतरों से क्यूँ खेलता हूँ और मुझ से कहते हैं के मुझ को रास्ते से हटा दिया जायेगा। निश्चित रूप से ऐसा होगा , मुझे मालूम है के यह नामुमकिन नहीं है, परन्तु मैं ऐसे मौके पर न बोलूं तो ऐसा कौन बचेगा , जो उन लोगों के लिए आवाज़ उठाएगा जो बोल नहीं सकते हैं। वो चाहे नस्ली अल्पसंख्यक हो, समाज का लाचार समुदाय हो या वो लोग जो मुकदमों में फंसाए जा रहे हैं।
दी लीडर सदा आप के लिए आवाज़ उठाता रहेगा। चाहे आप संहली हों, तमिल हों, मुस्लमान हों, उच्चय जाती के हों या अपाहिज या किसी ऐसी सोच से जुड़े हों जिस पर सामान्य तौर पर सकारात्मक टिप्पणी न की जाती हो। दी लीडर का स्टाफ आप के संघर्ष को आगे बढायेगा। वो किसी के आगे नहीं झुकेगा, किसी से नहीं डरेगा, वो ऐसी हिम्मत दिखायेगा जिस का उदहारण नापैद नहीं रही हैं। इस वादे को भूलें नहीं के आपको इस बारे में कोई शक नहीं रहना चाहिए के हम पत्रकार जो भी बलिदान पेश करते हैं हम अपने नाम या धन के लिए नहीं करते। वो आप के लिए अपनी जान बलिदान कर देते हैं। लेकिन आप उन के बलिदान के लायक हैं या नहीं यह एक दूसरी बात है। मेरे लिए तो सिर्फ़ महत्त्व इस बात का है के मैं ने प्रयास किया।

Wednesday, January 21, 2009


झूठा कौन, चश्म दीद गवाह या पुलिस......?

एक अमेरिकी दैनिक ने आज शाम फ़ोन पर लगभग आधा घंटा मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों के सम्बन्ध में मेरे विचार जानने के लिए बात की। वो अपने समाचारपत्र और अन्य पश्चिम मीडिया के लिए मेरा एक विस्तारित इंटरव्यू चाहते थे। उन का कहना था की उन्होंने मेरे जारी लेख "मुसलमानाने हिंद....माज़ी , हाल और मुस्तकबिल???"की १०० वीं कड़ी का अभ्यास किया है और इस की ५ कॉपी खरीद कर अमेरिका भी भेजी हैं।

वो पिछले कई दिनों से मुझ से बात करना चाहते थे, वो मुसलसल हिन्दुस्तानी दैनिकों का अभ्यास कर रहे हैं और उन्हें हमारे ज़रिये उठाये गए प्रशनों पर मीडिया की खामोशी से काफ़ी आशचर्य है। अपनी बात चीत में इस खामोशी को उन्होंने "क्रिमिनल साइलेंस" का नाम देते हुए कहा के इतने गंभीर प्रशन उठाये जाने पर भी मीडिया की इस खामोशी को सिवाय इस के कुछ और नहीं कहा जा सकता।

बेशक उन्हें आशचर्य हो सकता है, इस लिए के अमेरिका व बरतानवी राज्कर्ताओं का मिज़ाज जो भी हो मगर वहां मीडिया इस हद तक पुलिस वर्जन को सामने रखने का आदि नहीं है, जितना के हम ने अपने यहाँ "एनकाउंटर बटला हाउस" और "२६ नवम्बर को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों" के बाद देखा, लेकिन अब हालात बदलते नज़र आरहे हैं। इस अमेरिकी पत्रकार के सामने तो शायद पिछले छे महीने की पूर्ण दृश्यावली नहीं होंगी मगर हमारे पाठक अच्छी तरह जानते हैं के एनकाउंटर बटला हाउस के बाद मीडिया, पुलिस के ज़रिये दी गई जानकारियों को ही दिखाता रहा मगर कुछ दिनों बाद ही उस ने भी सच्चाई को सामने लाना शुरू कर दिया, ख़ास तौर से "मेल टुडे" "दी हिंदू" "टाईम्स ऑफ़ इंडिया" और "हिंदुस्तान टाईम्स" ने लगभग वही प्रशन उठाना शुरू कर दिए जो १९ सितम्बर को बटला हाउस में हुए संदिग्ध एनकाउंटर के बाद २१ सितम्बर से रोजनामा राष्ट्रीय सहारा ने उठाने शुरू किए थे और जनवरी के दूसरे हफ्ते में पुलिस के ज़रिये तीसरी चार्ज शीट दाखिल करने का समय आते आते लगभग सभी राष्ट्रीय मीडिया ने पूरे स्पष्टीकरण के साथ ये लिखना शुरू कर दिया के जब पुलिस ख़ुद इस बात का एतराफ कर रही है के इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा पर इस संदिग्ध एनकाउंटर में मारे गए आतिफ और साजिद के ज़रिये गोलियाँ नहीं चलाई गयीं और कहा है के इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा को उन आतंकवादियों की गोलियां लगीं जो जायवारदात से फरार हो गए थे। पुलिस की इस नाकाबिले यकीन कहानी पर पहले ही बहुत कुछ लिखा जा चुका है क्यूंकि बटला हाउस एल १८ के उस फ्लैट से भागने का सिर्फ़ एक ही रास्ता था, वो सीढियां जिन से उतर कर नीचे पहुँचा जा सकता था और ओपरेशन बटला हाउस के समय उन सीढियों पर ऊपर से नीचे तक पुलिस तैनात थी, इस लिए इस बात की सम्भावना नहीं थी के पुलिस की उपस्थिति में इस तंग जीने से कोई भी फरार हो सके।

आज हमारे सामने बटला हाउस का मामला तो है ही इस के अलावा मक्का मस्जिद ब्लास्ट के सभी २१ अभियुक्त रिहा किए जा चुके हैं, अब प्रशन यह पैदा होता है के असल मुजरिम कहाँ हैं क्यूंकि वो सब तो मुजरिम साबित नहीं हुए जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार किया था और अब उन के निर्दोष साबित होजाने के बाद उन अपराधी पुलिस वालों पर मुक़दमा क्यूँ नहीं जिन्होंने ने इन सब को निर्दोष होते हुए भी दोषी साबित करने की कोशिश में दर्दनाक सज़ाएं दी, जेल की सलाखों के पीछे रहने को मजबूर किया, आतंकवादी कह कर पुकारा, उन के खानदानों को समाज में रुसवा होने के लिए मजबूर किया, हम यह मामला भी उठाएंगे।

हमारे सामने ३१ दिसम्बर २००७ और १ जनवरी २००८ की पहली रात में रामपुर सी आर पी ऍफ़ कैंप में हुए हादसे की पूरी रिपोर्ट भी है, जिस से यह सवाल उठते हैं के पुलिस ने एक अविश्वसनीय कहानी बना कर उसे आतंकवादी हमला साबित करने का प्रयास किया, शीघ्र ही इस की पूरी सच्चाई हम सामने लायेंगे।

मुंबई लोकल ट्रेन में हुए बोम्ब ब्लास्ट की सच्चाई क्या है, यह सब सामने आने के बाद फिर एक बार शहीद हेमंत करकरे की याद आएगी, इस लिए के मालेगाँव बोम्ब ब्लास्ट के मामले में जो चोंका देने वाले रहस्योद्घाटन उन्होंने किए थे, ऐसा ही बहुत कुछ उन धमाकों के सम्बन्ध में भी देखने को मिल सकता है।

लेकिन हम इन सभी घटनाओं को कुछ समय के लिए पीछे छोड़ कर आज दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं को पाठकों के सामने रखना चाहते हैं। पहली घटना तो वही है जिसे हम ने अपने पिछले जारी लेख की १०० वीं कड़ी में सामने रखा था यानी मुंबई पर आतंकवादी हमला और मुंबई ऐ टी एस चीफ हेमंत करकरे की शहादत। दूसरा महत्त्वपूर्ण मामला है जिसे इस घटना के साथ हम एक बार फिर सामने लाना चाहते हैं, वो है अंसल प्लाजा के बेसमेंट में हुआ एक ऐसा ही एनकाउंटर जैसा के एनकाउंटर बटला हाउस था।

२६ नवम्बर २००८ को कराची से समंदर के रास्ते मुंबई में प्रवेश करने वाले आतंकवादियों की एक मात्र चश्म दीद गवाह अनीता उदैया के साथ पिछले हफ्ते जो कुछ गुज़रा उसे हम अपने शब्दों में नहीं बल्कि विशवास कुलकर्णी और भूपेन पटेल की जांच के बाद सामने आई सच्चाई के प्रकाश में कहना चाहेंगे। हालाँकि हमारी मुंबई इन्वेस्टीगेटिव टीम लगातार इस घटना और हालात की जांच कर रही है मगर इस वक़्त हम चाहते हैं के अब जबकि राष्ट्रीय मीडिया ने २६ नवम्बर २००८ को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों के सम्बन्ध में प्रशन उठाना शुरू कर दिया है और विशेषकर अनीता उदैया के मामले को अंग्रेज़ी, हिन्दी और अन्य स्थानीय भाषाओँ के लगभग सभी दैनिकों ने उठाया है तो हम क्यूँ न शब्द से शब्द यह दास्तान उन्हीं के हवाले से बयान करें और फिर कुछ वाक्यों में अपना तजज़िया पेश कर दें ताकि कोई यह न कह सके के हम बिना किसी कारन मामले को खींच रहे हैं। पेश है, अनीता उदैया को रहस्यमयी तरीके से भोर के समय उस के निवास स्थान के नज़दीक से उठा कर अमेरिका ले जाने की दास्तान और फिर अमेरिका से वापसी के बाद जब उस ने इस रहस्य का इन्केशाफ़ किया तो डिप्टी कमिशनर पुलिस राकेश मरिया के ज़रिये उसे झूठा करार देने का प्रयास.

पहले अनीता उदैया के मामले से अमेरिका ले जाए जाने और वापसी के बाद की कहानी:
२६/११ की गवाह अनीता उदैया जो चुपके से गायब हो गई थी, का कहना है के उसे गोरे, अमेरिका ले कर गए थे। ११ जनवरी की सुबह से वह अचानक अपने घर से गायब हो गई थी और बहुत तलाश करने के बाद भी जब वो नहीं मिली तो उस के घर वालों ने पुलिस स्टेशन में उस की गुम होने की रिपोर्ट दर्ज करादी। लेकिन १४ जनवरी को वो फिर रहस्यमई तरीके से अपने घर वापस भी लौट आई। वापसी के बारे में बताते हुए उदैया की बेटी ने पत्रकारों से कहा के उस की माँ को जांच करने वाले अमेरिका ले गए थे। लेकिन मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने इस दावे को बकवास कहा है और यह भी कहा है के वो मुंबई के आतंकवादी हमलों की एक मात्र गवाह नहीं है। बल्कि उदैया के खिलाफ आई पी सी के सेक्शन १८२ के तहत पुलिस को ग़लत ख़बर देने और गुमराह करने का मामला भी दर्ज कर लिया गया है। अपने घर वापस लौटने पर उदैया ने मीडिया और पुलिस से बचने के लिए झूठ बोला था के वो अपने रिश्तेदारों से मिलने सतारा जिला चली गई थी और वहां से विरार में जीवदानी की तीर्थ पर चली गई थी। लेकिन जब क्राइम ब्रांच ने उस की सच्चाई पर प्रशन चिन्ह लगाने शुरू कर दिए तो उस ने मीडिया के सामने सच बात कहने में ही खैरियत जानी।
पत्रकारों से बात करते हुए अनीता उदैया ने बताया के "मैं गायब नहीं हुई थी, मैंने अपने पति को इस की ख़बर दे दी थी। २७ नवम्बर २००८ से ही कुछ विदेशी मेरे संपर्क में थे। उन्होंने मेरी कहानी सुनी थी के कैसे मैंने उन लड़कों (आतंकवादियों) को यहाँ आते हुए देखा था। मुझ से तीन बार मिलने के बाद उन्होंने बताया था की वो एक दो दिन के लिए मुझे कहीं बाहर ले जाना चाहते हैं। मैंने उन पर विशवास किया, मैं उन की मदद करना चाहती थी, इस लिए मैंने "हाँ" में जवाब दे दिया। मैं सतारा नहीं गई थी, बल्कि अमेरिका गई थी। मैंने पुलिस से सतारा जाने की बात इस लिए कही क्यूंकि मैं डर गई थी।"

उदैया एक जाहिल औरत है, वो विस्तार से बयान नहीं करसकती, उस की कहानी में कई झोल भी हैं और अपने दावे को सच साबित करने के लिए उस के पास कोई कागज़ इत्यादि भी नहीं है।
अगर उस की बात सच है तो यह एक खुफिया इंटेलिजेंस ओपरेशन की निशानदही करता है।
हमारी मुलाक़ात उदैया से ब्रहस्पतिवार यानि १५ जनवरी की सुबह ७ बजे हुई जब वो अभी अभी नहा कर बाहर निकली थी और अपने बालों में कंघी कर रही थी लेकिन उस के चेहरे पर थकान दिखायी दे रही थी। उस का कहना था की "चारों तरफ़ से यलगार की वजह से मैं बहुत नाखुश हूँ। पुलिस हमें परेशान कर रही है। वो विरार में मेरी बेटी के पड़ोसी के घर भी गई थी, इस के बाद यहाँ पर मीडिया का हुजूम है।"

इस के बावजूद वो हम से बात करने के लिए तैयार हो जाती है। उदैया बताती है के २७ नवम्बर को यह बता देने के बाद के उस ने ६ लोगों को समुद्रतट से किनारे की तरफ़ आते हुए देखा था, बहुत सरे लोग इस सिलसिले में उस से बात चीत करनेके लिए आने लगे। उस की यह बातें बाद में टी वी पर भी दिखाई गयीं। उस के कुछ देर बाद ही कुछ "लंबे चौड़े क़द वाले लोग" उस से मिलने के लिए आए। उन के साथ एक हिन्दुस्तानी भी था (अनुवाद करने वाला)जिस का नाम शायद सुधाकर था "छोटा क़द, काला चेहरा, घुंघराले बाल और बड़ी बड़ी मूंछें" वो उस से इस बारे में बात करना चाहते थे के उस ने क्या देखा।

दिसम्बर के अन्तिम दिनों में और जनवरी के प्रारम्भ में उन्होंने अनीता उदैया से तीन बार मुलाक़ात की , उस से ज़्यादा से ज़्यादा विस्तार जानने की कोशिश की। और फिर उस से यह पूछा की वो उन के साथ कुछ दिनों के लिए देश से बहार जाने के लिए राज़ी है"। मैंने उन पर विशवास कर लिया, मैं उन की सहायता करना चाहती थी, इस लिए मैंने "हाँ" कह दिया। उस ने अपना यह बयान क्राइम ब्रांच के सामने भी दर्ज कराया था और उस का कहना है की मुंबई पुलिस के लोग भी उस से कई बार प्रशन कर चुके थे।

उदैया ने आगे बताया के "यह विदेशी मेरे साथ बड़ी अच्छी तरह पेश आए और मैंने उन से कहा के अगर वो मुझे सुरक्षित मेरे घर वापस छोड़ देंगे तो मैं उन के साथ जाने को तैयार हूँ।"
देश से बाहर जाने की तयारी में अनीता उदैया को एक "बड़े एयर कंडीशंड हॉस्पिटल" ले जा कर उस का मेडिकल टेस्ट कराया गया। लेकिन वो अस्पताल को नहीं पहचानती। उसे बताया गया के उसे शनिवार को बहार ले जाया जाएगा। क्यूंकि उस का पति सेंट जोर्ज हॉस्पिटल में भरती है और उस के दो छोटे बच्चे घर पर रहते हैं जिन की देखभाल उसे ख़ुद करनी पड़ती है, इसलिए उस ने अपनी बड़ी बेटी को (जो के विवाहित है और अपने पति के साथ विरार में रहती है) उसे कुछ दिनों के लिए अपने ही घर पर बुला लिया। उस ने एक छोटा सूट केस भी पैक किया, उस ने हमें यह दिखाया भी, जिस में उस ने अपनी सब से अच्छी दो साडियाँ रखीं। शनिवार को देर रात तक वो उन की प्रतीक्षा करती रही लेकिन वो नहीं आए।

रविवार (११ जनवरी) की सुबह को ५ या ६ बजे के आस पास उसे फोन कर के बताया गया के वो अपने घर से बाहर निकल आए और साथ में कोई भी सामान न लाये" यह बहाना करते हुए के " मैं शौचालय जा रही हूँ" वो घर से बाहर निकली।

कुछ दूरी पर एक गाड़ी उस का इंतज़ार कर रही थी। "मैं ने उन से कहा के जाने से पहले मुझे अपने पति से मिलना है इसलिए वो मुझे सेंट जोर्ज हॉस्पिटल ले गए जहाँ पर मैंने अपने पति से कहा के मैं कुछ दिनों बाद वापस आ जाउंगी ,उस ऐ बाद हम लोग एयर पोर्ट चले गए जहाँ मुझे एक स्कर्ट, ब्लाउज और एक स्कार्फ पहेन्ने के लिए दिया गया। इस के बाद हम लोग एक जहाज़ में सवार हो गए, यह सफ़ेद और नीले रंग का था और उस की दुम पर एक सितारा बना हुआ था। यह बड़ा जहाज़ नहीं था। मैं जिस सीट पर बैठी थी उस के आगे की कुछ सीटें खाली थी। उस जहाज़ में कुल १५-२० लोग थे। जब यह जहाज़ उड़ने लगा तो मैं बहुत घबरायी लेकिन कुछ देर बाद सब ठीक होगया और मैं सो गई"।

जब हम लोग जहाज़ से उतरे तो रात का समय था। वो एक बहुत बड़ा एअरपोर्ट था। उन्होंने मुझे कुछ सिक्यूरिटी चेक से गुज़ारा, उस के बाद हम बाहर आगये। जब हम बाहर आए तो बहुत ठण्ड थी। बहुत ही ठण्ड लेकिन उसे बर्दाश्त किया जासकता था। हम जल्द ही एक कार में बैठ गए और आगे को चल दिए। सड़कों पर अधिक भीड़ नहीं थी, जैसा के मुंबई में होती है, रास्ते में मैंने बड़ी बड़ी इमारतें देखि, ठीक वैसी ही जैसी के हमारे यहाँ का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर है। मुझे एक होटल में ले जाया गया। क्या ही शानदार कमरा था! बिस्तर भी उतना ही मुलायम और स्प्रिंग की तरह था, लेकिन मैं आप को बताऊँ, मैं ज़मीन पर ही सो गई क्यूँ की मुझे इस की आदत थी। लेकिन इस से पहले हमें रात का खाना खिलाया गया, यह विदेशी खाना था, लेकिन मैंने उस की परवाह नहीं की।"
उदैया के अनुसार, अगली सुबह उसे एक ईमारत में ले जाया गया जो के उस होटल से बहुत दूर था, उस की दूरी उतनी ही थी जितनी के "कोलाबा से मछीमार नगर है" वहां हमें एक कमरे में ले जाया गया जहाँ पर पहले से ३०-४० लोग मौजूद थे लेकिन बीच में एक बड़ा काला आदमी बैठा हुआ था, जिस ने मुझ से पूछा के जब आतंकवादी वहां पर उतरे तो समय क्या हो रहा था, उन की सूरत शकल कैसी थी, वो कौन सा कपड़ा पहने हुए थे, उन के कन्धों पर लटके हुए बैग का रंग कैसा था, उन के उतरने और कोलाबा में होने वाले पहले धमाके के बीच कितना समय गुज़रा था। क्या मैं यह जानती हूँ की उन (आतंकवादियों) का ख़ास निशाना विदेशी ही थे।"

प्रशन व उत्तर के इस लंबे वक़्त के दौरान उदैया को कई बार काफ़ी पिलाई गई। उदैया के अनुसार, उस की यह पूरी बातचीत कैमरे के ज़रिये रिकॉर्ड भी की जा रही थी। जब उसे वहां से वापस होटल में लाया गया तो शाम का अँधेरा छा चुका था। "लोग मेरे साथ बहुत अच्छी तरह पेश आए और उन्होंने मुझ से कहा के अगर आव्यशकता पड़ी तो वो मुझे दोबारा बुलाएँगे।"

जब वो एअरपोर्ट पहुँची तो दोबारा अँधेरा हो चुका था। "जिस समय में मुंबई से चली थी उस वक़्त एअरपोर्ट पर ज़्यादा देर इंतज़ार नहीं करना पड़ा था, लेकिन यहाँ पर मुझे एक बड़े कमरे में ले जाया गया और वहां पर कई घंटे तक इंतज़ार करना पड़ा। जिस हवाई जहाज़ से हम लोग वापस आए वो भी अलग था। यह एक बहुत बड़ा जहाज़ था, उस में गोरी एरहोस्टेस के अलावा कुछ औरतें साडियों में भी थीं, जो हमारी सेवा कर रही थीं और उस जहाज़ का रंग सफ़ेद था जिस पर लाल रंग की धारी बनी हुई थी।"

यह जहाज़ बीच में भी कहीं पर आधे या एक घंटे के लिए रुका, लेकिन उदैया को नहीं मालूम के वो जगह कौन सी थी। उदैया मुंबई में मंगलवार की शाम ६ बजे पहुँची और फिर उसे एक होटल में ले जाया गया, बहुत ही "आलिशान" होटल जहाँ पर उसे हिन्दुस्तानी खाना दिया गया।"खाना आने में काफ़ी देर लगी, जो आदमी मेरे साथ था, वो मुझ से लगातार बातें किए जा रहा था, लेकिन जब खाना आया तो यह सचमुच बहुत ही बढ़िया खाना था।"

इसी होटल में लगभग ४८ घंटों के बाद उदैया ने अपने कपड़े बदले। रात के ११ बजे उस के लिए एक टैक्सी बुलाई गई और टैक्सी ड्राईवर को ५०० रूपये दे कर कहा गया के उदैया को कोलाबा में स्थित उस के घर छोड़ दे। "मैं वापस आई, वहां पर मैंने पुलिस और मीडिया वालों को मेरा इंतज़ार करते हुए पाया, और फिर सारा तनाजा शुरू हो गया।"

बार बार पूछने के बावजूद उदैया ने और विस्तार बताने से मना कर दिया, उस ने किसी विदेशी का नाम भी नहीं बताया और न ही उस का नाम बताया जो शुरू से आख़िर तक उस के साथ रहा। परन्तु उस ने हमें कुछ कार्ड दिखाए जो विदेशियों के थे और वो भी पत्रकारों के विजिटिंग कार्ड थे। लेकिन उदैया की बेटी न बताया के उस की माँ को १०,००० अमेरिकी डॉलर देने का वादा किया गया है, लेकिन यह पैसे अभी उसे मिले नहीं हैं।

उदैया की २५ वर्षीय सब से बड़ी बेटी, सीमा केतन जोशी जो अपने पति के साथ विरार में रहती है, ने बताया के "मेरी माँ उस से पहले क्राइम ब्रांच के कार्यकर्ताओं के साथ आतंकवादियों की लाशों को पहचाने के लिए गई थी और पिछले कई दिनों से बार बार यह कह रही थी के बहुत जल्दी कोई उस को बुलाएगा और ये के "उस को कुछ दिनों के लिए ले जाने की तैयारियां चल रही हैं" लेकिन हमारी बार बार की कोशिशों के बावजूद उस ने हमें यह बताने से इंकार कर दिया के कौन उसे ले कर जायेगा और कहाँ। शनिवार के दिन हम लोग दिन भर बैठे हुए येही बातें करते रहे और रविवार की सुबह को लगभग ६ बजे जब वो शौचालय के लिए गई तो वहां से वापस नहीं लौटी।"

आस पड़ोस में उस की छान बीन करने के बाद जब उस का कहीं पता नहीं चला तो उदैया की फॅमिली कफ़ परेड पुलिस स्टेशन पहुँची और गुम होने का मामला दर्ज करा दिया। कफ़ परेड पुलिस स्टेशन के सब इंसपेक्टर सुनील विपत ने बताया के "हम ने शहर के सभी पुलिस स्टेशन को एलर्ट कर दिया है और दूरदर्शन पर उदैया की तस्वीर भी दिखाई है। हमें इस के बारे में अब तक कोई सुराग नहीं मिला है।" क्राइम ब्रांच के सीनियर कार्यकर्ता जो इस हमले की जांच कर रहे हैं, उन्होंने कोई भी बात करने से इंकार करदिया है।

इस बीच, उदैया की फॅमिली के लोगों और उस के पड़ोसी लगातार उस की खोज में लगे रहे और उन्हें इस बात का डर भी रहा कहीं उस की जान खतरे में न पड़ जाए क्यूंकि वो २६/११ हादसे की जांच से जुड़ी है। उदैया, जो बुधवार पार्क में सफाई का काम करती थी, उस दिन अपने घर के बाहर बैठी हुई थी जब उस ने आतंकवादियों को उधर से गुज़रते हुए देखा। कालोनी के चेयरमैन मधुसुदन नायर के अनुसार, जिस समय आतंकवादी वहां से गुज़र रहे थे उस समय उस (उदैया) के कुत्ते न उन पर भोंकना शुरू कर दिया, इस लिए उस न यूँही उन लोगों से पूछ लिया के वो कौन हैं, लेकिन उन आतंकवादियों न उसे झिडकते हुए कहा के वो अपना काम करे।

नायर ने बताया के जब उदैया ने उस से यह कहा के वो बाहर जाने वाली है तो उसे शक हुआ था के यह जांच का हिस्सा हो सकता है। नायर के अनुसार, "उस के गायब होने से कुछ दिनों पहले हम दोनों में बात चीत हुई थी और उस समय उस ने बताया था के उसे कुछ दिनों के लिए देश से बाहर जाना पड़ सकता है। उस ने यह भी कहा था के उस का पासपोर्ट जारी करने की भी तयारी चल रही है क्यूंकि वो क्राइम ब्रांच के दफ्तर में कई बार जा चुकी थी और फिर वहां से वापस आ जाती थी इस लिए मैंने सोचा के यह भी उसी जांच का हिस्सा हो सकता है। लेकिन वो अचानक गायब हो गई और हमें उस के बारे में कुछ भी पता नहीं चला के वो कहाँ है, अब हम उस की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।"

इसी बीच, आज एक और घटना घटी जिस ने उस के परिवार के लोगों को और क्रोधित कर दिया, उन के पास मौजूद एक मात्र मोबाइल भी उन के घर से चोरी हो गया। सीमा ने बताया के "जिस समय हम लोग अपने दरवाज़े के बाहर खड़े पत्रकारों से बात कर रहे थे उसी समय किसी ने हमारे उस मोबाइल को घर से चुरालिया। यह एक ही मोबाइल था जिस से हमारी माँ हम से संपर्क बनाये रखती थी लेकिन अब यह भी गायब हो चुका है।"
अनीता उदैया की अमेरिका से वापसी

पी टी आई को बताते हुए अनीता उदैया ने कहा है के "मुझे यह बताया गया था के (अमेरिका के) जिन अफसरों ने मुंबई हमलों के बारे में मुझ से प्रशन किए थे वो मुझे अमेरिका ले कर जायेंगे। वो रविवार की सुबह मेरे पास आए और मुझे एक हवाई जहाज़ के ज़रिये अमेरिका ले जाया गया। जब मैं वहां से वापस आई तो मैंने पुलिस से झूट बोला के मैं सतारा जिला गई थी (अपने भाई के पास) क्यूंकि उन अफसरों ने मुझ से कहा था की मैं अमेरिका जाने के बारे में किसी को कुछ न बताऊँ।"
अमेरिका जाने की कहानी बयान करते हुए उदैया ने कहा के शनिवार की रात को लगभग १० बजे उदैया जांच करने वाले अफसरों के आने का इंतज़ार कर रही थी। बाद में रविवार की सुबह जब वो शौचालय के लिए बाहर गई तो वहीँ से चार अफसर उसे एक गाड़ी में बिठा कर एअरपोर्ट ले गए। उदैया के मुताबिक उन चारों में से एक अफसर हिन्दी जानता था।

उदैया ने बताया के "सब से पहले मुझे सेंट जोर्ज हॉस्पिटल ले कर जाया गया ताकि मैं अपने पति राजेन्द्र को देख सकूँ। मैंने अपने पति को बताया के मैं कुछ दिनों बाद घर लौट आउंगी।" अस्पताल से मुझे एअरपोर्ट ले जाया गया। मुझे एअरपोर्ट पर बिठा दिया गया और बाक़ी अफसर एअरपोर्ट पर मौजूद कार्यकर्ताओं को कागज़ दिखने में लगे हुए थे। मेरे पास कोई सामान नहीं था। कुछ देर बाद, मैं जहाज़ में सवार हुई परन्तु मैं वहां पर बेचैनी महसूस कर रही थी।

उदैया जिस न हवाई जहाज़ के उस सफर में १७-१८ घंटे गुजारे,ने बताया के "सफर के दौरान ही मुझे बताया गया के हम अमेरिका जा रहे हैं। मैं हवाई जहाज़ में ठीक ढंग से खाना नहीं खा पा रही थी क्यूंकि वो लोग मुझे चॉकलेट सेनविच और खाने पीने की दूसरी चीज़ें दे रहे थे। मुझे नहीं मालूम के मैंने वो चीज़ें कैसे खायीं।"

"अमेरिका में हवाई जहाज़ से उतारते ही मुझे एक कार में बिठा कर एक आलिशान होटल में ले जाया गया। कुछ घंटों के बाद हम सब लोग एक बड़ी ईमारत में गए जहाँ पर मुझ से आतंकवादियों और मुंबई हमलों के बारे में कई प्रशन पूछे गए। मैं हिन्दी में जो कुछ बताती थी उस का अनुवाद अंग्रेज़ी में एक अफसर करता था और फिर अंग्रेज़ी में पूछे गए प्रशन का हिन्दी में अनुवाद करके मुझे बताया जाता था। यह सिलसिला दो तीन घंटे तक चला।"

"मैंने (हामिद कुरैशी )मुंबई का एक स्क्रैप डीलर जहाँ अनीता उदैया काम करती है) को फ़ोन के ज़रिये कई बार बताया के मैं सुरक्षित स्थान पर हूँ।" उस के बाद उदैया को उस ईमारत से वापस उस होटल में लाया गया फिर मुंबई ले जाने के लिए वहां से एअरपोर्ट लाया गया। मुंबई एअरपोर्ट से एक टैक्सी के ज़रिये वो अपने घर वापस लौट आई।

अब ऐसी खबरें मिले रही हैं की मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने उदैया के ख़िलाफ़ इंडियन पेनल कोड के सेक्शन १८२ के तहत पुलिस को गुमराह करने और ग़लत ख़बर देने का मामला दर्ज कर लिया है। मुंबई पुलिस (क्राइम ब्रांच) के जोइंट कमिशनर राकेश मारिया ने कहा है के उदैया अमेरिका नहीं गई थी बल्कि सतारा जिले में रहमत पूर गाँव गई थी। लेकिन प्रशन यह उठता है के राकेश मारिया को यह सब कैसे पता चला और वो यह बात यकीन के साथ कैसे कह सकते हैं। मारिया ने और जानकारी देने से मना कर दिया है।

इस बीच हिंदुस्तान में स्थित अमेरिकी सिफारत खाने के एक व्यक्ति ने अनीता उदैया के अमेरिका लेजाने की बात को खारिज कर दिया है।

मुंबई के डिप्टी कमिशनर राकेश मारिया का कहना है के अनीता उदैया झूठ बोल रही है, ऐसा ही कहा गया था डॉक्टर हरी कृष्ण के मामले में जो दिल्ली में हुए फर्जी एनकाउंटर (चश्मदीद गवाह डॉक्टर हरी कृष्ण) अंसल प्लाजा, जहाँ पुलिस ने दो नौजवानों को कार से बाहर निकाल कर गोली मार दी और फिर उन्हें आतंकवादी करार दे दिया। इस मामले की पूरी फाइल इस समय मेरे सामने है और इस लेख के अगले सिलसिले में पूर्ण विस्तार पाठकों की सेवा में पेश की जायेगी जो यह साबित करती है के पुलिस किस तरह चश्म दीद गवाहों को परेशान करती है, उन्हें लालच देती है, धमकियां देती है। अनीता उदैया तो एक गरीब, कमज़ोर, अनपढ़ औरत है, जब डॉक्टर हरी कृष्ण जैसे शिक्षित, समाज में एक अच्छी पोजीशन, दिल्ली की एक पोश कालोनी के शानदार बंगले में रहने वाले व्यक्ति को पुलिस परेशान कर सकती है, उन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर सकती है क्यूंकि उन्होंने इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा के ज़रिये किए गए उस फर्जी एनकाउंटर की असलियत को सामने रखा था, जी हाँ यह वही एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा हैं जिन्होंने ओपरेशन बटला हाउस में भाग लिया था।

२६ नवम्बर २००८ को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के बाद २८ नवम्बर को मैं ने अपने जारी लेख की ८५ वीं कड़ी इस टाइटल "हेमंत करकरे के बाद ऐ टी एस" के तहत शहीद वतन हेमंत करकरे की मौत पर शक का इज़हार किया था, उस के बाद मुसलसल १० दिनों तक लगभग हर दिन अपने लेखों के ज़रिये हम ने वो प्रशन सामने रखे जिन का उत्तर न तो पुलिस के पास था और न ही हिन्दुस्तानी सरकार के पास। क्यूंकि आज भी वो प्रशन अपनी जगह मौजूद हैं और उस पर लिखने का सिलसिला भी जारी है इस लिए आज के इस लेख में हम उस दौरान लिखे गए लेखों के कुछ टाइटल पाठकों की सेवा में पेश कर देना आवयशक समझते हैं।

८५ कड़ी: हेमंत करकरे के बाद ऐ टी एस (२८.११.२००८)

८६ कड़ी: मालेगाँव धमाकों की जांच और मुंबई आतंकवादी हमलों का क्या कोई सम्बन्ध है? (२९.११.२००८)

८७ कड़ी: करकरे के बाद भी क्या बेनकाब हो पायेंगे सफ़ेद पोश दहशत गर्द? ( ०१.१२.२००८)

८८ कड़ी: 5 अलग अलग स्थान पर 60 घंटे तक तबाही और केवल 10 आतंकवादी, बात कुछ हज़म नहीं हुई (०२.१२.२००८)

८९ कड़ी: शहीदों के रिश्तेदार न्याय मांग रहे हैं वह समझते हैं की जो दिख रहा है उसके परदे में सच्चाई कुछ और भी है (०३.१२.२००८)

९० कड़ी: मुंबई पर आतंकवादी हमला या क्रिया की प्रतिक्रिया "क्रिया" करकरे की जांच और "प्रतिक्रिया" करकरे की मौत (०४.१२.२००८)

९१ कड़ी: किसी भी निर्णय से पहले हमारी सरकार यह तो सोचे विश्वसनीय कौन! आतंकवादी "क़सब" या "शहीद करकरे" (०५.१२.२००८)

९२ कड़ी: प्रज्ञा और प्रोहित नए नहीं हैं आतंकवाद १९४७ से ही आर एस एस का कल्चर रहा है(०६.१२.२००८)

९३ कड़ी: १९९३ के अतिरिक्त सभी आतंकवादी घटनाएं संघ व मोसाद की साजिश का नतीजा हैं! करकरे इस सच्चाई को सामने ला रहे ठ(०७.१२.२००८)

९४ कड़ी: कौन है मास्टर माइंड इन आतंकवादी हमलों का, क्या सोचते हैं आप! विचार करें और बताएं (०९.१२.२००८)

अब यह सभी लेख एक बार फिर शहीद वतन हेमंत करकरे की शहादत यानी अपने जारी लेख की १०० कड़ी के दूसरे एडिशन में प्रकाशित किए जा रहे हैं।

हालात और सबूत जिस तरफ़ इशारा कर रहे हैं, उन से अंदाजा होता है के २६ नवम्बर २००८ को मुंबई पर हुआ आतंकवादी हमला सिर्फ़ १० आतंकवादियों का कारनामा नहीं था बल्कि एक ऐसे विदेशी षड़यंत्र का परिणाम था जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच जंग देखना चाहती थी, जो हिंदुस्तान को खाना जंगी का शिकार देखना चाहती थी, जो हिंदुस्तान में हिंदू और मुसलमानों के बीच ऐसी ही कशीदगी देखना चाहती थी, जो ६ दिसम्बर १९९२ को बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद देखि गई। और उन विदेशी ताकतों में अमेरिका और इस्राइल शामिल नज़र आते हैं।

अगर हिन्दुस्तानी सरकार अपने देश को उन विदेशी शिकंजों से बचाना चाहती है और उसे हिंदुस्तान की १०० करोड़ जनता की थोडी सी भी चिंता है तो उन सच्चाइयों को सामने लाना ही होगा जो उन आतंकवादी हमलों से जुड़ी हैं। हिन्दुस्तानी सरकार को बताना होगा के नरीमन हाउस का सच क्या है? जिस तरह के इशारे मिल रहे हैं २६, २७ और २८ नवम्बर को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों का केन्द्र नरीमन हाउस था, जिसे छाबड़ हाउस के नाम से भी जाना जाता था, उस नरीमन हाउस में उन तीन दिनों में क्या हुआ उस की अकेली चश्मदीद गवाह सेंड्रा सामुएल जो इस्राइली रब्बी ग्योरेल नोच होतेज्बर्ग और उस की पत्नी रिविका के बच्चे की आया थी और जो उसी दिन से इस्राइल में है और इस्राइली सरकार उसे अपने देश के सब से बड़े अवार्ड से नवाजने जा रही है।

आख़िर क्या वजह है के वो अपने दो बेटों को हिंदुस्तान में छोड़ कर दूसरे की औलाद की परवरिश के लिए इस्राइल में रहना चाह रही है, क्या यह उस की मर्ज़ी है या उस के ऊपर इस्राइल का ऐसा दबाव है के उस के पास इस के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं, हिन्दुस्तानी सरकार उसे वापस बुलाकर सभी बातों की जानकारी क्यूँ नहीं चाहती? हिंदुस्तान की पुलिस उस का बयान लेना ज़रूरी क्यूँ नहीं समझती? वो पासपोर्ट और विज़ा के बिना किस तरह इस्राइल पहुँची? उन तीन दिनों में उस ने क्या देखा? वो कौन लोग थे जिन्हें आतंकवादियों न मार दिया और वो आतंकवादी कौन थे जिन के कब्जे में नरीमन हाउस था? किन लोगों के लिए १०० किलो मांस और २५००० की शराब मंगाई?

इसी तरह हिन्दुस्तानी सरकार को इन प्रशनों का उत्तर भी देना होगा के अनीता उदैया को पासपोर्ट और विज़ा के बिना हिंदुस्तान के बाहर कैसे ले जाया गया? हिंदुस्तान की पुलिस को उस की जानकारी क्यूँ नहीं थी? ऍफ़ बी आई या अमेरिकी खुफिया एजेन्सी को उस से किसी भी जानकारी की आव्यशकता क्यूँ पड़ी? हमारी सरकार और पुलिस उस चश्मदीद गवाह के अमेरिकी सफर को छिपाना क्यूँ चाहती है? क्या अमेरिका ले जा कर उस पर यह दबाव डाला गया के उस दिन रबर की कश्ती से पहुँचने वाले आतंकवादियों का सही हुलया वो अपनी ज़बान पर न लाये? क्या वो आतंकवादी गोरी चमड़ी के थे?क्या उस आतंकवादी हमले में अमेरिका और इस्राइल शामिल है? क्या वो इस चश्मदीद गवाह की ज़बान को खामोश रख कर उस राज़ पर परदा रखना चाहते हैं?

हो सकता है के हिन्दुस्तानी सरकार आज इन प्रशनों का उत्तर न देना चाहे मगर जल्दी ही होने वाले चुनाव में उसे ऐसे प्रशनों से गुज़रना होगा। हमारे सामने डॉक्टर हरी कृष्ण की सूरत में एक ऐसा ही चश्मदीद गवाह मौजूद है क्यूंकि हमने अंसल प्लाजा केस की फाइल को पढ़ा है इस लिए हम अंदाजा कर सकते हैं. जो कुछ डॉक्टर कृष्ण के साथ गुज़रा वैसा ही कुछ अनीता उदैया के साथ भी गुज़रा होगा।

Tuesday, January 20, 2009

Thursday, January 15, 2009

The lines I have written on my heart
The terrorist attack on Mumbai on 26th Nov.2008 was indeed attack on the sovereignty and integrity of India. If this attack was due to the mischief of Pakistan,, then India should make Pakistan learn a lesson which all of its future generations should remember and those generations should completely keep away from abetting all terrorist activities.
And
If the antinational elements have orchestrated this attack with the help of Israel’s Intelligence Agency Mossad, then it should be made clear that these are not those days when the British came to India pretending to sell prices and captured India.
We know that nowadays terrorism has became your business and India and Pakistan seem like fertile land for it so that your business goes on and you could terrify the Arab countries and keep their oil wealth under captivity.
It is for these dirty designs that you have created an arms depot in the region in the name of Israel so that you could create trouble in India whenever you wish, through your paid agents, whenever you wish, you could colour the land of Pakistan in blood bath. This strategy of yours gave you an opportunity rule in Afghanistan and Iraq indirectly. But what you got in return, an Iraqi journalist Muntezir Zaidi threw his shoes on the face of the most powerful person of a powerful country.
The throwing of shoes by Muntezir Zaidi signifies how nationalist and humanitarian people treat the enemies of humanity. This also signifies that how the people of Iraq react on your efforts to divide Iraq on the basis of Shia and Sunni population.
The shoe thrown on the face of the President who is on the threshold of retirement was however prevented by his paid agent and so-called Iraqi rulers but who saved him from the shoes which were thrown afterwards on him by the entire world. We know that it is possible that there might be certain people in India also who have the same mindset as that of Noori Almaliki who support the same form of governance which does not want that the real masterminds of Mumbai attacks be exposed. They do not want that the ugly faces of their masters unveiled so that their help remains intact till the time when their dream is realized.
But will the 100 crore people of India allow the conspiracy succeed at the expense of the destruction of their beloved country and slavery? Does the majority of the people of India not know that the people who destroyed 13 temples in Ayodhya under the pretence of constructing a temple in the name of Lord Ram, will divide and destroy India numerous times in the name of Hindu Rashtra?
This article is my personal opinion which has reached you, as also the 100th series of my continuous article entitled “The Muslims of India: past, present and the future.” I am addressing you at this time not only as the Group Editor of Urdu Sahara but also as a peace loving, patriotic Indian. Probably I am the only citizen of India. (as the late Nirmala Deshpande has said) who had before the marriage of her daughter, takes the bride and bridegroom to the Delhi Jamia Masjid to perform the Namaz of gratitude and thereafter reached the tomb of Mahatma Gandhi, the Messaih of independence, to place the wreath, then went to temple, Gurudwara, Church to pay respect and take the blessings of religious heads of all religions and thereafter went to meet and take blessings of any mentor and guide Sahara Shree.
I am such an Indian that when the terrorist exploded bombs before Eid and Deevali in Sarojini Nagar, did not celebrate Eid spent all the day before the tomb of Mahatma Gandhi reciting the holy Quran and performing Namaz with the family.
Therefore I reserve the right to say that I am the flag bearer of the secular multi religious and multi lingual culture of the country. I am true Muslim, so also a true Indian and humanitarian.
I am well aware of the mentality of the sanghy, the Farangi and the War-mongers. A Sanghi is one who want to make the country the slave of their mentality under the pretext Hindu Rashtra and Martyr Hemant Karkare was unveiling the faces of these elements. The Farangi are not confined only to the British, today the American mentality is before us in its more dangerous form than the former and it wants to dominate the whole world and the Jangi or War-mongers are the self styled Mujahideen Lashkar-e-Taiba, ISI, Alqaeda Indian Mujahideen. All these are the arms and ammunition of Sanghi and Firangis. The terrorists who are part of them may be Muslims but they cannot be the Jihadi Groups of Muslims, they are only their tools. When there was the need to disintegrate soviet union, these Bin Laden, Alqaeda were the best friends of the Bush family. When they intended to destroy Iran, Saddam Hussain was their first choice and they intended to destroy Iraq, Pakistan was their friend. When they wanted to put India in the fire of terrorism, Lashkar-e-Taiba was their tool through the path of Kashmir. Lashkar-e-Taiba was brought up by these elements and Indresh had very close relations with Pakistan’s intelligence agency ISI. Martyr Hemant Karkare had revealed in his investigations that Indresh had borrowed. 3 crore rupees from ISI, Indresh has become now the fourth angle in the quadrilateral of Israel’s Mossad, whose other three angles are the Sanghi, Firangi and Jangi and they are probably responsible for the 26 Nov. 2008 terrorist attack on India through Mumbai.
Kindly think over……………..
Can only 10 terrorist from Pakistan and attack India in such a large scale, without any help from any quarter? No. It would not have been possible with the help of ordinary people.
It was possible only when the most influential and high ranking people guided them. Probably, to fulfill their evil designs these element used 10 paid agents provided with all the facilities and made them attack India which was the most shameful act and these elements do not want the secret to be revealed so that their hidden faces are not unveiled.
But it will not happen.
This is not a matter of Arushi murder case which was confined to a family and four walls of a house. This is the matter of the prestige of our beloved India, the prestige of 100 crore Indians. How long could the voice of those who want to sacrifice their lives for the prestige of the country be suppressed. How long would the voice of the soldiers who give away their lives standing on the border of the country to protect the nation, the voice of those brave and gallant men who liberated the Taj, the Oberoi and the Nariman House from clutches of the terrorist be suppressed. Are they not aware of the truth? Do they not know the purpose which their lives have been sacrificed for?
Indeed, it is possible that some members of our police and army are mislead and commit a mistake. But the entire society and nation rests on the trust bestowed upon the police and army. How long can they be mislead or their voice be suppressed.
Only these people will bring out the truth behind the terrorist attack, only they will protect the country from the actual and pseudo terrorists. They have been born in this soil, which is their motherland. And the sons of the soil will not tolerate that anybody cant an evil eye on the motherland, compulsion, diplomacy, fear can keep them silent only for sometime, not forever who sacrifice life in the battle ground, who faces the bullet headon, whose children are orphaned, whose family looses its head and heir?
Can a few notes of currency return the family its heir?
No., the houses will not be allowed to be darkened, Lives will be not sacrificed for the power greedy and traitors of the nation. The scene which on 29th Nov. 2008 at the Gateway of India, which was the expression of peace and unity will be seen by the whole world.
I am not writing an article at this time. These are not just a few words but a voice which should reach the hearts of all of you. This is just an example of my writings entitled “The lines which I wrote on the heart” (Jo Dil par Likha Hai Maine)
This is the true story which was seen with the eyes of an Indian Journalist who loves his country immensely and who does not want that his country become slave in front of his eyes.
I am writing this book in Urdu, Hindi and English and desire that it is translated in other Indian languages also and my voice reach the heart of every Indian and become their heart beat.
Therefore I am bringing out this special presentation, the 100th issue of my continuous Urdu, Hindi and English article expecting that it reaches every Indian. I have incorporated in this article, the articles of those writers who demand justice so that it is not considered only my voice but the voice of all Indians demanding justice.
I humbly request every patriotic citizen that a copy of this article be handed over to the police and army without fail because these people safeguard our society and nation. These people will bring out the truth and save the beloved nation from terrorists and terrorism.
And I also kindly request that a copy duly signed be sent to the Government of India through the District collector so that you all could bring out the truth. Then send me your special photograph and signed memorandum so that I can include it in my future series and take it to the President, Vice President and Prime Minister and present before them your feelings and realisations.
The last word:
All readers, writers, viewers have to right to take my writings which are available on the website of the newspaper, my books and blogs and publish them, can use them as excerpts, refer them in their speeches, though they may belong to any language or country. They do not require any permission in this regard.
With these a few words, I conclude.
Thank you,
May Allah protect you,
Jai Hind.
Aziz Burney
burneyazizburney@hotmail.com

Tuesday, January 13, 2009

जो दिल पर लिखा है, मैंने
२६ नवम्बर २००८ को मुंबई पर हुआ आतंकवादी हमला वास्तव में भारत की अखंडता पर हमला था, भारत की शान्ति और एकता पर हमला था, यदि यह हमला पाकिस्तान की शरारत से हुआ तो पाकिस्तान को ऐसा उचित जवाब दिया जाना चाहिए की उसकी आने वाली पीढियां भी याद रखें और भारत में आतंकवादी गतिविधियों के संरक्षण से तौबा कर लें।
और यदि यह हमला भारत की असामाजिक तथा सांप्रदायिक शक्तियों ने इस्राइल, मोसाद की सहायता से और अमेरिका के संरक्षण में किया तो उन सभी शक्तियों को एक आवाज़ में यह समझाना होगा की अब वह दौर नहीं की कुछ फिरंगी लौंग इलाइची का कारोबार करने के बहाने आयें और हिंदुस्तान को अपना गुलाम बना लें। हम जानते हैं, आतंकवाद आज तुम्हारा कारोबार है और उस के लिए तुम्हें भारत, पाकिस्तान उर्वरक भूमि की तरह नज़र आता है ताकि तुम्हारा यह कारोबार भी चलता रहे और तुम अरब देशों को भयभीत करके उनके तेल की संपत्ति पर कब्जा किए बैठे रहो। अपनी इन्हीं अपवित्र महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए तुम ने इस क्षेत्र में इस्राइल के रूप में अपना तोपखाना स्थापित किया है ताकि जब चाहो अपने खरीदे हुए गुलामों के द्वारा भारत में आतंक बरपा कर दो, जब चाहो पाकिस्तान की धरती को खून से रंग दो, तुम्हारी इस रणनीति ने तुम्हें परदे के आड़ में अफगानिस्तान और इराक पर शासन करने का अवसर प्रदान किया, लेकिन बदले में क्या मिला, दुन्या के सब से शक्तिशाली देश के सब से शक्तिशाली व्यक्ति के मुहँ पर एक इराकी पत्रकार मुन्तज़िर अलज़ैदी का जूता।
मुन्तज़िर अलज़ैदी का यह जूता जहाँ इस बात का प्रतिक है की मानवतावादी और देशप्रेमी मानवता के शत्रुओं का किस प्रकार स्वागत करते हैं, वहीँ इस बात का भी प्रतिक है की इराक को शिया और सुन्नी के बीच फूट की साज़िश का तुम्हें उस देश के नागरिक तुम्हें क्या जवाब देते हैं। विदाई द्वार पर खड़े निराश अमेरिकी राष्ट्रपति के मुख पर पड़ने वाले जूते को उनके द्वारा खरीदे हुए दास तथा इराक के तथाकथित शासक ने अपना हाथ आगे कर के बचा तो लिया परन्तु इस के पशचात संसार भर में पड़ने वाले जूतों से कौन बचा सका।
हम जानते हैं की नूरी अल्माल्की की मानसिकता के कुछ लोग भारत में भी हो सकते हैं, जो इसी प्रकार की सरकार के इच्छुक हैं। जो आज मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों के वास्तविक षड़यंत्र को बेनकाब होने से रोक देना चाहते हैं, इस लिए की उन के दागी चेहरे सामने न आपायें और इस लिए भी की उनके स्वामी बेनकाब न हों, ताकि उन का संरक्षण उन के दीर्घकालीन स्वप्न को ठोस रूप में लाने तक बना रहे।
परन्तु क्या भारत की १०० करोड़ जनता अपने प्यारे देश के विनाश और दासता के मूल्य पर इस षड़यंत्र को सफल हो जाने देगी....? क्या इस देश के बहुसंख्यक यह नहीं जानते की राम के नाम पर एक मन्दिर बनाने के बहाने अयोध्या के कई मन्दिर जिन्होंने तोड़ डाले, वो हिंदू राष्ट्र बनाने के नाम पर भारत की कितनी बार और कितने टुकड़े करेंगे...?
मेरा यह लेख व्यक्तिगत रूप में है जो आज आपके हाथों की शोभा बना। यह मेरे लगातार लेख "मुसलमानाने हिंद, माज़ी (अतीत), हाल (वर्तमान) और मुस्तकबिल (भविष्य)???" की १०० वीं किस्त है। मैं इस समय केवल उर्दू सहारा के समूह संपादक के रूप में नहीं बल्कि एक शांतिप्रिय, राष्ट्रभक्त भारतीय के रूप में आप से संभोदित हूँ। कदाचित मैं इस देश का एक मात्र वह नागरिक हूँ (जैसा की स्वर्गीय निर्मला देशपांडे ने कहा था) जो अपनी बेटी के विवाह के अवसर पर निकाह से पहले दूल्हा दुल्हन (सबा अज़ीज़ व शकील अहमद) को दिल्ली की जामा मस्जिद में नमाज़े शुक्र अदा करने केलिए ले जाने के बाद स्वतंत्रता के दूत राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की समाधी पर फूल चढ़ाने के लिए लेकर गया। इसके बाद मन्दिर, गुरुद्वारा और चर्च पर सम्मानस्वरूप इन तमाम धर्मों के प्रतिनिधियों से दुआओं के लिए हाज़री दी। तत्पश्चात अपने संरक्षक परम आदरणीय सहारा श्री की सेवा में हाज़िर हो कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। इस के पशचात निकाह का फरीजा अदा किया गया।
मैं वह भारतीय हूँ की जब ईद और दीपावली से पहले २९ अक्टूबर २००५ के दिन दिल्ली में आतंकवादियों के द्वारा बम धमाकों में ६१ निर्दोष लोगों की जान गई तो ईद न मानाने का निर्णय करते हुए सारा दिन शान्ति के दूत महात्मा गाँधी की समाधी पर अपने परिवार के साथ कुरान पढने और नमाज़ की अदायगी में गुज़ारा।
इस लिए आज मैं यह कहने का अधिकार रखता हूँ कि इस देश कि गंगा जमनी सभ्यता का झंडाबरदार हूँ, मैं जितना सच्चा पक्का मुस्लमान हूँ उतना ही सच्चा पक्का भारतीय और मानवता का मित्र भी।
मैं संघी, फिरंगी और जंगी तीनों कि मानसिकता से भलीभांति परिचित हूँ, संघी वे जो इस देश को हिंदू राष्ट्र के बहाने अपनी अपवित्र मानसिकता का दास बनाना चाहते हैं और जिन्हें शहीद हेमंत करकरे बेनकाब कर रहे थे, फिरंगी वह मानसिकता है जो केवल ब्रितिशियों तक सीमित नहीं, आज अमेरिकी मानसिकता इस से कहीं अधिक खतरनाक रूप में हमारे सामने है और जो सारे विश्व पर अपना वर्चस्व चाहती है। अब रहा सवाल जंगी का तो यह जंगी तथाकथित मुजाहिदीन लश्करे तैय्यबा, आई एस आई, अल क़ायदा , इंडियन मुजाहिदीन यह सब उन संघियों और फिरंगियों के हथ्यार हैं, इन में शामिल आतंकवादी मुस्लमान हो सकते हैं, परन्तु यह मुसलमानों के जिहादी ग्रुप नहीं हो सकते, इस्लाम के अनुयायी नहीं हो सकते, बल्कि यह उन उपरोक्त शक्तियों के खिलोने हैं, जब सोवियत संघ को टुकड़े टुकड़े करना था तो येही बिन लादेन और अल क़ायदा बुश परिवार के सर्वोत्तम मित्र थे, जब ईरान का विनाश करना था तो सद्दाम हुसैन उन कि पहली पसंद थे और जब इराक का विनाश करना था तो पाकिस्तान उन का दोस्त था, जब भारत को आतंकवाद कि आग में झोंकना था तो कश्मीर के रास्ते येही लश्करे तैय्यबा उनका हथ्यार था, उन ही कि सहायता से यह पला बढ़ा और पाकिस्तान कि गुप्तचर संस्था आई एस आई से इन्द्रेश के कितने निकट सम्बन्ध थे , यह रहस्योद्घाटन भी किया था शहीद हेमंत करकरे ने अपनी जांच में कि आई एस आई से ३ करोड़ रूपये प्राप्त किए थे इन्द्रेश ने। आज येही संघी, फिरंगी और जंगी के त्रिकोण में चौथा कोण शामिल हुआ इस्राइल और मोसाद का जो शायद २६ नवम्बर २००८ को मुंबई के रास्ते भारत पर आतंकवादी हमलों के लिए जिम्मेदार हैं।
ज़रा सोचिये..........! क्या केवल १० आतंकवादी पाकिस्तान से आकर भारत पर इतना बड़ा हमला कर सकते हैं, बिना किसी कि सहायता के? और हाँ! यह सामान्य लोगों कि सहायता से भी नहीं हो सकता, यह तभी सम्भव है जब देश के बहुत बड़े प्रभावशाली और कदावर व्यक्तियों की छत्रछाया उन को प्राप्त हो।
संभवत: अपने घिनौने उद्देश्य को पूरा करने के लिए संघी, जंगी और फिरंगी सबके उस गठजोड़ ने १० भाड़े के टट्टुओं का सहारा लेकर और उन्हें सभी प्रकार कि सुविधाएं उपलब्ध कराकर भारत पर यह शर्मनाक हमला किया, परन्तु ऐसा होगा नहीं, यह आरुशी मर्डर केस का मामला नहीं है जो एक घर परिवार कि चारदीवारी तक सीमित था, यह हमारे प्यारे देश भारत के मान सम्मान का मामला है, १०० करोड़ भारतियों के स्वाभिमान का मामला है, इसे कब तक दबाया जा सकेगा। देश की मर्यादा पर मर मिटने वाले शहीदों कि अंतरात्मा कि आवाज़ को, सीमा पर खड़े हो कर देश पर बलिदान हो जाने वाले सैनिकों कि आवाज़ को, ताज ओबेरॉय और नरीमन हाउस को आजाद कराने वाले जांबाज़ सिपाहियों के ज़मीर की आवाज़ को हमेशा हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। क्या यह सब नहीं जानते कि वास्तविकता क्या है? क्या यह नहीं जानते कि उनके साथियों की मूल्यवान जानें किस उद्देश्य के लिए कुर्बान हुई हैं? हाँ हो सकते हैं हमारी पुलिस और सेना में दो चार गुमराह जो धोके में आजायें और कोई गलती कर बैठें परन्तु हमारी पुलिस और सेना के भरोसे पर पूरा देश और समाज टिका है, कब तक उनको बहकाया जा सकेगा, कब तक उन की आवाज़ को दबाया जा सकेगा!
यही बताएँगे सच, इस आतंकवादी हमले का! यही बचायेंगे अपने देश को असली और नकली आतंकवादियों से, इसी मिटटी में जन्मे हैं ये! यह धरती इन की माँ है और माँ के मान की ओर कोई आँख उठा कर देखे, उसे इस धरती के सपूत कभी सहन नहीं कर सकते! मजबूरी, विपरीत परिस्थिति, डर और भय कुछ देर तो चुप रख सकता है, सदैव के लिए नहीं। आख़िर मरता कौन है, रन भूमि में जा कर सीने पर गोली कौन खता है, किस के बच्चे अनाथ होते हैं, किस का परिवार बे सहारा होता है, क्या भीख में मिले चांदी के यह कुछ सिक्के उस परिवार को उसके घर का चिराग लौटा सकते हैं।
नहीं! अब और घरों में अँधेरा नहीं होने देंगे। कुर्सी के भूके और देशद्रोहियों के लिए अपने प्राणों का बलिदान नहीं होने देंगे, जो दृश्य देखा गेट वे ऑफ़ इंडिया और पूरे भारत में २९ नवम्बर २००८ को वही शान्ति और एकता का दृश्य साड़ी दुन्या देखेगी।
मैं इस समय कोई लेख नहीं लिख रहा हूँ, यह मात्र शब्द नहीं हैं मेरे हृदय की एक आवाज़ है जिसे मैं आपके दिलों तक पहुँचाना चाहता हूँ, यह एक छोटा सा नमूना है, मेरे उस प्रयास का जिस पुस्तक को मैंने नाम दिया है "जो दिल पर लिखा है मैंने" एक ऐसे भारतीय पत्रकार की आंखों देखी दास्तान जो अपने देश से अत्याधिक प्रेम करता है और उसे अपनी आंखों के सामने पुन: गुलाम होते नहीं देख सकता।
मैं लिख रहा हूँ इस पुस्तक को उर्दू, हिन्दी और अंग्रेज़ी में और चाहता हूँ की अन्य भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद किया जाए ताकि यह आवाज़ हर भारतीय के दिल तक पहुंचे और उसके दिल की धड़कन बन जाए।
इसीलिए प्रस्तुत कर रहा हूँ अपनी विशेष प्रस्तुति, अपने लगातार लेख की १०० वीं किस्त उर्दू, हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषाओं में, इस आशा के साथ की यह प्रत्येक भारतीय तक पहुंचे, इसी सोच के अनुरूप मैंने शामिल किए हैं इस में उन लेखकों के लेख भी जो आज सत्य की आवाज़ बुलंद कर रहे हैं ताकि इसे केवल मेरी आवाज़ नहीं बल्कि भारत के सभी न्याय प्रियों की आवाज़ समझा जाए।
मेरी सम्मानपूर्वक प्रार्थना है, नम्र निवेदन है हर देश भक्त से की वह इस अंक की एक एक कॉपी पुलिस और सेना के एक एक सदस्य तक अवश्य पहुंचाएं, इसलिए की येही तो हमारे देश या समाज के रखवाले हैं, येही सच सामने लायेंगे और अपने प्यारे देश को आतंकवाद और आतंकवादियों से बचायेंगे। और प्रस्तुत करें इस की एक कॉपी अपने हस्ताक्षरों और एक मेमोरेंडम के साथ अपने जिलाधिकारी या निर्वाचित प्रतिनिधि के द्वारा भारत सरकार की सेवा में ताकि वे जान सकें की आप सब सच्चाई को सामने लाना चाहते हैं, फिर भेज दीजिये अपनी वह तस्वीर और हस्ताक्षरों वाला मेमोरेंडम मुझे ताकि मैं अपने इसी सिलसिले की अगली कड़ियों में इन्हें शामिल कर सकूँ और फिर उसे लेकर अपने देश के राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की सेवा में प्रस्तुत हो कर आप सब की भावनाएं उन की सेवा में प्रस्तुत करूँ।
एक और अन्तिम बात सभी पाठकों, लेखकों तथा प्रकाशकों को यह अधिकार प्राप्त है की वे मेरे सभी लेखों को जो मेरे अख़बार की वेब साईट , मेरी पुस्तकों और मेरे ब्लॉग पर उपलब्ध हैं, प्रकाशित कर सकते हैं, हवाले के रूप में प्रयोग कर सकते हैं, अपने भाषणों तथा संबोधनों में उल्लेख कर सकते हैं, चाहे उन के सम्बन्ध किसी भी धर्म, भाषा और देश से क्यूँ न हो, उन्हें इस विषय में किसी भी आज्ञा की आव्यशकता नहीं है।
क्या यह सिर्फ़ एक इत्तेफाक है की इस घटना पशचात इस्राइल ने फिलस्तीन पर आक्रमण कर दिया या फिर यह अंतर्राष्ट्रीय षड़यंत्र का हिस्सा! इंशा अल्लाह अति शीघ्र १०१ वीं कड़ी का आरम्भ इस विषय के साथ किया जायेगा। अब इजाज़त !
धन्यवाद
अल्लाह हाफिज़, जय हिंद
आपका
अज़ीज़ बर्नी